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                <title>चीन के आर्थिक हितों पर प्रहार करने की जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[चीन ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किये जाने के प्रस्ताव को संरासंघ की सुरक्षा परिषद में वीटो कर दिया। यह कोई अप्रत्याशित नहीं था, सामरिक व आर्थिक हितों के नजरिये से चीन को पाक की जरूरत है। उसने चौथी बार जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">चीन ने मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किये जाने के प्रस्ताव को संरासंघ की सुरक्षा परिषद में वीटो कर दिया। यह कोई अप्रत्याशित नहीं था, सामरिक व आर्थिक हितों के नजरिये से चीन को पाक की जरूरत है। उसने चौथी बार जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के प्रस्ताव को वीटो किया। जैसे चीन ने मामले को अंतिम समय तक लटकाये रखा और जिस तरह तकनीकी आधार बताकर प्रस्ताव को रोका? वह चीन की नीयत को दशार्ता है। घटनाक्रम के कई निष्कर्ष हमारे सामने हैं। ये पहला मौका नहीं है जब चीन ने इस तरह की हरकत से भारत को चिढ़ाया हो।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान के साथ हाल ही में उत्पन्न तनाव के बाद चीन ने जिस तरह से सहयोगात्मक रुख अपनाते हुए पाकिस्तान को इकतरफा समर्थन देने से परहेज किया। उससे ऐसा लगने लगा था कि वह भारत के साथ खड़ा होने को तैयार है किंतु अमेरिका, फ्रांस और ब्रिटेन जैसी महाशक्तियों द्वारा सुरक्षा परिषद में अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित किये जाने के लिए लाये गए प्रस्ताव को चीन ने ये कहकर रोक दिया कि बिना पर्याप्त सबूतों के ऐसा करना उचित नहीं होगा। पुलवामा में आंतकी हमले के बाद भारत की ओर से की गयी एयर स्ट्राइक से पूरे देश में पाकिस्तान के खिलाफ गुस्सा है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में चीन द्वारा पाकिस्तान में बैठे आंतकी सरगना मसूद अजहर का बचाव करने के चलते पाकिस्तान के साथ चीन के प्रति भी गुस्सा चरम पर है। वहां से ये अभियान उभर कर आया कि हमें चीन समेत उन सब देशों को सबक सिखाना चाहिए जो भारत के हित के खिलाफ नजर आते हों।चीन भारत का सबसे बड़ा कारोबार सहयोगी है। भारत में आयात किए जाने वाले सामान में गिफ्ट आइटम्स, टीवी, कम्प्यूटर के सामान, फोन और लैंप्स वगैरह शामिल हैं। देश में चीनी वस्तुओं का कारोबार इतना व्यापक है कि बीते साल दीवाली के त्योहार से पहले वाले कुछ हफ्ते में ही केवल दिल्ली में 1000 करोड़ के उत्पाद बिक चुके थे। इस समय होली का त्योहार सामने है। भारतीय बाजार चीनी उत्पादों से पटे पड़े हैं। भारत को डब्ल्यूटीओ का सदस्य होने के नाते चीनी वस्तुएं आयात करना आवश्?यक हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन और भारत का व्यापारिक साझेदारी 4.6 लाख करोड़ का है, और चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है। इस कारण भारत को चीन से व्यापारिक साझेदारी खत्म करने में दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। भारत में स्वदेशी वस्तुओं के निर्माण की प्रक्रिया कुंद-सी पड़ गई है। भारत निर्यात की तुलना में 7 गुना ज्यादा माल चीन से आयात करता है। भारत इलेक्ट्रानिक के 32.02, न्यूक्लियर रिएक्टर, बायलर्स और पार्ट्स के 17.01 प्रतिशत, आर्गनिक केमिकल्स 9.83 प्रतिशत फटिलाइजर्स 5.3 प्रतिशत आयात करता है। कृषि और आज के मानव का अहम हिस्सा मोबाइल जब हम चीन से आयात करने पर मजबूर हैं फिर चीन के साथ व्यापार बंद करना उचित नहीं लगता।<br />
महात्मा गांधी ने कहा था, कि हमें विदेशी वस्तुओं के उपयोग से मुक्त होने की जरूरत है, लेकिन उन्होंने यह भी कहा था कि ऐसा तभी होगा, जब हम खुद अपनी चीजें बनाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">जब मोदी की महत्वाकांक्षी योजना श्मेक इन इंडियाश् में भी विदेशी निवेश हो रहा है, फिर बहिष्कार की बात नाकाफी दिखती है। चीन को केवल हम उसके टिकाऊपन के खिलाफ मात दे सकते हैं। त्योहारों के सीजन में चीनी झालरों और पटाखों के इस्तेमाल न करने से केवल हम बहिष्कार की मुहिम नहीं चला सकते हैं। भारत वर्तमान में चीन से आयरन और स्टील 5.82 प्रतिशत, प्लास्टिक और उससे बनी चीजें 2.74 प्रतिशत, फोटोग्राफी उपकरण 2.09 प्रतिशत, बोट्?स 2.05 प्रतिशत, आयरन व स्टील से बनी चीजें 1.92 प्रतिशत और रेलवे के अलावा अन्य वाहनों के 1.81 प्रतिशत पुर्जे खरीदता है। दक्षिण एशिया में अपना प्रभुत्व बढ़ाने के रास्ते में वह भारत को सबसे बड़ा रोड़ा मानता है। पाकिस्तान से खैरात में मिली जमीन पर वन</p>
<p style="text-align:justify;">बेल्ट वन रोड के उसके महत्वाकांक्षी प्रकल्प में भारत ने जिस तरह अड़ंगा लगाया उससे भी वह भीतर-भीतर काफी नाराज है। पुलवामा हमले के बाद के घटनाचक्र में भले ही उसने भारत के साथ सौजन्यतापूर्ण व्यवहार किया हो किन्तु उसे ये डर भी सता रहा था कि पाकिस्तान के पूरी तरह दब जाने से भारत का पलड़ा यदि भारी हो गया तब वह चीन के दूरगामी हितों के लिए नुकसानदेह होगा। पाक अधिकृत कश्मीर में भारत के संभावित हस्तक्षेप और बलूचिस्तान की आजादी की मुहिम को भारत का अप्रत्यक्ष समर्थन भी चीन की परेशानी का कारण हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पहला यह कि भले ही भारत वैश्विक सहयोग के तमाम मंचों पर चीन के साथ खड़ा हो मगर चीन भारत के मुकाबले पाक को तरजीह देगा। पाक न केवल उसका सामरिक सहयोगी है बल्कि चीन के साम्राज्यवादी मंसूबों को पूरा करने वाली वन बेल्ट, वन रोड जैसी महत्वाकांक्षी योजना का साझीदार भी है। पाकिस्तान में कई विद्युत व बड़ी परियोजनाएं चीन के द्वारा पूरी की जा रही हैं। इसके अलावा चीन को शिनजियांग प्रांत में उईगर चरमपंथियों से मुकाबले के लिये पाक की मदद की जरूरत होती है। चीन भविष्य के अफगानिस्तान में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका चाहता है और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन के लिये उसे पाक की जरूरत होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन के हुक्मरान मोदी सरकार से अच्छे रिश्ते बनाकर चल रहे हैं लेकिन वे पाकिस्तान को छोडने की हिम्मत भी नहीं कर पा रहे क्योंकि चीन ने वहां बड़ी मात्रा में पूंजी का निवेश कर रखा है। बहरहाल अब जबकि उसने एक बार फिर भारत के विरुद्ध पाकिस्तान का साथ देने की नीति अपनाई है इसलिए हमें भी उसे अपनी नाराजगी का एहसास करवाना चाहिये। मौजूदा दौर की विश्व राजनीति में चीन निश्चित रूप से एक बड़ी ताकत है। आर्थिक दृष्टि से भी पश्चिमी देशों की ये मजबूरी हो गई है कि वे चीन के साथ रिश्ते कायम रखें क्योंकि लगभग सभी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का अरबों-खरबों का निवेश चीन में हो चुका है। ऐसी स्थिति में भारत के पास केवल एक ही तरीका है जिससे चीन के ऊपर दबाव बनाया जा सकता है और वह है चीनी सामान के उपयोग को घटाना।</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व व्यापार संगठन से बंधा होने की वजह से सरकारी स्तर पर ज्यादा कुछ किये जाने की स्थिति तो नहीं है लेकिन गैर राजनीतिक संगठनों के जरिये चीनी सामान के विरुद्ध माहौल बनाया जा सकता है। स्वदेशी जागरण मंच जैसे संगठन इस बारे में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर सकते हैं। इस बारे में एक बात उल्लेखनीय है कि भारत की जनता राष्ट्र की सुरक्षा और सम्मान को लेकर बहुत ही भावुक और संवेदनशील है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और चीन सहित दूसरे कई देश यहां अपना सामान बेचकर खुद को और अपने देश को मजबूत बना रहे हैं। इसलिए जब हम लोग चीन के सामान का बहिष्कार करेंगे तो चीन की अर्थव्यवस्था को बड़ा नुकसान होगा। यह करना इसलिए जरूरी है कि आज चीन पाकिस्तान का परोक्ष व अपरोक्ष रूप से सहयोग कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कभी ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी का पानी रोककर तो कभी पाकिस्तानी आतंकियों का समर्थन करके। इसलिए भारत की जनता को अब चीन को सबक सिखाने के लिए उसके खिलाफ खड़ा होना चाहिए और चीनी सामानों का बहिष्कार करना चाहिए। चीन के हालिया रवैये से जो उम्मीद जागी थी वह सुरक्षा परिषद में उसकी शरारत से खत्म हो गई है। केंद्र सरकार ने तो कूटनीतिक मयार्दाओं के मुताबिक प्रतिक्रिया दे दी लेकिन जनता को भी चीन के विरुद्ध संगठित होना पड़ेगा। आधुनिक चीन के प्राण उसके व्यापार में बसते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उस पर चोट होते ही वह सीधा हो जाएगा। ज्यादा न सही यदि महीने भर भी उसके सामान का आयात कम हो जाये तो उसके सुर बदल जाएंगे। वहीं एक बात और महत्वपूर्ण है कि भारत छोटे-मोटे सामान पर प्रतिबंध लगाकर सम्पूर्ण व्यापार बंद नहीं कर सकता है। अगर चीन को पाकिस्?तान प्रेम की सजा सुनाना है, वह भी व्यापार बंद करके, तो इसके लिए जरूरी बुनियादी स्तर पर उद्योग-धंधों को विकसित करना होगा। स्वदेशी पर बल देना होगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. श्रीनाथ सहाय</strong></p>
