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                <title>policies - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>राज्यपाल बनाम सरकारी नीतियां</title>
                                    <description><![CDATA[केरल विधान सभा में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव के साथ देश की संवैधानिक व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में है। राज्यपाल ने एक बार तो प्रस्ताव पढ़ने से इन्कार कर दिया और फिर मुख्य मंत्री की अपील पर प्रस्ताव पढ़ दिया। राजपाल ने कहा, ‘‘मैं […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/governor-vs-government-policies/article-12809"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/governor.jpg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:justify;">केरल विधान सभा में नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव के साथ देश की संवैधानिक व्यवस्था एक बार फिर चर्चा में है। राज्यपाल ने एक बार तो प्रस्ताव पढ़ने से इन्कार कर दिया और फिर मुख्य मंत्री की अपील पर प्रस्ताव पढ़ दिया। राजपाल ने कहा, ‘‘मैं सीएए के खिलाफ प्रस्ताव को पढ़ना नहीं चाहता, मैं इस प्रस्ताव के साथ सहमत नहीं, परंतु मुख्य मंत्री के कहने पर पढ़ रहा हूं’’ यहां बात सीएए के सही या गलत होने की नहीं बल्कि एक संवैधानिक पद के सिद्धांत और मर्यादा की है।</h4>
<h4 style="text-align:justify;">राज्यपाल द्वारा विधान सभा के सैशन की शुरूआत में भाषण दिया जाता है। यह भाषण सरकार की मंशा के अनुसार ही लिखवाया जाता है और राज्यपाल ने केवल वह पढ़ना ही होता है। इस तरह राज्यपाल का पद केवल संवैधानिक पद है और असली शक्तियों का प्रयोग मंत्रिमंडल ही करता है। कई बार स्थिति और भी अजीबो-गरीब बन जाती है जब एक राज्यपाल दो राज्यों की जिम्मेवारी संभालता है।पंजाब और हरियाणा में भी ऐसा मौका आया जब पंजाब के राज्यपाल का पद भी हरियाणा के राज्यपाल के पास था।</h4>
<h4 style="text-align:justify;">पंजाब की विधानसभा में राज्यपाल ने कहा कि पंजाब के पास अन्य राज्यों को देने के लिए अतिरिक्त पानी नहीं है, वहीं दूसरी तरफ हरियाणा की विधानसभा में राज्यपाल महोदय ने हरियाणा के लिए पंजाब से पानी लेने की मांग पूरजोर तरीके से उठाई।ऐसी हालत में दुविधा वाली बात भी बनती है। कई बार राज्यपाल और सरकार के बीच केरल की तरह टकराव वाले हालात भी बनते रहे हैं। पिछले दिनों में पश्चिमी-बंगाल में भी राज्यपाल और सत्ताधारी तृणमूल के बीच खींचातानी रही। ऐसे हालात पुडुचेरी व दिल्ली में भी देखने को मिले।दरअसल राज्यपाल मंत्रिमंडल के साथ सरकार चलाता है और वह सरकार से अलग नहीं हो सकता है।</h4>
<h4 style="text-align:justify;">दरअसल राज्यपालों की भी राजनीतिक पृष्ठभूमि होती है, जिस कारण उन पर किसी पार्टी विशेष के हितों के पालन के दोष लगते रहे हैं। इसी कारण कई बार राज्यपाल के पद को ही खत्म करने की बात भी उठती रही है। फिर भी इस पद की अपनी अहमियत है। देश के कानून विशेषज्ञों व राजनीतिज्ञों को इस मसले का हल निकालने के लिए कोई पहल करनी चाहिए, ताकि संविधान की उपयोगिता और गरिमा निर्विवादित बनी रहे।</h4>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi</a><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/"> News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</strong></p>
<p> </p>
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<p> </p>
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                <pubDate>Wed, 29 Jan 2020 20:41:24 +0530</pubDate>
