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                <title>Climate Change - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Climate Change: जलवायु परिवर्तन और बढ़ता बच्चों का जीवन संकट</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की रिपोर्ट ‘लर्निंग इंटरप्टेड: ग्लोबल स्नैपशॉट ऑफ क्लाइमेट-रिलेटेड स्कूल डिसरप्शंस इन 2024’ ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर एक महत्वपूर्ण और चौंकाने वाली तस्वीर प्रस्तुत की है। इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के कारण बच्चों पर होने वाले शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य संबंधित प्रभावों का गहरा विश्लेषण किया गया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/climate-change-and-the-growing-threat-to-childrens-lives/article-67061"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-02/new-generation-suffering-from-climate-change.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की रिपोर्ट ‘लर्निंग इंटरप्टेड: ग्लोबल स्नैपशॉट ऑफ क्लाइमेट-रिलेटेड स्कूल डिसरप्शंस इन 2024’ ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर एक महत्वपूर्ण और चौंकाने वाली तस्वीर प्रस्तुत की है। इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के कारण बच्चों पर होने वाले शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य संबंधित प्रभावों का गहरा विश्लेषण किया गया है। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">अब तक जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के पर्यावरणीय और कृषि पर प्रभावों के बारे में कई अध्ययन सामने आए थे, लेकिन बच्चों की शिक्षा पर इसके प्रभाव पर यह पहला गंभीर अध्ययन है, जो पूरी दुनिया के नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, और अभिभावकों को गंभीर चिंता में डालने के लिए पर्याप्त है। यह रिपोर्ट सरकारों पर भी दबाव डाल रही है कि वे जलवायु परिवर्तन के बच्चों और शिक्षा पर होने वाले घातक प्रभावों को कम करने के लिए तत्काल प्रभावी नीतियाँ बनाएं और उन्हें लागू करें।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत में लगभग पांच करोड़ छात्रों की शिक्षा पर लू और अत्यधिक गर्मी का गंभीर असर पड़ा। ओस्लो विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो डॉ. केटलिन एम. प्रेंटिस और उनके सहकर्मियों ने जलवायु परिवर्तन के इस प्रभाव पर विस्तृत अध्ययन किया है, जो ‘नेचर क्लाइमेट चेंज’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन में विशेष रूप से दक्षिण एशिया के देशों, जैसे भारत, बांग्लादेश, और कंबोडिया में अप्रैल महीने में आने वाली अत्यधिक गर्म हवाओं (हीटवेव) के कारण शिक्षा व्यवस्था पर पड़े नकारात्मक प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। भारत को जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में एक अत्यधिक संवेदनशील देश माना गया है। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में दुनिया के 85 देशों में कुल 24.2 करोड़ बच्चों की पढ़ाई मौसम की चरम स्थितियों के कारण प्रभावित हुई। इसका मतलब यह है कि हर सात में से एक बच्चा जलवायु संकट के कारण कभी न कभी स्कूल नहीं जा सका। शोध में यह भी बताया गया कि बढ़ती गर्मी और अधिक गर्म दिनों ने न केवल बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित किया, बल्कि उनके परीक्षा परिणामों को भी खराब किया। रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इस तरह जारी रहता है, तो वर्ष 2050 तक बच्चों के अत्यधिक गर्मी और लू के संपर्क में आने की संभावना आठ गुना बढ़ सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे यह स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन न केवल बच्चों की शिक्षा, बल्कि उनके समग्र भविष्य को भी गंभीर खतरे में डाल रहा है। अगर इस संकट से निपटने के लिए तत्काल प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इसके दीर्घकालिक परिणाम न केवल शिक्षा पर बल्कि बच्चों के समग्र विकास पर भी गहरे असर डालेंगे। जलवायु परिवर्तन का बच्चों पर प्रभाव शारीरिक, मानसिक और शैक्षिक दोनों दृष्टिकोणों से घातक हो सकता है। गर्मी से होने वाली बीमारियाँ और मौतों का खतरा बढ़ जाता है। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">हैजा, मलेरिया, डेंगू, और जीका जैसी बीमारियाँ बच्चों के जीवन के लिए खतरनाक हो सकती हैं। गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने से बच्चों के जन्म के समय कम वजन होने की संभावना भी बढ़ जाती है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रहे विषाक्त पदार्थों के संपर्क में आने से बच्चों के स्वास्थ्य पर और भी बुरा असर पड़ सकता है। मानसिक स्वास्थ्य भी इस संकट से प्रभावित होता है। बच्चों में अवसाद, चिंता, नींद संबंधी विकार और सीखने में कठिनाइयाँ जैसी समस्याएँ उभर सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चे वयस्कों की तुलना में जलवायु और पर्यावरणीय बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। वे बाढ़, सूखा, तूफान, और गर्मी जैसी चरम मौसम की घटनाओं से निपटने में वयस्कों से कम सक्षम होते हैं। इसके परिणामस्वरूप, बच्चों के लिए यह संकट उनके अस्तित्व, संरक्षण, विकास, और सामाजिक भागीदारी के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है। जलवायु परिवर्तन के अन्य प्रभावों में बच्चों के अनाथ होने, तस्करी, बाल श्रम, शिक्षा और विकास के अवसरों की हानि, परिवार से अलग होना, बेघर होना, और मानसिक आघात शामिल हैं। यह संकट पूरी दुनिया में मौजूद है, लेकिन विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील देशों में इसका प्रभाव अधिक है। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक प्रयासों की कमी ने इस संकट को और भी गंभीर बना दिया है। अमीर और शक्तिशाली देशों द्वारा इस मुद्दे को नजरअंदाज करना जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और बढ़ावा दे रहा है। पिछले साल में ही जलवायु परिवर्तन के घातक प्रभावों ने पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है। अगर वैश्विक तापमान में और वृद्धि होती है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक भयानक संकट बन सकता है। भारत को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए गंभीर कदम उठाने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों और परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा प्रणालियाँ मजबूत हों, और बच्चों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की पहचान की जाए। जलवायु परिवर्तन के कारण प्रभावित देशों को बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक मंचों पर अपनी प्रतिबद्धता बढ़ानी होगी। इसके साथ ही, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए व्यापक शोध और अध्ययन की आवश्यकता है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसके प्रभाव दीर्घकालिक हो सकते हैं। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">समग्र रूप से, जलवायु परिवर्तन ने दुनिया के बच्चों के भविष्य को खतरे में डाल दिया है। अगर हमें इस संकट से बचना है, तो हमें जलवायु परिवर्तन को लेकर तत्काल कार्रवाई करनी होगी। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं है, बल्कि यह बच्चों के अस्तित्व, विकास, और शिक्षा का संकट भी है। हमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ठोस नीतियों और वैश्विक सहयोग की आवश्यकता है। अगर हम अब भी चुप रहे, तो यह हमारे बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी नासमझी और अपराध साबित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>ललित गर्ग (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><a title="Turmeric Milk Benefit: दूध में हल्दी डालकर पीने के हैं अनोखे फायदे, जानें क्यों है ये हेल्थ के लिए वरदान" href="http://10.0.0.122:1245/haldi-wale-doodh-ke-fayde/">Turmeric Milk Benefit: दूध में हल्दी डालकर पीने के हैं अनोखे फायदे, जानें क्यों है ये हेल्थ के लिए व…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Feb 2025 16:02:28 +0530</pubDate>
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                <title>Climate Change: मौसम में डराने वाले परिवर्तन, फिर बाढ़ की आशंका !</title>
                                    <description><![CDATA[Climate Change: बीते दिनों भारी बारिश की आशंका को देखते हुए पंजाब सरकार ने स्कूलों में छुट्टियों का ऐलान कर दिया है। राज्य में तीसरी बार बाढ़ की चर्चा हो रही है। यह परिस्थिति साधारण नहीं बल्कि जलवायु में आए किसी बड़े परिवर्तन का ही परिणाम है। कई क्षेत्रों में बारिश सामान्य से अधिक दर्ज […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/frightening-changes-in-the-weather-fear-of-flood-again/article-51690"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/sutlej-river1.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Climate Change: बीते दिनों भारी बारिश की आशंका को देखते हुए पंजाब सरकार ने स्कूलों में छुट्टियों का ऐलान कर दिया है। राज्य में तीसरी बार बाढ़ की चर्चा हो रही है। यह परिस्थिति साधारण नहीं बल्कि जलवायु में आए किसी बड़े परिवर्तन का ही परिणाम है। कई क्षेत्रों में बारिश सामान्य से अधिक दर्ज की गई है। जुलाई माह में 1113 स्टेशनों पर भारी बारिश और 205 स्टेशनों पर बहुत अधिक बारिश दर्ज की गई। पिछले दशकों में देश में सूखे की स्थिति बनी रही, अब अधिक बारिश हो रही है। ये दोनों ही स्थितियां प्राणी जीवन के लिए खतरनाक है। हिमाचल प्रदेश में इस बार जो नुक्सान हुआ है, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन में किस हद तक परिवर्तन हो रहा है, इसका अनुमान हिमाचल में इस बार 350 लोगों की मौत होने से लगाया जा सकता है। यह अपने आप में स्थिति की भयावहता को दर्शाता है। बाढ़ की रोकथाम के लिए बांध बनाना सामान्य रूप से प्रथम स्तरीय प्रबंध होते हैं, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में स्थितियां कठिन हैं जहां बादलों के फटने के कारण उत्पन्न होने वाली स्थितियों से निपटना कठिन होता है। यदि प्रकृति का स्वरूप यूं ही जारी रहा तो भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से निपटना असंभव हो जाएगा। Weather Update</p>
<p style="text-align:justify;">ये कठिन हालात केवल भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में हो रहे हैं, इसलिए जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए ठोस कदम उठाना और जीवनशैली में बदलाव लाना अति आवश्यक हो गया है। दरअसल, बड़ी समस्या यह है कि वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन को रोकने पर चर्चा होती है, लेकिन आर्थिक विकास, उद्योग आदि जैसे मुद्दों पर प्रतिस्पर्धा इतनी ज्यादा है कि विकसित देश ‘व्यापार युद्ध’ में व्यस्त हैं। यह व्यापार युद्ध जलवायु परिवर्तन के लिए भी घातक है। विकसित देश अपनी जिम्मेदारी केवल शिखर सम्मेलन की टेबल तक ही निभाते हैं लेकिन व्यावहारिक रूप से कोई प्रयास नहीं किया गया। Flood</p>
<p style="text-align:justify;">यह अच्छा है कि भारत ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए बड़े पैमाने पर कदम उठाए हैं। प्राकृतिक आपदाओं के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाना जरूरी है ताकि विकसित देशों को उनकी भूमिका के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सके। विकास और विनाश में अंतर पर मंथन तो करना ही होगा। कटाई के कारण पहाड़ खत्म हो रहे हैं, सड़कों का निर्माण, वृक्षों की कटाई, अंधाधुंध खनन इत्यादि प्रवृत्तियां जलवायु परिवर्तन का कारण हैं। Climate Change</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Chandrayaan 3: क्या चंद्रयान-3 को चांद पर मिला खजाना? जानें 14 दिन बाद प्रज्ञान रोवर का क्या होगा…" href="http://10.0.0.122:1245/did-chandrayaan-3-find-treasure-on-the-moon/">Chandrayaan 3: क्या चंद्रयान-3 को चांद पर मिला खजाना? जानें 14 दिन बाद प्रज्ञान रोवर का क्या होगा…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Mon, 28 Aug 2023 15:57:18 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>Global warming: वैज्ञानिकों का दावा-भारत में इस वजह से बढ़ रही घरेलू हिंसा</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। Global warming: हमारे देश में यानी भारत में तापमान बढ़ने (heat protection) से घरेलू हिंसा (Domestic violence) में बढ़ोत्तरी हुई है। एक इंटरनेशनल अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि भारत ही नहीं बल्कि उसके पड़ोसी देश नेपाल, पाकिस्तान में भी यही हाल है। ग्लोबल वॉर्मिंग का असर अब निजी संबंधों पर पड़ने […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/scientists-claim-because-of-this-increasing-domestic-violence-in-india/article-49454"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/global-warming-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली। </strong>Global warming: हमारे देश में यानी भारत में तापमान बढ़ने (heat protection) से घरेलू हिंसा (Domestic violence) में बढ़ोत्तरी हुई है। एक इंटरनेशनल अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि भारत ही नहीं बल्कि उसके पड़ोसी देश नेपाल, पाकिस्तान में भी यही हाल है। ग्लोबल वॉर्मिंग का असर अब निजी संबंधों पर पड़ने लगा है। यह आने वाले समय के लिए बहुत खतरनाक हो सकता है।Climate change</p>
