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                <title>Indian culture - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Western Culture: पश्चिमी सभ्यता का बढ़ता प्रचलन चिंताजनक</title>
                                    <description><![CDATA[Western Culture: आर्थिक रूप से देश प्रगति कर रहा है। तकनीकी रूप से भी देश का नाम सबसे आगे आ रहा है। इसके बावजूद समाज में गिरावट का दौर जारी है। देश में चोरी, हत्या, डकैती निरंतर बढ़ रही हैं। प्रत्येक व्यक्ति खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। कानून व्यवस्था की समस्या गंभीर है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/the-increasing-prevalence-of-western-civilization-is-worrying/article-51826"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/crime-10.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Western Culture: आर्थिक रूप से देश प्रगति कर रहा है। तकनीकी रूप से भी देश का नाम सबसे आगे आ रहा है। इसके बावजूद समाज में गिरावट का दौर जारी है। देश में चोरी, हत्या, डकैती निरंतर बढ़ रही हैं। प्रत्येक व्यक्ति खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। कानून व्यवस्था की समस्या गंभीर है। ऐसा कोई दिन नहीं होगा, जब लूटपाट की घटना नहीं घटित होती हो। पहले लूटपाट व हत्या की घटना कभी-कभार होती थी, लेकिन अब यह आम हो चुकी हैं। सरकारों के एजेंडे में सामाजिक गिरावट को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जाता, विशेष रूप से अधिकतर घटनाएं आपसी द्वेष बताकर प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है, लेकिन सवाल यह भी उठता है कि किस माहौल ने आपराधिक प्रवृत्ति पैदा की है। Western Culture</p>
<p style="text-align:justify;">टीवी चैनलों पर चलने वाली अनैतिक सामग्री अश्लील विज्ञापनों पर कोई सख्त कार्रवाई नहीं की गई, जिसका परिणाम यह हुआ कि मासूम बच्चे अपराध की दलदल में जा गिरे। रोज लुटेरे क्यों पैदा हो रहे हैं? रोजाना ही एटीएम तोड़ना, कैश वैन लूटना, जमीन-जायदाद के लालच में बेटों द्वारा पिता की हत्या करना, भाइयों द्वारा भाइयों की हत्या करना, प्रवासियों की संपत्ति हड़पना ऐसी कई घटनाएं हैं, जिन्होंने समाज में आतंक और अविश्वास का माहौल पैदा कर दिया है। यह मुद्दा केवल कानून व्यवस्था का नहीं है बल्कि इसकी जड़ सामाजिक विकास का असंतुलित होना है। Western Culture</p>
<p style="text-align:justify;">वैश्विक स्तर पर आ रहे परिवर्तनों के दुष्परिणामों को रोकने के लिए भारतीय समाज के पास कोई ढाल नहीं है। न तो शिक्षा का ढांचा मजबूत है और न ही सांस्कृतिक मंच तैयार है। आधुनिकता के नाम पर पाश्चात्य संस्कृति का प्रचार किया जा रहा है। भारतीय संस्कृति का दमन किया जा रहा है। भारतीय खान-पान, पहरावा, आपसी भाईचारा, रिश्ते नाते, कलाएं सबकुछ भुलते जा रहे हैं। विदेशों में अमन-शांति की चर्चा होती है, लेकिन हमारे देश में अपराध केवल अपराधियों के लिए ही नहीं बल्कि भ्रष्ट कर्मचारियों और अधिकारियों के लिए भी सोने की खान बन गया है। समाज में शांति, प्रेम और विश्वास से परिपूर्ण वातावरण के लिए सरकार को ठोस नीतियां बनानी होगी। Western Culture</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="जानें ‘One Nation’, ‘One Election’ से क्या होगा फायदा, पहली बार कब हुआ ‘एक देश एक चुनाव’" href="http://10.0.0.122:1245/one-nation-one-election-news/">जानें ‘One Nation’, ‘One Election’ से क्या होगा फायदा, पहली बार कब हुआ ̵…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Sep 2023 19:31:48 +0530</pubDate>
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                <title>भारतीय संस्कृति में शिक्षकों का पद सर्वोच्च : राज्यपाल</title>
                                    <description><![CDATA[चंडीगढ़ (एजेंसी)। हरियाणा के राज्यपाल सत्यदेव नारायण आर्य ने कहा है कि भारतीय संस्कृति (Indian culture) में शिक्षकों का सदैव सम्मान किया जाता है तथा देश में प्राचीन काल से ही गुरु का पद सर्वोच्च रहा है। आर्य रविवार को शिक्षक दिवस के अवसर पर राजभवन में आयोजित राज्य शिक्षक पुरस्कार समारोह में शिक्षकों को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/teachers-rank-highest-in-indian-culture-governor/article-5740"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-09/governor.jpg" alt=""></a><br /><p><strong>चंडीगढ़ (एजेंसी)।</strong> हरियाणा के राज्यपाल सत्यदेव नारायण आर्य ने कहा है कि भारतीय संस्कृति <strong>(Indian culture)</strong> में शिक्षकों का सदैव सम्मान किया जाता है तथा देश में प्राचीन काल से ही गुरु का पद सर्वोच्च रहा है।</p>
