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                <title>Agriculture - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>AGRICULTURE: गन्ना नहीं, हल्दी की खेती लगाओं, प्रति हेक्टेयर से लाखों तक कमाओं&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[AGRICULTURE: अगर आप एक किसान हैं और अच्छी कमाई करना चाहतें हैं, तो हल्दी की खेती कर अपना ये सपना पूर कर सकते हैं, इसकी खेती से आपको प्रति हेक्टेयर 4 लाख रुपये तक का फायदा हो सकता हैं, हल्दी की खेती की जनपद खीरी में बढावा देने के लिए उद्यान विभाग की ओर से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/instead-of-sugarcane-cultivate-turmeric-and-earn-lakhs-per-hectare/article-66941"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-01/agriculture.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">AGRICULTURE: अगर आप एक किसान हैं और अच्छी कमाई करना चाहतें हैं, तो हल्दी की खेती कर अपना ये सपना पूर कर सकते हैं, इसकी खेती से आपको प्रति हेक्टेयर 4 लाख रुपये तक का फायदा हो सकता हैं, हल्दी की खेती की जनपद खीरी में बढावा देने के लिए उद्यान विभाग की ओर से किसानों के लिए नई पहल कि गई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल लखीमपुर जनपद के जिला उद्यान अधिकारी ने बताया कि जनपद खीरी को चीनी का कटोरा कहा जाता हैं, यहां कि अधिकांश किसान गन्ने की ही खेती करते हैं। उन्होंने बताया कि उद्यान विभाग की ओर से हल्दी की खेती करने के लिए किसानों को बीच उपलब्ध कराया जाएगा, इसके लिए किसान ऑनलाइ आवेदन भी कर सकते हैं, क्योंकि जनपद खीरी जिले को 10 हेक्टेयर का लक्ष्य मिला हैं, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के इस सुनहरे अवसर का फायदा, पहले ‘आओ पहले पाओं’ के आधार पर दिया जाएगा। AGRICULTURE</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन अब गन्ने की खेती के साथ-साथ किसानों को हल्दी की खेती के लिए जागरूक भी किया जा रहा हैं, अभी तक कुछ किसानों ने इस योजना का फायदा उठाने के लिए आवेदन भी कर दिया हैं, ऐसी उम्मीद हैं कि आगे भी बड़ी संख्या में किसान इस योजना का लाभ उठाने के लिए आगे आएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के लिए बता दें कि मार्च माह में हल्दी की बुवाई की जाती हैं, हल्दी की खेती कर किसान लाखों रुपए कमा सकते हैं, वहीं सब्जी धान और फल के अलावा भी किसान कई तरह के खेती कर सकते हैं, हल्दी की खेती उन्हीं में से एक हैं। वहीं इसकी खास बात ये हैं कि इसके लिए आपको ज्यादा रकम भी खर्च नहीं करनी पड़ती हैं, कम लागत में ये मोटा मुनाफा देती हैं, इसलिए किसान भाई इस योजना का लाभ उठाकर इस साल अपने खेतों में हल्दी की बुवाई कर सकते हैं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Hafed: हैफेड के गोदाम में गेहूं में पानी छिड़कने (पानी डालने) का वीडियो वायरल, डीएम ने कमेटी बना दिए जांच के आदेश" href="http://10.0.0.122:1245/video-of-pouring-water-on-wheat-in-hafed-godown-goes-viral/">Hafed: हैफेड के गोदाम में गेहूं में पानी छिड़कने (पानी डालने) का वीडियो वायरल, डीएम ने कमेटी बना दिए जांच के आदेश</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 31 Jan 2025 11:50:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>Kisan News: किसानों के लिए बड़ी खुशखबरी! मशरूम की खेती पर मिलेगी 50% की सब्सिडी, जानें कैसे उठाएं योजना का लाभ</title>
                                    <description><![CDATA[Kisan News: ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए किसानों को सरकार की तरफ से अनुदान भी दिया जा रहा है, इसके तहत मशरूम इकाइयों की लागत करीब 20 लाख रुपये निर्धारित की गई है, इस लागत पर 50 प्रतिशत सब्सिड्डी दी जाती है, जिसके तहत किसानों को 10 लाख रुपये तक का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/great-news-for-farmers-50-subsidy-will-be-available-on-mushroom-cultivation/article-60538"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/kisan-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Kisan News: ग्रामीण इलाकों में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए किसानों को सरकार की तरफ से अनुदान भी दिया जा रहा है, इसके तहत मशरूम इकाइयों की लागत करीब 20 लाख रुपये निर्धारित की गई है, इस लागत पर 50 प्रतिशत सब्सिड्डी दी जाती है, जिसके तहत किसानों को 10 लाख रुपये तक का अनुदान प्रदान किया जाता है। बता दें कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत करने, भूमिहीन किसानों को भी रोजगार से जोड़ने के लिए बेहतर रोजगार के अवसर प्रदान किए जा रहे हैं। दरअसल ग्रामीण क्षेत्रों में अब मशरूम की खेती का चलन तेजी से पैर पसार रहा है।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/use-this-white-water-to-bring-life-to-your-dull-face-know-its-benefits/">Skin Care: मुरझाए चेहरे में जान डालने के लिए करें इस सफेद पानी का इस्तेमाल, जानें इसके फायदे</a></p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल मशरूम वह हेल्दी फूड है, जिसका सेवन करना सेहत के लिए बहुत लाभदायक होता है, इसमें कई तरह के पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो शरीर को अंदर से मजबूती प्रदान करते हैं। सबसे खास बात ये है कि छोटे रकबे वाले किसान भी कम जगह में मशरूम की खेती कर बड़ा मुनाफा कमा सकते हैं, ये खेती भूमिहीन किसानों के लिए लाभ का धंधा बन सकती है, उद्यानिकी विभाग के अधिकारी पीएल अहिरवार ने जानकारी देते हुए बताया कि इस योजना से जुड़ने के लिए आप एमपी आॅनलाइन के माध्यम से www.fsts.com पर आवेदन कर सकते हैं। Kisan News</p>
<p style="text-align:justify;">आपको बता दें कि दमोह जिले के हिंडोरिया के रहने वाले युवा किसान अतुल धनकर ने पिछले साल मशरूम की खेती कर कम लागत में ही अधिक प्रॉफिट कमा लिया था, इस मशरूम की खेती करने के लिए अतुल को जमीन की जरूरत ही नहीं पड़ी बल्कि अतुल ने कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक डॉ. मनोज अहिरवार की मदद से घर की चार दिवारी के अंदर ही खेती करना शुरू कर दिया, जिसे करने में महज 4 से 5 हजार रुपये का खर्चा आया था और इस मशरूम को बाजार में बेचने पर अतुल को 8 से 9 हजार रुपये का प्रॉफिट हुआ था।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं मशरूम की खेती की शुरूआत करने से पहले युवा अतुल जबलपुर गया हुआ था, जहां उसने कृषि विज्ञान केंद्र दमोह के अधिकारियों के साथ 1 दिन की ट्रेनिंग ली थी, इस खेती को करने के लिए एक सर्कल में लगभग 40 से 50 रुपये की लागत आती है। एक पैकेट में करीब 2 किलो भूसा आता है, 200 ग्राम स्पॉन लगता है, 25 दिन में पहली फसल आ जाती है, 1 सर्कल में 2 से ढाई किलो मशरूम निकलता है, जो लोकल बाजार में 150 से लेकर 160 रुपये प्रति किलो तक बिक जाता है।</p>
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                                            <category>कृषि</category>
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                <pubDate>Wed, 31 Jul 2024 11:59:30 +0530</pubDate>
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                <title>सूखने लगे धान के खेत, किसानों की चिंता बढ़ी</title>
                                    <description><![CDATA[कैथल (सच कहूँ/कुलदीप नैन)। Kaithal News: पहले जून गया और अब जुलाई, लगातार दो महीने सूखे जाने से किसानों के माथे पर चिंता की लकीरे खींचना लाजमी बात है। मानसून की बेरुखी के चलते धान के खेतों में पड़ी दरारें देखकर किसानों का मन दुखी होता जा रहा है। बारिश न होने से हर कोई […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/sach-kahoon-special-story/paddy-fields-started-drying-up-farmers-worries-increased/article-60473"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-07/kaithal-news-24.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>कैथल (सच कहूँ/कुलदीप नैन)।</strong> Kaithal News: पहले जून गया और अब जुलाई, लगातार दो महीने सूखे जाने से किसानों के माथे पर चिंता की लकीरे खींचना लाजमी बात है। मानसून की बेरुखी के चलते धान के खेतों में पड़ी दरारें देखकर किसानों का मन दुखी होता जा रहा है। बारिश न होने से हर कोई परेशान नजर आ रहा है। सावन के महीने में बारिश का इंतजार रहता है, लेकिन इस बार जिलावासियों को सावन के महीने में भी निराशा ही हाथ लग रही है। वही लोगों को उमस भरी गर्मी का भारी अहसास झेलना पड़ रहा है। सारा दिन आमजन का पसीने से तर-बतर रह कर बीत रहा है। Kaithal News</p>