<p style="text-align:justify;">ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से भारत में यौन हिंसाओं की घटनाएं तेजी से बढ़ रही है। भारत, पाकिस्तान, नेपाल की 15 से 49 वर्ष की 1.94 लाख से ज्यादा महिलाओं ने यह शिकायत की है कि साथ याौन हिंसा की घटनाएं बढ़ी हैं। आपको बता दें कि यह डेटा एक अक्तूबर 2010 से 30 अप्रैल 2018 के बीच की है। यह अध्ययन हाल ही में JAMA Psychiatry में प्रकाशित हुई है। Global warming</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="en" xml:lang="en">A study published in JAMA Psychiatry found an increase in average annual temperature was connected to a rise of more than 6.3% in incidents of physical and sexual <a href="https://twitter.com/hashtag/domesticviolence?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#domesticviolence</a> across three south Asian countries. <a href="https://t.co/mQZVCZRj07">https://t.co/mQZVCZRj07</a></p>
<p>— UNSW Gendered Violence Research Network (@UNSW_GVRN) <a href="https://twitter.com/UNSW_GVRN/status/1674175885799469056?ref_src=twsrc%5Etfw">June 28, 2023</a></p></blockquote>
<h3>बढ़ते तापमान से बढ़ता है तनाव | Heat</h3>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन में पाया कि ज्यादा तापमान की वजह से किसान की फसलें खबरा होती है। जिससे आर्थिक व्यवस्था कमजोर होती है। लोग घरों में कैद हो जाते हैं। परिवार चलाने का दबाव बढ़ता है जिससे तनाव बढ़ सकता है। ये कारण है कि घरेलू हिंसा के केसों में बढ़ने का खतरा रहता है। Global warming</p>
<p style="text-align:justify;">ये केस सबसे ज्यादा कम कमाई वाले परिवारों व ग्रामीणों में बढ़ रहे हैं। इससे पहले ऐसा अध्ययन मैड्रिड के वैज्ञानिकों ने की थी। उन्होंने केन्या की महिलाओं पर अध्ययन किया था। तब वहां पर बढ़ते तापमान की वजह से इंटिमेंट पाटर्नर फेमिसाइड 40 प्रतिशत बढ़ गया था। यानि 2 लोगों के बीच हिंसा की दर 2.3 फीसदी हो गई थी। जबकि समूहों के बीच 13.2 प्रतिशत हो गई थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कई देश जूझ रहे हैं हीटवेव से | Global warming</h3>
<p style="text-align:justify;">आपको बता दें कि इस बार पूरे विश्व में कई देश अत्यधिक तापमान व हीटवेव की चपेट में है। इस माह में भारत में कईं स्थानों पर पारा 45 डिग्री सेल्सियस के पार जाने की वजह से दर्जनों मौते हुई थीं। वहीं चीन ने अपने उत्तरी इलाकों में रहने वाले लोगों से घरों में रहने की अपील की, क्योंकि पारा 40 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया है। चीन के वैज्ञानिकों ने कहा कि इस बार बढ़ती गर्मी के कारण घरेलू हिंसा बढ़ी है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">भविष्य में और ज्यादा पड़ेगी गर्मी…Global warming</h3>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिकों के अनुसार सलाना तापमान में जब एक डिग्री सेल्सियस बढ़ता है, तब आईपीवी की मात्रा 4.9 प्रतिशत बढ़ जाती है। इस कारण सबसे ज्यादा हिंसा दर्ज होती है। शारीरिक हिंसा 23 फीसदी, 12.5 फीसदी भावनात्मक हिंसा, 9.5 फीसदी यौन हिंसा औसत सालाना तापमान 20 डिग्री से तीस डिग्री सेल्सिय था।</p>
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                                                            <category>साहित्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Jun 2023 17:25:02 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को समझिए</title>
                                    <description><![CDATA[पृथ्वी का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक बताते हैं कि पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। पृथ्वी का तापमान बीते 100 सालों में 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। पृथ्वी के तापमान में यह परिवर्तन संख्या की दृष्टि से काफी कम हो सकता है, परंतु इस प्रकार के किसी भी परिवर्तन का मानव […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/understand-the-seriousness-of-climate-change/article-48884"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/climate-change.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पृथ्वी का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक बताते हैं कि पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। पृथ्वी का तापमान बीते 100 सालों में 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। पृथ्वी के तापमान में यह परिवर्तन संख्या की दृष्टि से काफी कम हो सकता है, परंतु इस प्रकार के किसी भी परिवर्तन का मानव जाति पर बड़ा असर हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के कुछ प्रभावों को वर्तमान में भी महसूस किया जा सकता है। पृथ्वी के तापमान में वृद्धि होने से हिमनद पिघल रहे हैं और महासागरों का जल स्तर बढ़ता जा रहा है, परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं और कुछ द्वीपों के डूबने का खतरा भी बढ़ गया है। पिछले 150 वर्षों में वैश्विक औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व भर में जलवायु परिवर्तन का विषय सर्वविदित है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में जलवायु परिवर्तन वैश्विक समाज के समक्ष मौजूद सबसे बड़ी चुनौती है एवं इससे निपटना वर्तमान समय की बड़ी आवश्यकता बन गई है। आंकड़े दर्शाते हैं कि 19वीं सदी के अंत से अब तक पृथ्वी की सतह का औसत तापमान लगभग 1.62 डिग्री फॉरनहाइट अर्थात लगभग 0.9 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। इसके अतिरिक्त पिछली सदी से अब तक समुद्र के जल स्तर में भी लगभग 8 इंच की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि यह समय जलवायु परिवर्तन की दिशा में गंभीरता से विचार करने का है।</p>