<p>आर्य रविवार को शिक्षक दिवस के अवसर पर राजभवन में आयोजित राज्य शिक्षक पुरस्कार समारोह में शिक्षकों को सम्मानित करने के बाद संबोधित कर रहे थे। उन्होंने राज्यभर के 32 शिक्षकों को राज्य शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित किया।</p>
<p>उन्होंने शिक्षकों को शिक्षक दिवस पर बधाई देते हुए कहा कि गुरु -शिष्य का रिश्ता भी प्राचीनकाल से ही पावन और प्रगाढ़ रहा है। संत कबीर ने तो गुरु-महिमा का वर्णन इस प्रकार किया है ‘गुरु गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पाय।</p>
<p>बलिहारी गुरु आपने, जिन गोविन्द दियो बताय। राज्यपाल ने कहा कि गुरूओं द्वारा दी गई श्रेष्ठ शिक्षा के ही परिणामस्वरूप कभी भारत को विश्वगुरु का दर्जा प्राप्त था।</p>
<p>इतिहास साक्षी है कि नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए पूरे संसार से छात्र आते थे। उन्होंने शिक्षकों का आह्वान किया कि वे भारत को फिर से विश्वगुरु बनाने में अपना योगदान दें ।</p>
<p>श्री आर्य ने पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि वे महान शिक्षक, चिन्तक, दार्शनिक और विद्वान थे।वे जानते थे कि शिक्षक समाज का वह अंग है जो भावी पीढ़ी का निर्माण करता है। शिक्षक ही समाज को राजनेता, समाजनेता, प्रशासक, विज्ञानवेत्ता, सैनिक, तकनीशियन आदि देते हैं। इसलिए आपको राष्ट्र-निमार्ता कहा जाता है।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Sep 2018 17:40:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>मितव्ययिता है भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श</title>
                                    <description><![CDATA[प्रत्येक वर्ष 30 अक्टूबर को पूरी दुनिया में विश्व मितव्ययिता दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1924 में इटली के मिलान में पहला अंतर्राष्ट्रीय मितव्ययिता सम्मेलन आयोजित किया गया था और उसी में एकमत से एक प्रस्ताव पारित कर विश्व मितव्ययिता दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया गया। तभी से यह दिन दुनिया भर में बचत […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/economy-is-the-key-role-of-indian-culture/article-3468"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/gandhi-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रत्येक वर्ष 30 अक्टूबर को पूरी दुनिया में विश्व मितव्ययिता दिवस मनाया जाता है। वर्ष 1924 में इटली के मिलान में पहला अंतर्राष्ट्रीय मितव्ययिता सम्मेलन आयोजित किया गया था और उसी में एकमत से एक प्रस्ताव पारित कर विश्व मितव्ययिता दिवस मनाये जाने का निर्णय लिया गया। तभी से यह दिन दुनिया भर में बचत करने को प्रोत्साहन देने के लिए मनाया जाता है। मितव्ययिता दिवस केवल बचत का ही दृष्टिकोण नहीं देता है बल्कि यह जीवन में सादगी, संयम, अनावश्यक खर्चों पर नियंत्रण, त्याग एवं आडम्बर-दिखावामुक्त जीवन को प्राथमिकता देता है। महात्मा गांधी ने कहा- सच्ची सभ्यता वह है जो आदमी को कम-से-कम वस्तुओं पर जीना सीखाए। आधुनिक विचारक भी इसी तर्ज पर सोचने लगे हैं। प्रधामंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने इसी सोच को आकार दे रहे हैं और इसीलिये खादी और चर्खा उनकी प्राथमिकता बने हैं। उपयुक्त प्रौद्योगिकी की बात करते हुए इंग्लैंड के विचारक शूमाखर कहते हैं कि बड़े-बड़े कारखानों की अपेक्षा कम खर्च वाला गांधी का चर्खा कई दृष्टियों से अधिक उपयुक्त हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आर्थिक विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने के लिये मितव्ययिता जरूरी है। मोदी सरकार ने मितव्ययिता के लिये ही वीआईपी कल्चर पर नियंत्रण लगाया है। मंत्रियों की विदेश यात्राओं एवं अन्य भोग-विलास एवं सुविधाओं पर अंकुश लगाया गया है। सरकार ने मितव्ययिता