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                <title>Param Pita Ji - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>‘‘बेटा, तुम्हारी फोटो तो आगे सचखंड पहुंंच गई है’’</title>
                                    <description><![CDATA[सन् 1989 की बात है। पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने सेवादारों को पानी वाली डिग्गी में पानी निकालकर वृक्षों को देने का वचन फरमाया। उस समय कल्याणनगर और सरसा शहर की कुछ बहनें भी सेवा करने लग गई शाम की मजलिस के बाद शहनशाह जी सेवा कर रही माता-बहनों के पास आए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/miracle-of-param-pita-shah-satnam-ji-maharaj/article-87181"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-03/shah-satnam-singh-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सन् 1989 की बात है। पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने सेवादारों को पानी वाली डिग्गी में पानी निकालकर वृक्षों को देने का वचन फरमाया। उस समय कल्याणनगर और सरसा शहर की कुछ बहनें भी सेवा करने लग गई शाम की मजलिस के बाद शहनशाह जी सेवा कर रही माता-बहनों के पास आए और फरमाने लगे, ‘‘बेटा, आपने बहुत ही सेवा की है।’’ पूजनीय परम पिता जी ने उन्हें प्रसाद दिया। सेवादार बहनों ने पूजनीय परम पिता जी से अपने साथ फोटो खिंचवाने की प्रार्थना की। सभी बहनें पूजनीय परम पिता जी के पावन चरण-कमलों में बैठ गई व फोटो खिंचवाई।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ दिनों बाद पता चला कि फोटो सही नहीं खींची गई। यह सुनकर पूजनीय परम पिता जी के पास आकर बहनें रोने लगीं। तब पूजनीय परम पिता जी ने वचन फरमाया,‘‘बेटा, तुम्हारी फोटो तो आगे सचखंड पहुंंच गई है।’’ यह बात सुनकर सभी बहनें बहुत ही खुश हो गई।                                                                                      <strong>श्रीमती शांति देवी, सरसा (हरियाणा)</strong></p>
<p><span style="color:#ff0000;"><strong>यह भी पढ़ें –</strong></span> <a href="http://10.0.0.122:1245/saint-dr-msg-anmol-vachan/">जो गुरु पर संदेह करते हैं ऐसे चपटों के लिए यह खास वचन</a></p>
<h3 style="text-align:center;"><strong>‘‘बेटा, गुरू तो प्रेम का ही भूखा होता है न कि खाने-पीने का।’’</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">एक दिन सरसा शहर के एक सत्संगी ने पूजनीय परम पिता जी से अपने घर पावन चरण कमल डालने की प्रार्थना की। पूजनीय परम पिता जी ने उसकी तड़प को देखते हुए उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और अगले ही दिन उसके घर चले गए। अपने प्यारे सतगुरू को अपने घर आए देखकर उस सत्संगी की खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। वह सत्संगी इतना गरीब था कि पूजनीय परम पिता जी को खिलाने के लिए उसके घर में कुछ नहीं था। वह पूजनीय परम पिता जी के पास आकर रोने लगा और कहने लगा, ‘‘पिता जी, मेरे पास आपको खिलाने के लिए कुछ भी नहीं।’’</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर पूजनीय परम पिता जी ने वचन फरमाया, ‘‘बेटा, गुरू तो प्रेम का ही भूखा होता है न कि खाने-पीने का। तू चिंता मत कर। हमें किसी भी चीज की जरूरत नहीं है।’’ फिर पूजनीय परम पिता जी ने उसे अपने पास बिठाकर उससे खूब बातचीत की और अत्यंत खुशियां बख्शकर वहां से आश्रम के लिए रवाना हो गए। इस प्रकार उस सत्संगी की इच्छा को पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने पूरा किया।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Mar 2023 12:22:37 +0530</pubDate>
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                <title>मुर्शिद प्यारे ने प्रत्यक्ष नूरी-दीदार देकर साध-संगत को किया निहाल</title>
