<?xml version="1.0" encoding="utf-8"?>        <rss version="2.0"
            xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
            xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
            xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom">
            <channel>
                <atom:link href="https://www.sachkahoon.com/ram-setu/tag-18885" rel="self" type="application/rss+xml" />
                <generator>Sach Kahoon Hindi RSS Feed Generator</generator>
                <title>Ram Setu - Sach Kahoon Hindi</title>
                <link>https://www.sachkahoon.com/tag/18885/rss</link>
                <description>Ram Setu RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>ISRO: अब इसरो के वैज्ञानिकों को राम सेतु पर मिली बड़ी सफलता!</title>
                                    <description><![CDATA[ISRO Ram Setu Research: नई दिल्ली (एजेंसी)। इसरो जोकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन है, ने एडम ब्रिज – जिसे कि राम सेतु के नाम से भी जाना जाता है, का सबसे विस्तृत मानचित्र तैयार किया है, जोकि इस बात की पुष्टि करता है कि डूबी हुई यह रिज भारत के धनुषकोडी से लेकर श्रीलंका के […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/now-isro-scientists-have-got-a-big-success-on-ram-setu/article-59717"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/isro.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ISRO Ram Setu Research: नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> इसरो जोकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन है, ने एडम ब्रिज – जिसे कि राम सेतु के नाम से भी जाना जाता है, का सबसे विस्तृत मानचित्र तैयार किया है, जोकि इस बात की पुष्टि करता है कि डूबी हुई यह रिज भारत के धनुषकोडी से लेकर श्रीलंका के तलाईमन्नार द्वीप तक एक निर्मित है। रामसेतु जिसका वर्णन रामायण में वानर सेना द्वारा तैयार किए पुल के रूप में मिलता है, जोकि वानर सेना द्वारा रावण की लंका में माता सीता को वापिस लाने के लिए बनाया गया था। इसरो के जोधपुर और हैदराबाद राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्रों के शोधकर्ताओं ने राष्ट्रीय वैमानिकी और अंतरिक्ष प्रशासन (नासा) उपग्रह ICESat-2 के साथ मानचित्रण अभ्यास किया, जिसने समुद्र तल से लेजर किरणों को उछालकर यह स्थापित किया कि एडम ब्रिज का 99.8 प्रतिशत हिस्सा उथले पानी में डूबा हुआ था। <strong>ISRO</strong></p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/if-you-dont-have-a-place-to-walk-in-the-rain-then-do-this-yoga-at-home-you-will-get-many-benefits/">Yoga Benefits: बरसात में नहीं है वॉक करने की जगह, तो घर में करें ये योगा, मिलेगे अनेकों फायदें</a></p>
<p style="text-align:justify;">‘‘हमारे शोध के परिणाम इस बात की पुष्टि करते हैं कि, पूरी तरह से, एडम ब्रिज धनुषकोडी और तलाईमन्नार द्वीप का एक पनडुब्बी विस्तार है। वैज्ञानिकों द्वारा साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि एडम ब्रिज की शिखर रेखा के दोनों ओर लगभग 1.5 किमी का हिस्सा अत्यधिक उथली जलराशि के भीतर अत्यधिक उतार-चढ़ाव वाला है, जिसमें अचानक गहराई की घटनाएँ होती हैं। एडम ब्रिज, जिसे भारतीय उपमहाद्वीप में राम सेतु के नाम से अधिक जाना जाता है, श्रीलंका के उत्तर-पश्चिमी तट से दूर मन्नार द्वीप और भारत के दक्षिण-पूर्वी तट से दूर रामेश्वरम द्वीप के बीच उथले पानी की एक श्रृंखला है। मौजूदा भूवैज्ञानिक साक्ष्यों ने सुझाव दिया है कि यह पुल भारत और श्रीलंका के बीच एक पूर्व भूमि कनेक्शन का प्रतिनिधित्व करता है। <strong>ISRO</strong></p>
