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                <title>सरकार और जनता एकजुट हो</title>
                                    <description><![CDATA[देश में कोविड-19 महाबिमारी की तीसरी लहर चल रही है। महाराष्ट्र के बाद पंजाब के हालात भी चिंताजनक हैं और यहां पाबंदी 10 अप्रैल तक बढ़ा दी गई हैं। दूसरी ओर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी स्थिति चिंताजनक बताई है तथा ठोस कदम उठाने की बात कही है। वास्तव में पिछले वर्ष […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/government-and-public-united/article-22575"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-04/corona.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में कोविड-19 महाबिमारी की तीसरी लहर चल रही है। महाराष्ट्र के बाद पंजाब के हालात भी चिंताजनक हैं और यहां पाबंदी 10 अप्रैल तक बढ़ा दी गई हैं। दूसरी ओर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी स्थिति चिंताजनक बताई है तथा ठोस कदम उठाने की बात कही है। वास्तव में पिछले वर्ष के मुकाबले इस वर्ष हालात अलग हैं। सरकारें जो दिशा-निर्देश व सूचनाएं जारी कर रही हैं, जनता उसे गंभीरता के साथ नहीं ले रही। लोग मास्क लगाने के लिए तैयार नहीं, खासकर सार्वजनिक स्थानों पर भी लापरवाही बरती जा रही है। सरकारी, गैर सरकारी, कार्यालयों, पार्कों व अन्य सार्वजनिक स्थानों पर कर्मचारी व आमजन भी लापरवाही बरत रहे हैं। अगर अधिकारी नियमों की पालना के लिए पहले करें और आमजन को लापरवाही करने से रोके, तभी सावधानी बरतने वाला माहौल पैदा होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">पंजाब में एक और नई स्थिति यह बन गई है सरकारी व निजी स्कूलों को खोलने के लिए संघर्ष शुरू हो गया है। निजी स्कूलों के मालिकों के साथ-साथ विद्यार्थियों के परिजन भी स्कूल खोलने की मांग कर रहे हैं। यह लोग सरकार पर दबाव बनाने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं। सरकार के लिए यह मुश्किल घड़ी है क्योंकि आमजन के सहयोग के बिना नियमों को केवल डंडे के साथ लागू करना काफी कठिन होगा। ऐसे ही हालात अन्य राज्यों में भी हैं। यहां सरकार को केवल सख्ती बरतने की बजाय लोगों को विश्वास में लेने की जरुरत हैं। सरकार और जनता के बीच तालमेल जरुरी है। आमजन का यह तर्क जायज है कि रात्रि कर्फ्यू का कोई फायदा नहीं है। वास्तव में लोगों के कामकाज और अन्य गतिविधियां दिन में होती हैं। इसलिए नाममात्र पाबंदियां लगाने की बजाय तर्कसंगत पाबंदियां ही स्थिति में सुधार ला सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आमतौर पर देखा जा रहा है कि बाजारों में भीड़ होती है और लोग बिना मास्क लगाए व बिना आपसी दूरी के ही घूम-फिर रहे हैं। दूसरी तरफ पुलिस कर्मी कार में एक परिवार के सदस्यों के मास्क न पहनने के बारे में पूछताछ करते देखे जाते हैं। पाबंदी वही कामयाब हो सकती है जिस पर आमजन भी विश्वास करे। यह भी जरुरी है कि टेस्टिंग बढ़ाई जाए। टेस्टिंग के लिए जिस तरह का उत्साह पिछले वर्ष नजर आ रहा था वह इस वर्ष नहीं है। टीकाकरण अभियान को भी मजबूत बनाने की जरुरत है। आमजन को यह समझना चाहिए कि राजनीति नेता खासकर रैलियों में भाग लेने वालों या अधिक गतिविधियां करने वालों को ही कोरोना हो रहा है। यह भ्रम है कि कोरोना केवल आमजन या गरीबों को ही शिकार बनाता है। बीमारी के प्रति लापरवाह होने की बजाय सावधान होने की जरुरत है। बिमारी है ही नहीं व टीका खतरनाक वाली धारणा को छोड़ना पड़ेगा।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Apr 2021 10:12:19 +0530</pubDate>
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                <title>नेता सुनें अन्यथा जनता नहीं सुनने वाली</title>
                                    <description><![CDATA[भाजपा दिल्ली का विधानसभा चुनाव तीसरी बार भी बुुरी तरह से हार गई है। इस चुनाव ने भाजपा को एक तरह से कांग्रेस की कतार में खड़ा कर दिया है। दिल्ली में भाजपा ने अपने पुराने व स्थानीय नेताओं विजय गोयल, डॉ. हर्षवर्धन, मिनाक्षी लेखी को छोड़कर पूर्व से आए मनोज तिवारी के भरोसे रखा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/leaders-now-listen-otherwise-public-will-not-listen/article-13014"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-02/leaders.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">भाजपा दिल्ली का विधानसभा चुनाव तीसरी बार भी बुुरी तरह से हार गई है। इस चुनाव ने भाजपा को एक तरह से कांग्रेस की कतार में खड़ा कर दिया है। दिल्ली में भाजपा ने अपने पुराने व स्थानीय नेताओं विजय गोयल, डॉ. हर्षवर्धन, मिनाक्षी लेखी को छोड़कर पूर्व से आए मनोज तिवारी के भरोसे रखा नतीजा सामने है। केन्द्र की सता में बैठकर बीजेपी अपने स्थानीय नेताओं (Leaders) को दरकिनार कर गई या उन लोगों को दरकिनार कर रही है, जो भाजपा को गांवों-शहरों से प्रचंड बहुमत दिलाते हैं। उनकी जगह नये-नये चेहरे आगे किए जाते हैं, जो महज सरकार के साथ चमकते हैं, जिन्हें जमीनी स्तर पर कोई पहचानता नहीं या फिर बीजेपी उन नेताओं को भी नहीं छोड़ रही जिनपर उनके अपने प्रदेश के लोग भी भरोसा नहीं करते। तभी झारखंड में से रघुवर दास, महाराष्ट्र से फड़णवीस को लोगों ने चलता किया है।</h4>
<h4 style="text-align:justify;">मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व राजस्थान में जनता स्थानीय नेताओं के साथियों के भ्रष्टाचार से त्रस्त थी। संगठन, सरकार, टिकिट, कारोबार सब जगह ये लोग हावी थे, जनता ने कहा भगाओ इन्हें। भाजपा का मेहनती कार्यकर्त्ता भी चुप रहा कि जनता जो कर रही है करने दो अन्यथा वह अपने नेताओं के लिए दिन-रात दौड़ता है। केन्द्र में जो टीम है वह भी दो बातों के आसपास ही सिमट गई है, जिनमें राष्ट्रवाद , अल्पसंख्यक राजनीति के सिवाय अन्य मुद्दों की कहीं कोई समझ दिखाई नहीं पड़ रही। राष्ट्रवाद व साम्प्रदायवाद आखिर कब तक साथ देगा? खासकर तब तो बिल्कुल भी साथ नहीं देगा जब प्रदेशों में जनता सरकारी भ्रष्टाचार से कुचली जा रही है। भ्रष्टाचार पर जीरों टोलरेंस की दुहाई बहुत है परंतु अफसरी-कर्मचारी वर्ग में मानों कोई भय ही नहीं है, फिर क्यों कोई भाजपा को वोट देगा? पिछले दिनों सब्जी में प्याज से उपभोक्ता जो रोये हैं, वह वही जानते हैं। अभी रसोई गैस में जो आग लगी है, वह क्या दिल्ली चुनाव तक ही रोक कर रखी गई थी?</h4>
<h4 style="text-align:justify;">आमजन की धारणा में अब भाजपा एवं कांग्रेस में कोई फर्क नहीं दिख रहा। यहां फर्क दिखा वहांं केजरीवाल को भाजपा के प्रचण्ड प्रचार के बाद भी जनता ने तीसरी दफा सत्ता दे दी है। भाजपा के पास अभी नेहरू व वामपंथ को कोसने का राग है, जिसे वह धारा 370 हटाने, नागरिकता संशोधन बिल से लेकर हर उस मामले में छेड़ लेती है, यहां जनता के सवालों का जवाब भाजपा के पास नहीं होता। भाजपा को अपने वैचारिक संस्थानों को व्यवहारिक कसौटियों पर तराशना होगा जो कि वह कर नहीं सकी। जबकि उसे केन्द्र में सरकार चलाते हुए भी 6 साल होने को हैं। अब वह दौर जा रहा है जब नेता कुछ भी करते थे, फिर भी नेता रहते थे, अब नेताओं को जनता की सुननी होगी अन्यथा जनता नहीं सुनने वाली।</h4>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 13 Feb 2020 12:46:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जन योजनाओं को बनाकर धरातल पर उतारना अधिकारियों की जिम्मेदारी : मुख्य सचिव</title>
                                    <description><![CDATA[आई टी का प्रयोग करके विकास के लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना सरकार का ध्यैय है। सरकार द्वारा जनसाधारण की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए ई-गर्वनेंस पर बल दिया जा रहा है।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/it-is-the-responsibility-of-the-administrative-officials-to-make-public-schemes-accessible-to-the-people/article-12786"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/keshini-anand-arora.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">संवेदनशील और पारदर्शी प्रशासन प्रदान करना सरकार की प्राथमिकताओं में से एक है</h2>
