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                <title>India-US bilateral Relations - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>भारत-अमेरिका द्विपक्षीय सम्बंधों का नया सूरज</title>
                                    <description><![CDATA[मैं ट्रम्प को हुई निराशा को समझता हूँ मुझे भी एक-दो बार हार झेलनी पड़ी है लेकिन अब आइये एक-दूसरे को एक मौका दें। यह कथन नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का है जो चुनावी रंजिश और प्रतियोगिता को भुलाकर एकजुटता को दशार्ने की ओर इशारा कर रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव भले ही […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/new-sun-of-india-us-bilateral-relations/article-19809"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-11/new-sun-of-india-us-bilateral-relations.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:center;"><strong>मैं ट्रम्प को हुई निराशा को समझता हूँ मुझे भी एक-दो बार हार झेलनी पड़ी है लेकिन अब आइये एक-दूसरे को एक मौका दें। यह कथन नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन का है जो चुनावी रंजिश और प्रतियोगिता को भुलाकर एकजुटता को दशार्ने की ओर इशारा कर रहा है।</strong></h6>
<h6 style="text-align:justify;">अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव भले ही चुनौतियों से भरा रहा हो पर डोनाल्ड ट्रंप इस तरह हारेंगे इसका काफी हद तक अंदेशा था। लगता है कि भारतीय और अफ्रीकी मूल के मतदाताओं ने इरादा बना लिया था कि बाइडेन को ही व्हाइट हाउस भेजना है। ऐसा कमला हैरिस के उपराष्ट्रपति की घोषणा के साथ समीकरण स्पष्ट सा हो गया था। बाइडेन ने कमला हैरिस को अपने साथ लेकर वो मुमकिन कर दिया जो कभी-कभी होता है। बाइडेन के व्हाइट हाउस में आने से भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय सम्बंधों का नया सूरज उगना तय है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">राष्ट्रपति चुनाव जीतने वाले डेमोक्रेटिक नेता जो बाइडेन भारत के पुराने मित्र हैं और कुछ बातों को हटा दें तो लम्बे समय से भारत के हितैषी रहे हैं। अहम मौकों पर न केवल उन्होंने भारत का साथ दिया बल्कि एक सबसे पुराने लोकतंत्र और एक सबसे बड़े लोकतंत्र के बीच एक साझा समझ को भी प्रदर्शित किया। बराक ओबामा के समय उपराष्ट्रपति रहते हुए द्विपक्षीय सम्बंधों को नई ऊँचाई भी दी है। इसी दौर में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता और न्यूक्लियर सप्लायर ग्रुप (एनएसीजी) को लेकर एड़ी-चोटी का जोर भी देखा जा सकता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">वैसे जब प्रधानमंत्री मोदी पहली बार सितम्बर 2014 में अमेरिका की यात्रा पर थे तब वांशिंगटन में जो बाइडेन से भी मुलाकात की थी। पड़ताल बताती है कि 1973 से 2008 तक बातौर सिनेटर बाइडेन भारत-अमेरिका साझेदारी के प्रबल समर्थक रहे हैं और 2008 में ही असैन्य परमाणु करार को मंजूरी दिलाकर द्विपक्षीय सम्बंधों को नया आयाम दिया था। इतना ही नहीं 2014 से 2016 के बीच सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्यता का जोरदार समर्थन किया और 8 साल के अपने उपराष्ट्रपति के कार्यकाल में भी उनका काफी योगदान देखा जा सकता है। अब वे दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति हैं ऐसे में द्विपक्षीय सम्बंध का आसमान और ऊँचा होगा यह उम्मीद करना बेमानी न होगा जैसा कि उनके राष्ट्रपति चुनने के बाद व्यक्त किये गये उद्गार में देखा जा सकता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">यदि ईरान जैसे देशों से अमेरिका का झगड़ा खत्म होता है तो यहां भी भारत को कच्चे तेल के मामले में अच्छा लाभ होगा। गौरतलब है कि ईरान और अमेरिका के बीच तनातनी के चलते 2 मई 2019 भारत ईरान से तेल अमेरिकी प्रतिबंध के चलते नहीं ले पा रहा है और उसे दूसरे देशों से इसी तेल की ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। ट्रम्प पेरिस जलवायु सन्धि-2015 से अलग हो चुके हैं। 