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                <title>Caste Census - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Caste Census: देश में इस बार होगी जातिगत जनगणना</title>
                                    <description><![CDATA[पीएम मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय कैबिनेट की बैठक में लिया बड़ा फैसला नई दिल्ली (एजेंसी)। Caste Census: बिहार विधानसभा चुनावों से पहले सरकार ने राजनीतिक महत्व का एक बड़ा कदम उठाते हुए देश में आम जनगणना में जातियों की गणना कराने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को यहां […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/this-time-there-will-be-caste-census-in-the-country/article-70304"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-04/caste-census.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">पीएम मोदी की अध्यक्षता में केन्द्रीय कैबिनेट की बैठक में लिया बड़ा फैसला</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)। </strong>Caste Census: बिहार विधानसभा चुनावों से पहले सरकार ने राजनीतिक महत्व का एक बड़ा कदम उठाते हुए देश में आम जनगणना में जातियों की गणना कराने का फैसला किया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में बुधवार को यहां हुई केन्द्रीय मंत्रिमंडल की राजनीतिक मामलों की समिति की बैठक में यह फैसला लिया गया। Caste Based Census</p>
<p style="text-align:justify;">रेल, सूचना प्रसारण, इलैक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने यहां एक संवाददाता सम्मेलन में कैबिनेट के फैसलों की जानकारी दी। उन्होंने कहा, ‘‘राजनीतिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने आज फैसला किया है कि जाति गणना को आगामी जनगणना में शामिल किया जाना चाहिए।’’ जनगणना इस साल सितंबर से शुरू की जा सकती है। इसे पूरा होने में एक साल लगेगा। ऐसे में जनगणना के अंतिम आंकड़े 2026 के अंत या 2027 की शुरूआत में आएंगे। हालांकि जनगणना कब से शुरू होगी, इसके बारे में सरकार ने कुछ नहीं कहा है। बता दें कि वर्ष 2021 में कोविड महामारी के चलते जनगणना को टाल दिया गया था। आमतौर पर ये प्रत्येक 10 साल में होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैष्णव ने कहा कि कांग्रेस की सरकारों ने आज तक जाति जनगणना का विरोध किया है। आजादी के बाद की सभी जनगणनाओं में जातियों की गणना नहीं की गई। वर्ष 2010 में, तत्कालीन प्रधानमंत्री दिवंगत डॉ. मनमोहन सिंह ने लोकसभा में आश्वासन दिया था कि जाति जनगणना पर कैबिनेट में विचार किया जाएगा। तत्पश्चात एक मंत्रिमण्डल समूह का भी गठन किया गया था, जिसमें अधिकांश राजनीतिक दलों ने जाति आधारित जनगणना की संस्तुति की थी। इसके बावजूद कांग्रेस की सरकार ने जाति जनगणना के बजाय, एक सर्वे कराना ही उचित समझा जिसे एसईसीसी के नाम से जाना जाता है। इस सब के बावजूद कांग्रेस और इंडी गठबंधन के दलों ने जाति जनगणना के विषय को केवल अपने राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग किया। Caste Based Census</p>
<p style="text-align:justify;">सूचना प्रसारण मंत्री ने कहा कि जनगणना का विषय संविधान के अनुच्छेद 246 की केंद्रीय सूची की क्रम संख्या 69 पर अंकित है और यह केंद्र का विषय है। हालांकि, कई राज्यों ने सर्वे के माध्यम से जातियों की जनगणना की है। जहां कुछ राज्यों में यह कार्य सूचारू रूप से संपन्न हुआ है, वहीं कुछ अन्य राज्यों ने राजनीतिक दृष्टि से और गैरपारदर्शी ढंग से सर्वे किया है। इस प्रकार के सर्वे से समाज में भ्रांति फैली है। इन सभी स्थितियों को ध्यान में रखते हुए और यह सुनिश्चित करते हुए कि हमारा सामाजिक ताना बाना राजनीति के दबाव में न आए, जातियों की गणना एक सर्वे के स्थान पर मूल जनगणना में ही सम्मिलित होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे यह सुनिश्चित होगा कि समाज आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से मजबूत होगा और देश की भी प्रगति निर्बाध होती रहेगी। उल्लेखनीय है कि सरकार के इस फैसले का बिहार विधानसभा के सितंबर अक्टूबर में होने वाले चुनाव की दृष्टि से देखा जा रहा है जहां विपक्षी इंडी गठबंधन द्वारा उठाई गई जातीय जनगणना कराने की मांग जोर पकड़ रही है। केन्द्र की राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) की सरकार के इस फैसले को बिहार की राजनीति में उलटफेर करने वाला निर्णय माना जा रहा है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">किस पार्टी का क्या रुख रहा | Caste Based Census</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>विपक्ष<br />
