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                <title>Iinspiration - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>सच्चे सतगुरु जी ने शिष्य को बख्शी नई जिदंगी</title>
                                    <description><![CDATA[सन् 1988 की बात है। मेरी शादी के चार वर्ष उपरांत मेरे परिवार ने मुझे अलग कर दिया। मेरे सिर पर इतना कर्ज हो गया कि मैं अपनी सारी जायदाद बेचकर भी उसे उतार नहीं सकता था। एक दिन मैंने सोचा कि ऐसी जिंदगी से मरना ही बेहतर है। मैं अपने कमरे में जाकर आत्महत्या […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/true-satguru-ji-gave-new-life-to-the-disciple/article-29080"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-12/shah-satnam-ji-maharaj.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सन् 1988 की बात है। मेरी शादी के चार वर्ष उपरांत मेरे परिवार ने मुझे अलग कर दिया। मेरे सिर पर इतना कर्ज हो गया कि मैं अपनी सारी जायदाद बेचकर भी उसे उतार नहीं सकता था। एक दिन मैंने सोचा कि ऐसी जिंदगी से मरना ही बेहतर है। मैं अपने कमरे में जाकर आत्महत्या करने के बारे में सोचने लगा। उसी समय मेरे गांव का एक प्रेमी दर्शन सिंह मेरे पास आकर सरसा आश्रम में जाने के लिए कहने लगा। उसकी बात पर विचार करते हुए मैंने अपने मन में सोचा कि मर तो जाना ही है, क्यों न पहले अपने सतगुरू परम पिता परमात्मा जी के दर्शन कर आएं। हम डेरा सच्चा सौदा, सरसा पहुंच गए। मजलिस में शब्दवाणी चल रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ देर बार पूजनीय परम पिता जी स्टेज पर आए, हमनें खूब दर्शन किए। पूजनीय परम पिता जी ने एक शब्द की व्याख्या करते हुए वचन फरमाए, ‘‘कई लोग कर्ज के नीचे दब जाते हैं। वे सोच लेते हैं कि कर्जा तो उतरेगा नहीं, कुछ खा-पी कर मर ही जाएं। सत्संगी को ऐसा कभी नहीं करना चाहिए क्योंकि आत्मघाती महापापी होता है। इससे उसके सतगुरू की बदनामी होती है। जिस तरह चलते राही को कांटेदार झाड़ियां चिपट जाती हैं और अपने आप ही उतर जाती हैं। इसी तरह मालिक उसकी फसल में बरकत डालता है और साल-दो साल में कर्ज उतर जाता है।’’ ये वचन सुनकर मेरा मन बदल गया और मैंने वहीं बैठे-बैठे प्रण कर लिया कि आत्मघात जैसा पाप मैं कभी नहीं करूंगा। सतगुरू जी की रहमत से दो साल में मेरा सारा कर्ज उतर गया।<br />
<strong>श्री गुरतेज सिंह, मसीतां, सरसा (हरियाणा)</strong></p>
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                <pubDate>Mon, 13 Dec 2021 06:05:54 +0530</pubDate>
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                <title>शहनशाही रहमत : ‘‘नहीं, तू सीधा उनके घर जाना। तू डर मत, हम तेरे साथ हैं। ऐसा कुछ नहीं होगा।’’</title>
                                    <description><![CDATA[गांव लालेआणा(भटिंडा) में एक ऐसा परिवार था जिसका वहां के एक परिवार से काफी मनमुटाव था। इस परिवार का मुखिया हमेशा अपने पास हथियार रखता था। उसने पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज से नाम दान लिया हुआ था। एक दिन वह पूजनीय परम पिता जी से मिला। उसे देखकर पूजनीय परम पिता जी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/shah-satnam-ji-maharaj-2/article-27746"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-10/shah-satnam-singh-ji-mahara.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गांव लालेआणा(भटिंडा) में एक ऐसा परिवार था जिसका वहां के एक परिवार से काफी मनमुटाव था। इस परिवार का मुखिया हमेशा अपने पास हथियार रखता था। उसने पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज से नाम दान लिया हुआ था। एक दिन वह पूजनीय परम पिता जी से मिला। उसे देखकर पूजनीय परम पिता जी बोले, ‘‘बेटा! क्या बात है, तू हर वक्त हथियार अपने पास रखता है?’’ वह बोला, पिता जी हमारी दुश्मनी बहुत है। इतना सुनकर पूजनीय परम पिता जी बोले, ‘‘बेटा, दुश्मनी को खत्म करो।</p>
