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                <title>राष्ट्रीय सुरक्षा हित सर्वोपरि रख कर चीन के साथ आगे बढ़ेंगे: जयशंकर</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। S. Jaishankar: सरकार ने भारत एवं चीन के बीच सीमावर्ती क्षेत्रों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अप्रैल 2020 के पूर्व की स्थिति बहाल होने को सुधार की दिशाह्ण बताते हुए बुधवार को स्पष्ट किया कि दोनों देशों के संबंधों में प्रगति के लिए सीमा क्षेत्रों में शांति एवं सौहार्द बनाए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/we-will-move-forward-with-china-by-keeping-national-security-interests-paramount-jaishankar/article-64998"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-12/new-delhi-4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। </strong>S. Jaishankar: सरकार ने भारत एवं चीन के बीच सीमावर्ती क्षेत्रों में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर अप्रैल 2020 के पूर्व की स्थिति बहाल होने को सुधार की दिशाह्ण बताते हुए बुधवार को स्पष्ट किया कि दोनों देशों के संबंधों में प्रगति के लिए सीमा क्षेत्रों में शांति एवं सौहार्द बनाए रखना एक पूर्व-आवश्यकता है और अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को सर्वोपरि रखते हुए ही आगे बढ़ेंगे। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आज राज्यसभा में चीन के साथ 21 अक्टूबर को हुए समझौते तथा उसके बाद भारत एवं चीन के द्विपक्षीय संबंधों में प्रगति को लेकर एक वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा, ‘मैं सदन को भारत चीन सीमा क्षेत्रों में हाल ही में घटी कुछ घटनाओं और हमारे समग्र द्विपक्षीय संबंधों पर उनके प्रभावों से अवगत कराना चाहता हूँ। सदन को पता है कि 2020 से हमारे संबंध असामान्य रहे हैं, जब चीनी कार्रवाइयों के परिणामस्वरूप सीमा क्षेत्रों में शांति और सौहार्द भंग हुआ था। हाल की घटनाएँ, जो तब से हमारे निरंतर कूटनीतिक जुड़ाव को दशार्ती हैं, ने हमारे संबंधों को कुछ सुधार की दिशा में स्थापित किया है। New Delhi</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री ने निकट भविष्य में चीन के साथ संबंधों की दिशा में अपनी अपेक्षाएँ साझा करते हुये कहा ह्ल हमारे संबंध कई क्षेत्रों में आगे बढ़े हैं, लेकिन हाल की घटनाओं से स्पष्ट रूप से नकारात्मक रूप से प्रभावित हुए हैं। हम स्पष्ट हैं कि सीमा क्षेत्रों में शांति और सौहार्द बनाए रखना हमारे संबंधों के विकास के लिए एक पूर्व-आवश्यकता है। आने वाले दिनों में, हम सीमा क्षेत्रों में अपनी गतिविधियों के प्रभावी प्रबंधन के साथ-साथ तनाव कम करने पर भी चर्चा करेंगे। विघटन चरण के समापन से अब हमें अपने राष्ट्रीय सुरक्षा हितों को सर्वोपरि रखते हुए, अपने द्विपक्षीय संबंधों के अन्य पहलुओं पर विचार करने का अवसर मिला है। विदेश मंत्री वांग यी के साथ मेरी हाल की बैठक में, हम इस बात पर सहमत हुए कि विशेष प्रतिनिधि और विदेश सचिव स्तर की व्यवस्था की बैठकें जल्द ही आयोजित की जाएंगी। मुझे विश्वास है कि इस महत्वपूर्ण संबंध की जटिलताओं के समाधान में सरकार को सदन का पूर्ण समर्थन प्राप्त होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि यह याद रखना चाहिए कि 21 अक्टूबर, 2024 का समझौता पूर्वी लद्दाख में विभिन्न टकराव बिंदुओं पर स्थिति के समाधान के संबंध में समझ की श्रृंखला में नवीनतम है। मई/जून 2020 की घटनाओं और जुलाई 2020 में गलवान घाटी में प्रारंभिक