<p style="text-align:justify;">मानसून की अच्छी बारिश के लिए जिला तरस रहा है। मौसम विभाग के पूवार्नुमान भी फेल होते नजर आ रहे हैं, क्योंकि पिछले कई दिनों से लगातार मौसम विभाग बारिश का अनुमान बता रहा है लेकिन इंद्र देव मौसम वैज्ञानिकों को लगातार फेल करते जा रहे है। रविवार को दिन का अधिकतम तापमान 38.2 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया जबकि न्यूनतम तापमान 29.2 डिग्री सेल्सियस रहने से रात में भी गर्मी सताने लगी है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">धान के खेतो में पड़ गई दरारें | Kaithal News</h3>
<p style="text-align:justify;">जिले के अमूमन एरिया में धान की रोपाई की जा चुकी है। गर्मी ज्यादा होने के कारण धरती ज्यादा पानी की खपत कर रही है। ऐसे में खेतों में पानी नहीं थम रहा है। किसान लगातार बारिश होने का इंतजार कर रहे हैं, क्योंकि धान की फसल में ज्यादा पानी की जरुरत होती है। बारिश न होने के कारण धान की फसलों में पानी की कमी हो गई है। कई गांव तो ऐसे हैं जहां धान लगे खेतों में दरारें बन गई हैं। यदि बारिश नहीं होती है तो किसानों की चिंता बढ़ सकती है। इससे फसल पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है</p>
<h3 style="text-align:justify;">ट्यूबवेल दे रहे जवाब</h3>
<p style="text-align:justify;">जलस्तर नीचे जाने के कारण ट्यूबवैल भी जवाब दे रहे हैं। ट्यूबवैलों से धान की फसल में पानी भी पूरा नहीं ही पा रहा है। किसानो को बार बार ट्यूबवेल रोकने पड़ रहे है। किसानों ने बताया कि धान की बुआई बारिश में ही अच्छी होती हैं। ऐसे में किसान बारिश के इंतजार में बैठे हैं। यदि अगले कुछ दिन भी बारिश नहीं हुई तो किसानों को काफी आर्थिक नुक्सान होगा। फसल भी सूखना शुरु हो गई है। बढ़ती उमस ने फसलों को नुकसान पहुंचाना शुरु कर दिया है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">उमस से जीना हुआ बेहाल | Kaithal News</h3>
<p style="text-align:justify;">उमस वाली गर्मी के कारण शरीर की चिपचिपाहट आमजन के लिए परेशानी पैदा कर रही है। कूलर-एसी के सहारे आमजन उमस भरी भीषण गर्मी से लडाई लड़ रहे हैं। कूलर एसी से दूर होते ही गर्मी बेहाल कर देती है। थोड़ी-थोड़ी देर के लिए आने वाले बादल लगातार लोगो को छका रहे हैं। रोजाना बारिश का मौसम बनता देख लोगो को एक बार तो उम्मीद होती है कि गर्मी से राहत मिलेगी लेकिन कुछ देर बाद उनकी उम्मीद फिर टूट जाती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">धान का फुटाव रुका</h3>
<p style="text-align:justify;">बारिश न होने के चलते धान में पानी नहीं रुक पा रहा है। मानसून सक्रिय होने पर ही धान में फुटाव होता है लेकिन अब धान का फुटाव रुक गया है। ट्यूबवेल का पानी फसल में खड़ा नहीं हो पा रहा है, जिसके कारण फसल में खरपतवार भी बढ़ गया है। पिछले कई सालो में इस बार जून जुलाई में सबसे कम बारिश हुई है। Kaithal News</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="कृषि से क्यों विमुख हो रहे हैं किसान?" href="http://10.0.0.122:1245/why-are-farmers-turning-away-from-agriculture/">कृषि से क्यों विमुख हो रहे हैं किसान?</a></p>
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                                                            <category>सच कहूँ विशेष स्टोरी</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/sach-kahoon-special-story/paddy-fields-started-drying-up-farmers-worries-increased/article-60473</link>
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                <pubDate>Mon, 29 Jul 2024 16:52:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Top Paddy Variety : धान की यह चार किस्में लगाने से किसान होंगे मालामाल!</title>
                                    <description><![CDATA[कुरुक्षेत्र (देवीलाल बारना)। हरियाणा में धान की रोपाई पूरे जोरों पर है फिलहाल किसान ज्यादातर मोटी और हाइब्रिड धान (Top Paddy Variety) की रोपाई कर रहे हैं। इसके बाद किसान बासमती धान की रोपाई का कार्य शुरू करेंगे। हरियाणा प्रदेश के 14 जिलों में धान का उत्पादन किया जाता है। इसके लिए उतरी हरियाणा के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/top-4-paddy-variety/article-59139"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/whatsapp-image-2024-06-28-at-10.33.41-am.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>कुरुक्षेत्र (देवीलाल बारना)।</strong> हरियाणा में धान की रोपाई पूरे जोरों पर है फिलहाल किसान ज्यादातर मोटी और हाइब्रिड धान (Top Paddy Variety) की रोपाई कर रहे हैं। इसके बाद किसान बासमती धान की रोपाई का कार्य शुरू करेंगे। हरियाणा प्रदेश के 14 जिलों में धान का उत्पादन किया जाता है। इसके लिए उतरी हरियाणा के कई जिले सबसे ज्यादा मशहूर है, जिसके चलते इस क्षेत्र को धान का कटोरा भी कहा जाता है। हरियाणा की बासमती धान की भारत ही नहीं विदेशों में मांग है क्योंकि हरियाणा की बासमती धान के चावल का स्वाद और खुशबू अलग ही होती है। लेकिन कुछ किसान बासमती धान की उन्नत किस्म का चयन नहीं कर पाते जिसके चलते वह अच्छा उत्पादन नहीं ले पाते।</p>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा में लगने वाली बासमती धान की उन्नत किस्म कौन-कौन सी है व धान की रोपाई करने का वैज्ञानिक तरीका क्या है और उसका प्रबंधन कैसे किया जाता है। इसके लिए दैनिक सच कहूँ ने कृषि विभाग के उपनिदेशक डा. कर्मचंद से बातचीत की। डॉ. कर्मचंद का कहना है कि हरियाणा में बड़े स्तर पर बासमती धान की खेती की जाती है और हमारा बासमती चावल विदेशों में भी लोकप्रिय है लेकिन कुछ किसान भाई उचित किस्म का चयन नहीं कर पाते जिसके चलते उत्पादन प्रभावित होता है। हरियाणा में बासमती धान की प्रमुख तौर पर चार किस्म लगाई जाती है। हरियाणा में मुख्यतौर पर बासमती धान की रोपाई 25 जून से 15 जुलाई तक सही मानी जाती है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>हरियाणा के लिए कौन-सी बासमती है प्रमुख | Top Paddy Variety</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा में लगने वाली बासमती की प्रमुख चार किस्म हैं जिसमें पूसा बासमती 1692, पूसा बासमती 1509, पूसा बासमती 1121 व सीएसआर 30 शामिल हैं। ये चार किस्में हरियाणा में उन्नत किस्म मानी जाती है जो अच्छा उत्पादन देती हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>यूं करें धान की रोपाई | Top Paddy Variety</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">डॉ. कर्मचंद ने बताया कि उन्नत किस्म का सही तरीके से चयन करने के बाद किसानों के सामने धान रोपाई सही तरीके से कैसे करें, यह जानना जरूरी है। ऐसे में अपने खेत को अच्छे से तैयार कर ले, ट्रैक्टर के साथ खेत जोतने के बाद 4 घंटे तक खेत को ऐसे ही पानी से भरा हुआ छोड़ दें, ताकि उसमें जो भी कंकड़ पत्थर इत्यादि होती है वह सभी नीचे बैठ जाएं। जब नीचे गीली मिट्टी दिखने लग जाए तब धान की रोपाई करनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">धान की नर्सरी से पनीरी उखाड़ते समय किसान ध्यान रखें की नर्सरी उखाड़ते समय उस खेत में पानी भरा होना चाहिए क्योंकि अगर सुखे खेत में नर्सरी को उखाड़ते हैं तो पौधे के नीचे वाले हिस्से में जहां पर जड़ होती है वहां पर इंजरी हो जाती है और इससे कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो जाते हैं जिनमें से झंडा एक प्रमुख रोग है। नर्सरी को उखाड़ने के बाद ट्राइकोडर्मा नामक दवाई का घोल बनाकर उसमें कुछ समय के लिए नर्सरी के पौधों को रखें, जिसे उसके फंगस इत्यादि सभी प्रकार के रोग दूर हो जाते हैं और पौधे की खेत में लगने के साथ अच्छी बढ़वार होती है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>बासमती धान में कितनी डालें खाद की मात्रा?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">बासमती धान की हरियाणा में मुख्य तौर पर चार किस्में लगाई जाती हैं, लेकिन यह अलग-अलग श्रेणी में आती हैं। इनमें से कुछ किस्म लंबी होती है तो कुछ किस्म का पौधा छोटा रहता है जिसे बोनी बासमती कहा जाता है। दोनों के लिए अलग-अलग खाद की मात्रा डाली जाती है। बोनी बासमती के लिए 36 किलोग्राम शुद्ध नाइट्रोजन, 80 किलोग्राम यूरिया खाद, 12 किलोग्राम फासफोर्स और 10 किलोग्राम जिंक की मात्रा प्रति एकड़ डालें। लम्बी किस्म वाली बासमती धान में 24 किलोग्राम शुद्ध नाइट्रोजन, एक बैग यूरिया खाद और 12 किलोग्राम फासफोर्स 10 किलोग्राम जिंक प्रति एकड़ डालें।</p>
