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                <title>Ruhani Karishma - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>जब एक शख्स को खुद पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने यमों से बचाया</title>
                                    <description><![CDATA[प्रेमी भोपाल सिंह (मास्टर) गांव शाहपुर बड़ौली जिला मेरठ (यूपी) से अपने प्यारे सतगुरु जी के एक प्रत्यक्ष करिश्में का इस प्रकार वर्णन करता है। सन् 1978 की बात है, भोपाल सिंह ने उस वक्त तक नाम (गुरुमंत्र) नहीं लिया हुआ था। वह बाहरी कर्म काण्डों में ही फंसा हुआ था। एक बार वह मानसिक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/satguru-ji-saved-from-eunuchs/article-87109"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-01/parm-pita-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:center;"><strong>प्रेमी भोपाल सिंह (मास्टर) गांव शाहपुर बड़ौली जिला मेरठ (यूपी) से अपने प्यारे सतगुरु जी के एक प्रत्यक्ष करिश्में का इस प्रकार वर्णन करता है।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">सन् 1978 की बात है, भोपाल सिंह ने उस वक्त तक नाम (गुरुमंत्र) नहीं लिया हुआ था। वह बाहरी कर्म काण्डों में ही फंसा हुआ था। एक बार वह मानसिक रोग का शिकार हो गया। वह रोग उसके पीछे ही पड़ गया था और ठीक होने का नाम नहीं ले रहा था। उसने इस बीमारी का बहुत इलाज करवाया, लेकिन वो ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">एक दिन की बात है प्रेमी भोपाल सिंह बीमारी के चलते परेशानी की हालत में अपनी चारपाई पर लेटा हुआ था। अचानक उसे महसूस हुआ जैसे कि उसका दम घुट रहा हो। एक बहुत ही भंयकर शक्ल वाला कोई उसके सामने खड़ा। उसे देखकर उसकी साँस फूल गई और आँखें पथरा गई थीं। कोई भी तो नहीं था उसे उस भंयकर स्थिति से छुड़ाने वाला। माँ-बाप, भाई-बहन कोई भी उसे नजर नहीं आ रहा था, जिसे कि वह अपनी मदद के लिए पुकारता। उसकी जीभ सुखकर तालू से लग गई थी और स्वांस रुक गए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">तभी उसे अचानक एक बहुत ही सुन्दर प्रकाश दिखाई दिया। वह उस भयंकर अन्धकार से निकल कर एक नूरानी प्रकाश में आ गया। ऊँचे-लम्बे कद सफेद पोशाक में एक अति सुन्दर नूरी चेहरे वाले बुजुर्ग (बाबा जी) उसके सामने आकर खड़े हो गए। उस महान हस्ती के दर्शन उसने पहली बार ही किए थे। अपनी मदद के लिए उस बुजुर्ग को देखकर उसकी जान में जान आ गई। बाबा जी के हाथ में पकड़ी लाठी को देखकर वह यमदूत हाथ जोड़ते हुए एकदम वहां से भाग गया।</p>
<p style="text-align:justify;">बेशक उपरोक्त घटना को कई दिन बीत गए थे, परन्तु वह बाबा जी के उस सुन्दर नूरानी स्वरूप को भूला नहीं था। वह उन्हें ढूंढे तो कहां ढूंढे। तलाश करना तो उसके वश की बात नहीं थी, परन्तु उस सुन्दर इलाही स्वरूप की कशिश बराबर उसे अपनी ओर खींच रही थी।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्हीं दिनों में ही शहनशाहों के शहनशाह परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने किशनपुरा बराल का सत्संग मंजूर कर दिया। यह गांव डेरा सच्चा सौदा, बरनावा के प्रबंधक रांधी साहिब का पैतृक गांव है। अचानक उसी दिन एक प्रेमी उसे कह कर अपने साथ किशनपुरा बाराल ले गया, आ जा! आज परम पिताजी से तेरी बीमारी की बात करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">सत्संग पण्डाल में संगत खूब सजी हुई थी। पूज्य परम पिता जी स्टेज पर सुशोभित थे। ज्यों ही उसने सामने देखा तो अचम्भित ही रह गया। सामने स्टेज के ऊपर वही सुन्दर नूरी स्वरूप वही लिबास, वही भोली-भाली अदाएं, सब कुछ वही तो था। मेहरबान सतगुरु जी स्टेज पर विराजमान उसकी तरफ ऐसे भोले-भाले अंदाज में देख रहे थे मानो कह रहे हों, ‘‘आ गया भाई! बहुत अच्छा हुआ।’’</p>
<p style="text-align:justify;">सच्चे पातशाह जी की कृपा से उसे उसी सत्संग पर ही नाम-दान मिल गया। कुल मालिक जी ने प्रत्यक्ष रहमत करके अपनी रूह के काल से बचाया। वहीं इतना धन और समय खर्च करने पर भी उसकी जो बीमारी ज्यों की त्यों थी। पूज्य परम पिता जी के दर्शन करने तथा नाम-दान प्राप्त करने से तुरंत बाद उसका मन, दिमाग व शरीर फूल से भी हल्का हो गया जैसे कि सिर पर रखे बहुत भारी बोझ को उतार कर कोई व्यक्ति राहत महसूस करता है।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 01 Jan 2025 10:10:45 +0530</pubDate>
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                <title>करिश्मा : जब लाशों के बीच पड़े जख्मी के खून को खुद शाह मस्ताना जी ने किया साफ</title>
