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                <title>Farmer movement - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Farmer movement RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>अंबाला में सीएम को दिखाए काले झंडे, पुलिस ने धक्का-मुक्की की तो किसानों ने बरसाए डंडे</title>
                                    <description><![CDATA[जजपा के विधायक भी खुलेआम देने लगे चेतावनी, बिल वापिस नहीं हुए तो समर्थन होगा वापिस चंडीगढ़ (अनिल कक्कड़)। कृषि के तीनों कानूनों को वापिस लेने की मांग को लेकर पिछले 25 दिनों से दिल्ली बॉर्डर पर धरना दे रहे किसानों की बात मोदी सरकार नहीं सुन रही है। इसी से खफा किसान अब भाजपा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/farmer-movement-farmers-and-laborers-showed-black-flags-to-cm-khattar-in-ambala-city/article-20749"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/farmer-movement.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:left;">जजपा के विधायक भी खुलेआम देने लगे चेतावनी, बिल वापिस नहीं हुए तो समर्थन होगा वापिस</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>चंडीगढ़ (अनिल कक्कड़)।</strong> कृषि के तीनों कानूनों को वापिस लेने की मांग को लेकर पिछले 25 दिनों से दिल्ली बॉर्डर पर धरना दे रहे किसानों की बात मोदी सरकार नहीं सुन रही है। इसी से खफा किसान अब भाजपा और जजपा मंत्रियों और नेताओं का प्रदेश में जगह-जगह काले झंडे दिखाकर उनका विरोध कर रहे हैं। इसी कड़ी में हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल को मंगलवार को अंबाला में किसानों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">आक्रोशित किसानों को काबू करने में पुलिस को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। वहीं जुलाना से जेजेपी विधायक अमरजीत ढांडा ने खट्टर सरकार को चेतावनी दे दी है कि यदि सरकार किसानों की समस्या का समाधान जल्द नहीं निकालती तो समर्थन वापिस लिया जाएगा। गौरतलब हैं कि अंबाला में मंगलवार को सीएम मनोहर लाल भाजपा की मेयर पद की प्रत्याशी डॉ. वंदना शर्मा के समर्थन में एक जनसभा को संबोधित करना था। सीएम के अंबाला आगमन की सूचना मिलते ही सैकड़ों किसान सिटी के अग्रसेन चौक पर जमा हो गए।</p>
<h4 style="text-align:justify;">पुलिस ने की धक्का-मुक्की, किसान की पगड़ी गिरी, मामला बिगड़ गया</h4>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के अनुसार किसान शांतिपूर्ण तरीके से काले झंडे दिखाकर विरोध व्यक्त करने की मांग कर रहे थे। प्रशासन ने चालाकी दिखाते हुए मुख्यमंत्री को दूसरे रास्ते से निकालने का प्रयास किया। इसके बाद मामला तूल पकड़ गया। किसानों ने पुलिस के वाहनों पर भी डंडे मारे। करीब एक हजार से ज्यादा किसान मौके पर मौजूद थे। पुलिस ने किसानों को पीछे किया। इसी धक्का-मुक्की में एक किसान की पगड़ी भी गिर गई। इसके बाद जमकर हंगामा हुआ। किसानों ने सीएम के काफिले में शामिल एंबुलेंस को छोड़कर हर गाड़ी पर डंडे बरसाए। जिस गाड़ी में सीएम बैठे थे, उस गाड़ी पर भी डंडे मारे गए। (CHD News)</p>
<h4 style="text-align:justify;">जहां-जहां भाजपा-जजपा नेता जाएंगे वहां होगा विरोध |</h4>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि किसान एलान कर चुके हैं कि जहां-जहां भाजपा-जजपा के बड़े नेता आएंगे वहीं पर काले झंडे दिखाकर विरोध व्यक्त किया जाएगा। हाल ही में डिप्टी सीएम दुष्यंत का भी प्रदेश में कई जगह विरोध हुआ था, वहीं रानियां में बिजली मंत्री रणजीत सिंह को काले झंडे दिखाए गए। कुरुक्षेत्र से सांसद नायब सैनी को तो किसानों ने एक भवन का शिलान्यास तक नहीं करने दिया, वहां उन्होंने खुद भवन का शिलान्यास किया। (CHD News)</p>
<h4 style="text-align:justify;">सरकार जबरदस्ती कोई कानून नहीं लागू कर सकती: ढांडा</h4>
<p style="text-align:justify;">जेजेपी विधायक अमरजीत ढांडा ने चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार जबरदस्ती कोई भी कानून लागू नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि जब किसान ही नाराज हैं तो कानून वापिस ले लेने चाहिए। उन्होंने किसानों का समर्थन करते हुए कहा कि सरकार जल्द किसानो का नही निकालती समाधान तो समर्थन वापिस लिया जाएगा।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 22 Dec 2020 14:08:14 +0530</pubDate>