<p style="text-align:justify;">इसने बहुत से घर बर्बाद कर दिये। सत्संगी को हमेशा सबके साथ प्रेम का व्यवहार रखना चाहिए। तू गांव में जाकर इस बंदूक को संभाल कर रख दे। फिर खाली हाथ उनके (दुश्मन) के घर जाकर दीनतापूर्वक उनको कहना कि अपनी कोई दुश्मनी नहीं है।’’ फिर वह पूजनीय परम पिता से बोला कि पिता जी, खाली हाथ जाऊंगा तो कहीं वे मुझे मार न दें। पूजनीय परम पिता जी कहने लगे, ‘‘नहीं, तू सीधा उनके घर जाना। तू डर मत, हम तेरे साथ हैं। ऐसा कुछ नहीं होगा।’’ घर जाकर उसने अपने सतगुरू के वचनानुसार वैसा ही किया। बंदूक रखकर वह खाली हाथ सीधा उनके घर चला गया। जब वह उनके आंगन में गया तो उसने अपने दोनों बाजू ऊपर उठा लिये और नम्रतापूर्वक कहने लगा कि मैं तुम्हारे पास दुश्मन बनकर नहीं बल्कि दुश्मनी खत्म करने आया हूं। मुझे पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज जी ने आपके पास गिल-शिकवे दूर करने के लिए भेजा है।</p>
<p style="text-align:justify;">उसकी नम्रता देखकर वे अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने भी उस व्यक्ति को क्षमा करते हुए अपने घर में आदर सहित बैठाया और चाय वगैरह पिलाई। फिर सदा के लिए वे आपसी वैर-भाव भुलाकर एक हो गए। यह पूजनीय परम पिता जी पावन शिक्षाओं पर अमल करते हुए ही संभव हुआ। बाद में उस परिवार ने भी पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज से नामदान प्राप्त कर लिया।<br />
<strong>– श्री हाकम सिंह, महमा सरजा, बठिंडा।</strong></p>
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                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 21 Oct 2021 06:05:12 +0530</pubDate>
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                <title>ज्ञानकोष्ठ : आज भारत के नौवें राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा का जन्म दिवस है</title>
                                    <description><![CDATA[आज भारत के नौवें राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा का जन्म दिवस है। उनका जन्म 19 अगस्त, 1918 को भोपाल में हुआ था। डॉ. शकंरदयाल शर्मा प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। उन्होंने शिक्षा से लेकर राजनीति में जो भी मुकाम हासिल किया अपनी मेहनत से। राष्ट्रपति बनने से पहले वह उपराष्ट्रपति भी रह चुके थे। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/today-is-the-birthday-of-the-ninth-president-of-india-dr-shankar-dayal-sharma/article-26168"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-08/dr.-shankar-dayal-sharma-to-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज भारत के नौवें राष्ट्रपति डॉ. शंकर दयाल शर्मा का जन्म दिवस है। उनका जन्म 19 अगस्त, 1918 को भोपाल में हुआ था। डॉ. शकंरदयाल शर्मा प्रतिभा के धनी व्यक्ति थे। उन्होंने शिक्षा से लेकर राजनीति में जो भी मुकाम हासिल किया अपनी मेहनत से। राष्ट्रपति बनने से पहले वह उपराष्ट्रपति भी रह चुके थे। उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी, आगरा कॉलेज, लखनऊ यूनिवर्सिटी से शिक्षा ग्रहण की। फिट्जविलियम कॉलेज, कैंब्रिज यूनिवर्सिटी से पीएचडी की। उन्हें लखनऊ विश्विद्यालय से समाज सेवा के लिए चक्रवर्ती स्वर्ण पदक भी दिया गया। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय तथा कैंब्रिज में कानून का अध्यापन कार्य भी किया।</p>