                                    <description><![CDATA[सच्चाई की दास्तान, जहां बचाव किया खुद शाह मस्तान प्रेमी हंस राज खट्टर पुत्र श्री गुरांदित्तामल गऊशाला रोड, सरसा से पूजनीय परम संत बेपरवाह मस्ताना जी महाराज (Shah Mastana Ji) की अपार रहमत का वर्णन करते हुए बताता है कि मेरा छोटा भाई इन्द्रजीत जोकि अपना शरीर छोड़कर सचखंड जा चुका है, उसने पूजनीय बेपरवाह […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/shah-mastana-ji-came-in-a-dream-and-alerted/article-55300"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/shah-mastana-ji-maharaj.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">सच्चाई की दास्तान, जहां बचाव किया खुद शाह मस्तान</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रेमी हंस राज खट्टर पुत्र श्री गुरांदित्तामल गऊशाला रोड, सरसा से पूजनीय परम संत बेपरवाह मस्ताना जी महाराज (Shah Mastana Ji) की अपार रहमत का वर्णन करते हुए बताता है कि मेरा छोटा भाई इन्द्रजीत जोकि अपना शरीर छोड़कर सचखंड जा चुका है, उसने पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज से नाम-दान लिया था और दरबार में रहकर ही सेवा व सुमिरन किया करता था। इंद्रजीत शादी नहीं करवाना चाहता था। किंतु मेरी माता ने एक दिन पूज्य शहनशाह जी के चरणों में अरदास की, कि साईं जी! इन्द्रजीत शादी नहीं करवाता।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर बेपरवाह जी ने इन्द्रजीत की तरफ मुखातिब होकर वचन फरमाया, ‘पुट्टर! तू अपना घर-बार बसा। अपने मां-बाप को राजी कर।’ शहनशाह जी के वचनों के अनुसार उसने शादी करवा ली। इसके बाद वह सिलाई मशीनों का एजेंट बनकर अपना कारोबार करने लग गया यानि वह कम्पनी से मशीनें मंगवाता और आगे अपना कमिशन लेकर उन्हें बेच देता। इस तरह उसका रोजगार बहुत बढ़िया चल पड़ा। एक बार वह लुधियाना के किसी एजेंट के साथ व्यापार के संबंध में अहमदाबाद चला गया। काम पूरा कर लेने के बाद उन दोनों ने राय बनाई कि वो सुबह वाली गाड़ी में वहां से दिल्ली जाएंगे। उस रात्रि वे वहां किसी होटल में ठहरे हुए थे।</p>
<h3>सपने में रेलगाड़ी का एक्सीडेंट हो गया</h3>
<p style="text-align:justify;">यह सलाह-मशविरा बनाकर वो दोनों सो गए। उस रात इन्द्रजीत को सपना आया कि वो दोनों रेलगाड़ी द्वारा अहमदाबाद से दिल्ली जा रहे हैं और रास्ते में उसी रेलगाड़ी का एक्सीडेंट हो गया। उस दुर्घटना में लाशें ही लाशें पड़ी हुई हैं और सैंकड़ों आदमी घायल भी हैं। इन्द्रजीत ने बताया कि वह भी उन लाशों के बीच जख्मी हुआ पड़ा था, पर मुझे पूरी होश थी और वहीं पड़ा उन लाशों को देख रहा था। इतने में अचानक पूजनीय बेपरवाह मस्ताना जी महाराज पास आए। उसने देखा कि प्यारे सार्इं जी स्वयं उसके शरीर से बह रहे खून को कपड़े से साफ कर रहे हैं और इसी दरमियान उसकी आंख खुल गई।</p>
<p style="text-align:justify;">अगली सुबह लुधियाना वाले एजेंट ने मेरे भाई से कहा कि ‘इन्द्रजीत! जल्दी कर, गाड़ी का टाईम हो गया है, हमने दिल्ली पहुंचना है।’ तो रात्रि के उस भयानक दृष्टांत के मद्देनजर इन्द्रजीत ने उसको जवाब दे दिया कि ‘मैं तो कल जाऊंगा, मुझे कोई काम है।’ दो-तीन दिन बाद इन्द्रजीत को पता चला कि उस रेलगाड़ी का एक्सीडेंट हो गया, जिसमें वो लुधियाने वाला एजेंट भी मारा गया। यह सुनकर इन्द्रजीत ने अपने पूजनीय सतगुरु बेपरवाह मस्ताना जी महाराज का कोटि-कोटि बार धन्यवाद किया जिनकी दया-मेहर से ही उसे दोबारा जिंदगी मिल पाई थी। प्रेमी हंसराज बताता है कि उपरोक्त सच्ची घटना मेरा भाई इन्द्रजीत खुद हमें बताया करता था।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 26 Nov 2023 20:59:43 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>सतगुरू जी ने मौत जैसा भयानक कर्म कंकर में बदला</title>
                                    <description><![CDATA[प्रेमी कैलाश चंद इन्सां पुत्र नन्हें सिंह एम 160 सी महेन्द्रा एनक्लेव गाजियाबाद (यूपी) से पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपने ऊपर हुई अपार दया मेहर रहमत का वर्णन इस प्रकार करता है:- प्रेमी कैलाश चंद इन्सां बताते हैं कि सन् 1991 की बात है। मैंने पूज्य गुरू […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/ruhani-karishma-pujy-guru-saint-dr-msg/article-35103"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-07/karsihma.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रेमी कैलाश चंद इन्सां पुत्र नन्हें सिंह एम 160 सी महेन्द्रा एनक्लेव गाजियाबाद (यूपी) से पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की अपने ऊपर हुई अपार दया मेहर रहमत का वर्णन इस प्रकार करता है:-</p>
<p style="text-align:justify;">प्रेमी कैलाश चंद इन्सां बताते हैं कि सन् 1991 की बात है। मैंने पूज्य गुरू जी से नाम की अनमोल दात ग्रहण की। मेरे कर्म के अनुसार मुुझे एक भयानक बीमारी ने घेर लिया, वो बीमारी छाती में कैंसर था। मैंने बहुत दवाई खाई, मगर आराम नहीं आया। इस समय के दौरान मेरी नौकरी भी छूट गई। मैं पूज्य गुरू जी से इस बीमारी से छुटकारे के लिए अरदास करता और रोता रहता।</p>
<h3><strong>मेरे दाता, मेरे रहबर, मेरे पीया तेरे बिना कोई भी सहारा नहीं </strong></h3>
<p style="text-align:justify;">मैं डेरा सच्चा सौदा बरनावा यूपी में सेवा करने के लिए गया तो वहां के जिम्मेवार सेवादार ने मुझे कहा कि तुम सरसा जाओ, पूज्य गुरू जी से आशीर्वाद लेना, तुम ठीक हो जाओगे और श्री गुरूसर मोडिया के अस्पताल से दवाई भी मिल जाएगी। उस सेवादार की बात मानकर मैं सरसा दरबार चला आया। जब मैं आश्रम के गेट पर था तो पूज्य गुरू जी मजलिस कर रहे थे। पूज्य गुरू जी ने वचन किए कि जो भी बीमार चलकर आया है, वह नाम जपे और दवाई खाए, वह ठीक हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वचन तो हो चुके थे, पर मन ने विश्वास नहीं किया और सोच दी कि पिता जी से मिलकर अपनी बीमारी की सारी बात बताऊं। मुझे पिता जी से मिलने का समय मिल गया और वचन मानकर श्री गुरूसर मोडिया दवाई लेने पहुंच गया। मुझे वहां से मुफ्त दवाई भी मिल गई और वहां पूज्य बापू जी नम्बरदार सरदार मग्घर सिंह जी (पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के पूजनीय जन्मदाता) के दर्शन किए। जैसे मैं दवाई लेकर बस मैं बैठा तो मैं पूज्य गुरू जी की याद में फूट फूट कर रोने लगा और अपनी बीमारी के बारे में विलाप कर रहा था कि हे सतगुरू, मेरे दाता, मेरे रहबर, मेरे पीया तेरे बिना कोई भी सहारा नहीं है।</p>
