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                <title>Agriculture Law - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>तीनों कृषि कानून रद्द करने के प्रस्ताव को मोदी कैबिनेट की मंजूरी</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। तीनों नए कृषि कानूनों की वापसी के प्रस्ताव को बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच दिन पहले (19 नवंबर) गुरु पर्व के दिन इन तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी। कैबिनेट की मंजूरी के बाद कानून वापसी के प्रस्ताव को संसद […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/modi-cabinet-approves-proposal-to-repeal-all-three-agriculture-law/article-28600"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/pm-narendera-modi2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> तीनों नए कृषि कानूनों की वापसी के प्रस्ताव को बुधवार को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पांच दिन पहले (19 नवंबर) गुरु पर्व के दिन इन तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा की थी। कैबिनेट की मंजूरी के बाद कानून वापसी के प्रस्ताव को संसद के शीतकालीन सत्र में दोनों सदनों में पारित करवाया जाएगा। इसके बाद किसान आंदोलन की वजह बने तीनों कृषि कानून खत्म हो जाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को देश के नाम अपने संबोधन में तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा करते हुए कहा था कि सरकार ये कानून किसानों के हित में नेक नीयत से लाई थी, लेकिन हम कुछ किसानों को समझाने में नाकाम रहे। प्रधानमंत्री ने कहा कि अगले संसद सत्र में कानूनों को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। वहीं, विशेषज्ञों के मुताबिक संसद सत्र शुरू होने के बाद 3 से 5 दिन में ये प्रक्रिया पूरी हो सकती है। संसद सत्र 29 नवंबर से शुरू होना है।</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Nov 2021 13:27:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बिल वापसी कृषि समस्याओं का हल नहीं</title>
                                    <description><![CDATA[तीन कृषि बिल जिन्हें लेकर किसान पिछले एक साल से विरोध कर रहे थे, उन पर आखिर केंद्र सरकार झुक गई और किसान बिलों को वापिस लेने की घोषणा स्वंय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कर दी है। किसान बिल वापिसी से यहां किसानों में राहत एवं खुशी की लहर दौड़ी है वहीं विपक्षी दलों को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/bill-withdrawn-not-a-solution-to-agricultural-problems/article-28517"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/governments-dwarfed-in-agriculture-and-farmer-welfare.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">तीन कृषि बिल जिन्हें लेकर किसान पिछले एक साल से विरोध कर रहे थे, उन पर आखिर केंद्र सरकार झुक गई और किसान बिलों को वापिस लेने की घोषणा स्वंय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कर दी है। किसान बिल वापिसी से यहां किसानों में राहत एवं खुशी की लहर दौड़ी है वहीं विपक्षी दलों को इस कदम से राजनीति के और ज्यादा पेचिदा हो जाने का एहसास हो गया है। 2022 की शुरूआत में ही पांच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं जिनमें पंजाब एवं उत्तर प्रदेश का चुनाव बेहद चर्चा का विषय बन चुका है। दोनों ही प्रदेश कृषि प्रधान हैं और भाजपा को यहां आगामी चुनावों में उतरने के लिए जमीनी स्तर पर बहुत ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। किसान बिल वापिस लेकर केन्द्र सरकार चला रही भाजपा ने अपने लिए चुनावी राहें आसान करने का एक प्रयास किया है। राजनीति से इतर केन्द्र द्वारा पारित तीनों कृषि बिलों एवं इससे उपजे देशव्यापी किसान आंदोलन ने कई सवाल खड़े कर दिए, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण यह कि अगर ये बिल वापिस ही लिए जाने थे तब इन्हें जल्दबाजी में पारित ही क्यों किया गया?