<p style="text-align:justify;">सन 1940 में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के लिए शंकर दयाल शर्मा ने कांग्रेस की सदस्यता ली। आजादी के बाद वह सन 1952 में भोपाल के मुख्यमंत्री बनाए गए। इस पद पर 1956 तक रहे। 1960 के दशक में शंकरदयाल शर्मा ने इंदिरा गांधी को कांग्रेस पार्टी का नेतृत्व करने का समर्थन दिया। इंदिरा सरकार की कैबिनेट में 1974 से 1977 तक संचार मंत्री रहे। भोपाल लोकसभा सीट से सन 1971 और 1980 में दो बार लोकसभा चुनाव जीतने के बाद शंकर दयाल शर्मा संसद पहुंचे। वर्ष 1984 आन्ध्र प्रदेश के राज्यपाल के कार्यकाल के दौरान सिख चरमपंथियों ने दिल्ली में रह रहे उनकी बेटी और दामाद की हत्या कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">1985 से 1986 तक वह पंजाब के राज्यपाल रहे। इस दौरान सिखों और भारत सरकार के बीच लगातार बढ़ते संघर्ष की वजह से वहां हालात बहुत खराब थे, इसीलिए वह पंजाब के राज्यपाल पद से इस्तीफा देने के बाद महाराष्ट्र के गवर्नर नियुक्त हुए। 1992 तक वह रामास्वामी वेंकटरमण के कार्यकाल में भारत के उपराष्ट्रपति के रूप में कार्य करते रहे। राष्ट्रपति चुनाव उन्होंने जार्ज स्वेल को हरा के जीता था। 26 दिसंबर, 1999 को उनका निधन हो गया।</p>
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                <pubDate>Thu, 19 Aug 2021 16:02:06 +0530</pubDate>
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                <title>ज्ञानकोष्ठ : स्टील का अविष्कार</title>
                                    <description><![CDATA[ऐसा कहा जाता है कि हैरी ब्रियरली (1813-1898) में पहली बार वह बंदूक के बैरल के लिए कुछ ऐसा बनाने की कोशिश कर रहा था, जो पानी से खराब न हो और उस पर कोई रासायनिक प्रभाव न पड़े। तभी प्रक्रिया शुरू हुई और 1872 ई. में, वुड्स और क्लार्क ने स्टील का आविष्कार आज […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/invention-of-steel/article-26023"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-08/invention-of-steel.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ऐसा कहा जाता है कि हैरी ब्रियरली (1813-1898) में पहली बार वह बंदूक के बैरल के लिए कुछ ऐसा बनाने की कोशिश कर रहा था, जो पानी से खराब न हो और उस पर कोई रासायनिक प्रभाव न पड़े। तभी प्रक्रिया शुरू हुई और 1872 ई. में, वुड्स और क्लार्क ने स्टील का आविष्कार आज ही के दिन किया और 1900 में पेरिस में एक प्रदर्शनी में स्टील के कुछ नमूने थे जो स्टेनलेस स्टील के समान थे। और 1903 ई. में इंग्लैंड में स्टेनलेस स्टील का पेटेंट कराया गया, उस समय स्टील में क्रोमियम की मात्रा 24 से 57 प्रतिशत और निकल की मात्रा 5 से 60 प्रतिशत तक थी और 1912 ई. गोलियां बनाना।</p>
<p style="text-align:justify;">स्टील मिश्र धातु का उपयोग किया गया था और 1935 ईस्वी में जर्मनी में एक प्रकार का स्टेनलेस स्टील का निर्माण किया गया था जिसमें निकल के स्थान पर मैंगनीज का उपयोग किया गया था क्योंकि जर्मनी में निकल की कमी थी। पहले स्टील को लेस स्टील कहा जाता था लेकिन स्थानीय कटलरी निर्माता आरएफ मोस्ले के अर्न्स्ट स्टुअर्ट ने इसे स्टेनलेस स्टील नाम दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रारंभ में स्टेनलेस स्टील को ‘एलेघेनी मेटल्स’ और ‘निरोस्टा स्टील’ जैसे विभिन्न ब्रांड नामों के तहत अमेरिका में बेचा गया था और 1929 में, ग्रेट डिप्रेशन के हिट होने से पहले, यूएस में 25,000 टन से अधिक स्टेनलेस स्टील का निर्माण और बिक्री की गई थी। स्टेनलेस स्टील की आयु लम्बी होती है और दूसरा इसके उपर जंग नही लगता और यह वायुमंडल तथा कार्बनिक और अकार्बनिक अम्लों से खराब नहीं होता है और लोहे की तुलना में स्टील करीब 1000 गुना अधिक मजबूत हो सकता है और लगभग 88 फीसद स्टील ऐसा है जिसे रिसाइकल किया जा सकता है।</p>