<h3><strong>पूज्य गुरू जी ने अपने सीधे हाथ का अंगूठा जख्म वाली जगह पर रख दिया।</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">आप ही मुझे इस भयानक बीमारी से निजात दिला सकते हो। आगे जनवरी का भंडारा था। जब मैैंने पूज्य गुरू जी से गुरूमंत्र लिया, तब से मुझे आश्रम में सेवा मिल गई थी। जब पूज्य गुरू जी सेवादारों को दातें बख्श रहे थे तो मेरा भी नंबर आया, तो मैंने अरदास की कि हे मेरे दाता, मेरे शहनशाह जी, अगर मुझे दात ही देनी है तो मुझे ठीक कर दो, मेरे लिए यही सबसे बड़ी दात है। क्योंकि मैं बीमारी से इतना परेशान था कि सुबह, दोपहर और शाम को दर्द की गोली लेता था, हर वक्त दर्द होता रहता था।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरी छाती में कैंसर का बहुत बड़ा फोड़ा बन गया था और उसमें से मुवाद बहती रहती थी तब मैं अपने प्यारे सतगुरू जी से अरदास करता कि हे मेरे दाता, जब से मैंने नाम लिया है, ये सिर आपके ही आगे झुकता है, किसी और के आगे नहीं। आप जैसा भी रखो, आपकी मर्जी। रात को सपने में मुझे पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने दर्शन दिए और फरमाया, ‘‘बेटा! दिखाना कहां पर फोड़ा है?’’ तो मैंने अपनी कमीज उठाकर पूज्य गुरू जी को फोड़ा दिखाया। तो पूज्य गुरू जी ने अपने सीधे हाथ का अंगूठा जख्म वाली जगह पर रख दिया।</p>
<h3><strong>सतगुरू जी की दया मेहर रहमत से स्वस्थ जिंदगी जी रहा हूं</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">उस समय मुझे इतनी खुशी हुई, जिसे लिखने के शब्द नहीं हैं। जब मैंने उठकर पिता जी को देखना चाहा तो पिता जी अदृश्य हो गए। मैं बहुत खश था। मैंने इस दृष्टांत के बारे में किसी को नहीं बताया क्योंकि ऐसा हुक्म नहीं था। मैं बलिहारी जाऊं उस सतगुरू पर जिसने इतनी भयानक बीमारी से मेरा छुटकारा करवा दिया। अब मैं प्यारे सतगुरू जी की दया मेहर रहमत से स्वस्थ जिंदगी जी रहा हूं। ऐ मेरे सतगुरू, मेरी आप से ओड़ निभ जाए, मेरी यही अरदास है जी।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Jul 2022 19:00:54 +0530</pubDate>
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                <title>लंगर खिलाकर सतगुरू जी ने रोग किया खत्म</title>
                                    <description><![CDATA[सन् 1981 की बात है कि मेरी भाभी सुखविन्द्र कौर बहुत ज्यादा बीमार हो गई। उसे कुछ भी नहीं पचता था। यहां तक कि 23 दिन बीत जाने पर भी उसने कुछ नहीं खाया। उसकी हालत को देखकर सभी कह रहे थे कि अब यह नहीं बचेगी। उन दिनों पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/ruhani-karishma-dera-sacha-sauda/article-35073"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-06/shah-satnam-singh-ji-14.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सन् 1981 की बात है कि मेरी भाभी सुखविन्द्र कौर बहुत ज्यादा बीमार हो गई। उसे कुछ भी नहीं पचता था। यहां तक कि 23 दिन बीत जाने पर भी उसने कुछ नहीं खाया। उसकी हालत को देखकर सभी कह रहे थे कि अब यह नहीं बचेगी। उन दिनों पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज डेरा सच्चा सौदा, मलोट (पंजाब) में पधारे हुए थे। सारे परिवार ने विचार किया कि इसकी तंदरूस्ती के लिए पूजनीय परम पिता जी के पावन चरण कमलों में अर्ज की जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">सारा परिवार इसे मलोट ले जाने के लिए तैयार हो गया। हम इसे एक कार में डेरा सच्चा सौदा आश्रम, मलोट (पंजाब) में ले गए। पूजनीय परम पिता जी शाम की मजलिस फरमाकर तेरावास में जा रहे थे। मैंने उसी समय पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के पावन चरण कमलों में अर्ज की कि पिता जी, इस समय हमारा पूरा परिवार चिंताग्रस्त है। मेरी भाभी के सात लड़कियां हैं। इसे अन्न पानी भी नहीं पच रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">दया करो जी। पूजनीय परम पिता जी ने फरमाया, ‘‘रामजीत सिंह, इसे लंगर खिलाओ।’’ हमनें उसी समय हुक्म मानकर उसे खाने के लिए लंगर दिया। उसने उस समय एक लंगर खा लिया और उसे लंगर हजम हो गया। हम रात के बारह बजे तक बैठे रहे तथा पूजनीय परम पिता जी का गुणगान करते रहे। वह सुबह खाने के लिए और लंगर मांगने लगी। हमनें उसे दो लंगर दिए और वह खा गई। हम सभी हैरान और खुश थे। जहां उसे पानी तक नहीं पच रहा था, अब वह दो-दो लंगर खाने लग गई। पूजनीय परम पिता जी की दया मेहर रहमत से वह स्वस्थ हो गई। जब हम पूजनीय परम पिता जी से आज्ञा लेकर वापिस मानसा लौटे तो सभी रिश्तेदार उसे देखकर दंग रह गए। सतगुरू के अहसानों का बदला कभी भी चुकाया नहीं जा सकता।<br />
<strong>श्री रामजीत सिंह, मानसा (पंजाब)</strong></p>
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                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 30 Jun 2022 20:41:32 +0530</pubDate>