<p style="text-align:justify;">इसरो के वैज्ञानिकों अब इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि एडम ब्रिज के दोनों ओर आधार पर अनुप्रस्थ ढलानों की विषमता है, जो पाक जलडमरूमध्य की तुलना में मन्नार की खाड़ी के पानी से भौतिक ऊर्जा के प्रमुख उल्लंघन का संकेत देती है। अध्ययन में लिखा है, हमारे शोध में गणना की गई एडम ब्रिज की मात्रा लगभग 1 किमी 3 थी। दिलचस्प बात यह है कि इस आयतन का केवल 0.02 प्रतिशत ही औसत समुद्र तल से ऊपर है, और सामान्य तौर पर, आॅप्टिकल सैटेलाइट इमेजरी में भी यही दिखाई देता है – कुल मिलाकर, एडम्स ब्रिज का लगभग 99.98 प्रतिशत हिस्सा उथले और बहुत उथले पानी में डूबा हुआ है।’’ <strong>ISRO</strong></p>
<p style="text-align:justify;">यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि इससे पहले उपग्रह अवलोकनों ने डूबी हुई संरचना की उपस्थिति की पुष्टि की है, लेकिन ये उन हिस्सों पर केंद्रित थे जो पानी से ऊपर थे। इस तरफ समुद्र की उथली गहराई ने जहाजों से इस पुल का नक्शा बनाने के पिछले प्रयासों में भी बाधा डाली है। इस बार, शोधकर्ताओं ने ICESat-2 के हरे रंग के लेजर से निकलने वाले फोटॉन का इस्तेमाल किया, जिसमें लगभग 40 मीटर की गहराई तक समुद्र तल का पता लगाने की क्षमता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन में कहा गया है, ‘‘इस संभावना से संकेत लेते हुए, हमारे शोध में, हमने गहराई की जानकारी का प्रतिनिधित्व करने वाले लगभग 0.2 मिलियन फोटॉन एकत्र किए हैं और एडम्स ब्रिज की सीमा के लिए 10 मीटर रिजॉल्यूशन का बाथिमेट्रिक डेटा तैयार किया है।’’ एडम्स ब्रिज की वर्तमान भौतिक विशेषताओं की पुष्टि करने के लिए, वैज्ञानिकों ने 3D-व्युत्पन्न मापदंडों के माध्यम से बाथिमेट्रिक डेटा से दृश्य व्याख्याओं का उपयोग किया, जिसमें आकृति, ढलान और वॉल्यूमेट्रिक विश्लेषण शामिल थे।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/now-isro-scientists-have-got-a-big-success-on-ram-setu/article-59717</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/national/now-isro-scientists-have-got-a-big-success-on-ram-setu/article-59717</guid>
                <pubDate>Fri, 12 Jul 2024 12:52:05 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2024-07/isro.jpg"                         length="34301"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रामसेतु: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। उच्चतम न्यायालय ने ‘रामसेतु’ को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा देने की मांग वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर केंद्र सरकार को फरवरी के पहले सप्ताह तक अपना जवाब दाखिल करने का समय दिया है। मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/ram-setu-supreme-court-seeks-answers-from-central-government/article-42256"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-01/supreme-court-of-india-3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> उच्चतम न्यायालय ने ‘रामसेतु’ को राष्ट्रीय धरोहर का दर्जा देने की मांग वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की याचिका पर केंद्र सरकार को फरवरी के पहले सप्ताह तक अपना जवाब दाखिल करने का समय दिया है। मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को राज्यसभा सांसद डॉ. स्वामी की संक्षिप्त दलीलें सुनने के बाद सरकार को फरवरी के प्रथम सप्ताह तक अपना जवाबी हलफनामा दायर करने का आदेश दिया। शीर्ष अदालत इस मामले में अगली सुनवाई फरवरी के दूसरे सप्ताह में करेगी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">क्या है मामला</h3>