<h3>रोजमर्रा की चीजों में कैमिकल का इस्तेमाल होता है | (Climate Change)</h3>
<p style="text-align:justify;">खेतीबाड़ी में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है और यदि यह आवश्यकता से ज्यादा हो जाए तो कृषि उपज का जहरीला होना लाजिमी है। इसी तरह पशु पालन, डेयरी उद्योग, फूड प्रोसैसिंग, डिब्बाबंद चीजें हैं जो हमारी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। इनमें भी कैमिकल का इस्तेमाल होता है जो इन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल करने लायक बनाए रखता है। इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून भी हैं। लेकिन फिर भी नकली, मिलावटी, दूषित और अपौष्टिक खाद्य पदार्थों के सेवन से लोगों का जीवन संकट में पड़ जाता है। लोग बीमारियों का शिकार होते हैं, उनका स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन सबको रोकने के उपाय जरूर हैं, लेकिन उसके लिए विज्ञान के साथ-साथ समाज और कानून की भी भूमिका है। प्रश्न यह है कि जीवन को मौत तक देने वाले मिलावटियों को मृत्यु दंड क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? इसी तरह उद्योगों से निकला विषैला रसायन नदियों और दूसरे जल स्रोतों को जहरीला बनाता है। विज्ञान ने इसके लिए पूरी व्यवस्था की है लेकिन ऐसे उद्योगों को चलने ही क्यों दिया जाता है जिनके लिए न तो वैज्ञानिक तरीकों का कोई अर्थ है और न ही कानून का डर है।</p>
<h3>…तो 15 फीसदी प्रजातियां खत्म हो जाएंगी | (Climate Change)</h3>
<p style="text-align:justify;">दुनिया के 197 देशों के सहयोग से यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन आॅन क्लाइमेट चेंज यानी यूएनएफसीसीसी पृथ्वी के तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने के उद्देश्य को पूरा करने की कोशिश में हर साल 1995 से लेकर अब तक बैठक करता आ रहा है। लेकिन उसके नतीजे क्या निकले ये दुनिया से छिपा नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र ने आशंका जाहिर की है कि अगले पांच साल में पृथ्वी का औसत तापमान 1.5 डिग्री की सीमा को पार कर जाएगा। अगर धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो 15 फीसदी प्रजातियां खत्म हो जाएंगी। धरती जैसे ही 2.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म होगी तो 30 फीसदी प्रजातियां खत्म हो जाएंगी। यूनिवर्सिटी आॅफ केपटाउन, यूनिवर्सिटी आॅफ बफेलो और यूनिवर्सिटी आॅफ कनेक्टिकट ने एक शोध में यह दावा किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र की संस्था विश्व मौसम संगठन ने हाल में अनुमान लगाया कि अब से 2027 के बीच धरती का तापमान 19वीं सदी के मध्य की तुलना में सालाना 1.5 डिग्री से ज्यादा पर पहुंच जाएगा। यह सीमा महत्वपूर्ण है क्योंकि 2015 के पेरिस समझौते में इसी 1.5 डिग्री सेल्सियस औसत तापमान को दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरनाक सीमा माना गया था और विभिन्न देशों ने शपथ ली थी कि इस सीमा को पार होने से रोकने के लिए कोशिश करेंगे।</p>
<h3>अनेक प्रजातियां लुप्त होंगी | (Climate Change)</h3>
<p style="text-align:justify;">तीनों यूनिवर्सिटीज के शोध में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया में बड़ा बदलाव आएगा। शोध में कहा गया है कि अनेक प्रजातियां सभी महाद्वीपों और समुद्र के किनारों से लुप्त होंगी। वैश्विक स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग के दौरान ग्लेशियर पिघल जाते हैं और समुद्र का जल स्तर ऊपर उठता है जिसके प्रभाव से समुद्र के आस-पास के द्वीपों के डूबने का खतरा भी बढ़ जाता है। मालदीव जैसे छोटे द्वीपीय देशों में रहने वाले लोग पहले से ही वैकल्पिक स्थलों की तलाश में हैं। तापमान में वृद्धि और वनस्पति पैटर्न में बदलाव ने कुछ पक्षी प्रजातियों को विलुप्त होने के लिये मजबूर कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भीषम गर्मी के प्रकोप से किडनी की कार्यक्षमता भी प्रभावित हो रही है। अंग फेल्योर होने से भी लोगों की जान जा रही है। गर्मी के चलते ही डिहाइड्रेशन से लेकर दिल और फेफड़े की बीमारियां भी हो रही हैं। इसके अलावा प्रसव में होने वाली परेशानियां, विभिन्न तरह की एलर्जी और मानसिक बीमारियों की भी वजह जलवायु परिवर्तन ही है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, पृथ्वी का तापमान 1.1 से 1.2 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ चुका है। यह जान लीजिए कि न तो जीवन का अंत है और न ही प्रकृति का। दोनों के बीच सही तालमेल न होने से आपस में संघर्ष होना तय है।</p>
<h3>प्रकृति से तालमेल बिठाकर ही जीवन खुशहाल</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति से जीतना संभव नहीं क्योंकि मनुष्य चाहे कितनी कोशिश कर ले, प्रकृति के बनाए पर्दे को नष्ट नहीं कर सकता, उसमें एकाध छिद्र बेशक कर ले। यदि हम एक साधारण-सी बात समझ लें और वह भी इस उदाहरण के साथ कि हमारे शरीर के अधिकतर अंग अपनी चिकित्सा, उनका बढ़ना या घटना, फिर से नए बन जाना स्वयं कर लेते हैं अर्थात यह एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है। जब यह है तो प्रकृति क्यों जरूरत से ज्यादा अपने काम में इंसान की दखलंदाजी बर्दाश्त करेगी? इसलिए उसके साथ तालमेल बिठाकर ही जीवन को सुख और खुशहाली से भरा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए जरूरी है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि औसत 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड पर स्थिर हो जाए। ऐसा करने के लिए 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों और कार्बन डाई आॅक्साइड उत्सर्जन कम कर 40 प्रतिशत तक लाना होगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. आशीष वशिष्ठ , वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 15 Jun 2023 18:43:34 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>WMO का ALERT, Saint MSG पहले ही बरनावा आश्रम में दे चुके हैं चेतावनी</title>