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                <title>मुर्शिद प्यारे ने प्रत्यक्ष नूरी-दीदार देकर साध-संगत को किया निहाल</title>
                                    <description><![CDATA[13 दिसंबर 1978 आश्रम की कुछ जमीन सिरसा-बेगू मुख्य सड़क पर मिल्क-प्लांट के पास भी है। यह जमीन ‘भट्ठे वाले खेत’ के नाम से जानी जाती है। उन दिनों इस खेत में नरमा चुनने की सेवा चल रही थी। पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज उस दिन सेवादारों को अपना अलौकिक प्रेम प्रदान करने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/ruhani-karishma-shah-satnam-ji-maharaj/article-34394"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-06/parm-pita-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">13 दिसंबर 1978 आश्रम की कुछ जमीन सिरसा-बेगू मुख्य सड़क पर मिल्क-प्लांट के पास भी है। यह जमीन ‘भट्ठे वाले खेत’ के नाम से जानी जाती है। उन दिनों इस खेत में नरमा चुनने की सेवा चल रही थी। पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज उस दिन सेवादारों को अपना अलौकिक प्रेम प्रदान करने के लिए अचानक उस खेत में चले गए। सभी सेवादार बहन-भाई, जो नरमा चुनने की सेवा कर रहे थे, अपने प्रीतम प्यारे के इस प्रकार दर्शन करके खुशी से झूम उठे। पूजनीय परम पिता जी सभी सेवादारों को अपना ईलाही प्रेम बख्शते हुए मोटर वाले कमरे के पास रखी हुई एक साधारण सी चारपाई पर जाकर विराजमान हो गए।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ ही समय बाद दोपहर के लंगर का समय हो गया। पूजनीय परम पिता जी ने सभी सेवादारों को वहीं अपने पास बुला लिया और लांगरी भाइयों को लंगर बांटने का हुक्म फरमाया। इधर तो लांगरी भाई लंगर खिलाने में व्यस्त हो गए और उधर रहमतों के दाता जी ने कुछ मूलियां मंगवा लीं और स्वयं अपने पवित्र कर-कमलों से काट-काटकर थाली भर ली व सभी सेवादारों में बांटने के लिए लांगरियों को दे दी।</p>
<p style="text-align:justify;">सेवादारों ने बताया कि उस दिन लंगर खाने में जो आनंद, लज्जत और सतगुरू का सच्चा प्यार प्राप्त हुआ हम उसका लिख बोलकर बयान नहीं कर सकते क्योंकि एक तरफ तो अपने मुर्शिद प्यारे के पवित्र कर-कमलों द्वारा दिया गया मूलियों का रसदायक प्रसाद और दूसरी तरफ स्वयं प्यारे सतगुरू जी के प्रत्यक्ष नूरी-दीदार और उनके हास्य-रस से भरपूर मीठे शिक्षादायक वचन थे। इस तरह सभी सेवादारों में रहमतें व अलौकिक खुशियां बांटते हुए पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज वहां से पैदल ही वापिस आश्रम में आ गए।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Jun 2022 21:20:46 +0530</pubDate>
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                <title>बच्चे को बोरी में बांध रहा था बदमाश, परम पिता जी ने खुद प्रकट होकर छुड़ाया</title>
                                    <description><![CDATA[सरसा। मकान नं. 926 मोहल्ला धोबियों वाला बंद गेट सरसा शहर से बीबी ईश्वर देवी परम पूजनीय सतगुरु जी की अपार बख्शिश का एक अद्भुत करिश्मा (Ruhani Karishma) इस प्रकार वर्णन करती है : सन् 1975 की बात है। उस दिन भी दरबार में प्रतिदिन की तरह सुबह की मजलिस लगी हुई थी। उस दिन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/the-miscreant-was-tying-the-child-in-a-sack-param-pita-ji-himself-came-and-rescued-him/article-30243"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-01/parampita-ji.gif-11.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>सरसा।</strong> मकान नं. 926 मोहल्ला धोबियों वाला बंद गेट सरसा शहर से बीबी ईश्वर देवी परम पूजनीय सतगुरु जी की अपार बख्शिश का एक अद्भुत करिश्मा (Ruhani Karishma) इस प्रकार वर्णन करती है : सन् 1975 की बात है। उस दिन भी दरबार में प्रतिदिन की तरह सुबह की मजलिस लगी हुई थी। उस दिन रक्षा बन्धन के कारण काफी गिनती में संगत दरबार में आई हुई थी। मजलिस के बाद मेहरबान दातार जी ने अपने प्यारे सत्ब्रहमचारियों को तेरा वास में बुलाकर उन्हें अपने पवित्र कर-कमलों के द्वारा रखड़िया (राखियां) तथा कृपा दृष्टि का प्रसाद बख्शकर बेशुभार प्रेम प्रदान किया। कुल मालिक की मौज थी एक बहुत ही सुन्दर छोटी सी राखी सच्चे पातशाह जी ने अपने पवित्र कर-कमलों के द्वारा प्रेमी दीवान चन्द सरसा को देते हुए वचन फरमाया, भाई ! शाम होण तो पहला-पहला इह राखी प्रेमी राम चन्द्र पटवारी दे घर पहुंचा देवीं।</p>
<p style="text-align:justify;">प्यारे परम पिताजी के हुक्म द्वारा जब प्रेमी दिवान चन्द राखी लेकर हमारे घर पहुंचा तब मेरा सारा परिवार अपने परम दयालु दातार जी की पवित्र सौगात प्राप्त करके बहुत खुश हुआ। कुल मालिक की अपार रहमत को राखी रूप में प्राप्त करके मेरे परिवार को विश्वास हो गया कि हमारे घर पर आज ही लड़के का जन्म होगा और वैसा ही हुआ। वाली दो जहान शहनशाह जी ने हमारे विश्वास को बरकरार रखा। उसी दिन मेरे घर सच्चे पातशाह जी ने अत्यन्त खुशी बख्शी। हमारे यहां पौत्र पैदा हुआ। उसका नाम बेपरवाह जी ने कृष्ण रखा। कुल मालिक की उस प्यारी दात (बच्चा प्राप्त करके सारा परिवार फूले नहीं समाया बड़े यत्न तथा लाड-प्यार से कृष्ण का लालन-पा किया।</p>
