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                <title>Short Story - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>बाल कहानी: नाच न जाने आंगन टेढ़ा |</title>
                                    <description><![CDATA[प्राँजली की आदत थी कि वह छोटी से छोटी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बोलती थी। क्लास में कोई भी ऐसा बच्चा नहीं था, जिसका वह मज़ाक नहीं उड़ाती थी। कई बार तो उसके दोस्त नाराज हो जाते थे और कई बार हँसकर टाल देते थे। पर ज्यादा समय तक कोई भी उससे गुस्सा रह भी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/naach-na-jaane-aangan-tedha-a-bad-workman-blames-his-tools/article-28999"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-12/paranjli.gif" alt=""></a><br /><h6>प्राँजली की आदत थी कि वह छोटी से छोटी बात को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर बोलती थी। क्लास में कोई भी ऐसा बच्चा नहीं था, जिसका वह मज़ाक नहीं उड़ाती थी। कई बार तो उसके दोस्त नाराज हो जाते थे और कई बार हँसकर टाल देते थे। पर ज्यादा समय तक कोई भी उससे गुस्सा रह भी नहीं पाता था क्योंकि प्राँजली बहुत ही मिलनसार और हँसमुख थी। उसका सिर्फ एक यही दुर्गुण था कि वह जब देखों तब सब का मजाक उड़ाया करती थी और खुद को सबसे महत्वपूर्ण बताती थी। धीरे-धीरे उसके दोस्त भी उसकी इस आदत को जान गए थे, इसलिए उन्होंने इस बात पर ध्यान देना बंद कर दिया थाड़बातेन को अनुसना कर देते है तो एक दिन वह अपने दोस्तों से बोली – ‘‘मैं इस बार स्कूल के किसी भी सांस्कृतिक कार्यक्रम में जरूर भाग लूँगी।’’ सोनम ने आश्चर्य से पूछा – ‘‘क्या करोगी तुम उसमें?’’</h6>
<h6>‘‘मैं डांस करूंगी’’ प्राँजली ने गर्व से कहा।<br />
अमित ठहाका मारकर हँसता हुआ बोला – ‘‘पर तुम्हें डांस आता कहाँ है?’’</h6>
<h6>‘‘किसने कहा कि मुझे डांस नहीं आता?’’<br />
प्राँजली ने खिसियाते हुए जवाब दिया।<br />
मीना मुस्करा कर बोली-‘‘हम तो तुम्हारे साथ इतने सालों से पढ़ रहे हैं। हमने तो कभी नहीं देखा, तुम्हें डांस करते हुए!’’</h6>
<h6>‘‘हाँ-हाँ, क्योंकि कभी ऐसा मौका ही नहीं आया तो तुम में से किसी को भी नहीं पता है कि मैं बहुत अच्छा नाचती हूँ।’’</h6>
<h6>‘‘अरे वाह…’’ सभी दोस्त खुश होते हुए बोले।</h6>
<h6>यह देखकर प्राँजली को बहुत खुशी हुई और वह इतरा उठी। कुछ ही दिनों बाद उसकी सहेली नीलम का जन्मदिन था। नीलम ने अपने सभी दोस्तों को बुलाया था।</h6>
<h6>जब प्राँजली वहाँ पहुँची तो उसे सबके साथ गुब्बारे फोड़ने और गेम्स खोलने में बहुत मज़ा आया। थोड़ी ही देर बाद नीलम ने म्यूज़िक चलाया और सब को डांस करने के लिए कहा।</h6>
<h6>मीना बोली – ‘‘नहीं आज हम सब से पहले प्राँजली की डांस देखेंगे।’’<br />
प्राँजली ने आश्चर्य से कहा – ‘‘मेरा डांस!’’</h6>
<h6>अब तक प्राँजली यह भूल चुकी थी कि वह सभी दोस्तों के सामने अपने डांस की डींगें मार चुकी थी।<br />
नीलू ने उसे याद दिलाते हुए कहा-‘‘तुम ही ने तो उस दिन कहा था कि तुम बहुत अच्छा नाचती हो।’’</h6>
<h6>जब प्राँजली को कुछ नहीं सूझा तो उसने बहाना बनाते हुए कहा – ‘‘पर इस गाने पर नहीं, मुझे तो दूसरे गाने पर डांस करना आता है।’’</h6>
<h6>‘‘कोई बात नहीं, हम दूसरा गाना चला देते हैं!’’ नीलम ने उसकी तरफ देखते हुए पूछा।<br />
प्राँजली ने सोचा, कौन-सा इसके पास हर गाना होगा।<br />
पर उस दिन प्राँजली का पासा उल्टा पड़ गया।</h6>
<h6>वह जो भी गाने बता रही थी, नीलम एक के बाद एक गाने चलाते जा रही थी। प्राँजली के काटों तो खून नहीं, उसे तो बिलकुल ही नाचना नहीं आता था। सब लोग उसी की तरफ देख रहे थे।</h6>