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                <title>किसान आंदोलन पर प्रस्तावित समिति में व्यापारियों को शामिल करने की मांग</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली। अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ ने किसान आंदोलन पर गठित होने वाली प्रस्तावित समिति में व्यापारियों को भी शामिल करने की मांग की है। परिसंघ ने केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को बृहस्पतिवार को एक पत्र भेजकर कहा है कि खाद्य आपूर्ति श्रृंखला […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/demand-to-include-traders-in-proposed-committee-on-farmer-movement/article-20614"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/farmer-protest2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली।</strong> अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ ने किसान आंदोलन पर गठित होने वाली प्रस्तावित समिति में व्यापारियों को भी शामिल करने की मांग की है। परिसंघ ने केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को बृहस्पतिवार को एक पत्र भेजकर कहा है कि खाद्य आपूर्ति श्रृंखला में व्यापारी एक महत्वपूर्ण कड़ी है इसलिए प्रस्तावित समिति में व्यापारियों के प्रतिनिधि संगठन अखिल भारतीय व्यापारी परिसंघ के प्रतिनिधियों को भी शामिल किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">परिसंघ के महासचिव प्रवीण खंडेलवाल ने कहा कि किसान आंदोलन पर समिति गठित करने के उच्चतम न्यायालय के आदेश का व्यापारी परिसंघ स्वागत करता है। उन्होंने कहा कि कृषि कानूनों के संबंध में महत्वपूर्ण पक्षों में से एक होने के नाते परिसंघ को भी गठित होने वाली समिति में एक पक्षकार बनाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन के कारण, आपूर्ति श्रृंखला पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है और देश भर के करोड़ों व्यापारी आंदोलन से प्रभावित हो रहे हैं। इसलिए परिसंघ की समिति में समावेश व्यापारियों के दृष्टिकोण को रखने के लिए उपयुक्त है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 17 Dec 2020 10:35:26 +0530</pubDate>
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                <title>किसान आंदोलन के चलते कुछ ट्रेन निरस्त, कुछ का मार्ग परिवर्तन</title>
                                    <description><![CDATA[गोरखपुर l रेल प्रशासन ने पंजाब में चल रहे किसान आन्दोलन के कारण कुछ गाड़ियों का निरस्त और कुछ का मार्ग परिवर्तन करने का निर्णय लिया है। पूर्वोत्तर रेलवे के प्रवक्ता ने मंगलवार को बताया कि दरभंगा से 11 नवम्बर को चलने वाली 05211 दरभंगा-अमृतसर विशेष गाड़ी और अमृतसर से 13 नवम्बर को चलने वाली 05212 […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/some-trains-canceled-due-to-farmer-movement-some-changed-route/article-19831"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/some-trains-canceled-due-to-farmer-movement-some-changed-route.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>गोरखपुर</strong> l रेल प्रशासन ने पंजाब में चल रहे किसान आन्दोलन के कारण कुछ गाड़ियों का निरस्त और कुछ का मार्ग परिवर्तन करने का निर्णय लिया है। पूर्वोत्तर रेलवे के प्रवक्ता ने मंगलवार को बताया कि दरभंगा से 11 नवम्बर को चलने वाली 05211 दरभंगा-अमृतसर विशेष गाड़ी और अमृतसर से 13 नवम्बर को चलने वाली 05212 अमृतसर-दरभंगा विशेष गाड़ी निरस्त रहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि अमृतसर से 12 नवम्बर को चलने वाली 04674 अमृतसर-जयनगर विशेष गाड़ी अम्बाला से चलाई जायेगी तथा यह गाड़ी अमृतसर-अम्बाला के बीच निरस्त रहेगी । इसके अलावा गोरखपुर- ऐशबाग के बीच इण्टरसिटी एक्सप्रेस विशेष गाड़ी का संचलन 13 नवम्बर से अगले आदेश तक किये जाने का निर्णय लिया है।</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Nov 2020 12:31:39 +0530</pubDate>
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                <title>सियासत चमकाओ अभियान बना किसान आंदोलन</title>