<p style="text-align:justify;">करीब सात वर्ष की आयु में शहनशाह जी उसे नाम की दात प्रदान की। उन्हीं दिनों की बात है। एक दिन कृष्ण अपने मोहल्ले में अकेला ही रहा था। उस समय दिन छिप गया था तथा अंधेरा हो गया था। इस प्रकार बच्चे को देखकर किसी अज्ञात व्यक्ति ने उसे पकड़ लिया, वह आदमी शायद बच्चे उठाने वाले किसी गिरोह का ही सदस्य था। अपनी निश्चित योजना के अधीन ही कृष्ण को बोरी में बंद करके अपने निश्चित स्थान पर ले जाना चाहता था, परन्तु वह तो सर्व-सामर्थ्य सतगुरु का जीव था। उसने तुरंत अपने सतगुरु को याद किया और ‘धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ का नारा लगाया। तत्काल ही उसे शहनशाह जी के दर्शन हुए। बेपरवाह जी के हाथ में वही लाठी थी। वाली दो जहान दातार जी ने कड़कती हुई आवाज में उस आदमी को पूछा, ‘ओह बच्चे नूं कित्थे लिजा रिहा है? इह हुण साडा बच्चा है इसनूं इत्थे ही छड़ दे।’ खुद-खुदा की उस प्रभावशाली आवाज को सुनकर तथा लाठी को देखकर वह बदमाश व्यक्ति डर के मारे थर-थर कांपने लगा। उसे अपनी जान की बन गई। वह कृष्ण को वहीं पर छोड़कर ऐसे भागा कि पीछे मुंह करके देखा तक नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">उसके बाद सच्चे पातशाह जी ने कृष्ण से पूछा, ‘बेटा! तूं पटवारी दा पोता हैं?’ बच्चा भी कुछ घबरा सा गया था। उसने हां में सिर हिलाया। इस पर मेहरबान दाता जी ने कृष्ण को अपने घर जाने के लिए कहते हुए फरमाया, ‘जा बेटा ! तू आपणे घर चला जा। असी इत्ये साहमणे ही खड़े हां।’ कृष्ण उसी वक्त दौड़कर अपने घर चला गया और जाते ही उसने मुझे सब कुछ बता दिया और यह भी कहा कि परम पिताजी ने स्वयं मुझे उस बदमाश से छुड़ाया है और आपजी ही मुझे घर तक छोड़ने आए हैं। अपने नन्हें से भतीजे के मुंह से यह बात सुनते ही मैं (ईश्वर देवी) तुरन्त दौड़कर बाहर आई परन्तु तब तक तो मेहरबान सतगुरु जी वहां से अलोप हो चुके। यह बात तत्काल सारे मोहल्ले में फैल गई कि पूज्य परम पिताजी रामचन्द पटवारी के पोते कृष्ण को बदमाश से छुड़ाकर स्वयं घर छोड़कर गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सतगुरु जी की इस रहमत को लेकर सारे परिवार तथा सारे मोहल्ले में कई दिन तक चर्चा होती रही। सभी परिवार जनों ने वाली दो जहान दयालु दाता जी का लाख-लाख शुक्राना किया कि बेपरवाह जी ने अपने मासूम बच्चे की रक्षा करके प्रेमी परिवार की लाज रखी है। कुल मालिक की रहमत के इस प्रत्यक्ष प्रमाण (Ruhani Karishma) से स्पष्ट है कि सतगुरु जी शब्द रूप में अपने हर जीव के सदा अंग-संग हैं और जहां कहीं भी उस पर कोई भीड़ बनती है तो तत्काल ही उसकी सहायता करते हैं। काल को भी अधिकार नहीं कि वह पूरे सतगुरु के जीव के तरफ आंख उठाकर देख सके, क्योंकि मेहरबान सतगुरु पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज हर समय अपने जीवों की स्वयं रक्षा करते हैं तथा हमेशा उनके अंग-संग रहते हैं।</p>
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                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Jan 2022 13:32:50 +0530</pubDate>
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                <title>पूज्य गुरु जी ने स्वयं प्रकट होकर प्रेमी को भारी मुसीबत से बचाया</title>
                                    <description><![CDATA[प्रेमी गुरचरण सिंह पुत्र कृपाल सिंह गांव काट दुन्ना जिला संगरूर (पंजाब) से सतगुरु की उस पर हुई दया-मेहर का एक करिश्मा इस प्रकार वर्णन करता है:- 27 फरवरी 1995 की सुबह को वह अपने घर में अर्द्ध निंदा की अवस्था में सोया हुआ था। उसे स्वप्न आया कि उसका स्कूटर के साथ एक्सीडैंड हो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/guru-ji-himself-appeared-and-saved-the-devotee-from-great-trouble/article-27538"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-10/precious-words-by-saint-dr.-msg.jpeg" alt=""></a><br /><h4 style="text-align:center;"><strong>प्रेमी गुरचरण सिंह पुत्र कृपाल सिंह गांव काट दुन्ना जिला संगरूर (पंजाब) से सतगुरु की उस पर हुई दया-मेहर का एक करिश्मा इस प्रकार वर्णन करता है:-</strong></h4>
<p>27 फरवरी 1995 की सुबह को वह अपने घर में अर्द्ध निंदा की अवस्था में सोया हुआ था। उसे स्वप्न आया कि उसका स्कूटर के साथ एक्सीडैंड हो गया और उसकी टांग तीन जगह से टूट गई है। सपने में ही उसे डॉ. सतीश के अस्पताल में दाखिल करवाया गया। पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने उसके ऊपर अपनी पवित्र दया दृष्टि डालते हुए वचन फरमाया, ‘‘बेटा! ठीक है। कोई तकलीफ तो नहीं।’’ गुरचरण सिंह ने नतमस्तक होकर कहा, पिता जी! आप तकलीफ तो बिल्कुल भी नहीं होने देते और न ही अब है। तब पूज्य गुरु जी उसे भरपूर आशीर्वाद देकर अलोप हो गए। प्यारे दातार जी के दर्शन करके उसे असीम खुशी हुई और साथ में ही में सोच में पड़ गया कि मामला क्या है?</p>