<p style="text-align:justify;">जिंक को रोपाई के समय डालें, जबकि 80 किलोग्राम यूरिया खाद को तीन भागों में कुछ-कुछ समय के अंतराल पर डालें। खरपतवार नियंत्रण के लिए धान रोपाई के 72 घंटे के अंदर ब्यूटाक्लोर (मिचेटी) नामक दवाई खेत में डालें। खाद की इस मात्रा से किसान बंपर पैदावार बासमती धान की ले सकता है। किसान अधिक जानकारी के लिए नजदीकी जिला कृषि अधिकारी से सम्पर्क कर सकता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>15 सेंटीमीटर रखें पौधों की दूरी</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">डॉ. कर्मचंद के अनुसार खेत में धान के पौधे लगाते समय उसकी संख्या पूरी होनी चाहिए ताकि उत्पादन पर कोई असर न पड़े, इसमें पौधे से पौधे की दूरी 15 सेंटीमीटर की रखें और लाइन से लाइन में पौधा लगाना चाहिए ताकि जब फसल कुछ महीने की हो जाती है तब उसमें हवा क्रॉस होती रहे। इसे बीमारियां लगने का काम खतरा होता है और उत्पादन अच्छा होता है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 28 Jun 2024 11:07:15 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Organic Farming : प्रकृति संतुलन का आधार- जैविक खेती</title>
                                    <description><![CDATA[Organic Farming जैविक खेती (Organic Farming) कृषि की वह प्रवृत्ति है जिससे पर्यावरण के स्वच्छ एवं प्राकृतिक संतुलन को कायम रखते हुए भूमि, जल और वायु को प्रदूषित किये बिना लंबे समय तक संतोषजनक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पद्धति में रसायनों का प्रयोग कम से कम एवं आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। इसमें […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/organic-farming-is-the-basis-of-nature-balance/article-59028"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/organic-farming.jpeg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>Organic Farming</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">जैविक खेती (Organic Farming) कृषि की वह प्रवृत्ति है जिससे पर्यावरण के स्वच्छ एवं प्राकृतिक संतुलन को कायम रखते हुए भूमि, जल और वायु को प्रदूषित किये बिना लंबे समय तक संतोषजनक उत्पादन प्राप्त किया जाता है। इस पद्धति में रसायनों का प्रयोग कम से कम एवं आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। इसमें मिट्टी को एक जीवित माध्यम माना गया है। मिट्टी में असंख्य लाभदायक जीव रहते हैं जो एक-दूसरे के पूरक होते हैं तथा पौधों की वृद्धि हेतु पोषक तत्व भी उपलब्ध कराते हैं। अत: इस पद्धति में मिट्टी को स्वस्थ एवं जीवित रखते हुए प्रकृति में उपलब्ध अन्य मित्र जीवों के मध्य तालमेल रखकर खेती करनी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके लिए खेत की आवश्यकतानुसार जुताई की जाये क्योंकि अधिक जुताई भी लाभदायक जीवों को नष्ट कर देती है। अच्छी फसल के लिए मिट्टी का स्वस्थ रहना आवश्यक है। मिट्टी की स्वस्थता से मतलब है कि उसमें जितने अधिक जीवाणु होंगे, वह मिट्टी उतनी ही स्वस्थ मानी जावेगी। ये जीवाणु फसल के अवशेष जैसे जड़, डंठल, पत्तियां, कचरे को सड़ा-गलाकर झूमस में परिवर्तित करते हैं और मिट्टी में खनिज को भी घुलनशील अवस्था में परिवर्तित कर फसल को उपलब्ध कराते हैं। इसके साथ इन जीवों को सड़ने-गलने से भी मिट्टी की उर्वरा शक्ति में वृद्धि होती है। कृषि का आधार जीवांश है। जीवांश से भूमि जीवित रहती है। जीवांश से भूमि पर विपरीत असर डालने वाले कारक विघटित हो जाते हैं। वे पौधों एवं जीवों के लिए पर्याप्त मुख्य एवं अल्प पोषण तत्व उपलब्ध कराते हैं। भू-क्षरण का बचाव करते हैं, इससे जल के रिसाव व संवर्धन की क्षमता में वृद्धि होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">रासायनिक खेती के कारण अनेक स्थानों पर मिट्टी की गुणवत्ता व सजीवता तथा सूक्ष्म जीवों की संख्या में कमी आ रही है तथा भुरभुरी मिट्टी का भयावह रूप से क्षरण हुआ है। हरित क्रांति के दौरान भारत वर्ष में कृषि का विकास बहुत तेजी से हुआ है और हमारे देश के खाद्यान्नों के उत्पादन में भी पर्याप्त वृद्धि हुई है। आज की खेती मुख्यत: रासायनिक खादों पर ही निर्भर रहने लगी है। आधुनिक खेती से हमारी कृषि योग्य भूमि में अब अन्य तत्वों की कमी के साथ-साथ मृदा संरचना एवं स्वास्थ्य पर भी विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। कृषि भूमि की उत्पादन क्षमता एवं स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए रासायनिक उर्वरकों के साथ-साथ जैविक उर्वरकों का प्रयोग भी संतुलित रूप में करने की अत्यंत आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">तरल जैविक उर्वरक लाभकारी जीवाणुओं के वह उत्पाद हैं, जो लम्बी अवधि तक सक्रिय रहकर मिट्टी व हवा से मुख्यत: सूक्ष्म तत्वों का दोहन कर पौधों को उपलब्ध कराते हैं। प्राकृतिक संतुलन कायम रखती है जैविक खेती जिसका आधार जीवांश है। जीवांश को जलाकर नष्ट नहीं करें अन्यथा उसकी ऊर्जा समाप्त हो जाती है। प्राचीन समय में भारत की कृषि की गौरवशाली उपलब्धियों में गोवंश की अहम भूमिका रही है। पशुधन अर्थ तंत्र की धुरी थी वह आज भी उतनी ही प्रासंगिक है व साथ में पर्यावरण सुरक्षित रखने में सक्षम भी है। ग्रीनपीस के सर्वेक्षण के अनुसार भारत के 98 प्रतिशत कृषक जैविक खाद का उपयोग करना चाहते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गोवंश के अतिरिक्त पेड़-पौधों, पक्षी, मेंढक, उल्लू, केंचुए आदि प्राकृतिक संतुलन के साथ उत्पादन स्तर उच्च स्तर पर रखने में सहायक होेते हैं। इस धरती को लाखों पौधों की जातियो ंने संवारा है। मानव सभ्यता के इतिहास में केवल सात हजार जातियों का ही भोजन के रूप में प्रयोग होने का उल्लेख मिलता है। जिनमें धान, गेहूं, मक्का, ज्वार, आलू सोयाबीन, गन्ना आदि प्रमुख हैं। इन प्रमुख जातियों के अतिरिक्त पौधों की अन्य जंगली किस्में भी हैं। जिन्हें विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषत: प्रगतिशील देशों में प्रयोग में लाया जाता है। इन सब पादप जन्य द्रव्यों का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है क्योंकि भोजन, चारा, रेशा, र्इंधन आदि की आवश्यकता मानव उपयोग के लिए सदैव बनी रहेगी। उक्त तथ्यों को दृष्टिगत रखते हुए जैविक खेती प्रकृति संतुलन का आधार है। अत: हर व्यक्ति पर्यावरण प्रहरी बने।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 25 Jun 2024 11:23:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>कृषि छात्रों के लिए खुशखबरी! मिलेगी 25 लाख तक की सहायता! किसान भी कर सकते हैं आवेदन</title>