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]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Fri, 13 Aug 2021 15:48:18 +0530</pubDate>
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                <title>ज्ञानकोष्ट : जाने, भारतीय महिला हॉकी टीम ने पहला कांस्य पदक कब जीता था?</title>
                                    <description><![CDATA[भारत ने सुशीला चानू की कप्तानी में जूनियर महिला हॉकी विश्व कप-2013 में इंग्लैंड को 3-2 से पराजित कर कांस्य पदक जीता था। यह पहला अवसर है जब भारतीय महिला टीम ने इस प्रतियोगिता में पदक जीता है। हॉकी इंडिया ने जूनियर हॉकी टीम की प्रत्येक खिलाड़ी के लिए एक-एक लाख रुपए के पुरस्कार की […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/know-when-did-the-indian-womens-hockey-team-win-the-first-bronze-medal/article-25770"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-08/sushila-chanu-.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत ने सुशीला चानू की कप्तानी में जूनियर महिला हॉकी विश्व कप-2013 में इंग्लैंड को 3-2 से पराजित कर कांस्य पदक जीता था। यह पहला अवसर है जब भारतीय महिला टीम ने इस प्रतियोगिता में पदक जीता है। हॉकी इंडिया ने जूनियर हॉकी टीम की प्रत्येक खिलाड़ी के लिए एक-एक लाख रुपए के पुरस्कार की घोषणा की। जर्मनी के मोंशेंग्लाबाख में खेले गए कांस्य पदक मुकाबले में दोनों टीमें निर्धारित समय तक 1-1 से बराबरी पर थी जिसके बाद मैच का फैसला पेनल्टी शूट आउट से हुआ। भारत की तरफ से 18 वर्ष की रानी ने पेनल्टी पर पहला शॉट लिया और इसे गोल में तब्दील कर दिया लेकिन नवनीत कौर अपना शॉट चूक गई।</p>
<p style="text-align:justify;">रानी दूसरी पेनल्टी को भी गोल में बदलने में कामयाब रहीं लेकिन दोनों बार इंग्लैंड की एमिली डेफ्रोएंड ने अपनी टीम को बराबरी दिला दी। नवनीत ने फिर भारत को 3-2 से आगे किया और एन्ना टोमैन का शॉट मिस होते ही भारत ने जीत प्राप्त कर ली। विदित हो कि वर्ष 2012 के चैम्पियन हॉलैंड ने अर्जेन्टीना को पेनल्टी शूटआउट में 4-2 से पराजित कर जूनियर महिला हॉकी विश्व कप-2013 का खिताब बरकरार रखा। इस प्रतियोगिता में भारत को तीसरा, इंग्लैड को चौथा, स्पेन को पांचवां, आॅस्ट्रेलिया को छठा, अमेरिका को सातवां और दक्षिण अफ्रीका को आठवां स्थान मिला।</p>
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                                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 Aug 2021 16:44:14 +0530</pubDate>
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                <title>घमंड कभी न करने का ज्ञान</title>
                                    <description><![CDATA[तो बात उस समय की है, जब स्वामी विवेकानंद अपने लोकप्रिय शिकागो धर्म सम्मेलन के भाषण के बाद भारत वापस आ गये थे। अब उनकी चर्चा विश्व के हर देश में हो रही थी। सब लोग उन्हें जानने लगे थे। स्वामी जी भारत वापस आकर अपने स्वभाव अनुरूप भ्रमण कर रहे थे। इस समय वे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/the-wisdom-of-never-boasting/article-24951"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-07/swami-vivekananda.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">तो बात उस समय की है, जब स्वामी विवेकानंद अपने लोकप्रिय शिकागो धर्म सम्मेलन के भाषण के बाद भारत वापस आ गये थे। अब उनकी चर्चा विश्व के हर देश में हो रही थी। सब लोग उन्हें जानने लगे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वामी जी भारत वापस आकर अपने स्वभाव अनुरूप भ्रमण कर रहे थे। इस समय वे हिमालय और इसके आसपास के क्षेत्रों में थे। एक दिन वो घूमते घूमते एक नदी के किनारे आ गये। वहां उन्होंने देखा कि एक नाव है पर वह किनारा छोड़ चुकी है। तब वे नाव के वापस आने के इंतजार में वहीं किनारे पर बैठ गए।</p>