<p style="text-align:justify;">अगले दिन 28 फरवरी 1995 को बारह बजे दोपहर को वह बरनाला से धनौला ठेकेदार के पास साईकिल पर जा रहा था। रास्ते में ही उसका एक स्कूटर सवार के साथ एक्सीडैंट हो गया। उसकी वहीं टांग (जो  सपने में टूटी थी) स्कूटर के नीचे आ गई। उसी क्षण पूज्य गुरु जी वहां प्रकट हो गए। प्यारे दातार जी ने अपने पवित्र कर कमलों से स्कूटर को ऊपर उठाया हुआ था। उसकी टांग पर स्कूटर का भार बिल्कुल नहीं आने दिया। तब प्रेमी ने तुरन्त अपनी टांग स्कूटर के नीचे से खींच ली। प्यारे सतगुरु जी ने उसकी टांग टूटने से बचा ली, जो कि वास्तव में टूटनी ही थी। वह उसका कोई कठोर कर्म था, जो सतगुरु जी ने अपनी दया-मेहर से सपने में ही भुगतवा दिया। अगर उसने अपने सतगुरु का पल्ला न पकड़ा होता तो पता नहीं कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ता।</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्रकार सतगुरु अपने जीव की पल-पल, क्षण-क्षण सम्भाल करता है। शिष्य को यह पता भी नहीं चलते देता कि कब मुसीबत आई और कैसे टल गई। संकट के समय जितनी जल्दी सतगुरु सहायता के लिए पहुंचता है, उतनी जल्दी और कोई नहीं पहुंच सकता। जीव की जो मदद सतगुरु कर सकता है, वो कोई नहीं कर सकता। जो जीव सतगुरु के हुक्म को मानते हुए उसकी रज़ा में रहते हैं। सतगुरु उनके भारी से भारी कर्मों को सूली से सूल कर देता है, जैसे कि उपरोक्त साखी से स्पष्ट है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूरा सतगुरु अपनी रूह के हर समय अंग-संग होता है। जीव कहीं भी है, चाहे वो उजाड़-पहाड़ में है और चाहे सात समुद्र पार है, सतगुरु उसके हर दु:ख-संकट में सहाई होता है। जो इन्सान अपने सतगुरु मुर्शिदे-कामिल के हुक्म, उनकी रज़ा में रहते हैं और उनके वचनों पर दृढ़ता से अमल करते हैं तो सतगुरु भी उपरोक्त अनुसार उसे मुश्किल की कोई घड़ी देखने नहीं देता। वह अपने शिष्य के सूली जैसे कर्म को अपन दया मेहर रहमत से सूल (कांटे) में बदल देता है, केवल यही नहीं बल्कि उसे सूल (कांटे) की भी पीड़ा का अनुभव नहीं होने देता।</p>
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                <pubDate>Mon, 11 Oct 2021 05:13:01 +0530</pubDate>
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                <title>&amp;#8230;जब सोमनाथ को मौत के मुंह से निकाल लाए सतगुरू</title>
                                    <description><![CDATA[अक्सर हम छोटी-मोटी परेशानियों में घिर कर हिम्मत हार बैठते हैं। कई लोग तो बुरे वक्त के ख्याल भर से काँप उठते हैं। लेकिन अगर मुश्किलों का डटकर सामना किया जाए तो उन्हें भी खुद पीछे हटना पड़ता है। आज की साखी एक ऐसे ही शख़्स के जीवन से जुड़ी सच्ची घटना पर आधारित है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">अक्सर हम छोटी-मोटी परेशानियों में घिर कर हिम्मत हार बैठते हैं। कई लोग तो बुरे वक्त के ख्याल भर से काँप उठते हैं। लेकिन अगर मुश्किलों का डटकर सामना किया जाए तो उन्हें भी खुद पीछे हटना पड़ता है। आज की साखी एक ऐसे ही शख़्स के जीवन से जुड़ी सच्ची घटना पर आधारित है।</p>
<p style="text-align:justify;">जो एक वक्त मौत के मुहाने पर खड़ा था। पल-पल मौत उसकी ओर कदम बढ़ा रही थी। ठीक होने की उम्मीद को डॉक्टरों ने यह कहकर खत्म कर दिया कि अब ये इस दुनिया में कुछ दिनों का मेहमान है। पूरा परिवार गहरे सदमे में चला गया। लेकिन वो शख़्स हिम्मत न हारा और अपनी असीम आस्था और दृढ़ विश्वास के सहारे इस मुश्किल वक्त पर ऐसे जीत पा गया मानों उसकी ज़िदंगी में कोई परेशानी आई ही न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">साध-संगत जी बात सन् 1993 की है। प्रेमी सोमनाथ पुत्र श्री अर्जुन दास गाँव रामपुर, डाकखाना सरहेड़ी, जिला अंबाला को अचानक गले की खुराक नली में तकलीफ हो गई। वो थोड़ा कुछ खाने की कोशिश करता तो उल्टी आ जाती। लेकिन जिंदा रहने की ख़्वाहिश में मजबूर होकर थोड़ा बहुत खा लेता। उसके गले में असहनीय दर्द था, जो बढ़ता जा रहा था।</p>
<p style="text-align:justify;">परेशानी की हालत में वो अंबाला के एक प्राइवेट डॉक्टर के पास पहुंचा। डॉक्टर ने एक्स-रे करवाने के लिए कहा। सोमनाथ ने जैसे ही एक्स-रे करवाकर डॉक्टर को रिपोर्ट सौंपी तो डॉक्टर हैरान रह गया। डॉक्टर ने कहा कि इस रोग का इलाज मैं नहीं कर पाऊंगा, ये मेरे वश से बाहर की बात है। डॉक्टर का जवाब सुनकर सोमनाथ सन्न रह गया। तब डॉक्टर ने कहा कि आप पीजीआई चंडीगढ़ में दिखाओ।</p>
<p style="text-align:justify;">अगले दिन सोमनाथ एक रिश्तेदार को साथ लेकर पीजीआई में पहुंच गया। वहां डॉक्टर ने अगले हफ्ते आने को बोल दिया। ये सुनकर सोमनाथ घर वापिस लौट आया। उसकी तकलीफ दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही थी। वो अगले दिन मिशन अस्पताल अंबाला में पहुंचा। डॉक्टर ने जब उसका एक्स-रे देखा तो पूछा कि क्या तुम अकेले आए हो? उसने जवाब दिया, ‘‘हाँ’’। तो डॉक्टर ने कहा कि आप अपने किसी परिवार वाले या रिश्तेदार को साथ लाइए।</p>
<p style="text-align:justify;">जब सोमनाथ ने डॉक्टर से बीमारी के बारे में पूछा तो उन्होंने कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया। अगले दिन सोमनाथ अपने बड़े भाई को साथ लेकर फिर मिशन अस्पताल अंबाला में पहुंचा। डॉक्टर ने धीरे से उसके बड़े भाई के कान में कोई बात कही और उससे एक कागज पर हस्ताक्षर करवा लिए।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर सोमनाथ थोड़ा असहज हो गया। फिर उसे अस्पताल में भर्ती कर लिया गया। अस्पताल में डॉक्टरों ने सोमनाथ को बेहोश करके उसकी खुराक नली से सैंपल के तौर पर एक मांस का टुकड़ा निकाला और उसे सीएमसी लुधियाना में भेज दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">जब सोमनाथ की रिपोर्ट आई तो डॉक्टरों ने उसके परिवार वालों को बताया कि उसकी खुराक नली में कैंसर फैल चुका है। ये बात सुनकर परिवार के लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच गई। डॉक्टरों ने सोमनाथ को तुरंत सी.एम.सी. लुधियाना ले जाने की सलाह दी।</p>