                                    <description><![CDATA[जयपुर (सच कहूं न्यूज)। श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय (Shri Karna Narendra Agriculture University) में संचालित श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि-व्यवसाय इंक्यूबेटर द्वारा कृषि छात्रों और नवाचारी कृषि स्टार्टअप्स के लिए कोहोर्ट-10.0 का शुभारंभ किया गया है। इस कार्यक्रम के तहत इंक्यूबेसन सेंटर के द्वारा कृषि छात्रों और नवाचारी कृषि स्टार्टअप्स को कृषि उत्पादों और सेवाओं […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/agriculture-students-will-get-assistance-up-to-rs-25-lakh-farmers-can-also-apply/article-57982"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/shri-karna-narendra-agricul.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>जयपुर (सच कहूं न्यूज)।</strong> श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय (Shri Karna Narendra Agriculture University) में संचालित श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि-व्यवसाय इंक्यूबेटर द्वारा कृषि छात्रों और नवाचारी कृषि स्टार्टअप्स के लिए कोहोर्ट-10.0 का शुभारंभ किया गया है। इस कार्यक्रम के तहत इंक्यूबेसन सेंटर के द्वारा कृषि छात्रों और नवाचारी कृषि स्टार्टअप्स को कृषि उत्पादों और सेवाओं के विकास और उत्पादन में मदद के लिए विभिन्न संसाधन, मार्गदर्शन व प्रशिक्षण प्रदान किया जाएगा। कुलपति डॉ. बलराज सिंह ने बताया कि इसके साथ 25 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता भी प्रदान की जाएगी। Rajasthan News</p>
<p style="text-align:justify;">कार्यक्रम के शुभारंभ समारोह में बलराज सिंह ने बताया कि कृषि छात्रों और कृषि उद्यमियों के लिए कृषि-व्यवसाय इंक्यूबेसन सेंटर की स्थापना एक बड़ा कदम है जो हमारे कृषि क्षेत्र को उच्च स्तर पर ले जाने का निरन्तर प्रयास कर रहा है। इंक्यूबेसन सेंटर द्वारा अब तक 184 नवाचारी कृषि स्टार्टअप्स को प्रशिक्षित किया गया है, जिनमें से 50 स्टार्टअप्स को 6.01 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की है।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही उन्होंने कहा कि हम उम्मीद करते हैं कि इस कार्यक्रम के माध्यम से हमारे छात्रों और उद्यमियों को अधिक ज्ञान, नए कौशल और व्यापारिक सूचना प्राप्त होगी, जो उन्हें कृषि क्षेत्र में सफलता की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करेगी। बलराज सिंह ने बताया इस कार्यक्रम का उद्देश्य न केवल स्टार्टअप्स को बढ़ावा देना है, बल्कि कृषि क्षेत्र को भी नवाचार के माध्यम से विकसित करना है। स्टार्टअप्स कोहोर्ट-10.0 के विमोचन के दौरान डॉ. बलवीर सिंह बधाला, डॉ. राजेश सिंह, व्यवसायिक प्रबंधक प्रभात दुबे, सहायक प्रबंधक हर्षित शर्मा, व्यवसायिक अधिकारी अशोक भूरिया, तकनीकी सहायक मनीष कुमावत इत्यादि मौजूद रहे। Rajasthan News</p>
<h3 style="text-align:justify;">ऐसे कर सकते है आवेदन | Rajasthan News</h3>
<p style="text-align:justify;">-प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए 30 जून-2024 तक इंक्यूबेसन सेंटर की वेबसाइट <a href="http://sabijobner.co.in">sabijobner.co.in</a> व विश्वविद्यालय की वेबसाइट <a href="http://sknau.ac.in">sknau.ac.in</a> के माध्यम से आवेदन कर सकते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">पात्रता मापदंड</h3>
<p style="text-align:justify;">एक माह की मेंटरशिप और तकनीकी सहायता के साथ 4 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता के लिए कृषि व कृषि से सम्बन्धित सेक्टर के विद्यार्थी आवदेन कर सकते हैं जबकि प्री-सीड स्टेज व सीड स्टेज पर कोई भी कृषि उद्यमी आवेदन कर सकता है। इसके लिए राजस्थान, मध्यप्रदेश, हरियाणा, गुजरात, उत्तरप्रदेश व पंजाब के कृषि छात्र व नवाचारी किसान आवेदन सकते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">वित्तीय सहायता का विवरण</h3>
<p style="text-align:justify;">कृषि छात्रों के लिए एक माह की मेंटरशिप और तकनीकी सहायता के साथ 04 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। प्री-सीड स्टेज कृषि उद्यमियों के लिए एक माह की मेंटरशिप और 05 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी। सीड स्टेज कृषि उद्यमियों के लिए एक माह की मेंटरशिप और तकनीकी सहायता के साथ 25 लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इंक्यूबेसन सेंटर के प्रभारी डॉ. आईएम खान ने बताया कि कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा वित्त सहायता से वर्ष 2018-19 में श्री कर्ण नरेन्द्र कृषि व्यवसाय इंक्यूबेटर की स्थापना की गई थी। यह भारतीय कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय की एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसके माध्यम से कृषि क्षेत्र को विकसित करने और युवा उत्पादकों को प्रेरित करने के लिए एक नई दिशा देने का प्रयास किया जा रहा है। इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य कृषि क्षेत्र में उत्पादकता और उद्यमिता को बढ़ावा देना है। यह कार्यक्रम कृषि छात्रों और उद्यमियों को नवाचारी विचारों और तकनीकी सहायता के साथ अपने व्यवसायिक सपनों को साकार करने में मदद करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस इंक्यूबेसन सेंटर ने नवाचारी उत्पादों और सेवाओं को विकसित करने के लिए महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में अपनी पहचान बनाई है। इसके अंतर्गत युवा उद्यमियों को अपने विचारों को साकार करने और उन्हें व्यवसायिक सफलता प्राप्त करने के लिए सहायता प्रदान की जाती है।</p>
<p><a title="Australia: पर्थ, ऑस्ट्रेलिया में कुछ इस अंदाज में मनाया MSG सत्संग भंडारा!" href="http://10.0.0.122:1245/msg-satsang-bhandara-celebrated-in-this-style-in-perth-australia/">Australia: पर्थ, ऑस्ट्रेलिया में कुछ इस अंदाज में मनाया MSG सत्संग भंडारा!</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/agriculture-students-will-get-assistance-up-to-rs-25-lakh-farmers-can-also-apply/article-57982</link>
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                <pubDate>Sun, 26 May 2024 18:10:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Slehri Medicine : सलेहरी औषधि की खुशबू से महक उठी लाडवा मंडी</title>
                                    <description><![CDATA[देशी दवाइयां बनाने में होता है इसका प्रयोग || Slehri Medicine रामगोपाल, लाडवा। हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी लाडवा अनाजमंडी आजकल सलैहरी औषधि (Slehri Medicine) की खुशबू से महकी हुई है। हरियाणा और पंजाब की सीमा कैथल और पटियाला के किसानों द्वारा इस औषधि की फसल तैयार की जाती है। अब इस फसल […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/slehri-medicine/article-57896"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/slehri-medicine.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>देशी दवाइयां बनाने में होता है इसका प्रयोग || Slehri Medicine</strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>रामगोपाल, लाडवा।</strong> हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी लाडवा अनाजमंडी आजकल सलैहरी औषधि (Slehri Medicine) की खुशबू से महकी हुई है। हरियाणा और पंजाब की सीमा कैथल और पटियाला के किसानों द्वारा इस औषधि की फसल तैयार की जाती है। अब इस फसल की बिजाई कुरुक्षेत्र जिले में भी कुछ किसानों द्वारा की जा रही है। केवल लाडवा और अमृतसर की अनाजमंडी मे सलैहरी औषधि का व्यापार होता है। किसानों द्वारा बिक्री के लिए सलैहरी औषधि लाडवा अनाजमंडी मे लाई जाती है। इसलिए लाडवा अनाज मंडी एशिया की प्रमुख अनाजमंडी में से एक है। लाडवा मंडी में इस औषधि फसल की हर वर्ष लगभग 15,000 से 20,000 बोरी किसानों द्वारा बिक्री के लिए लाई जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अभी तक मंडी में लगभग 500 से 1000 बोरी सलैहरी की आवक हुई है। इस फसल को व्यापारियों द्वारा 7200 रुपए से लेकर 8500 रुपए प्रति क्विंटल तक खरीदा जा रहा है। व्यापारियों ने बताया कि इस फसल का एशिया देशों में निर्यात किया जाता है। इस औषधि फसल का तेल निकाल कर देशी दवाइयां बनाने में प्रयोग किया जाता है और खाद्य सामग्री को लंबे समय तक ठीक रखने के लिए भी इसका प्रयोग किया जाता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>कैसी होती है सलैहरी औषधि || Slehri Medicine</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">सलैहरी