</strong>कांग्रेस सहित बीजू जनता दल, समाजवादी पार्टी, राष्टÑीय जनता दल, बहुजन समाज पार्टी, एनसीपी शरद पवार देश में जातिगत जनगणना की मांग कर रही हैं। हालांकि तृणमूल का रुख अभी साफ नहीं है। राहुल गांधी ने हाल ही में अमेरिका दौरे पर भी जातिगत जनगणना को सही बताया था।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सत्ता पक्ष</strong><br />
पहले भाजपा जाति जनगणना के पक्ष में नहीं थी और विपक्ष पर जातिगत जनगणना के जरिए देश को बांटने की कोशिश का आरोप लगा रही थी। हालांकि बिहार में भाजपा ने ही जातिगत जनगणना का सपोर्ट किया था। बिहार ने अक्टूबर 2023 में जातिगत जनगणना के आंकड़े जारी किए थे। जो ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">किसने क्या कहा?</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">जाति जनगणना का फैसला दर्शाता है कि सरकार देश और समाज के विकास के लिए प्रतिबद्ध है: केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय</li>
<li style="text-align:justify;">यह फैसला हमारी जीत है। हमारी बात सरकार को माननी पड़ी : तेजस्वी यादव</li>
<li style="text-align:justify;">यह कांग्रेस की जीत है। आखिरकार मोदी सरकार को जाति जनगणना करानी पड़ रही है: उदित राज</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">कानून में करना होगा संशोधन</h3>
<p style="text-align:justify;">जनगणना एक्ट 1948 में एससी-एसटी की गणना का प्रावधान है। ओबीसी की गणना के लिए इसमें संशोधन करना होगा। इससे ओबीसी की 2,650 जातियों के आंकड़े सामने आएंगे। 2011 की जनगणना के अनुसार, मार्च 2023 तक 1,270 एससी, 748 एसटी जातियां हैं। 2011 में एससी आबादी 16.6% और एसटी 8.6% थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">अंग्रेजों के जमाने में होती थी जातिगत जनगणना</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">1881 में देश में पहली बार अंग्रेज शासकों ने जनगणना के साथ जातिगत जनगणना करवाई थी।</li>
<li style="text-align:justify;">1931 तक चलता रहा ये सिलसिला</li>
<li style="text-align:justify;">वर्ष 1941 में जातिगत जनगणना तो हुई लेकिन आंकड़े सार्वजनिक नहीं हुए।</li>
<li style="text-align:justify;">संविधान निर्माताओं और स्वतंत्रता के बाद जवाहर लाल नेहरू, सरदार वल्लभ भाई पटेल, बी.आर. अंबेडकर और मौलाना आजाद जैसे नेताओं वाली देश की पहली कैबिनेट ने समाज में विभाजनकारी असर की आशंका के चलते जातिगत जनगणना न करवाने का निर्णय लिया।</li>
<li style="text-align:justify;">स्वतंत्रता के पश्चात 1951 में पहली जनगणना हुई लेकिन उसमें सिर्फ एससी-एसटी की गणना हुई। ये भी इसलिए क्योंकि संविधान में आरक्षण की बाध्यता थी। Caste Based Census</li>
</ul>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="जानलेवा हमले के आरोप में पिता-पुत्र गिरफ्तार, जेल रवाना" href="http://10.0.0.122:1245/father-and-son-arrested-on-charges-of-murderous-attack/">जानलेवा हमले के आरोप में पिता-पुत्र गिरफ्तार, जेल रवाना</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 30 Apr 2025 20:45:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>अदालत में उलझी जातीय जनगणना</title>