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<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 Mar 2019 21:56:25 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>मुझे आरक्षण चाहिए, क्या नेता कृपा करेंगे?</title>
                                    <description><![CDATA[कोटा और कतारें भारतरीय राजनीति के लिए अभिशाप रहे हैं। जिनके चलते हमारे नेतागण लोकप्रिय वायदे करते रहे, वोट बैंक की खातिर कदम उठाते रहे और अपने मतदाताओं को खुश करने के लिए मूंगफली की तरह आरक्षण बांटते रहे। यह हमारे 21वीं सदी के भारत की दशा को दर्शाता है जिसमें कोटा का तात्पर्य है […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">कोटा और कतारें भारतरीय राजनीति के लिए अभिशाप रहे हैं। जिनके चलते हमारे नेतागण लोकप्रिय वायदे करते रहे, वोट बैंक की खातिर कदम उठाते रहे और अपने मतदाताओं को खुश करने के लिए मूंगफली की तरह आरक्षण बांटते रहे। यह हमारे 21वीं सदी के भारत की दशा को दर्शाता है जिसमें कोटा का तात्पर्य है कि जीत के लिए निश्चित रूप से वोट मिलना। आगामी लोक सभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए मोदी सरकार ने अभूतपूर्व निर्णय लेते हुए दो दिन के भीतर संविधान का 124वां संशोधन विधेयक पारित किया जिसमें सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में 10 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया और इस आरक्षण का आधार परिवार की 8 लाख रूपए से कम वार्षिक आय, एक हजार वर्ग फीट से कम का घर और पांच एकड़ से कम कृषि भूमि रखी गयी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह अलग बात है कि इस निर्णय से गरीबी की रेखा 32 रूपए प्रति दिन से बढकर 2100 रूपए प्रतिदिन अर्थात 8 लाख रूपए सालाना पहुुंच गयी। यह कानून राजनीतिक कार्य साधकता के लिए पारित किया गया और इसका कारण मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ तथा राजस्थान में हाल में हुए विधान सभा चुनावों में उच्च जातियों की भाजपा के प्रति नाराजगी थी। विपक्षी दलों ने भी इसका समर्थन किया। किंतु इससे वे भी लाभान्वित होंगे और यदि वे ऐसा नहीं करते तो उन्हें सामान्य श्रेणी के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के विरुद्ध माना जाता। इस कदम से सरकार सामान्य श्रेणी के लोगों को नए आरक्षण के अंतर्गत तुरंत तीन लाख रोजगार दे सकती है क्योंकि केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों में 29 लाख पद खाली हैं। शिक्षा क्षेत्र में 13 लाख, पुलिस में 4 लाख और रेलवे में 3 लाख पद रिक्त हैं। किंतु अगले ही दिन इस कानून को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी गयी कि यह कानून समानता के मूल अधिकार का हनन कर रहा है और अनुच्छेद 15 ;6द्ध और 16 ;6द्ध जोड़कर संविधान के बुनियादी ढांचे के साथ छेड़छाड़ की गयी है। इस कानून से आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की परिभाषा के बारे में भी प्रश्न उठे हैं और इसका निर्णय राज्यों पर छोड़ दिया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">उच्चतम न्यायालय ने इससे पूर्व 1975 में उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सामान्य श्रेणी के आरक्षण को रद्द कर दिया था और कहा था कि गरीबी आरक्षण का आधार नहीं हो सकता है। 1980 में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया था कि जम्मू कश्मीर आरक्षण देने के आधार को क्षेत्रीय असंतुलन नहीं बना सकता है। इसी तरह 1992 में इंदिरा साहनी मामले में 9 न्यायधीशों की खंडपीठ ने निर्णय दिया था कि संविधान के अंतर्गत आरक्षण के लिए आर्थिक मानदंड एकमात्र आधार नहीं हो सकता है। 2006 में एम. नागराज मामले में न्यायालय ने आरक्षण की 50 प्रतिशत सीमा को वैध ठहराया था। इसी तरह 2018 में जनरैल सिंह बनाम लक्ष्मीनारयाण मामले में 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा को वैध ठहराया गया। विभिन्न उच्च न्यायालयनों ने भी इस संबध्ां में निर्णय दिए। 2015 में राजस्थान उच्च न्यायालय ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण को रद्द किया और 2016 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण का स्थगनादेश दिया। गुजरात उच्च न्यायालय ने भी 6 लाख से कम आय वाले आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण रद्द किया।</p>
<p style="text-align:justify;">2017 में केरल ने देवस्थान बोर्ड में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण दिया। अगड़ी जाति में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण देने का औचित्या क्या है? क्या सरकार 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा को बढाकर 60 प्रतिशत कर सकती है? 8 लाख की आय सीमा रखने पर मानदंड क्या हैं? क्या अगड़ी जातियों में आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग का कोई मानक है? शेष बचे 40 प्रतिशत समान्य श्रेणी के लोगों का क्या होगा? उन्हें शिक्षा और रोजगार कहां मिलेंगे? कुछ राज्यों में पहले ही आरक्षण की सीमा बढ़ा दी गयी है। तमिलनाडू में यह 69 प्रतिशत है तो बिहार और कर्नाटक में 80 प्रतिशत है। प्रश्न यह भी उठता है कि यदि अगड़ी जाति में आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के कुछ लोगों को रोजगार मिल जाएगा तो उससे उनकी दशा कैसे सुधरेगी? क्या योग्य व्यक्ति को प्रवेश या रोजगार से वंचित करना उचित है? सरकार इस तरह का भेदभाव कैसे कर सकती है? क्या इस बात का आकलन किया गया है कि जिन लोगों को आरक्षण दिया गया है उन्हें लाभ मिला है या उन्हें नुकसान हुआ है?</p>
<p style="text-align:justify;">क्या इसके परिणामों के बारे में कोई अध्ययन कराया गया है? क्या आरक्षण अपने आप में साध्य बन गया है? क्या भारत के सामाजिक ताने-बाने और सौहार्द को बनाने का उपाय आरक्षण है? राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के एक पूर्व अध्यक्ष के अनुसार राजनेताओं ने आरक्षण को सर्कस बना दिया है। आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के वोट प्राप्त करने की चाह में नेता अपने इस कदम के प्रभावों को नहीं समझ पाए हैं। समाज पहले ही जाति और पंथ के आधार पर बंटा हुआ है और अब यह गरीब और अमीर के आधार पर भी बंट जाएगा। इस अदूरदर्शी कदम से भारत के नागरिकों में खाई और बढ़Þ जाएगी। दुर्भाग्य से वास्तविकता और आभासी समाज शास्त्र के लिए समानता नहीं होती है। आरक्षण से ग्रामीण समाज में बदलाव नहीं आएगा क्योंकि उसका सामान्य ढ़ांचा अज्ञानता और अशिक्षा पर बना हुआ है और इससे वर्ग-जाति व्यवस्था बढ़ेगी। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के अनेक परिवार गरीबी में जी रहे हैं। किंतु हमें ध्यान में रखना होगा कि गरीबी परिवार स्तर पर होती है न कि वर्ग स्तर पर। अगर गरीबी का उन्मूलन करना है तो फिर किसी वर्ग के सभी गरीब परिवारों को ये सुविधाएं दी जानी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">सामाजिक न्याय प्रदान करने की आड़ में हमारे नेता विवेकहीन तदर्थवाद अपनाते हैं और आरक्षण की घोषणा करते हैं। सच्चाई यह है कि हम आज ऐसे दुष्चक्र में फंसे हुए हैं जिसे हमारी अस्थिर और बिखरी राजनीति ने और जटिल बना दिया है और अब जाति संघर्ष नहीं अपितु वर्ग संघर्ष का खतरा पैदा हो गया है। हमारी राजनीति में वामपंथ दक्षिण पंथ के बजाय अगड़ा पिछड़ा अधिक महत्वपूर्ण बन गया है। आज हर कोई सामाजिक सौहार्द की अपनी परिभाषा दे रहा है और हमारे नेता कोटा के माध्यम से वोट प्राप्त करने की चाह में स्वयं भ्रमित हैं तथा वे मतदाताओं और इतिहास को भी भ्रमित कर रहे हैं। आज भारत को वही देश नहीं कहा जा सकता जिसे एमरसन ने मानव विचारों का शीर्ष कहा था। हमारे राजनेताओं को समझना होगा कि जाति और वर्ग की प्रतिद्धंद्धिता के आधार पर राजनीतिक सत्ता का खेल खतरनाक है और इससे सामाजिक सुधार आंदोलन निरर्थक बन जाएंगे। उन्हें इस बात को ध्यान में रखना होगा कि सभी के लिए आरक्षण देने का मतलब है कि उत्कर्षता और मानकों का त्याग जो कि किसी भी आधुनिक राष्ट्र की प्रगति के लिए आवश्यक है। सामाजिक न्याय एक वांछनीय और प्रशंसनीय लक्ष्य है किंतु यह औसत दर्जे के नागरिक पैदा करने की कीमत पर नहीं किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतंत्र में दोगले मानदंडों या अन्य लोगों से अधिक समान की ओरवेलियन अवधारणा को कोई स्थान नहीं दिया जा सकता है। मूल अधिकारों में जाति, पंथ या लिंग को ध्यान में रखे बिना सबको समान अवसर दिए गए हैं ओर हमें इसके साथ छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। समय आ गया है कि हमारे नेता विवेकहीन लोकपिय्र वायदों से पीछे हटें, तुच्छ राजनीति न करें और आरक्षण देने पर रोक लगाएं क्योंकि ये देश के दीर्घकालिक विकास के लिए बाधक है। उन्हें सभी को समानता के आधार पर आगे बढ़ाने के बारे में सोचना चाहिए। केवल आरक्षण देने से उत्कृष्टता नहीं आएगी। विशेषकर आज के प्रतिस्पर्धी वैश्विक गांव में आरक्षण के आधार पर प्रतिस्पर्धा नहीं की जा सकती। सामाजिक न्याय और समान अवसर केवल कुछ लोगों के विशेषाधिकार नहीं हैं। जाति आधारित आरक्षण पहले ही विभाजनकारी बन गया है और इसके लक्ष्य भी प्राप्त नहीं हुए हैं। हर कीमत पर सत्ता प्राप्त करने वाले हमारे राजनेताओं को वोट बैंक की राजनीति से परे देखना होगा और इसके दीर्घकालिक प्रभावों पर विचार करना होगा। भारत की युवा पीढ़ी यह स्वीकार नहीं करेगी कि चुनावी प्रतिस्पर्धा के माध्यम से बहुमत जुटाया जाए।</p>
