<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/improvement/tag-1845" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>improvement - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/1845/rss</link>
                <description>improvement RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>मोटर व्हीकल एक्ट से बढ़ता विवाद</title>
                                    <description><![CDATA[मोटर व्हीकल एक्ट इन दिनों केंद्र और राज्यों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। हाल ही में केंद्र सरकार ने 1988 के मोटर व्हीकल एक्ट में कुछ नए प्रावधानों को जोड़ा है। जिसमें लाइसेंसिंग सिस्टम में सुधार, तकनीकी का प्रयोग, दुर्घटना में घायलों की मदद करने वालों को सुरक्षा और विशेषकर ट्रैफिक नियमों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/increasing-controversy-over-motor-vehicle-act/article-10391"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-09/improvement-technical-accident-controversy-over-motor-vehicle-act.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मोटर व्हीकल एक्ट इन दिनों केंद्र और राज्यों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है। हाल ही में केंद्र सरकार ने 1988 के मोटर व्हीकल एक्ट में कुछ नए प्रावधानों को जोड़ा है। जिसमें लाइसेंसिंग सिस्टम में सुधार, तकनीकी का प्रयोग, दुर्घटना में घायलों की मदद करने वालों को सुरक्षा और विशेषकर ट्रैफिक नियमों का उल्लंघन करने वालों पर भारी भरकम जुर्माने आदि कई महत्वपूर्ण प्रावधान शामिल हैं। जिनमें भारी भरकम जुर्माने विवाद के केंद्र में है। इससे असहमत होकर कुछ राज्यों में इस कानून को अपने यहां लागू करने से मना कर दिया है। जिसमें मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, पंजाब और राजस्थान शामिल हैं। इनके अतिरिक्त कुछ बीजेपी शासित राज्य भी हैं, जो इस कानून पर अपनी असहमति व्यक्त कर चुके हैं। भारत में एक संघीय ढांचा है जिसके द्वारा केंद्र और राज्य में विधाई शक्तियों का स्पष्ट बंटवारा किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिसके लिए संविधान में तीन सूचियों की चर्चा की गई है। जिसमें संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची प्रमुख हैं। केंद्र सरकार ने समवर्ती सूची द्वारा प्राप्त शक्तियों के माध्यम से मोटर व्हीकल एक्ट में नए प्रावधानों को जोड़ा है। समवर्ती सूची के अंतर्गत राज्य और केंद्र दोनों ही सूची में अंकित विषयों पर कानून बना सकते हैं। लेकिन यदि एक ही विषय पर केंद्र और राज्य दोनों ने कानून बनाया है। तो केंद्र का कानून लागू होगा और राज्यों का कानून शून्य माना जाएगा। लेकिन यहां पर राज्यों के लिए भी कुछ प्रावधान किए गए हैं। जिनके माध्यम से राज्य केंद्र द्वारा बनाए गए कानूनों पर एक नया कानून बना सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन इसकी प्रक्रिया जटिल है। इसके लिए राज्य सरकारों को सर्वप्रथम किए गए संशोधनों को विधानसभा में पास कराने के बाद केंद्र सरकार को भेजना होगा और केंद्र सरकार विवेचना के बाद उसको राष्ट्रपति के पास भेजेगी। यदि राष्ट्रपति इस पर हस्ताक्षर कर देते हैं, तो राज्यों द्वारा बनाया गया कानून अस्तित्व में आ जाएगा। इस मोटर व्हीकल कानून में कुल 93 प्रावधान हैं। जिसमें 63 केंद्र सरकार के नोटिफिकेशन द्वारा ही राज्यों पर लागू हो जाते हैं। बाकी के प्रावधान तभी लागू हो सकेंगे जब राज्य सरकारें उसके लिए नोटिफिकेशन जारी करेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जो विवादित विषय कठोर जुमार्ने का है। वह तभी लागू हो सकता है जब राज्य सरकारें उसके लिए नोटिफिकेशन जारी करें। राज्य सरकारों ने इसको ना लागू करने के लिए अपने तर्क दिए हैं। जिनमें भ्रष्टाचार का मुद्दा प्रमुख है। संविधान विश्लेषकों को यह विरोध राजनीति से प्रेरित लगता है। क्योंकि लगभग एक माह पहले ही इसके लागू करने की तिथि की घोषणा की जा चुकी थी उस समय इसका विरोध नहीं किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन यह भी सार्वभौमिक सत्य है कि जुर्माने राशि के बढ़ने से जरूरी नहीं है की सभी इसको स्वीकार करने लगे। यदि आप जुमार्ने की राशि बढ़ाते हैं तो सड़कों की गुणवत्ता भी अच्छी होनी चाहिए। हाईवे पर स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता उच्च होनी चाहिए। इसके साथ सभी राज्य एक जैसे नहीं हैं। कुछ राज्य अभी भी काफी पिछड़े हुए हैं। जहां पर मूलभूत सुविधाओं का अभाव है, लोग अपनी दैनिक जरूरतों को भी पूरा करने में असमर्थ हैं। ऐसे में भारी-भरकम जुर्माने सभी राज्यों में तर्कसंगत प्रतीत नहीं होता। केंद्र सरकार का तर्क है कि दिन प्रतिदिन सड़कों पर दबाव बढ़ रहा है, गाड़ियां बढ़ रही हैं। इसलिए ऐसा करना आवश्यक था। यह तर्क भी सभी राज्यों के लिए सही नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्योंकि पिछड़े राज्यों में अभी भी कनेक्टिविटी का अभाव है, सड़कों पर दबाव और गाड़ियों की संख्या अभी भी वहां पर विकसित राज्यों की तुलना में कम है। इसलिए कठोर जुमार्ने के प्रावधानों को चरणबद्ध तरीके से सर्वप्रथम विकसित राज्यों से शुरू करना तर्कसंगत था। मौजूदा समय में जिस प्रकार से सड़क दुर्घटनाएं बढ़ रही हैं। भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के लिए हमें ज्यादा से ज्यादा तकनीकी का प्रयोग करना होगा हमें चालान में मैनुअल चालान को समाप्त करना होगा। इसके साथ कई अन्य आवश्यक कदम भी उठाने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">सड़क परिवहन मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि राज्यों के पास मोटर व्हीकल कानून को लागू करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। अन्यथा उनको आर्थिक पाबंदियो से गुजरना होगा और कैग आॅडिट के माध्यम से जुमार्ने ना लगाने से हुई आर्थिक हानि के बराबर केंद्र सरकार रेवेन्यू शेयर में कटौती कर सकती है। यहां यह ध्यान देने की आवश्यकता है कि पेनाल्टी नियमित आय का साधन नहीं है। यदि इस विषय पर राज्य और केंद्रों के बीच मतभेद हैं तो केंद्र सरकार को पहल करनी चाहिए और बातचीत के माध्यम से राज्य सरकार की चिंताओं को दूर किया जाना चाहिए। इसके साथ यदि राज्य सरकारें इस विषय पर अपना कानून बनाना चाहती हैं तो उनके पास भी संवैधानिक विकल्प उपलब्ध हैं, जिनका उन्हें प्रयोग करना चाहिए। क्योंकि नागरिकों को सुरक्षित परिवहन व्यवस्था उपलब्ध कराना राज्य का कर्तव्य है। जिससे समस्त नागरिक एक स्वस्थ और सुरक्षित माहौल में अपने गंतव्य स्थल तक जा सके।<br />