एवं बचत का नारा दिया है। संचार माध्यमों से पानी बचाओ, बिजली बचाओ का उद्घोष प्रसारित हो रहा है। यह एक आवश्यक और उपयोगी कदम है, पर जब तक कोई भी आदर्श जीवनशैली का अंग नहीं बनता है, तब तक वह स्थायी नहीं बन पाता। समय के साथ वह बहुत जल्दी विस्मृत हो जाता है। इस प्रकार के अनेक उद्घोष सरकारी मंचों से जननेताओं द्वारा उद्घोषित होते रहे हैं, किन्तु उनका आधार गहरा नहीं होने के कारण वे जीवन से जुड़ नहीं सके। मितव्ययिता भारतीय संस्कृति का प्रमुख आदर्श रहा है। सुखी और स्वस्थ जीवन के लिए उसका बहुत बड़ा महत्व है। आज की उपभोक्तावादी एवं सुविधावादी जीवन-धारा में उसके प्रति किसी का भी लक्ष्य प्रतीत नहीं होता। यदि मितव्ययिता का संस्कार लोकजीवन में आत्मसात हो जाये तो समाज एवं राष्ट्र में व्याप्त प्रदर्शन, दिखावा एवं फिजुलखर्ची पर नियंत्रण हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक सामाजिक और राष्ट्रीय संपदा का यह अर्थहीन अतिरिक्त भोग और दूसरी तरफ अनेक-अनेक व्यक्ति जीवन की मौलिक और अनिवार्य अपेक्षाओं की पूर्ति के लिए भी तरसते रहते हैं। यह आर्थिक विषमता निश्चित ही सामाजिक विषमता को जन्म देती है। जहां विषमता है, वहां निश्चित हिंसा है। इस हिंसा का उद्गम है, पदार्थ का अतिरिक्त संग्रह, व्यक्तिगत असीम भोग, अनुचित वैभव प्रदर्शन, साधनों का दुरुपयोग। सत्ता का दुरुपयोग भी विलासितापूर्ण जीवन को जन्म देता है। जनता के कुछ प्रतिनिधि अपनी ही प्रजा के खून-पसीने की कमाई से किस कदर ऐशोआराम एवं भोग की जिन्दगी जीते हैं, यह भी सोचनीय है।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलीपींस के मारर्कोस दंपति जब देश छोड़कर भागे तो श्रीमती इमेल्दा मार्कोस के पास से इतनी जूतों की जोड़ियां मिली, जिन्हें वो एक जोड़ी को दूसरी बार पहने बिना नौ साल तक पहन सकती थी। उसके महल से एक गाऊन और छह ऐसी विशिष्ट पोशाकें बिल सहित मिलीं, जिनका बिल राष्ट्रपति मार्कोस को राष्ट्रपति होने के नाते जो वार्षिक पगार मिलती थी, उससे 19 गुणा अधिक था। रोमानिया के पदच्युत राष्ट्रपति निकोलाई चाऊसेस्कू की कहानी भी कम विलासिता की नहीं है। जूतों की एड़ियों में कीमती हीरे लगे होने की बात तो ऐसे व्यक्तियों के लिए सामान्य हो सकती हैं। चालीस कमरों वाले उनके महल का प्रत्येक स्नानागार सोने के संसाधनों से परिपूर्ण था। आधुनिक भारत के अनेक राजनेताओं के भी ऐसे किस्से चर्चित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसके पास कितना धन है, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्व इस बात का है कि अर्थ के प्रति व्यक्ति का दृष्टिकोण क्या है तथा उसका उपयोग किस दिशा में हो रहा है। प्रदर्शन एवं विलासिता में होने वाला अर्थ का अपव्यय समाज को गुमराह अंधेरों की ओर धकेलता है। विवाह शादियों में 35-40 करोड़ का खर्च, क्या अर्थ बर्बादी नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रश्न उठता है कि ये चकाचैंध पैदा करने वाली शादियां, राज्याभिषेक के आयोजन, राजनीतिक पार्टियां, जनसभाएं- मानवीय सभ्यता और संस्कृति के विनाश के ही कारण हैं। इस तरह की आर्थिक सोच एवं संरचना से क्रूरता बढ़ती है, भ्रष्टाचार की समस्या खड़ी होती है, हिंसा को बल मिलता है और मानवीय संवेदनाएं सिकुड़ जाती है। अर्थ केन्द्रित विश्व-व्यवस्था समग्र मनुष्य-जाति के लिये भयावह बन रही है। इसलिये विश्व मितव्ययिता दिवस जैसे उपक्रमों की आज ज्यादा उपयोगिता प्रासंगिकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मितव्ययिता का महत्व शासन की दृष्टि से ही नहीं व्यक्ति एवं समाज की दृष्टि से भी है। हमारे यहां प्राचीन समाज में मितव्ययिता के महत्व को स्वीकार किया जाता था। किसी सामान की बबार्दी नहीं की जाती थी और उसे उपयुक्त जगह पहुंचा दिया जाता था। भोग विलास में पैसे नहीं खर्च किए जाते थे, पर दान, पुण्य किए जाने का प्रचलन था।</p>