विघटन के बाद, 10 सितंबर, 2020 को मास्को में विदेश मंत्रियों की बैठक हुई। उस समय सरकार का रुख यह था कि तत्काल कार्य सभी टकराव वाले क्षेत्रों में सैनिकों की व्यापक वापसी सुनिश्चित करना था। इस बात पर भी जोर दिया गया कि एलएसी पर सैनिकों का बड़ा जमावड़ा 1993 और 1996 के समझौतों के अनुसार नहीं था। यह स्पष्ट किया गया कि भारतीय पक्ष एकतरफा रूप से यथास्थिति को बदलने के किसी भी प्रयास को बर्दाश्त नहीं करेगा। हमें यह भी उम्मीद थी कि सीमा क्षेत्रों के प्रबंधन से संबंधित सभी समझौतों और प्रोटोकॉल का ईमानदारी से पालन किया जाएगा। New Delhi</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने भारत चीन संबंधों की पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हुए कहा, ‘सदन इस तथ्य से अवगत है कि 1962 के संघर्ष और उससे पहले की घटनाओं के परिणामस्वरूप चीन ने अक्साई चिन में 38 हजार वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र पर अवैध कब्जा कर रखा है। इसके अलावा, पाकिस्तान ने 1963 में अवैध रूप से 5180 वर्ग किलोमीटर भारतीय क्षेत्र चीन को सौंप दिया, जो 1948 से उसके कब्जे में था। भारत और चीन ने सीमा मुद्दे को सुलझाने के लिए कई दशकों तक बातचीत की है। जबकि वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) है, लेकिन कुछ क्षेत्रों में इस पर आम सहमति नहीं है। जयशंकर ने कहा, ‘हम सीमा समझौते के लिए एक निष्पक्ष, उचित और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य ढांचे पर पहुंचने के लिए द्विपक्षीय चचार्ओं के माध्यम से चीन के साथ जुड़ने के लिए प्रतिबद्ध हैं। New Delhi</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि अप्रैल/मई 2020 में पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीन द्वारा बड़ी संख्या में सैनिकों को एकत्र करने के परिणामस्वरूप कई बिंदुओं पर हमारी सेनाओं के साथ आमना-सामना हुआ। इस स्थिति के कारण गश्ती गतिविधियों में भी बाधा उत्पन्न हुई। यह हमारे सशस्त्र बलों के लिए श्रेय की बात है कि रसद संबंधी चुनौतियों और उस समय व्याप्त कोविड स्थिति के बावजूद, वे तेजी से और प्रभावी ढंग से जवाबी तैनाती करने में सक्षम थे।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि सदन जून 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़पों के लिए जिम्मेदार परिस्थितियों से भली-भांति परिचित है। उसके बाद के महीनों में, हम ऐसी स्थिति से निपट रहे थे, जिसमें न केवल 45 वर्षों में पहली बार मौतें हुई थीं, बल्कि घटनाक्रम इतना गंभीर था कि एलएसी के करीब भारी हथियारों की तैनाती करनी पड़ी। जबकि सरकार की तत्काल प्रतिक्रिया पर्याप्त क्षमता की दृढ़ जवाबी तैनाती थी, इन बढ़े हुए तनावों को कम करने और शांति और सौहार्द बहाल करने के लिए कूटनीतिक प्रयास की भी आवश्यकता थी। New Delhi</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि चीन के साथ हमारे संबंधों का समकालीन चरण 1988 से शुरू होता है, जब यह स्पष्ट समझ थी कि चीन-भारत सीमा प्रश्न को शांतिपूर्ण और मैत्रीपूर्ण परामर्श के माध्यम से सुलझाया जाएगा। 1991 में, दोनों पक्ष सीमा प्रश्न के अंतिम समाधान तक एलएसी के साथ क्षेत्रों में शांति और सौहार्द बनाए रखने पर सहमत हुए। इसके बाद, 1993 में शांति और सौहार्द बनाए रखने पर एक समझौता हुआ। इसके बाद 1996 में, भारत और चीन सैन्य क्षेत्र में विश्वास निर्माण उपायों पर सहमत हुए। वर्ष 2003 में, हमने अपने संबंधों और व्यापक सहयोग के सिद्धांतों पर एक घोषणा को अंतिम रूप दिया, जिसमें विशेष प्रतिनिधियों की नियुक्ति भी शामिल थी। 