</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने कृषि बिलों को तैयार करने से पहले किसानों व कृषि विशेषज्ञों की राय क्यों नहीं ली? अगर किसान या कृषि विशेषज्ञों की राय ली भी थी तब उसे माना क्यों नहीं? अब अगर एक साल बाद सरकार किसानों की बात मान गई तब 700 से अधिक किसानों की जान लेने व एक साल तक पूरे किसान वर्ग को सड़कों पर बैठाकर आखिर सरकार ने हासिल क्या किया? किसान बिलों में सरकार की सोच व किसानों की सोच में अगर अंतर की बात भुला भी दें तब भी देश के सामने एक बहुत बड़ा सवाल है कि कृषि क्षेत्र को सुधारों की बेहद दरकार है और कृषि को मरणासन्न हालत में और ज्यादा देर तक नहीं रखा जा सकता। अत: वो नवीन परिवर्तन कौन से हों जिससे कृषि, कृषक व अर्थव्यवस्था तीनों का कायाकल्प हो सके, उस पर सरकार राजनीति दलों किसी में भी कोई चिंता या तीव्रता नजर नहीं आ रही। हाल के वापिस लिए तीनों कृषि बिल सरकार का एक प्रयास था कि कृषि को कॉरपोरेट के हवाले कर दिया जाए और सरकार इस क्षेत्र से स्वंय भी बाहर हो ले और किसानों को भी खींच बाहर कर दे जिसमें कि सरकार विफल ही नहीं बुरी तरह से विफल हो चुकी है। कॉरपोरेट जगत का यहां भी कुछ नहीं बिगड़ा, पूरे एक साल तक सरकार व किसान ही उलझे रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">परन्तु यहां किसानों की एक चिंता शायद पूरे देश के समझ आ चुकी है कि खाने-पीने की श्रृंखला में कॉरपोरेट की घुसपैठ बेहद खतरनाक है क्योंकि कॉरपोरेट को सामाजिक सरोकारों से कुछ भी लेना-देना नहीं है वह सिर्फ अपने मुनाफे से मतलब रखता है। कृषि किसी भी देश का ऐसा क्षेत्र है जिसके आर्थिक से सामाजिक सरोकार ज्यादा हैं। जिस तरह की भारत की आबादी है ऐसे में कृषि को सामाजिक व्यवस्था में ही नवीकृत किया जाए तब यह पूरे देश के हित में है। कृषि को सामाजिक व्यवस्था से निकालकर विशुद्ध रूप से कॉरपोरेट के हवाले करना न केवल किसानों को बेमौत मारना है बल्कि देश की संवैधानिक संस्थाओं खासकर संसद व विधान सभाओं को पूरी तरह से दांव पर लगाना है। देर से ही सही भाजपा ने किसान बिलों को वापिस लेकर न केवल लोकतंत्र बचा लिया है, बल्कि अपना आप भी बचा लिया है, भले ही भाजपा आज एकआध बार कोई चुनाव हार भी क्यों न जाए।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 21 Nov 2021 09:45:34 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>कानून वापसी से भी खत्म नहीं हुई कृषि समस्याएं</title>
                                    <description><![CDATA[करीब एक वर्ष बाद आखिर केंद्र सरकार ने विवादित तीन कृषि कानून वापिस ले लिए हैं। किसानों के विरोध और बढ़ रहे टकराव के मद्देनजर वापिसी के निर्णय को लेकर केंद्र सरकार ने सही कदम उठाया है। इस घटनाक्रम को बेशक किसान संगठन अपनी जीत बता रहे हैं लेकिन इससे कृषि मुद्दे पर चर्चा का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/agricultural-problems-did-not-end-even-with-the-withdrawal-of-the-law/article-28493"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/farmer1.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">करीब एक वर्ष बाद आखिर केंद्र सरकार ने विवादित तीन कृषि कानून वापिस ले लिए हैं। किसानों के विरोध और बढ़ रहे टकराव के मद्देनजर वापिसी के निर्णय को लेकर केंद्र सरकार ने सही कदम उठाया है। इस घटनाक्रम को बेशक किसान संगठन अपनी जीत बता रहे हैं लेकिन इससे कृषि मुद्दे पर चर्चा का अंत नहीं बल्कि शुरूआत होनी चाहिए। अगला सवाल यह भी है कि क्या कानून वापिसी के बावजूद वर्तमान और भविष्य की चुनौतियों का सामना कृषि सैक्टर कर सकेगा? चुनौतियों का सामना करने के लिए सरकार और किसानों दोनों को किस प्रकार की नीतियां और तैयारियों के साथ काम करना होगा, इसको लेकर भी विचार करने की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक कानूनों की वापिसी को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपना तर्क रखा है कि वह (सरकार) किसानों को कानूनों के फायदों के बारे में समझा नहीं सके। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार शोध के लिए भी तैयार थी, यहां प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री गुरचरण दास की टिप्पणी बहुत सार्थक सिद्ध होती नजर आ रही है। वह कहते थे कि मोदी सरकार कानूनों को बेच नहीं सकी, अर्थात इन कानूनों का प्रचार नहीं किया जा सका फिर भी इस बात की तसल्ली है कि किसानों और सरकार ने अधिक से अधिक शांतमयी तरीके से चलने की कोशिश की। आंदोलन हिंसक नहीं हुआ। यहां केंद्र व राज्य के अधिकारों का कानूनी पहलू भी चर्चा करने वाला है। वापिस हुए कानूनों को लेकर गैर-भाजपा की सरकारों वाले राज्यों और किसान संगठनों का तर्क था कि कृषि राज्यों का विषय है।</p>
<p style="text-align:justify;">केंद्र सरकार कानून बना ही नहीं सकती, भविष्य में इस तकनीकी उलझन को दूर करने का प्रयास होना चाहिए। दरअसल कानून लोकमत का अधिकार माना जाता है। यहां कानून निर्माण संंबंधी भी एक नई चर्चा छिड़ सकती है कि किसी भी कानून के निर्माण के वक्त लोक भावना को कैसे मद्देनजर रखा जाए। हमारे देश में स्विट्जरलैंड की तरह सीधी लोकतंत्र प्रणाली नहीं बल्कि लोगों के चुने हुए नुमाइंदे कानून बनाते हैं। जब लोग किसी कानून के खिलाफ हो जाएं तब उस कानून की सार्थकता क्या रह जाएगी, लोकतंत्र में इस स्थिति को भी सोचना होगा। इस मामले में विधान पालिका विशेष तौर पर सरकारी पक्ष को कानून के निर्माण के समय इसके सामाजिक, आर्थिक, एतिहासिक और सांस्कृतिक पहलुओं के प्रति सजग रहना होगा। अधिकतर कानूनी मामलों को राजनीतिक नजरिए से ही देखा जाता है। कानून की मूल भावना का उद्देश्य लोकहित ही हो, अध्यादेश हंगामेदार परिस्थितियों की आवश्यकता होता है। अध्यादेश सहायक है, कानून नहीं।</p>
<p> </p>
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                <pubDate>Sat, 20 Nov 2021 10:02:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मॉनसून सत्र:  आईटी मंत्री जवाब के लिए उठे तो टीएमसी सांसदों ने फाड़े पन्ने</title>
                                    <description><![CDATA[लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही फिर स्थगित नई दिल्ली (एजेंसी)।कृषि कानूनों, कथित जासूसी के आरोपों तथा कुछ अन्य मुद्दों पर संसद के दोनों सदनों में गुरुवार को लगातार तीसरे दिन विपक्ष ने हंगामा किया जिसके कारण लोकसभा में तीन बार के स्थगन के बाद और राज्य सभा में दो बार के स्थगन के बाद कार्यवाही […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/monsoon-session-congress-mp-manickam-tagore-gives-adjournment-motion-on-agriculture-law-in-lok-sabha/article-25390"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-07/parliament3.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;"><strong>लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही फिर स्थगित</strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong>कृषि कानूनों, कथित जासूसी के आरोपों तथा कुछ अन्य मुद्दों पर संसद के दोनों सदनों में गुरुवार को लगातार तीसरे दिन विपक्ष ने हंगामा किया जिसके कारण लोकसभा में तीन बार के स्थगन के बाद और राज्य सभा में दो बार के स्थगन के बाद कार्यवाही दिनभर के लिए स्थगित करनी पड़ी। संसद का मानसून सत्र 19 जुलाई से शुरू हुआ था, लेकिन एक दिन भी सदन सुचारु रूप से नहीं चला है।</p>