<p style="text-align:justify;">पुण्य की लालच से ही सही, पर गरीबों को खाना खिला देना, अनाथों को रहने की जगह देना, जरूरतमंदों की सहायता करना जैसे काम लोग किया करते थे। पर आज का युग स्वार्थ से भरा है, अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर भोग विलास में आपना समय और पैसे जाया करना आज के नवयुवकों की कहानी बन गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरों की मदद के नाम से ही वे आफत में आ जाते हैं, अपने माता-पिता तक की जिम्मेदारी नहीं लेना चाहते, दाई-नौकरों और स्टाफ को पैसे देने में कतराते हैं, पर अपने शौक मौज के पीछे न जाने कितने पैसे बर्बाद कर देते हैं। अपने मामलों में उन्हें मितव्ययिता की कोई आवश्यकता नहीं होती, पर कंपनी का खर्च घटाने में और दूसरों के मामले में अवश्य की जाती है। क्या मितव्ययिता का सही अर्थ यही है ? जब तक जन-जन को मितव्ययी जीवनशैली का व्यवस्थित प्रशिक्षण नहीं दिया जाएगा, तब तक इस प्रकार की त्रुटियों का सुधार नहीं हो पायेगा। यह तभी संभव है हम अर्थ के प्रति हमारा दृष्टिकोण बदलेगा एवं धन के प्रति व्यक्ति और समाज का दृष्टिकोण सम्यक होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वामी महावीर जी ने मितव्ययिता की दृष्टि से इच्छाओं के परिसीमन, व्यक्तिगत उपभोग का संयम एवं संविभाग यानी अपनी संपदा का समाजहित में सम्यक नियोजन के सूत्र दिये हैं। पंूजी, प्रौद्योगिकी और बाजार के उच्छृंखल विकास को नियंत्रित कर, व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सादगी एवं संयम को बल देकर, आर्थिक समीकरण एवं मानवीय सोच विकसित करके ही हम नया समाज दर्शन प्रस्तुत कर सकते हैं। ऐसा करके ही हम विश्व मितव्ययिता दिवस को मनाने की सार्थकता सिद्ध कर सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-ललित गर्ग</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 30 Oct 2017 03:41:08 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>भारतीय संस्कृति पूरे विश्व में सर्वश्रेष्ठ:  पूज्य गुरुजी</title>
                                    <description><![CDATA[रूहानी सत्संग: उमस भरी गर्मी के बावजूद पूज्य गुरु जी के दर्शनों को पहुंची लाखों में साध-संगत, 22780 लोगों ने लिया गुरुमंत्र सरसा। सत्संग में आना अपने आप में बहुत बड़ी बात है। भाग्यशाली होते हैं वह जीव, जो सत्संग में चलकर आते हैं, पर और भाग्य बना लेते हैं जब वह सुनकर अमल कमाया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/spiritual-news/indian-culture-top-on-the-world-saint-dr-msg/article-2415"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/saint-dr.-msg-1.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">रूहानी सत्संग: उमस भरी गर्मी के बावजूद पूज्य गुरु जी के दर्शनों को पहुंची लाखों में साध-संगत, 22780 लोगों ने लिया गुरुमंत्र</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>सरसा।</strong> सत्संग में आना अपने आप में बहुत बड़ी बात है। भाग्यशाली होते हैं वह जीव, जो सत्संग में चलकर आते हैं, पर और भाग्य बना लेते हैं जब वह सुनकर अमल कमाया करते हैं। आप भाग्यशाली बनो उसके लिए जरूरी है, सत्संग सुनना। उक्त वचन पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने रविवार को शाह सतनाम जी धाम में आयोजित रूहानी सत्संग में फरमाए। सत्संग के दौरान लाखों की संख्या में श्रद्धालुओं ने शिरकत की और पूज्य गुरुजी के वचनों को श्रवण किया। सत्संग के दौरान पूज्य गुरुजी ने 22,780 लोगों ने गुरुमंत्र लिया। हजारों लोगों ने जाम ए इन्सां ग्रहण कर बुराइयां त्यागने का संकल्प लिया।</p>
<h2 style="text-align:justify;">कलियुग में सबसे मुश्किल है राम के नाम में बैठना</h2>
<p style="text-align:justify;">श्रद्धालुआें को पावन वचनों से लाभांवित करते हुए पूज्य गुरुजी ने फरमाया कि आज का दौर कलियुग का दौर है, इस दौर में इन्सान मनमते ज्यादा चलता है। काम-वासना, क्रोध, लोभ, मोह, अंहकार, मन और माया इन सब ने इन्सान को अपना गुलाम बना रखा है। आज इन्सान विषय विकारों में समय लगाता है, ठग्गी, बेईमानी, भ्रष्टाचार में समय लगाता है, झूठ बोलना उसमें समय लगाता है, चुगलियां करना, निंदा करना, गप मारना यह आजकल आम बात हो गई है। इस कलियुग में सबसे मुश्किल है राम के नाम में बैठना। राम के नाम का जाप करना।</p>
<p style="text-align:justify;">आपजी ने फरमाया कि दस मिनट भी अगर प्रभु का नाम लेना पड़ जाए तो ऐसे लगता है कि जैसे बहुत सारा बोझ उठा लिया हो, ऐसे लगता है जैसे बहुत बड़ी कुर्बानी दे दी हो। दुनियां की तमाम बातें मसालेदार लगती हैं लेकिन राम नाम की बात अलुनी सिल की तरह लगती है कि यह तो बकबका समान है लेकिन आप नहीं जानते कई बकबकी चीजें सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होती है। नीम की दातुन बड़ी कड़वी होती है लेकिन दातों के साथ मुंह की बहुत सी बीमारियों से निजात दिला देती है। नीम, करेला, जामुन, मैथी यह ऐसी चीजें है जिसे कोई खाना पंसद नहीं करेगा लेकिन क्या आप जानते है कि यह चीजें शरीर सेहत के लिए कितनी फायदेमंद है और पुरातन समय में लोग इन्हें खाया करते थे।</p>