                                    <description><![CDATA[जलेगी धरती, जलेगा जंगल, दुनिया में होगा इतना अमंगल पेरिस। विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने अलर्ट किया है कि वर्ष 2027 में धरती का औसतन टैम्प्रेचर 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा, जिसका परिणाम ये होगा कि धरती जलेगी, आसमान जलेगा, जंगल जलेंगे, बेमौसमी बरसात, बाढ़, सूखा, धूल भरी आंधी, समुद्री जलस्तर बढ़ना, समुद्री तूफान […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/wmo-alert-saint-msg-has-already-warned-in-barnava-ashram/article-47779"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/wmo.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">जलेगी धरती, जलेगा जंगल, दुनिया में होगा इतना अमंगल</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>पेरिस।</strong> विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने अलर्ट किया है कि वर्ष 2027 में धरती का औसतन टैम्प्रेचर 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ जाएगा, जिसका परिणाम ये होगा कि धरती जलेगी, आसमान जलेगा, जंगल जलेंगे, बेमौसमी बरसात, बाढ़, सूखा, धूल भरी आंधी, समुद्री जलस्तर बढ़ना, समुद्री तूफान आएंगे। ऐसे में इंसानों का क्या होगा? इसका अंदाजा लगाना शायद ही दुनिया के लिए मुश्किल होगा। साइंस इसका अलर्ट आज जारी कर रही है, वहीं दूसरी ओर डेरा सच्चा सौदा के संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां पहले ही आॅनलाइन गुरुकुल के माध्यम से दुनिया को आगाह कर चुके हैं कि दुनिया महाप्रलय की ओर जा रही है।</p>
<h3>दुनिया की हालत इतनी खराब होगी कि पूरी दुनिया जलेगी | WMO ALERT</h3>
<p style="text-align:justify;">WMO  ने 30 साल के औसत वैश्विक तापमान के आधार पर ये खुलासा करते हुए दुनिया को चेतावनी दी है कि हर पांच साल में एक साल रिकॉर्डतोड़ गर्मी वाला होगा, जिसका 98 प्रतिशत अनुमान है। यह प्रक्रिया 2016 से शुरू हो चुकी है। यह एक बहुत बड़े स्तर का जलवायु संकट है जिसे दुनिया गंभीरता से नहीं ले रही है। दुनिया की हालत इतनी खराब होगी कि पूरी दुनिया जलेगी, मौसम अपने समय के विपरीत बदल जाएंगे। अचानक आपदाएं आएंगी, धूल भरी आंधियां आएंगी, बेमौसमी बरसात होगी।</p>
<h3>डरावना खुलासा | WMO ALERT</h3>
<p style="text-align:justify;">इस संबंध में ब्रिटेन के मेट आॅफिस हैडली सेंटर के लॉन्ग-रेंज प्रेडिक्शन प्रमुख एडम स्कैफी ने कहा कि यह भी संभव है कि हम अगले चार-पांच सालों में गर्मी का ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर देखें। डेढ़ डिग्री सेल्सियस से ऊपर तापमान चला जाए। उन्होंने कहा है कि पिछले वर्ष आई रिपोर्ट के अनुसार इस बात की संभावना 50-50 थी, लेकिन दोबारा की गई स्टडी के अनुसार अब यह 66 प्रतिशत है। स्कैफी के अनुसार ग्लोबल एनुअल टू डिकेडल क्लाइमेट अपडेट (Global Annual to Decadal Climate Update) में यह डरावना खुलासा किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">एडम स्कैफी के अनुसार अगर अस्थाई तौर पर भी डेढ़ डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ता है तो भी पूरी दुनिया को प्राकृतिक आपदाएं झेलनी पड़ेंगी। कहने का मतलब कि पूरी दुनिया ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगाने में कामयाब नहीं होगी। जब तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम नहीं होगा तब तक बढ़ती गर्मी को रोका नहीं जा सकता, जिसका विभिन्न देशों के मौसम पर फर्क पड़ना लाजमी है। भारत की हालत इसलिए खराब होगी क्योंकि अल-नीनो के साथ जब इंसानों द्वारा किया जा रहा जलवायु परिवर्तन मिलेगा तो स्थितियां और भी बद्तर हो जाएंगी।</p>
<h3>बरनावा आश्रम से पहले ही दे चुके है चेतावनी | WMO ALERT</h3>
<p><iframe title="नशा दुनिया को महाप्रलय की तरफ ले जा रहा है | Drug Addiction Will Result in Global Destruction" width="500" height="281" src="https://www.youtube.com/embed/c-GMiC_Xqtg?feature=oembed" frameborder="0" allowfullscreen=""></iframe></p>
<p style="text-align:justify;">पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां 40 दिन की रूहानी यात्रा पर बरनावा आश्रम में पधारे थे उस दौरान गुरु जी ने फरमाया कि ऐसे थोड़ी ना बरसात को उड़ीकते रहते हैं लोग। पर बरसात सही समय पर आ जाए लेकिन आजकल तो गड़बड़ हो रही है जब बरसात नहीं चाहिए तब आती है। जब चाहिए तब नहीं आती। यह क्यों होता है ऐसा क्यों हो रहा है इस पर भी बात करेंगे अभी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसकी वजह है जो हमने अनुभव किया पिछली बार भी हमने कहा था आपको जब पिछली बार आए थे कि शाह सतनाम शाह मस्तान जी ने इस बॉडी से पता नहीं क्या काम लेना है जो इतनी तपस्या करवाई उन्होंने। तो फीलिंग आती है महसूस होता है कि ऐसा तब होता है, मालिक ऐसा करे ना यह मालिक से दुआ है , पर यह परिवर्तन तब आता है जब प्रलय की तरफ दुनिया बढ़ रही होती है। बड़ी दुखद बात है जनसंख्या का विस्फोट होने को तैयार है। इतने बच्चे बढ़ते जा रहे हैं इतनी जनसंख्या होती जा रही है कि पूछो मत। पानी धरती में नीचे गायब होता जा रहा है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/wmo-alert-saint-msg-has-already-warned-in-barnava-ashram/article-47779</link>
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                <pubDate>Thu, 18 May 2023 16:30:43 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>नई बर्फीली झीलों से संकट में आबादी</title>
                                    <description><![CDATA[तापमान बढ़ने के साथ पूरी दुनिया में ग्लेशियर यानी हिमखंड बहुत तेजी से पिघल रहे हैं। नतीजतन समूचे बर्फीली इलाकों में नवीन झीलों का निर्माण हो रहा है। यदि इन झीलों के फटने की घटना घटती है तो इन ग्लेशियरों के पचास किलोमीटर के दायरे में रहने वाले दुनिया के 1.5 करोड़ लोगों के लिए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/population-in-trouble-due-to-new-icy-lakes/article-43621"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-02/climate-change.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">तापमान बढ़ने के साथ पूरी दुनिया में ग्लेशियर यानी हिमखंड बहुत तेजी से पिघल रहे हैं। नतीजतन समूचे बर्फीली इलाकों में नवीन झीलों का निर्माण हो रहा है। यदि इन झीलों के फटने की घटना घटती है तो इन ग्लेशियरों के पचास किलोमीटर के दायरे में रहने वाले दुनिया के 1.5 करोड़ लोगों के लिए यह संकट बहुत बड़ा खतरा बन सकता है। इन हिमखंडों में से आधे भारत, पाकिस्तान, चीन और पेरू में हैं। नेचर कम्युनिकेशंस पत्रिका में प्रकाशित यूके स्थित न्यूकासल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के इस अध्ययन में कहा गया है कि खतरे का सामना कर रही दुनिया की 50 प्रतिशत यानी 75 लाख की आबादी भारत समेत इन चार देशों में रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में 30 लाख और पाकिस्तान में 20 लाख लोग इससे प्रभावित हो सकते हैं। इस रिपोर्ट में उत्तराखंड के चमोली में फरवरी 2021 में हुई घटना का भी हवाला दिया गया है। इसमें 80 लोगों की मौत हो गई थी। सबसे ज्यादा खतरा तिब्बत के पठार किर्गिस्तान से लेकर चीन तक है। इस इलाके में 93 लाख लोग रहते हैं। धु्रवीय क्षेत्र के बाहर कुल ग्लेशियरों में से आधे पाकिस्तान में हैं। 