                                    <description><![CDATA[किसान आन्दोलन के नाम पर विपक्ष खासकर कांग्रेस अपनी सियासत चमकाने में लगी है। पंजाब में चूंकि कांग्रेस की सरकार है, ऐसे में राहुल गांधी सोफा लगाकर ट्रैक्टर रैली निकालने से लेकर भाषणबाजी कर रहे हैं। लेकिन किसान आन्दोलन की तपिश पंजाब के अलावा थोड़ी बहुत हरियाणा में दिखी। इसके अलावा देशभर में जैसा कांग्रेस […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/farmers-movement-became-a-political-flash-campaign/article-19179"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/farmers-movement-became-a-political-shine-campaign.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">किसान आन्दोलन के नाम पर विपक्ष खासकर कांग्रेस अपनी सियासत चमकाने में लगी है। पंजाब में चूंकि कांग्रेस की सरकार है, ऐसे में राहुल गांधी सोफा लगाकर ट्रैक्टर रैली निकालने से लेकर भाषणबाजी कर रहे हैं। लेकिन किसान आन्दोलन की तपिश पंजाब के अलावा थोड़ी बहुत हरियाणा में दिखी। इसके अलावा देशभर में जैसा कांग्रेस दावा कर रही है, किसान आन्दोलित नहीं हैं। किसान सरकार और विपक्ष दोनों की मंशा बखूबी समझ रहे हैं। उन्हें ये भी समझ आ रहा है कि नये कृषि कानून उनका कितना भला करेंगे और उनका नुक्सान कहां पर हो रहा है। एक किसान से ज्यादा नफा-नुक्सान कोई सियासी दल या नेता नहीं सोच सकता, ये कटु सत्य है। चूंकि विपक्ष का स्थापित धर्म सरकार का विरोध करना है, ऐसे में कांग्रेस कृषि कानून का विरोध कर रही है। इस विरोध की आड़ में वो अपनी सियासत चमका रही है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">राहुल गांधी ने पंजाब और हरियाणा में कृषि कानून के विरोध में सोफे लगाकर ट्रैक्टर यात्रा का आनंद उठाया। उसे चलाने वाले भी किसान या उनके संगठनों के बजाय कांग्रेस के नेता रहे। कांग्रेस शासित राजस्थान में भी नये कानूनों के विरोध में न किसान संगठित हो सके और न ही कांग्रेस या अन्य पार्टियाँ ही कुछ कर सकीं। छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में कांग्रेस या तो अपने बल पर सत्ता में है या फिर हिस्सेदार है। ये दोनों राज्य भी कृषि प्रधान हैं लेकिन इनमें भी नए कानूनों के विरुद्ध किसान लामबंद हुए हों ऐसा सुनने में नहीं आया। राहुल गांधी ने केन्द्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी पर अपने रटे-रटाए और घिसे पिटे आरोप लगाये। राहुल गांधी की आरोपों में कितनी सच्चाई है ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">लेकिन एक तथ्य जो इस मामले में पूरी तरह साफ हो चुका है कि कृषि सुधार कानूनों का विरोध उत्तर भारत के दो राज्यों में पंजाब और हरियाणा में सिमटकर रह गया है। जहां तक बात न्यूनतम समर्थन मूल्य की है तो इसे वैधानिक रूप देने के बाद भी उसका पूरी तरह पालन हो सकेगा ये कह पाना कठिन है क्योंकि किसान, आढ़तिया और ग्रामीण अंचलों से सम्बन्ध रखने वाले व्यापारियों के बीच के रिश्ते अलग तरीके के होते हैं। इसीलिये राजनेता जब किसी कानून या व्यवस्था का विरोध अथवा समर्थन करते हैं तब उसमें जमीनी सच्चाई की बजाय अपने तात्कालिक राजनीतिक हितों के अलावा और कुछ नहीं होता। नये कृषि सुधार कानून पूरी तरह किसानों के हित में हैं या विरोध में ये पक्के तौर पर कोई नहीं कह पायेगा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">नए कानून किसानों को देश में कहीं भी अपनी उपज बेचने की स्वतंत्रता देते हैं। आप भी सोचिए, क्या आप देश में कहीं भी वेतन कमाने या सामान या सेवाएं बेचने के लिए स्वतंत्रता चाहेंगे या केवल राज्य सरकारों द्वारा निर्दिष्ट स्थानों पर केवल बिचैलियों को कमीशन देने के बाद ही अपना माल बेचना चाहेंगे। किसानों को भी भारत में कहीं भी खरीदने और बेचने के लिए एक आम व्यक्ति की तरह यह आजादी होनी चाहिए। खेती एक आकर्षक व्यवसाय नहीं है। सर्वेक्षण बताते हैं कि 42 फीसदी किसान इससे बाहर निकलना चाहते हैं। 