<p style="text-align:justify;">एक साधु वहां से गुजर रहा था। साधु ने स्वामी जी को वहां अकेला बैठा देखा तो वह स्वामी जी के पास गया और उनसे पूछा, तुम यहां क्यों बैठे हुए हो? स्वामी जी ने जवाब दिया, मैं यहां नाव का इंतजार कर रहा हूं। साधु ने फिर पूछा, तुम्हारा नाम क्या है? स्वामी जी ने कहा, मैं विवेकानंद हूं। साधु ने स्वामी जी का मजाक उड़ाते हुए उनसे कहा, अच्छा! तो तुम वो विख्यात विवेकानंद हो जिसको लगता है कि विदेश में जाकर भाषण दे देने से तुम बहुत बड़े महात्मा साधु बन सकते हो।</p>
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                <pubDate>Tue, 06 Jul 2021 13:24:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>आईए जानते हैं फादर्श-डे की शुरूआत कब और कहां से हुई</title>
                                    <description><![CDATA[फादर्श डे की शुरूआत अमेरिका से हुई थी। बता दें कि आॅफिशियल तरीके से सबसे पहला फदर्स-डे 19 जून 1909 को मनाया गया। इस खास दिन की प्रेरणा साल 1909 में मदर्स डे से मिली थी। वॉशिंगटन के स्पोकेन शहर में सोनोरा डॉड ने अपने पिता की स्मृति में इस दिन की शुरूआत की थी। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/lets-know-when-and-where-did-fathers-day-start/article-24567"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-06/fathers-day.jpg" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">फादर्श डे की शुरूआत अमेरिका से हुई थी। बता दें कि आॅफिशियल तरीके से सबसे पहला फदर्स-डे 19 जून 1909 को मनाया गया। इस खास दिन की प्रेरणा साल 1909 में मदर्स डे से मिली थी। वॉशिंगटन के स्पोकेन शहर में सोनोरा डॉड ने अपने पिता की स्मृति में इस दिन की शुरूआत की थी। इसके बाद साल 1916 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने इस दिवस को मनाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी। राष्ट्रपति कैल्विन कुलिज ने साल 1924 में इसे राष्ट्रीय आयोजन घोषित किया। वहीं अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने पहली बार साल 1966 में इस खास दिन को जून के तीसरे रविवार को मनाए जाने का फैसला किया।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">इसके बाद साल 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ज निक्सन ने इसे पहली बार नियमित अवकाश के रूप में घोषित किया। परिवार में पिता की छवि एक मजबूत इंसान की तरह होती है। मां की तुलना में बच्चे पिता के सामने अपना प्यार नहीं दिखा पाते हैं। लेकिन समय के साथ पिता के प्रति बच्चों का स्नेह खुल गया है। पहली बार पश्चिम वर्जीनिया के फेयरमोंड में 5 जुलाई 1908 में फादर्स डे मनाया गया था।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">दरअसल साल 1907 में मोनोगाह में कोयले की खान में दर्दनाक हादसा हुआ था। इसमें कई लोगों की जान चली गई थी। ऐसे में मृतक पिताओं को सम्मान और उन्हें याद करते हुए श्रीमती ग्रेस गोल्डन क्लेटन ने विशेष दिन पर आयोजन किया। पहली बार फादर्स डे पश्चिम वर्जीनिया के फेयरमोंट शहर में 5 जुलाई 1908 में मनाया गया था। इसे फादर्स डे का नाम दिया गया। बता दें कि प्रथम फादर्स डे चर्च आज भी फेयरमोंट शहर में है।</h6>
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                <pubDate>Sat, 19 Jun 2021 16:11:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>मृत्यु के समय इंसान को कितना कष्ट होता है?</title>