<h2 style="text-align:center;">(Keshini Anand Arora)</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>चंडीगढ़ (सच कहूँ न्यूज)।</strong> हरियाणा की मुख्य सचिव केशनी आनन्द अरोड़ा ने कहा है कि लोगों की सुविधाओं के लिए जन योजनाएं बनाने का कार्य करना और उन्हें धरातल पर उतारकर जन-जन तक पहुंचाना प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी है। श्रीमती अरोड़ा आज यहां वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से हरियाणा लोक प्रशासन संस्थान (हिपा), गुरुग्राम में हरियाणा सिविल तथा अलाइड सेवा परीक्षा के नवनियुक्त 134 अधिकारियों के पहले ज्वाइंट फाउंडेशन कोर्स के प्रारंभिक सत्र को संबोधित कर रही थी।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">इस अवसर पर कार्मिक और प्रशिक्षण विभागों के सचिव नितिन यादव भी उपस्थित थे।</li>
<li style="text-align:justify;">मुख्य सचिव ने कहा कि सरकार की अपेक्षा है।</li>
<li style="text-align:justify;">आप सेवा, समर्पण एवं कर्मठता के साथ राष्ट्रहित में योगदान देकर आदर्श स्थापित करें ।</li>
<li style="text-align:justify;">खुशहाल समाज और देश के निर्माण में भरपूर सहयोग दें।</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">आप सभी मैरिट पर इस सेवा में चयनित होकर आए हैं और अब यह आपकी जिम्मेदारी बनती है कि अंत्योदय की राह पर चलते हुए समाज के अंतिम व्यक्ति तक सरकार की योजनाओं को पारदर्शी तरीके एवं समयबद्ध ढंग से पहुंचाने में भागीदार बनें। (Keshini Anand Arora) उन्होंने कहा कि संवेदनशील और पारदर्शी प्रशासन प्रदान करना सरकार की प्राथमिकताओं में से एक है। आई टी का प्रयोग करके विकास के लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना सरकार का ध्यैय है। सरकार द्वारा जनसाधारण की जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए ई-गर्वनेंस पर बल दिया जा रहा है।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">श्रीमती अरोड़ा ने कहा कि अधिकारियों को समय-समय पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।</li>
<li style="text-align:justify;">उस समय अपने विवेक एवं धैर्य का प्रयोग करते हुए समाज हित में निर्णय लेना ही अधिकारी की असली परीक्षा है ।</li>
<li style="text-align:justify;">जो इन परीक्षाओं में पास हो जाता है वहीं सफल अधिकारी माना जाता है।</li>
</ul>
<p> </p>
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<p> </p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Jan 2020 20:42:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>घोषणा-पत्रों में जन-सहभाग महत्वपूर्ण</title>
                                    <description><![CDATA[मेरी राय यह है कि विधानसभा का चुनाव है; अत: विधायी कार्य संबंधी ‘दिल्ली नीति घोषणापत्र’ बने। यह पूरी दिल्ली के स्तर पर बने। 70 विधानसभाओं की विकास संबंधी इलाकाई जरूरतें और परिस्थितियां विविध हैं। जाहिर है कि प्रत्येक विधानसभा का विकास संबंधी रोड मैप भी अलग-अलग ही होना चाहिए। अत: उम्मीदवारों को चाहिए कि […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/public-participation-is-necessary-in-the-manifesto/article-12634"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/public-participation.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">मेरी राय यह है कि विधानसभा का चुनाव है; अत: विधायी कार्य संबंधी ‘दिल्ली नीति घोषणापत्र’ बने। यह पूरी दिल्ली के स्तर पर बने। 70 विधानसभाओं की विकास संबंधी इलाकाई जरूरतें और परिस्थितियां विविध हैं। जाहिर है कि प्रत्येक विधानसभा का विकास संबंधी रोड मैप भी अलग-अलग ही होना चाहिए। अत: उम्मीदवारों को चाहिए कि वे मोहल्ला निवासी समितियों का आह्वान करें। अपने प्रचार का पहला सप्ताह विधानसभा स्तरीय घोषणापत्र बनवाने और उसके प्रति अपना संकल्प बताने में लगायें।</h2>
<p style="text-align:justify;">
<strong>लेखक: अरुण तिवारी</strong></p>
<h4 style="text-align:justify;">लोकतांत्रिक पिरामिड को सही कोण पर खड़ा करने के पांच सूत्र हैं: लोक-उम्मीदवार, लोक-घोषणापत्र, लोक-अंकेक्षण, लोक-निगरानी और लोक-अनुशासन। लोक-घोषणापत्र का सही मतलब है, लोगों की नीतिगत तथा कार्य संबंधी जरूरत व सपने की पूर्ति के लिए स्वयं लोगों द्वारा तैयार किया गया दस्तावेज। प्रत्येक ग्रामसभा व नगरीय वार्ड सभाओं को चाहिए कि वे मौजूद संसाधन, सरकारी-गैरसरकारी सहयोग, आवंटित राशि तथा जनजरूरत के मुताबिक अपने इलाके के लिए अगले पांच साल के सपने का नियोजन करें। इसे लोकसभावार, विधानसभावार, मोहल्लावार व मुद्देवार तैयार करने का विकल्प खुला रखना चाहिए। इसमें हर वर्ष सुधारने का विकल्प भी खोलकर रखना अच्छा होगा। इस लोक एजेंडे या लोक नियोजन दस्तावेज को लोक-घोषणापत्र का नाम दिया जा सकता है। इस लोक-घोषणापत्र को किसी बैनर या फलेक्स पर छपवाकर अथवा सार्वजनिक मीटिंग स्थलों की दीवार पर लिखकर चुनाव प्रचार के लिए आने वाले चुनावी उम्मीदवारों के समक्ष पेश किया जा सकता है। उनसे उसकी पूर्ति के लिए संकल्पपत्र/शपथपत्र लिया जा सकता है। इससे उम्मीदवार के चयन में सुविधा होगी और पालन करने के लिए उम्मीदवार के सामने अगले पांच साल एक दिशा-निर्देश भी होगा।<br />
जल घोषणापत्र, हरित घोषणापत्र, उत्तराखण्ड जन घोषणापत्र – नागरिक संगठन स्तर पर ऐसे प्रयास होते रहे हैं। किंतु आदर्श स्थिति हासिल करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। फिलहाल, चर्चा करें कि दिल्ली के इस चुनाव में पार्टी घोषणापत्र बनाने में एक बार फिर से जनता की राय मांगी जा रही है। हमें इस रायशुमारी को एक सुअवसर मानना चाहिए; पार्टी घोषणापत्र से लोक घोषणापत्र की ओर बढ़ने की एक छोटी सी खिड़की मान स्वागत करना चाहिए। इसमें खुद पहल कर पार्टियों और अपने विधानसभा क्षेत्र के उम्मीदवार तक अपनी राय पहुंचानी चाहिए।<br />
इन घोषणापत्रों को जमीन पर उतारने के लिए नीतिगत आवश्यकता होगी कि दिल्ली नियोजन क्रियान्वयन एवम निगरानी समिति का गठन हो। इसके तहत केन्द्र, राज्य, स्थानीय नगर व गांव अर्थात चार स्तरीय उपसमितियां हों। चार स्तरीय समितियों में आपसी तालमेल व पारदर्शिता की सर्वश्रेष्ठ व्यवस्था बने। चुनाव बाद के पांच साल के दौरान विकास संबंधी घोषणापत्र को पूरा करने में लोग सहयोगी भी बनें और विधायक द्वारा असहयोग करने पर बाध्य करने वाले भी; इसके लिए जन-निगरानी प्रणाली विकसित की जाए। लोक-प्रतिनिधियों के बजट से क्रियान्वित होने वाले कार्यों का लोक अंकेक्षण यानी ‘पब्लिक-आॅडिट’ अनिवार्य हो। आॅडिट सिर्फ वित्तीय नहीं, कैग के नए विविध सूचकांकों के आधार पर हो। ऐसे प्रावधानों को विधिसम्मत बनाने के लिए पार्टियां, इन्हे विधान का हिस्सा बनाने की घोषणा करें। लाभ यह होगा कि पांच साल पूरे होने पर लोक-अंकेक्षण समूह की रिपोर्ट खुद-ब-खुद इस बात का आइना होगी कि निवर्तमान प्रत्याशी उसमें अपना चेहरा देख सकें; जान सकें कि वह अगली बार चुनाव लड़ने लायक है या नहीं। इस आधार पर पर्टियां अपना उम्मीदवार तय कर सकेंगी और लोग भी कि उस प्रतिनिधि को अगली बार चुना जाये या दरकिनार कर दिया जाये। पांच सालों का लेखा-जोखा, अगले पंचवर्षीय कार्यों का नियोजन व तद्नुसार लोक-घोषणापत्र निर्माण में भी बराबर का मददगार सिद्ध होगा।<br />
इसी दिशा में एक अन्य महत्वपूर्ण नीतिगत तथ्य यह है कि भारत के सभी राज्यों में गांवों में संवैधानिक स्तर पर गठित ग्राम सभा, ग्राम पंचायत और न्याय पंचायत है; विधानसभा के साथ केन्द्र शसित क्षेत्र वाली दिल्ली की तर्ज में नवगठित राज्य जम्मू-कश्मीर में भी। दिल्ली के गांवों के पास क्या है ? नये राजस्व रिकॉर्ड के मुताबिक, दिल्ली में 357 गांव हैं। क्या स्वराज का सपना दिखाने वालों को दिल्ली में ग्राम स्वराज का सर्वश्रेष्ठ ढांचा बनाने की पहल नहीं करनी चाहिए? उन्हें चाहिए कि दिल्ली पंचायतीराज अधिनियम बनाने को पार्टी घोषणापत्र में शामिल कर इस सपने की नींव रखें।<br />