<h6>तभी वह बोली-‘‘यहाँ पर नाचने में मुझे मज़ा नहीं आएगा। मुझे खुली जगह में नाचने में मज़ा आता है।’’</h6>
<h6>यह सुनकर सभी दोस्त जोरों से हंस पड़े। नीलम बोली ठीक है मैं उसकी आवाज बढ़ा देती हूँ, जिससे बाहर तक सुनाई पड़ेगा और तुम बाहर आँगने में डांस करो, हम लोग वहां देख लेंगे। अब प्राँजली का चेहरा उतर गया। वह सबसे बता भी नहीं सकती थी कि उसे बिलकुल भी नाचना नहीं आता है। उसने फिर एक बहाना सोचा और बोली-‘‘नहीं मुझे लग रहा है कि आज कुछ मौसम ठीक नहीं है और शायद यह ज़मीन भी उबड़-खाबड़ है। मैं फिर कभी नाचूँगी।’’</h6>
<h6>यह सुनते ही नीलम की दादी जोरों से हँस पड़ी। वह बहुत देर से प्राँजली और उसके दोस्तों की बातचीत सुन रही थी।</h6>
<h6>वह हँसते हुए बोली-‘‘प्राँजली बेटा, नाच न जाने आंगन टेढ़ा (Naach Na Jaane Aangan Tedha)।’’</h6>
<h6>और यह सुनते ही सभी दोस्त भी खिल खिलाकर हँस पड़े। पर प्राँजली को यह समझ में आ गया था कि अब कभी भी झूठी डीेंगे नहीं मारेगी और कभी किसी का मज़ाक नहीं उड़ाएगी।</h6>
<h6><strong>– लेखिका : डॉ. मंजरी शुक्ला, बोहली (पानीपत)।</strong></h6>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 09 Dec 2021 16:03:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>लघुकथा: अपने मनोबल को कभी कमजोर मत होने दो</title>
                                    <description><![CDATA[एक बार एक मेढ़क का समूह जंगल में घूम रहा था। तभी अचानक उन समूह में से दो मेढ़क एक गहरे गड्ढे में गिर गये। जब उनके साथी दूसरे मेढ़कों ने उन्हें गहरे गड्ढे में गिरे हुए देखा तो वे बोले की आप इस गड्ढे से बाहर नहीं निकल सकते और अब आप अपनी मौत […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/short-story-never-let-your-morale-get-weakened/article-27058"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-09/morale.jpg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">एक बार एक मेढ़क का समूह जंगल में घूम रहा था। तभी अचानक उन समूह में से दो मेढ़क एक गहरे गड्ढे में गिर गये। जब उनके साथी दूसरे मेढ़कों ने उन्हें गहरे गड्ढे में गिरे हुए देखा तो वे बोले की आप इस गड्ढे से बाहर नहीं निकल सकते और अब आप अपनी मौत के बहुत नजदीक हो। उन दो मेढ़कों ने उनकी बातों को इग्नोर कर दिया और अपनी पूरी ताकत से उस गड्ढे से बाहर निकलने के लिए छलांग मारने लगे।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">वे मेढ़क फिर उन दो मेढकों से बोले, रुक जाओ तुम इस गड्ढे से बाहर नहीं निकल सकते और तुम दोनों मौत के बेहद करीब हो। अंतत: एक मेढ़क ने उनकी बात सुन ली और हार मान ली जिस कारण वह गिर कर मर गया जिससे उसकी मौत हो गयी।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">लेकिन दूसरा मेढ़क अपनी पूरी ताकत से लगातार जम्प मार रहा था। एक बार फिर, मेढ़क का समूह उस मेढ़क को बोला की, इतना दु:ख मत सहो क्योंकि मौत तुम्हारे बहुत नजदीक है। उसने फिर दोबारा से अपनी सारी ताकत लगा कर जम्प मारा और फाइनली वह गड्ढे से बाहर निकल आया। जब वह ऊपर आया तो उससे मेढक का समूह बोला, क्या उसने हमारी बात नहीं सुनी। तब वह मेढ़क उनको बोला, वह बहरा है और मुझे लगा की आप सब ऊपर आने के लिए मेरा उत्साह बढ़ा रहे होंगे। दोस्तों, आपके शब्दों में जीवन और मृत्यु देने की शक्ति है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">आप चाहे तो किसी को अपने शब्दों से एक नई उम्मीद दे सकते हो तो वही अपने शब्दों के द्वारा किसी की उम्मीद को हमेशा के लिए तोड़ भी सकते हो। हमें कभी भी किसी इन्सान को ऐसे शब्द नहीं बोलने चहिये जिससे उसकी हिम्मत टूटे या उसका मनोबल गिर जाए। इसके बजाय आपको उस इन्सान का उत्साह बढ़ाना चहिये जिसका मनोबल गिरा हो, आपके उत्साह बढ़ाने से क्या पता उसे नयी उम्मीद मिल जाए। इसलिए आप क्या कह रहे है इस बात का हमेशा ध्यान रखे। शब्दों में बहुत ताकत होती है। कभी-कभी यह समझना मुश्किल होता है कि एक उत्साहजनक शब्द किसी को कितना प्रोत्साहित कर सकते है।</h6>