<h2 style="text-align:justify;">निंदा चुगली कभी भी नहीं करनी चाहिए</h2>
<p style="text-align:justify;">गांव में बड़ा अच्छा सा फल होता है नीम की निमौली। नीम के बीज लगते हैं पहले वह हरे रंग की होती है और फिर बाद में पीला रंग की हो जाती है। फिर हल्का सा संतरा रंग हो जाता है तो जब निमौली का रंग पीला या संतरा होता है तब वह खा ली या चुस ली जाए तो वह बहुत ही मीठी होती है और बड़ी ही गुणकारी होती है तो कहने का मतलब हर मीठी चीज फायदेमंद नहीं होती और हर कड़वी चीज नुकसानदायक नहीं होती।</p>
<p style="text-align:justify;">मीठे में चीनी है और अब डॉक्टर मानने लगे हैं कि चीनी सबसे घातक है, नमक है वह भी सबसे घातक है और आप नमक मिर्च वाली बाते ही पंसद करते हैं। जब खाने पीने में नमक मिर्च घातक है तो जो बातें भी नमक मिर्च वाली होती है वह भी उतनी ही घातक है। चुगली करते हो, एक तरह से आप दूसरों की मैल धोते हो, एक तरह से आप दूसरों की बुराइयां अपने आप में प्रवेश करने का मौका देते हो, इसलिए निंदा चुगली कभी भी नहीं करनी चाहिए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">समाज भलाई व राम-नाम की बातें करो</h2>
<p style="text-align:justify;">पूज्य गुरुजी ने फरमाया कि लोगों का एक रूतबा हो जाता है, लोग कहते हैं कि यह बंदा तो झूठ ही झूठ बोलता है, सारी जिंदगी निकल जाती है उन लोगों की लेकिन जब तक दिन में दस पंद्रह बार झूठ न बोल दे उनकी रोटी हजम नहीं होती और कोई भी उन पर यकीन नहीं करता। पता है कि छोड़ रहा है, झूठ बोल रहा है तो बातें वह करो जिसका कोई मूल्य हो, राम नाम की बात करो, हम गांरटी देने को तैयार हैं राम नाम की बात का मूल्य लाखों करोड़ो से बढ़ कर होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सृष्टि की भलाई की बातें करो। हम आपको गारंटी देते है सृष्टि की भलाई की बातें करने से किसी का भला हो ना हो आपका भला जरूर होगा। पुण्य दान की बात करो। सच्चा पुण्य, सच्चा दान बीमारों का ईलाज करवा दो, भूखों को खाना खिला दो, प्यासे को पानी पिला दो। यह कार्य करने की बातें करोगे और आप इन कार्यों को करोगे तो हम आपको गारंटी देते हैं कि आपका ही नहीं आपके परिवार का भला जरूर हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">तो यह वह बातें हैं तो मूल्यवान होती है, देश की तरक्की की बात, इन्सानियत और समाज के भले की बात यह बातें आप करो इसके साथ राम नाम की बात जैसे जैसे आप करते जाओगे वैसे वैसे आत्मिक शांति, आत्मिक आंनद आता जाएगा, लेकिन ऐसी बातें करने वाले बहुत कम होते हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">लग्न से सुनें सत्संग</h2>
<p style="text-align:justify;">पूज्य गुरुजी ने फरमाया कि आप सत्संग में आते हैं, हम भी सत्संग में आया करते थे और देखते थे कि सत्संग में कोई नया सज्जन आके बैठा है उससे हाथ मिलाया उससे पूछा सुना क्या हाल चाल है उधर राम नाम की चर्चा हो रही है। और इधर कोई और चर्चा हो रही है, बड़े दिनों के बाद आया है क्या हो गया और वह शुरू हो जाता है कि मेरे घर यह परेशानियां थी, मेरे घर में ये था वो था वगैहरा वगैरहा लेकिन वो जिसे सुना रहा है क्या वह तेरी तकलीफ दूर कर देगा, नहीं ना।</p>
<p style="text-align:justify;">अरे, सत्संग में तो खास कर, कोई भी तकलीफ कोई भी परेशानियां है अगर आप सत्संग लग्न से सुनोगे तो क्या पता वह मालिक आपकी परेशानियां दुख तकलीफ एक मिनट में दूर कर दे। ऐसी बातें अगर आपको सुनानी है , जो इसे सुनने के लायक है तो वह अल्लाह, वाहेगुरू, सतगुरू राम है जो सुनेगा भी और परेशानियां दूर भी करेगा।</p>
<h3 style="text-align:justify;">इन्सान, इन्सान को क्या देगा</h3>