शुद्ध हवा, स्वच्छ पानी-पर्याप्त पानी, स्थानीय कचरा प्रबंधन और सर्व सुलभ पार्किंग-दिल्ली की चार बड़ी चुनौतियां हैं। दिल्ली के चारदीवारी वाले हर संस्थान, हर कार्यालयी-व्यावसायिक परिसर, हर हाउसिंग सोसाइटी परिसर को उसके परिसर के भीतर ही इन चारों की स्वावलम्बी व्यवस्था के लिए बाध्य व प्रोत्साहित…दोनों करने की नीतिगत घोषणा करनी चाहिए। ऐसे परिसरों का सीवेज निष्पादन भी परिसर के भीतर संभव है और यमुना प्रदूषण मुक्ति के लिए जरूरी भी। स्वावलम्बी जल प्रबंधन और धूल-धुआं प्रबंधन करना ही चाहिए। वाटर रिजर्व, ग्रीन रिजर्व व वेस्ट रिजर्व एरिया नीति इसमें मदद कर सकती है। जैम फ्री ट्रैफिक और भाड़े की मनमानी से मुक्त ऑटो चालक भी दिल्ली की आवश्यकता है। फैक्टरी-दफ्तरों-बाजारों के समय में अनुकूल बदलाव तथा ऐसी नियुक्ति नीति, जिसमें लोगों को अपने आवास से कम से कम दूरी तक सफर करना पड़े़; पर्यावरण बेहतरी के लिए जरूरी है।<br />
जरूरत है कि नंबर दौड़ में लगाने की बजाय, स्कूली शिक्षा को प्रत्येक विद्यार्थी में पहले से मौजूद प्रतिभा के विकास पर केन्द्रित किया जाए। उनमें उनके आसपास के परिसरों के प्रति सकारात्मक सरोकार व संवेदना विकसित की जाए। आठवीं कक्षा के बाद प्रतिभानुसार अवसर देने के लिए मात्र खेल नहीं, नृत्य-संगीत-शिल्प विषयक श्रेष्ठ विशेषज्ञ स्कूलों की स्थापना की जाए। उच्च शिक्षा और फिर कोचिंग के लम्बे दुष्चक्र में फंस चुकी नई पीढ़ी को बचाने के लिए एनडीए, रेलवे अप्रेन्टिस की तर्ज पर पहल जरूरी है। कम से कम दिल्ली सरकार की हर छोटी-बड़ी नौकरी के लिए तो 10वीं-12वीं की न्यूनतम शैक्षिक योग्यता तथा चयन पश्चात पद की जरूरत के अनुसार एक से तीन साल का शिक्षण-प्रशिक्षण का प्रावधान किया जा सकता है। पढ़ाई, दवाई, सुरक्षा, यातायात, सुरक्षा, संचार, जलापूर्ति जैसे बुनियादी सेवा क्षेत्रों में ठेकेदारी व निजीकरण को हतोत्साहित करके दिल्ली सुरक्षित रोजगार का रास्ता प्रशस्त कर सकती है। दूसरे राज्यों से दिल्ली आ रही आबादी को उनके प्रदेश में रोकने के लिए दिल्ली सरकार को चाहिए कि वह उन राज्यों के शिक्षा और रोजगार के ढांचे को स्वावलम्बी बनाने में सहयोग करे। इसके लिए वह दिल्ली में मौजूद ज्ञान, कौशल व मानव संसाधन का उपयोग करे। इससे भी अंतत: रोजगार, दिल्लीवासियों का ही बढ़ेगा। स्वास्थ्य बीमा की आड़ में उपजी लूट की जगह, 50 वर्ष से अधिक उम्र के हर दिल्लीवासी के इलाज का जिम्मा। अधिकतम संभव लागत पर सुनिश्चित मुनाफा दर के आधार पर वस्तुओं की अधिकतम फुटकर बिक्री दर का निर्धारण। मूल आवश्यकता पार्टी, उम्मीदवार व नागरिक…तीनों द्वारा अपनी-अपनी जवाबदारी ईमानदारी से निभाने का मन बनाने की है। यदि हम यह कर पायें, तो तय मानिए कि तंत्र पर लोक की हकदारी एक दिन खुद-ब-खुद आ जायेगी। धीरे-धीरे हम सही मायने में लोकतंत्र भी हो जायेंगे।</h4>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Jan 2020 20:48:49 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>विरोधी राजनीति में दब रहे जनता के मुद्दे</title>
                                    <description><![CDATA[एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2018 में बेरोजगारी के कारण औसतन 35 व्यक्तियों ने रोजाना खुदकुशी की, दूसरे शब्दों में हर दो घंटों बाद 3 बेरोजगार आत्महत्याएं कर रहे हैं।
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/public-issues-are-being-suppressed-in-politics/article-12559"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/public-issues.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में एनआरसी, सीएए और एनपीआर को लेकर राजनीति चरम पर है। विपक्षी दलों ने उक्त मामले में तो विरोध करना ही था, अब सत्तापक्ष द्वारा भी सार्वजनिक तौर पर नागरिकता संशोधन बिल के समर्थन में आंदोलन शुरू किया जा रहा है। रोजाना कहीं न कहीं टकराव व हिंसा की घटनाएं घट रही हैं लेकिन इस उथल-पुथल में जनता के मुद्दे इस तरह भुला दिए गए हैं जैसे देश में कोई समस्याएं ही नहीं हैं। विपक्षियों ने देश की आर्थिकता, स्वास्थ्य सेवाओं की कमी, बेरोजगारी के मुद्दे को समस्या समझना ही छोड़ दिया है अन्यथा नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की रिपोर्ट का कहीं तो जिक्र होता।</p>
<p style="text-align:justify;">सीएए की कापियां तो फाड़ी जा रही हैं लेकिन बेरोजगारी व कृषि संकट के कारण हो रही आत्महत्याओं का किसी भी पार्टी ने संज्ञान में नहीं लिया। एनसीआरबी की रिपोर्ट सीएए के धरने-प्रदर्शनों की आड़ में ही दबकर रह गई है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2018 में बेरोजगारी के कारण औसतन 35 व्यक्तियों ने रोजाना खुदकुशी की, दूसरे शब्दों में हर दो घंटों बाद 3 बेरोजगार आत्महत्याएं कर रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार हर वर्ष दस हजार से अधिक किसान-मजदूर आत्महत्याएं कर गए, किसी भी दल के नेता ने इस रिपोर्ट पर चिंता नहीं जताई व इसे पढ़ने तक की जहमत नहीं की। स्वास्थ्य सेवाओं व प्रबंधों की दुर्दशा पर भी किसी नेता का ध्यान नहीं है। पंजाब के मोगा में गत दिवस एक महिला ने अस्पताल में फर्श पर बच्चे को जन्म दिया, स्टाफ ने उस महिला को दाखिल नहीं किया और आखिर कुछ दिनों बाद बच्चे की मृत्यु हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">दुखी महिला मृत बच्चे को झोली में लेकर बैठ गई लेकिन किसी भी पार्टी का कोई नेता तो दूर एक वर्कर भी सरकार को घेरने नहीं पहुंचा। पता नहीं ऐसीं कितनी ही घटनाएं देश में घट रही हैं, लेकिन कहीं भी धरने में कोई नेता नहीं पहुंचता, लेकिन पार्टी हितों के लिए अपने नेताओं को दिखाने के लिए गड़े मुर्दों पर भी ये लोग जमीन-आसमान एक कर देते हैं। अभी साम्प्रदायिक मुद्दों पर राजनीतिक पार्टियां खूब हंगामा कर रही हैं लेकिन आम आदमी का दम घुट रहा है। जन हितों की अनदेखी कर पार्टी हितों को प्राथमिकता दी जा रही है। बात राजनीतिक नफे-नुक्सान की नहीं बल्कि बात आम आदमी की बुनियादी सुविधाओं की होनी चाहिए। देश की फिक्र होनी चाहिए।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 Jan 2020 20:19:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बजट में जन सामान्य मोदी की प्राथमिकता नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[मोदी सरकार को सूट बूट की सरकार बताते हुए उन्होंने इस ट्वीट के साथ प्रमुख उद्योगपतियों के साथ खिंचवाई गई मोदी की दो फोटो भी पोस्ट की हैं। उन्होंने कहा कि जो उद्योगपति इन चित्रों में मोदी के साथ मौजूद हैं
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/public-has-no-priority-in-the-budget/article-12377"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/rahul-gandhi.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर साधा निशाना, कहा- (Rahul Gandhi)</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी (Rahul Gandhi) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि जन सामान्य के प्रति उन्हें कोई रुचि नहीं है इसलिए बजट पर ‘व्यापक विचार विमर्श’ में भी आम आदमी की बजाय वह अपने नजदीकी पूंजी पति मित्रों को ही महत्व देते हैं। गांधी ने शुक्रवार को ट्वीट किया, ‘मोदी का बजट को लेकर ‘व्यापक राय शुमारी’ भी उनके नजदीकी पूंजीपति मित्रों तथा बड़े धनपतियों के लिए आरक्षित है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे किसानों, छात्रों, युवाओं, महिलाओं, सरकार तथा सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों, छोटे कारोबारियों या मध्यम वर्ग के करदाताओं के प्रति उनकी कोई रुचि नहीं है। मोदी सरकार को सूट बूट की सरकार बताते हुए उन्होंने इस ट्वीट के साथ प्रमुख उद्योगपतियों के साथ खिंचवाई गई मोदी की दो फोटो भी पोस्ट की हैं। उन्होंने कहा कि जो उद्योगपति इन चित्रों में मोदी के साथ मौजूद हैं वे उनके नजदीकी हैं और उन्हीं से वह राय शुमारी करते हैं।</p>
<p> </p>
<pre class="tw-data-text tw-text-large tw-ta" dir="ltr"><span lang="en" xml:lang="en"><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।