2005 में, एलएसी पर विश्वास निर्माण उपायों के कार्यान्वयन के लिए तौर-तरीकों पर एक प्रोटोकॉल तैयार किया गया था। उसी समय, सीमा प्रश्न के समाधान के लिए राजनीतिक मापदंडों और मार्गदर्शक सिद्धांतों पर सहमति हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">जयशंकर ने कहा, ‘वर्ष 2012 में, परामर्श और समन्वय के लिए एक कार्य तंत्र (डब्ल्यूएमसीसी) की स्थापना की गई थी और एक साल बाद 2013 में, हम सीमा रक्षा सहयोग पर भी एक समझ पर पहुँचे। इन समझौतों को याद करने का मेरा उद्देश्य शांति एवं सौहार्द सुनिश्चित करने के हमारे साझा प्रयासों की विस्तृत प्रकृति को रेखांकित करना है और 2020 में इसके अभूतपूर्व व्यवधान ने हमारे समग्र संबंधों के लिए जो कुछ भी निहित किया है, उसकी गंभीरता पर जोर देना है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा ‘2020 में हमारी जवाबी तैनाती के बाद पैदा हुई स्थिति में कई तरह की प्रतिक्रियाओं की जरूरत थी। तात्कालिक प्राथमिकता टकराव वाले बिंदुओं से सैनिकों की वापसी सुनिश्चित करना था ताकि आगे कोई अप्रिय घटना या झड़प न हो। यह पूरी तरह से हासिल हो चुका है। अगली प्राथमिकता तनाव कम करने पर विचार करना होगी, जो एलएसी पर सैनिकों की तैनाती और उनके साथ अन्य लोगों की तैनाती को संबोधित करेगा। यह भी स्पष्ट है कि हमारे हालिया अनुभवों के मद्देनजर सीमा क्षेत्रों के प्रबंधन पर और अधिक ध्यान देने की आवश्यकता होगी। इन सबमें, हम पहले भी स्पष्ट थे और अब भी हैं कि तीन प्रमुख सिद्धांतों का सभी परिस्थितियों में पालन किया जाना चाहिए: (1) दोनों पक्षों को एलएसी का कड़ाई से सम्मान और पालन करना चाहिए, (2) किसी भी पक्ष को यथास्थिति को एकतरफा बदलने का प्रयास नहीं करना चाहिए, और (3) अतीत में हुए समझौतों और सहमतियों का पूरी तरह से पालन किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि सीमावर्ती क्षेत्रों में निरंतर तनाव और विशिष्ट घटनाक्रमों के परिणामस्वरूप, चीन के साथ हमारे समग्र संबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ना तय था। नई परिस्थितियों में, अतीत की तरह सामान्य आदान-प्रदान, बातचीत और गतिविधियों को जारी रखना स्पष्ट रूप से संभव नहीं था। इस संबंध में, हमने स्पष्ट किया कि हमारे संबंधों का विकास आपसी संवेदनशीलता, आपसी सम्मान और आपसी हितों के सिद्धांतों पर निर्भर था। सरकार का मानना ​​है कि सीमावर्ती क्षेत्रों में शांति और सौहार्द के अभाव में भारत-चीन संबंध सामान्य नहीं हो सकते। सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थिति पर दृढ़ और सैद्धांतिक रुख के साथ-साथ हमारे संबंधों की समग्रता के प्रति हमारा स्पष्ट दृष्टिकोण पिछले चार वर्षों से चीन के साथ हमारे संबंधों का आधार रहा है। हम इस बात को लेकर बहुत स्पष्ट रहे हैं कि शांति और सौहार्द की बहाली ही बाकी संबंधों को आगे बढ़ाने का आधार होगी। New Delhi</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘इसलिए 2020 से हमारा जुड़ाव इसी उद्देश्य पर केंद्रित रहा है। यह विभिन्न स्तरों पर हुआ, जिसमें सरकार के विभिन्न अंग शामिल थे। मैंने खुद अपने चीनी समकक्ष के साथ बैठकें की हैं, जैसा कि मेरे वरिष्ठ सहयोगी रक्षा मंत्री जी ने भी किया है। हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) ने भी अपने चीनी समकक्ष के साथ बातचीत की है, दोनों ही सीमा मुद्दे पर विशेष प्रतिनिधि हैं। सहयोग और समन्वय के लिए कार्य तंत्र (डब्ल्यूएमसीसी) द्वारा राजनयिक स्तर पर अधिक विस्तृत चर्चा की गई। इसका सैन्य समकक्ष