औषधि हरे और भूरे रंग की खुशबूदार औषधि है और यह देखने में अजवायन जैसी लगती है। यह देसी दवाइयां बनाने और खाद्य पदार्थों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने के लिए प्रयुक्त होती है। कुछ लोग इसे हड्डियों और जोड़ों के दर्द में दवाई के रूप में प्रयोग करते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>मटर के बीज और सलैहरी की एक साथ होती है बिजाई</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">इस फसल को लेकर आए किसान अमरीक सिंह, करनैल सिंह, अमरजीत सिंह, निदान सिंह, कर्मवीर, जयपाल आदि ने बताया कि इसकी बिजाई अक्टूबर नवंबर में की जाती है। जिसमें मटर सब्जी के बीज और सलैहरी के बीज दोनों फसलों की एक साथ बिजाई की जाती है। इन फसलों की निकासी का समय 6 महीने का है। मटर सब्जी की फसल 3 महीने मे तैयार हो जाती है। आगे 3 महीने के बाद सलैहरी औषधि की फसल तैयार हो जाती हैं। इस फसल की 6 से 8 क्विंटल प्रति एकड़ निकासी होती है। जिसका बाजार भाव 7200 से 8500 रुपए प्रति क्विंटल है और यह फसल लगभग 50000 से 60000 रूपए पर प्रति एकड़ तक बिक जाती है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/slehri-medicine/article-57896</link>
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                <pubDate>Fri, 24 May 2024 10:46:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Watermelon Farming : तरबूज की मिठास ने खारियां के किसान कृष्ण कालड़ा को बनाया लखपति</title>
                                    <description><![CDATA[किसान कृष्ण कुमार ने बताया कि फसल की देखरेख, अच्छी पैदावार लेने के लिए उसने पड़ोसी राज्य के जिला फाजिल्कां से बलवंत सिंह व सुनील कुमार को 20 प्रतिशत बटाई पर रखा है, जिन्होंने कृषि विभाग रानियां से एचडीओ प्रोमिला के मार्गदर्शन में तरबूज (Watermelon Farming) की अच्छी पैदावार व गुणवता के लिए समय-समय पर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/beneficial-farming-of-watermelon/article-57608"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/watermelon-farming.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><em><strong>किसान कृष्ण कुमार ने बताया कि फसल की देखरेख, अच्छी पैदावार लेने के लिए उसने पड़ोसी राज्य के जिला फाजिल्कां से बलवंत सिंह व सुनील कुमार को 20 प्रतिशत बटाई पर रखा है, जिन्होंने कृषि विभाग रानियां से एचडीओ प्रोमिला के मार्गदर्शन में तरबूज (Watermelon Farming) की अच्छी पैदावार व गुणवता के लिए समय-समय पर जैविक खाद-उर्वरक, पानी, स्प्रै, निराई-गुड़ाई का कार्य किया। </strong></em></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सुनील कुमार खारियां। </strong>ग्रीष्म ऋतु के समय में बाजार में तरबूज की बहुत ज्यादा डिमांड रहती है। ऐसे में गर्मी के मौसम में किसानों के लिए तरबूज की खेती करना काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। जो कम लागत में किसान को कुछ ही समय में लखपति बना सकती है। सरसा जिले के गांव खारियां निवासी कृष्ण कुमार कालड़ा ऐसे किसान हैं जो अल्प समय में तरबूज की खेती से लखपति बन गए।</p>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि कृष्ण कुमार करीब दो वर्ष पूर्व तक एक बिजनेसमैन थे, जो गांव में खुद के पैट्रोल पंप का संचालन करते थे। खुद की जमीन जायदाद के चलते कृष्ण कुमार ने पैट्रोल पंप बेच कर खेती करने की मन में ठानी, लेकिन पिछले वर्षों में कपास में आई गुलाबी सुड़ी ने लाखों रुपये का घाटा पहुंचा दिया। इसके बाद कृष्ण कुमार ने कपास की खेती छोड़कर कुछ अलग करने का मन बना लिया और मात्र छह महीने में तरबूज की खेती से आठ लाख की आमदनी हासिल कर ली।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>ऐसे आया तरबूज की खेती का आईडिया || Watermelon Farming</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">कृष्ण कुमार बताते हैं कि उसके पास कृषि योग्य भूमी काफी है, जिसमें 20 प्रतिशत की हिस्सेदारी पर भूमिहीन किसानों से खेती का कार्य करवाता है। पिछले साल नरमा व कपास की फसल में आई गुलाबी सुंडी से उसे लाखों का नुकसान उठाना पड़ा। जिससे समाधान के लिए कुछ किसानों एकत्रित होकर एक सामूहिक बैठक में खेती के तरीकों, खर्चों, नए प्रयोगों व नई खेती पर मंथन किया।</p>
<p style="text-align:justify;">उसी समय उन्हें क्षेत्र के तापमान, मिट्टी, पानी, बाजार की मांग व मौसम को ध्यान में रखते हुए तरबूज की खेती का आईडिया ध्यान में आया। जिसके बाद उसने तरबूज की खेती पर रिसर्च किया और कृषि विभाग रानियां से संपर्क कर खेती के तरीके, लगाने का उचित समय, खर्चा, आमदनी, मेहनत व मार्केट का विश्लेषण कर दो एकड़ में तरबूज की खेती करने का मन बनाया। कृष्ण कुमार के अनुसार, उसने मात्र दो लाख रूपए का रिस्क उठाकर आठ लाख रूपये की आमदनी हासिल की है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>कुछ इस तरह से तैयार होता है तरबूज  </strong></h4>
<p style="text-align:justify;">कृष्ण कुमार ने बताया कि तरबूज की खेती के लिए दोमट मिट्टी, नहर का पानी तथा गर्म मौसम की जरूरत होती है। उसने दो एकड़ में तरबूज की अच्छी पैदावार उठाने के लिए उन्नत किस्म का बीज चुना। दो एकड़ के लिए साढ़े 14 हजार रूपए खर्च कर 12,000 पौधों के बीजों को 40 दिन की क्लटीवेशन के लिए मांगेआना फार्म में रखा। दिसम्बर महीने के प्रथम सप्ताह में भूमि को सिंचाई व निराई-गुड़ाई करके तैयार किया और 4-4 फिट की मेड बनाकर उस पर प्लास्टिक की मलचिंग तथा पौधों को सर्दी से बचाने के लिए करीब 12 इंच ऊंची लॉ टनल बनाई गई, जिस पर 30 हजार रूपए खर्च आया। दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में पौधों की रोपाई करने के बाद ड्रिप के माध्यम से हर दस दिन बाद पानी व जरूरत अनुसार लिक्विड खुराक देने की प्रक्रिया जारी रही।</p>
<p style="text-align:justify;">फरवरी के अन्त में बेलों पर फूल व फल की प्रक्रिया शुरू हो गई, जो अगले 20 दिनों में शहद की मिठास से भरपूर, लाल रंग तथा वजन में लगभग 5 से 7 किलोग्राम के फल तैयार होने लगे। किसान ने बताया कि दो एकड़ में लगे तरबूज के इस खेत तैयार करने से लेकर उत्पादन तक जिसमें लेबर, किराया व मंडी की दामी भी शामिल है, करीब 2 लाख रूपए खर्च आया। उसने बताया कि दो एकड़ में लगभग 1400 क्विंटल तरबूज की पैदावार हुई जिससे मार्केट रेट के अनुसार छह महीने में लगभग 8 लाख की आमदनी हुई। हालांकि गांव के नजदीक में बड़ा बाजार या मंडी ना होने के चलते तरबूज की सप्लाई या बिक्री करना बड़ा मुश्किल है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 17 May 2024 10:03:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Wheat Dry Fodder : खेतों से तैयार नई तूड़ी कर सकती है आपके पशु का स्वास्थ्य खराब, रखें खास ख्याल</title>
                                    <description><![CDATA[विशेष बातचीत में पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. विद्यासागर बंसल ने कई अहम विषयों पर दी महत्वपूर्ण जानकारी || Wheat Dry Fodder राजू, ओढां। गेहूँ की कटाई के साथ ही नई तूड़ी तैयार होकर इनदिनों हर घर में पहुंच रही है। अगर आप पशुओं को नई तूड़ी (Wheat Dry Fodder) खिलाने जा रहे हैं तो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/wheat-dry-fodder/article-56797"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/animal-husbandry.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>विशेष बातचीत में पशुपालन विभाग के उपनिदेशक डॉ. विद्यासागर बंसल ने कई अहम विषयों पर दी महत्वपूर्ण जानकारी || Wheat Dry Fodder</strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>राजू, ओढां।</strong> गेहूँ की कटाई के साथ ही नई तूड़ी तैयार होकर इनदिनों हर घर में पहुंच रही है। अगर आप पशुओं को नई तूड़ी (Wheat Dry Fodder) खिलाने जा रहे हैं तो सावधान हो जाईये, क्योंकि अगर आपने कई बातों का ध्यान न रखा तो आपके पशु का स्वास्थ्य खराब हो सकता है, बल्कि उसकी जान तक जा सकती है। तूड़ी के सही इस्तेमाल व इसके भंडारण सहित पशुओं से जुड़े कई विषयों को लेकर सच-कहूँ संवाददाता ने पशुपालन विभाग सरसा के उपनिदेशक डॉ. विद्यासागर बंसल से विशेष बातचीत की। डॉ. बंसल ने पशु की नियमित खुराक, गर्मी के मौसम में उचित देखरेख, टीकाकरण व विभाग द्वारा पशुपालकों के हितार्थ चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं के बारे भी काफी महत्वपूर्ण जानकारियां सांझा की।