<p><strong>पूनम आई कौशिश</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 15 Jan 2019 08:00:24 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>सेना पर भरोसा, वीडियो की नहीं जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[हमें हमारी सेना पर पूरा भरोसा है। सन् 1971 की जंग कौन भूल सकता है जब लै. जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने 90 हजार पाक सैनिकों को बंदी बना लिया था। कारगिल की जंग में पाक को बहादुर भारतीय सेना ने पीछे धकेल दिया। मँुह तोड़ जवाब देने की ताकत के बावजूद हम शांति के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/army-rely-on-no-need-of-video/article-4592"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/army.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हमें हमारी सेना पर पूरा भरोसा है। सन् 1971 की जंग कौन भूल सकता है जब लै. जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने 90 हजार पाक सैनिकों को बंदी बना लिया था। कारगिल की जंग में पाक को बहादुर भारतीय सेना ने पीछे धकेल दिया। मँुह तोड़ जवाब देने की ताकत के बावजूद हम शांति के पुजारी हैं। सन् 2016 में सेना ने पाक के कब्जे वाले कश्मीर में दाखिल होकर सर्जिकल स्ट्राईक किया। राजनैतिक शोर-शराबा हुआ विरोधियों ने सरकार से इसके सबूत मांगे। सबूत देने की कोई आवश्यकता ही नहीं थी। क्योंकि उस समय सर्जिकल स्ट्राईक की अगुवाई करने वाले सेना के उच्च अधिकारियों ने भी सर्जिकल स्ट्राईक पर मोहर लगाई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस कार्रवाई में पाक सेना और आतंकवादियों का भारी नुकसान हुआ पर चुनौती वाली बात यह है कि सर्जिकल स्ट्राईक के बावजूद पाक से आतंकवादियों का आना जारी रहा तथा पठानकोट एअरबेस के अलावा जम्मू-कश्मीर के कई सेनिक कैंप्स पर हमले हुए। हैरानी की बात है कि कार्रवाई सेना करती है पर हंगामा राजनीति में मचता है। यह बहस व दूषणबाजी आतंकवाद की समस्या को हल करने की बजाय इसको उलझाना है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय राजनीति में फौज सरकार के तहत आती है जो सरकार से कुछ छुपाने में ना समर्थ है तथा ना ही सेना में ऐसा कोई रुझान रहा है। सेना की शानदार परंपराएं और इतिहास है। पिछले दिनों एक ताजा वीडियो वायरल हुई जिसमें भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राईक की कार्रवाई को पेश किया गया है। इसकी कोई जरूरत नहीं थी, लोगों को सेना पर भरोसा है। वैसे भी यदि वीडियो थी तो इस बहादुरी भरे कारनामे को इतनी देर तक जाहिर ना करने की कोई तुक नहीं थी। यदि सुरक्षा के नजरिये पर इसको गुप्त रखना था तो जाहिर करने की जरूरत नहीं थी। ऐसे कदम खामखाह सेना पर राजनीतिकरण के दोषों का माहौल बना देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विपक्ष सरकार पर सेना कार्रवाई द्वारा राजनैतिक लाभ लेने का दोष लगा रही है। यह वर्ष चुनावीय वर्ष है अगले वर्ष लोकसभा चुनाव हो रहे हैं। ऐसे समय में सेना संबंधी कोई वीडियो ना सिर्फ अन्य विवादों को जन्म देती हैं बल्कि सेना के प्रतिष्ठा को भी चोट मारती है। कारगिल युद्ध के समय सेना का प्रवक्ता हर दिन सेना की कार्रवाई का विवरण देता था तो आज का जमाना और भी आधुनिक है किसी भी कार्रवाई की जानकारी लंबे समय के बाद देना हमारे प्रबंधों तथा टेक्नोलोजी के प्रयोग पर सवाल खड़े करती है। बहादुर सेना के प्रतिष्ठा को बरकरार रखने की विशेष आवश्यकता है।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jul 2018 08:32:56 +0530</pubDate>
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                <title>सपने देखना नहीं साकार करने के लिए जुटना जरूरी</title>
                                    <description><![CDATA[हरि शंकर आचार्य सिने अभिनेता संजय दत्त के जीवन पर आधारित फिल्म ‘संजू’ शुक्रवार को रिलीज हुई। इसने पहले ही दिन सफलता के झंडे गाड़ दिए। इससे पहले यूट्यूब पर जारी हुए इसके टीजर को लगभग छह करोड़ बार देखा जा चुका है। यहां इस फिल्म का उल्लेख करना इस कारण जरूरी है क्योंकि यह […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/need-to-mobilize-for-realizing-no-dreams/article-4591"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/dream.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">
हरि शंकर आचार्य</p>
<p style="text-align:justify;">सिने अभिनेता संजय दत्त के जीवन पर आधारित फिल्म ‘संजू’ शुक्रवार को रिलीज हुई। इसने पहले ही दिन सफलता के झंडे गाड़ दिए। इससे पहले यूट्यूब पर जारी हुए इसके टीजर को लगभग छह करोड़ बार देखा जा चुका है। यहां इस फिल्म का उल्लेख करना इस कारण जरूरी है क्योंकि यह फिल्म बॉलीवुड के सफलतम डायरेक्टर्स में से एक राजकुमार हिरानी की फिल्म है। वही राजकुमार हिरानी जिसने अब तक चार फिल्में बनाई हैं और चारों ही सुपर हिट रही हैं। अगर इन चार फिल्मों की कुल कमाई जोड़ें तो यह नौ सौ करोड़ के पार पहुंच चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">
हिरानी ने सबसे पहले वर्ष 2003 में बनाई ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’। इसने कमाए 34 करोड़। दूसरी फिल्म 2006 में आई ‘लगे रहो मुन्ना भाई’। इसने सौ करोड़ से अधिक कमाई की। वर्ष 2009 में हिरानी लाए ‘थ्री इडियट्स’। इसने 273 करोड़ कमाकर रिकॉर्ड बनाया तो वर्ष 2014 में आई ‘पीके’ ने पुराने सभी रिकॉर्ड ध्वस्त करते हुए लगभग 450 करोड़ रुपये कमा लिए। एक बात और ‘पीके’ की कहानी भी खुद हिरानी ने लिखी। इस पटकथा लेखन में उन्हें पांच वर्ष का समय लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
अब चलते हैं हिरानी के बैकग्राउंड पर। राजकुमार हिरानी का जन्म 22 नवंबर 1962 को नागपुर के सिंधी परिवार में हुआ। राजकुमार के परिजन उन्हें चार्टर्ड एकाउंटेंट के रूप में देखना चाहते थे, लेकिन हिरानी पढ़ाई में बहुत होशियार नहीं थे। उनके कभी अच्छे अंक नहीं आए। इस कारण यह सपना पूरा नहीं हो सका। हिरानी के पिता एक टाइपिंग इस्टीट्यूट चलाते थे। वे इस काम में पिता की मदद करते थे। हां, अभिनेता बनना उनका सपना था। इसी कारण उनके पिता ने फोटोशूट करवाकर उन्हें मुंबई के एक्टिंग स्कूल भेजा लेकिन वहां राजकुमार हिरानी का मन नहीं लगा और वे जल्दी ही इसे छोड़कर आ गए।</p>
<p style="text-align:justify;">
इस दौरान उन्होंने खुद को एडवरटाइजिंग फिल्मों में निर्माता निर्देशक के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया। वे फेविकोल के एक विज्ञापन में भी दिखा दिए। उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘1942 ए लव स्टोरी’ में के प्रोमो और ट्रेलर पर काम किया। ‘करीब’ के प्रोमो एडिट किए, लेकिन वर्ष 2000 में ‘मिशन कश्मीर’ की एडिटिंग करते हुए उन्होंने पहली बार सफलता का स्वाद चखा। बस फिर क्या था, राजकुमार हिरानी ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। चाहे ‘मुन्ना भाई एमबीबीएस’ हो ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ और चाहे ‘थ्री इडियट्स’ और ‘पीके’ हर बार उन्होंने न सिर्फ सफलता प्राप्त की बल्कि इस सफलता को और अधिक बड़ी करते रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">
राजकुमार हिरानी ने हर फिल्म के लिए एक यूनीक स्टोरी का चयन किया। यही कारण है कि हिरानी को राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। उनकी फिल्मों ने अनेक पुरस्कार जीते और लोगों के दिल जीतने में भी कामयाब रहे। हर सफलता के बाद हिरानी ने कई गुने जोश के साथ नया प्रोजेक्ट हाथ में लिया और उसमें भी सफलता को चूमकर दम लिया। संजय दत्त हमेशा से ही उनके नजदीक रहे। इस कारण उन्होंने अपनी पटकथा के मूल में दत्त के जीवन को रखा। उनके जीवन में अनेक छूए-अनछूए पहलुओं को बड़ी शिद्दत के साथ दर्शकों के बीच रखा।</p>