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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jan 2020 15:42:27 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>महंगाई का खेल निकाल रहा जनता का तेल</title>
                                    <description><![CDATA[रुपये की महिमा बड़ी न्यारी है। कहावतें भी बड़ी बनी है रुपये पर तो, बाप बड़ा ना भैया यहां सबसे बड़ा रुपिया और भी न जाने क्या-क्या। लेकिन जब रुपैय्या ही गिरना शुरू हो जाए तो भगवान ही रखवाला है। ऐसे में रुपैया डॉलर के मुकाबले आज तक के सबसे निचले स्तर पर 70.7 पर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/public-oil-extracting-inflation/article-5828"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/oil.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">रुपये की महिमा बड़ी न्यारी है। कहावतें भी बड़ी बनी है रुपये पर तो, बाप बड़ा ना भैया यहां सबसे बड़ा रुपिया और भी न जाने क्या-क्या। लेकिन जब रुपैय्या ही गिरना शुरू हो जाए तो भगवान ही रखवाला है। ऐसे में रुपैया डॉलर के मुकाबले आज तक के सबसे निचले स्तर पर 70.7 पर पहुंच गया। सरकारें कोई भी रहीं हो इस सारे खेल में तेल जरूर निकला है, किसी और का नहीं बल्कि आम आदमी का, विपक्ष में होने की रस्म अदायगी करती अलग-अलग पार्टियाँ लेकिन सरकार में आते ही हाव भाव ही बदल जाते हैं बिल्कुल रंग बदलने वाले किसी गिरगिट की तरह। पिछले 4 साल से पहले के वक्त में लौटकर देखता हूँ तब पैट्रोल-डीजल की कीमतों पर हाय तौबा मची हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">उस समय के पीएम मनमोहन सिंह को तब की विपक्ष और अब की सत्ताधारी पार्टी ने जाने क्या-क्या कहा था लेकिन लोगों ने सरकार बदल दी और ऐसी बदली की राजीव गाँधी की सरकार के बाद से अब तक सबसे ज्यादा सीटें भाजपा को जीतवा भी दी लेकिन समय बदलने के बाद आज कच्चे तेल की कीमतें तब के मुकाबले बेहद कम हैं लेकिन पेट्रोल डीजल के बढ़े दाम आम आदमी की जेब पर डाका डालने का काम कर रहे हैं। अब बात करते हैं गैरों पर करम की। एक आरटीआई में खुलासा हुआ है कि भारत 15 देशों को 34 रुपए लीटर पैट्रोल व 29 देशों को 37 रुपए लीटर डीजल बेच रहा है। जबकि देश मे पैट्रोल कई जगह 86 रुपये के आसपास पहुंच चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">बस शतक से जरा सा ही दूर तो है। पिछले समय को याद करके कुछ बयान याद आते हैं। ये राजनेता भी गिरगिट की तरह रंग बदलते हैं। तब के बयान वर्तमान में विदेश मंत्री व तब विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज बड़ी मुखर हो आवाज उठाती थी। तब सुषमा स्वराज ने कहा था कि जैसे-जैसे रूपया गिरता है। अब तब के भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार और वर्तमान पीएम ने पेट्रोल डीजल की बढ़ी कीमतों पर दिए थे। पैट्रोल के बड़े दाम दिल्ली में बैठी सरकार की नाकामयाबी का प्रतीक है। दिल्ली में बैठी सरकार और रुपये में होड़ लगी है कौन कितना गिरेगा। अब ना पीएम साहब को सरकार की नाकामयाबी की ही चिंता है और न ही उन्हें अब आम आदमी नजर आता है।</p>
<p style="text-align:justify;">साल 2012 में मई और सितम्बर के महीने में बीजेपी ने पेट्रोल और डीजल के दामों को लेकर भारत बंद किया था। 23 मई 2012 में उस समय के गुजरात के मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया था कि पेट्रोल की कीमत में भारी वृद्धि कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार की विफलता का एक प्रमुख उदाहरण है। इससे गुजरात पर कई सौ करोड़ का बोझ पड़ जाएगा। नाकामयाबी तो है लेकिन क्या सरकारें बदलने के साथ नेताओं के विचार भी बदल जाते हैं या हमारी यादाश्त ही इतनी कमजोर है कि नेता आसानी से कुछ भी चिपका जाते हैं। अब तेल कंपनियां अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड आॅइल के बढ़ते दामों का हवाला देकर पेट्रोल के दाम बढ़ाए हैं, लेकिन पिछले महीने जब क्रूड आॅइल के दाम निचले स्तर पर थे तब इन कंपनियों ने जमकर चांदी काटी।</p>
<p style="text-align:justify;">उस समय इन कंपनियों को पेट्रोल के दाम कम करने का ख्याल क्यों नहीं आया? नेताओं को समाजसेवी होने पर भी मोटा वेतन, सुख-सुविधाएँ, कई तरह के भत्ते और भी न जाने क्या-क्या मिलता है लेकिन इन नेताओं को शिखर तक पहुंचाने वाली जनता हर बार की तरह पिसती नजर आती है। खैर यह उस वक़्त भाजपा नेताओं के बयान है। जब भाजपा विपक्ष में थी। खैर अब तो अच्छे दिन हैं। इस लिए गिरता रुपया राष्ट्रभक्ति की श्रेणी में माना जायेगा। सोशल मीडिया पर लोगों का इससे अच्छा खासा टाइम पास हो जाता है। पैट्रोल-डीजल के बढ़े दामों तले दबता आम आदमी कुछ करने की स्थिति में नजर नहीं आता।</p>
<p style="text-align:justify;">पेट्रोल-डीजल लम्बे समय से राजनैतिक पार्टियों के लिए खींच-तान और राजनैतिक प्रोपगेंडा बना है लेकिन इन दामों को भुगता आम जनता ने ही है। सरकार चाहे कोई भी रही हो। सबने अपने हिसाब से पैट्रोल-डीजल के दामों में बढ़ोतरी की। अब आम आदमी के पास इतना समय तो है नहीं की वो पेट्रोल-डीजल की बढ़ी कीमतों के खिलाफ विरोध दर्ज कराए। आम आदमी को पता है कि अगर वो ऐसा करेगा तो उसका जीवन नहीं चल पाएगा इसलिए राजनैतिक पार्टियों के भरोसे ही आमजन ने शांति और विरोध छोड़ रखा है। शाम होते ही जिसे ही आम आदमी अपने सुकून के लिए टीवी यानि बुद्धू बक्से को आॅन करता है तो सुकून मिलना तो दूर न्यूज उसे बिल्कुल अशांत कर देती है।</p>
<p style="text-align:justify;">तेल में लगी आग, महंगाई का बम ऊपर से टीवी स्टूडियो में बैठे एक्सपर्ट मानो एक-दूसरे को खा ही जाएंगे। बेचारा सुकून का मारा आम आदमी, टीवी बन्द करके सोना चाहता है तो घर की समस्याएं उसे खाने को आती हैं। समस्याएं तो खाएंगी ही भला आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया हो तो किसे चलेगा। किसी से पूछ लो और क्या चल रहा है। सामने वाला मुंह पर साढ़े 6 बजाकर बोलता है बस कट रहे हैं दिन। ऐसी स्थिति हो चली है हर ओर तनाव का माहौल, न वो हंसी न मुस्कुराहट। भाई हंसना सीख लो। ये सब देश से कभी नहीं खत्म होने वाला। जिंदगी तो चलानी ही है चाहे हँसकर या रोकर।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>प्रदीप दलाल</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Sep 2018 20:24:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>जनता के अधिकारों की जीत</title>
                                    <description><![CDATA[राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थित जंतर मंतर पर आंदोलनकारी, अब फिर पहले की तरह अपनी आवाज उठा सकेंगे। जंतर-मंतर और बोट क्लब पर धरना, प्रदर्शन पर लगी रोक को सर्वोच्च न्यायालय ने शर्तों के साथ हटाने का आदेश दिया है। हाल ही में इस मामले में सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि दिल्ली में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/public-rights-wins/article-5035"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/public-right.jpg" alt=""></a><br /><p>राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थित जंतर मंतर पर आंदोलनकारी, अब फिर पहले की तरह अपनी आवाज उठा सकेंगे। जंतर-मंतर और बोट क्लब पर धरना, प्रदर्शन पर लगी रोक को सर्वोच्च न्यायालय ने शर्तों के साथ हटाने का आदेश दिया है। हाल ही में इस मामले में सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि दिल्ली में प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती। अदालत ने कहा कि भारत जैसे गुंजायमान लोकतंत्र में ये अधिकार बेहद अहम हैं। ये अधिकार इसलिए भी अहम है, क्योंकि आम नागरिक अपने विरोध के जरिये सीधे अपनी बात सरकार तक पहुंचाते हैं और उनकी भागीदारी महसूस होती है।</p>