<p style="text-align:justify;">गुरुवार को कार्यवाही का तीसरा दिन था। कृषि कानूनों, इजरायली सॉफ्टवेयर पेगासस की मदद से विपक्षी नेताओं और अन्य लोगों की कथित जासूसी तथा महंगाई जैसे मुद्दों को लेकर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, वामदल, शिवसेना, शिरोमणि अकाली दल समेत कई विपक्षी दलों के सदस्य दोनों सदनों में हमलावर बने हुये हैं। हंगामे के कारण कारण लोकसभा में आज प्रश्नकाल की कार्यवाही 20 मिनट तक ही चल सकी जबकि दोपहर बाद जरूरी कागजात सदन में रखवाने के बाद शोर-शराबे के बीच दो विधेयक सदन में पेश किये। इसके अलावा कोई और कामकाज नहीं हो सका। रक्षा राज्य मंत्री अजय भट्ट ने आवश्यक रक्षा सेवा विधेयक, 2021 तथा केन्द्रीय पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्री सर्वानंद सोनावाल ने अंतरदेशीय जलयान विधेयक, 2021 पेश किया।<br />
राज्य सभा में सूचना एवं प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हंगामे के बीच ही पेगासस जासूसी मामले पर वक्तव्य दिया, लेकिन इसके अलावा कोई विधायी कामकाज नहीं हुआ। दिनभर के लिए स्थगित करने से पहले लोकसभा की कार्यवाही तीन बार और राज्य सभा की कार्यवाही दो बार स्थगित की गई थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">लोकसभा में कांग्रेस सांसद मणिकम टैगोर ने कृषि कानून पर दिया स्थगन प्रस्ताव</h3>
<p style="text-align:justify;">पेगासस जासूसी केस में संसद का मॉनसून सत्र पहले दो दिन हंगामें की भेंट चढ़ गया था। राज्यसभा में कुछ देर तक ही कोरोना पर चर्चा हो पाई थी। लेकिन विपक्ष के हंगामे के कारण सदन स्थगित हो गया था। आज फिर से संसद की कार्रवाई शुरू हो गई है। विपक्ष आज भी महंगाई, पेगासस और कोरोना समेत कई अन्य मुद्दों पर सरकार को घेर सकता है। वहीं आज सदन के बाद जंतर-मंतर पर किसानों की संसद चलेगी। इस बीच कांग्रेस के सांसद बी.मनिकम टैगोर ने कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के लंबे आंदोलन के बारे में चर्चा के मुद्दे पर लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव नोटिस दिया है और सरकार को इस कानून को वापस लेने के लिए कहा है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">मनीष तिवारी ने भी दिया स्थगन प्रस्ताव</h4>
<p style="text-align:justify;">किसान आंदोलन के मुद्दे पर कांग्रेस सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा और प्रताप सिंह बाजवा ने नियम 267 के तहत निलंबन का नोटिस दिया है। वहीं कांग्रेस के लोकसभा सांसद मनीष तिवारी ने पेगासस मुद्दे पर सदन में स्थगन प्रस्ताव नोटिस दिया है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">सीपीआई सांसद ने राज्यसभा में दिया विशेषाधिकार प्राप्त प्रस्ताव नोटिस</h4>
<p style="text-align:justify;">सीपीआई के राज्यसभा सांसद बिनॉय विश्वम ने राज्यसभा में राज्य मंत्री भारती प्रवीण पवार के जवाब के खिलाफ विशेषाधिकार प्राप्त प्रस्ताव नोटिस दिया है।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 22 Jul 2021 17:47:48 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>किसानों ने कृषि सुधार कानूनों की प्रतियां जलायी</title>
                                    <description><![CDATA[नयी दिल्ली l कृृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठनों ने बुधवार को पूरे देश में इन कानूनों की प्रतियां जलायीं। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी ) की यहां जारी विज्ञप्ति के अनुसार आन्दोलन के 49 वें दिन किसानों ने अलग-अलग राज्यों में इन तीनों कानूनों की प्रतियां जलायीं और उन्हें […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/farmers-burn-copies-of-agricultural-reform-laws/article-21065"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-01/farmers-burn-copies-of-agricultural-reform-laws.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली</strong> l कृृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रहे किसान संगठनों ने बुधवार को पूरे देश में इन कानूनों की प्रतियां जलायीं। अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति (एआईकेएससीसी ) की यहां जारी विज्ञप्ति के अनुसार आन्दोलन के 49 वें दिन किसानों ने अलग-अलग राज्यों में इन तीनों कानूनों की प्रतियां जलायीं और उन्हें रद्द करने पर जोर दिया। इस अवसर पर दिल्ली के पास के सभी जिलों से गणतंत्र दिवस किसान ट्रैक्टर परेड की तैयारी करने का आह्नान किया।</p>