<strong><em>-कुलिन्दर सिंह यादव</em></strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/increasing-controversy-over-motor-vehicle-act/article-10391</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/increasing-controversy-over-motor-vehicle-act/article-10391</guid>
                <pubDate>Sun, 08 Sep 2019 13:45:27 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2019-09/improvement-technical-accident-controversy-over-motor-vehicle-act.jpg"                         length="75490"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>बैंक  पुन: पूँजीकरण और बैंकिंग सुधार</title>
                                    <description><![CDATA[चालू वित्त वर्ष में सार्वजनिक बैंकों में 650 अरब रुपये की पूँजी डालने का बजट प्रावधान रखा था सरकार ने चालू वित्त वर्ष में सार्वजनिक बैंकों में 650 अरब रुपये की पूँजी डालने का बजट प्रावधान रखा था। इसमें से 420 अरब (Bank Re-capitalization and Banking Improvement) रुपए का आवंटन अब भी होना है।इसका आशय […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><h1>चालू वित्त वर्ष में सार्वजनिक बैंकों में 650 अरब रुपये की पूँजी</h1>
<h1>डालने का बजट प्रावधान रखा था</h1>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने चालू वित्त वर्ष में सार्वजनिक बैंकों में 650 अरब रुपये की पूँजी डालने का बजट प्रावधान रखा था। इसमें से 420 अरब (Bank Re-capitalization and Banking Improvement) रुपए का आवंटन अब भी होना है।इसका आशय है कि मार्च 2019 तक सार्वजनिक बैंकों के भीतर कुल 830 अरब रुपये डाले जाने हैं। इस तरह चालू वित्त वर्ष के दौरान इन बैंकों में डाली जाने वाली कुल पूँजी 1.06 लाख करोड़ रुपये पहुँच जाएगी। अब प्रश्न उठता है कि बैंकों को इतनी अधिक पूँजी की जरुरत क्यों है?दरअसल फंसे कर्जों के लिए वित्तीय प्रावधान करने से उनके पास पूँजी घट गई है और वे नए कर्ज भी नहीं दे सकते।इसके अलावा आरबीआई ने 11 सार्वजनिक बैंकों पर सख्त पाबंदियाँ लगाई हुई हैं।अपने तरीके नहीं सुधारने तक उन पर सामान्य बैंकिंग कामकाज की भी पाबंदियाँ लगी हुई हैं।</p>
<h2>इसमें से 420 अरब रुपए का आवंटन अब भी होना है</h2>
<p style="text-align:justify;">केंद्र सरकार के अनुसार बैंकों में पूँजी डालने का मकसद बेहतर प्रदर्शन करने वाले बैंकों को त्वरित उपचारात्मक कार्यवाई (पीसीए) से बाहर निकालने (Bank Re-capitalization and Banking Improvement) में मदद करना है। इसके बाद वे दोबारा कर्ज दे सकेंगे।गौरतलब है कि 11 सार्वजनिक बैंकों के पीसीए मामला भी आरबीआई और सरकार के बीच मतभेद का बड़ा कारण बना था। अब सरकार का कहना है कि बैंकों में अतिरिक्त पूँजी डालने से कुछ ऐसे बैंक हैं,जो पीसीए सीमा के करीब हैं,वे सुरक्षित हो जाएंगे तथा 4-5 बैंक पीसीए से बाहर निकल सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पष्ट है कि नई पूँजी डालने से कई कमजोर सरकारी बैंकों को आरबीआई की सख्ती से मुक्ति मिल जाएगी। वित्त मंत्रालय के अनुसार इससे पीएनबी जैसे बैंको को लाभ होगा, जो पीसीए नहीं है और लेकिन पीसीए के करीब है। बैंकों के पुन: पूँजीकरण के अंतगर्त जल्द ही यह निर्णय सरकार करेगी कि किस बैंक में कितनी पूँजी डाली जाएगी। लेकिन सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि बैंक आॅफ बड़ौदा, देना बैंक तथा विजया बैंक में पूँजी डाली जाएगी,जिससे नियामकीय और विकास पूँजी मुहैया करा बैंकों के एकीकरण को सुदृढ़ता प्रदान की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">बैंकिंग क्षेत्र की ऋण वृद्धि दर 15 फीसदी को पार कर चुकी है,जो हमारी जीडीपी रफ्तार से डबल है। लेकिन सरकार को लगता है कि यह काफी नहीं है और बैंकों को और कर्ज देना चाहिए। सरकार को लगता है कि बैंक लोन नहीं देंगे, तो अर्थव्यवस्था की रफ्तार रूक जाएगी। लेकिन अगर वास्तव में बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करना है, तो केवल अतिरिक्त पूँजी डालकर आरबीआई के पीसीए से बाहर लाकर बैंकों को मजबूत नहीं किया जा सकता, अपितु हमारे सार्वजनिक बैंकों की मूल समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">अतीत में भी यह फॉर्मूला बैंकों के लिए खतरनाक साबित हुआ: अतीत में भी बैंकों में इसी तरह से पूंही डाली गयी, लेकिन उससे समस्या सुलझने के बदले और उलझी ही। वर्ष 1985-86 और 2016-17 के बीच सरकार ने इन बैंकों में करीब 1.5 लाख करोड़ डॉलर डाले थे। इसमें से बड़ी पूँजी वर्ष 2008 में लीमन ब्रदर्स के पतन के बाद उभरे वैश्विक आर्थिक संकट के बाद आई। इस संकट के दुष्परिणामों को दूर करने के लिए आरबीआई ने बैंकिंग प्रणाली में पूँजी उड़ेल दी और नीतिगत ब्याज दरों को भी ऐतिहासिक निम्न स्तर पर ले आया। अपने पास काफी पूँजी होने के कारण इन बैंकों ने खुलकर कर्ज बांटे।इसका नतीजा यह निकला कि बैंकों के पास फंसे कर्ज का अंबार खड़ा होने लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में सार्वजनिक बैंकों की स्थिति: यह समय सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों के प्रदर्शन पर नजर डालने के लिए सबसे उपयुक्त है। वित्त वर्ष 2015-16 की दूसरी छमाही में आरबीआई ने पहली बार बैंकों के लिए परिसंपत्ति गुणवत्ता का आकलन किया था।दिसंबर 2015 से लेकर मार्च 2015 तक की पाँच तिमाहियों ने बैंकों ने अपने फंसे कर्जों की शिनाख्त की, लेकिन. उन पर कोई कदम नहीं उठाया गया। इन बैंकों की एनपीए जून के 8.74 लाख करोड़ रुपए से मामूली गिरावट के साथ सितंबर में 8.69 लाख करोड़ रुपये पर आ गई, लेकिन वह सितंबर 2017 के 7.34 लाख करोड़ रुपये की तुलना में काफी अधिक है। यही कारण है कि सितंबर 2018 में शुद्ध एनपीए 4.83 करोड़ रुपये रहा,जो एक वर्ष पूर्व 3.97 लाख करोड़ रुपए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">बैकों का अभूतपूर्व घाटा: इसके अतिरिक्त देश के 21 में से 12 सार्वजनिक बैंक सितंबर तिमाही में घाटे में रहे। इंडियन ओवरसीज बैंक,सेंट्रल बैंक आॅफ इंडिया और यूको बैंक ने इन सभी 12 तिमाहियों में कुल मिलाकर 37,500 करोड़ रुपया का घाटा उठाया। देना बैंक और बैंक आॅफ महाराष्ट्र को भी 11 तिमाही में कुल 94,00 करोड़ का घाटा झेलना पड़ा। कुल मिलाकर इस दौरान सार्वजनिक बैंकों को 1 लाख 84 हजार करोड़ रुपए का घाटा हुआ,जो देश के जीडीपी का करीब 1.2 फीसदी है। यह घाटा काफी बड़ा है।यह घाटा 1986 से 2017 तक बैंकों में डाली गई कुल पूँजी को भी पार कर जाता है। अनुमान है कि दिसंबर तिमाही तक यह घाटा 2.1 लाख करोड़ रुपये की नई पूँजी को भी पीछे छोड़ देगा।<br />