<p>अदालत ने अपना आदेश देते हुए इस बात को जरूर माना कि एनजीटी के फैसले में जो तर्क थे, वे सही हैं, लेकिन पूरी तरह से प्रदर्शन पर पाबंदी समस्या का समाधान नहीं है। जस्टिस ए.के. सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण की पीठ ने आदेश में स्पष्ट तौर पर कहा कि धरने और प्रदर्शन का अधिकार मौलिक अधिकार है। सरकार इसमें वाजिब पाबंदी भी लगा सकती है लेकिन इसमें संतुलन की जरूरत है। प्रदर्शन के अधिकार और शांतिपूर्ण जीवन जीने के लोगों के अधिकार के बीच संतुलन कायम करना होगा। धरना, प्रदर्शन इस तरह से हो कि आस-पास रहने वालों को कोई परेशानी न हो। अदालत ने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि वे दो महीने के अंदर अन्य एजेंसी के साथ मिलकर इस संबंध में एक आदर्श आचारसंहिता और तंत्र तैयार करें, ताकि सीमित संख्या में होने वाले प्रदर्शन धरना आदि को नियंत्रित किया जा सके।</p>
<p>शीर्ष अदालत के इस फैसले से सबसे ज्यादा खुशी उन लोगों को हुई है, जो शांतिपूण ढंग से सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिए राजधानी दिल्ली में इकट्ठा होते हैं। जंतर-मंतर और बोट क्लब पर धरना, प्रदर्शन की पाबंदी हटने से वाकई लोकतंत्र की जीत हुई है। अदालत के इस आदेश से लोगों की आवाज अब फिर से संसद तक पहुंच सकेगी। इस आवाज को कोई दबा नहीं सकेगा।पर्यावरण संबंधी नियमों का उल्लंघन और प्रदूषण का हवाला देते हुए पिछले साल अक्टूबर में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी एनजीटी ने सरकार को यहां के आयोजनों पर तुरंत रोक लगाने का आदेश दिया था। एनजीटी के इस आदेश के बाद दशकों से तरह-तरह के आंदोलनों के स्थल रहे जंतर मंतर पर सभी तरह के धरने-प्रदर्शन बंद हो गए।</p>
<p>एनजीटी के आदेश का सहारा लेते हुए दिल्ली पुलिस ने यहां स्थित सभी टेंटों को तोड़ दिया और आंदोलनकारियों से यह जगह खाली करा ली। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन पर पाबंदी के एनजीटी के इस आदेश को चुनौती दी पूर्व सैनिकों ने। वे इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय में ले गए और अदालत से आदेश की समीक्षा करने को कहा। अदालत ने पहले तो दोनों पक्षों की बात गंभीरता से सुनी और उसके बाद एक ऐसा फैसला दिया, जिसमें दोनों पक्षों के मौलिक अधिकारों की हिफाजत हो रही है। इस आदेश से जहां पर्यावरण संबंधी नियमों का उल्लंघन और प्रदूषण नहीं होगा, तो वहीं आंदोलनकारियों के धरने-प्रदर्शन पर भी रोक नहीं लगेगी। जनसंघर्षों की अभिव्यक्ति का मंच बन गए जंतर मंतर पर रैलियों और प्रदर्शनों पर पाबंदी, निश्चित तौर पर उन लोगों के लिए निराशा का सबब थी, जो अपनी मांगे लोकतांत्रिक तरीके से सरकार के सामने उठाते रहे हैं।</p>
<p>यह ऐसा मंच था, जहां से उनकी आवाज संसद से लेकर पूरे देश में सुनाई देती थी। एक जमाना था जब राजपथ से सटे वोट क्लब पर रैलियां और प्रदर्शन हुआ करते थे। हाई कोर्ट के निर्देश के बाद साल 1993 में सरकार ने जंतर-मंतर को धरना स्थल के लिए सुनिश्चित किया। करीब पांच हजार लोगों की क्षमता वाला यह ऐतिहासिक स्थल तब से कई बड़े आंदोलनों का गवाह रहा है। चाहे निर्भया के सामूहिक दुष्कर्म के बाद हत्या के विरोध का आंदोलन हो या फिर लोकपाल की मांग को लेकर समाजसेवी अन्ना हजारे का आंदोलन, गोया कि ये सभी बड़े आंदोलन यहीं परवान चढ़े और कई अपने मुकाम तक भी पहुंचे। जंतर मंतर देश भर के मजदूरों, किसानों, मानवाधिकार संगठनों और पर्यावरण प्रेमियों के विरोध और असहमति का आंगन रहा है। यहां धरना-प्रदर्शन, आंदोलन कर वह अपनी आवाज सरकार तक पहुंचाते हैं। बड़े विरोध-प्रदर्शनों के अलावा कई छोटे विरोध प्रदर्शन, धरने जंतर मंतर पर इस लिए चलते हैं कि सरकार उनकी मांगों पर सहानुभूति से विचार करे और इनका समाधान करे। देश भर से लोग यहां तभी आते हैं, जब कहीं उनकी कोई सुनवाई नहीं होती। गर यह जगह भी उनसे छिन जाएगी, तो वह कहां से अपनी आवाज सरकार के कानों तक पहुंचाएंगे।</p>
<p>नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अपने आदेश में जंतर मंतर पर एकत्रित होकर धरना देने पर भले ही रोक लगा दी थी, लेकिन प्रदर्शनकारियों को रामलीला मैदान जैसी वैकल्पिक जगह पर स्थानांतरित करने का सरकार को निर्देश दिया था। एनजीटी ने लाउडस्पीकर की आवाज और वायु प्रदूषण को आधार बनाते हुए जगह बदलने का फैसला दिया था, पर नई जगह पर तो पुरानी जगह से भी ज्यादा लोग रहते हैं। जंतर मंतर के पास तो काफी कम रिहायशी इलाका है। जंतर मंतर से कहीं अधिक आबादी रामलीला मैदान के पास है। सड़कें बहुत अधिक चौड़ी नहीं है। मैदान के पास एक कॉलेज, दो अस्पताल, सिविक सेंटर और कुछ स्कूल चलते हैं। बड़ी रैलियों के समय रामलीला मैदान को आसपास के क्षेत्रों से पार्किंग शिफ्ट करने के साथ, ट्रैफिक को डायवर्ट करना पड़ता है। रोज प्रदर्शन होने की वजह से यहां ध्वनि प्रदूषण के साथ वायु प्रदूषण भी बढ़ रहा है। गाड़ियों के जाम लगने की भी समस्या है। यहीं नहीं जंतर मंतर के आसपास खाने, रहने, पेयजल, शौचालय और सफाई की अच्छी व्यवस्था है, लेकिन यह सब रामलीला ग्राउंड में नहीं है। सैद्धांतिक तौर पर एनजीटी का आदेश भले ही अच्छा था, पर व्यावहारिक तौर पर रामलीला मैदान में भी इस तरह की समस्याएं सामने आ रही हैं।</p>
<p>सच बात तो यह है कि ध्वनि और वायु प्रदूषण राजधानी दिल्ली में हर जगह है। गंदगी और प्रदूषण को ही आधार बनाकर बोट क्लब पर होने वाली रैलियों, धरनों-प्रदर्शनों को प्रतिबंधित कर दिया गया था और उन्हें संसद के नजदीक जंतर मंतर रोड पर अस्थायी स्थल के तौर पर इजाजत दी गई थी। यही समस्या अब रामलीला मैदान के आसपास रहने वाले रहवासियों को आ रही है। वायु प्रदूषण कानून के हिसाब से तो यहां भी धरने-प्रदर्शन नहीं हो सकते। तर्कसंगत बात तो यह होती कि संबंधित प्राधिकरण अपनी जिम्मेदारियों का सही निर्वहन करते हुए धरने-प्रदर्शनों और रैलियों को व्यवस्थित करते। कोशिश करते कि जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन भी चलते रहें और वायु एवं ध्वनि प्रदूषण भी न हो। कमोबेश यही बात अब सर्वोच्च न्यायालय ने अपने हालिया आदेश में कही है। धरने-प्रदर्शनों और रैलियों को व्यवस्थित, नियंत्रित किया जाए, तो किसी को भी परेशानी नहीं आएगी। संबंधित अधिकारियों द्वारा अपनी जिम्मेदारी न निभाने के कारण जंतर-मंतर के लोग समस्याओं का सामना कर रहे थे। यदि वे अपनी जिम्मेदारियों का सही तरह से पालन करते, तो आज शीर्ष अदालत को इस आदेश देने की जरूरत ही नहीं पड़ती।</p>
<p>सर्वोच्च न्यायालय का हालिया आदेश, जहां जन संघर्षों की हिफाजत करता है, वहीं जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों के हक में भी है। इस आदेश से हमारे गौरवशाली लोकतंत्र और जनता के अधिकारों की जीत हुई है। अदालत ने लोगों का शांतिपूर्वक तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का उनका अधिकार, उन्हें दोबारा वापस दे दिया है। केंद्र की मोदी सरकार ने दिल्ली पुलिस का गलत इस्तेमाल करते हुए जंतर-मंतर में स्थायी तौर पर धारा 144 लगवा दी थी। जो कि एक लोकतांत्रिक देश में रहने वाले नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन था। लोकतंत्र में जनता को और तमाम सामाजिक-राजनीतिक संगठनों को सत्ता के केंद्र के नजदीक जाकर अपनी आवाज उठाने और शांतिपूर्वक विरोध प्रदर्शन करने का संवैधानिक अधिकार है और उनका यह अधिकार, उनसे कोई नहीं छीन सकता। जंतर-मंतर और वोट क्लब पर धरना, प्रदर्शन पर लगी रोक हर मायने में असंवैधानिक थी, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश से हटाकर देश के नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की है। जिसका स्वागत किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:right;">जाहिद खान</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 28 Jul 2018 05:07:20 +0530</pubDate>
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                <title>राष्ट्रपति कोविंद: मानसून सत्र में  जनहित कार्यों को आगे बढ़ाएं</title>