<p style="text-align:justify;">डॉ. स्वामी ने पीठ के समक्ष दलील देते हुए कहा कि केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल ने 12 दिसंबर तक अपना जवाब दाखिल करने को वचन दिया था, लेकिन उस पर अमल नहीं किया गया। उन्होंने केंद्र सरकार द्वारा अदालत के समक्ष दिये गये वचन का पालन नहीं करने पर केंद्रीय कैबिनेट सचिव को समन जारी करने की मांग की , लेकिन पीठ ने उनकी इस गुहार को अस्वीकार कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. स्वामी ने भारत और श्रीलंका के बीच मौजूद खाड़ी में तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चट्टानों से निर्मित ‘रामसेतु’ को राष्ट्रीय धरोहर घोषित करने की मांग करते हुए 2007 में एक याचिका दायर की थी। हिंदू धर्म में विश्वास रखने वाले बहुत से लोगों का मानना है कि ये चट्टानें रामायण काल की हैं। केंद्र सरकार ने 2021 में यह पता लगाने के लिए शोध की अनुमति दी थी कि रामसेतु मानव निर्मित है या नहीं। इसके अलावा इसके बनने का समय क्या है और क्या यह रामायण के दौर से मिलता है।</p>
<p><b>अन्य </b><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a></strong><b> हासिल करने के लिए हमें </b><strong><a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a></strong><b> और </b><strong><a href="https://twitter.com/SACHKAHOON">Twitter</a></strong><b>, <a href="https://www.instagram.com/sachkahoon/">Instagram</a>, <a href="https://www.linkedin.com/company/sachkahoon">LinkedIn</a> , <a href="https://www.youtube.com/channel/UCOcEoUWkETVpZIzmQPVlpfg">YouTube</a>  पर फॉलो करें।</b></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/ram-setu-supreme-court-seeks-answers-from-central-government/article-42256</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/national/ram-setu-supreme-court-seeks-answers-from-central-government/article-42256</guid>
                <pubDate>Thu, 12 Jan 2023 15:22:30 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2023-01/supreme-court-of-india-3.jpg"                         length="27812"                         type="image/jpeg"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>विज्ञान की कसौटी पर रामसेतु</title>
                                    <description><![CDATA[रामेश्वरम से लेकर श्रीलंका के बीच रामसेतु के चित्र आने के बाद से विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्था नासा सहित अनेक संस्थानों ने रामसेतु की सरंचना पर शोध किए हैं। इनके निष्कर्ष से तय हुआ है कि उथले समुद्र में दिखाई देने वाली 48 किलोमीटर लंबी सेतु सरंचना रामायणकालीन रामसेतु ही है। पुरातत्वीय अनुसंधानों ने भी […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ram-setu-on-the-test-of-science/article-21534"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/ram-setu-on-the-test-of-science.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:center;"><strong>रामेश्वरम से लेकर श्रीलंका के बीच रामसेतु के चित्र आने के बाद से विश्व प्रसिद्ध वैज्ञानिक संस्था नासा सहित अनेक संस्थानों ने रामसेतु की सरंचना पर शोध किए हैं। इनके निष्कर्ष से तय हुआ है कि उथले समुद्र में दिखाई देने वाली 48 किलोमीटर लंबी सेतु सरंचना रामायणकालीन रामसेतु ही है।