बढ़ता बैंकिंग फ्रॉड और निम्नस्तरीय बैंकिंग कार्यप्रणाली: बैंकों की कार्य संस्कृति कितनी निम्नस्तरीय है,वह पिछले कुछ वर्षों से बैंकिंग फ्रॉड से भी स्पष्ट है। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 4 वर्षों में फ्रॉड की वजह से बैंकों को हुए नुकसान की राशि बढ़कर चार गुनी हो गई। साल 2013-14 में 10,170 करोड़ रुपए के फ्रॉड के मामले आए थे, जबकि 2017-18 में 41,167.7 करोड़ रुपये के मामले पता चले। गौर करने वाली बात यह है कि 1 लाख रुपए से ज्यादा के 93 फीसदी फ्रॉड सरकारी बैंकों में हुए। फ्रॉड के बढ़ते मामलों से भी बैड लोन के आँकड़ों में वृद्धि हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">सार्वजनिक बैंकों की घटती जमा राशि: चार सार्वजनिक बैंकों का अग्रिम पोर्टफोलियो जून तिमाही की तुलना में सितंबर तिमाही में कम हो गया। इनमें से 11 बैंकों का कर्ज आवंटन कम हुआ है। दो बैंकों में तो 10 फीसदी से भी अधिक गिरावट हुई है। इसी तरह सार्वजनिक बैंकों में जमा राशि भी कम हुई है। सात बैंकों का जमा पोर्टफोलियो कम हो गया है।<br />
सकल एनपीए में वृद्धि: 6 बैंकों का सकल एनपीए जून की तुलना में सितंबर तिमाही में बढ़ा है। सितंबर तिमाही में आईडीबीआई बैंक का सकल एनपीए 30 फीसदी अधिक रहा। इसके अतिरिक्त यूको, इंडियन ओवरसीज बैंक, देना बैंक, यूनाइटेड एवं सेट्रल बैंक का सकल एनपीए 20 फीसदी से अधिक रहा,जबकि 6 बैंकों का एनपीए 15% से ज्यादा रहा। शुद्ध एनपीए के मामले में, 9 सार्वजनिक बैंकों का स्तर 10 फीसदी से ऊपर 17.3% फीसदी तक पहुँच गया है। इनमें से कुछ बैंकों का परिसंपत्ति गुणवत्ता सितंबर में और भी खराब हो गई। स्पष्ट है कि बैंकों ने आँखे़ मूँदकर कर्ज बाँटे। फंसे कर्ज की स्थिति को देखकर ऐसा लगता है कि इन बैंकों को कर्ज देने के सही तरीके ही मालूम नहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर बैंकिंग कार्यसंस्कृति यूँ ही रही ,तो सरकार चाहे बैंकों का कितना भी पूँजीकरण कर ले,बैंक पुन: इसी स्थिति में आ जाएगी तथा टैक्स पेयर की गाढ़ी कमाई इसी तरह कर्ज में फंसती रहेगी। फंसे कर्ज में हुई बढ़ोतरी के लिए अर्थव्यवस्था की हालत को दोष देना सही नहीं होगा, क्योंकि उसी परिवेश में निजी क्षेत्रों की बैंकिंग परिसंपत्ति गुणवत्ता बेहतर है। सरकार का कहना है कि बैंक पूंजीकरण से भारतीय बैंक उच्चतर अंतरराष्ट्रीय नियमन मापदंडों का अनुपालन कर सकेंगे। लेकिन सरकार को समझना होगा कि प्रोजेक्ट आकलन, जोखिम प्रबंधन, पर्यवेक्षण और शासन की गुणवत्ता जैसे कठोर बिंदुओं पर ध्यान देने के बजाय सार्वजनिक बैंकों में समय-समय पर पूँजी डालने की परिपाटी अंतत: देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान ही पहुंचाएगी। सार्वजनिक बैंकों के पुर्नपूंजीकरण के निरर्थक प्रवाह से बैंकिंग सुधार के अल्पकालिक लक्ष्य प्राप्त किए जा सकते हैं, लेकिन दीर्घकालिक नहीं। इससे उल्टे बैंकों की कार्य शैली में सुधार पर भी ब्रेक ही लगता है।            <strong><em>राहुल लाल</em></strong></p>
<p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/bank-re-capitalization-and-banking-improvement/article-7311</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/bank-re-capitalization-and-banking-improvement/article-7311</guid>
                <pubDate>Thu, 10 Jan 2019 19:25:59 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विद्यालयी शिक्षा में सुधार की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[हाल ही में शिक्षा की निगरानी के बारे में यूनेस्को द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि 2.8 मिलियन बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। 11 मिलियन बच्चे माध्यमिक स्तर से शिक्षा छोड़ देते हैं और 47 मिलियन बच्चे उच्च माध्यमिक स्तर से विद्यालय छोड़ देते हैं। सच यह है कि देश के कुल बच्चों […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/need-for-improvement-in-school-education/article-3477"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/study.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हाल ही में शिक्षा की निगरानी के बारे में यूनेस्को द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि 2.8 मिलियन बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। 11 मिलियन बच्चे माध्यमिक स्तर से शिक्षा छोड़ देते हैं और 47 मिलियन बच्चे उच्च माध्यमिक स्तर से विद्यालय छोड़ देते हैं। सच यह है कि देश के कुल बच्चों में से एक चौथाई माध्यमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते हैं। देश में 266 मिलियन वयस्क और 33 मिलियन युवा लिख या पढ़ नहीं सकते हैं और भारत जैसे उच्च आर्थिक वृद्धि दर वाले देश के लिए यह बड़े दु:ख की बात है। इस मुद्दे को बार-बार उठाया जाता है कि शिक्षा पर बहुत कम खर्च किया जाता है और यह हमारे सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3.8 प्रतिशत है जिसके चलते शिक्षा की यह स्थिति बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही अध्यापकों में कर्तव्य निष्ठा और समर्पण का अभाव है और शिक्षा से संबंधित कल्याण योजनाओं की निगरानी भी नहीं की जाती। वस्तुत: ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषकर शिक्षा अवसंरचना बड़ी दयनीय स्थिति में है। विद्यालयों में