                                    <description><![CDATA[फतेहाबाद में राष्टपति रामनाथ कोविंद ने जनसभा को किया संबोधित फतेहाबाद (सच कहूँ न्यूज)। देश के 14वें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कबीर महाकुंभ से भारतीय लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में संत शिरोमणि कबीर के विचारों की प्रासंगिकता का जिक्र करते हुए लोकतंत्र के मंदिरों के जनप्रतिनिधियों को बेहद अहम पाठ पढ़ाया। संत कबीर को उनकी 620वीं जयंती […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/president-kovind-carry-forward-public-work-in-the-monsoon-session/article-4861"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/ramnath-kovind.jpg" alt=""></a><br /><h2><strong>फतेहाबाद में राष्टपति रामनाथ कोविंद ने जनसभा को किया संबोधित</strong></h2>
<p><strong>फतेहाबाद (सच कहूँ न्यूज)।</strong> देश के 14वें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने कबीर महाकुंभ से भारतीय लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में संत शिरोमणि कबीर के विचारों की प्रासंगिकता का जिक्र करते हुए लोकतंत्र के मंदिरों के जनप्रतिनिधियों को बेहद अहम पाठ पढ़ाया। संत कबीर को उनकी 620वीं जयंती पर पुष्पांजलि देने के बाद राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि कबीर पंथ के रास्ते ही पंथनिरपेक्षता आती है।उन्होंने कहा कि कबीर की वाणी न केवल सही व्यक्ति, समाज व राष्ट्र को सही दिशा देती है बल्कि अगर उसे व्यावहारिकता में उतारें तो लोकतंत्र को भी ताकत मिलेगी। वह यहां धानक समाज द्वारा आयोजित कबीर महाकुंभ में समस्त उत्तर भारत से आए प्रतिनिधियों को संबोधित कर रहे थे।</p>
<h2>सांसदों व विधायकों से कबीर  वाणियों को  आत्मसात का आह्वान</h2>
<p>राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मानसून सत्र से ही कबीर की वाणियों को मन, कर्म व वचन से आत्मसात का आह्वान देशभर के सांसदों व सभी राज्यों के विधायकों से किया। उन्होंने कहा कि पूरे देश में मानसून आ चुका है। लोकतंत्र के मंदिरों में मानसून सत्र शुरू होने वाले हैं। उनका विश्वास है कि देश के हर क्षेत्र के सांसद व सभी राज्यों के विधायक लोकतंत्र के मूलमंत्र अर्थात चर्चा, परिचर्चा व संवाद के माध्यम से जनहित के कार्यों को आगे बढ़ाएंगे।</p>
<h2>कबीर पंथ का रास्ता ही पंथ निरपेक्षता का मार्ग</h2>
<p>उन्होंने कहा कि समरस समाज की स्थापना के पैरोकार संत कबीर की वाणी को व्यावहारिक पटल पर उतारने की जरूरत है। सही मायनों में कबीर पंथ का रास्ता ही पंथ निरपेक्षता का मार्ग है। राष्ट्रपति ने कबीर को किसी एक समाज अथवा समुदाय से जोड़ने वालों को भी नसीहत दी कि वह सभी के थे। उनकी वाणी सबके लिए है और वह हमें सही दिशा में ले जाती है। लोकतंत्र को भी इससे ताकत मिलेगी। संबोधन में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने संविधान निर्माता बाबा सहब डॉ. भीमराव अंबेडकर की विचारधारा को भी संत शिरोमणि कबीर से प्रेरित बताया। उन्होंने कहा कि डॉ. अंबेडकर के चिंतन पर कबीर का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। कबीर के विचारों से ही प्रेरित होकर उन्होंने कमजोर व निरीह लोगों के हित की बात की थी।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/president-kovind-carry-forward-public-work-in-the-monsoon-session/article-4861</link>
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                <pubDate>Mon, 16 Jul 2018 04:20:20 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>शिक्षा बनाम लोक संस्कृति</title>
                                    <description><![CDATA[हाल ही में राजस्थान के समाचार पत्रों में एक खबर पढ़ने को मिली कि राजस्थान सरकार ने निर्णय किया है कि आने वाले शिक्षा सत्र में राजस्थान शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त सभी सरकारी व गैर सरकारी प्रारम्भिक व माध्यमिक स्कूलों में हर शनिवार को सामाजिक सरोकार से जुड़ी शिक्षा प्रदान की जायेगी। इसके लिये […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/education-public-culture/article-4305"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/lakhe.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हाल ही में राजस्थान के समाचार पत्रों में एक खबर पढ़ने को मिली कि राजस्थान सरकार ने निर्णय किया है कि आने वाले शिक्षा सत्र में राजस्थान शिक्षा विभाग से मान्यता प्राप्त सभी सरकारी व गैर सरकारी प्रारम्भिक व माध्यमिक स्कूलों में हर शनिवार को सामाजिक सरोकार से जुड़ी शिक्षा प्रदान की जायेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिये माध्यमिक शिक्षा निदेशक ने शिविरा पंचाग जारी किया है। शिक्षा विभाग के स्कूलों में प्रथम शनिवार को किसी महापुरूष के जीवन से सम्बन्धित प्रेरक जानकारी दी जायेगी। दूसरे शनिवार को दादी, नानी से जुड़ी प्रेरक कहानियां सुनायी जायेंगी। माह के तीसरे शनिवार को संत, महात्माओं, धर्मगुरूओं के प्रवचन करवाये जायेगें। चौथे शनिवार को महाकाव्यों पर प्रश्रोत्री होगी। पांचवे शनिवार को प्रेरक नाटकों का मंचन व राष्ट्रभक्ति गीतो का गायन होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षा विभाग से उक्त आदेश जारी होते ही कई शिक्षक संगठनो ने सरकार के इस आदेश का यह कह कर विरोध करना शुरू कर दिया कि इससे शिक्षा का भगवाकरण होगा। मेरी नजर में सरकार का यह एक अच्छा कदम है। आज के दौर में विद्यार्थी दर्जनों किताबो व कापियों से भरे भारी भरकम बस्तो का बोझ उठाये मानसिक रूप से इतने दब चुके है कि उन्हे समाजिक गतिविधियों का ज्ञान ही नहीं रहता है। छात्र दिन भर अपनी पढ़ाई की चिंता में डूबा रहता है। आज छात्र बोर्ड की परीक्षा में 500 में 499 अंक प्राप्त करने लगा है। पहले के समय में प्रथम श्रेणी से पास होने वाला श्रेष्ठ छात्र माना जाता था। छात्रों के 70-75 प्रतिशत अंक आना तो बहुत बड़ी बात मानी जाती थी। ऐसे में आज के समय में छात्रों के मध्य पढ़ाई को लेकर भारी प्रतिस्पर्धा चल रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज हर बच्चे के अभिभावक भी चाहते हैं कि उनका बच्चा क्लास में सर्वाधिक अंक लाये। बच्चे भी अभिभावकों के दबाव में दिन भर किताबों में डूबे रहने लगे हैं। ऐसे में बच्चो की पूरी दुनिया किताबो के बस्तों व स्कूल तक ही सिमट कर रह गयी है। आज बच्चे को घर में क्या हो रहा है, क्या सामाजिक रीति-रिवाज, मान्यतायें है इससे उन्हे कोई सरोकार नहीं हैं। बच्चों की पूरी दुनिया तो अधिकाधिक अंक प्राप्त करने का प्रयास करने तक ही रह गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में राजस्थान सरकार का निर्णय एक नयी आस जगाता है। इस निर्णय से बच्चों को अपनी संस्कृति को, अपने स्थानीय रीति-रिवाजों को निकट से जानने, समझने का मौका तो मिलेगा ही उनकी जिन्दगी में एक नया नवाचार भी होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले के समय में छोटे बच्चे गांव के स्कूल में पढ़ते थे तब आज की तरह स्मार्ट फोन का जमाना नहीं था। उस वक्त सभी बच्चे रात में सोने से पहले घर के बड़े बुर्जुगों, दादी, नानी से कहानियां सुनते थे। गर्मी की छुट्टियों में बच्चे जब अपनी ननिहाल जाते थे तो उनको सबसे अधिक उत्सुकता नानी से कहानियां सुनने की होती थी। नानी भी बच्चों को बड़े चाव से कहानियां सुनाती थी। उस जमाने के बुर्जुगों को बहुत सारी कहानियां याद रहती थी जो रोजाना बच्चों को सोने से पहले सुनाया करती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">स्कूलों में महापुरूषों के जीवन पर चर्चा करना, प्रेरक कहानियां सुनाना, धर्मगुरूओं के प्रवचन सुनाना, महाकाव्यों पर प्रश्रोत्री, प्रेरक नाटकों का मंचन करना कतई गलत नहीं हैं। हम जब स्कूल में पढ़ते थे तो गांव के स्कूल में प्रतिवर्ष दो-तीन नाटको का मंचन किया जाता था। स्कूल में खेले जाने वाले नाटकों के सभी पात्र स्कूल के अध्यापक व विद्यार्थी निभाते थे। कई दिन पहले से नाटक का रिहर्सल शुरू हो जाता था। नाटक देखने पूरा गांव उमड़ पड़ता था। नाटक के माध्यम से स्कूल में कुछ अतिरिक्त आय हो जाती थी जिससे गरीब बच्चों की फीस, किताब, कापी व ड्रेस की व्यवस्था की जाती थी। उसमें से कुछ पैसा स्कूल के कमरों में सफेदी करने पर भी खर्च किया जाता था। सफेदी बच्चे स्वंय ही करते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">आज के