<p style="text-align:justify;">समिति ने कहा कि आज देश भर में 20 हजार से ज्यादा स्थानों पर कानून की प्रतियां जलाई गईं। एआईकेएससीसी ने दिल्ली के आसपास 300 किमी के सभी जिलों में किसानों से अपील की है कि वे दिल्ली में गणतंत्र दिवस ट्रैक्टर परेड की तैयारी में जुटें और सीमाओं पर एकत्र हों। देश में 18 जनवरी को सभी जिलों में महिला किसान दिवस मनाया जाएगा, बंगाल में 20 से 22 जनवरी, महाराष्ट्र में 24 से 26 जनवरी, केरल, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश में 23 से 25 जनवरी और ओडिशा में 23 जनवरी को महा महिम के कार्यालय के समक्ष महापड़ाव आयोजित किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">एआईकेएससीसी ने कहा है कि सरकार ने पिछले 50 दिनों से लगातार देश की जनता और किसान नेताओं के सामने इस बात की कोई सच्चाई पेश नहीं की है कि ये कानून कैसे किसानों को लाभ पहुचाएंगे। उसका ये तर्क कि तकनीकी विकास होगा, पूंजी का निवेश होगा और कुल मिलाकर विकास बढ़ेगा। सरकार ने निजी निवेशकों को मदद देने के लिए एक लाख करोड़ रुपये आवंटित किये हैं, पर तकनीकी विकास, पूंजीगत निवेश और अन्य जरूरी मुद्दों पर धन नहीं लगाना चाहती। कारपोरेट जब यह निवेश करेगा तो उसका लक्ष्य ऊंचा मुनाफा कमाना और भूमि एवं जल स्रोतों पर कब्जा करना होगा।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 Jan 2021 19:19:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>प्राथमिकता से सुलझे पंजाब का मामला</title>
                                    <description><![CDATA[तीन कृषि बिलों को लेकर केंद्र सरकार व पंजाब के बीच लगातार टकराव बढ़ रहा है। राष्ट्रपति से मिलने का समय नहीं मिलने पर पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह ने विधायकों सहित जंतर-मंतर पर धरना दिया। यदि संवैधानिक दृष्टिकोण से देखें तो किसी मुख्यमंत्री का केंद्र सरकार के खिलाफ धरने पर बैठना एक गंभीर मामला […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/the-matter-of-punjab-settled-on-priority/article-19712"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/the-matter-of-punjab-settled-on-priority.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">तीन कृषि बिलों को लेकर केंद्र सरकार व पंजाब के बीच लगातार टकराव बढ़ रहा है। राष्ट्रपति से मिलने का समय नहीं मिलने पर पंजाब के मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह ने विधायकों सहित जंतर-मंतर पर धरना दिया। यदि संवैधानिक दृष्टिकोण से देखें तो किसी मुख्यमंत्री का केंद्र सरकार के खिलाफ धरने पर बैठना एक गंभीर मामला है। राष्ट्रपति द्वारा पंजाब के मुख्यमंत्री को मिलने का समय नहीं देना भी हैरानीजनक है। बातचीत व तालमेल संघीय ढांचें का आधार हैं। संघीय प्रणाली के अंतर्गत राज्य व केंद्र सरकार के बीच तालमेल जरूरी है। कोयले के संकट के कारण पंजाब में ब्लैक आउट होने की नौबत बन गई है, ऐसे में इस समस्या का का समाधान टकराव की बजाय सदभावना से होना चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का बड़ा महत्व है। पंजाब सरकार को न तो राष्ट्रपति से समय मिला और न ही राज्य के सांसदों को केंद्रीय मंत्री मिले। यह सब लोकतंत्र व संसदीय प्रणाली के अनुकूल नहीं हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">नि:संदेह भले ही राष्ट्रपति पंजाब के बिलों से सहमत नहीं हैं, लेकिन यहां मामला केवल बिलों का नहीं बल्कि मालगाड़ियों का भी है जिस कारण पंजाब में कोयले का संकट, कच्चा माल नहीं मिलने से इंडस्ट्री को भारी नुक्सान, यात्रियों को समस्या, आगामी फसल के लिए यूरिया व खाद की कमी भी पैदा हो गई है। यहां राजनीतिक मामलों में आम आदमी पार्टी व शिरोमणी अकाली दल का अपना-अपना स्टैंड है लेकिन जहां तक पंजाब की जनता का संबंध है, इस मामले पर अब राजनीति