<p> </p>
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<p style="text-align:justify;">
</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Sep 2021 15:45:51 +0530</pubDate>
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                <title>लघुकथा : एक गिलास दूध की कीमत</title>
                                    <description><![CDATA[एक दिन, एक गरीब लड़का जो स्कूल के बाद घर-घर जाकर सामान बेच रहा था, उसने पाया कि उसके पास केवल कुछ पैसा ही बचा है, और वह भूखा था। उसने तय किया कि वह अगले घर पर खाना मांगेगा। हालांकि, जब एक युवती ने दरवाजा खोला, तो उसने संकोच वश भोजन के बदले पानी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/short-story-the-price-of-a-glass-of-milk/article-26747"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-09/price-a-glass-of-milk.jpg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">एक दिन, एक गरीब लड़का जो स्कूल के बाद घर-घर जाकर सामान बेच रहा था, उसने पाया कि उसके पास केवल कुछ पैसा ही बचा है, और वह भूखा था। उसने तय किया कि वह अगले घर पर खाना मांगेगा। हालांकि, जब एक युवती ने दरवाजा खोला, तो उसने संकोच वश भोजन के बदले पानी मांगा। वह युवती समझ गई कि उसे भूख लग रही है इसलिए वह दूध का एक बड़ा गिलास ले आयी। लड़के ने धीरे से उसे पी लिया, और फिर पूछा, “मैं आपका एहसानमंद हूँ” “मुझे इसके बदले क्या देना चाहिए” उस युवती ने जवाब दिया “माँ ने हमें किसी की मदद के बदले कुछ भी स्वीकार करने के लिए कभी नहीं सिखाया है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">” उस लड़के ने कहा, “फिर मैं आपको अपने दिल से धन्यवाद देता हूं और वह उस घर से चला गया, अब वह न केवल शारीरिक रूप से अच्छा महसूस कर रहा था, बल्कि भगवान और मनुष्य में उसका विश्वास भी बढ़ गया था। वर्षों बाद में वह युवती गंभीर रूप से बीमार हो गई। स्थानीय डॉक्टर के समझ में कुछ नहीं आ रहा था। उन्होंने आखिरकार उसे बड़े शहर में भेज दिया, जहाँ उन्होंने विशेषज्ञों को उसकी दुर्लभ बीमारी का अध्ययन करने के लिए बुलाया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">डॉ. हॉवर्ड केली को परामर्श के लिए बुलाया गया था। जब उसने शहर का नाम सुना तो एक अजीब-सी रोशनी उनके आँखो में भर गई। वह तुरंत उठे और अस्पताल के हॉल से नीचे अपने कमरे में चले गये अपने कपड़े बदल कर गाउन पहने वह उसे देखने गहन चिकित्सा इकाई गए उन्होंने एक बार में उस महिला को पहचान लिया। डॉ. केली ने उसके जीवन को बचाने के लिए पूरी कोशिश में लग गए और अपने निर्धारित परामर्श कक्ष में वापस चले गए।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">उस दिन से वे उस औरत के उपचार पर विशेष ध्यान देने लगे। एक लंबे संघर्ष के बाद, लड़ाई जीत ली गई। डॉ. केली ने अस्पताल के व्यापार कार्यालय से अंतिम बिल पास करने का अनुरोध किया। डॉ. केली ने बिल देखा, फिर किनारे पर कुछ लिखा और बिल को महिला के कमरे में भेज दिया। महिला बिल के लिफाफे को खोलने से डर रही थी, क्योंकि उसे यकीन था कि इस बिल के भुगतान के लिए जीवन भर का कमाया हुआ पैसा लगेगा। अंत में उसने लिफाफा खोल कर देखा और एक लाइन ने बिल की तरफ उसका ध्यान आकर्षित किया। उसने निम्नलिखित शब्दों को पढ़ना शुरू किया। ‘‘एक गिलास दूध के साथ पूरा भुगतान कर दिया गया’’</h6>