                                    <description><![CDATA[समाजशास्त्रीय विचारक डी.एन. मजूमदार ने कहा था कि जाति एक बन्द वर्ग है। देखा जाए तो अभी भी यह मानो खुलेपन की मोहताज है। फिलहाल इन दिनों Caste Census को लेकर मामला काफी फलक पर है। हालांकि यह पूरे देश में नहीं है मगर बिहार जाति आधारित सर्वेक्षण के चलते चर्चा में है। गौरतलब है […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/caste-census-embroiled-in-court/article-47892"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/bihar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">समाजशास्त्रीय विचारक डी.एन. मजूमदार ने कहा था कि जाति एक बन्द वर्ग है। देखा जाए तो अभी भी यह मानो खुलेपन की मोहताज है। फिलहाल इन दिनों Caste Census को लेकर मामला काफी फलक पर है। हालांकि यह पूरे देश में नहीं है मगर बिहार जाति आधारित सर्वेक्षण के चलते चर्चा में है। गौरतलब है कि बिहार में जाति आधारित सर्वेक्षण का पहला दौर 7 से 21 जनवरी के बीच आयोजित हुआ था जबकि दूसरा दौर 15 अप्रैल को शुरू हुआ था। मगर यह न्यायालीय पचड़े में उलझ गया है। पटना उच्च न्यायालय के 4 मई के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत में दायर याचिका में बिहार सरकार ने कहा कि जातीय सर्वेक्षण पर रोक से पूरी कवायद पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">विदित हो कि पटना उच्च न्यायालय ने फिलहाल के लिये इस पर रोक लगायी है। जिस पर बीते 18 मई को शीर्ष अदालत ने पटना उच्च न्यायालय के आदेश पर स्थगनादेश देने से इंकार कर दिया। राज्य सरकार का यह भी दृष्टिकोण है कि जाति आधारित आंकड़ों का संग्रह मूल अधिकार के अंतर्गत निहित अनुच्छेद 15 और 16 में एक संवैधानिक मामला है। विचारणीय मुद्दा यह भी है कि Caste Census का राजनीतिक या सुशासनिक दृष्टिकोण क्या होगा। वैसे तो भारत में जनगणना का चलन औपनिवेशिक सत्ता के दिनों से है और आखिरी बार ब्रिटिश शासन के दौरान जाति के आधार पर 1931 में जनगणना हुई थी। हालांकि 1941 में भी जनगणना हुई मगर आंकड़े पेश नहीं किये गये। आजादी के बाद भारत ने पहली जनगणना 1951 में सम्पन्न हुई जिसमें केवल अनुसूचित जातियों और जनजातियों को ही गिना गया जो अभी भी जारी है।</p>
<p style="text-align:justify;">बिहार में Caste Census राज्य सरकार के लिए अब सिर दर्द बन गयी है। बिहार सरकार ने पांच सौ करोड़ की लागत से इसे पूरा करने का संकल्प लिया था और अब मामला खटायी में जाता दिख रहा है साथ ही दौड़ सुप्रीम कोर्ट तक देखी जा सकती है। जबकि शीर्ष अदालत ने उच्च न्यायालय के फैसले को बरकरार रखा है। हालांकि जुलाई में इसे लेकर अन्तिम निर्णय आ सकता है मगर तब तक के लिए नीतीश सरकार को असमंजस तो रहेगा ही। आखिर बिहार सरकार जातीय जनगणना को लेकर इतने उत्साहित क्यों है और अदालत का रवैया सरकार के पक्ष में क्यों नहीं है? बिहार सरकार की इस दलील कि राज्य ने कुछ जिलों में जातिगत जनगणना का 80 फीसद से अधिक सर्वे कार्य पूरा कर दिया है और महज 10 फीसद से भी कम कार्य बचा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इतना ही नहीं पूरा तंत्र जमीनी स्तर पर काम करने में लगा है। फिर भी इसे लेकर के कोर्ट पर कोई असर नहीं है और दो टूक कहें तो नीतीश सरकार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा झटका दिया है। गौरतलब है कि दो चरणों में की जा रही इस प्रक्रिया का पहला चरण 31 मई तक पूरा करने का लक्ष्य था जबकि दूसरे चरण में बिहार में रहने वाले लोगों की जाति, उपजाति और सामाजिक, आर्थिक स्थिति से जानकारियां जुटाई जाएंगी। याचिकाकर्ता का कहना है कि बिहार में हो रही इस प्रक्रिया से संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन हो रहा है क्योंकि जनगणना का विषय संविधान की 7वीं अनुसूची की संघ सूची में है। ऐसे में जनगणना कराने का अधिकार केन्द्र के पास है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदित हो कि मूल संविधान में मूल ढांचे की कोई चर्चा नहीं है। 