शौचालय, पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं, विद्यालय भवन आदि की दयनीय स्थिति के कारण भी बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते हैं। शहरी क्षेत्रों में बडेÞ-बड़े प्राइवेट स्कूलों में छात्रों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है और इसके चलते देश में विद्यालयी शिक्षा के सभी पहलुओं की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है। विद्यालयी शिक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। विद्यालयी शिक्षा की समस्याएं, शिक्षण का स्तर, विद्यालयों में अनुशासन, पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता, छात्रों के साथ व्यवहार आदि हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विभिन्न सर्वेक्षणों से पता चला है कि शिक्षा के स्तर में गिरावट आयी है और इसका कारण अध्यापकों की उदासीनता है। नए कानूनों के अनुसार अध्यापक छात्रों को अनुशासित करने के लिए उनकी पिटाई नहीं कर सकते हैं। मुख्य मुद्दा अध्यापकों की गुण्वत्ता और अध्यापन के प्रति कर्तव्य निष्ठा है। रिपोर्ट के अनुसार 1297 गांवों में पाया गया कि 24 प्रतिशत ग्रामीण अध्यापक विद्यालय के निरीक्षण के दौरान अनुपस्थित थे। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि छह राज्यों में 619 विद्यालयों के निरीक्षण के दौरान 18.5 अध्यापक अनुपस्थित थे, जिनमें से 9 प्रतिशत छुट्टी पर थे। 7 प्रतिशत अन्य आधिकारिक कार्यों में लगे थे और 2.5 प्रतिशत बिना किसी सूचना के अनुपस्थित थे।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बात को सब स्वीकार करते हैं कि अधिकतर सरकारी स्कूलों में अध्यापन का स्तर बहुत खराब है, हालांकि दक्षिणी राज्यों में इसमें कुछ सुधार आया है। रिपोर्ट के अनुसार प्रभावी नीतिगत कदमों के कारण अध्यापकों की अनुपस्थिति प्रभावित हुई है जिसमें विद्यालय से दूरी, छात्र-अध्यापक अनुपात और कार्य की खराब दशाएं प्रमुख हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्राइवेट ट्यूशन की प्रवृति बढ़ती जा रही है और इससे छात्रों पर शैक्षिक भार बढ़ता जा रहा है। व्यक्तिगत ट्यूशन या उपचारात्मक कक्षाओं से छात्र को लाभ हो सकता है किंतु इस पर खर्च होने वाली राशि से छात्र का कल्याण प्रभावित होता है और अध्यापकों पर दबाव बढ़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राइवेट ट्यूशन की प्रवृति बढ़ती जा रही है। माता-पिता भी सोचते हैं कि प्राइेवट ट्यूशन के बिना उनके बच्चे का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहेगा और अब तो कक्षा 2 और 3 के छात्रों को भी प्राइवेट ट्यूशन लेते हुए देखा जा सकता है। अब तक शिक्षा के स्तर में गिरावट का एक कारण विद्यालयों में अनुशासन का अभाव भी है। अध्यापक छात्रों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने से डरते हैं, जबकि छात्र अपने गृह कार्य करने की परवाह तक नहीं करते हैं। यही नहीं कुछ राज्यों में आठवीं कक्षा तक फेल न करने का निर्णय किया गया है जिससे छात्र पढ़ाई में रूचि ही नहीं लेते हैं। कुछ छात्रों में अच्छे अंकों के साथ पास होने की ललक रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">किंतु विद्यालयों में राजनीति के प्रवेश से वातावरण और खराब हुआ है। अनुशासन भंग हुआ है, छात्रों को अनुशासित करने के लिए पिटाई बंद करने से छात्र अनुशासनहीन हो गए हैं। शिक्षाविद् इस बारे में बहस कर रहे हैं कि क्या छात्रों को अनुशासित करने के लिए दंड आवश्यक है। कुछ का मानना है कि छात्रों द्वार पढ़ाई न करने, गृह कार्य न करने और कक्षा में ध्यान न देने के लिए दंड आवश्यक है। दूसरी ओर छात्रों को प्यार और स्रेह न मिलने के कारण वे अध्यापकों की अवज्ञा करते हैं और उनका सम्मान नहीं करते हैं। संप्रेषण एक कला है और अध्यापक तब तक छात्रों के मन में अपनी पैठ नहीं बना सकते, जब तक वे इस कला में सिद्धहस्त न हों।</p>
<p style="text-align:justify;">पाठ्यक्रम भी महत्वपूर्ण है। अधिकतर राज्य शिक्षा बोर्डों का पाठ्यक्रम पुराना है तथा राज्य स्तर पर पाठ्यक्रम में बदलाव के बारे में कोई विचार नहीं किया जाता है। कुछ राज्यों में पहले पर्यावरण विज्ञान को पढ़ाया जाता था किंतु अब दो-तीन साल से यह भी बंद कर दिया गया है। इन बातों से पता चलता है कि विद्यालयी शिक्षा के प्रति लोगों की निष्ठा नहीं है। चाहे वह विद्यालयों में समुचित सुविधाओं का विकास करना हो या पाठयक्रम विकास हो। इसके लिए पर्याप्त बजट प्रावधान नहीं किया जाता है जिसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों में सुविधाओं का अभाव है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में ऐसी खबरें भी आई थी कि विद्यालयों में शौचालय उपयोग लायक नहीं हैं या छात्रों के शौचालय में पानी नहीं है। विद्यालयों के सामने जल जमाव से छात्रों को विद्यालय पहुंचने में दिक्कत होती है और आशा की जाती है कि प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत सभी विद्यालयों में शौचालय बनाए जाएंगे। विद्यालयी शिक्षा की अनेक समस्सयाएं हैं तथा इनका समाधान आसान नहीं है। किंतु शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए कुछ कदम अवश्य उठाए जा सकते हैं और इसमें सबसे महत्वपूर्ण है कि सभी सरकारी विद्यालयों में अध्यापकों पर कड़ी निगरानी रखी जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए सरकार अध्यापकों के कार्य निष्पादन और छात्रों के प्रति उनके दृष्टिकोण की निगरानी के लिए सेवानिवृत सरकारी अधिकारियों की सेवाएं ले सकता है और इसके लिए उन्हें मानदेय में छोटी सी राशि देनी पड़ेगी और ये अधिकारी जिला मजिस्टेÑट को अपनी त्रैमासिक रिपोर्ट दे सकते हैं। जिसमें वे किसी विकास खंड में विद्यालयों की समस्याओं और उनके निराकरण के लिए उपायों का सुझाव दे सकते हैं। चूंकि वे सेवानिवृत अधिकारी होते हैं इसलिए वे सरकार पर दबाव बना सकते हैं कि विद्यालयों की समस्याओं का निराकरण किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में असमानता को दूर करने तथा देश के दीर्घकालीन विकास के लिए शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आवश्यक है। अधिक जनसंख्या का लाभ हम तब तक नहीं उठा सकते जब तक विद्यालयी शिक्षा में सुधार न किया जाए। प्राथमिक विद्यालयों में सुधार के लिए संसाधन चाहिए, किंतु जिला और विकास खंड स्तर पर विद्यालयों की निगरानी भी की जानी चाहिए जो वर्तमान में न के बराबर है। यदि 100 मिलियन बच्चे लिखना-पढ़ना भी न जानें तो एक परिपक्व अर्थव्यवस्था या लोकतंत्र के रूप में भारत का विकास संभव नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-डा. ओइशी मुखर्जी</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/need-for-improvement-in-school-education/article-3477</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/need-for-improvement-in-school-education/article-3477</guid>