वरिष्ठ सर्वोच्च सैन्य कमांडरों की बैठक (एसएचएमसी) तंत्र था। बातचीत स्वाभाविक रूप से राजनयिक और सैन्य अधिकारियों दोनों की वार्ता में संयुक्त उपस्थिति के साथ बहुत कसकर समन्वित थी। जून 2020 से, डब्ल्यूएमसीसी की 17 बैठकें और एसएचएमसी के 21 दौर हो चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंंत्री ने कहा, ‘इस पृष्ठभूमि में, मैं आज सदन को देपसांग और डेमचोक के संबंध में 21 अक्टूबर, 2024 को हुए समझौते के बारे में सूचित करना चाहूंगा। अस्थिर स्थानीय स्थिति और प्रभावित द्विपक्षीय संबंध के दोहरे विचार स्पष्ट रूप से इन हालिया प्रयासों के पीछे प्रेरक थे। ये दोनों क्षेत्र सितंबर 2022 से चीनी पक्ष के साथ डब्ल्यूएमसीसी और एसएचएमसी दोनों में हमारी चचार्ओं का केंद्र रहे हैं, जब हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र में अंतिम विघटन समझौता संपन्न हुआ था। 21 अक्टूबर को हुए समझौते से पहले, मैंने 4 जुलाई को अस्ताना में और 25 जुलाई को वियनतियाने में अपने चीनी समकक्ष के साथ विशिष्ट विघटन मुद्दे के साथ-साथ व्यापक संबंधों पर भी चर्चा की थी। हमारे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और उनके चीनी समकक्ष ने 12 सितंबर को सेंट पीटर्सबर्ग में भी मुलाकात की। इन दोनों क्षेत्रों में समस्या मुख्य रूप से हमारी लंबे समय से चली आ रही गश्त गतिविधि में बाधा डालने से संबंधित थी। डेमचोक में, हमारी खानाबदोश आबादी द्वारा पारंपरिक चरागाहों के साथ-साथ स्थानीय लोगों के लिए महत्वपूर्ण स्थलों तक पहुँच का सवाल भी था।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि गहन वार्ता के बाद हाल ही में बनी इस सहमति के परिणामस्वरूप, पारंपरिक क्षेत्रों में गश्त फिर से शुरू की जा रही है। शुरूआत में जमीन पर सैनिकों की वापसी के सत्यापन के लिए गश्ती दल भेजकर इसका परीक्षण किया गया और सहमति के अनुसार नियमित गतिविधियों का पालन किया जा रहा है। 21 अक्टूबर को हुई सहमति के बाद प्रधानमंत्री और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने 23 अक्टूबर को कजान में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान एक बैठक की। उन्होंने इस सहमति का स्वागत किया और विदेश मंत्रियों को बैठक कर संबंधों को स्थिर और पुनर्निर्माण करने का निर्देश दिया। विशेष प्रतिनिधियों को सीमा प्रश्न का निष्पक्ष, उचित और पारस्परिक रूप से स्वीकार्य समाधान तलाशने के अलावा शांति और सौहार्द के प्रबंधन की देखरेख भी करनी है। New Delhi</p>
<p style="text-align:justify;">श्री जयशंकर ने कहा, ह्लइसके अनुसरण में, मैंने हाल ही में 18 नवंबर, 2024 को रियो डी जेनेरियो में जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ फिर से चर्चा की। रक्षा मंत्री ने 20 नवंबर, 2024 को वियनतियाने में आसियान रक्षा मंत्रियों (एडीएमएम+) की बैठक में चीनी रक्षा मंत्री डोंग जून से भी मुलाकात की। दोनों मंत्रियों ने हाल ही में हुए सैन्य वापसी समझौते की प्रगति, तनाव कम करने की आवश्यकता और विश्वास निर्माण उपायों को मजबूत करने की आवश्यकता पर चर्चा की। वे विभिन्न स्तरों पर बैठकें और परामर्श जारी रखने के महत्व पर सहमत हुए।ह्व</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि पूर्वी लद्दाख में चरणबद्ध तरीके से सेना को पूरी तरह से पीछे हटा लिया गया है, जिसकी परिणति देपसांग और डेमचोक में हुई है। पीछे हटने का काम पूरा हो जाने के बाद, अब हमारी उम्मीद है कि एजेंडे में रखे गए शेष मुद्दों पर भी चर्चा शुरू हो जाएगी। मैं इस मुद्दे पर संसद में सरकार द्वारा व्यक्त की गई पिछली स्थिति की ओर भी सदन का ध्यान आकर्षित करना चाहूंगा। 