                                    <description><![CDATA[13 दिसंबर 1978 आश्रम की कुछ जमीन सिरसा-बेगू मुख्य सड़क पर मिल्क-प्लांट के पास भी है। यह जमीन ‘भट्ठे वाले खेत’ के नाम से जानी जाती है। उन दिनों इस खेत में नरमा चुनने की सेवा चल रही थी। पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज उस दिन सेवादारों को अपना अलौकिक प्रेम प्रदान करने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/ruhani-karishma-shah-satnam-ji-maharaj/article-34394"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-06/parm-pita-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">13 दिसंबर 1978 आश्रम की कुछ जमीन सिरसा-बेगू मुख्य सड़क पर मिल्क-प्लांट के पास भी है। यह जमीन ‘भट्ठे वाले खेत’ के नाम से जानी जाती है। उन दिनों इस खेत में नरमा चुनने की सेवा चल रही थी। पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज उस दिन सेवादारों को अपना अलौकिक प्रेम प्रदान करने के लिए अचानक उस खेत में चले गए। सभी सेवादार बहन-भाई, जो नरमा चुनने की सेवा कर रहे थे, अपने प्रीतम प्यारे के इस प्रकार दर्शन करके खुशी से झूम उठे। पूजनीय परम पिता जी सभी सेवादारों को अपना ईलाही प्रेम बख्शते हुए मोटर वाले कमरे के पास रखी हुई एक साधारण सी चारपाई पर जाकर विराजमान हो गए।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ ही समय बाद दोपहर के लंगर का समय हो गया। पूजनीय परम पिता जी ने सभी सेवादारों को वहीं अपने पास बुला लिया और लांगरी भाइयों को लंगर बांटने का हुक्म फरमाया। इधर तो लांगरी भाई लंगर खिलाने में व्यस्त हो गए और उधर रहमतों के दाता जी ने कुछ मूलियां मंगवा लीं और स्वयं अपने पवित्र कर-कमलों से काट-काटकर थाली भर ली व सभी सेवादारों में बांटने के लिए लांगरियों को दे दी।</p>
<p style="text-align:justify;">सेवादारों ने बताया कि उस दिन लंगर खाने में जो आनंद, लज्जत और सतगुरू का सच्चा प्यार प्राप्त हुआ हम उसका लिख बोलकर बयान नहीं कर सकते क्योंकि एक तरफ तो अपने मुर्शिद प्यारे के पवित्र कर-कमलों द्वारा दिया गया मूलियों का रसदायक प्रसाद और दूसरी तरफ स्वयं प्यारे सतगुरू जी के प्रत्यक्ष नूरी-दीदार और उनके हास्य-रस से भरपूर मीठे शिक्षादायक वचन थे। इस तरह सभी सेवादारों में रहमतें व अलौकिक खुशियां बांटते हुए पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज वहां से पैदल ही वापिस आश्रम में आ गए।</p>
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                <pubDate>Fri, 10 Jun 2022 21:20:46 +0530</pubDate>
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                <title>‘‘बेटा, आगे से लेट नहीं होना, हम आपका ही इंतजार कर रहे थे’’</title>
                                    <description><![CDATA[सन् 1978 की बात है। उस समय मेरी माता जी ने नाम-शब्द नहीं लिया हुआ था। एक दिन मेरी माता जी ने मुझसे पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के दर्शन करने की इच्छा व्यक्त की। उसी समय मैं अपनी माता जी के साथ पूजनीय परम पिता जी के दर्शन करने के लिए डेरा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/beta-dont-be-late-we-were-waiting-for-you/article-32157"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-04/parm-pita-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सन् 1978 की बात है। उस समय मेरी माता जी ने नाम-शब्द नहीं लिया हुआ था। एक दिन मेरी माता जी ने मुझसे पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज के दर्शन करने की इच्छा व्यक्त की। उसी समय मैं अपनी माता जी के साथ पूजनीय परम पिता जी के दर्शन करने के लिए डेरा सच्चा सौदा सरसा के लिए चल पड़ा। हम घर से ही चलते वक्त लेट हो गए। रास्ते में मैंने अपनी माता जी को कहा कि हमें आज सुबह की मजलिस में दर्शन नहीं होंगे क्योंकि हम लेट हो गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरी माता जी कहने लगीं कि यदि तुम्हारे गुरू पूर्ण हैं तो फिर हमें दर्शन हो ही जाएंगे। उस समय मैंने कहा कि इसमें हमारी ही गलती है। हम ही घर से लेट चले हैं। पूजनीय परम पिता जी तो सही समय पर मजलिस कर तेरावास में चले जाते हैं। मेरी माता जी ने कहा मैं तो तब ही मानूंगी जब आपके सतगुरू हमें जाते ही दर्शन दें। हम सुबह 11 बजे आश्रम के मुख्य द्वार पर पहुंचे। सेवादारों ने हमें बताया कि अभी पिता जी तेरावास में नहीं गए हैं। यह सुनकर हमारी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा और हम भागकर दर्शनों के लिए गए तो पूजनीय परम पिता जी ने वचन फरमाया, ‘‘बेटा, आगे से लेट नहीं होना, हम आपका ही इंतजार कर रहे थे।’’</p>