<p style="text-align:justify;">
पर्दे पर यह फिल्म रिलीज हो चुकी है और सफलता की ओर बढ़ रही है। नि:संदेह यह फिल्म भी हिरानी के पुराने अनुभवों को दोहराएगी। ऐसा नहीं है कि राजकुमार हिरानी को यूं ही मिल गई। इसके लिए उन्होंने बहुत मेहनत की। स्वयं को स्थापित करने के लिए दिन-रात एक कर दिए। उनका कोई फिल्मी बैकग्राउण्ड नहीं था, लेकिन उनके मन में कुछ करने का जुनून था। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत थी। इसके बूते उन्होंने इतिहास रच डाला। उन्होंने हर बार ‘मन’ की आवाज सुनी। दर्शकों की नब्ज को समझा और एक से बढ़कर एक यूनिक सब्जेक्ट के साथ पर्दे पर आए। तो इस ‘संडे’का ‘फंडा’ यह है कि सिर्फ सपने देखने से कुछ नहीं होता बल्कि इन सपनों को साकार करने अथक परिश्रम करना पड़ता है। इस राह में बाधाएं भी आती हैं, लेकिन उनसे घबराए बिना लगातार आगे बढ़ने वाला ही इतिहास रच सकता है।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 01 Jul 2018 08:28:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>टोल प्लाजा में सुविधाओं की दरकार</title>
                                    <description><![CDATA[बरनाला (सच कहूँ न्यूज)। गांव बडबर नजदीक एनएच-7 पर बना टोल प्लाजा लोगों को दी जाने वाली सुविधाओं को अनदेखा कर यात्रियों की जेबें काटने में मशरूफ है। टोल प्लाजे पर नियमों अनुसार यात्रियों को सुविधाएं न -मात्र ही मिल रही हैं। बेशक खोज प्लाजों पर कंपनी की तरफ से वाहनों से रूपयें वसूलने शुरू कर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/need-of-facilities-in-toll-plaza/article-3912"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/tolplaja.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बरनाला (सच कहूँ न्यूज)। </strong>गांव बडबर नजदीक एनएच-7 पर बना टोल प्लाजा लोगों को दी जाने वाली सुविधाओं को अनदेखा कर यात्रियों की जेबें काटने में मशरूफ है। टोल प्लाजे पर नियमों अनुसार यात्रियों को सुविधाएं न -मात्र ही मिल रही हैं। बेशक खोज प्लाजों पर कंपनी की तरफ से वाहनों से रूपयें वसूलने शुरू कर दिए गए हैं परंतु अभी तक टोल प्लाजों पर अभी भी सुविधाएं सिर्फ न -मात्र ही हैं, जिस की ताजा मिसाज तकरीबन 6 माह पहले एनएच-7 पर गांव बडबर समीप बने टोल प्लाजा से मिलती है जहां एंबुलेंस वैन, रिकवरी क्रेन की कमी के साथ-साथ पीने वाले पानी का कोई प्रबंध नहीं है। इस प्लाजा पर मोटरसाईकिल व अन्य दो पहिया वाहनों के लिए कोई अलग जगह नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिस कारण दोपहिया वाहन चालकों को बड़े वाहनों के साथ लाईनों में लग कर निकलने का इंतजार करना पड़ता है। यदि दोपहिया वाहन चालक अपने वाहन को पास के कच्चे रास्ते में से निकालते हैं तो उनको भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है, जिससे कई बार चालकों के चोटों भी भी लग चुकी हैं। इस टोल प्लाजा पर शौचालय का भी कोई पुख़्ता प्रबंध नहीं है। इसके अलावा यहां कोई रिकवरी क्रेन वैन भी नहीं है, जिस से घटित हुए सड़क हादसे में क्षतिग्रस्त वाहनों को सायड पर किया जा सके। जिससे साबित होता है कि कंपनी की तरफ से यह प्लाजा सिर्फ यात्रियों की जेबें काटने का काम ही कर रहा है न कि रोड सेफ्टी एक्ट के अंतर्गत सुविधाएं देने का। टोल प्लाजे के साईन बोर्ड में से भी दोपहिया वाहनों की रोड का कहीं जिक्र नहीं है। नियमों के अंतर्गत समूह सुविधाएं पुरी करने उपरांत ही टोल प्लाजा को शुरू किया जाना चाहिए था।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Jun 2018 12:32:07 +0530</pubDate>
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                <title>कट्टरता नहीं, सद्भावना की जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[‘वंदे मातरम्’ महान गीत है, जो देश को प्यार करने वाले लोगों के दिल में सहज ही उठता है लेकिन इस गीत को लेकर जो टकराव के हालात बन रहे हैं वह बेहद चिंताजनक है। इस मामले में पूर्व राज्यपाल अजीज कुरैशी की टिप्पणी बेहद स्टीक है। उन्होंने इस्लाम के नाम पर ‘वंदे मातरम्’ का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/no-fanaticism-need-for-goodwill/article-3490"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/bharat.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">‘वंदे मातरम्’ महान गीत है, जो देश को प्यार करने वाले लोगों के दिल में सहज ही उठता है लेकिन इस गीत को लेकर जो टकराव के हालात बन रहे हैं वह बेहद चिंताजनक है। इस मामले में पूर्व राज्यपाल अजीज कुरैशी की टिप्पणी बेहद स्टीक है। उन्होंने इस्लाम के नाम पर ‘वंदे मातरम्’ का विरोध करने वालों को यह नसीहत दी कि ‘वंदे मातरम्’ कभी भी इस्लाम के खिलाफ नहीं। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि ‘वंदे मातरम्’ को धक्के से गंवाने वाले भी दोषी हैं। कुरैशी की बात में दम है। वैसे भी देखा जाए देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं, जो ‘वंदे मातरम्’ नहीं गाते लेकिन इसका सम्मान करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">‘वंदे मातरम्’ का विरोध करने वाले लोग धर्म की हाल दुहाई देकर सुर्खियां बटोरने की कोशिश कर रहे हैं। दरअसल देश भक्ति का प्रचार करने के लिए सद्भावना ही सबसे बड़ा स्त्रोत है। देश के लिए मर मिटने वाले देश भक्त सबके सांझा होते हैं। उन पर किसी धर्म का ठप्पा लगाना संकुचित सोच का परिणाम है। यह बड़ी गर्व की बात व राष्ट्रीय एकता का सबूत है कि देश के लिए मर-मिटने वालों में सभी धर्मों के लोग थे। देश भक्ति राष्ट्र के लिए समर्पण भाव है, जिसे फैलाने के लिए प्यार व भाईचारे की जरूरत है। देश के सभी नागरिकों को समानता व सम्मान की भावना से देखने के से उनमें राष्ट्र प्यार की भावना पैदा होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनेताओं को इस मामले पर राजनीति करने से संकोच करना चाहिए। पिछले कुछ सालों में कुछ राजनेताओं ने राष्ट्रीय गीत के समर्थन में तो किसी ने विरोध में ऐसी शब्दावली का प्रयोग किया, जिससे वे नेता तो चर्चा में आ गए लेकिन उनकी इस बयानबाजी से समाज में टकराव वाले हालात पैदा हो गए। राजनेता विवादों को उलझाने की बजाए सुलझाने पर बल दें। नेताओं को इस प्रकार की बहस से भी संकोच करना चाहिए जो जनता को बांटने का काम करते हों। राष्ट्रीय एकता की मजबूती ही प्रत्येक राजनीतिक पार्टी का उद्देश्य होना चाहिए। जनता में फूट डालने व आपस में झगड़ा करवाने से देश कमजोर होता है। मजबूत राष्ट्र के लिए सद्भावना व प्यार जरूरी है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Nov 2017 04:19:49 +0530</pubDate>
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                <title>विद्यालयी शिक्षा में सुधार की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[हाल ही में शिक्षा की निगरानी के बारे में यूनेस्को द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि 2.8 मिलियन बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। 11 मिलियन बच्चे माध्यमिक स्तर से शिक्षा छोड़ देते हैं और 47 मिलियन बच्चे उच्च माध्यमिक स्तर से विद्यालय छोड़ देते हैं। सच यह है कि देश के कुल बच्चों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/need-for-improvement-in-school-education/article-3477"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/study.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हाल ही में शिक्षा की निगरानी के बारे में यूनेस्को द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि 2.8 मिलियन बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं। 