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सवाल : नई तूड़ी से पशु में बंध पड़ने व अफारा की शिकायतें आती हैं। इसका कारण और उपचार क्या है?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जवाब : नई तूड़ी को लेकर पशुओं में बंध या अफारा की अकसर शिकायत आती है। दरअसल, तूड़ी (Wheat Dry Fodder) के साथ तीखे कण होते हैं वो पशु के पेट में चले जाते हैं जोकि अंदर जख्म भी कर देते हैं। इसके लिए बेहतर ये है कि पशु को खिलाने से पूर्व तूड़ी को हल्के से पानी में भिगो दें। सेवन से पूर्व उसे छान लेना बेहतर है। साथ में हरे चारे की मात्रा अधिक रखें। ऐसा करने से तूड़ी न केवल नरम पड़ जाएगी, बल्कि पशु को पचाने में भी ज्यादा ऊर्जा खर्च नहीं करनी पड़ेगी। बंध के लक्षण दिखने पर पशुपालक अपने स्तर पर उपचार करने की बजाय पशु चिकित्सक से संपर्क करें। बंध ज्यादा समय तक रहने से पशु की मौत भी हो सकती है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सवाल : तूड़ी का भंडारण किस तरह से करना चाहिए?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जवाब: तूड़ी का भंडारण एक तो खुष्क जगह पर करें, जहां नीचे नमी हो या आसपास पानी का स्त्रोत हो वहां भंडारण करने से बचें। हो सके तो तूड़ी डालने से पूर्व नीचे पॉलीथीन बिछा दें। अक्सर देखा जाता है कि किसान जो खेती के लिए पेस्टीसाइड लेकर आते हैं उसका छिड़काव करने के बाद उसे तूड़ी में दबा देते हैं। ऐसे में कई बार दवा की बोतल लिकेज भी हो जाती है। फिर वही तूड़ी पशु को खिला दी जाती है जिसके चलते कई बार पशु के लिए वह खतरा बन जाती है। तूड़ी को नमी व बरसात से बचाकर रखना चाहिए। जब तूड़ी समाप्त होने वाली होती है तो कभी-कभी नीचे नमी वाली तूड़ी बच जाती है जिसमें फंगस आ जाती है। यह तूड़ी पशु में रोग का कारण बन जाती है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सवाल: पशु के ब्याने के बाद अगर जैर नहीं गिरती तो क्या हाथ से निकलवाना सही है ?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जवाब: अमूमन पशु ब्याने के कुछ घंटों बाद ही जैर गिरा देता है। कई बार पशु निर्धारित समय में ऐसा नहीं करता तो 24 घंटे तक इंतजार अवश्य करें। फिर भी अगर जैर नहीं गिरती तो निपुण पशु चिकित्सक से पहले सलाह व उपचार अवश्य लें। अधिकतर केसों में हम पशु के अंदर दवाई वगैरा रख देते हैं जिससे जैर अपने आप ही निकल जाती है। याद रहे कि हाथ से जैर निकलवाना अंतिम विकल्प होना चाहिए। इस प्रक्रिया में सावधानी बरतें और पशु के गर्भ में हाथ डालते समय सफाई का विशेष ध्यान रखें। यदि जैर पशु के अंदर पड़ी है तो कोई दिक्कत नहीं, वो धीरे-धीरे अपने आप बाहर आ जाती है। लेकिन जब जैर बाहर लटकती है तो पशु के बैठने पर उसमें मिट्टी या गोबर वगैरा लग जाता है। जब पशु खड़ा होता है तो जैर अंदर जाने पर गर्भ में संक्रमण हो जाता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सवाल: नस्ल सुधार क्या है और इसकी पूरी प्रक्रिया के बारे मेें बताएं?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जवाब: नस्ल सुधार एक निरंतर प्रक्रिया है। जब हम देसी गाय को मेल पशु का सीमन लगाते हैं तो प्रथम बार 50 प्रतिशत, दूसरी बार 75 प्रतिशत व तीसरी बार 87 प्रतिशत नस्ल सुधार होती जाती है, इस तरह यह एक निरंतर प्रक्रिया है। गाय जैसे पहली बार ब्याती है तो मान लो उसे बछड़ी हुई। बछड़ी जब ग्याभिन हुई तो उसको जब टीका लगाया जाता है तो तब वह 75 प्रतिशत बढ़ेगी। आगे उसकी बछड़ी को टीका लगाया जाता है तो फिर वह 87 प्रतिशत बढ़ेगी। ये एक अच्छी प्रक्रिया है। पशुपालक को चाहिए कि वह इंतजार भी करे। जहां तक कृत्रिम गर्भाधान की बात है तो विभाग के पास उच्च क्वालिटी का सीमन है। इन दिनों एक ऐसा सीमन भी आया था जिससे 87 प्रतिशत गुंजाइश होती है कि बछड़ी ही पैदा होगी। सरसा क्षेत्र का यह रिकॉर्ड रहा है कि इस सीमन से मात्र 13 प्रतिशत ही मेल बच्चों ने जन्म लिया है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सवाल: प्राकृतिक व कृत्रिम गर्भाधान में क्या फर्क है?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जवाब: कृत्रिम गर्भाधान की शुरूआत इसलिए हुई ताकि अच्छी नस्ल के बच्चे पैदा हो सकें। कई बार मेल पशु के चोट लग जाती है तो वह क्रॉस करने की स्थिति में नहीं होता। ऐसे पशु का सीमन लेकर हम काफी मात्रा में बच्चे पैदा कर सकते हैं। लेकिन मेल पशु का अच्छा रिकॉर्ड भी होना चाहिए। पशुपालन विभाग द्वारा उच्च क्वालिटी के सीमन कम शुल्क पर मुहैया करवाए जा रहे हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>सवाल : क्या टीकाकारण से पशु की दुग्ध क्षमता व स्वास्थ्य पर कोई प्रभाव पड़ता है, क्या इससे गर्भपात का खतरा है?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जवाब: विभाग की ओर से साल में 2 बार पशुओं का मुंहखुर व गलघोटू का नि:शुल्क टीकाकरण किया जाता है। हां, ऐसा होता है कि लोग पशुओं का टीकाकरण करवाने से बचते हैं। उनका कहना होता है कि पशु के दुग्ध उत्पादन पर असर पड़ेगा व ग्याभिन पशु का गर्भपात हो जाएगा। जहां तक गर्भपात का सवाल है विभाग इस पर पहले ही सजग है। बाकायदा हिदायत भी है कि अगर कोई पशु 7 माह से ऊपर का ग्याभिन है तो उसका टीकाकरण नहीं किया जाता। वैसे भी टीकाकरण से गर्भपात की गुंजाइश बहुत कम है। लेकिन फिर भी विभाग व टीका कंपनी किसी प्रकार का रिस्क नहीं लेती। रही बात दुग्ध उत्पादन पर असर पड़ने की तो अधिकतर पशुओं में ऐसी कोई समस्या नहीं आती। कई बार टीकाकरण से पशु में बुखार आ जाता है जिसकी वजह से वह खाना-पीना कम कर देता है जिससे दुग्ध उत्पादन पर कुछ असर पड़ जाता है। ऐसी स्थिति में चिकित्सीय परामर्श लेकर पशु को बुखार व भूख बढ़ाने की दवा दें।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>लू में दुधारू पशुओं की किस तरह से देखरेख करें?</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">जवाब: इस बार लू चलने का अंदेशा है। ऐसे में पशु विशेषकर दुधारू पशु पर ध्यान देने की आवश्यकता है। पशु को छायादार व खुली हवादार जगह पर रखें। पशु को दिन में कई बार पानी पिलाएं और नहलाएं भी। हो सके तो पानी में थोड़ा नमक मिलाकर पिलाएं। गर्मी की चपेट में आने से पशु दूध की मात्रा कम कर देता है। ऐसे में उसे खनिज तत्व दें।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/wheat-dry-fodder/article-56797</link>
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                <pubDate>Fri, 26 Apr 2024 10:01:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Agriculture: आसान हुई अब कपास की खेती, ऐसे लगाएं और लाभदायक फसल पाएं</title>
                                    <description><![CDATA[Agriculture: कपास भारत की सबसे महत्वपूर्ण फाइबर और नकदी फसलों में से एक है। यह सूती कपड़ा उद्योग को प्राथमिक कच्चा माल सूती फाइबर प्रदान करता है। कपास भारत में छह मिलियन किसानों को प्रत्यक्ष आय प्रदान करता है, जबकि चालीस से पचास मिलियन लोग कपास के व्यापार और इसके प्रसंस्करण में शामिल हैं। बता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/now-cotton-cultivation-has-become-easier/article-56727"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/agriculture.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Agriculture: कपास भारत की सबसे महत्वपूर्ण फाइबर और नकदी फसलों में से एक है। यह सूती कपड़ा उद्योग को प्राथमिक कच्चा माल सूती फाइबर प्रदान करता है। कपास भारत में छह मिलियन किसानों को प्रत्यक्ष आय प्रदान करता है, जबकि चालीस से पचास मिलियन लोग कपास के व्यापार और इसके प्रसंस्करण में शामिल हैं। बता दें कि कपास का पौधा गर्म जलवायु में पनपता है। यह 60 डिग्री फारेनहाइट से कम तापमान को संभाल नहीं सकता है। यदि आप ठंडी जलवायु में रहते हैं, तो पौधे को घर के अंदर लगाना और मौसम गर्म होने पर इसे बाहर ले जाना सबसे अच्छा है। इस लेख के माध्यम से आपको बताया जा रहा है कि कपास का बीज बोते समय आपको किन कारकों का आकलन करना चाहिए।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/summer-vacation-will-start-from-this-day-in-all-schools-of-haryana/">Haryana School Holidays: हरियाणा के सभी स्कूलों में इस दिन से शुरू होगा ग्रीष्मकालीन अवकाश</a></p>