<p style="text-align:justify;">इन्सान, इन्सान को क्या दे सकता है। ठीक है! आप घर परिवार में हैं तो आपस में बात करने से कोई परेशानी नहीं है उससे दिल हल्का होता है। आप अपने गम को शेयर करो लेकिन सुनने वाला सच्चा दोस्त हो, सच्चा इन्सानियत का पहरेदार हो, उसके सामने अगर बात करो तो हो सकता है कि कुछ न कुछ वह आपको राह दिखा दे और ऐसा करने से आपका गम भी थोड़ा बहुत दूर हो जाएगा। पर आम तौर पर लोग बेवजह बिना सिर पैर की बातें करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आजकल के नौजवान कहीं भी बैठते हैं तो बैठते ही शुरु हो जाते हैं कि चलो गपशप मारते हैं। हमें लगता है गप का मतलब तो जो आप झूठ बोलते हो, और शप का मतलब समय की बर्बादी है, कि आ जाओ गप मारकर समय की बर्बादी करते हैं। क्यों भाई? आज जो जिंदगी का दिन जी रहे हो वो आज ही है, कल नहीं आएगा। ये दिन आपकी जिंदगी में से कम हो गया। जो दिन, घण्टा, मिनट, सेकेण्ड गुजर जाता है आपकी कुल उम्र में से कम हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आप निरंतर अपने अंतिम समय (मृत्यु) की ओर जा रहे हैं। तो फिर क्यों न हर दिन को नेकी में गुजारा जाए, खुशी में गुजारा जाए। क्या आपको ये शरीर खाने, पीने, सोने के लिए मिला है? आपका दिन गुजर रहा है, पर कुछ ऐसा गुजारो कि आने वाली दुनिया के लिए वो दिन रोशनी से भरा हो लोग उसकी रोशनी से आगे बढें। वो दिन राम नाम से, अच्छे कर्म करने से व लोगों का भला करने से गुजरेगा।</p>
<h2 style="text-align:justify;">अच्छाई में समय लगाओ</h2>
<p style="text-align:justify;">पूज्य गुरुजी ने फरमाया कि हमने देखा शाह सतनाम जी ग्रीन एस वेल्फेयर फोर्स विंग के सेवादारों की फोटो विदेशों की किताबों में आ गई हैं, और वो फोटो इसलिए नहीं आई कि उसमें कुछ खास बात है वो फोटो इसलिए आई उन्होंने मानवता भलाई का खास काम किया था। लोग याद रखते हैं कि ये अच्छे काम करने वाले हैं, ये भले काम करने वाले हैं। इसलिए अच्छाई में समय लगाओ, समय का सदुपयोग करो। समय तो गुजरेगा लेकिन गुजरते समय के साथ-साथ समझ लेनी चाहिए, नासमझ नहीं बनना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">कई लोग अच्छी-भली जिंदगी गुजार रहे होते हैं पर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है वैसे ही उनके गलत कामों की लिस्ट बढ़ती जाती है। आपको अच्छे कर्म करने हैं, आपको बुराइयों को छोड़ना है। आपको लगता है कि जिंदगी जीने का तजुर्बा ही अब आया है पहले तो पता नहीं था कि जिंदगी कैसे जीनी है? जिंदगी में क्या नजारे मिल सकते हैं? उम्र हो जाने पर आप कहते हो कि मुझे तजुर्बा आ गया। और लोग गलत कर्म करने लगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अरे! आपकी उम्र गुजर गई, इसका मतलब ये नहीं है कि आपने गलत कार्य नहीं किए तो पश्चाताप हो रहा है बल्कि अच्छे कर्म नहीं किए उसका पश्चाताप होना चाहिए। और सिर्फ पश्चाताप ही नहीं, जो समय बचा हुआ है उसका सदुपयोग करते हुए अच्छे कर्म करो, क्योंकि समय का सदुपयोग आपको समाज में परिवार में इज्जत दिलाएगा। वो तमाम खुशियां देगा जिसकी आपने कभी कल्पना नहीं की होती। समय का सदुपयोग करना बहुत जरूरी है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">दुनिया को भारत ने सिखाई प्यार की परिभाषा</h2>
<p style="text-align:justify;">आपजी ने फरमाया कि भारतीय सभ्यता बहुत ही आगे थी। लेकिन आपने उसे मामूली बना दिया आपको लगता है कि विदेशी लोगों की सभ्यता, संस्कृति हमसे ज्यादा है। ये आपको भ्रम है, गलत सोच है। आप तो इतना ही जानते हैं कि भारत ने पूरी दुनिया को शून्य, दशमलव दिया, पर आप ये नहीं जानते कि प्यार की परिभाषा सिखाई भारत ने पूरी दुनिया को। लोग पशुओं की तरह रहते थे। हजारों साल पहले पवित्र वेदों में प्यार की परिभाषा सिखाई गई। और यहीं से ये भाषा पूरी दुनिया में फैली। इसलिए आप ये मत सोचो कि आप पिछड़े वर्ग से हो। संस्कृति, सभ्यता का उदय कहीं से हुआ है तो वो है भारत।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारी नालंदा विश्वविद्यालय में यूएसए, कनाडा, यूके बाहर जितनी भी कंट्री हैं वहां के लोग पढ़ना पसंद करते थे। और पूरी दुनिया को बताया करते थे कि हम नालंदा यूनिवर्सिटी में पढ़कर आए हैं। और आज कोई अमेरिका या कनाडा पढ़ने गया होता है तो और कुछ हो न हो, टूटा सा सेंट लगाकर 15-20 लोगों को बात सुना प्रभावित कर लेते हैं कि तुझे पता नहीं मैं कनाडा गया हूं। दो-चार शब्द बोलना सीख लेते हैं। इंग्लिश को नाक में बोल लेते हैं विदेश की हो गई। और अगर हम मुंह से इंग्लिश बोलेंगे तो तो इंण्डियन इंग्लिश हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">लोग अब तो फूफा को भी अंकल और मामा को भी अंकल कहने लगे हैं। पहले चाचा नहीं कहलवाने देते थे। आज वालों को तो पता ही नहीं है हर एक को अंकल चाहे जो भी हो। क्या आपको अपनी भाषा बोलने में सहज नहीं लगती।