                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 23:57:43 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-11/study.jpg"                         length="79468"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अब खत्म होगा अग्निश्मन वाहनों का टोटा</title>
                                    <description><![CDATA[सराहनीय। शहरों में हाइड्रोलिक प्लेटफार्म व दो टर्न टेबल लैडर खरीदने की प्रकिया शुरू चंडीगढ़(सच कहूँ न्यूज)। प्रदेश सरकार पूरी अग्निश्मन व्यवस्था को एक छत के नीचे ला रही है, ताकि पालिका, हुडा, एचएसआईआईडीसी क्षेत्र में आपत्ति की स्थिति में अग्निश्मन यंत्रों की जरूरत को पूरा किया जा सके। शहरी इलाकों में ऊंचे भवनों को […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/improvement-in-fire-extinguisher-vehicles/article-2722"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/fire-extinguisher.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">सराहनीय। शहरों में हाइड्रोलिक प्लेटफार्म व दो टर्न टेबल लैडर खरीदने की प्रकिया शुरू</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>चंडीगढ़(सच कहूँ न्यूज)।</strong> प्रदेश सरकार पूरी अग्निश्मन व्यवस्था को एक छत के नीचे ला रही है, ताकि पालिका, हुडा, एचएसआईआईडीसी क्षेत्र में आपत्ति की स्थिति में अग्निश्मन यंत्रों की जरूरत को पूरा किया जा सके। शहरी इलाकों में ऊंचे भवनों को ध्यान में रखते हुए 32 मीटर के दो हाइड्रोलिक प्लेटफार्म, 55 मीटर के दो टर्न टेबल लैडर, 70 मीटर ऊंचाई के दो हाइड्रोलिक प्लेटफार्म तथा 101 मीटर का एक प्लेटफार्म खरीदने की प्रक्रिया शुरू की गई है।</p>
<h2>एक छत तले आएगा अग्निश्मन सिस्टम</h2>
<p>शहरी स्थानीय निकाय मंत्री कविता जैन ने बताया कि प्रदेश में अग्निश्मन सेवाओं की स्थिति को सुधार लाने के मकसद से जहां पूरी व्यवस्था को एक छत के नीचे लाया जा रहा है, वहीं विभाग को ढांचागत मजबूती देने के लिए संसाधनों को जुटाने पर काम किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पालिकाओं में अग्निश्मन वाहनों की कमी को देखते हुए विभाग ने सबसे पहले 56 अग्निश्मन गाड़ी तथा 102 अग्निश्मन यंत्र चालित मोटरसाइकिल खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। अब इनके संबंध में निविदाएं आमंत्रित की जा चुकी हैं। उन्होंने बताया कि इन वाहनों की खरीद पूरी होने से प्रदेश के ग्रामीण, शहरी इलाकों में अग्निश्मन वाहनों की कमी दूर होने के साथ-साथ अग्निशमन सेवाओं में और सुधार आएगा ।</p>
<h3 style="text-align:justify;">दमकल वाहनों पर खर्च होंगे 35 करोड़</h3>
<p style="text-align:justify;">कविता जैन ने बताया कि वर्ष 2015-16 के दौरान 74 अग्निश्मन वाहन तैयार कराए गए थे और 10 करोड़ रूपए की राशि खर्च करते हुए 34 छोटे अग्निश्मन वाहन तैयार कराए गए। वर्तमान वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान 35 करोड़ रूपए के बजट का निर्धारण अग्निश्मनों सेवाओं को दुरूस्त करने के लिए किया गया है। उन्होंने बताया कि तीनों विभागों के तहत आने वाले कर्मचारी, अधिकारियों को एक छत के नीचे लाकर न केवल व्यवस्था को सुदृढ करने के प्रयास किए जाएंगे, अपितु उनकी क्षमता के बेहतर उपयोग पर जोर दिया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/improvement-in-fire-extinguisher-vehicles/article-2722</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/improvement-in-fire-extinguisher-vehicles/article-2722</guid>
                <pubDate>Sun, 30 Jul 2017 07:42:53 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-07/fire-extinguisher.jpg"                         length="63624"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>टैंक निर्माण से होगा किसानों के जीवन स्तर में सुधार</title>
                                    <description><![CDATA[ मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान द्वितीय चरण जयपुर (सच कहूँ न्यूज)। प्रदेश की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे की दूरगामी सोच का पूरे राज्य में सफलता पूर्वक क्रियान्वयन किया जा रहा है, वही मुख्यमंत्री जल स्ववलम्बन अभियान का द्वितीय चरण बहुआयामी कायाकल्प का अभियान साबित हो रहा है। इस अभियान से प्रदेश में हर व्यक्ति की पेयजल […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/improvement-in-living-standard-of-the-farmers-by-water-campaign/article-1839"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/vasundhara.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;"> मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान द्वितीय चरण</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>जयपुर (सच कहूँ न्यूज)।