<p style="text-align:justify;">परिवार के लोग सोमनाथ को सी.एम.सी. लुधियाना में लेकर पहुंचे और उसके कई टेस्ट करवाए गए। तब डॉक्टरों ने पूरी तरह कन्फर्म कर दिया कि सोमनाथ की खुराक नली में कैंसर ही है। इस पर डॉक्टरों ने सोमनाथ को कैंसर की दवाईयां दी और कई बार सेंके लगाए।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन उसकी हालत सुधरने की बजाय और बिगड़ती चली गई। अब वो सूखकर कर कांटे जैसा हो गया। डेरा सच्चा सौदा में पहुंचकर वो पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां से मिला और अपनी पूरी व्यथा उनके सामने रख दी। तब पूज्य जी ने सोमनाथ को वचन फरमाया, बेटा! जहां से दवाई खाई है, वहां से चैकअप करवाते रहना। यहां दरबार से भी दवाई ले जाओ। आधा-पौना घंटा सुमिरन करके ही दवाई लेनी है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूज्य गुरू जी ने इसके साथ ही अपनी पावन दृष्टि वाला प्रशाद भी उसे दिलवाया। तभी एक अचंभित करने वाली बात हुई। खाने-पीने में असमर्थ सोमनाथ पूज्य गुरु जी की पावन दृष्टि वाला प्रशाद एकदम से ऐसे खा गया मानों उसे कोई परेशानी ही न हो। इसके बाद सोमनाथ धीरे-धीरे सब कुछ खाने लगा।</p>
<p style="text-align:justify;">वो डेरा सच्चा सौदा से दवाई ले जाता और राम नाम का जाप करके उस दवाई को खा लेता। ये सिलसिला तीन-चार महीने तक लगातार चलता रहा। इसके बाद वो पूज्य गुरू जी के वचनानुसार एक दिन सी.एम.सी. लुधियाना में अपनी जांच करवाने के लिए पहुंच गया। सोमनाथ को देखकर डॉक्टर भी भौचक्के रह गए। उन्होंने सोमनाथ से पूछा कि कहां से दवाई खाता है?</p>
<p style="text-align:justify;">तो सोमनाथ ने तपाक से जवाब दिया, मैं डेरा सच्चा सौदा में जाता हूँ और मैंने पूज्य गुरू संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की पावन दृष्टि वाला प्रसाद खाया है और वहीं की दवाई खा रहा हूँ। डॉक्टरों ने सोमनाथ की जांच आदि की और रिपोर्ट देखकर कहा कि तू अब बिल्कुल ठीक है।</p>
<p style="text-align:justify;">तेरे साथ वाले तो कब के इस दुनिया से चले गए हैं। एक तू ही बचा है। जैसे ही डॉक्टर सोमनाथ को ये शब्द बोले तो सोमनाथ वैराग्य से भर गया और दोनों हाथ जोड़कर बार-बार अपने सतगुरू का शुक्राना करने लगा। इस तरह सतगुरु ने उसे जीवनदान देकर उसके परिवार को खुशियों से भर दिया।</p>
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                <pubDate>Sun, 18 Jul 2021 09:30:35 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>दु:खों से घिरी बहन को पूज्य गुरु जी ने बख्शा खुशहाल जीवन</title>
                                    <description><![CDATA[सतगुरु की रजा, रमज और रहमत की कोई सीमा नहीं होती और न ही इसे कोई समझ सकता है। उनका हर कर्म सृष्टि के भले के लिए होता है। वे अपने बच्चों के भारी कर्मों को काटकर उनके जीवन को खुशियों से महका देते हैं। आज की साखी ऐसे ही जीवन के सत्य अनुभव पर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/pujya-guru-ji-gave-happiness-life/article-25203"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-07/guru-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:center;"><strong>सतगुरु की रजा, रमज और रहमत की कोई सीमा नहीं होती और न ही इसे कोई समझ सकता है। उनका हर कर्म सृष्टि के भले के लिए होता है। वे अपने बच्चों के भारी कर्मों को काटकर उनके जीवन को खुशियों से महका देते हैं। आज की साखी ऐसे ही जीवन के सत्य अनुभव पर आधारित है।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">बहन गुरप्रीत कौर सुपुत्री सरदार हरनेक सिंह, गली गोदिया प्रैस होरो मजैस्टिक, श्री मुक्तसर साहिब (पंजाब) से पूज्य सतगुरु जी की अपने ऊपर हुई दया, मेहर रहमत को इस प्रकार बयां करती है।<br />
बात उस वक्त की है जब वो 13 वर्ष की थी। गुरप्रीत कौर एक भयानक बीमारी की चपेट में आ गई। शरीर में इतना दर्द होता कि पीड़ा से उसका रंग पीला जर्द और शरीर ठण्डा हो जाता। उस असहनीय दर्द से वो बहुत देर तक तड़पती रहती। उसकी इस हालत को देखकर उसके माता-पिता और बहन-भाई परेशान हो जाते और सोचते कि इसका क्या बनेगा। दर्द होने के कारण उसकी छाती में रिसोलिया हो गईं। इस बीमारी को लेकर उसने अच्छे-अच्छे विशेषज्ञ डॉक्टरों से इलाज करवाया, लेकिन रत्ती भर भी असर नहीं हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">गुरप्रीत का सबसे पहले दुग्गल होम्योपैथिक फिजिशियन से करवाया गया लेकिन कोई लाभ न हुआ। उसके बाद परिवार वाले उसे डॉक्टर मिसेज रेणू गर्ग (एम.डी., डी.जी.टी.) भटिण्डा के अस्पताल ले गए। तीन-चार महीने तक वहां इलाज चलता रहा। दर्द में कोई कमी न आने के कारण उसे भटिण्डा के एक मशहूर हार्ट स्पैशलिस्ट डॉक्टर मोहन लाल गर्ग (एम.बी.बी.एस., एम.डी.) के अस्पताल में दाखिल करवाया गया। लेकिन उसकी सेहत में कोई फर्क नहीं पड़ा। इसके बाद गुरू नानक अस्पताल कोटकपूरा रोड़ मुक्तसर में दिल और छाती रोग विशेषज्ञ डॉक्टर मदन मोहन बांसल (एम.बी.बी.एस., एम.