11 मिलियन बच्चे माध्यमिक स्तर से शिक्षा छोड़ देते हैं और 47 मिलियन बच्चे उच्च माध्यमिक स्तर से विद्यालय छोड़ देते हैं। सच यह है कि देश के कुल बच्चों में से एक चौथाई माध्यमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते हैं। देश में 266 मिलियन वयस्क और 33 मिलियन युवा लिख या पढ़ नहीं सकते हैं और भारत जैसे उच्च आर्थिक वृद्धि दर वाले देश के लिए यह बड़े दु:ख की बात है। इस मुद्दे को बार-बार उठाया जाता है कि शिक्षा पर बहुत कम खर्च किया जाता है और यह हमारे सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3.8 प्रतिशत है जिसके चलते शिक्षा की यह स्थिति बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही अध्यापकों में कर्तव्य निष्ठा और समर्पण का अभाव है और शिक्षा से संबंधित कल्याण योजनाओं की निगरानी भी नहीं की जाती। वस्तुत: ग्रामीण क्षेत्रों में विशेषकर शिक्षा अवसंरचना बड़ी दयनीय स्थिति में है। विद्यालयों में शौचालय, पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं, विद्यालय भवन आदि की दयनीय स्थिति के कारण भी बच्चे स्कूल नहीं जाना चाहते हैं। शहरी क्षेत्रों में बडेÞ-बड़े प्राइवेट स्कूलों में छात्रों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है और इसके चलते देश में विद्यालयी शिक्षा के सभी पहलुओं की समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है। विद्यालयी शिक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। विद्यालयी शिक्षा की समस्याएं, शिक्षण का स्तर, विद्यालयों में अनुशासन, पाठ्यक्रम की प्रासंगिकता, छात्रों के साथ व्यवहार आदि हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विभिन्न सर्वेक्षणों से पता चला है कि शिक्षा के स्तर में गिरावट आयी है और इसका कारण अध्यापकों की उदासीनता है। नए कानूनों के अनुसार अध्यापक छात्रों को अनुशासित करने के लिए उनकी पिटाई नहीं कर सकते हैं। मुख्य मुद्दा अध्यापकों की गुण्वत्ता और अध्यापन के प्रति कर्तव्य निष्ठा है। रिपोर्ट के अनुसार 1297 गांवों में पाया गया कि 24 प्रतिशत ग्रामीण अध्यापक विद्यालय के निरीक्षण के दौरान अनुपस्थित थे। एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि छह राज्यों में 619 विद्यालयों के निरीक्षण के दौरान 18.5 अध्यापक अनुपस्थित थे, जिनमें से 9 प्रतिशत छुट्टी पर थे। 7 प्रतिशत अन्य आधिकारिक कार्यों में लगे थे और 2.5 प्रतिशत बिना किसी सूचना के अनुपस्थित थे।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बात को सब स्वीकार करते हैं कि अधिकतर सरकारी स्कूलों में अध्यापन का स्तर बहुत खराब है, हालांकि दक्षिणी राज्यों में इसमें कुछ सुधार आया है। रिपोर्ट के अनुसार प्रभावी नीतिगत कदमों के कारण अध्यापकों की अनुपस्थिति प्रभावित हुई है जिसमें विद्यालय से दूरी, छात्र-अध्यापक अनुपात और कार्य की खराब दशाएं प्रमुख हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्राइवेट ट्यूशन की प्रवृति बढ़ती जा रही है और इससे छात्रों पर शैक्षिक भार बढ़ता जा रहा है। व्यक्तिगत ट्यूशन या उपचारात्मक कक्षाओं से छात्र को लाभ हो सकता है किंतु इस पर खर्च होने वाली राशि से छात्र का कल्याण प्रभावित होता है और अध्यापकों पर दबाव बढ़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्राइवेट ट्यूशन की प्रवृति बढ़ती जा रही है। माता-पिता भी सोचते हैं कि प्राइेवट ट्यूशन के बिना उनके बच्चे का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहेगा और अब तो कक्षा 2 और 3 के छात्रों को भी प्राइवेट ट्यूशन लेते हुए देखा जा सकता है। अब तक शिक्षा के स्तर में गिरावट का एक कारण विद्यालयों में अनुशासन का अभाव भी है। अध्यापक छात्रों के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही करने से डरते हैं, जबकि छात्र अपने गृह कार्य करने की परवाह तक नहीं करते हैं। यही नहीं कुछ राज्यों में आठवीं कक्षा तक फेल न करने का निर्णय किया गया है जिससे छात्र पढ़ाई में रूचि ही नहीं लेते हैं। कुछ छात्रों में अच्छे अंकों के साथ पास होने की ललक रहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">किंतु विद्यालयों में राजनीति के प्रवेश से वातावरण और खराब हुआ है। अनुशासन भंग हुआ है, छात्रों को अनुशासित करने के लिए पिटाई बंद करने से छात्र अनुशासनहीन हो गए हैं। शिक्षाविद् इस बारे में बहस कर रहे हैं कि क्या छात्रों को अनुशासित करने के लिए दंड आवश्यक है। कुछ का मानना है कि छात्रों द्वार पढ़ाई न करने, गृह कार्य न करने और कक्षा में ध्यान न देने के लिए दंड आवश्यक है। दूसरी ओर छात्रों को प्यार और स्रेह न मिलने के कारण वे अध्यापकों की अवज्ञा करते हैं और उनका सम्मान नहीं करते हैं। संप्रेषण एक कला है और अध्यापक तब तक छात्रों के मन में अपनी पैठ नहीं बना सकते, जब तक वे इस कला में सिद्धहस्त न हों।</p>
<p style="text-align:justify;">पाठ्यक्रम भी महत्वपूर्ण है। अधिकतर राज्य शिक्षा बोर्डों का पाठ्यक्रम पुराना है तथा राज्य स्तर पर पाठ्यक्रम में बदलाव के बारे में कोई विचार नहीं किया जाता है। कुछ राज्यों में पहले पर्यावरण विज्ञान को पढ़ाया जाता था किंतु अब दो-तीन साल से यह भी बंद कर दिया गया है। इन बातों से पता चलता है कि विद्यालयी शिक्षा के प्रति लोगों की निष्ठा नहीं है। चाहे वह विद्यालयों में समुचित सुविधाओं का विकास करना हो या पाठयक्रम विकास हो। इसके लिए पर्याप्त बजट प्रावधान नहीं किया जाता है जिसके चलते ग्रामीण क्षेत्रों में विद्यालयों में सुविधाओं का अभाव है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में ऐसी खबरें भी आई थी कि विद्यालयों में शौचालय उपयोग लायक नहीं हैं या छात्रों के शौचालय में पानी नहीं है। विद्यालयों के सामने जल जमाव से छात्रों को विद्यालय पहुंचने में दिक्कत होती है और आशा की जाती है कि प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत सभी विद्यालयों में शौचालय बनाए जाएंगे। विद्यालयी शिक्षा की अनेक समस्सयाएं हैं तथा इनका समाधान आसान नहीं है। किंतु शिक्षा के स्तर में सुधार के लिए कुछ कदम अवश्य उठाए जा सकते हैं और इसमें सबसे महत्वपूर्ण है कि सभी सरकारी विद्यालयों में अध्यापकों पर कड़ी निगरानी रखी जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए सरकार अध्यापकों के कार्य निष्पादन और छात्रों के प्रति उनके दृष्टिकोण की निगरानी के लिए सेवानिवृत सरकारी अधिकारियों की सेवाएं ले सकता है और इसके लिए उन्हें मानदेय में छोटी सी राशि देनी पड़ेगी और ये अधिकारी जिला मजिस्टेÑट को अपनी त्रैमासिक रिपोर्ट दे सकते हैं। जिसमें वे किसी विकास खंड में विद्यालयों की समस्याओं और उनके निराकरण के लिए उपायों का सुझाव दे सकते हैं। चूंकि वे सेवानिवृत अधिकारी होते हैं इसलिए वे सरकार पर दबाव बना सकते हैं कि विद्यालयों की समस्याओं का निराकरण किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में असमानता को दूर करने तथा देश के दीर्घकालीन विकास के लिए शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आवश्यक है। अधिक जनसंख्या का लाभ हम तब तक नहीं उठा सकते जब तक विद्यालयी शिक्षा में सुधार न किया जाए। प्राथमिक विद्यालयों में सुधार के लिए संसाधन चाहिए, किंतु जिला और विकास खंड स्तर पर विद्यालयों की निगरानी भी की जानी चाहिए जो वर्तमान में न के बराबर है। यदि 100 मिलियन बच्चे लिखना-पढ़ना भी न जानें तो एक परिपक्व अर्थव्यवस्था या लोकतंत्र के रूप में भारत का विकास संभव नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-डा. ओइशी मुखर्जी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Nov 2017 23:57:43 +0530</pubDate>
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                <title>अब एक भारत, एक चुनाव की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में बदलाव की हवा बह रही है। क्या हमारा देश चुनावों में सुधार के लिए तैयार हो रहा है? क्या हमारा देश निरंतर चुनावों पर रोक लगाने की दिशा में बढ़ रहा है, जिसके चलते हमारी राजनीति और शासन व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है? क्या हमारा देश लोकसभा और राज्य विधान सभाओं […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/now-an-india-the-need-for-an-election/article-3378"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/vote.