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">पुरातत्वीय अनुसंधानों ने भी इसे भारत की ही नहीं दुनिया की करीब सात हजार साल पुरानी सबसे प्राचीन मानव निर्मित धरोहरों में से एक माना है। सेतु समुद्रम परियोजना ने भी इसकी पौराणिक मान्यता स्वीकारी है। बावजूद इसके अनेक रहस्य समुद्र के गर्भ में छिपे हैं। इन्हीं रहस्यों की परतें खंगालने के लिए अब वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआईआर) की राष्ट्रीय समुद्र विज्ञान संस्थान, गोवा इसकी विज्ञान सम्मत पड़ताल करेगी। इसके तहत यह जानकारी जुटाई जाएगी कि रामसेतु की अधोसरंचना कैसी है ? भूगर्भीय हलचल का इस पर कितना अरस पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश के इतिहास में पहली बार होगा कि किसी धार्मिक मान्यता वाले स्थल का वैज्ञानिक आधार तलाशने के लिए वैज्ञानिक अभियान चलाएंगे। कार्बन डेटिंग तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाएगा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण इसकी प्राचीनता और मानव निर्मित होने के बिंदुओं पर पहले से ही अनुसंधान कर रहा है। अब इन दोनों संस्थानों के निष्कर्ष से यह परिणाम निकाला जाएगा कि क्या वाकई रामसेतु रामायणकालीन सरंचना है। हालांकि राम जन्मभूमि की तरह रामसेतु का भी सत्यापन होना तय है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल सेतु समुद्रम परियोजना के अंतर्गत मनमोहन सिंह सरकार के वक्त से दरअसल समुद्र में जहाजों की आवाजाही के लिए रास्ता बनाया जाना प्रस्तावित है। यह रास्ता नौवहन मार्ग (नॉटिकल मील) 30 मीटर चौड़ा, 12 मीटर गहरा और 167 किमी लंबा होगा। यह परियोजना यदि पूर्व रूप में आकार लेती है तो पौराणिक काल में अस्तित्व में आए रामसेतु का टूटना तय था। साथ ही करोड़ों मछुआरों की आजिविका प्रभावित होती और बड़े पैमाने पर समुन्द्री क्षेत्र का पर्यावरण नष्ट हो जाता।</p>
<p style="text-align:justify;">बावजूद पूर्व संप्रग सरकार ने सेतु-समुद्रम परियोजना के सिलसिले में उच्चतम न्यायालय में शपथपत्र देकर दलील दी थी कि एडम ब्रिज अर्थात रामसेतु हिंदू धर्म का आवश्यक हिस्सा नहीं है, इसलिए इसे तोड़कर बनाए जाने में हिंदू धर्मांवलंबियों की आस्था आहत नही होगी। यह शपथपत्र हिंदुओं की ही नहीं, भारत की सांस्कृतिक विरासत के साथ खिलवाड़ था। श्री राम हिंदुओं के ही नहीं भारत की पहचान हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि राम और कृष्ण भारतीय संदर्भ में दो ऐसे महामानव हैं, जिनकी लीलाओं से ही भारतीय संस्कृति न केवल फली-फूली है, बल्कि इसके संस्कार और रीति-रिवाज भी इन्हीं की उत्सवधर्मिता से विकसित हुए हैं। तमिलनाडू की मन्नार खाड़ी से पाक जलडमरूमध्य के बीच 5 जिलों में 138 गांव, कस्बे व नगर ऐसे हैं जिनकी बहुसंख्यक आबादी समुद्री जल-जीव व अन्य प्राकृतिक संपदा पर आश्रित है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय समुद्र की तटवर्ती पट्टी 5 हजार 660 किमी लंबी है। गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, उड़ीसा, तमिलनाडू, पश्चिम-बंगाल, गोवा राज्यों और केंद्र शासित राज्य पांडिचेरी, लक्षद्वीप तथा अण्डमान-निकोबार द्वीप समूह के तहत विशाल तटवर्ती क्षेत्र फैले हैं। रामसेतु की विवादित धरोहर रामेश्वरम को श्रीलंका के जाफ्ना द्वीप से जोड़ती है। यह मन्नार की खाड़ी में स्थित है। यहीं जो रेत, पत्थर और चूने की दीवार की 48 किमी लंबी पारनुमा सरंचना है, उसे ही रामसेतु का अवशेष माना जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका की विज्ञान संस्था नासा ने इस पुल के 2007 में उपग्रह से चित्र लेकर अध्ययन करने के बाद दावा किया था कि मानव निर्मित यह पुल दुनिया की सबसे पुरानी सेतु संरचना है। इस नाते राम की इस धरोहर को सुरक्षित रखने की जरूरत हैं। बाल्मीकि रामायण, स्कंद पुराण, ब्रह्म पुराण, विष्णु पुराण, अग्नि पुराण, रामकियेन और रामचरित मानस में इस सेतु के निर्माण और इसके ऊपर से लंका जाने के विवरण हैं। इन ग्रंथों के अनुसार राम और उनके खोजी दल ने रामेश्वरम से मन्नार तक जाने के लिए वह मार्ग खोजा जो अपेक्षाकृत सुगम होने के साथ रामेश्वरम के निकट था। जहां से राम व उनकी बांनर सेना ने उपलब्ध सभी प्रमुख 65 रामायणों के अनुसार लंका के लिए कूच किया था।</p>