</strong> प्रदेश की मुख्यमंत्री श्रीमती वसुन्धरा राजे की दूरगामी सोच का पूरे राज्य में सफलता पूर्वक क्रियान्वयन किया जा रहा है, वही मुख्यमंत्री जल स्ववलम्बन अभियान का द्वितीय चरण बहुआयामी कायाकल्प का अभियान साबित हो रहा है। इस अभियान से प्रदेश में हर व्यक्ति की पेयजल संबंधित समस्या का समाधान होगा वही क्षेत्र व प्रदेश के विकास को ओर गति मिल सकेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">दौसा जिले में मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान द्वितीय चरण के अन्तर्गत जिला कलेक्टर नरेश कुमार शर्मा की अध्यक्षता में जिला स्तरीय समिति, मुख्य कार्यकारी अधिकारी, जिला परिषद, दौसा नॉडल अधिकारी, के निर्देशन में, अधीक्षण अभियन्ता मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान, अधीशाषी अभियन्ता वाटरशेड सेल कम डाटा सेन्टर, जिला परिषद दौसा, के द्वारा कार्य सम्पादित किया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिले में 9 दिसम्बर 2016 को मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान द्वितीय चरण का शुभारम्भ जिला प्रभारी मंत्री अरूण चतुवेर्दी ने ग्राम पंचायत सैथल के ग्राम भैयापुरा में भाटी की बगीची सैथल में मिनी परकोलेशन टैंक निर्माण में श्रमदान कर शुभारम्भ किया। मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान के द्वितीय चरण में जिले की 37 ग्राम पंचायतों के 130 ग्रामों का चयन किया गया है इसके तहत 2266 कार्य विभिन्न विभागों के द्वारा करवाए जाएंगे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सरकार के प्रयास सराहनीय</h3>
<p style="text-align:justify;">जिला प्रभारी मंत्री अरूण चतुवेर्दी ने कहा कि प्रदेश को जल के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के लिए राज्य सरकार द्वारा हर सम्भव प्रयास किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान की सफलता के लिए हर ग्रामीण को सहयोग करना होगा। यह आम जन का अभियान है। समारोह में विधायक शंकर लाल शर्मा ने पेयजल समस्या के निस्तारण के लिये सभी ग्रामवासी जल संरक्षण में सहयोग कर मुख्यमंत्री जल स्वावलम्बन अभियान को सफल बनाने का आग्रह किया।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/improvement-in-living-standard-of-the-farmers-by-water-campaign/article-1839</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/improvement-in-living-standard-of-the-farmers-by-water-campaign/article-1839</guid>
                <pubDate>Sat, 01 Jul 2017 08:03:26 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-07/vasundhara.jpg"                         length="68621"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कुछ नया करने पर शुरू में दिक्कतें, बाद में सुधार : जेटली</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने को लेकर हो रहे विरोध के बीच वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि कुछ नया करने पर शुरू में दिक्कतें आती हैं, लेकिन उसमें सुधार कर लिया जाता है। जीएसटी लागू होने से चंद घंटे पहले यहां एक टेलीविजन चैनल के सम्मेलन में जेटली ने […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/arun-jaitley-speak-about-gst/article-1805"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/arun-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने को लेकर हो रहे विरोध के बीच वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि कुछ नया करने पर शुरू में दिक्कतें आती हैं, लेकिन उसमें सुधार कर लिया जाता है। जीएसटी लागू होने से चंद घंटे पहले यहां एक टेलीविजन चैनल के सम्मेलन में जेटली ने कहा कि पिछले 70 साल में किसी विधेयक पर इतनी बहस नहीं हुई है जितनी जीएसटी पर हुई है। इसके लागू होने को बड़ा मौका बताते हुए उन्होंने कहा कि बड़े कदमों से ही देश की तकदीर बदलती है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">नेताओं की अहम भूमिका</h2>
<p style="text-align:justify;">इसे लागू करने में कई नेताओं की अहम भूमिका रही है। कई राज्यों के मंत्रियों ने इसे पास कराने में काफी मदद की है। इस पर सबकी सहमति के लिए सरकार ने कई बैठकें कीं। कई बैठकें तो दो-तीन दिन तक चली। देश की आजादी के बाद जीएसटी को सबसे बड़े आर्थिक सुधार के रूप में देखा जा रहा है। जेटली ने कहा कि जीएसटी पर सब कुछ केन्द्र ने तय नहीं किया है। केन्द्र सरकार के साथ 31 राज्य सरकारों ने कई दौर की बैठकों के बाद इस पर आम सहमति बनाई है।</p>
<p style="text-align:justify;">जीएसटी को लेकर लोगों में घबराहट की जिक्र करते हुए जेटली ने कहा हम एक नयी व्यवस्था में आ रहे हैं। इसकी वजह से लोगों में घबराहट है। व्यापारियों की दिक्कतों पर उन्होंने कहा कि जीएसटी के तहत सभी रिटर्न सॉफ्टवेयर से भरे जायेंगे। इससे उनको कोई दिक्कत नहीं होगी। देश का एक बड़ा व्यापारी वर्ग नयी कर व्यवस्था के पक्ष में है।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/arun-jaitley-speak-about-gst/article-1805</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/arun-jaitley-speak-about-gst/article-1805</guid>
                <pubDate>Fri, 30 Jun 2017 08:21:39 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-06/arun-2.jpg"                         length="53731"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जीएसटी: कर सुधार का बड़ा कदम</title>
                                    <description><![CDATA[आज बाजार में एक ही चर्चा सुनी जा रही है, वह चर्चा है जीएसटी की। जीएसटी के बारे में सरकार अपने विभिन्न प्रयासों से व्यापारी और आम जनता का भ्रम दूर करने का हर संभव प्रयत्न कर रही है। इसके बाद भी जीएसटी के बारे में कुछ व्यपारियों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/gst-big-step-to-tax-improvement/article-1774"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/gst-logo.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज बाजार में एक ही चर्चा सुनी जा रही है, वह चर्चा है जीएसटी की। जीएसटी के बारे में सरकार अपने विभिन्न प्रयासों से व्यापारी और आम जनता का भ्रम दूर करने का हर संभव प्रयत्न कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद भी जीएसटी के बारे में कुछ व्यपारियों में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इसके कारण कहीं विरोध के स्वर सुनाई दे रहे हैं तो कहीं आर्थिक मामलों के जानकार इसे अभूतपूर्व कदम बता रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों प्रकारों के स्वरों के उभरने से ऐसा लग रहा है कि वास्तव में जीएसटी समस्या है या फिर समाधान। अगर समस्या है तो सरकार को समाधान कारक कदम उठाना चाहिए। कहा जा रहा है कि जीएसटी के बारे में अनभिज्ञता ही समस्या है। जो धारणा है वह शीघ्र ही समाप्त होगी, ऐसा विश्वास भी कुछ व्यापारियों को है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में पूरे देश को एक समान कर प्रणाली में लाने वाला जीएसटी कर सुधार का सबसे बड़ा पर्याय माना जा रहा है। इससे जहां व्यापारियों को कर जमा करने में आसानी होगी, वहीं आम जनता पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को भी कम किया जा सकेगा। फिलहाल देश में यही दिखाई देता था कि व्यापारी कई स्तर पर माल की कीमत तय करता था।</p>