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत में बदलाव की हवा बह रही है। क्या हमारा देश चुनावों में सुधार के लिए तैयार हो रहा है? क्या हमारा देश निरंतर चुनावों पर रोक लगाने की दिशा में बढ़ रहा है, जिसके चलते हमारी राजनीति और शासन व्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है? क्या हमारा देश लोकसभा और राज्य विधान सभाओं के लिए एक साथ चुनाव करवाए जाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है? ऐसा लगता है। चुनाव आयोग ने भी इस दिशा में कुछ सकारात्मक बातें कही हैं और यह संकेत दिया है कि अगले वर्ष सितंबर के बाद वह ऐसा कर सकता है, हालांकि लोकसभा चुनाव 2019 में होने हैं और यदि ऐसा किया जाता है, तो न केवल चुनाव प्रचार पर पैसा और समय की बचत होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अपितु वोट बैंक को नाराज किए जाने की चिंता किए बिना केन्द्र और राज्य सरकारें लोकहित में कठोर निर्णय लेने में सक्षम होंगी तथा सुशासन दे पाएंगे। चुनावों को ध्यान में रखते हुए अनेक अच्छे निर्णय और योजनाएं इसलिए लागू नहीं किए जाते कि इससे जातीय, सामुदायिक, धार्मिक और क्षेत्रीय समीकरण बिगड़ेंगे। जिसके चलते नीतिगत पंगुता आती है तथा योजनाओं और कार्यक्रमों का ठीक से कार्यान्वयन नहीं हो पाता। यही नहीं इसके चलते राजनीतिक ऊर्जा वोट बैंक की राजनीति में लगानी पड़ती है। हमारे यहां हर वर्ण, जाति, और पंथ के राजनेताओं ने इस बीमारी को बढ़ने दिया है और इसके चलते सुशासन प्रभावित हुआ है। बार-बार चुनावों के चलते प्रशासन को भुला दिया जाता है। प्रश्न यह उठता है कि क्या संसद और राज्य विधान सभाओं के एक साथ चुनाव कराने का वक्त आ गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या संसद और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं और यदि हां, तो क्या यह राष्ट्रीय हित में होगा। नि:संदेह अक्षमता, उदासीनता और कुशासन से मुक्ति पाने का यह एक तरीका हो सकता है। किंतु इस विचार पर सभी स्तरों पर चर्चा की जानी चाहिए और अंतिम निर्णय पर पहुंचने से पहले इसके लाभ-हानि पर गहन विचार होना चाहिए, क्योंकि इस बदलाव में संविधान के बुनियादी ढांचे में बदलाव करना पड़ेगा। लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप का मत है कि लोकसभा और विधान सभाओं के एक साथ चुनाव कराने के लिए कानून या संविधान में संशोधन करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अनुच्छेद 172 में विधान सभा का एक निर्धारित कार्यकाल का प्रावधान है।</p>
<p style="text-align:justify;">वस्तुत: विधि आयोग की 1999 की रिपोर्ट में कहा गया है कि ‘‘प्रत्येक वर्ष चुनावों के इस चक्र पर रोक लगा दी जानी चाहिए और आयोग ने सिफारिश की कि लोक सभा और विधान सभा के एक साथ चुनाव कराने की दिशा में बढ़ा जाना चाहिए।’’ आयोग ने यह भी कहा कि यदि किसी सरकार के विरुद्ध अविश्वास प्रस्ताव लाया जाता है, तो साथ-साथ वैकल्पिक सरकार के लिए विश्वासमत भी लाया जाना चाहिए, ताकि किसी भी बहुमत वाली या अल्पमत वाली सरकार के लिए 5 साल का कार्यकाल निर्धारित किया जा सके। संसद की एक समिति ने भी दिसंबर 2015 में इसी तरह की सिफारिश की है। समिति का मत था कि इससे आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराने में सुधार आएगा और ठोस नीतियां बनायी जाएंगी, क्योंकि आदर्श आचार संहिता के लागू होने के कारण कोई नई नीति या कार्यक्रम लागू नहीं किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश में पहले चार आम चुनाव – 1952, 1957, 1962 और 1967 के चुनाव लोकसभा और राज्य विधान सभाओं के लिए साथ-साथ कराए गए थे। 1971 में इंदिरा गांधी ने लोकसभा भंग कर दी थी और इसके चलते लोकसभा चुनाव एक वर्ष पहले कराने पड़े और तब से यह क्रम टूट गया। उसके बाद केन्द्र और राज्यों में अनेक अस्थिर सरकारें आयी। फलत: अनेक विधान सभाएं और लोकसभा को समय से पूर्व भंग करना पड़ा। संवैधानिक विशेषज्ञों का मत है कि दोनों चुनावों का घालमेल नहीं किया जाना चाहिए। यह प्रस्ताव राजनीतिक स्वार्थ प्रेरित हो सकता है। जब लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव साथ-साथ कराए जाएंगे, तो हो सकता है मतदाता एक ही पार्टी को मत दें। साथ ही केन्द्र और राज्य स्तर पर चुनावी मुद्दे अलग-अलग होते हैं, इसलिए दोनों के चुनाव अलग-अलग ही कराए जाने चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकसभा और विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराने से मतदाताओं में भी भ्रम हो सकता है। हो सकता है कोई पार्टी उसकी नीतियों और कार्यक्रमों के कारण केन्द्र में समर्थन प्राप्त करने की हकदार हो, किंतु राज्य स्तर पर ऐसा न हो। हालांकि विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराए जा सकते हैं और उनका एक निर्धारित कार्यकाल नियत किया जा सकता है। यदि कोई निर्वाचित सरकार गिर जाती है, तो उस विधान सभा के कार्यकाल को पूरा होने तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। किंतु लोकसभा का एक नियत कार्यकाल नहीं हो सकता है, क्योकि केन्द्र में राष्ट्रपति शासन का प्रावधान नहीं है और इससे समस्याएं हल होने के बजाए उलझेगी ही।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही लोकसभा और विधान सभाओं का निर्धारित कार्यकाल नियत करना संसदीय लोकतंत्र के सिद्धान्तों के विरुद्ध है और यह उपचार बीमारी से भी अधिक खराब है। निर्धारित कार्यकाल का तात्पर्य है कि यदि जन-समर्थन प्राप्त करने वाली सरकार अल्पमत में आ जाती है, तो वह बनी रहेगी या उसके स्थान पर कोई ऐसी सरकार बन सकती है, जिसे जनसमर्थन प्राप्त न हो। इसका तात्पर्य है कि ऐसी सरकार बना दी जाएगी, जिसे लोकसभा या विधानसभा का विश्वास प्राप्त न हो और यह एक तरह से तानाशाही और राजशाही अराजकता का स्वरूप ले लेगा और वह सरकार जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकसभा और विधान सभाओं के एक साथ चुनाव कराने का सबसे बड़ा लाभ वित्तीय बचत है। आंकड़े बताते हैं कि जब 1952 में लोक सभा और विधान सभाओं के लिए पहले आम चुनाव कराए गए थे, तो उन पर दस करोड़ रूपए खर्च हुए थे। 1957 में छह करोड़ और 1962 में 7.5 करोड़ रूपए खर्च किए गए। चुनावों पर खर्च 1977 के बाद बढ़ा। 1980 में 23 करोड़ रूपए, 1989 में 154 करोड़ रूपए और 1991 में 359 करोड़ रूपए तथा 1999 में 880 करोड़ रूपए खर्च हुए। 2004 के चुनाव पर 1300 करोड़ रूपए और 2014 के लोकसभा चुनाव पर 4500 करोड़ रूपए खर्च किए गए। आज इसलिए भी भ्रम की स्थिति पैदा हो गयी है कि विभिन्न राज्यों की विधान सभाओं का कार्यकाल अलग-अलग समय पर हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनावों की लागत अत्यधिक बढ़ गयी है। बिहार विधान सभा चुनावों पर 400 करोड़ रूपए से अधिक और उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव पर इससे दोगुनी राशि खर्च हुई। इस तरह बार-बार होने वाले चुनावों पर करदाताओं के पैसे को अविवेकपूर्ण ढंग से खर्च किया जा रहा है। 2011 में केरल, तमिलनाडू, असम, पुडुचेरी, और बंगाल विधान सभाओं के चुनाव हुए। 2012 में उत्तर प्रदेश, गोवा, पंजाब, मण्पिुर और उत्तराखंड के चुनाव हुए। 2013 में दिल्ली, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, राजस्थान और मिजोरम विधान सभाओं के चुनाव हुए। 2014 में लोक सभा चुनाव और दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश विधान सभाओं के चुनाव हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">2015 बिहार, झारखंड, और जम्मू-कश्मीर विधान सभा के चुनाव हुए तथा पिछले वर्ष केरल, बंगाल और असम विधान सभाओं के चुनाव हुए। फिर इस समस्या का समाधान क्या है? क्या हमें अमरीकी मॉडल पर विचार करना चाहिए, जहां पर राष्ट्रपति और राज्यों के गर्वनरों का चुनाव चार साल की निर्धारित अवधि के लिए सीधे जनता द्वारा किया जाता है और वे अपनी टीम चुनते हैं तथा वहां राष्ट्रपति हाऊस और रिप्रजेंटेटिव तथा सीनेट के प्रति उत्तरदायी होता है। किंतु उसे विश्वासमत लेने की आवश्यता नहीं होती है। इससे सुशासन, स्थिरता और निरंतरता सुनिश्चित होती है, जिसके चलते शासक वर्ग सत्ता खोने के भय से कठिन निर्णय लेने में हिचकिचाता नहीं है। कुल मिलाकर चुनाव हमारे लोकतंत्र के आधार हैं। किंतु बार-बार चुनावों से बचा जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>-पूनम आई कौशिश</strong></em></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Oct 2017 04:25:17 +0530</pubDate>
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                <title>परिवार नियोजन पर बल देने की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में जनसंख्या दबाव के कारण अनेक समस्याएं उत्पन्न हो गयी हैं, जिसके चलते सरकर को पुन: परिवार नियोजन पर विचार करना पड़ रहा है। पश्चिमी देशों ने जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण लगा दिया है। इसी तरह भारत को भी इस दिशा में कदम उठाने होंगे। जनसंख्या वृद्धि ने एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/need-to-emphasize-on-family-planning/article-2305"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/family-planing.