                                    <description><![CDATA[पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सन् 1960 से 1991 तक बहुत से सत्संग फरमाए और इस बीच सत्संगियों ने समय समय पर पूजनीय परम पिता जी से अनेक प्रश्न पूछे। जो कुछ प्रश्न विभिन्न स्त्रोतों से हमें प्राप्त हुए, उन्हें आपकी सेवा में प्रस्तुत कर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/how-much-does-a-person-suffer-at-the-time-of-death/article-24339"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-06/spiritual-question-and-answ.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में सन् 1960 से 1991 तक बहुत से सत्संग फरमाए और इस बीच सत्संगियों ने समय समय पर पूजनीय परम पिता जी से अनेक प्रश्न पूछे। जो कुछ प्रश्न विभिन्न स्त्रोतों से हमें प्राप्त हुए, उन्हें आपकी सेवा में प्रस्तुत कर रहे हैं:-</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सवाल: मृत्यु के समय इंसान को कितना कष्ट होता है?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>उत्तर:</strong> मालिक की भक्ति करने वाली रूह तो मृत्यु के समय शरीर को ऐसे छोड़ देती है जैसे कोई इन्सान अपने शरीर से कपड़ा उतार देता है। लेकिन निगुरे इन्सान को मृत्यु के समय असहनीय पीड़ा होती है। जैसे एक रेशमी तिल्लेदार कपड़े को कांटेदार झाड़ी पर रखकर खींचे तो वह कपड़ा तार-तार हो जाता है, उसी प्रकार शरीर छोड़ते समय उसकी आत्मा तार तार हो जाती है। हिन्दु धर्म के अनुसार यदि हजार बिच्छू एक साथ मिलकर डंक मारें। इसी तरह ही इस्लाम धर्म के अनुसार यदि किसी कांटेदार झाड़ी को इंसान के मुंह में डालकर गुदा के रास्ते खींची जाए तथा सिख धर्म के अनुसार यदि किसी जीवित मनुष्य की सारी हड्डियों का चूरा कर दिया जाए लेकिन उसके प्राण न निकलें, तब इसके जितनी पीड़ा उस जीवात्मा को होगी उतनी ही मृत्यु के समय आत्मा को होती है।</p>
<h4 style="text-align:center;"><strong>सवाल: जब मनुष्य सामूहिक रूप में किसी संकट में फंस जाता है, तो उसे अपना भला सोचना चाहिए या दूसरे का भी?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>उत्तर :</strong> इंसान कैसी भी स्थिति में क्यों न फंस जाए लेकिन उसे परमार्थ करना नहीं छोड़ना चाहिए। जो इन्सान परमात्मा की बनाई हुई खलकत से बेगर्ज प्रेम करता है तो परमात्मा भी उससे खुश रहता है तथा उसकी सहायता करता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सवाल: नाम देते समय कौन-कौन से तीन परहेज बताए जाते हैं?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>उत्तर :</strong> डेरा सच्चा सौदा में जब नाम-दान प्राप्त करते हैं तो पहले तीन वचन-तीन वायदे या इकरार अथवा प्रण करवाते हैं:-<br />
1. अंडा-मांस नहीं खाना<br />
2. शराब नहीं पीना<br />
3. पुरूषों ने पर-स्त्री को माता-बहन तथा बेटी समझना है और इसी तरह माता-बहनों ने पर-पुरूष को आयु के अनुसार पिता, भाई व पुत्र समझना है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सवाल: क्या मालिक की याद में रोने पर ही सतगुरू-मालिक के दर्श-दीदार जल्दी होते हैं?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>उत्तर :</strong> मुसलमान सूफी फकीरों का फरमान है कि तरी के रास्ते इंसान शीघ्र काबे में पहुुंचता है अर्थात् मालिक-सतगुरू के दर्श-दीदार के लिए दिल में इतनी जबरदस्त तड़प पैदा हो जाए, जितनी कि इन्सान के अंदर अपने बच्चे के लिए उस समय बन जाती है, जब वह मौत से जूझ रहा होता है। अगर उस तड़प की 10 प्रतिशत तड़प भी मालिक के लिए पैदा हो जाए तो मालिक को अंदर से दर्श-दीदार देने की पड़ते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सवाल: दो प्रेमी आपस में मालिक की चर्चा करें, क्या वह समय सुमिरन में गिना जाता है?