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारी भाषा में हर चीज का अलग नाम है। हमारी भाषा बड़ी ही मीठी है, वो अलग बात है कि आपने बिल्कुल बुरा हाल कर रखा है। जब किसी को घर बुलाते थे तो कहा करते थे- आइए, आप घर, आईएगा न। तो आजकल की बात होती है- आएंगा? बस यहीं पर बात खत्म। सारी मिठास को खूह-खाते में डाल दी जाती है। आपने भाषा का कचरा करके रख दिया है वरना इतनी मीठी भाषाएं हैं पर आप जीभ पर जोर नहीं लगाना चाहते इसलिए भाषा का कचरा किया हुआ है। हमारी संस्कृति, सभ्यता बहुत ही अच्छी है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">हमारी संस्कृति बहुत महान है</h2>
<p style="text-align:justify;">आपजी ने फरमाया कि हमारी संस्कृति बहुत महान है। आपको लगता है कि हमारी संस्कृति में कमी है ये आपका भ्रम है। हम महान सभ्यता का हिस्सा हैं जिसने पूरी दुनिया को सभ्यता सिखाई है। हमारे देश में ये सिखाया गया है कि 25 साल तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। खासकर 23 सालों तक ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए था। आप कहते हो कि पहले ताकत ज्यादा थी दिमाग कम था तो ये आपकी गलतफहमी है। पहले साऊंडलेस जहाज होते थे, आज तक नहीं बने। पहले परमाणु कंधे पर रखकर चलते थे आज तक नहीं हुआ। पहले परमाणु चल जाता था तो उसे रोका जा सकता था जो आज तक संभव नहीं हुआ। पहले जब चाहे वर्षा करवा लेते थे , जो आज तक संभव नहीं हुआ।</p>
<h2> ब्रह्मचर्य का पालन करना</h2>
<p style="text-align:justify;">पहले शरीर ही नहीं दिमाग भी आज के दौर से कई गुना ज्यादा पावरफुल और स्वस्थ होते थे। क्योंकि पच्चीस साल तक बच्चों को पता ही नहीं होता था कि गृहस्थ जिंदगी होती क्या है? गुुरुकुल में पढ़ाया जाता था, सख्त निर्देश होते थे। 23 साल तक ब्रह्मचर्य के अकॉर्डिंग युद्ध कला, विज्ञान कला, धर्म कला, समाज कला बहुत सारी अन्य कलाएं यानि शिक्षाएं दी जाती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">और 24-25 साल में गृहस्थ जीवन के बारे में बताकर 25 साल के बाद शादी की जाती थी तब जाकर पता चलता था कि ये नर और मादा होते हैं, अदॅरवाईज ब्रह्मचर्य पर ही जोर दिया जाता था और लोग सच्चे दिल से पालना करते थे। तब जो हाईट होती थी वो इंचों, सेंटीमीटरों और फुटों में नहीं हाथों में नापी जाती थी कि ये सात हाथ का है। सात हाथ का मतलब 10 फुट का कम से कम माना जाता था। और आजकल साढ़े सात फुट ही हो जाए तो जाने क्या हो जाए? यूं लगेगा जैसे आदमियों में कोई ऊंट घूम रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पहले हमारी ही प्रजाति थी। हमारे ही पूर्वज थे जिनकी हाईट इतनी होती थी और पावर कितनी थी, दिमाग कितना तेज था वो भी कहने-सुनने से परे है। इंसान पुनर्विकसित हुआ तो इंसान को लगता है कि पहले पिछड़े वाले थे आज वाले ज्यादा तेज हैं। कोई तेज नहीं है ये सिर्फ आपका भ्रम है। आज के युवा को ज्यादा अहंकार हो गया हो तो साऊंडलेस जहाज बना कर दिखाओ। परमाणु को कंधे पर टांगकर दिखाओ। जब चाहे बरसात करवा के दिखाओ। चन्द्रमा की रोशनी से खाना बनाया जाता था। पहले के लोग सफल क्लोन ज्ञाता थे, लेकिन ये सब तब कहीं देखने को नहीं मिलता।</p>
<h1 style="text-align:center;">सवाल-जवाब</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>सवाल:</strong> किसी के पूर्वज अच्छे कर्म करते हैं तो आने वाली पीढ़ी सुखी रहती है, और बुरे कर्म करने पर दु:खी रहती है, शास्त्रों में लिखा है कि जो जैसा कर्म करेगा वैसा ही फल भोगेगा। तो पूर्वजों के किए हुए कर्मों का फल आने वाली पीढ़ी क्यों भोगती है?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> आपके पूर्वज करोड़ों रूपए कमाकर जाएं तो आप प्रयोग में लाते हो क्योंकि वो आपकी जद्दी-जायदाद है। उसी प्रकार पूर्वजों के कर्म भी आपको ही भोगना पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सवाल:</strong> दुनिया में सबसे मुश्किल काम क्या है?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> आज के दौर में राम का नाम जपना सबसे मुश्किल काम है। बड़े आसान से शब्द होते हैं पर उनका जाप करना ऐसा लगता है जैसे बोझा उठाना हो। अपनी आदतों को बदलना ये भी बहुत मुश्किल काम होता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सवाल:</strong> पूज्य पिता जी, सपने मे जो आप जी दर्शन देते हो, वचन करते हो, क्या वो हम परिवार में बता सकते हैं जी?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>जवाब:</strong> हां, जो आप सत्संग सुनते हो या समाज भलाई की बात, परिवार के भले की बात हो तो बता सकते हैं। अगर आपकी पर्सनल बात है तो वो कभी शेयर नहीं करनी चाहिए।</p>