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                <title>कृषि के लिए संतुलित नीतियों की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[पंजाब में धान का उत्पादन कम रहने की रिपोर्टें सरकार की कृषि नीतियों पर सवाल खड़े कर रही है। इस वर्ष राज्य सरकार ने 20 जून से पहले धान की बिजाई न करने की अधिसूचना जारी की थी, जिसका किसानों ने विरोध किया। किसानों की शंकाए आज सच साबित हो रही हैं। किसानों का तर्क […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/balanced-policies-for-agriculture/article-6514"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-10/agriculture.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पंजाब में धान का उत्पादन कम रहने की रिपोर्टें सरकार की कृषि नीतियों पर सवाल खड़े कर रही है। इस वर्ष राज्य सरकार ने 20 जून से पहले धान की बिजाई न करने की अधिसूचना जारी की थी, जिसका किसानों ने विरोध किया। किसानों की शंकाए आज सच साबित हो रही हैं। किसानों का तर्क था कि धान की बिजाई 20 जून से शुरू करने से केवल पांच-सात दिन में बिजाई मुकम्मल नहीं हो सकती। धान की बिजाई वाली मशीनें फेल होने के कारण व बाहरी राज्यों से प्रवासी मजदूरों की संख्या कम होने के कारण पंजाब-हरियाणा में मजदूरों का टोटा पड़ गया है। साथ ही धान की बिजाई देरी से हुई। दूसरी तरफ यदि इस बार गेहूँ की बिजाई पिछड़ गई तब अगले साल धान की बिजाई की तारीख को लेकर सरकार व किसानों में फिर टकराव हो सकता है। दरअसल कृषि संबंधी नीतियां बनाते समय संतुलित सोच से काम नहीं लिया जाता।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी अधिकारियों की बैठक में भू-जल का मामला हावी हो जाता है, जो धान की लेट बिजाई को इसका एकमात्र हल मान लेते हैं और दूसरे पहलुओं पर कोई चर्चा नहीं हो पाती। अभी पंजाब प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने 25 जून से पूर्व धान न लगाने की पेशकश सरकार के समक्ष रखी थी, जिसे सरकार ने मंजूर नहीं किया। यदि ऐसा हो जाता तब उत्पादन 30 प्रतिशत तक गिर सकता था। धान की कटाई के वक्त पराली न जलाने पर जोर दिया जाता है और अधिकारी गेहूँ की बिजाई भूल जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे गेहूँ की बिजाई में देरी होगी, जिसका गेहूँ के उत्पादन पर प्रभाव पड़ेगा। भले ही राज्य सरकारों का 20 जून से पूर्व धान की बिजाई न करने के पीछे तर्क गिरता भू-जल स्तर है, लेकिन एक समस्या का हल कई और समस्याओं को भी जन्म देता है। सरकार की पराली न जलाने की मुहिम भी देरी से बिजाई के कारण सफल नहीं हो रही। किसान गेहूँ की बिजाई में कुछ दिन बचे होने के कारण पराली को खेत में न जलाने के लिए मजबूर हैं। यदि गेहूँ की बिजाई के लिए कुछ दिन और मौसम साथ दे तब पराली की समस्या भी कुछ हद तक हल हो सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल कृषि संबंधी संतुलित नीतियों की कमी ही कृषि संकट का मुख्य कारण है। केवल दफ्तरों में बैठकर नीतियां बनाने पर सरकारी आदेशों को जैसे-तैसे लागू करने की की विचारधारा को छोड़कर कृषि, वातारवण व देश हित के लिए संतुलित नीति बनाने की आवश्यकता है। किसानों संबंधी नीतियों में कृषि से जुड़े हालात किसान से अधिक कोई नहीं जानता। कम-से-कम कृषि नीति को तैयार करते वक्त किसान नेताओं की राय को अवश्य ध्यान में रखना चाहिए।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 30 Oct 2018 08:39:09 +0530</pubDate>
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                <title>मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के प्रति बढ़ी निराशा</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। भारतीय रिजर्व बैंक के सर्वे के मुताबिक केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से लोग अपनी अपेक्षाएं पूरी होते नहीं देख रहे हैं। सर्वे की मानें तो अच्छे दिन के अपने चुनावी नारे के बावजूद उपभोक्ताओं में मौजूदा आर्थिक स्थिति को लेकर निराशा की स्थिति है और यह बढ़ रही है। आरबीआई की ओर से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/increased-frustration-towards-economic-policies/article-4124"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/modi-3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)। </strong>भारतीय रिजर्व बैंक के सर्वे के मुताबिक केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार से लोग अपनी अपेक्षाएं पूरी होते नहीं देख रहे हैं। सर्वे की मानें तो अच्छे दिन के अपने चुनावी नारे के बावजूद उपभोक्ताओं में मौजूदा आर्थिक स्थिति को लेकर निराशा की स्थिति है और यह बढ़ रही है। आरबीआई की ओर से मई 2018 में कराए गए कन्जयूमर कॉन्फिडेंस सर्वे के मुताबिक नरेंद्र मोदी जब प्रधानमंत्री बने थे, उस वक्त के मुकाबले इन दिनों उपभोक्ताओं में निराशा की स्थिति पैदा हुई है। हालिया सर्वे की जून 2014 में कराए गए सर्वे से तुलना की जाए तो इकॉनमी को लेकर उपभोक्ताओं का दृष्टिकोण उत्साहजनक नहीं दिखता है। तब पीएम मोदी को देश की सत्ता संभाले एक महीना भी नहीं बीता था। हालिया सर्वे के मुताबिक 48 फीसदी उपभोक्ता यह मानते हैं कि बीते एक साल में देश की आर्थिक परिस्थिति खराब हुई है। हालांकि 31.9 फीसदी उपभोक्ता यह मानने वाले भी हैं कि आर्थिक स्थिति में सुधार आया है।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 Jun 2018 20:06:24 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मांगों को लेकर किसान-मजदूरों का फूटा गुस्सा</title>
                                    <description><![CDATA[सब तहसील दीनानगर में केंद्र और पंजाब सरकार की नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की ख़ुदकशी करने वाले किसानों-मजदूरों के लिए मांगा 20 लाख का मुआवजा गुरदासपुर (सरबजीत)। कुल हिंद किसान सभा और खेत मजदूर सभा जिला गुरदासपुर द्वारा आज सब तहसील दीनानगर में केंद्र और पंजाब सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/workers-protest-against-anti-farmer-policies/article-1273"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/raised-farmers1.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">सब तहसील दीनानगर में केंद्र और पंजाब सरकार की नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>ख़ुदकशी करने वाले किसानों-मजदूरों के लिए मांगा 20 लाख का मुआवजा</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>गुरदासपुर (सरबजीत)</strong>। कुल हिंद किसान सभा और खेत मजदूर सभा जिला गुरदासपुर द्वारा आज सब तहसील दीनानगर में केंद्र और पंजाब सरकार की किसान विरोधी नीतियों के खिलाफ नारेबाजी की गई। किसान नेता मांग कर रहे थे कि किसानों और खेत मजदूरों के सभी कर्ज माफ किये जाएं और स्वामीनाथन कमीशन की सिफारिशें लागू की जाएं।</p>
<p>इसके इलावा उन्होंने प्रत्येक फसल का सरकारी भाव निर्धारित करने, हरेक किसान-खेत मजदूर की 60 साल के बाद 10 हजर रुपए पैंशन लगाने, फसलों की बर्बादी रोकने के लिए आवारा पशूओं का प्रबंध किये जाने, किसानों को यंत्र, दवाएं और खाद सस्ते रेटों पर दिए जाने, किसानों की कुर्कियां पूरी तरह से रोके जाने और खुदकुशी करने वाले किसानों-खेत मजदूर को 20 लाख रुपए का मुआवज बिना देरी के दिए जाने की मांगें भी रखी।</p>
<h2>मांगों की पूर्ति के लिए नायब तहसीलदार को दिया मांग पत्र</h2>
<p style="text-align:justify;">इस मौके पंजाब किसान सभा के जिलााध्यक्ष कामरेड बलबीर सिंह , पूर्व अध्यक्ष जसबीर सिंह, पंजाब खेत मजÞदूर सभा के जिलाध्यक्ष कामरेड सुखदेव सिंह काहलोंं और सर्व भारत नौजवान सभा के प्रांतीय सचिव सुभाष कैरे ने कहा कि अब तक जितनी भी सरकारें आई हैं किसी ने भी किसानों और खेत मजदूरों को उनके बनते हक नहीं दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि चुनाव के दिनों में उनके साथ बड़े-बड़े वायदे और दावे किये जाते हैं परन्तु सरकार बनते ही सत्ताधारियों को सब वायदे भूल जाते हैं और वह किसानों के खिलाफ नीतियां बनाते हैं। इस मौके नेताओं ने प्रधान मंत्री व मुख्यमंत्री पंजाब के नाम मांग पत्र नायब तहसीलदार प्रेम कुमार को सौंपा और मांग की कि उनके मांगों को तुरंत पूरा किया जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले संगठनोंं की तरफ से सीपीआई कार्यलय में जलसा किया गया और समूह नेता और किसान मार्च करते हुए सब तहसीलदार के कार्यलय पहुंचे। जहां पर किसानों और मजÞदूरों की तरफ केंद्र और पंजाब सरकार खिलाफ नारेबाजी की गई। इस मौके बलॉक प्रधान गुरदीप सिंह कलीजपुर, सुभाष चौंता, गुरचरन सिंह वालिया, तरसेम सिंह जंडी, ओंकार सिंह , सुरिन्दर सिंह काहलों, दर्शन पाल, सुखदेव राज अवांखा, दर्शन अवांखा, बलबीर सिंह ग्याला, मस्त राम, बऊ मसीह, कमल शर्मा, बब्बू शर्मा, सुनील कुमार कुंडे, जरनैल सिंह, अंग्रेज सिंह और चिमन लाल उपस्थित थे।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/punjab/workers-protest-against-anti-farmer-policies/article-1273</link>