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत में जनसंख्या दबाव के कारण अनेक समस्याएं उत्पन्न हो गयी हैं, जिसके चलते सरकर को पुन: परिवार नियोजन पर विचार करना पड़ रहा है। पश्चिमी देशों ने जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण लगा दिया है। इसी तरह भारत को भी इस दिशा में कदम उठाने होंगे। जनसंख्या वृद्धि ने एक बड़ी चुनौती पैदा कर दी है और इस दिशा में गंभीर प्रयास की आवश्यकता है। हाल ही में सरकार ने परिवार नियोजन उपायों में तेजी लाने का निर्णय किया है और इसके लिए ऐसे 146 जिलों की पहचान की गयी है, जहां पर प्रजनन दर 3 प्रतिशत से अधिक है और इनकी जनसंख्या देश की कुल जनसंख्या का 28 प्रतिशत है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य मंत्रलय ने इन जिलों में मिशन परिवार विकास शुरू किया है, जिसके अंतर्गत परिवार नियोजन सेवाओं में सुधार, जागरूकता और परिवार नियोजन विकल्प उपलब्ध कराने पर बल दिया गया है। इस कार्यक्रम के अंतर्गत सेवाओं की गुणवत्ता में सुधार, संवर्धन योजनाएं, सामुदायिक सुरक्षा, क्षमता निर्माण, उचित वातावरण का निर्माण और गहन निगरानी पर ध्यान दिया गया है। अधिकारियों से कहा गया है कि वे इस कार्यक्रम की अर्धवार्षिक समीक्षा करे और उपलब्धियों का आंकलन करे कि क्या कार्यक्रम सही दिशा में बढ़ रहा है या नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">ये जिले बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और असम में स्थित हैं। ये जिले अपेक्षाकृत पिछड़े हैं। आंकड़ों के अनुसार भारत में जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आयी है किंतु जनसंख्या वृद्धि दर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग है। दक्षिणी राज्यों में इसमें गिरावट आयी है। 2008 में देश में प्रजनन दर 2.6 प्रतिशत थी, जो वर्तमान में 2.3 प्रतिशत है। विश्व मेंं भी अफ्रीकी देश में जनसंख्या वृद्धि दर 5.1 प्रतिशत से गिरकर 4.1 प्रतिशत और एशिया में 2.4 प्रतिशत से गिरकर 2.2 प्रतिशत रह गयी है। विश्व के नौ देश जिनमें भारत, नाइजीरिया, अमरीका, युगांडा, तंजानिया, पाकिस्तान, आदि प्रमुख हैं 2050 तक विश्व जनसंख्या वृद्धि दर में इनका 50 प्रतिशत योगदान रहेगा। विकासशील देशों में संसाधनों की कमी है। इसलिए भी इन देशों में जनसंख्या वृिद्ध दर तेजी से बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में जनसंख्या स्थिरीकरण आवश्यक है, ताकि आर्थिक विकास के अगले चरण में पहुंचा जा सके और इस नए कार्यक्रम का उद्देश्य यही है। यदि कुल प्रजनन दर अधिक होगी, तो मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्य दर भी अधिक होगी। इसलिए मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में कमी लाने के लिए कुल प्रजनन दर में भी कमी लानी होगी। विश्व जनसंख्या दिवस के अवसर पर स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि जनसंख्या नियंत्रण की ओर कदम बढ़ाना होगा, ताकि लोगोें की बदलती आवश्यकताओं को पूरा किया जा सके और हमने गुणवत्ता सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए हैं तथा ग्रमीण और शहरी क्षेत्रों में अंतिम उपभोक्ता तक परिवार नियोजन की सेवाओं को पहुंचाने का प्रयास किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछली सरकारों ने परिवार नियोजन पर बल नहीं दिया, इसलिए आवश्यक है कि इस नए कार्यक्रम के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए गंभीर कदम उठाए जाएं। अब इसकी आशा भी की जाती है, क्योंकि मोदी सरकार ने अपनी परियोजनाओं और योजनाओं को पेशेवर ढंग से शुरू किया है। अत: लगता है कि स्वच्छ भारत अभियान की तरह परिवार विकास मिशन पर भी पूरा ध्यान दिया जाएगा। भारत जैसे विकासशील देश में जनता के सामाजिक आर्थिक विकास के लिए संसाधनों की कमी को देखते हुए प्रजनन दर को 2 प्रतिशत अर्थात् प्रति परिवर दो बच्चों तक लाने की आवश्यकता है। चीन ने इस दिशा में अनेक कदम उठाए, इसलिए वहां की जनसंख्या वृद्धि दर 9.5 प्रतिशत तक आ गयी है और कुछ रिपोर्ट्स के अनुसार 2024 तक भारत की जनसख्या चीन से अधिक हो जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">छोटे परिवार के लाभों के बारे में विशेषकर उत्तरी और मध्य भारत के गांवों में जागरूकता अभियान चलाया गया है। देश में स्वास्थ्य, पोषाहार, शिक्षा, आवास आदि के व्यय में वृद्धि के चलते छोटा परविार किसी भी परिवार के आर्थिक सामाजिक विकास को सुनिश्चित करता है। इस कार्यक्रम के कुशल क्रियान्वयन से जनसंख्या वृद्धि दर निर्धारित होगी। किंतु इस कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए पंचायतों और जमीनी संगठनों की भागीदारी के साथ ही घर-घर अभियान भी आवश्यक हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भी देश में मुसलमान एक से अधिक विवाह करते हैं और परिवार नियोजन उपायों को नहीं अपनाते। अल्पसंख्यक समुदाय होने के कारण वे किसी भी तरह अपनी जनसंख्या बढ़ाना चाहते हैं और इस प्रवृति को यदि आवश्यक हुआ तो कठोर उपायों के माध्यम से रोका जाना चाहिए। उच्चतम न्यायालय में तीन तलाक का मुद्दा लंबित है। यदि मुसलमानों को देश के पर्सनल लॉ का पालन करना है, तो उन्हें अपने बच्चों की संख्या सीमित रखनी होगी। गरीब और अशिक्षित लोग परिवार नियोजन तथा अपने बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देते है। विशेषकर बेटियों की शिक्षा पर ध्यान नहीं दिया जाता है।<br />
इस संबंध में पश्चिम बंगाल सरकार के कन्याश्री प्रकल्प को हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पुरस्कार दिया या है। पुरानी पीढ़ी में जनसख्या नियंत्रण के बारे में जागरूकता नही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">शिक्षा और जागरूता के प्रसार के कारण धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। परिवार नियोजन प्रभावी रहा है, क्योंकि इसका असर महानगरों और शहरों में देखने को मिला है। अर्धशहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में भी परिवार नियोजन को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इसके लिए शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा और बुनियादी शिक्षा आवश्यक है। अब तक इस तरह की शिक्षा की उपेक्षा की जाती रही है, जिसके चलते परिवार नियोजन कार्यक्रम प्रभावी नहीं हुए। प्रत्येक जिले और मंडल में परिवार नियोजन शिविर लगाए जाने चाहिएं, ताकि गरीब लोग इस बारे में जागरूक हो सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">पश्चिमी देश इसलिए तेजी से विकास कर पाए, क्योंकि उनकी जनसंख्या वृद्धि दर कम है और प्रति व्यक्ति आय अधिक है। यद्यपि भारत जनसंख्या वृद्धि दर को उन देशो के स्तर पर नहीं ला सकता, किंतु यदि परिवार नियोजन कार्यक्रम को प्रभावी ढंग से लागू किया जाए, तो जनसंख्या वृद्धि पर रोक अवश्य लगेगी। इससे देश तेजी से सामाजिक आर्थिक विकास करेगा। देश की युवा जनसंख्या इस बारे में जागरूक है और जनसंख्या नियंत्रण में इस वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong><br />
<em>डॉ. ओईशी मुखर्जी</em></strong><em> </em></p>
<p style="text-align:justify;">
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/need-to-emphasize-on-family-planning/article-2305</link>
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                <pubDate>Sat, 15 Jul 2017 03:16:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>परिवर्तन को आगे बढ़ाने के लिए साहस की आवश्यकता : मोदी</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि भारत उतनी प्रगति नहीं कर पाया जितनी उसे करनी चाहिए थी। साथ ही उन्होंने दावा किया कि बदलाव को आगे बढ़ाने के लिए साहस की आवश्यकता पड़ती है। उन्होंने यहां 2015 बैच के आईएएस अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि जिन देशों ने भारत के बाद […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/need-of-adventure-for-pursue-the-change-modi/article-1910"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/modi1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि भारत उतनी प्रगति नहीं कर पाया जितनी उसे करनी चाहिए थी। साथ ही उन्होंने दावा किया कि बदलाव को आगे बढ़ाने के लिए साहस की आवश्यकता पड़ती है। उन्होंने यहां 2015 बैच के आईएएस अधिकारियों को संबोधित करते हुए कहा कि जिन देशों ने भारत के बाद आजादी प्राप्त की तथा जिनके सामने संसाधनों की कमी थी, उन्होंने विकास के मामले में नई उंचाइयों को छुआ है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">परिवर्तन के लिए गतिशील बदलाव की आवश्यकता</h2>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री ने दावा किया कि बदलाव को आगे बढ़ाने के लिए साहस की आवश्यकता पड़ती है। उन्होंने युवा प्रशासनिक अधिकारियों से कहा कि उन्हें उस सोच से बचना चाहिए जो बदलाव का विरोध करती है। उन्हें भारत की प्रशासनिक प्रणाली को नए भारत की उर्जा से भर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यवस्था में परिवर्तन के लिए गतिशील बदलाव की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बयान में कहा गया कि प्रधानमंत्री ने युवा अधिकारियों से कहा कि वे सहायक सचिवों के रूप में अपने कार्यकाल की अगले तीन माह की अवधि के दौरान केन्द्र सरकार के वरिष्ठतम अधिकारियों के साथ निस्संकोच होकर बातचीत करें ताकि व्यवस्था को उनकी उर्जा एवं नए विचारों तथा सचिव स्तर के अधिकारियों के प्रशासनिक अनुभव के मेल का लाभ मिल सके। प्रधानमंत्री ने युवा अधिकारियों से कहा कि वे यूपीएससी परिणामों के दिन तक अपने जीवन, उनके द्वारा झेली गई चुनौतियों और अब उनके समक्ष पेश अवसरों पर विचार करें ताकि वे व्यवस्था और आम आदमी के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Jul 2017 07:21:06 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>सरकारी जन औषधि केंद्रों को स्वस्थ बनाने की जरूरत</title>