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>उत्तर :</strong> मालिक की चर्चा, नामचर्चा अथवा प्रभु-भक्ति की बात, जिसमें अपना कोई स्वार्थ न हो वह एक तरह का सुमिरन ही है क्योंकि जहां मालिक की चर्चा में इन्सान का दिन गुजरता है, वहीं रात्रि को एकांतवास में जब मालिक की याद (सुमिरन) में बैठता है तो बहुत ही जल्दी ध्यान जमता है और सूरत (रू ह) शरीर के नौ द्वारों में से सिमटकर बहुत जल्दी एकाग्र होकर दसवें द्वार में पहुंचती है, जहां सतगुरू-मालिक के दर्श-दीदार होते हैं।</p>
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                <pubDate>Thu, 10 Jun 2021 15:05:30 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>आंखें खोलकर भी सो सकता है खरगोश</title>
                                    <description><![CDATA[दुनियाभर में सबसे ज्यादा यूरोपियन खरगोश को ही पाला जाता हैं। 2 किलो का खरगोश 9 किलो के कुत्ते के बराबर पानी पी सकता है। धरती पर पालतू खरगोश की लगभग 305 प्रजातियां और जंगली खरगोश की लगभग 13 प्रजातियां हैं। 1912 से पहले खरगोश को रोडेंट्स यानी चूहे, गिलहरी आदि की श्रेणी में रखा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/rabbit-can-sleep-with-open-eyes/article-21548"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-02/rabbit-can-sleep-with-open-eyes.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">दुनियाभर में सबसे ज्यादा यूरोपियन खरगोश को ही पाला जाता हैं। 2 किलो का खरगोश 9 किलो के कुत्ते के बराबर पानी पी सकता है। धरती पर पालतू खरगोश की लगभग 305 प्रजातियां और जंगली खरगोश की लगभग 13 प्रजातियां हैं। 1912 से पहले खरगोश को रोडेंट्स यानी चूहे, गिलहरी आदि की श्रेणी में रखा जाता था। खरगोश को पूरे शरीर में सिर्फ उसके पैरों की तली के माध्यम से ही पसीना आता हैं। खरगोश के जबड़े में 28 दांत होते हैं और रोचक बात ये है कि उनके दांत जीवनभर बढ़ते रहते हैं जो हर महीने 1 से.मी. तक बढ़ जाते हैं। जंगली खरगोश की उम्र लगभग 1-2 साल की और पालतू खरगोश की उम्र 8-10 साल की होती है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">हालांकि ऑस्ट्रेलिया में एक खरगोश 18 साल तक जीवित रहा था, जो कि एक वर्ल्ड रिकॉर्ड हैं। खरगोश का गर्भावस्था काल लगभग 30-32 दिनों का होता है। मादा खरगोश साल में कम से कम चार बार और एक बार में औसतन 3-7 बच्चे देती है। जन्म के समय खरगोश के बच्चे बिना बालों के पैदा होते हैं और उनकी आंखें तब तक नहीं खुलती जब तक वे लगभग 2 सप्ताह के नहीं हो जाते और लगभग 8 सप्ताह बाद वो अपनी माँ का दूध पीना छोड़ते हैं। खरगोश खाने में लगभग 6-8 घंटे खर्च करता है, और एक मिनट में लगभग 120 बार खाना चबाता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">खरगोश लगभग-लगभग 360 डिग्री तक देख सकता है, लेकिन उसकी नाक से ठीक नीचे एक ब्लाइंड स्पॉट होता है। इसलिए जो भोजन खरगोश खाता है उसे दिखाई नहीं देता बल्कि वह सिर्फ सूंघकर पता लगाता है। यह शाकाहारी होते हैं। ये घास, गाजर, फल, अनाज.. आदि खाते हैं। खरगोश भी घोड़े की तरह उल्टी नहीं कर सकते। खरगोश एक बार में अपने एक कान को भी हिला सकता है और ठंड से बचने के लिए यह अपने बाहरी कान को मोड़ भी लेता है यही कारण है कि खरगोश ठंड के बजाय गर्मियों में बेहतर सुन सकता हैं। खरगोश 1 दिन में 18 झपकी लेता है और कुल 8 घंटे सोता हैं और यह अपनी आँखे खोल कर भी सो सकता है।</h6>
<p> </p>
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                <pubDate>Sat, 06 Feb 2021 16:00:58 +0530</pubDate>
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