बंद होनी चाहिए। शिरोमणी अकाली दल व आम आदमी पार्टी पंजाब सरकार के राष्ट्रपति को मिलने के फैसले को गलत करार दे रही है और वे प्रधानमंत्री को मिलने का तर्क दे रहे हैं लेकिन सवाल यह भी बनता है कि यदि कांग्रेस के विधायक प्रधानमंत्री को नहीं मिलने जाते, तो फिर आप और शिअद नेता खुद प्रधानमंत्री से क्यों नहीं मुलाकात कर रहीं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">शिअद, भाजपा और आम आदमी पार्टी तीनों ही पार्टियां पंजाब सरकार के बिलों के साथ सहमत नहीं लेकिन उक्त पार्टियां मालगाड़ियों व थर्मल प्लांट के मामलों में केंद्र तक अपनी आवाज उठा सकती हैं, क्योंकि बतौर सांसद व विधायक इन पार्टियों के नेताओं की भी यह जिम्मेवारी बनती है। राजनीतिक नजर से मामला त्रिकोणीय बना हुआ है लेकिन कांग्रेस को कोसने वाली पार्टियां भी अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाय केवल बयानबाजी तक सीमित हैं। केंद्र सरकार को सकारात्मक नजरिया अपनाकर समस्या का समाधान निकालना चाहिए।</h6>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 04 Nov 2020 20:26:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पंजाब में विपक्ष का विरोध हैरानीजनक</title>
                                    <description><![CDATA[देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि किसी बिल पर विपक्षी दल द्वारा सरकार को समर्थन देने के कुछ घंटों बाद उसे गलत करार देकर कोसना शुरू कर दिया हो। पंजाब में इन दिनों कृषि कानूनों व किसान आंदोलन को लेकर खूब नाटक हो रहा है। गत दिवस पंजाब विधानसभा में पंजाब की […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/opposition-protest-in-punjab-is-surprising/article-19393"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/opposition-protest-in-punjab-is-surprising.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि किसी बिल पर विपक्षी दल द्वारा सरकार को समर्थन देने के कुछ घंटों बाद उसे गलत करार देकर कोसना शुरू कर दिया हो। पंजाब में इन दिनों कृषि कानूनों व किसान आंदोलन को लेकर खूब नाटक हो रहा है। गत दिवस पंजाब विधानसभा में पंजाब की कांग्रेस सरकार ने केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को रद्द कर नए बिल पेश किए थे, जिसे विपक्ष में बैठी आम आदमी पार्टी व शिरोमणी अकाली दल ने सर्वसम्मति से पास किया था। बिलों की मंजूरी देने के लिए दोनों पार्टियों के विधायक दल के नेता मुख्यमंत्री अमरेन्द्र सिंह के साथ राज्यपाल वीपी बदनौर से मिले, किंतु देर शाम विपक्षी दल आम आदमी पार्टी का बयान आया कि पंजाब सरकार लोगों को मूर्ख बना रही है, दूसरे दिन यही कुछ अकाली दल ने कर दिया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">यहां बड़ा सवाल यह है कि विपक्षी दलों की विचारधारा का प्रस्ताव कमजोर है या राजनीतिक पैंतरेबाजी हो रही है या फिर ये पार्टियां राजनीतिक व संसदीय तौर-तरीकों में गलती कर रही हैं। पहले विधानसभा व फिर बाहर आकर ‘आप’ व ‘अकाली दल’ द्वारा बिलों पर सहमति देना सही था, लेकिन कुछ घंटों बाद ही उसे गलत करार दे देना किसानों के समर्थन में नहीं है। यह विरोध बेहद चिंताजनक व हैरानीजनक है, जो नेताओं की काबलियत पर सवाल खड़े करता है। सदन की मर्यादा के मुताबिक विपक्ष के विधायक स्पीकर को विनती कर या विरोध कर या वॉकआउट कर किसी भी प्रकार से किसान विरोधी बिल को पास करने में अपनी असहमति जता सकते थे। अकाली दल ने ये गलती चंद दिनों में दूसरी बार की है। केंद्रीय कृषि अध्यादेश जारी होने के बाद शिरोमणी अकाली दल कई सप्ताह तक यही प्रचार करता रहा कि यह किसानों के समर्थन में हैं, फिर जब किसानों ने विरोधी सुर अपनाना शुरू किया तब महीने भर बाद अकाली दल भी अध्यादेशों के खिलाफ आवाज उठाने लगा।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">अकाली दल ने अपने किसान हितैषी होने का प्रमाण देने के लिए केंद्र में मंत्री की कुर्सी भी छोड़ दी और पंजाब भाजपा से नाता भी तोड़ लिया। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या दोनों विरोधी पार्टियां कांग्रेस सरकार को बिलों का श्रेय मिलने से यू-टर्न ले रही हैं या बिलों में तकनीकी कमियां व विधायी प्रणाली में इन्हें पास करने में कहीं भूल हैं। इनमें से किसी भी एक बिंदू पर विपक्ष की सहमति दोनों पार्टियों के लिए मुश्किल पैदा करती है लेकिन कृषि जैसे गंभीर मुद्दे पर ऐसे भ्रम राजनीतिक पार्टियों के लिए महंगे पड़ सकते हैं, विशेष रूप से उन परिस्थितियों में जब किसानों ने मान लिया कि बिल उनके हक में हैं।</h6>