                                    <description><![CDATA[अक्सर ही देखा जाता है कि एक बार तो भलाई योजनाओं की शुरूआत कर दी जाती है, लेकिन बाद में यह दम तोड़ जाती हैं। इसी तरह ही मंझधार में लटक रहे हैं केंद्र सरकार द्वारा खोले गए सस्ती दवाइयों वाले जन औषधि जैनरिक ड्रग स्टोर। यह स्टोर केंद्र में दो बार सत्ता पर काबिज […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/the-need-to-make-government-public-health-centers-healthy/article-1553"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/medicine.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अक्सर ही देखा जाता है कि एक बार तो भलाई योजनाओं की शुरूआत कर दी जाती है, लेकिन बाद में यह दम तोड़ जाती हैं। इसी तरह ही मंझधार में लटक रहे हैं केंद्र सरकार द्वारा खोले गए सस्ती दवाइयों वाले जन औषधि जैनरिक ड्रग स्टोर। यह स्टोर केंद्र में दो बार सत्ता पर काबिज रही पूर्व प्रधानमंत्री की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार ने अपनी योजना के तहत देश के जिला सरकारी अस्पतालों में खोले थे।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने जब दूसरी बार केंद्र में सरकार बनाई थी, तो उन्हें चुनाव से पहले अपने चुनावी घोषणापत्र में लोगों को सस्ती दवाएं प्रदान करवाने का वादा किया था। इसी के तहत यह स्टोर खोले गए थे, लेकिन यह स्टोर खुलने के बाद लोगों को कोई खास सहुलियत नहीं मिली। वर्तमान की भाजपा सरकार में यह केन्द्र अधिक तीव्र गति से खोले जा रहे हैं, लेकिन इन केन्द्रों पर दवाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन स्टोरों को 2008 में शुरू किया गया था। अब पूरे भारत में इन स्टोरों की संख्या 1289 है। पंजाब में कुल 39 हैं। एक बार तो यह स्टोर खोल दिए, लेकिन सरकार ने इस तरफ कोई विशेष ध्यान नहीं दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">इन केंद्रों में सस्ते भाव पर जेनेरिक दवाइयां भेजी गई थीं, जिनकी कीमत तो सचमुच ही बहुत कम है। लेकिन प्रतिदिन 24 घंटे खुलने वाले यह स्टोर कभी भी लोगों के न बन सके, क्योंकि पहली बात, यहां पर दवाइयों की संख्या बहुत कम ही रही है। दूसरी बात, जो दवाइयां इन स्टोरों पर उपलब्ध करवाई जाती हैं, उनको सरकारी अस्पतालों में मौजूद डाक्टरों द्वारा कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए लोगों को पहले की तरह निजी दुकानों से महंगे भाव पर ही दवाएं लेनी पड़ती हैं। डाक्टरों द्वारा ज्यादातर बड़ी निजी कंपनियों की दवाइयों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। जन औषधि स्टोर बी.पी.पी.आई. (ब्यूरो फारमा आफ इंडिया) के तहत चलते हैं। यहां पर जो कम भाव पर दवाइयां उपलब्ध करवाई जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">वो पांच कंपनियां इंडियन ड्रग फार्मास्युटिकल लिमिटेड, हिंदुस्तान एंटीबायोटिक, बंगाल कैमीकल लिमिटेड, राजस्थान ड्रग फार्मास्युटिकल लिमिटेड, कर्नाटक एंटीबायोटिक की दवाइयां उपलब्ध करवाई जाती हैं। पहले तो सीधे ही आदेश देने पर यह कंपनियां दवाइयां भेज दिया करती थीं, लेकिन अब राज्य स्तर पर दवाइयां सप्लाई करने वाले बड़े स्टोर बना दिए गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन दवाइयों की कमी फिर पूरी नहीं हो सकी है। बी.पी.पी.आई. की तरफ से 757 दवाइयों की सूची जारी की हुई है, लेकिन स्टोरों में 150 से 200 तक दवाइयां ही मुश्किल से पहुंच पाती हैं। जिन दवाइयों की सूची जारी की हुई है, यदि वो सभी दवाई इन स्टोरों पर भेजी जाएं, तो लोगों को आसानी से सभी दवाइयाँ पाप्त हो सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ये स्टोर शुरू में तो जिला रेडक्रॉस सोसाइटी के अंतर्गत कर दिए गए थे। बाद में कई स्टोरों की हालत ज्यादा बुरी होने की वजह से उन्हें बंद कर दिया गया। इसके बाद इन केन्द्रकों को रोगी कल्याण समिति के अंतर्गत कर दिया गया। सस्ती दवाइयां उपरोक्त कंपनियों द्वारा भेजी जाती थीं, उनकी संख्या कम होने के कारण दवाइयों की कमी पूरी करने के लिए जिला स्तर पर समितियां बनाकर निजी दवाइयों की खरीद करके गुजारा किया जाने लगा। लेकिन डाक्टरों की सिफारिशों पर निजी कंपनियों की दवाइयां इन स्टोरों पर ब्रिकी की जाने लगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अब इन स्टोरों में काम कर रहे कर्मचारियों की बात की जाए, तो उनकी स्थिति सांप के मुंह में छिपकली जैसी है। यानि इन कर्मियों का वेतन बहुत ही कम है। इनकी नौकरी भी पक्की नहीं है। सरकार के पास इनके लिए कोई एजेंडा नहीं है। दरअसल राज्य सरकारें इस योजना को प्रभावी ढंग से चलाने के लिए सोचना अपना फर्ज नहीं मानती।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारों को ऐसा कोई फंड यां ग्रांट जारी नहीं किया जाता, जिससे इनका निर्माण हो सके। जो भी इन स्टोरों का खर्च होता है, वो भी दवाइयों की ब्रिकी करके पूरे किए जाते हैं। इसलिए केंद्र सरकार को इन स्टोरों को स्वस्थ बनाने के लिए विशेष फंड जारी करने चाहिए, ताकि उनका निर्माण अच्छे से हो सके। सभी दवाइयों का इन स्टोरों पर भेजने का प्रबंध किया जाए, ताकि हर जरूरतमंद को सस्ती दवा आसानी से मिल सके और जिस प्रयोजन से यह जन औषधि स्टोर खोले गए थे, वह पूरा हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>– सुखराज चहल धनौला</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Fri, 23 Jun 2017 23:21:42 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>ग्रामीण इलाकों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरत : राष्ट्रपति</title>
                                    <description><![CDATA[सामान्य चिकिस्तकों की 83 प्रतिशत कमी उडुपी (कर्नाटक)। राष्ट्रपति मुखर्जी ने रविवार को कहा कि उत्तम स्वास्थ्य सुविधाएं हर व्यक्ति के लिए जरूरी हैं। उन्होंने साथ ही ग्रामीण इलाकों में बेहतर बुनियादी ढांचे की जरूरत पर बल दिया ताकि डॉक्टर वहां अपनी सेवाएं दे सकें। उडुपी में शंभु शेट्टी मेमोरियल हाजी अब्दुल्ला सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/need-of-better-health-facilities-in-rural-areas-president/article-1364"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/president.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">सामान्य चिकिस्तकों की 83 प्रतिशत कमी</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>उडुपी (कर्नाटक)।</strong> राष्ट्रपति मुखर्जी ने रविवार को कहा कि उत्तम स्वास्थ्य सुविधाएं हर व्यक्ति के लिए जरूरी हैं। उन्होंने साथ ही ग्रामीण इलाकों में बेहतर बुनियादी ढांचे की जरूरत पर बल दिया ताकि डॉक्टर वहां अपनी सेवाएं दे सकें। उडुपी में शंभु शेट्टी मेमोरियल हाजी अब्दुल्ला सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की स्थापना के मौके पर राष्ट्रपति ने कहा कि उत्तम स्वास्थ्य सुविधाएं अब विलास का प्रतीक नहीं रहीं, बल्कि यह जरूरी हो गई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रपति ने कहा कि एक हजार की आबादी के लिए एक डॉक्टर के अंतर्राष्ट्रीय मानक की तुलना में हमारे देश में 1,700 लोगों पर एक डॉक्टर उपलब्ध है। मुखर्जी ने आगे कहा, ‘ग्रामीण भारत में स्थिति ज्यादा गंभीर हैं, जहां सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के स्तर पर 83.4 प्रतिशत सर्जन, प्रसूति एवं स्त्री रोग विशेषज्ञों की 76.3 प्रतिशत, बाल रोग विशेषज्ञों की 82.1 प्रतिशत और सामान्य चिकिस्तकों की 83 प्रतिशत कमी है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘स्थिति इस बात से भी जटिल हो जाती है कि हम अपनी जरूरत के मुकाबले करीब 50 प्रतिशत कम डॉक्टरों को शिक्षित और प्रशिक्षित करते हैं। राष्ट्रपति ने डॉक्टरों की कमी पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत पर बल देते हुए कहा कि निवारक स्वास्थ्य सुविधाओं के क्षेत्र पर अधिक ध्यान और निवेश की जरूरत है। मुखर्जी ने कहा, ‘पिछले 70 सालों में हमने स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता के मामले में व्यापक विकास किया है।’</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 18 Jun 2017 08:35:10 +0530</pubDate>
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