1970-71 और 2015-16 के बीच, खेतों की संख्या दोगुनी होकर 7.1 करोड़ से 14.5 करोड़ हो गई, जबकि औसत खेत का आकार 2.28 हेक्टेयर से 1.08 तक आधा हो गया। कोई भी ऐसे छोटे खेतों से एक अच्छी आय नहीं कमा सकता है। मुख्य समाधान कृषि से बाहर के लोगों को विनिर्माण और सेवाओं में ले जाने में निहित है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">विपक्षी दल दावा करते हैं कि बेचने की स्वतंत्रता का मतलब फसलों की एमएसपी सरकारी झूठ है। सरकार एमएसपी में कुछ (हालांकि सभी नहीं) की खरीद जारी रखेगी। राशन की दुकानों के लिए सरकार को और अनाज कैसे मिलेगा? हम फर्जी खबरों की दुनिया में रह रहे हैं। चूंकि एक हेक्टेयर में अनाज के उत्पादन से अच्छी आमदनी नहीं होगी, इसलिए छोटे किसान पशुपालन, सब्जियों और फलों की ओर रुख कर रहे हैं। इनसे कम भूमि से अधिक आय प्राप्त होती है। लेकिन सब्जियां और फल खराब होते हैं और धीमी गति से चलने वाली सरकारी एजेंसियों द्वारा खरीदे और वितरित नहीं किए जा सकते।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">किसानों के समूहों के लिए कृषि-प्रोसेसर के साथ अनुबंध करने का सबसे अच्छा तरीका है। कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग किसानों के लिए पैमाने की अर्थव्यवस्थाएं बनाएगी और न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित करेगी। सरकार कह रही है कि हम मंडियों में सुधार के लिए यह कानून लेकर आ रहे हैं। लेकिन, सच तो यह है कि कानून में कहीं भी मंडियों की समस्याओं के सुधार का जिक्र तक नहीं है। यह तर्क और तथ्य बिल्कुल सही है कि मंडी में पांच आढ़ती मिलकर किसान की फसल तय करते थे। किसानों को परेशानी होती थी। सरकार को किसानों की जायज मांगों पर जरूर ध्यान देना चाहिए। आखिरकार मोदी सरकार किसान और गरीब हितेषी सरकार मानी जाती है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा कर चुकी है। यह देश के 14 करोड़ कृषि परिवारों का सवाल है। शांता कुमार समिति कहती है कि महज 6 फीसदी किसान ही एमएसपी का लाभ उठा पाते हैं। बाकी 94 फीसदी बाजार और बिचैलियों पर ही निर्भर रहते हैं। अन्य क्षेत्रों की तुलना में कृषि क्षेत्र आय असमानता को सबसे अधिक देख रहा है। इसलिए किसानों को एमएसपी का कानूनी अधिकार दिए जाने की जरूरत है। कोई उनकी फसल उससे नीचे दाम पर न खरीदे। अगर कोई खरीदता है तो उस पर कानूनी कार्रवाई हो।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">राहुल गांधी आज भले ही किसान आंदोलन के नाम पर अपनी सियासत चमकाने में लगे हैं। वो मोदी सरकार को बदनाम करने का कोई मौका चूकना नहीं चाहते हैं। ऐसे में वो बीच-बीच में अपनी सुविधा के अनुसार राजनीति चमकाने के लिये कुछ न कुछ करते रहते हैं। फिलहाल वो किसानों की आड़ में ट्रैक्टर यात्राओं का आनंद ले रहे हैं। वहीं इसमें भी कोई दो राय नहीं है कि कृषि सुधार कानूनों के समर्थन में भाजपा के नेता और कार्यकर्ता भी महज दिखावा कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं को आह्वान किया था कि वो किसानों के बीच जाकर बैठे। उनसे बातचीत करके उनकी शंकाओं का समाधान करें। असल में भाजपा नेताओं ने प्रधानमंत्री की बात पर कितना अमल किया है ये भाजपा के बड़े नेता स्वयं अच्छी तरह से जानते होंगे। किसानों की समस्या यही है कि वे राजनीति के मोहरे बनकर रह गये हैं और उनकी असली समस्याओं के प्रति न सत्ता पक्ष में अपेक्षित संवेदनशीलता है और न ही विपक्ष में। रही बात समाचार माध्यमों की तो उनके लिए तो केवल टीआरपी और सुर्खियां ही महत्वपूर्ण हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">केंद्र सरकार के समर्थक वर्ग को नये कानूनों में सब कुछ अच्छा नजर आ रहा है वहीं विरोधियों को वह किसानों को बर्बाद करने वाला लग रहा है। पंजाब और हरियाणा में किसान आन्दोलन के पीछे मंडी माफिया और आढ़तियों की ताकत खुलकर सामने आ चुकी है। ये सोचने वाली बात है कि नए कानून जब पूरे देश में लागू होने हैं तब केवल दो या कुछ राज्यों में ही उसके विरोध में किसान समुदाय आंदोलित क्यों है? राजनीतिक दलों और सरकार को किसानों की असल आवाज सुननी और समझनी चाहिए। वहीं किसानों की स्थिति सुधारने के सार्थक प्रयास सभी राजनीतिक दलों को करने चाहिएं। अगर धरतीपुत्रों को सियासत को मोहरा बनाने से किसी का भला नहीं होगा। और देश एक घोर संकट का शिकार हो जाएगा।</h6>
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                <pubDate>Mon, 12 Oct 2020 21:02:48 +0530</pubDate>
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