<p> </p>
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                <pubDate>Wed, 21 Oct 2020 21:11:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पंजाब विधान सभा में सभी पार्टियां ने एकजुटता से पास किए तीनों बिल</title>
                                    <description><![CDATA[राज्यपाल के साथ की मुलाकात, राष्ट्रपति से मांगा समय  देश के इतिहास में पहली बार केंद्रीय कानूनों को रद्द कर बनाए जा रहे हैं तीन कानून सरकार ने राज्यपाल को बिल पास करने की विनती की, 2 से 5 नवंबर के बीच राष्ट्रपति से करेंगे मुलाकात सच कहूँ/अश्वनी चावला चंडीगढ़। पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/all-the-parties-passed-all-the-three-bills-in-solidarity-in-the-punjab-legislative-assembly/article-19364"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/all-the-parties-passed-all-the-three-bills-in-solidarity-in-the-punjab-legislative-assembly.gif" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;"><strong>राज्यपाल के साथ की मुलाकात, राष्ट्रपति से मांगा समय </strong></h4>
<ul>
<li style="text-align:justify;">
<h5>देश के इतिहास में पहली बार केंद्रीय कानूनों को रद्द कर बनाए जा रहे हैं तीन कानून</h5>
</li>
<li style="text-align:justify;">
<h5>सरकार ने राज्यपाल को बिल पास करने की विनती की, 2 से 5 नवंबर के बीच राष्ट्रपति से करेंगे मुलाकात</h5>
</li>
</ul>
<h6 style="text-align:justify;"><strong>सच कहूँ/अश्वनी चावला चंडीगढ़</strong>। पंजाब विधानसभा के विशेष सत्र के दूसरे दिन की कार्यवाही शुरू में केंद्र सरकार के तीन नए कृषि कानूनों को पंजाब में निष्प्रभावी करने के लिए तीन बिल पेश किए गए, जिसे विधानसभा ने सर्वसम्मति से पास कर दिया। प्रस्ताव व बिलों के पास होने के बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़, नेता प्रतिपक्ष व आप विधायक हरपाल सिंह चीमा व अकाली विधायक शरणजीत सिंह ढिल्लों के साथ राज्यपाल वीपी बदनौर से मिले और उन्हें कृषि कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव व विधानसभा द्वारा पास बिलों को सौंपा। उन्होंने राज्यपाल से बिलों को पास करने की भी मांग रखी। उन्होंने राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द से भी मिलने के लिए समय मांगा है। 2 नवंबर से 5 नवंबर के बीच पंजाब का शिष्टमंडल राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द को बिलों को पास करने की गुहार लगाएगा। पंजाब के इतिहास में यह पहली बार हो रहा है कि चार बिल को सर्वसमिति से विधानसभा में पास किया गया हो। इनमें तीन बिल कृषि कानून और एक बिजली कानून से सबंधित है। यह चौथा बिल भी किसानों से जुड़ा हुआ है। प्रदेश सरकार ने एक प्रस्ताव पारित करते हुए केंद्र सरकार के कृषि कानूनों व प्रस्तावित बिजली संशोधन बिल को रद्द कर दिया है।</h6>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>पहला बिल:</strong></h4>