<p style="text-align:justify;">इतना कहकर पूजनीय पिता जी (Miracles of Param Pita ji) आशीर्वाद देते हुए तेरावास में चले गए। वहां पर सेवादारों ने हमें बताया कि आज पिता जी मजलिस की समाप्ति के बाद भी काफी देर तक तेरावास में नहीं गए। यह सुनकर मेरा मन भर आया और सतगुरू के प्रति मेरा विश्वास और भी दृढ़ हो गया। मेरी माता जी की भी शंका दूर हो गई और उसी मासिक सत्संग पर उन्होंने पूजनीय परम पिता जी से नाम-शब्द ले लिया।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>प्रेम सागर, मंडी डबवाली (हरियाणा)</strong></p>
<h4 style="text-align:justify;">‘‘बेटा, अगर पूरी लगन के साथ सुमिरन करो तो ऐसा भी संभव है।’’</h4>
<p style="text-align:justify;">तीन प्रेमी सरसा के पास के किसी गांव से तीन दिन से लगातार आश्रम में पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज (Miracles of Param Pita ji) के दर्शन करने के लिए आ रहे थे। एक दिन पूजनीय परम पिता जी ने उनको मजलिस में खड़ा करके कहा, ‘‘बेटा, तुम तीन दिन से हर रोेज इक्ट्ठे आते हो, आने-जाने में समय लगाते हो, घर का कोई काम नहीं कर पाते हो और किराया भी प्रतिदिन लगाते हो।</p>
<p style="text-align:justify;">तुम रोजाना न आया करो, हम घर बैठे ही तुम्हें सत्संग का फल दे देंगे।’’ इस पर वे बोले, ‘‘पिता जी हमें सत्संग का फल नहीं चाहिए। अगर आप हमें घर पर ही प्रतिदिन साक्षात् दर्शन दें तो हम यहां नहीं आएंगे।’’ पूजनीय परम पिता जी ने वचन फरमाया, ‘‘बेटा, अगर पूरी लगन के साथ सुमिरन करो तो ऐसा भी संभव है।’’ इस उदाहरण के द्वारा पूजनीय परम पिता जी ने साध-संगत को समझाया कि गुरू के दर्शनों की इतनी तड़प इन्सान को होनी चाहिए, तभी जीवात्मा की शुद्धि होती है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>श्री सुभाष चन्द्र, चंडीगढ़ (हरियाणा)</strong></p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 Apr 2022 21:49:28 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>बच्चे को बोरी में बांध रहा था बदमाश, परम पिता जी ने खुद प्रकट होकर छुड़ाया</title>
                                    <description><![CDATA[सरसा। मकान नं. 926 मोहल्ला धोबियों वाला बंद गेट सरसा शहर से बीबी ईश्वर देवी परम पूजनीय सतगुरु जी की अपार बख्शिश का एक अद्भुत करिश्मा (Ruhani Karishma) इस प्रकार वर्णन करती है : सन् 1975 की बात है। उस दिन भी दरबार में प्रतिदिन की तरह सुबह की मजलिस लगी हुई थी। उस दिन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/the-miscreant-was-tying-the-child-in-a-sack-param-pita-ji-himself-came-and-rescued-him/article-30243"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-01/parampita-ji.gif-11.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>सरसा।</strong> मकान नं. 926 मोहल्ला धोबियों वाला बंद गेट सरसा शहर से बीबी ईश्वर देवी परम पूजनीय सतगुरु जी की अपार बख्शिश का एक अद्भुत करिश्मा (Ruhani Karishma) इस प्रकार वर्णन करती है : सन् 1975 की बात है। उस दिन भी दरबार में प्रतिदिन की तरह सुबह की मजलिस लगी हुई थी। उस दिन रक्षा बन्धन के कारण काफी गिनती में संगत दरबार में आई हुई थी। मजलिस के बाद मेहरबान दातार जी ने अपने प्यारे सत्ब्रहमचारियों को तेरा वास में बुलाकर उन्हें अपने पवित्र कर-कमलों के द्वारा रखड़िया (राखियां) तथा कृपा दृष्टि का प्रसाद बख्शकर बेशुभार प्रेम प्रदान किया। कुल मालिक की मौज थी एक बहुत ही सुन्दर छोटी सी राखी सच्चे पातशाह जी ने अपने पवित्र कर-कमलों के द्वारा प्रेमी दीवान चन्द सरसा को देते हुए वचन फरमाया, भाई ! शाम होण तो पहला-पहला इह राखी प्रेमी राम चन्द्र पटवारी दे घर पहुंचा देवीं।</p>