1973 में केशवानंद भारती मामले में पहली बार यह शब्द मुखर हुआ था। सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक है और उसी के द्वारा समय-समय पर यह बताया जाता है कि मूल ढांचा क्या है? याचिका में यह भी उल्लेख है कि 1948 की जनगणना कानून में जातिगत जनगणना करवाने का कोई प्रावधान नहीं है। फिलहाल बिहार सरकार के लिए अभी की स्थिति प्रतीक्षा करो और देखो की है। सभी जातियों और समुदायों का सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण सामान्य जनगणना में नहीं होती है अर्थात् यह एक अलग किस्म की अवधारणा हालांकि 1931 के बाद साल 2011 में इसे पहली बार आयोजित किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल जनगणना भारतीय आबादी का एक समग्र चित्र प्रस्तुत करता है जबकि Caste Census राज्य द्वारा सहायता के योग्य लाभार्थियों की पहचान करने का एक उपाय के रूप में देखा जा सकता है। चूंकि जनगणना 1948 के जनगणना अधिनियम के अधीन आती है ऐसे में सभी आंकड़ों को गोपनीय माना जाता है। जबकि जातीय जनगणना में दी गई सभी व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग कर सरकारी विभाग परिवारों को लाभ पहुंचाने या प्रतिबंधित करने के लिए स्वतंत्र हैं। जातीय आधारित जनगणना के पक्ष और विपक्ष दोनों देखे जा सकते हैं। देखा जाये तो इसके होने से सामाजिक समानता और कार्यक्रमों के प्रबंधन में सहायता मिल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके माध्यम से ओबीसी आबादी के आकार, आर्थिक स्थिति, नीतिगत जानकारी, जनसांख्यिकीय जानकारी मसलन लिंगानुपात, मृत्युदर, जीवनप्रत्याशा और शैक्षिक डेटा आदि प्राप्त किया जा सकता है। इसमें कमियां भी पता चलेंगी और खूबियां भी। कमियों को दूर करने के लिए सरकार नीतियां बना सकती हैं और खूबियों से भरे लोगों को सरकार से मिल रही अतिरिक्त सेवा या लाभ को प्रतिबंधित किया जा सकता है। इसके विरोध में यह भी तर्क है कि जाति में एक भावनात्मक तत्व निहित होता है जिसका राजनीतिक और सामाजिक दुष्प्रभाव सम्भव है। हालांकि भारत विविध जातियों का देश है और राजनीति में इसका भरपूर उपयोग होता रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में भले ही Caste Census को लेकर अलग किस्म की चर्चा हो मगर देश कभी भी जात-पात के बगैर रहा ही नहीं है। चुनाव का यह बड़ा आधार बिन्दु है यहां का बड़े-से-बड़ा नेता भी अपनी सियासी शतरंज की चाल इन्हीं जातियों के इर्द-गिर्द बनाता है। वैसे इस सच से पूरी तरह मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि जाति के आंकड़े न केवल इस प्रश्न पर स्वतंत्र शोध करने में सक्षम होंगे कि सकारात्मक नीति या कार्यवाही की आवश्यकता किसे है और किसे नहीं बल्कि यह आरक्षण की प्रभावशीलता में भी एक नया नजरिया देगा। दुविधा यह है कि कुछ बिन्दुओं की सही समझ व परख नहीं होने से एक ऐसी भ्रम की अवस्था बनती है जिससे आम जनमानस एक नई असुविधा में फंस जाता है। जातीय जनगणना कितना सही है यह कह पाना मुश्किल है। मगर इसके केवल दुष्प्रभाव हैं ऐसे मनोदशा भी ठीक नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में प्रत्येक 10 साल में एक जनगणना की जाती है मगर कोविड-19 के कारण साल 2021 में यह हो नहीं पाया। जनगणना से सरकार को विकास योजनाएं तैयार करने में मदद मिलती है। किसे कितनी हिस्सेदारी मिली, कौन, कितना वंचित है आदि का पता भी चलता है और जातीय जनगणना तो इससे दो और कदम आगे है। साल 2010 में जब भाजपा सत्ता में नहीं थी तब ऐसा देखा गया कि संसद के भीतर भाजपा के नेता स्वर्गीय गोपीनाथ मुंडे जाति आधारित जनगणना को लेकर कहीं अधिक तर्कशील थे। मगर सत्तासीन भाजपा सरकार से जब संसद में सवाल किया गया कि 2021 की जनगणना किस हिसाब से होगी अर्थात जातिगत या सामान्य तरीके से। सरकार का लिखित जवाब था कि केवल अनुसूचित जाति और जनजातियों को ही गिना जायेगा।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="ना हों परेशान, आरबीआई ने किया समाधान ! जानें ‘गुलाबी नोट’ की कहानी आरबीआई की जुबानी" href="http://10.0.0.122:1245/dont-worry-rbi-has-a-solution/">ना हों परेशान, आरबीआई ने किया समाधान ! जानें ‘गुलाबी नोट’ की कहानी आरबीआई की जुबानी</a></p>
<p style="text-align:justify;">साफ है कि अन्य अर्थात् ओबीसी आदि को गिनने की कोई योजना नहीं थी। दरअसल जो पार्टी सत्ता में रहती है वह Caste Census को लेकर बहुत आतुर नहीं रहती है। हालांकि यह नीतीश कुमार पर लागू नहीं है मगर जब पार्टियां विपक्ष में होती हैं तो इसे लेकर जोर भी लगाती हैं और शोर भी करती हैं और जातिगत जनगणना को मुद्दे के रूप में परोसती हैं। फिलहाल नफे-नुकसान की इस सोच के साथ कि जातीय जनगणना का सकारात्मक दृष्टिकोण किस बिन्दु तक होगा और नकारात्मक पहलू भारतीय समाज में इससे कितना पनपेगा से परे न्यायालय के फैसले का इंतजार करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक (ये लेखक के निजी विचार हैं।)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचार</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/caste-census-embroiled-in-court/article-47892</link>