<h6 style="text-align:right;"><strong><em> – हस्ताक्षरित, डॉ. हॉवर्ड केली</em></strong></h6>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 12 Sep 2021 15:57:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>रोटी या पाप</title>
                                    <description><![CDATA[उगते सूरज की किरणें अभी समंदर की इठलाती लहरों को चूम भी नहीं पाई थीं कि फुटपाथ पर बैठे भिखारियों में आपा-धापी मच उठी। सेठ शांति लाल की मोटर वहां आकर रुक चुकी थी। उसकी आवाज उन्हें उसी तरह उद्वेलित कर देती थी, जैसे भोजन का समय होने पर गली में घुमने वाले जानवरों के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/bread-or-sin/article-22904"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-04/bread-or-sin.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">उगते सूरज की किरणें अभी समंदर की इठलाती लहरों को चूम भी नहीं पाई थीं कि फुटपाथ पर बैठे भिखारियों में आपा-धापी मच उठी। सेठ शांति लाल की मोटर वहां आकर रुक चुकी थी। उसकी आवाज उन्हें उसी तरह उद्वेलित कर देती थी, जैसे भोजन का समय होने पर गली में घुमने वाले जानवरों के मुँह से अपने आप ही लार टपकने लगती है। सदा की तरह सेठ जी के हाथ में एक बड़ा-सा पैकेट था। उसी से निकाल-निकाल कर वे डबल रोटी का एक-एक टुकड़ा एक-एक भिखारी पर फेंकने लगे। एक-दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ में वे भिखारी उन टुकड़ों पर जानवरों की तरह झपटते। कुछ तो उन्हें छिपाकर आगे भी जा बैठते। सेठजी देखते रहते और घृणा से हँसते रहते। कभी-कभी बोल भी उठते-‘लोग कहते हैं कि गरीब बड़े ईमानदार होते हैं।’</h6>
<h6 style="text-align:justify;">
लेकिन एक दिन सब कुछ उलट-पुलट गया। उन्होंने देखा कि भीड़ से दूर एक भिखारी चुपचाप इस दृश्य को देख रहा है। उसने रोटी का वह टुकड़ा लेने के लिए हाथ तक नहीं हिलाया। सेठ जी ने उससे पूछा-‘तुझे रोटी मिली?’ उसने उत्तर दिया-‘रोटी है कहां, जो मिलती।’ ‘यह रोटी नहीं तो क्या है?’ सेठ जी बोले। ‘आपका पाप।’ आप रोटी नहीं, अपने पाप  (Sin) बाँट रहे हैं। मुझे पाप नहीं, ‘आप’ चाहिए। दे सकेंगे अपने आपको।’ सेठ जी सकते आ गए। हँसकर बोले-‘तू भूखा नहीं है।’ और वे रोटी (Bread) (पाप) बाँटने के लिए आगे बढ़ गए।<br />
<strong>-विष्णु प्रभाकर</strong></h6>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 14 Apr 2021 17:22:53 +0530</pubDate>
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                <title>Nature of saint: संत का स्वभाव</title>
                                    <description><![CDATA[एक संत गांव में प्रवेश कर रहे थे। सैकड़ों भक्त उनके पास थे। अचानक एक व्यक्ति संत के सामने आया। उसके हाथ में एक पात्र था। वह कोयले और राख से भरा हुआ था। संत के निकट आते ही उसने राख और कोयला संत के सिर पर फेंक दिया। संत के भक्त क्रोधित हो उठे। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/nature-of-saint/article-21497"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/saint.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक संत गांव में प्रवेश कर रहे थे। सैकड़ों भक्त उनके पास थे। अचानक एक व्यक्ति संत के सामने आया। उसके हाथ में एक पात्र था। वह कोयले और राख से भरा हुआ था। संत के निकट आते ही उसने राख और कोयला संत के सिर पर फेंक दिया। संत के भक्त क्रोधित हो उठे। उन्होंने कहा, ‘‘यह बदतमीजी है।’’ कुछ लोग उसे मारने के लिए आगे बढ़े। लेकिन संत ने कहा, ‘‘ शांत रहो।’’ लोग बोले, ‘‘महाराज, हमें मत रोकिए।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मूर्ख आदमी को सजा देना ही उचित है।’’ संत ने उत्तेजित लोगों को शांत करते हुए कहा, ‘‘यह आदमी मेरे लिए कितना अच्छा है। इसने मुझ पर जलते हुए अंगारे नहीं फेंके। बुझे हुए कोयले की राख फेंकी है। इससे मेरा कोई नुकसान नहीं हुआ। स्नान करते ही राख का सारा मैल साफ हो जाएगा।’’ संत के समर्थक भौचक्क होकर उन्हें देखते रह गए।</p>