डी.) के यहां से तीन महीने तक इलाज चलता रहा। हजारों रुपये खर्च करने के बाद भी गुरप्रीत कौर की बीमारी वैसी की वैसी रही। इस दौरान उसके शरीर की रसौलियां काफी बड़ी हो गई और डॉक्टरों ने आॅप्रेशन करवाना जरूरी बता दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर उसका रसौली का पहला आॅप्रेशन भटिण्डा के सरकारी अस्पताल में हुआ। तीन-चार महीने बाद उसका दूसरा ऑपरेशन मुक्तसर में करवाया गया। आॅप्रेशन के बाद दर्द से गुरप्रीत कौर का बुरा हाल हो गया। वो चैन से ना तो खुद टिक पा रही थी और ना ही घरवालों को टिकने देती थी। दर्द कम होने की बजाय लगातार बढ़ता जा रहा था। इसके बाद परिवार वाले उसे बी.डी.एस. गोल्ड मैडलिस्ट डॉक्टर जे.आर. सोफ्ट के पास दयानंद मेडिकल कॉलेज लुधियाना में ले गए और वहां गुरप्रीत का इलाज चला।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां अस्पताल में करीब 10 हजार रुपये के टैस्ट करवाए गए और तब जाकर कहीं दवाई दी गई। इलाज के वक्त तो उसे दर्द में थोड़ी राहत महसूस हुई, लेकिन जब घर पर वापिस पहुंची तो दर्द पहले की तरह बढ़ गया। इतना वक्त बीतने के बाद रसौलियों का आकार और बढ़ गया, जिसके कारण उसका तीसरा आॅप्रेशन डॉक्टर सुभाष गोयल (एमबीबीएस) दयानंद मैडिकल कॉलेज, लुधियाना से करवाया गया। ऑपरेशन के बाद गुरप्रीत को टांकों के कारण असहनीय दर्द सहना पड़ा और हालत बहुत ज्यादा खराब हो गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">गुरप्रीत कौर ने बताया कि वो दुनिया में मर-मर के जीअ रही थी। परमात्मा के आगे रोजाना ये ही अरदास करती कि हे परमात्मा मुझे मौत ही दे दे, क्यों तड़पा-तड़पा कर इतनी भयानक सजा दे रहा है। गुरप्रीत की बुरी हालत को देखकर उसकी गली में रहने वाली नाम लेवा लड़की वीरपाल और उसकी मौसी घर वालों से मिली और कहा कि आप गुरप्रीत को सरसा ले जाओ, वहां पर हुत बीमार ठीक होते हैं, लेकिन गुरप्रीत के परिवार वालों ने उनकी बात अनसुनी कर दी। क्योंकि उसका परिवार एक बाहर-मुखी बाबा के पीछे लगा हुआ था। उसने कहा कि गुरप्रीत के ऊपर किसी ओपरी चीज का असर है। उस बाबा ने कहा कि हम सात पाठ करेंगे और 35000 रुपये लेंगे। परिवार के लोग बाबा की बातों में आ गए और वहां पर एक पाठ में 7000 हजार रुपये भी खर्च कर दिए।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन इसके बावजूद गुरप्रीत का दर्द पहले से ज्यादा बढ़ गया। उस बाबा के पास गुरप्रीत के परिवार वाले तीन-चार साल जाते रहे, लेकिन गुरप्रीत की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ। जब गुरप्रीत कौर का परिवार मन्नतें मांग-मांग कर, पूजा कर करके, बाबाओं के आगे हाथ जोड़-जोड़ कर और डॉक्टरों के चक्कर काट-काट कर थक गया तो उसकी मौसी के दोबारा कहने पर परिवार वालों ने डेरा सच्चा सौदा का रूख किया। 13 नवम्बर 1998 के दिन गुरप्रीत और उसके परिवार वालों ने सरसा दरबार में आकर रूहानी सत्संग सुना और 14 नवम्बर को पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां से नाम दान की अनमोल दात प्राप्त की।</p>
<p style="text-align:justify;">गुरप्रीत बताती हैं कि नाम लेने के बाद उसे ऐसे लगा जैसे इससे पहले उसके सिर पर पाप कर्मों का लाखों मन बोझ था। जो नाम लेते ही उतर गया। मैं ऐसे डॉक्टर के पास पहुंच गई हूँ। जहां मेरे शरीर का भी इलाज होगा और मेरी आत्मा का भी। इससे पहले गुरप्रीत के जीवन के लगातार आठ साल बिस्तर और अस्पतालों में गुजरे थे। लेकिन नाम लेने के बाद उसके जीवन में बहुत बड़ा बदलावा आया। अब वो दस-पन्द्रह दिनों में अगर बीमार हो भी जाती तो दो-तीन दिनों में ही ठीक हो जाती।</p>
<p style="text-align:justify;">अब गुरप्रीत को लंगर घर में पक्की सेवा मिल गई। कहां तो उसका परिवार और कबीला गुरप्रीत की बीमारी को देखकर ये कहते कि ये (गुरप्रीत) मर जाए तो अच्छा है। कहां, दरबार में 150 सेवादार बहनों का गुरप्रीत के साथ इतना प्रेम-प्यार बढ़ गया कि जैसे वो सभी एक ही परिवार के सदस्य हों। नाम लेने के बाद गुरप्रीत के तीन आॅप्रेशन शाह सतनाम जी सार्वजनिक अस्पताल श्री गुरूसर मोडिया में हुए, जो पूरी तरह सफल रहे और उसे कोई तकलीफ भी नहीं हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">एक बार फिर गुरप्रीत कौर की छाती में एक बड़ी रसौली हो गई, जिसके ऑपरेशन से उसके जीवन को खतरा हो गया था। माता गुरदेव कौर लक्कड़वाली ने उसे शाह सतनाम जी स्पैशलिटी अस्पताल में दाखिल करवाया और सुमिरन किया व सतगुरु जी के चरणों में अरदास दुआ की। इसी दौरान उसे दस्त लग गए और जो रसौलियां इतनी सख्त थी, वो दस्त के जरिए बाहर निकल गई और वो बिल्कुल स्वस्थ हो गई। उसके बाद उसके शरीर में न तो कोई रसौली हुई और न ही कभी दर्द हुआ। अब गुरप्रीत कौर दरबार में सेवा करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गुरप्रीत कौर पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां का कोटि-कोटि धन्यवाद करते हुए कहती हैं कि सतगुरु जी ने मेरे मृतप्राय: शरीर में फिर से नया जीवन दान दिया है। सतगुरु जी के चरणों में यही अरदास है कि सारी उम्र डेरा सच्चा सौदा दरबार में मानवता की सेवा और सुमिरन में ही गुजरे। ये शरीर जिसकी अमानत है, उसके ही लेखे लग जाए, क्योंकि सतगुरु के इस उपकार का बदला मैं करोड़ों जन्म पाकर भी नहीं उतार सकती।<br />
<strong>”ऐहो मंग मंगां मेरे सतगुरु दयाल जी, ओड़ निभ जाए प्रीती चरणां दे नाल जी।”</strong></p>
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                <pubDate>Fri, 16 Jul 2021 10:20:28 +0530</pubDate>
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