तकनीकी युग में बच्चे अपने महापुरूषों, बड़ों-बुर्जुगों को भूलते जा रहे हैं। स्कूलों में महापुरूषो के जीवन पर चर्चा की जायेगी तो बच्चों में उनके बारे में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न होगी। हमारे झुंझुनू जिले के खेतड़ी में स्वामी विवेकानन्द जी ने तीन बार यात्रा की थी व कई दिनों तक यहां ठहरे थे। उनको भगवाबाना व स्वामी विवेकानन्द नाम भी शिकागो धर्म सम्मेलन में जाते वक्त खेतड़ी के राजा अजीतसिंह जी द्वारा ही प्रदान किया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">मगर आज इस बात का ज्ञान कितने विद्यार्थियों को है। स्कूलों में जब महापुरूषों के जीवन पर चर्चा होगी तब स्वामी विवेकानन्द जी का प्रसंग जरूर आयेगा व विद्यार्थियों को उनके बारे में पता लग सकेगा। इसी प्रकार की अन्य पे्ररणादायक बातों से छात्र रूबरू होगें। स्कूलों में धर्मगुरू छात्रों को धर्म से जुड़ी सामाजिक एकता की बाते बतायेंगें तो उनकी सोच का दायरा बढ़ेगा। धर्म कोई भी हो सभी धर्मो में समाज को एकसूत्र में पिरोने की बातें होती हंै। कोई भी धर्म समाज को तोड़ने की शिक्षा नहीं देता हैं। सभी धर्म शान्ति के मार्ग पर चलने की राह दिखाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आज के प्रतियोगिता के दौर में मनुष्य एक दूसरे का प्रतिस्पर्धी बन कर रह गया है। वर्तमान समय में स्कूल शिक्षा का केन्द्र ना होकर पढ़ाई के कारखाने बन चुके हैं। हर अभिभावक चाहता है कि उसका बच्चा उसके पड़ोसी के बच्चे से अधिक अंक प्राप्त करें।</p>
<p style="text-align:justify;">ऊंची पढ़ाई पढ़ कर बड़े पद पर काम करें। अभिभावक प्रतिस्पर्धी के चक्कर में यह भी नहीं देखता की उसका बच्चा क्या पढ़ना चाहता है। उसकी किस विषय में रूचि है। बच्चों को उनकी रूचि का विषय नहीं मिलने पर सही ढ़ंग से पढ़ नहीं पाते हैं, उपर से कम अंक लाने पर घर वालों का डर। ऐसे माहौल में बच्चा अवसाद की स्थिति में आ जाता है व कई बार इसी प्रकार के तनाव के चलते वह गलत कदम उठा लेता है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान का कोटा शहर कोचिंग के क्षेत्र में देश की सबसे बड़ी मंडी बन चुका हैं। यहां प्रतिवर्ष लाखों छात्र पढ़ने आते हैं मगर तनाव के चलते प्रतिवर्ष दर्जनो छात्र आत्महत्या भी कर लेते हैं। हालांकि यहां से हर साल कई टापर भी निकलते हैं मगर आत्म हत्या करने वाले उनपर एक बदनुमा दाग बन जाते है। यहां पढ़ने वाले छात्र द्वारा आत्म हत्या करने का कारण पढ़ाई का दवाब रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन छात्रों के घरवाले उनपर लाखों रुपए खर्च कर उन्हे कोटा इस आस में पढ़ने भेजते हैं कि वहां जाकर वह प्रतियोगी परीक्षा अवश्य पास कर लेगा ऐसे में परीक्षा में असफल होने पर वे मानसिक दबाव में आकर गलत कदम उठा लेते हैं। जिसका खामियाजा उनके अभिभावकों को जिन्दगी भर उठाना पड़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज की शिक्षा मात्र किताबी व कम्प्यूटर वाली रह गयी है। शिक्षा में व्यावहारिक पक्ष गायब हो गया है। शिक्षा का पूर्णत: व्यावसायी करण हो चुका है। इस प्रकार की शिक्षा ग्रहण करने वाले छात्रों से व्यावहारिकता की उम्मीद करना बेमानी है। सरकारों को शिक्षा के क्षेत्र में आमूलचूल परिवर्तन कर इसे व्यवहारिक, रोजगारपरक व सामाजिक समरसता वाली बनाने की दिशा में कदम उठाने चाहिये ताकि शिक्षा पूर्ण करने के बाद मात्र सरकारी नौकरी की आश ना रख अपने स्वरोजगार पर भी ध्यान केन्द्रित कर सके। जिससे शिक्षित बेरोजगारों की बढ़ती संख्या पर काबू पाया जा सके।</p>
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                <pubDate>Tue, 19 Jun 2018 08:11:07 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>केंन्द्र सरकार के चार साल पूर्ण होने के बहाने जनता के बीच पहुंचेगी भाजपा</title>
                                    <description><![CDATA[कोर कमेटी की बैठक में 10 जून तक का रोड़मैप तय जयपुर (सच कहूँ न्यूज)। राजस्थान भारतीय जनता पार्टी की आज यहां हुई कोर कमेटी की बैठक में प्रदेश में संगठन को मजबूत करने और कार्यकतार्ओं को सक्रिय करने के लिये रोड़मैप तैयार किया गया। पार्टी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी ने पत्रकारों से कहा कि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/bjp-will-reach-out-public-on-the-pretext-of-completion-four-years-centra-government/article-3806"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-05/vasundra1.jpg" alt=""></a><br /><h2>कोर कमेटी की बैठक में 10 जून तक का रोड़मैप तय</h2>
<p><strong>जयपुर (सच कहूँ न्यूज)। </strong>राजस्थान भारतीय जनता पार्टी की आज यहां हुई कोर कमेटी की बैठक में प्रदेश में संगठन को मजबूत करने और कार्यकतार्ओं को सक्रिय करने के लिये रोड़मैप तैयार किया गया। पार्टी के पूर्व प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी ने पत्रकारों से कहा कि बैठक में केंन्द्र सरकार के चार साल पूर्ण होने पर प्रदेश में आयोजित विभिन्न कार्यक्रमों की समीक्षा, विधानसभा चुनावों का रोड़मैप और चुनावी व्यूह रचना की समीक्षा की गई। उन्होंने केन्द्र की मोदी सरकार के चार साल को बेमिसाल बताते हुये कहा कि केन्द्र सरकार जन आंकाक्षाओं पर खरी उतरी है। उन्होंने कहा कि भाजपा राज में देश की साख अंर्तराष्ट्रीय जगत में बढी है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि कोर कमेटी की बैठक में आगामी विधानसभा चुनावों के मद्देनजर दस जून तक के कार्यक्रमों को अंतिम रूप दिया गया। इसके तहत एक जून को मोदी मैराथन दौड़, 2 जून को कमल संदेश यात्रा ,चार और पांच जून को शक्ति केन्द्र,सात और आठ जून को ग्राम सभा रात्रि चौपाल तथा नौ और दस जून को बूथ संपर्क अभियान संचालित किया जायेगा। उन्होंने बताया कि इन कार्यक्रमों की भारतीय जनता युवा मोर्चा,भारतीय महिला मोर्चा सहित सभी संगठन सक्रिय भागीदारी निभाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">पार्टी मुख्यालय पर आयोजित भाजपा प्रदेश कोर कमेटी की बैठक में मुख्यमंत्री वसुन्धरा राजे, राष्ट्रीय सह-संगठन महामंत्री वी.सतीश, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ओमप्रकाश माथुर, निवर्तमान प्रदेशाध्यक्ष अशोक परनामी, प्रदेश संगठन महामंत्री चन्द्रशेखर, केन्द्रीय मंत्री अर्जुनराम मेघवाल, सीआर चौधरी, गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया, कैबिनेट मंत्री अरूण चतुवेर्दी, राजेन्द्र राठौड़, यूनुस खान शामिल रहे। विदित रहे कि भाजपा ने विधानसभा में मिशन 180 और लोकसभा में मिशन 25 बना रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसको अमलीजामा पहनाने के लिए पार्टी ने केन्द्र सरकार के चार वर्ष पूर्ण होने के कार्यक्रमों के साथ शुरू कर दिया है। पार्टी सूत्रों का कहना है कि प्रदेश में गत महीनों में हुए उपचुनाव के हार के बाद भाजपा एक बार फिर चुनावी मैदान में पूरी तैयारी के साथ उतरने की तैयारी कर रही है। भाजपा नेताओं का मानना है कि राज्य सरकार के प्रति कहीं न कहीं एंटीइंकबेंसी का सामना करना पड़ सकता है। अब इसको कम करने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सबसे बड़े हथियार साबित हो सकते हैं। चुनाव में उनका अधिक से अधिक उपयोग करने की योजना पर भाजपा नेताओं ने काम करना शुरू कर दिया है।</p>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 27 May 2018 20:30:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>बड़े चूककर्ताओं के नाम सार्वजनिक हों</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में बैंकों में धोखाधड़ी और घोटालों की बाढ़ आयी हुई है और भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों से इस बात का खुलासा हुआ है कि वर्ष 2012 से 2017 के बीच पांच वर्षों में बैंकों को कर्ज घोटालों में 61260 करोड़ रूपए खोने पडे। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार ऐसे धोखाधड़ी के मामलों की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/names-of-big-defaulters-should-be-public/article-3550"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-02/bank-scam.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत में बैंकों में धोखाधड़ी और घोटालों की बाढ़ आयी हुई है और भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों से इस बात का खुलासा हुआ है कि वर्ष 2012 से 2017 के बीच पांच वर्षों में बैंकों को कर्ज घोटालों में 61260 करोड़ रूपए खोने पडे। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार ऐसे धोखाधड़ी के मामलों की संख्या 8670 है जबकि इलेक्ट्रोनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद ने संसद को बताया कि ऐसे मामलों की संख्या 25600 है। यह बताता है कि लोन लेना आसान है और उसे न लौटाना और भी आसान है।</p>