<p style="text-align:justify;">जीएसटी के लागू हो जाने से व्यापारी स्तर पर होने वाली मूल्य वृद्धि पर लगाम लगाई जा सकेगी और कई जगह लगाए जाने वाले कर से भी मुक्ति मिलेगी। अभी देश में ऐसा देखने में आ रहा था कि शोरुम पर बिकने वाली कोई वस्तु साधारण दुकान से काफी महंगी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">शोरुम वाले वस्तु को सजाने के लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री का दाम भी ग्राहक के खाते में जोड़ देते हैं, जिससे उपभोक्ता की जेब पर अनावश्यक बोझ बढ़ जाता था।</p>
<p style="text-align:justify;">जीएसटी के लागू होने से वस्तु की कीमत हर जगह एक ही होगी। इसके साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि इससे व्यापारियों पर कुछ भी प्रभाव नहीं होगा, जो कर लगेगा वह सीधे जनता से ही वसूल किया जाएगा। हालांकि यह भी सत्य है कि जनता पर करों का बोझ पहले से ही था, लेकिन जीएसटी के लागू हो जाने के बाद इन करों में पारदर्शिता आएगी, जिसे जनहितकारी कदम निरुपित किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जुलाई से जीएसटी की दरें लागू होने से आपकी जेब पर इसका क्या असर पड़ेगा इसे जानना आपके लिए बहुत जरूरी है। 1 जुलाई से लागू होने जा रहा है एक समान कर वाला जीएसटी यानि गुड्स एंड सर्विसिस टैक्स एक ऐसा टैक्स है जो टैक्स के बड़े जाल से मुक्ति दिलाएगा। जीएसटी आने के बाद बहुत सी चीजें सस्ती हो जाएंगी, जबकि कुछ जेब पर भारी भी पड़ेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन सबसे बड़ा फायदा होगा कि टैक्स का पूरा सिस्टम आसान हो जाएगा। 18 से ज्यादा टैक्सों से मुक्ति मिलेगी और पूरे देश में सिर्फ एक टैक्स जीएसटी।</p>
<p style="text-align:justify;">अब जबकि यह विधेयक लागू होने जा रहा है तो इसकी अलग-अलग परतों पर चर्चा करना आवश्यक हो जाता है। एक तरफ अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह अर्थव्यवस्था में एक नई जान फूंकेगा, तो कुछ पार्टियों और राज्य इसे लागू करने के विरोध में भी हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ उलझनों के बावजूद सरकार और अधिकांश आर्थशास्त्री इसे स्वतंत्रता के बाद भारत का सबसे बड़ा कर सुधार का कदम मान रहे हैं और इसके पीछे उनका तर्क है कि जीएसटी देश की टेढ़ी कर व्यवस्था को पटरी पर लाएगा और लाल फीताशाही को कम करेगा। गौरतलब है कि ये अकेला टैक्स, सामान के शहर में प्रवेश पर लगने वाले कर, एक्साइज ड्यूटी, सर्विस टैक्स और अन्य राज्य स्तरीय करों की जगह ले लेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारों के अनुसार, इससे मेक इन इंडिया प्रोग्राम को प्रोत्साहन तो मिलेगा ही, क्योंकि व्यापार क्षेत्र में उच्च कर दरों और लाल फीताशाही के कारण वर्तमान में व्यापार को 5 से 10 प्रतिशत का नुकसान होता है। जाहिर है, यह एक बड़ा आंकड़ा है और अगर गुड्स एन्ड सर्विसेज टैक्स जीएसटी, इस गैप को भरने में कामयाब रहता है तो एक बड़ी उपलब्धि के साथ-साथ अर्थव्यवस्था में भी एक निश्चित उछाल आ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जीएसटी की महत्ता को हम कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि भारत के एक राज्य में बनने वाला सामान जब देश के किसी दूसरे हिस्से में पहुंचता है तो उस पर कई बार टैक्स लग जाता है। इस स्थिति से जीएसटी छुटकारा दिला सकता है। जीएसटी का जो सबसे बड़ा फायदा बताया जा रहा है, उसके अनुसार टैक्स वो राज्य सरकारें वसूलेंगी, जहां उत्पाद की खपत होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्ञातव्य हो कि इससे पहले टैक्स वसूली वहां होती थी, जहाँ सामान बनता था और खपत वाले राज्यों में भी वैट इत्यादि से सरकारें अपनी आमदनी बढ़ाने का जरिया खोजती थीं। ऐसे में उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे कम विकसित राज्यों को अधिक संसाधन मिलेंगे क्योंकि वहां उपभोक्ताओं की बड़ी संख्या है।</p>
<p style="text-align:justify;">समझना मुश्किल नहीं है कि क्यों बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जीएसटी पर मोदी सरकार के सुर में सुर मिलाते नजर आये थे। साफ है कि यह व्यवस्था भारत के विभिन्न राज्यों के बीच राजस्व के बराबरी वाली वितरण व्यवस्था के रूप को प्रोत्साहन देती है। इस कानून का एक बड़ा फायदा यह भी बताया जा रहा है कि यह टैक्स वसूली में मदद करेगा और देश में कर चोरी को कम करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के अनुसार, यह पूरा तंत्र इलेक्ट्रॉनिक प्लेटफॉर्म पर तैयार किया जा रहा है इसलिए हर भुगतान का एक डिजिटल मार्क होगा, जिसे तलाशना आसान होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">जो व्यापारी जीएसटी का विरोध कर रहे हैं, उनके बारे में यही कहा जा सकता है कि वह इसका विरोध नाजायज तरीके से कर रहे हैं। क्योंकि व्यापारी जो कर अदा करता है, उसे वह जनता से वसूल करता है। जब देश की जनता कर देने का तैयार है तो फिर व्यापारी क्यों विरोध कर रहे हैं। एक व्यापारी ने तो यहां तक कहा कि जीएसटी लागू होना देश हित में उठाया गया एक क्रांतिकारी कदम है।</p>