<h3 style="text-align:justify;">कैसे लगाएं कपास? Agriculture</h3>
<p style="text-align:justify;">सफल फसल सुनिश्चित करने के लिए कपास के बीज बोने के लिए सावधानीपूर्वक तैयारी और बारीकियों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। बीज बोने से पहले, सही समय चुनना, मिट्टी को ठीक से तैयार करना और सर्वोत्तम गुणवत्ता वाले कपास के बीज खरीदना महत्वपूर्ण है। यहां, हम कपास के बीज कैसे बोएं, सही मिट्टी चुनने से लेकर कटाई के समय तक फसल के रखरखाव के बारे में चरण-दर-चरण बताएंगे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">पहला चरण | Agriculture</h3>
<p style="text-align:justify;">कपास उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में सबसे अच्छी तरह उगती है। खेत में बेहतर अंकुरण के लिए तापमान कम से कम 15 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। वानस्पतिक वृद्धि के लिए सर्वोत्तम तापमान 21 से 27 डिग्री सेल्सियस के बीच है, लेकिन फसल 43 डिग्री सेल्सियस तक तापमान सहन कर सकती है।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/prepare-matka-kulfi-at-home-to-cool-your-body-in-summers/">Kulfi For Summer: गर्मी में शरीर को ठंडक पहुंचाने के लिए घऱ पर ही तैयार करें मटका कुल्फी, स्वाद भी है लाजवाब</a></p>
<p style="text-align:justify;">फल लगने की अवधि के दौरान, गर्म दिन और ठंडी रातें कपास के बीजकोष और रेशे को अच्छी तरह बढ़ने में मदद करती हैं। यह विभिन्न प्रकार की मिट्टियों में उगता है, जैसे उत्तर में अच्छी जल निकास वाली गहरी जलोढ़ मिट्टियाँ जैसे पंजाब, हरियाणा और राजस्थान, केंद्र में विभिन्न गहराई की काली चिकनी मिट्टियाँ और दक्षिण में काली और मिश्रित काली और लाल मिट्टियाँ। कपास को बहुत अधिक नमकीन या बहुत गीला होना पसंद नहीं है, और यह अच्छी जल निकासी वाली मिट्टी में सबसे अच्छा बढ़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भूमि की बनावट और उर्वरता बीज फसलों की आवश्यकता के अनुरूप होनी चाहिए। भूमि पर कोई भी खरपतवार, स्वयंसेवी पौधे या अन्य फसल वाले पौधे नहीं हो सकते। इसे सुनिश्चित करने के लिए आप उचित खरपतवार नाशकों का उपयोग कर सकते हैं। वही फसल पिछले वर्ष नहीं उगाई जा सकी थी। यदि ऐसा है, तो खेत में जल्दी पानी डालें और पिछले सीजन में अपने आप उग आए बीजों को सूखने दें। उपजाऊ मिट्टी और पानी के निकास के रास्ते वाली भूमि चुनें। कपास के पौधों को उगाने के लिए सबसे अच्छी स्थितियाँ बिना पाले के विकास की लंबी अवधि (लगभग 175 से 225 दिन) मानी गई है।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/health-insurance/">Health Insurance : हेल्थ इंश्योरेंस: मुश्किल समय का सहारा</a></p>
<p style="text-align:justify;">बीज अंकुरित होने और बीजकोष बनने के बीच कपास को कम से कम 500 मिमी पानी की आवश्यकता होती है। इसके लिए ठोस, गर्म और नम बीज क्यारियों की आवश्यकता होती है जो अच्छी तरह से तैयार की गई हों। जब आप पौधारोपण करते हैं, तो आपको मिट्टी के तापमान और अगले महीने के मौसम के पूवार्नुमान को ध्यान में रखना होगा। बीज बोने से पहले उन पर फफूंदनाशी डालने से पौध रोगों को दूर रखने में मदद मिलती है। कवकनाशी या कोई अन्य कृषि रसायन डालने से पहले, कपास की फसल की व्यापक बीमारी का निदान करना आवश्यक है। इससे आपको सही मात्रा और प्रकार के कवकनाशी डालने में मदद मिलेगी और आपके क्षेत्र में कृषि रसायनों के अधिक उपयोग को रोका जा सकेगा।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ध्यान रखने योग्य | Agriculture</h3>
<p style="text-align:justify;">कपास के बीज बोते समय इस बात का ध्यान रखें कि आप बहुत अधिक गीली, बहुत ठंडी, बहुत कठोर या बहुत अधिक रसायनों वाली मिट्टी में बहुत गहराई में न बोएं। अंकुरों और जड़ों को चोट लगने से बचाने के लिए लेबल पर बताए अनुसार शाकनाशी का उपयोग करना महत्वपूर्ण है। उर्वरकों का उपयोग इस प्रकार किया जाना चाहिए कि बीज और पौधों को नुकसान न हो।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले कि आप बाहर कपास लगाएं, आपको यह सुनिश्चित करने के लिए मिट्टी थर्मामीटर का उपयोग करना चाहिए कि मिट्टी कम से कम 60 डिग्री एफ गर्म हो। और अगले तीन दिनों तक हर सुबह इसे जांचें। एक बार जब तापमान इस सीमा में रहता है, तो आप मिट्टी का काम कर सकते हैं और लगभग एक इंच खाद डाल सकते हैं। खाद पौधों के लिए नाइट्रोजन, पोटेशियम और सूक्ष्म खनिज जैसे पोषक तत्व प्राप्त करने का एक शानदार तरीका है जिनकी उन्हें अच्छी तरह से वृद्धि करने के लिए आवश्यकता होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">कपास बोने के लिए दूरी ऐसी होनी चाहिए कि कपास के बीज एक इंच गहरे और तीन-तीन के समूह में चार इंच की दूरी पर हों। फिर मिट्टी को ढककर दबा दें। लगभग दो सप्ताह में, बीज उगने लगेंगे। आदर्श परिस्थितियों में, वे एक सप्ताह के भीतर बढ़ने लगेंगे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कपास के बीज अंकुरण के लिए बीजों का चयन</h3>
<p style="text-align:justify;">कपास के बीजों के गुण उनकी वृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समान विकास पाने के लिए आपको अच्छी गुणवत्ता वाले बीजों का उपयोग करना चाहिए। ताजे बीजों का ही प्रयोग करना चाहिए। पुराने बीजों का उपयोग न करें जिन्हें एक वर्ष से अधिक समय से संग्रहित किया गया हो क्योंकि उनके बढ़ने की संभावना कम होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बीजों की गुणवत्ता जांचने के लिए साफ किए गए बीजों को दोगुनी मात्रा में पानी में 3 घंटे के लिए भिगो दें। बीजों को छाया में तब तक सुखाएं जब तक वे पहले जैसे सूखे न हो जाएं और फिर उन्हें वापस पानी में डाल दें। मृत बीज पानी के ऊपर तैरेंगे और बह जायेंगे। सभी अच्छे बीज सींकर्स की तली में डूब जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बीज भारी होने पर कपास के अंकुरण की प्रक्रिया और पौधे की मजबूती बेहतर होगी। अच्छे, मोटे बीज अपेक्षाकृत बड़े भ्रूण के कारण होते हैं, जिसमें बहुत सारा भोजन भंडार होता है और भोजन को अच्छी तरह से इधर-उधर ले जाता है, जिससे अंकुर बड़े हो जाते हैं। Agriculture</p>
<h3 style="text-align:justify;">कपास के बीज का स्थान</h3>
<p style="text-align:justify;">कपास के बीजों को ढीली, समृद्ध मिट्टी वाली जगह पर रोपें जहाँ पौधों को हर दिन कम से कम 4 या 5 घंटे सीधी धूप मिले। इसे गमले में उगाया जा सकता है, लेकिन गमला कम से कम 36 इंच गहरा होना चाहिए। पौधे लगाने से पहले, मिट्टी में एक इंच खाद डालने से मदद मिलती है। यह आपको कपास में पोषक तत्वों की कमी को पूरा करने में मदद करेगा। जब आप बहुत जल्दी बीज बोते हैं, तो उन्हें बढ़ने में अधिक समय लगता है। कुछ देर तक तापमान 60डिग्री एफ से ऊपर रहने तक प्रतीक्षा करें। जब तापमान 60 डिग्री एफ से ऊपर हो तो कपास को बीज से फूल बनने में 65 से 75 दिन लगते हैं। फूल खिलने के बाद बीज की फली तैयार होने में 50 दिन और लगते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">जड़ वृद्धि का रखें ख्याल</h3>