<h6 style="text-align:justify;">किसानों के (सशक्तिकरण और सुरक्षा) कीमत के भरोसे संबंधी करार और कृषि सेवाओं (विशेष उपबंध और पंजाब संशोधन) बिल, 2020 में न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर उपज बेचने/खरीदने पर सजा का उपबंध किया गया है। चार बिलों में से एक बिल के तहत एम.एस.पी से कम कीमत पर उपज की बिक्री/खरीद नहीं की जा सकेगी और इसका उल्लंघन करने पर उपरोक्त सजा और जुमार्ना भुगतना पड़ेगा। यह बिल केंद्र सरकार के किसानों के (सशक्तिकरण और सुरक्षा) कीमत के भरोसे संबंधी करार और कृषि सेवाएं एक्ट, 2020 की धारा 1(2), 19 और 20 में संशोधन करने की माँग करता है। इसमें नयी धाराओं 4, 6 से 11 को शामिल करने का प्रस्ताव भी दिया गया है।</h6>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>दूसरा बिल:</strong></h4>
<h6 style="text-align:justify;">किसान फसल, व्यापार और वाणिज्य (प्रोत्साहित करने और आसान बनाने) (विशेष व्यवस्थाएं और पंजाब संशोधन) बिल, 2020 के अंतर्गत किसान फसल, व्यापार और वाणिज्य (प्रोत्साहित करने और आसान बनाने) एक्ट, 2020 की धारा 1(2), 14 और 15 में संशोधन करने की माँग की गई है, जिससे राज्य में गेहूँ या धान की फसल की बिक्री या खरीद एम.एस.पी. से कम कीमत न होने को यकीनी बनाया जा सके। संशोधित बिल में नयी धारा 6 से 11 शामिल करके किसानों को तंग-परेशान करने या किसानों को कम कीमत की अदायगी करने पर सजा देने की भी माँग की गई है। इन दोनों बिलों का उद्देश्य ए.पी.एम.सी. कानूनों के स्थापित ढांचे के द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य की विधि समेत अलग-अलग सुरक्षा बहाल कर केंद्रीय एक्ट के लागू होने से पंजाब के किसानों द्वारा नुकसान के जाहिर की गई आशंकाओं को रोकना है, जिससे किसानों और कृषि मजदूरों के साथ-साथ कृषि धंधो के साथ जुड़ी गतिविधियों में शामिल अन्शें की रोजी -रोटी और हितों की रक्षा की जा सके।</h6>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>तीसरा बिल:</strong></h4>
<h6 style="text-align:justify;">उपभोक्ताओं को कृषि उपज की जमाखोरी और काला-बाजारी से बचाने के लिए और किसानों और कृषि मजदूरों के साथ-साथ कृषि धंधो के साथ जुड़ी गतिविधियों में शामिल अन्यों की रोजी-रोटी और हितों की रक्षा के लिए राज्य सरकार द्वारा जरूरी वस्तुएँ ( विशेष व्यवस्थाएं और पंजाब संशोधन) बिल, 2020 पेश किया गया है। यह बिल, जरूरी वस्तुएं एक्ट, 1955 की धारा 1(2) और 3(1ए) में संशोधन कर केंद्र के जरूरी वस्तुएँ (संशोधन) एक्ट, 2020 में संशोधन करने की माँग करता है। यह बिल जरूरी वस्तुएँ (संशोधन) एक्ट, 2020 नामी केंद्रीय एक्ट के लागू करने सम्बन्धी 04 जून, 2020 को पहले जैसी स्थिति बहाल करने को यकीनी बनाने की माँग करता है।</h6>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>चौथा बिल:</strong></h4>
<h6 style="text-align:justify;">किसानों को 2.5 एकड़ से कम जमीन की कुर्की से राहत प्रदान करता है। कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर (पंजाब संशोधन) बिल, 2020, कोड ऑफ़ सिवल प्रोसीजर 1908 की धारा 60 में 2.5 एकड़ से कम की कृषि वाली जमीन को छूट देने की व्यवस्था शामिल करने की माँग करता है। कोड ऑफ़ सिविल प्रोसीजर 1908 की धारा में विभिन्न चल और अचल जायदादों की कुर्की/फरमान की व्यवस्था है। इस नई संशोधन के अंतर्गत पशु, यंत्र, पशूओं के बाड़े आदि किस्मों की जायदादें कुर्की से मुक्त होंगी,अभी तक कृषि वाली जमीन की कुर्की की जा सकती है।</h6>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>विधान सभा में शामिल नहीं हुए दोनों भाजपा विधायक</strong></h4>
<h6 style="text-align:justify;">पंजाब विधान सभा के इस विशेष सत्र में दोनों भाजपा विधायक शामिल नहीं हुए। पिछले दो दिनों से चल रहे विशेष सत्र में अबोहर से अरूण नारंग और सुजानपुर से विधायक दिनेश बब्बू दिखाई ही नहीं दिए। जिस पर व्यंग्य कसते हुए अमरिन्दर सिंह ने कहा कि यह भाजपा के विधायक यहां क्या करने के लिए आते, उन्हें पता था कि केंद्र के कानूनों के खिलाफ यह सारा कुछ चल रहा है, जिस कारण ही यह सत्र में भाग लेने के लिए ही नहीं आए।</h6>
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                <pubDate>Tue, 20 Oct 2020 18:48:15 +0530</pubDate>
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