<h2 style="text-align:justify;">7 परिवारों को सौंपी मकान की चाबी</h2>
<p style="text-align:justify;">पूज्य गुरु जी ने सत्संग के दौरान 7 जरूरतमंदों विधवा सावित्री, पटौदी जिला गुरूग्राम, विधवा बबली इन्सां (गुरूग्राम), विधवा सीमा इन्सां, ब्लॉक कोटकपूरा (पंजाब), कालू इन्सां, ब्लॉक नाथूसरी कलां (सरसा), धर्मपाल इन्सां, ब्लॉक बुढलाड़ा (मानसा), निर्भय इन्सां, ब्लॉक शेरपुर (संगरूर) और संदीप कुमार, ब्लाक बरनाला (पंजाब) को साध-संगत द्वारा बनाए गए मकानों की चाबियां दी।</p>
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                                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>सत्संग</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 18 Jul 2017 05:31:03 +0530</pubDate>
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                <title>द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय भारतीय संस्कृति सम्मेलन 13 से</title>
                                    <description><![CDATA[ ‘भारतीय भाषा एवं संस्कृति संगम’ जयपुर (सच कहूँ न्यूज)। द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय भारतीय संस्कृति सम्मेलन 13 जून से आस्ट्रेलिया में आयोजित किया जाएगा। सम्मेलन के संयोजक हेमजीत मालू ने बताया कि ‘ भारतीय भाषा एवं संस्कृति संगम’ एवं हिन्दी गौरव काम’ आॅस्ट्रेलिया के संयुक्त तत्वावधान में आॅस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में आयोजित 12 दिवसीय सम्मेलन में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/second-international-indian-culture-conference-to-13/article-881"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/india.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;"> ‘भारतीय भाषा एवं संस्कृति संगम’</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>जयपुर (सच कहूँ न्यूज)।</strong> द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय भारतीय संस्कृति सम्मेलन 13 जून से आस्ट्रेलिया में आयोजित किया जाएगा। सम्मेलन के संयोजक हेमजीत मालू ने बताया कि ‘ भारतीय भाषा एवं संस्कृति संगम’ एवं हिन्दी गौरव काम’ आॅस्ट्रेलिया के संयुक्त तत्वावधान में आॅस्ट्रेलिया के सिडनी शहर में आयोजित 12 दिवसीय सम्मेलन में भारत से नौ सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल भाग लेगा। उन्होंने बताया कि प्रतिनिधिमंडल में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के डॉ.अमर सिंह राठौड, वीणा समूह के प्रबंध निदेशक हेमजीत मालू, चैनल इंडयिा के संपादक कुमेश जैन सहित कई पत्रकार शामिल होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">संस्कृति सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ. अमर सिंह राठौड़ ने बताया कि आयोजन का मुख्य उद्देश्य सांस्कृतिक भ्रमण द्वारा दूसरे देशों की सांस्कृतिक, साहित्यिक व सांगीतिक परम्पराओं एवं विरासत को निकटता से देखने व समझने के साथ ही उसका ज्ञान प्राप्त करना है। सम्मेलन के माध्यम से अपने देश की संस्कृति एवं परम्पराओं को दूसरे देशों की संस्कृति एवं परम्पराओं के साथ प्रचारित-प्रसारित करने एवं समझने एवं वहां की विरासत को देखने का प्रयास करना है। इसमें भारत की कला, संस्कृति एवं विभिन्न प्रदर्शनियों का आयोजन सम्मिलित है। उन्होंने बताया कि सम्मेलन के दौरान उस देश के साहित्यकारों, संगीतकारों, लेखकों, चित्रकारों संगीत प्रेमियों से मुलाकात कर सांस्कृतिक परिचर्चाओं के माध्यम से विचारों का आदान-प्रदान किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 04 Jun 2017 07:06:41 +0530</pubDate>
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