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                <pubDate>Sun, 21 May 2023 10:10:29 +0530</pubDate>
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                <title>जातिगत जनगणना पर गरमाई सियासत, पीएम से मिले नीतीश-तेजस्वी सहित कई नेता</title>
                                    <description><![CDATA[पटना। बिहार में जाति आधारित जनगणना की मांग पर सियासी हलकों में सियासत गर्मा गई है। सोमवार को इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव समेत कुल 11 नेताओं का प्रतिनिधिमंडल दिल्‍ली में प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी से मिलने पहुंचा। अलग-अलग दलों के ये नेता, प्रधानमंत्री से मिलकर उनके सामने जाति आधारित जनगणना […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/politics-heats-up-on-caste-census-many-leaders-including-nitish-tejashwi-met-pm/article-26244"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-08/nitish-meets-pm.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>पटना।</strong> बिहार में जाति आधारित जनगणना की मांग पर सियासी हलकों में सियासत गर्मा गई है। सोमवार को इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव समेत कुल 11 नेताओं का प्रतिनिधिमंडल दिल्‍ली में प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी से मिलने पहुंचा। अलग-अलग दलों के ये नेता, प्रधानमंत्री से मिलकर उनके सामने जाति आधारित जनगणना को लेकर अपना पक्ष रखा। यह मुलाकात साउथ ब्लॉक के प्रधानमंत्री के दफ़्तर में हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रतिनिधिमंडल में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अलावा नेता प्रतिपक्ष तेजस्‍वी यादव, जेडीयू के विजय कुमार चौधरी, भाजपा के जनक राम, कांग्रेस के अजीत शर्मा, भाकपा माले के महबूब आलम, एआईएमआईएम अख्‍तरुल ईमान, हम के जीतन राम मांझी, वीआईपी के मुकेश सहनी, भाकपा के सूर्यकांत पासवान और माकपा के अजय कुमार शामिल हैं। नीतीश कुमार का कहना है कि यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है और हम लंबे समय से इसकी मांग कर रहे हैं। अगर यह हो जाता है, तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। इसके अलावा, यह सिर्फ बिहार के लिए नहीं होगा, पूरे देश में लोगों को इससे फायदा होगा। इसे कम से कम एक बार किया जाना चाहिए।</p>
<h4 style="text-align:justify;">1931 में हुई थी जाति आधारित जनगणना</h4>
<p style="text-align:justify;">पिछली जाति-आधारित जनगणना 1931 में हुई और जारी की गई थी। जबकि 1941 में, डेटा एकत्र किया गया था, लेकिन सार्वजनिक नहीं किया गया। 2011 में, सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना की गई थी, लेकिन विसंगतियों के आधार पर एकत्र किए गए इस डेटा को भी सार्वजनिक नहीं किया गया था।</p>
<h4 style="text-align:justify;">चुनावी लाभ की फिराक में हर दल</h4>
<p style="text-align:justify;">अगले साल सात राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए जाति आधारित जनगणना कराना सरकार के लिए एक संवेदनशील मुद्दा है। इसको लेकर कई राजनीतिक दल एक साथ आए हैं। जद-यू, अपना दल और रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया-अठावले जैसे भाजपा सहयोगियों ने जाति आधारित जनगणना कराने की मांग उठा रहे हैं। कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल और समाजवादी पार्टी जैसे कई विपक्षी दल भी इसके पक्ष में हैं।</p>
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                <pubDate>Mon, 23 Aug 2021 11:57:03 +0530</pubDate>
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