15 सितंबर, 2020 को रक्षा मंत्री जी ने एलएसी का उल्लंघन करने की चीनी कोशिशों और हमारे सशस्त्र बलों द्वारा दिए गए उचित जवाब पर एक विस्तृत बयान दिया था। 11 फरवरी, 2021 को रक्षा मंत्री जी ने फिर से सदन को पैंगोंग झील के उत्तरी और दक्षिणी किनारों पर हमारे ‘डिसइंगेजमेंट’ समझौते के बारे में जानकारी दी थी। इसके बाद, अगस्त 2021 में, गोगरा के क्षेत्र में सैनिकों की वापसी का तीसरा चरण हुआ, जिसके तहत अब सैनिक अपने-अपने ठिकानों पर रहेंगे। अगला चरण सितंबर 2022 में हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र से संबंधित हुआ। फिर से, अग्रिम तैनाती चरणबद्ध, समन्वित और सत्यापित तरीके से समाप्त हो गई, जिसके परिणामस्वरूप सैनिक अपने-अपने क्षेत्रों में लौट आए। सबसे हालिया 21 अक्टूबर, 2024 का समझौता पहले के समझौतों के बाद हुआ है। यह सितंबर 2020 में मास्को में हमारे बीच हुई सहमति का पहला चरण पूरा करता है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री ने कहा कि सर्वविदित है कि भारत-चीन सीमा के कई क्षेत्रों में टकराव, अतिक्रमण और टकराव का लंबा इतिहास रहा है। यह 1954 से बाराहोती, 1959 में लोंगजू, 1986-1995 तक सुमदोरोंग चू और 2013 में देपसांग में हुआ। अतीत में, पिछली सरकारों ने अलग-अलग समय पर पैदा हुई स्थितियों को शांत करने के लिए कई तरह के कदमों पर सहमति जताई है, जिसमें हमारी ओर से असैन्यीकृत क्षेत्र बनाने, सीमित गैर-गश्ती क्षेत्र बनाने, चौकियों को स्थानांतरित करने या वापस बुलाने, सैनिकों को वापस बुलाने और संरचनाओं को हटाने के प्रस्ताव शामिल हैं। अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग समाधानों की जांच की गई है। जहां तक ​​21 अक्टूबर की सहमति का सवाल है, हमारा उद्देश्य पिछले समय की तरह संबंधित गश्त बिंदुओं पर गश्त सुनिश्चित करना है, साथ ही लंबे समय से चली आ रही प्रथा के अनुसार हमारे नागरिकों द्वारा चराई फिर से शुरू करना है। वास्तव में देपसांग और डेमचोक के संबंध में हम इसी पर सहमत हुए हैं। कुछ अन्य स्थानों पर जहां 2020 में टकराव हुआ था, वहां स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर अस्थायी और सीमित प्रकृति के कदम उठाए गए थे, ताकि आगे टकराव की संभावना को कम किया जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, ‘मैं इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि यह दोनों पक्षों पर लागू होता है और स्थिति की मांग के अनुसार इस पर फिर से विचार किया जा सकता है। इस लिहाज से हमारा रुख दृढ़ और दृढ़ रहा है और यह हमारे राष्ट्रीय हित को पूरी तरह से पूरा करता है। इस तरह से हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना सरकार के कई हिस्सों के संचयी और समन्वित प्रयासों का परिणाम है, जो स्पष्ट रूप से हमारे रक्षा और सुरक्षा बलों पर केंद्रित है। इस अवधि में हमारी सेवाओं की क्षमता और व्यावसायिकता हमारी त्वरित और प्रभावी जवाबी तैनाती में प्रदर्शित हुई। चीन के साथ बातचीत में, रक्षा और कूटनीतिक शाखाओं ने यह सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम किया कि हमारे राष्ट्रीय हितों को व्यापक रूप से पूरा किया जाए।ह्व</p>