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                <pubDate>Thu, 15 Jun 2017 23:13:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रारम्भिक व उच्च शिक्षा नीतियों में सुधार की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[उत्तर प्रदेश व हरियाणा में नकल की समस्या, बिहार में शिक्षा परीक्षा परिणामों में भ्रष्टाचार की बदौलत हेर-फेर, उस पर पिछली केन्द्र सरकार द्वारा आठवीं तक बच्चों को फेल न करने की लागू की गई नीति ने देश में शिक्षा का बंटाधार कर रखा है। पिछले वर्ष भी बिहार में दसवीं, बाहरवीं के परिणामों में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/need-for-improvement-in-early-and-higher-education-policies/article-856"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/copy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश व हरियाणा में नकल की समस्या, बिहार में शिक्षा परीक्षा परिणामों में भ्रष्टाचार की बदौलत हेर-फेर, उस पर पिछली केन्द्र सरकार द्वारा आठवीं तक बच्चों को फेल न करने की लागू की गई नीति ने देश में शिक्षा का बंटाधार कर रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले वर्ष भी बिहार में दसवीं, बाहरवीं के परिणामों में टॉप रहे विद्यार्थी मीडिया को अपने पूरे विषय तक नहीं बता सके थे। यहां तक कि लड़कियों में अव्वल रही रुबी ने पॉलिटीकल साइंस को खाना बनाने का विज्ञान बताया था। इस वर्ष 12वीं परीक्षा में अव्वल रहे विद्यार्थी गणेश, जिन्हें संगीत विषय में 70 में से 65 अंक दिए गए हैं, संगीत का क-ख भी नहीं बता पाए।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां तक कि उसके खिलाफ परीक्षा में धोखाधड़ी का केस दर्ज हो गया और उनकी गिरफ्तारी हो गई। स्कूली शिक्षा के अतिरिक्त पत्राचार से हो रही उच्च शिक्षा भी सवालों के घेरे में है, यहां विद्यार्थियों को स्नातक परा- स्नातक की डिग्री दी जा रही है, जबकि उनका विषय ज्ञान सैकेंडरी स्तर तक भी नहीं होता। पत्राचार प्रणाली विश्वविद्यालयों के लिए कामधेनू गाय की तरह हो गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां न आधारभूत ढांचे की जरूरत है और ना ही विषयों के अध्यापकों की आवश्यकता है और प्रतिवर्ष करोड़ों रूपए फीस के इक्ट्ठे हो जाते हैं। प्रति वर्ष हजारों-लाखों विद्यार्थियों को पोस्ट ग्रेजुएट बना दिया जाता है। हालांकि पत्राचार शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ उन विद्यार्थियों को परिपूर्ण बनाना था, जो अपनी उम्र या नौकरी की वजह से पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन अब अधिकतर विद्यार्थी इसी प्रणाली पर निर्भर हो गए हैं। शिक्षा क्षेत्र में निम्न स्तर की शिक्षा नीतियां एवं कार्यशैली ने भारत की एक पूरी पीढ़ी को बेवकूफ बना दिया है, जिनके पास प्रमाणपत्र तो ऊंची से ऊंची शिक्षा के हैं, लेकिन ज्ञान के नाम पर उनके दिमाग खाली ही हैं। केन्द्रीय व राज्य स्तर पर शिक्षा के गिर रहे स्तर को सुधारने में शीघ्र ही प्रभावी निर्णय लागू करने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वप्रथम आठवीं तक फेल न करने की नीति को तत्काल हटाया जाए, इससे शिक्षकों पर जहां पढ़ाने का उत्तरदायित्व होगा, वहीं विद्यार्थी भी ढंग से पढ़ेंगे। नकल व परीक्षा परिणामों में भ्रष्टाचार के खिलाफ कठोर दण्डात्मक कार्रवाई की जानी होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">पत्राचार शिक्षा हालांकि उपयोगी है, लेकिन इसमें प्रवेश, शिक्षा एवं परीक्षा प्रणाली में सुधार करने होंगे, ताकि पत्राचार माध्यम से की जा रही शिक्षा भी अच्छे नागरिक व पेशेवर तैयार कर सके। देश की समस्त शिक्षा नीति एक समान हो एवं दुनिया के विकसित राष्ट्रों की प्रतिस्पर्धा कर सके।</p>
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                <pubDate>Sat, 03 Jun 2017 22:04:54 +0530</pubDate>
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