<p style="text-align:justify;">प्यारे परम पिताजी के हुक्म द्वारा जब प्रेमी दिवान चन्द राखी लेकर हमारे घर पहुंचा तब मेरा सारा परिवार अपने परम दयालु दातार जी की पवित्र सौगात प्राप्त करके बहुत खुश हुआ। कुल मालिक की अपार रहमत को राखी रूप में प्राप्त करके मेरे परिवार को विश्वास हो गया कि हमारे घर पर आज ही लड़के का जन्म होगा और वैसा ही हुआ। वाली दो जहान शहनशाह जी ने हमारे विश्वास को बरकरार रखा। उसी दिन मेरे घर सच्चे पातशाह जी ने अत्यन्त खुशी बख्शी। हमारे यहां पौत्र पैदा हुआ। उसका नाम बेपरवाह जी ने कृष्ण रखा। कुल मालिक की उस प्यारी दात (बच्चा प्राप्त करके सारा परिवार फूले नहीं समाया बड़े यत्न तथा लाड-प्यार से कृष्ण का लालन-पा किया।</p>
<p style="text-align:justify;">करीब सात वर्ष की आयु में शहनशाह जी उसे नाम की दात प्रदान की। उन्हीं दिनों की बात है। एक दिन कृष्ण अपने मोहल्ले में अकेला ही रहा था। उस समय दिन छिप गया था तथा अंधेरा हो गया था। इस प्रकार बच्चे को देखकर किसी अज्ञात व्यक्ति ने उसे पकड़ लिया, वह आदमी शायद बच्चे उठाने वाले किसी गिरोह का ही सदस्य था। अपनी निश्चित योजना के अधीन ही कृष्ण को बोरी में बंद करके अपने निश्चित स्थान पर ले जाना चाहता था, परन्तु वह तो सर्व-सामर्थ्य सतगुरु का जीव था। उसने तुरंत अपने सतगुरु को याद किया और ‘धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ का नारा लगाया। तत्काल ही उसे शहनशाह जी के दर्शन हुए। बेपरवाह जी के हाथ में वही लाठी थी। वाली दो जहान दातार जी ने कड़कती हुई आवाज में उस आदमी को पूछा, ‘ओह बच्चे नूं कित्थे लिजा रिहा है? इह हुण साडा बच्चा है इसनूं इत्थे ही छड़ दे।’ खुद-खुदा की उस प्रभावशाली आवाज को सुनकर तथा लाठी को देखकर वह बदमाश व्यक्ति डर के मारे थर-थर कांपने लगा। उसे अपनी जान की बन गई। वह कृष्ण को वहीं पर छोड़कर ऐसे भागा कि पीछे मुंह करके देखा तक नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">उसके बाद सच्चे पातशाह जी ने कृष्ण से पूछा, ‘बेटा! तूं पटवारी दा पोता हैं?’ बच्चा भी कुछ घबरा सा गया था। उसने हां में सिर हिलाया। इस पर मेहरबान दाता जी ने कृष्ण को अपने घर जाने के लिए कहते हुए फरमाया, ‘जा बेटा ! तू आपणे घर चला जा। असी इत्ये साहमणे ही खड़े हां।’ कृष्ण उसी वक्त दौड़कर अपने घर चला गया और जाते ही उसने मुझे सब कुछ बता दिया और यह भी कहा कि परम पिताजी ने स्वयं मुझे उस बदमाश से छुड़ाया है और आपजी ही मुझे घर तक छोड़ने आए हैं। अपने नन्हें से भतीजे के मुंह से यह बात सुनते ही मैं (ईश्वर देवी) तुरन्त दौड़कर बाहर आई परन्तु तब तक तो मेहरबान सतगुरु जी वहां से अलोप हो चुके। यह बात तत्काल सारे मोहल्ले में फैल गई कि पूज्य परम पिताजी रामचन्द पटवारी के पोते कृष्ण को बदमाश से छुड़ाकर स्वयं घर छोड़कर गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">सतगुरु जी की इस रहमत को लेकर सारे परिवार तथा सारे मोहल्ले में कई दिन तक चर्चा होती रही। सभी परिवार जनों ने वाली दो जहान दयालु दाता जी का लाख-लाख शुक्राना किया कि बेपरवाह जी ने अपने मासूम बच्चे की रक्षा करके प्रेमी परिवार की लाज रखी है। कुल मालिक की रहमत के इस प्रत्यक्ष प्रमाण (Ruhani Karishma) से स्पष्ट है कि सतगुरु जी शब्द रूप में अपने हर जीव के सदा अंग-संग हैं और जहां कहीं भी उस पर कोई भीड़ बनती है तो तत्काल ही उसकी सहायता करते हैं। काल को भी अधिकार नहीं कि वह पूरे सतगुरु के जीव के तरफ आंख उठाकर देख सके, क्योंकि मेहरबान सतगुरु पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज हर समय अपने जीवों की स्वयं रक्षा करते हैं तथा हमेशा उनके अंग-संग रहते हैं।</p>
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                <pubDate>Mon, 24 Jan 2022 13:32:50 +0530</pubDate>
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