<p style="text-align:justify;">जयशंकर ने कहा कि इस संदर्भ में, सीमा पर बुनियादी ढांचे में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, जिसके कारण ऐसी प्रभावी जवाबी तैनाती संभव हो पाई है। यह पिछले दशक में सीमा पर बुनियादी ढांचे के आवंटन में वृद्धि के साथ-साथ अन्य बातों के अलावा भी परिलक्षित होता है। अकेले सीमा सड़क संगठन (बीआरओ) ने एक दशक पहले की तुलना में तीन गुना अधिक व्यय किया है। चाहे सड़क नेटवर्क की लंबाई हो, पुलों की हो या सुरंगों की संख्या हो, पहले की अवधि की तुलना में इसमें पर्याप्त वृद्धि हुई है। हाल के वर्षों में उल्लेखनीय उपलब्धियों में लाहुल स्पीति तक अटल सुरंग, तवांग तक सेला और नेचिपु सुरंग, दक्षिणी लद्दाख में उमलिंगला दर्रा सड़क और जोजिला अक्ष का विस्तारित उद्घाटन शामिल है। लद्दाख में कुछ रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सड़कों और हवाई क्षेत्रों पर काम प्रगति पर है। उच्च ऊंचाई, दूरदराज, दुर्गम और हमेशा बर्फ से ढके रहने वाले क्षेत्रों में नई तकनीकों को अपनाना भी महत्वपूर्ण रहा है। यह सब हमारी सीमाओं की रक्षा करने और यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार की दृढ़ प्रतिबद्धता को दशार्ता है कि हमारे सशस्त्र बलों को वे सुविधाएँ और रसद सहायता मिले जिसके वे हकदार हैं। New Delhi</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="अपहरण कर ले गए घर, बांधकर बुरी तरह से की पिटाई" href="http://10.0.0.122:1245/kidnapped-taken-home-and-beaten-badly-three-people-including-two-women-have-been-named/">अपहरण कर ले गए घर, बांधकर बुरी तरह से की पिटाई</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Wed, 04 Dec 2024 15:47:09 +0530</pubDate>
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                <title>जयशंकर की मेलानी जोली के साथ बैठक</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कनाडा की विदेश मंत्री मेलानी जोली के साथ शनिवार को यहां एक बैठक में व्यापार, संपर्क और परस्पर संबंधों सहित विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की। डॉ जयशंकर ने अपने ट्वीट में कहा, ‘कनाडा की विदेश मंत्री मेलानी जोली के साथ व्यापक बातचीत। जी20 एजेंडे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/jaishankars-meeting-with-melanie-jolie/article-44131"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-03/minister-s-jaishankar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कनाडा की विदेश मंत्री मेलानी जोली के साथ शनिवार को यहां एक बैठक में व्यापार, संपर्क और परस्पर संबंधों सहित विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा की। डॉ जयशंकर ने अपने ट्वीट में कहा, ‘कनाडा की विदेश मंत्री मेलानी जोली के साथ व्यापक बातचीत। जी20 एजेंडे और वैश्विक विकास पर चर्चा की। द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत में व्यापार, कनेक्टिविटी और लोगों से लोगों के बीच संबंध शामिल रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले सुश्री जोली ने रायसीना डायलॉग को संबोधित करते हुए कहा, ‘कनाडा अपनी हिंद-प्रशांत रणनीति के माध्यम से भारत में विस्तारित और गहन जुड़ाव को विस्तार देगा। दोनों देशों के बीच संबंधों को गहरा करने के लिए उठाये जाने वाले सार्थक कदम पर ध्यान देने के साथ हम अपनी उपस्थिति बढ़ाने और अपने काम को आगे बढ़ाने के लिए तैयार हैं।ह्व<br />
इंडो कैनेडियन बिजनेस चैंबर को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, ‘कनाडा-भारत संबंधों को मजबूत करने में निहित आर्थिक क्षमता को कम करके नहीं आंका जा सकता है। हमारी सरकारों, हमारे लोगों, व्यवसायिक भागीदारों के बीच एकजुटता आवश्यक है।</p>
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                <pubDate>Sat, 04 Mar 2023 12:49:04 +0530</pubDate>