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                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Feb 2021 16:27:31 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>बाल कथा : संतोष</title>
                                    <description><![CDATA[चाणक्य मगध देश के राजा चन्द्रगुप्त के मंत्री थे। वे बुद्धिमान, तपस्वी और राजनीतिज्ञ थे। चाणक्य मंत्री होते हुए भी बहुत साधारण जीवन व्यतीत करते थे और शहर से बाहर एक झोंपड़ी में रहते थे। एक बार राजा चन्द्रगुप्त ने मंत्री चाणक्य को कुछ कंबल दिए और कहा-इन कम्बलों को शीत ऋतु में जो अभी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/children-corner/satisfaction/article-20182"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/chankya.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चाणक्य मगध देश के राजा चन्द्रगुप्त के मंत्री थे। वे बुद्धिमान, तपस्वी और राजनीतिज्ञ थे। चाणक्य मंत्री होते हुए भी बहुत साधारण जीवन व्यतीत करते थे और शहर से बाहर एक झोंपड़ी में रहते थे। एक बार राजा चन्द्रगुप्त ने मंत्री चाणक्य को कुछ कंबल दिए और कहा-इन कम्बलों को शीत ऋतु में जो अभी पूरी तरह शुरू नहीं हुई है, गरीब लोगों के बीच बांट देना। चाणक्य ने वे कम्बल झोंपड़ी में रख दिए और सोचा-सुबह मैं इन कम्बलों को बांट दूंगा और सो गये। कुछ लोगों को इस बात का पता चल गया था कि सारे कम्बल चाणक्य की झोंपड़ी में रखे हैं। वे चोरी की नीयत से झोंपड़ी में कम्बल चुराने के लिए आए तो देखा कि चाणक्य चटाई पर ठंड में बिना कम्बल के सो रहे थे। चोर ठिठके और चाणक्य को जगा कर कहने लगे कि आपके पास कम्बलों का ढेर है, फिर भी आप बिना कम्बल के सो रहे हैं। चाणक्य ने बड़ी मधुरता से सहज होते हुए जवाब दिया, ये कंबल राजा ने गरीबों में बांटने के लिए मुझे दिए हैं, जिनको मैं कल सुबह बांटूंगा। इन कंबलों पर मेरा कोई अधिकार नहीं है। यह सुनकर चोरों को बहुत शर्म महसूस होने लगी। वे सोचने लगे कि एक यह हैं (चाणक्य) जो दूसरे के धन के प्रयोग को अधर्म समझते हैं और दूसरी ओर हम हैं, जो हर रोज दूसरों का सामान चुराते हैं। हम कितने अधर्मी और असंतोषी हैं। यह कितने संतोषी और तृप्त हैं। यह सोचकर उन्होंने चाणक्य से क्षमा मांगी और कभी भी दूसरों की चीज न चुराने का वचन दिया।</p>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>शिक्षा :</strong> प्रत्येक इंसान को संतोष (Satisfaction) जैसे गुण को अपने जीवन में उतारना चाहिए। इससे वह स्वयं भी सुखी होगा और समाज भी।</h6>
<p style="text-align:justify;"><strong>नीतू गुप्ता</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>बच्चों का कोना</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Nov 2020 21:07:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>लघुकथा: आभार</title>