1987 के रूस से हुए इंटरमीडिएट रेंज न्यक्लियर फोर्सेज समझौते और समेत दुनिया के कई देशों के साथ सन्धि और समझौतों से नाता तोड़ चुके हैं।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">कोरोना काल में तो ट्रम्प विश्व स्वास्थ संगठन से ही अमेरिका को अलग कर लिया। जाहिर है बाइडेन की उदार नीतियों से उक्त समस्याओं का भी हल मिल सकता है पर इसका भी लाभ भारत के हितों को मजबूत कर सकता है। सबसे बड़ी बात दक्षिण चीन सागर में चीन की एकाधिकार का है। यदि बाइडेन इस पर सार्थक कदम उठाते हैं तो इसका लाभ भारत को आसियान और एशिया-पेसिफिक तक पहुंचने में कहीं अधिक मदद मिलेगी जैसा कि उम्मीद की भी जा रही है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">फिलहाल नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के रहते भारत के साथ कोई हानि नहीं दिखती, लाभ कितना होगा यह आने वाला वक्त बतायेगा। वैसे उपराष्ट्रपति के रूप में बाइडेन जुलाई 2013 में 4 दिवसीय यात्रा पर भारत आये थे तब तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से भेंट की थी और जब प्रधानमंत्री मोदी 2014 में अमेरिका गये थे तब दोपहर के भोज की मेजबानी इन्होंने की थी।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">वैसे बाइडेन अमेरिका के बहुत वरिष्ठ और पुराने नेता हैं। शायद यही कारण है कि वे रिकॉर्ड तोड़ मत प्राप्त किये और सबसे अधिक उम्र के राष्ट्रपति बनने का रिकॉर्ड भी बनाया। हालांकि राष्ट्रपति बनने का उनका यह प्रयास तीन दशक से चल रहा है। तमाम अनुभवों के कारण ही सभी को साथ लेकर चलने का बड़ा दिल इन दिनों दिखा भी रहे हैं। वैसे खास यह भी है जो भारत के लिए उचित नहीं कहा जा सकता दरअसल बराक ओबामा के काल में पाकिस्तान पर तमाम आतंकी गतिविधियों के बावजूद प्रतिबंध नहीं लगाया गया जबकि उपराष्ट्रपति जो बाइडेन ही थे और ट्रम्प ने पाकिस्तान की इसी स्थिति के चलते आर्थिक प्रतिबंध भी लगाये थे।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">रोचक यह भी है कि बराक ओबामा के शासनकाल में साल 2011 में पाकिस्तान के एटबाबाद से अलकायदा का सरगना ओसामा बिन लादेन मारा गया था। तब भी पाकिस्तान पर कोई बड़ी कार्यवाही नहीं की गयी थी। यह बात पुख्ता करती है कि डेमोक्रेटिक कुछ हद तक मध्यम मार्गी है। मोदी और बराक ओबामा गहरी दोस्ती के लिए जाने जाते थे। फिर भी बराक ओबामा ने पाकिस्तान पर कोई खास शक्ति नहीं दिखाई थी। इसके अलावा पड़ताल यह भी बताती है कि बाइडेन मोदी सरकार की कई नीतियों पर सवाल भी उठाते रहे हैं। सीएए और एनआरसी पर उनकी राय अच्छी नहीं है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">भारत-अमेरिका के सम्बंध किसी भी काल से बेहतर बराक ओबामा के समय में ही थे। गणतंत्र दिवस पर ओबामा का मुख्य अतिथि के रूप में 2015 में उनका आना और दो बार भारत आना इस बात को पुख्ता करता है। बाइडेन पर बराक ओबामा की नीतियों की छाप है ऐसे में द्विपक्षीय सम्बंध का सूरज अधिक चमक के साथ उगेगा ऐसा लगता तो है। सबके बावजूद भारत की शान्तिप्रियता, स्वहृदयता और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस का भारतीय मूल का होना द्विपक्षीय सम्बंधों के लिए कहीं अधिक कारगर सिद्ध होगा। इतना ही नहीं भारत एक उभरती हुई अर्थव्यवस्था है और अपनी नीतियों से दुनिया को प्रभावित करता है। दोस्ती का दायरा बड़ा है और दुश्मनी पहले नहीं करता है। इन तमाम कारकों से भी अमेरिका परिचित है और बाइडेन भी।</h6>
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                <pubDate>Mon, 09 Nov 2020 19:58:29 +0530</pubDate>
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