<p style="text-align:justify;">कपास के पौधे की वृद्धि में जड़ वृद्धि सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, जबकि यह अंकुरित हो रहा है और अंकुर के रूप में स्थापित हो रहा है। जब बीजपत्र बाहर आते हैं, तब तक मुख्य जड़ 10 इंच तक गहरी हो सकती है और जड़ प्रणाली के बढ़ने के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण समय है। ठंडी मिट्टी, अंकुर रोग, कम मिट्टी पीएच, पानी का तनाव, हार्डपैन और शाकनाशी क्षति से जड़ों की वृद्धि और पौधों का विकास धीमा हो जाता है। हालाँकि, सावधानीपूर्वक फसल प्रबंधन से इनमें से अधिकांश तनावों को कम किया जा सकता है। पौधे की जड़ें पानी और पोषक तत्व लेती हैं जो पौधे के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। कोई भी चीज जो कपास के पौधे के जीवन के शुरूआती चरण में जड़ों को बढ़ने से रोकती है, उत्पादन के मौसम को निराशाजनक बना सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जब मिट्टी गर्म और गीली होती है तो कपास सबसे तेजी से बढ़ती है। नीचे कम तापमान और मिट्टी में पर्याप्त पानी की कमी चयापचय प्रक्रियाओं को धीमा कर सकती है और बीजों के बढ़ने को कठिन बना सकती है। भौतिक बाधाएँ, जैसे पपड़ी बनना, बीजों के अंकुरण को धीमा नहीं करती हैं, लेकिन वे हाइपोकोटिल्स को बाहर आने से रोक सकती हैं। इसके कारण हाइपोकोटिल्स मोटे हो जाते हैं और इस स्थिति को बड़ी शैंक या मोटी टांगों वाली कपास कहा जाता है, जिससे अंकुर कम मजबूत हो जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पूरी प्रक्रिया के दौरान, पौधों को बढ़ने और उत्पादन के लिए पानी की आवश्यकता होती है। जब सभी बीजकोष खुल जाएं और फूली हुई गेंदों की तरह दिखने लगें, तो कपास का पौधा तोड़ने के लिए तैयार है। ऐसा रोपण के लगभग 4 महीने बाद होता है। कपास के पौधे सूख जाएंगे और बीजकोषों के टूटने से ठीक पहले उनकी पत्तियां अपने आप गिर जाएंगी। पौधों से कपास चुनते समय सुनिश्चित करें कि आप दस्ताने पहनें ताकि आपके हाथ कटें नहीं।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 24 Apr 2024 11:50:05 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>PUSA-44 : किसान वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं</title>
                                    <description><![CDATA[गत वर्ष पंजाब सरकार ने भू-जल बचाव और पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए धान की पूसा-44 (PUSA-44) किस्म पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस साल पुन: इस बीज के बाजार में उतरने की चर्चा है। चर्चा यह है कि एक एक शैलर संगठन किसानों को इस प्रतिबंधित धान को लगाने की अपील भी कर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/pusa-44/article-56672"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/paddy-rice.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गत वर्ष पंजाब सरकार ने भू-जल बचाव और पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए धान की पूसा-44 (PUSA-44) किस्म पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस साल पुन: इस बीज के बाजार में उतरने की चर्चा है। चर्चा यह है कि एक एक शैलर संगठन किसानों को इस प्रतिबंधित धान को लगाने की अपील भी कर रहा है, हालांकि संगठन के एक वरिष्ठ नेता ने इस आरोप से इनकार किया है। दरअसल, पंजाब ने धान के लिए पानी की लागत कम करने के लिए पूसा-44 पर प्रतिबंध लगा दिया था। धान की इस किस्म की पराली भी अधिक बनती थी और फसल तैयार होने में अधिक समय लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि पीआर-126, पूसा बासमती 1509 और पूसा बासमती 1692 केवल 120 दिनों में तैयार हो जाती है। इसी तरह गेहूं की बिजाई करने के लिए किसानों को अधिक समय मिलता है। किसान खाली खेतों में गेहूं से पहले सब्जियां या कोई अन्य फसल भी लगा सकते हैं। यह जरूरी है कि किसान पर्यावरण की बेहतरी के लिए वैज्ञानिक और तार्किक निर्णय लें ताकि खेती से मुनाफा बढ़ाया जा सके और वहां वायु प्रदूषण से भी बचा जा सके। शैलर मालिकों को भी पर्यावरण के पक्ष में मुहिम शुरु करनी चाहिए। बेहतर होगा, यदि सरकार द्वारा धान की प्रमाणित किस्मों के बारे में किसानों को अधिक जानकारी देने के लिए एक प्रचार अभियान की शुरुआत हो।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 23 Apr 2024 10:06:55 +0530</pubDate>
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                <title>Dharambir Kamboj : कभी चलाते थे रिक्शा, फिर एक आइडिया से बदली जिंदगी</title>
                                    <description><![CDATA[कभी दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा चलाने वाले धर्मवीर कंबोज (Dharambir Kamboj) ने भाग्य पर भरोसा करने के बजाय कड़ी मेहनत करना जरूरी समझा और आज पूरी दुनिया उन्हें एक सफल किसान और उद्यमी के रूप में जानती है। हरियाणा के यमुनानगर के धामला गांव के रहने वाले धर्मवीर कंबोज ने सबसे पहले औषधीय खेती […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/dharambir-kamboj-farmer-entrepreneur-built-a-multipurpose-food-processing-machine/article-56550"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/dharambir-kamboj.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">
<div style="text-align:justify;">
<p>कभी दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा चलाने वाले धर्मवीर कंबोज (Dharambir Kamboj) ने भाग्य पर भरोसा करने के बजाय कड़ी मेहनत करना जरूरी समझा और आज पूरी दुनिया उन्हें एक सफल किसान और उद्यमी के रूप में जानती है। हरियाणा के यमुनानगर के धामला गांव के रहने वाले धर्मवीर कंबोज ने सबसे पहले औषधीय खेती से अपना सफर शुरू किया, जब उन्हें सफलता मिली, तो आसपास के किसान भी औषधीय खेती करने लगे। वह औषधियों से कुछ उत्पाद बनाना चाहते थे, जिसके लिए उन्होंने खुद एक प्रोसेसिंग मशीन बनाई। इस यात्रा में सेंट्रल इंस्टीट्यूट आॅफ पोस्ट-हार्वेस्ट इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, लुधियाना का भी सहयोग रहा।</p>
<p>इससे पहले 1987 तक उन्होंने दिल्ली की सड़कों पर रिक्शा चलाया। एक दुर्घटना के बाद वह वापस गांव लौट आए और खेती शुरू कर दी। दिल्ली से गांव लौटने के बाद उन्होंने खेती के बारे में जानने के लिए कई कार्यक्रमों और प्रशिक्षण केंद्रों का दौरा किया। अधिक जानकारी के लिए वह 2004 में राजस्थान भी पहुंचे, जहां उन्होंने एलोवेरा जैसी कई औषधीय फसलों की खेती के बारे में सीखा और अपने गांव लौटकर उन्होंने इन फसलों को उगाना शुरू कर दिया। इससे अच्छी आमदनी हो रही थी, लेकिन वह अब औषधियों के प्रोसेसिंग बिजनेस के बारे में सोच रहे थे। इसी बीच बैंक के एक कर्मचारी ने बताया कि इस काम के लिए कई प्रोसेसिंग मशीनों का इस्तेमाल किया जाता है, जिनके जरिए कई तरह के उत्पाद बनाए जा सकते हैं, लेकिन ये मशीनें काफी महंगी होती हैं। फिर क्या था, उन्होंने खुद की किफायती मल्टी पर्पज फूड प्रोसेसिंग मशीन बना ली। इस काम में करीब 8 महीने की कड़ी मेहनत लगी।</p>
<p>धर्मवीर कंबोज (Dharambir Kamboj) द्वारा आविष्कार की गई मशीन सिंगल फेज मोटर पर चलती है, जिसमें आंवला, एलोवेरा, जामुन और अन्य औषधियों के साथ बीज, फल और सब्जियों को प्रोसेस करके जूस और एसेंस निकाला जाता है। इस मशीन में तापमान नियंत्रित करने की भी सुविधा है। उन्होंने मशीन का आविष्कार कर अपने इनोवेशन को नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन से पेटेंट भी करा लिया। आज यह मशीन 1 घंटे में 200 किलो टमाटर की प्रोसेसिंग कर देती है। अपने प्रोसेसिंग के एग्री बिजनेस के अलावा उन्होंने हाइब्रिड टमाटर की खेती करके रिकॉर्ड प्रोडक्शन हासिल किया। प्रोसेसिंग मशीन कोई पहला आविष्कार नहीं था। इससे पहले भी फसल पर कीटनाशक का स्प्रे करने वाली बैटरी चलित स्प्रेयर मशीन बनाई थी। इसी के साथ-साथ एक ही जमीन पर धनिया, लौकी और गन्ना उगाने का भी सफल प्रयास किया। 2009 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सम्मानित किया। 2012 में तत्कालीन केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पंवार ने उन्हें किसान वैज्ञानिक पुरस्कार से सम्मानित किया। ज्यादातर लोगों का मानना है कि उच्च शिक्षा के बिना कोई भी वैज्ञानिक नहीं बन सकता, लेकिन यह पूरी तरह सच नहीं है। धर्मवीर कंबोज अपने आप में एक मिसाल हैं।</p>
</div>
</div>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
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                <pubDate>Sat, 20 Apr 2024 10:40:42 +0530</pubDate>
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