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                <title>पाकिस्तान से पहले आतंकवाद की समस्या का समाधान चाहिए: जयशंकर</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आर्थिक संकट से जुझ रहे पड़ोसी देश पाकिस्तान की मदद करने से इनकार करते हुए कहा कि इस्लामाबाद को पहले आतंकवाद के मुद्दे का समाधन करना चाहिए। पुणे में विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित वार्षिक एशिया आर्थिक संवाद में जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/pakistan-should-solve-the-problem-of-terrorism-before-jaishankar/article-43822"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-02/minister-s-jaishankar2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> विदेश मंत्री एस जयशंकर ने आर्थिक संकट से जुझ रहे पड़ोसी देश पाकिस्तान की मदद करने से इनकार करते हुए कहा कि इस्लामाबाद को पहले आतंकवाद के मुद्दे का समाधन करना चाहिए। पुणे में विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित वार्षिक एशिया आर्थिक संवाद में जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि पाकिस्तान से उत्पन्न होने वाला आतंकवाद एक मूलभूत मुद्दा है जिसकी भारत अनदेखी नहीं कर सकता और न ही करना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर मुझे कोई बड़ा फैसला लेना है, तो मैं यह भी देखूंगा कि जनता की भावना क्या है। मैं सबसे पहले नब्ज टटोलूंगा कि मेरे लोग इसके बारे में क्या महसूस करते हैं और मुझे लगता है कि आपको इसका जवाब पता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि कोई भी देश कभी भी मुश्किल स्थिति से बाहर नहीं निकल सकता और एक समृद्ध शक्ति नहीं बन सकता, अगर उसका मूल उद्योग आतंकवाद है। उन्होंने सुझाव दिया कि आतंकवादी समूहों को पड़ोसी देश का समर्थन ही उसकी आर्थिक समृद्धि के लिए बड़ी बाधा है। उन्होंने कहा कि जब कोई देश किसी गंभीर आर्थिक समस्या में फंसता है तो उस देश को खुद को इससे बाहर निकालने के लिए नीतिगत विकल्प और शासन के फैसले लेने पड़ते हैं। उन्होंने कहा कि अन्य देश समस्या का समाधान नहीं कर सकते हैं यदि वह देश स्वयं इसका समाधान करने के लिए तैयार नहीं है और दुनिया क्या कर सकती है कि वह विकल्प और समर्थन दे सकती है।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Feb 2023 10:28:54 +0530</pubDate>
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                <title>खाद्य सुरक्षा आज की सबसे बड़ी चुनौती:  जयशंकर</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। विदेश मंत्री डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने कहा है कि मौजूदा समय में विश्व की सबसे बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा होने वाली है और इससे निपटने के लिए सभी देशों को मिलकर काम करना होगा। डॉ. जयशंकर ने श्रीनगर स्थित शेरे कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय द्वारा अंतरराष्ट्रीय छात्रों के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/food-security-biggest-challenge-today-jaishankar/article-43739"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-02/minister-s-jaishankar1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> विदेश मंत्री डॉ. सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने कहा है कि मौजूदा समय में विश्व की सबसे बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा होने वाली है और इससे निपटने के लिए सभी देशों को मिलकर काम करना होगा। डॉ. जयशंकर ने श्रीनगर स्थित शेरे कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय द्वारा अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए प्रवेश खोले जाने के मौके पर राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा मेला कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए यह बात कही।