2022 में गिलगिट-बाल्टिस्तान क्षेत्र में ग्लेशियर फटने की 16 घटनाएं घटित हुई हैं। हालांकि इस रिपोर्ट में यह स्पष्ट नहीं है कि 2022 में पाकिस्तान में आई बाढ़ के लिए हिमखंड का पिघलना कितना जिम्मेदार है। न्यूजीलैंड के कैंटरबरी विवि के प्राध्यापक टॉम रॉबिनसन का कहना है कि ग्लेशियर झील का फटना जमीनी सुनामी की तरह है। इसका असर किसी बांध के फटने जैसा दिखाई देगा। सबसे बड़ा संकट यह है कि यह संकट बिना कोई पूर्व चेतावनी के कहर बरपा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के हिमालयी क्षेत्र में स्थित सतलुज नदी घाटी में हिमखंडों के पिघलने से ऐसी झीलों की संख्या बढ़ रही है, जो भविष्य में बाढ़ और तबाही का बड़ा खतरा बन सकती है। इन बर्फीली वादियों में 273 नई झीलें बनी हैं। मान सरोवर से नाथपा-झाकड़ी तक कुल 1632 झीलें गिनी गई हैं। इनमें से 17 झीलें खतरे के निशान तक पहुंच गई हैं, जिनमें से आठ चीन के कब्जे वाले तिब्बत क्षेत्र में है। इनका क्षेत्रफल पांच हेक्टेयर तक है। ये झीलें सतलुज के पानी को बढ़ाकर बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है। अत: ये झीलें हिमाचल समेत अन्य हिमालयी राज्यों के लिए खतरे की घंटी है। देश व प्रदेश के भू-विज्ञानी हिमालयी क्षेत्र की चार घाटियों चिनाब, ब्यास, रावी व सतलुज में हिमखंड पिघलने से बनी झीलों की निगरानी में लगे हैं। इनके अध्ययन से पता चला है कि सतलुज नदी घाटी में ग्लेशियरों के पिघलने से झीलों में पानी की मात्रा 4 से 5 प्रतिशत तक बढ़ गई है। भविष्य में और बढ़ने की आशंका है। बढ़ते तापमान के कारण हिमखंडों के पिघलने व टूटने से झीलों के आकार बड़े हो रहे हैं। इस बदलाव को जलवायु परिवर्तन का कारण माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">2005 में भू-स्खलन से पारछू झील टूट गई थी। नतीजतन सतलुज का जलस्तर बढ़ा और उसने हिमाचल प्रदेश के किन्नौर व बिलासपुर जिलों में तबाही मचा दी थी। कुछ समय पहले गोमुख के विशाल हिमखण्ड का एक हिस्सा टूटकर भागीरथी, यानी गंगा नदी के उद्गम स्थल पर गिरा था। हिमालय के हिमखण्डों का इस तरह से पिघलना व टूटना प्रकृति के अशुभ संकेत हैं। गंगोत्री राष्टÑीय उद्यान के वनाधिकारी ने इस हिमखण्ड के टुकड़ों के चित्रों से इसके टूटने की पुष्टि की थी।<br />
ग्लेशियर वैज्ञानिक इन घटना की पृष्ठभूमि में कम बर्फबारी होने के साथ धरती का बढ़ा तापमान मानते हैं। सतलुज और नंदादेवी हिमखंडों के तेजी से पिघलने के पीछे भौगोलिक परिस्थितियां है। यहां का तापमान 0.5 डिग्री बढ़ चुका है और इस क्षेत्र में 30 प्रतिशत बारिश भी कम हो रही है। यदि कालांतर में धरती पर गर्मी इसी तरह बढ़ती रही और ग्लेशियर क्षरण होने के साथ टूटते भी रहे तो इनका असर समुद्र का जलस्तर बढ़ने और नदियों के अस्तित्व पर पड़ना तय है। गरमाती पृथ्वी की वजह से हिमखण्डों के टूटने का सिलसिला आगे भी जारी रहा तो समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा, जिससे कई लघुद्वीप और समुद्रतटीय शहर डूबने लग जाएंगे। हालांकि वैज्ञानिक अभी तक यह निश्चित नहीं कर पाए हैं कि इन घटनाओं को प्राकृतिक माना जाए या जलवायु परिवर्तन के कारण ?</p>
<p style="text-align:justify;">हिमखंडों के पिघलने और टूटने की घटनाओं को वैज्ञानिक फिलहाल साधारण घटना मानकर चल रहे थे। उनका मानना था कि कम बर्फबारी होने और ज्यादा गर्मी पड़ने की वजह से हिमखण्डों में दरारें पड़ गई थीं, इनमें बरसाती पानी भर जाने से हिमखण्ड टूटने लग गए। उत्तराखण्ड के जंगलों में हर साल लगने वाली आग की आंच ने भी हिमखण्डों को कमजोर करने का काम किया है। आग और धुएं से बर्फीली शिलाओं के ऊपर जमी कच्ची बर्फ तेजी से पिघलती चली गई। इस कारण दरारें भर नहीं पाईं। कार्बन यदि शिलाओं पर जमा रहता है तो भविष्य में नई बर्फ जमने की उम्मीद कम हो जाती है। इधर हाल ही में कश्मीर घाटी में बड़ी मात्रा में पीले रंग की बर्फ देखने में आई है। इसके पहले भी इस ्रक्षेत्र में काली बर्फ और काली बारिश देखने में आई थी। बर्फ का यह रंग परिवर्तन क्यों हुआ, इसका स्पष्ट कारण पर्यावरणविद् नहीं जान पाए हैं। हो सकता है जलवायु परिवर्तन इसका कारण हो ?</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे हिमखण्डों का टूटना कोई नई बात नहीं है, लेकिन इनका पिघलना नई बात है। शताब्दियों से प्राकृतिक रूप में हिमखण्ड पिघलकर नदियों की अविरल जलधारा बनते रहे हैं। लेकिन भूमण्डलीकरण के बाद प्राकृतिक संपदा के दोहन पर आधारित जो औद्योगिक विकास हुआ है, उससे उत्सर्जित कार्बन ने इनके पिघलने की तीव्रता को बढ़ा दिया है।एक शताब्दी पूर्व भी हिमखण्ड पिघलते थे, लेकिन बर्फ गिरने के बाद इनका दायरा निरंतर बढ़ता रहता था। इसीलिए गंगा और यमुना जैसी नदियों का प्रवाह बना रहा। किंतु 1950 के दशक से ही इनका दायरा तीन से चार मीटर प्रति वर्ष घटना शुरू हो गया था। 1990 के बाद यह गति और तेज हो गई इसके बाद से गंगोत्री के हिमखंड प्रत्येक वर्ष 5 से 20 मीटर की गति से पिघल रहे हैं। भारतीय हिमालय में कुल 9975 हिमखण्ड हैं। इनमें 900 उत्तराखण्ड के क्षेत्र में आते हैं। इन हिमखण्डों से ही ज्यादातर नदियां निकली हैं, जो देश की 40 प्रतिशत आबादी को पेय, सिंचाई व आजीविका के अनेक संसाधन उपलब्ध कराती हैं। किंतु हिमखण्डों के पिघलने और टूटने का यही सिलसिला बना रहा तो ऐसा कोई उपाय मुश्किल है जो इन नदियों से जीवनयापन कर रही 50 करोड़ आबादी को रोजगार व आजीविका के वैकल्पिक संसाधन दे सके?</p>
<p style="text-align:justify;">ज्लवायु परिवर्तन के प्रभाव से बर्फ के पिघलने से बनने वाली झीलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसी अनुपात में इनके जलग्रहण क्षेत्रों में भी आबादी बढ़ती रही है। जानकारों का दावा है कि उतना खतरा झीलों के फटने से नहीं है, अलबत्ता इन झीलों के निकट जनसंख्या का दबाव बढ़ जाने के कारण है। गोया, झील फटती है तो झील के किनारे आबाद बस्ती के लोग संकट से घिर जाएंगे। ये झीलें ऐसे दुर्गम बफीर्ले इलाकों में बन रही हैं, जहां आपदा बचाव दलों का पहुंचना भी कठिन होता है। 1089 झीलों की पड़ताल में पाया गया है कि पचास किलोमीटर के दायरे में 1.5 करोड़ लोग रहते हैं।</p>