<p style="text-align:justify;">बैंकों की गैर-निष्पादनकरी आस्तियां 6 लाख करोड़ रूपए की है और यदि इसमें बट्टे खाते में डाली गयी राशि को भी शामिल करें तो यह 12 लाख करोड़ तक पहुंचती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाल के बयान के अनुसार अधिकतर बडेÞ ऋणों का भुगतान नहीं किया गया है और बेचारे जमाकर्ताओं की बचत निशाने पर है। ऐसा लगता है कि जनता का पैसा लूटने के लिए है। पंजाब नेशनल बैंक का 11400 करोड़ रूपए का घोटाला और रोटोमैक कंपनी के मालिक विक्रम कोठारी द्वारा 2695 करोड़ रूपए न लौटाए जाने का व्यापक प्रभाव पडेगा। लगता है कई बैंकों ने अपने घोटाले छिपा रखे हैं। ये धोखाधड़ी और घोटाले केवल बडेÞ सरकारी और निजी बैंकों तक सीमित नहीं हैं। ग्रामीण और सहकारी बैंकों में भी ऐसे धोखाधड़ी देखने को मिलती है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2014 में नाबार्ड ने कहा था कि वर्ष 2012-13 में क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को धोखाधड़ी के कारण 727़54 करोड़ रूपए और 2011-12 में 611़77 करोड़ रूपए खोने पडे। नाबार्ड ने स्वीकार किया था कि बैंक धोखाधड़Þी के ऐसे बडे मामलों की सूचना नहीं दे रहे हैं और यह राशि और भी बड़ी हो सकती है। सहकारी बैंकों में भी धोखाधड़ी हो रही है किंतु उसके आंकडे उपलब्ध नहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर पूरा बैंकिंग क्षेत्र संकट के दौर से गुजर रहा है और सरकारी बैंक विशेष रूप से संकट की स्थिति में हैं। ये बैंक वास्तव में सरकार द्वारा पुर्न पूंजीकरण के आधार पर चल रहे हैं और इसके लिए 2000-01 और 2014-15 के बीच 81200 करोड़ रूपए का बजटीय प्रावधान किया गया। 2017 में सरकार ने सरकारी बैंकों के पुर्नपूंजीकरण के लिए 2़11 लाख करोड़ रूपए उपलब्ध कराने की घोषणा की थी। इस राशि में से 18139 करोड़ रूपए बजटीय प्रावधान से और 1़35 लाख करोड़ रूपए बिक्री से जुटाए जाएंगे। शेष राशि बैंक सरकार की हिस्सेदारी बेचकर जुटाएंगे। इसका मतलब है कि भविष्य में सरकार को कम लाभांश मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकराी बैंकों का दोष यह है कि ये अवसंरचना परियोजनाओं के लिए भारी ऋण देते हैं और ये परियोजनाएं आगे नहीं बढ़ पाती हैं। इसका उपाय यह है कि कर्ज के कारण घाटे के लिए धन उपलब्ध कराया जाए, प्रबंधन की जिम्मेदारी तय की जाए और बैंकों का प्रशासन सुधारा जाए। जैसा कि सभी जानते हैं कि रीयल एस्टेट परियाजाओं के लिए दिए गए कर्ज को अन्य प्रयोजनों के लिए खर्च किया गया। बैंकों द्वारा एक बार कर्ज देने के बाद उस पर उनका कोई नियंत्रण नहीं रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसीलिए जेपी जैसी कंपनी द्वारा 95 हजार करोड़ रूपए न लौटाए जाने के बावजूद उसे गैर-निष्पादनकारी आस्तियों में नहीं दर्शाया गया। बैंकों के लिए राहत पैकेज तब दिया जाता है जब बैंक विफल हो जाते हैं। विनियामक अर्थों में इसका तातपर्य यह है कि बैंकों का जोखिम और पूंजी का अनुपात उनकी परिसंपत्ति के मूल्य से कम हो जाता है। वतमान में यह मानदंड 8 प्रतिशत का है और बेसल मानकों में भी यही दर निर्धारित की गयी है। भारतीय रिजर्व बैंक इसे 9 प्रतिशत पर रखना चाहता है। यह 14 प्रतिशत पर रखा गया था क्योंकि यदि कुछ ऋण अशोध्य ऋण भी बन जाएं तो बैंक पूंजी आवश्यकता के स्तर से नीचे न गिर पाए और वे ऋण देने की स्थिति में बने रहें।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने 12 सरकारी बैंकों सहित 15 सबसे बड़े बैंकों के दबाव झेलने की परीक्षा की। भारतीय रिजर्व बैंक के परीक्षण में भी बैंकों की गैर-निष्पादनकारी आस्तियों में वृद्घि पायी गयी। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष हो या भारतीय रिजर्व बैंक उन्होंने बैंकिंग संकट को कम कर आंका। वे चूककर्ताओं के नाम नहीं बताते हैं। पंजाब नेशनल बैंक घोटाले में कहा जा रहा है कि नीरव मोदी ने बैंक की मुंबई की एक शाखा को चुना जो स्विफ्ट नामक आॅनलाइन प्रणाली से नहीं जुड़ा हुयी थी और यदि यह शाखा भी आॅनलाइन प्रणाली से जुड़ी होती तो घोटाला आसानी से सामने आ जाता। इस मामले में कार्य प्रणाली बहुत सरल थी। ऋण छोटी-छोटी राशियों में अनेक बार लिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">कई बार छोटी-छोटी राशियों का भुगतान भी किया गया किंतृ अधिकतर राशि का बही में समायोजन किया गया। इस तरह से बड़ा आंकड़ा सामने नहीं आया और जब तक गहन छानबीन न की जाए तब तक यह पकड़ा भी नहीं जाता। भारतीय रिवर्ज बैंक और अन्य विनियामकों की कार्यवाही दर्शाती है कि बंंैकों में बेचारे जमाकर्ताओं की राशि की सुरक्षा की किसी को चिंता नहीं है। इस बात का कोई आकलन नहीं किया गया है कि ऋण धोखाधड़ी और अन्य घोटालों में बैंकों ने कितनी राशि खोई है। एकमात्र सुरक्षा यह है कि अधिकतर बैंक सरकारी बैंक हैं और सरकार उनको बचाए रखने के लिए पैसा दिए जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">जमाकर्ताओं और सरकार को इस बात पर पुनर्विचार करना होगा कि क्या लोगों को बैंकिंग के माध्यम से लेनदेन करने के लिए बाध्य किया जा सकता है। यह बहुत जोखिम भरा है। आॅनलाइन बैंकिंग प्रणाली शुरू होने के बाद अनेक लोगों को आॅनलाइन धोखेबाजों द्वारा चपत लगायी जा चुकी है। क्या आधार को बैंक खातों से जोड़ने से सहायता मिलेगी? सरकार को चाहिए कि वह बैंकों से कहे कि फिलहाल इसे रोक दे क्योंकि सुरक्षित आनलाइन बैंकिंग के बारे में अभी अनेक आशंकाएं हैं। आधार को बैंक खातों से जोड़ने वाले भी ऋण धोखाधड़ी कर बच सकते हैं। इसलिए इस प्रणाली को 99 प्रतिशत ईमानदार जमाकर्ताओं पर क्यों थोपा जाए? प्रक्रिया को जटिल बनाने से जमाकर्ताओं को मदद नही मिलती है जो वास्तव में बैंकों के मालिक हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">व्यापार में सरलता लाने के नाम पर लगता है बैंक कर्ज देने में लापरवाही बरत रहे हैं। उनका वसूली और निगरानी तंत्र कमजोर है। पिछले कुछ वर्षों में ऋण को सस्ता बनाए जाने के कारण ऋण की मांग बढ़ी है और इसके साथ ही धोखाधड़ी के मामले भी बढ़े हैं। किसी भी व्यक्ति को तब तक दूसरा ऋण नहीं दिया जाना चाहिए जब तक वह पहले ऋण के 90 प्रतिशत का भुगतान न कर दे। जमाकर्ताओं के लिए दुविधा की स्थिति है। वे कम ब्याज प्राप्ति और धोखाधड़ी के कारण बढ़ते जोखिम, बढ़ते बैंक प्रभारों और पैसे का मूल्य कम होने के कारण नुकसान उठा रहे हैं और इसका अप्रत्यक्ष प्रभाव पूरी अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। यदि यह प्रणाली कमजोर हुई तो अंतर्राष्ट्रीय रेटिंग में गिरावट आएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश में शिक्षा और कृषि ऋण की जटिल प्रक्रियाएं पूरी करके दिए जाते हैं फिर बिना किसी रेहन के अरबों रूपयों का ऋण कैसे दिया गया? बैंकों से कहा जाना चाहिए कि वे ऊंची राशि का ऋण लेने वाले लोगों का नाम अपनी वेबसाइट पर डालें। यदि एक ऋण लेने वाले किसान का नाम सार्वजनिक किया जा सकता है तो फिर मोटी राशि का कर्ज लेने वालों के नाम क्यों नहीं? लोगों का बैंकों में विश्वास बना रहना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><em>शिवाजी सरकार</em></p>
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                <pubDate>Tue, 27 Feb 2018 02:20:41 +0530</pubDate>
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