                                    <description><![CDATA[हर की पैड़ी पर निरंतर बढ़ती भीड़ को देखते हुए भवगीत का ध्यान चौड़े पाट की ओर गंगा-स्नान करते भक्त पर गया तो वह भी उधर ही जा पहुंचा और घाट पर लगे एंगल को पकड़कर ज्यों ही गोता लगाने को हुआ ही कि उसके पाँव उखड़ गए। बस, फिर क्या था, बरबस ही जीवन-मृत्यु […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/thankfulness/article-18137"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-09/thankfulness.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हर की पैड़ी पर निरंतर बढ़ती भीड़ को देखते हुए भवगीत का ध्यान चौड़े पाट की ओर गंगा-स्नान करते भक्त पर गया तो वह भी उधर ही जा पहुंचा और घाट पर लगे एंगल को पकड़कर ज्यों ही गोता लगाने को हुआ ही कि उसके पाँव उखड़ गए। बस, फिर क्या था, बरबस ही जीवन-मृत्यु के बीच संघर्ष शुरू हो गया। पल बीतते पसलियां चरमरा उठीं। सांसें भी जवाब देने लगीं। देखते-देखते भीड़ जमा हो गई, असमंजस की स्थिति में और तमाशबीन की तरह भी। तभी झुंड को चीरता हुआ एक युवक आगे बढ़ा, एकदम फटेहाल… मगर उसने सूझ-बूझ दिखाई। तीन-चार लोगों को परस्पर बाहें पकड़ाकर चैन बनाई, खुद मचलती धारा में दूसरी-तीसरी सीढ़ी पर खड़ा हुआ और पलक झपकते भवगीत को बाहर खींच लिया। मगर वह संभल पाता, उससे पहले ही युवक भीड़ में ओझल हो गया।<br />
मौत के मुँह से लौटा भवगीत इधर-उधर दूर-दूर तक, फिर आसमान की ओर नजर दौड़ाता रहा और मन ही मन बुदबुदाता रहा, ‘‘भाई, तुम इन्सान हो, फरिश्ता हो, जो भी हो, जहां भी हो, तुम सचमुच जग-भाता हो, जीवन-दाता हो।…मेरा आभार स्वीकार कर लेना।’’</p>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>भगवती प्रसाद गौतम, कोटा (राजस्थान)</strong></h5>
<p> </p>
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]]></content:encoded>
                
                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 05 Sep 2020 10:27:15 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>अभिनय का उपहार</title>
                                    <description><![CDATA[उन्नीसवीं शताब्दी की घटना है। भारत पर अंग्रेजों का अधिपत्य था। बंगाल नील साहब के अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर रहा था। कलकत्ता के कुछ नवयुवकों ने इन अत्याचारों पर प्रकाश डालने के लिए एक नाटक का आयोजन किया। अन्य अतिथियों के अतिरिक्त प्रकाण्ड विद्वान ईश्वरचन्द्र विद्यासागर भी नाटक देखने के लिए आए। नाटक में विभिन्न […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/acting-gift/article-17953"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-08/gift.jpg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">उन्नीसवीं शताब्दी की घटना है। भारत पर अंग्रेजों का अधिपत्य था। बंगाल नील साहब के अत्याचारों से त्राहि-त्राहि कर रहा था। कलकत्ता के कुछ नवयुवकों ने इन अत्याचारों पर प्रकाश डालने के लिए एक नाटक का आयोजन किया। अन्य अतिथियों के अतिरिक्त प्रकाण्ड विद्वान ईश्वरचन्द्र विद्यासागर भी नाटक देखने के लिए आए। नाटक में विभिन्न दृश्यों के माध्यम से नील साहब के अत्याचार प्रस्तुत किए गए।<br />
दृश्यों के प्रस्तुतीकरण में इतनी स्वाभाविकता थी कि दर्शकों की आँखों से आँसुओं की निर्झरणी बह निकली।<br />
ईश्वरचन्द्र विद्यासागर क्रोध से लाल-पीले हो गए। उन्होंने अपने पैर से चप्पल निकाली और लोगों पर अत्याचार कर रहे नील साहब का अभिनय करने वाले नवयुवक को दे मारी। नाटक पूर्ण होने पर नील का अभिनय करने वाला नवयुवक तुरंत विद्यासागर के चरणों में गिर पड़ा। बड़े विनम्र भाव से वह बोला, ‘‘आपकी चप्पल से बड़ा उपहार हमें नहीं मिल सकता, हमारा नाटक सार्थक हुआ। अब हमें विश्वास हो गया कि सारा बंगाल हमारे साथ है।’’</h6>
<h5 style="text-align:justify;"><strong>-तनसुखराम गुप्ता</strong></h5>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 30 Aug 2020 10:22:45 +0530</pubDate>
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