<p><strong>                                          (यह लेखक के अपने विचार हैं) प्रमोद भार्गव वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 18 Feb 2023 10:01:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में &amp;#8216;भारत&amp;#8217; अग्रणी</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व बैंक ने जारी की रिपोर्ट  ऊर्जा स्रोतों में कोयले की जगह ले रही है सौर ऊर्जा  सौर ऊर्जा का सबसे बेहतर स्थान है भारत वाशिंगटन (एजेंसी)। विश्व बैंक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत अग्रणी देश बनकर उभर रहा है। उसने कहा कि एशियाई देशों में ऊर्जा के स्रोत […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/india-pioneer-in-the-fight-against-climate-change/article-2098"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/climent.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">विश्व बैंक ने जारी की रिपोर्ट</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong> ऊर्जा स्रोतों में कोयले की जगह ले रही है सौर ऊर्जा</strong></li>
<li style="text-align:justify;"><strong> सौर ऊर्जा का सबसे बेहतर स्थान है भारत</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन (एजेंसी)।</strong> विश्व बैंक ने कहा कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत अग्रणी देश बनकर उभर रहा है। उसने कहा कि एशियाई देशों में ऊर्जा के स्रोत के तौर पर सौर उर्जा धीरे-धीरे कोयले का स्थान ले रही है। विश्व बैंक ने कल प्रकाशित एक समाचार रिपोर्ट में कहा, ‘अपने लोगों को 2030 तक चौबीसों घंटे बिजली उपलब्ध कराने के लिए सौर ऊर्जा की ओर प्रतिबद्धता, नवोन्मेषी समाधान और ऊर्जा दक्षता पहलों के साथ भारत जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में अग्रणी बनकर उभर रहा है।’</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व बैंक के अनुसार, अपनी वृद्धि को बढ़ाने के लिए और अधिक स्वच्छ उर्जा का इस्तेमाल करने की सचेत पसंद के साथ ही भारत जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से धरती को बचाने के वैश्विक प्रयासों में योगदान दे रहा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ सप्ताह पहले देश ने कोयले से चलने वाले 14 गीगावॉट क्षमता वाले बिजली संयंत्र स्थापित करने की योजना से कदम पीछे खींच लिए, क्योंकि अब सौर ऊर्जा से बिजली पैदा करने में वहन करने योग्य लागत आती है। रिपोर्ट में इस संबंध में भारत के कदमों की तारीफ की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">बैंक ने कहा, ‘भारत और उसके अलावा ऊर्जा के स्रोत के रूप में सौर ऊर्जा कोयले की जगह ले रही है।’ उसने कहा कि सौर फोटोवॉल्टेक (पीवी) से बिजली पैदा करने की लागत वर्ष 2009 के मुकाबले एक चौथाई कम है और वर्ष 2040 तक इसके 66 फीसदी तक और कम होने की संभावना है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सौर ऊर्जा के लिए भारत बेहतर विकल्प</h3>
<p style="text-align:justify;">भारत में सालभर में करीब 300 दिन धूप निकलती है, इसलिए भारत में सौर ऊर्जा का फायदा उठाने और इसका इस्तेमाल करने के लिए दुनिया में सबसे अच्छी परिस्थितियां हैं। भारत सरकार ने महत्वाकांक्षी परियोजनाएं बनाई हैं, जिसमें वर्ष 2022 तक पवन चक्की और सौर ऊर्जा से 160 गीगावॉट तक बिजली पैदा करने का लक्ष्य शामिल है। इससे न केवल लाखों लोगों के घरों में रोशनी होगी, बल्कि बच्चे रात को पढ़ाई भी कर पाएंगे। लोग अपने खाने को फ्रिज में संरक्षित कर पाएंगे या टीवी पर मनोरंजन भी कर पाएंगे। बैंक ने कहा कि यह अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भारत के सौर बाजार में निवेश करने का भी अच्छा मौका है।</p>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 08 Jul 2017 07:30:51 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर वैश्विक एकजुटता जरुरी</title>
                                    <description><![CDATA[2015 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में संपन्न जलवायु शिखर सम्मेलन में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए कहा था कि वह कार्बन उत्सर्जन की समस्या को पैदा करने में अपनी भूमिका को स्वीकार करते हैं और इससे निपटने के लिए अपनी जिम्मेदारी को लेकर वह सजग भी है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/global-solidarity-is-necessary-on-the-issue-of-climate-change/article-854"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/trump.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">2015 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में संपन्न जलवायु शिखर सम्मेलन में, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा ने अपनी प्रतिबद्धता जाहिर करते हुए कहा था कि वह कार्बन उत्सर्जन की समस्या को पैदा करने में अपनी भूमिका को स्वीकार करते हैं और इससे निपटने के लिए अपनी जिम्मेदारी को लेकर वह सजग भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन, वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आश्चर्यजनक रूप से पेरिस जलवायु समझौते से हटने का ऐलान कर दिया है। उनका मानना है कि 2015 में जलवायु परिवर्तन को लेकर हुआ यह वैश्विक समझौता अमेरिका के साथ न्याय नहीं करता। उनका विश्वास है कि पेरिस समझौता चीन तथा भारत जैसे देशों को फायदा पहुंचाता है। लिहाजा, उन्होंने पेरिस समझौते से हटने का फैसला किया है। ट्रंप के इस अनोखे रवैये की वजह से विश्वभर में उनकी आलोचना हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, यह पहली दफा नहीं है, जब जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अमेरिका का रवैया एकपक्षीय व हतप्रभ भरा रहा है। इससे पहले भी, अमेरिका क्योटो प्रोटोकॉल (1997) पर अपनी भूमिका से मुकर चुका है। गौरतलब है कि तब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने क्योटो संधि पर हस्ताक्षर किए थे मगर, क्लिंटन के बाद राष्ट्रपति बने जॉर्ज बुश ने इसे मंजूरी देने से मना कर दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बार फिर, मौजूदा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति ओबामा की पर्यावरणीय नीतियों को दरकिनार कर अमेरिका की दादागिरी तथा ‘अमेरिका फर्स्ट’ वाली मानसिकता को उजागर करने की कोशिश की है। जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए, वैश्विक एकजुटता का होना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन, सवाल यह है कि अमेरिका, पेरिस जलवायु समझौते को स्वीकारने से मुकर क्यों रहा है?