<p style="text-align:justify;">जीएसटी के आने के बाद किसी भी प्रकार की बेईमानी के अवसर समाप्त हो जाएंगे। जो व्यापारी नम्बर दो की राह पर चलकर देश का अहित कर रहे हैं, उनके सामने कठिनाई आएगी, लेकिन जो ईमानदारी से अपने व्यापार का संचालन कर रहे हैं, उन्हें किसी भी प्रकार की कोई शंका नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में जीएसटी को जिस प्रकार से देश में कर सुधार का बड़ा कदम बताया जा रहा है, उसकी गंभीरता को देखते हुए व्यापारी को भी सरकार का साथ देना चाहिए और बाजार में पारदर्शिता लाने का प्रयास करना चाहिए। हां अगर यह व्यापारियों के समक्ष समस्या पैदा करेगा तो निश्चित ही सरकार को भी इसका गंभीरता पूर्वक चिन्तन करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार के अनुसार जीएसटी स्वतंत्रता के बाद कर सुधार का सबसे बड़ा कदम है, जिससे जीडीपी में वृद्धि और रोजगारों का सृजन होगा। केंद्रीय वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा कि जीएसटी व्यवस्था आने से भारत एक बड़े और एकीकृत बाजार के रूप में तब्दील होगा और जटिल करारोपण खत्म होने से विदेशी निवेशकों को आसानी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">एसोचैम के अनुसार छोटे या मध्यम उद्योग समूह, जो असंगठित क्षेत्र में कार्य कर रहे हैं, को इस टैक्स सुधार कानून से काफी फायदा होगा। जीएसटी से कर संकलन में हो रहे कई तरह के व्यर्थ के खर्चों को रोकने में सहायता मिलेगी, जिससे राज्यों की आर्थिक हालात में सुधार होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">जीएसटी से उन राज्यों को फायदा होगा, जहां टैक्स लीकेज की वजह से कर संकलन प्रणाली में भ्रष्टाचार चरम पर है। जीएसटी लागू होने से हर सौदा इस कर व्यवस्था के तहत आ जाएगा, जिससे लोगों के लिए करों की चोरी कर पाना आसान नहीं होगा, इसीलिये जीएसटी को काले धन से निबटने के विरुद्ध मजबूत हथियार के तौर पर देखा जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुरेश हिन्दुस्थानी</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/gst-big-step-to-tax-improvement/article-1774</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/gst-big-step-to-tax-improvement/article-1774</guid>
                <pubDate>Thu, 29 Jun 2017 23:42:59 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-06/gst-logo.jpg"                         length="50416"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रारम्भिक व उच्च शिक्षा नीतियों में सुधार की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तर प्रदेश व हरियाणा में नकल की समस्या, बिहार में शिक्षा परीक्षा परिणामों में भ्रष्टाचार की बदौलत हेर-फेर, उस पर पिछली केन्द्र सरकार द्वारा आठवीं तक बच्चों को फेल न करने की लागू की गई नीति ने देश में शिक्षा का बंटाधार कर रखा है। पिछले वर्ष भी बिहार में दसवीं, बाहरवीं के परिणामों में […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/need-for-improvement-in-early-and-higher-education-policies/article-856"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/copy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश व हरियाणा में नकल की समस्या, बिहार में शिक्षा परीक्षा परिणामों में भ्रष्टाचार की बदौलत हेर-फेर, उस पर पिछली केन्द्र सरकार द्वारा आठवीं तक बच्चों को फेल न करने की लागू की गई नीति ने देश में शिक्षा का बंटाधार कर रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले वर्ष भी बिहार में दसवीं, बाहरवीं के परिणामों में टॉप रहे विद्यार्थी मीडिया को अपने पूरे विषय तक नहीं बता सके थे। यहां तक कि लड़कियों में अव्वल रही रुबी ने पॉलिटीकल साइंस को खाना बनाने का विज्ञान बताया था। इस वर्ष 12वीं परीक्षा में अव्वल रहे विद्यार्थी गणेश, जिन्हें संगीत विषय में 70 में से 65 अंक दिए गए हैं, संगीत का क-ख भी नहीं बता पाए।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां तक कि उसके खिलाफ परीक्षा में धोखाधड़ी का केस दर्ज हो गया और उनकी गिरफ्तारी हो गई। स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त पत्राचार से हो रही उच्च शिक्षा भी सवालों के घेरे में है, यहां विद्यार्थियों को स्नातक परा- स्नातक की डिग्री दी जा रही है, जबकि उनका विषय ज्ञान सैकेंडरी स्तर तक भी नहीं होता। पत्राचार प्रणाली विश्वविद्यालयों के लिए कामधेनू गाय की तरह हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां न आधारभूत ढांचे की जरूरत है और ना ही विषयों के अध्यापकों की आवश्यकता है और प्रतिवर्ष करोड़ों रूपए फीस के इक्ट्ठे हो जाते हैं। प्रति वर्ष हजारों-लाखों विद्यार्थियों को पोस्ट ग्रेजुएट बना दिया जाता है। हालांकि पत्राचार शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ उन विद्यार्थियों को परिपूर्ण बनाना था, जो अपनी उम्र या नौकरी की वजह से पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन अब अधिकतर विद्यार्थी इसी प्रणाली पर निर्भर हो गए हैं। शिक्षा क्षेत्र में निम्न स्तर की शिक्षा नीतियां एवं कार्यशैली ने भारत की एक पूरी पीढ़ी को बेवकूफ बना दिया है, जिनके पास प्रमाणपत्र तो ऊंची से ऊंची शिक्षा के हैं, लेकिन ज्ञान के नाम पर उनके दिमाग खाली ही हैं। केन्द्रीय व राज्य स्तर पर शिक्षा के गिर रहे स्तर को सुधारने में शीघ्र ही प्रभावी निर्णय लागू करने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वप्रथम आठवीं तक फेल न करने की नीति को तत्काल हटाया जाए, इससे शिक्षकों पर जहां पढ़ाने का उत्तरदायित्व होगा, वहीं विद्यार्थी भी ढंग से पढ़ेंगे। नकल व परीक्षा परिणामों में भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर दण्डात्मक कार्रवाई की जानी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">पत्राचार शिक्षा हालांकि उपयोगी है, लेकिन इसमें प्रवेश, शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली में सुधार करने होंगे, ताकि पत्राचार माध्यम से की जा रही शिक्षा भी अच्छे नागरिक व पेशेवर तैयार कर सके। देश की समस्त शिक्षा नीति एक समान हो एवं दुनिया के विकसित राष्ट्रों की प्रतिस्पर्धा कर सके।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/need-for-improvement-in-early-and-higher-education-policies/article-856</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/need-for-improvement-in-early-and-higher-education-policies/article-856</guid>
                <pubDate>Sat, 03 Jun 2017 22:04:54 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2017-06/copy.jpg"                         length="56802"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        