<p style="text-align:justify;">माना जाता है कि 500 साल पहले तक यहां पानी इतना कम था कि मन्नार और रामेश्वरम के बीच लोग सेतुनुमा टापूओं से होते हुए पैदल ही आया-जाया करते थे। वैसे इस क्षेत्र में ऐसे छिद्रयुक्त कम दबाव व भार वाले पत्थर भी पाए जाते हैं, जो पानी में नहीं डूबते। दरअसल ज्वालामुखी फूटने के समय ऐसे पत्थर प्राकृतिक रूप से निर्मित हो जाते हैं, जिनके भीतर हवा भरी रहती है।  नल और नील ने जिन पत्थरों का उपयोग सेतु निर्माण में किया था, शायद ये उन्हीं पत्थरों के अवशेष हों, जो आज भी धार्मिक स्थलों पर देखने को मिल जाते हैं। साथ ही, नल-नील के नेतृत्व में वानरों ने पेड़ों के तनों और बांसों को खोखला करके उनके दोनों सिरों को सीलबंद कर दिया। इस कारण ये तने पानी में डूबे नहीं। इन वायु भरे तनों को ताड़वृक्ष के पत्तों एवं छाल की बनी डोरियों, रस्सियों और कसनों से बांधकर इस पुल को मजबूत आधार दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">देश की कई नदियों पर इसी तकनीक से टंकियों व नावों पर बने पुल देखे जा सकते हैं। इस तरह पांच दिन में यह पुल तैयार हुआ। इस पुल को पार कर राम सेना श्रीलंका में सुबेल पर्वत पर पहुंची और सैन्य शिविरों की स्थापना की। समुद्र में उपलब्ध शैवाल (काई) भी एक महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ है। शैवाल में प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होती है। लेकिन इसे खाने लायक बनाए जाने की तकनीकों का विकास हम ठीक ढंग से अब तक नहीं कर पाए हैं। लिहाजा इसे खाद्य के रूप में परिवर्तित कर दिया जाए तो परंपरागत शाकाहारी लोग भी इसे आसानी से खाने लगेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">शैवाल में अच्छे किस्म की चॉकलेट से कहीं ज्यादा ऊर्जा होती है। आयुर्वेद औषधियों तथा आयोडीन जैसे महत्वपूर्ण तत्व भी इसमें होते हैं। ये शैवाल भित्तियां उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में न केवल खाद्य संसाधनों, बल्कि जैव रासायनिक प्रक्रियाओं में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं । तटीय क्षेत्रों मे ये लहरों का अवरोध बनकर, कटाव को बाधित करती हैं। 750 प्रकार की मछलियों के आहार व प्रजनन की भी यही काई प्रमुख साधन है। यहां थोरियम के बड़े भण्डार हैं। विश्व का 30 प्रतिशत थोरियम भारत में ही मिलता है। जो यूरेनियम बनाने के काम आता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनामी कहर के विश्व प्रसिद्ध विशेषज्ञ डॉ. मूर्ति के अनुसार 26 दिसंबर 2004 को आए सुनामी तूफान के दौरान रामसेतु देश के दक्षिण हिस्से के लिए सुरक्षा कवच साबित हुआ था। यानि रामसेतु प्राकृतिक आपदा का भी बड़ा अवरोधक है। गोया, इस पुरातात्विक, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक महत्व की अद्वितीय विरासत का आयोध्या के राम जन्मभूमि मंदिर की तरह सरंक्षण करना जरूरी है।</p>
<p><strong>अन्य <a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a> हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ram-setu-on-the-test-of-science/article-21534</link>
                <guid>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ram-setu-on-the-test-of-science/article-21534</guid>
                <pubDate>Fri, 05 Feb 2021 21:03:15 +0530</pubDate>
                                    <enclosure
                        url="https://www.sachkahoon.com/media/2021-02/ram-setu-on-the-test-of-science.gif"                         length="103488"                         type="image/gif"  />
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>

            </channel>
        </rss>
        