</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि, विकसित देशों की सततपोषणीय विकास से इतर, एकाधिकारवादी औद्योगिक विकास की चाह ही जलवायु परिवर्तन के लिए प्रमुख रुप से जिम्मेवार रही है। दरअसल, ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए पेरिस सम्मेलन के अंतर्गत विकसित देशों द्वारा विकासशील देशों की सहायतार्थ 2020 तक 100 बिलियन डॉलर का सलाना फंड बनाने की बात कही गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन, अब विकसित देशों का कहना है कि केवल विकसित ही नहीं, अपितु विकासशील देशों को भी इसमें योगदान देना होगा। डोनाल्ड ट्रंप ने आरोप लगाया है कि पेरिस समझौता, अमेरिका की संपदा को दूसरे देशों में बांट रहा है। ट्रंप को डर है कि अमेरिका अगर इस समझौते को स्वीकार करता है तो, वहां 27 लाख नौकरियों का संकट उत्पन्न हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रंप ने, भारत के संबंध में यहां तक कह दिया कि भारत को उत्सर्जन कम करने के वास्ते करोड़ों रुपये बतौर सहायता मिलने वाले हैं। अगर, ट्रंप की आशंकाओं को कुछ क्षण के लिए अपनी जगह सही मान लिया जाए फिर भी, ट्रंप द्वारा ऐतिहासिक पेरिस समझौते को पूरी तरह नकार देना समझ से परे है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में पेरिस समझौते का विशिष्ट महत्व रहा है। इसमें, वैश्विक तापमान को कम करना, कार्बन उत्सर्जन में कमी लाना और अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन बनाकर सौर ऊर्जा पर बल देने तथा हर पांच साल में प्रत्येक देश की भूमिका की प्रगति की समीक्षा करने जैसे महत्वपूर्ण लक्ष्य शामिल रहे हैं। सत्ता परिवर्तन के बाद जिस तरह, अमेरिका ने अपना रंग बदला है, उससे, जलवायु परिवर्तन से निपटने के उद्देश्यों को आंशिक झटका जरुर लगा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन पर दो ध्रुवों पर बंटे विश्व को एक मंच पर लाने का एक बड़ा प्रयास 2015 के पेरिस सम्मेलन में किया गया। इस समझौते की प्रमुख बात यह रही थी कि इसमें जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने की जिम्मेदारी केवल विकसित या विकासशील नहीं अपितु, सभी देशों पर डाली गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने समझौते के बारे में उस वक्त कहा था कि ‘पेरिस समझौते में ना कोई विजेता है और ना ही किसी की हार हुई है, पर्यावरण को लेकर न्याय की जीत हुई है और हम सब एक हरे भरे भविष्य पर काम कर रहे हैं।’</p>
<p style="text-align:justify;">पेरिस समझौते के तहत 190 से अधिक देशों ने वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी को 2 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का लक्ष्य रखा है। तापमान का यह स्तर इसलिए महत्व रखता है, क्योंकि वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि 2 डिग्री से ऊपर के तापमान से धरती की जलवायु में बड़ा बदलाव हो सकता है, जिसके असर से ग्लेशियर का पिघलना, समुद्र तल की ऊंचाई बढ़ना, सूखा, दावानल और बाढ़, भूस्खलन जैसी आपदाएं दस्तक दे सकती हैं। जलवायु परिवर्तन इस सदी की प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय समस्या रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व बैंक के मुख्य अधिकारी रहे अर्थशास्त्री सर निकोलस स्टर्न ने जलवायु परिवर्तन के नतीजों की तुलना दो विश्व युद्धों के सामाजिक और आर्थिक परिणामों तथा बीसवीं सदी की आर्थिक मंदी के रुप में की थी। यह सच्चाई है कि वैश्विक ऊष्मण की वजह से, पृथ्वी पर उपस्थित सभी सजीवों का जीवन-यापन करना कठिन हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैश्विक ऊष्मण जैव-विविधता का सबसे बड़ा दुश्मन है। वैश्विक ऊष्मण की वजह से ही प्राकृतिक मौसम तथा जलवायु चक्र विच्छेद हो रहे हैं, जिस कारण पृथ्वी का कुछ हिस्सा, प्रतिदिन बाढ़, सूखा, भूस्खलन व अन्य जानलेवा आपदाओं से प्रभावित रहता है। इस वजह से, भौतिक तथा मानव संसाधन का बड़े पैमाने पर नुकसान भी हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुखद यह है कि पर्यावरण संरक्षण पर आयोजित तमाम सम्मेलनों तथा तरह-तरह के एक दिवसीय वार्षिक आयोजन के बावजूद, वायुमंडल के औसत तापमान में कमी आने की बजाय, बढ़ोतरी ही हो रही है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, पिछली सदी के दौरान, धरती का औसत तापमान 1.4 फारेनहाइट बढ़ चुका है। जबकि, अगले सौ साल के दौरान, इसके बढ़कर 2 से 11.5 फारेनहाइट होने के अनुमान हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर विकसित देशों का रवैया सदैव एकपक्षीय, ढुलमुल व स्वार्थ भरा रहा है। 1997 के क्योटो प्रोटोकॉल के बाद से ही, कार्बन उत्सर्जन को लेकर विकसित देशों ने अपनी भूमिका से हटते हुए, विकासशील देशों पर दबाव बनाना शुरू कर दिया था। जलवायु परिवर्तन एक ऐसा विषय है, जिससे पूरा विश्व समान रुप से जुड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बावजूद इसके, इस संवेदनशील मुद्दे पर एकजुटता की बजाय, वैश्विक स्तर पर राजनीति हो रही है। समझना होगा कि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न ग्लोबल वार्मिंग, बाढ़, सूखा जैसी आपदाओं की विभीषिका का दंश कोई एक देश या महादेश नहीं, अपितु समस्त मानव समाज झेल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। भारत ने कार्बन उत्सर्जन में 2030 तक 33 से 35 फीसदी तक कटौती का एलान कर इस दिशा में पहल भी कर दी है। जरूरत इस बात की है कि पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर अपनी एकजुटता दिखाए। ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों पर अत्यधिक निर्भरता की बजाय सौर, पवन, भूतापीय तथा जल ऊर्जा का विकास करना पर्यावरण संरक्षण की दिशा में राहत योग्य बात होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा, विभिन्न देशों को अपने नागरिकों के लिए एक साझा कार्यक्रम तैयार कर पर्यावरण संरक्षण के निमित्त अपनी प्रतिबद्धता दिखानी होगी। सकारात्मक पहल कर जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटा जा सकता है। संसार की आठ अरब आबादी पूरी जिम्मेदारी के साथ छोटी-छोटी बातों पर अमल कर जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">–<strong>सुधीर कुमार</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Jun 2017 21:55:30 +0530</pubDate>
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