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मोटे अनाज का अंतरराष्ट्रीय वर्ष मनाने का जो फैसला</h3>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री ने कहा, “मुझे अगर मौजूदा समय की कुछ बड़ी समस्या को चुनना हो तो उनमें अहम है खाद्य सुरक्षा का मामला। यूक्रेन युद्ध ने इस समस्या को और गहरा कर हमारे सामने खड़ा कर दिया है।” उन्होंने कहा कि भारत की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को मोटे अनाज का अंतरराष्ट्रीय वर्ष मनाने का जो फैसला किया है वो बहुत अहम है। इसके परिणाम केवल भारत ही नहीं पूरी दुनिया के लिए हैं। इस साल जी-20 शिखर सम्मेलन से भी हम इस सन्देश को देना चाहते हैं कि खाद्य सुरक्षा के लिए यह जरूरी है कि सभी देश मिलकर प्रयास करें। क्योंकि सदियों से हम मोटे अनाज का उत्पादन करते आए हैं। इसके लिए नए सिरे से प्रयास करने की जरूरत है।</p>
<p style="text-align:justify;">कार्यक्रम में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद के अध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे भी शामिल हुए। डॉ. जयशंकर ने अंतर्राष्ट्रीय शिक्षा मेला पहल के लिए विश्वविद्यालय की सराहना करते हुए कहा कि तीन साल पहले, जम्मू-कश्मीर में परिवर्तन की प्रक्रिया शुरू हुई थी, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि विकास और प्रगति का पूरा लाभ जो शेष भारत ने कई वर्षों तक देखा था, वह जम्मू और कश्मीर के लोगों के लिए अब पूरी तरह से उपलब्ध है, खासकर युवाओं के लिए। इस लिहाज से जम्मू-कश्मीर के लोगों का राष्ट्रीय मुख्यधारा में होना बेहद महत्वपूर्ण था। ऐसा करने से, वे शेष भारत और अंतरराष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ेंगे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में विकास की एक नई सुबह देख रहा कश्मीर</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, “मेरे लिए यह केवल एक शिक्षा कार्यक्रम नहीं है, यह सुनिश्चित करने का एक बहुत ही अभिन्न अंग है कि भारत का एक बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्र दुनिया में जो कुछ हो रहा है, उससे जुड़ा है।” डॉ. जयशंकर ने कहा कि भारतीय विश्वविद्यालयों को अपने परिसरों में अधिक विदेशी छात्रों को आमंत्रित करने पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा,”आज, भारत के पास दुनिया के 78 देशों में परियोजनाएं हैं जो या पूरी हो चुकी हैं या पूरी होने वाली हैं। इसलिए यदि हमारे संबंध इतने व्यापक हैं, निवेश इतने गहरे हैं और नेटवर्किंग इतनी अच्छी है, तो हमें यह देखने की जरूरत है कि भारत में अंतरराष्ट्रीय छात्रों का प्रवाह बड़ा हो।”</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री ने कहा, “एक वैश्वीकृत दुनिया में, यह नितांत आवश्यक है कि भारत के युवा दुनिया में क्या हो रहा है, इसके बारे में पूरी तरह से जागरूक हों और ऐसा करने का इससे बेहतर तरीका कोई नहीं है कि आपके बीच अंतरराष्ट्रीय छात्र हों।” केंद्रीय शिक्षा मंत्री प्रधान ने जम्मू-कश्मीर सरकार को देश के उच्च शिक्षा परिदृश्य की ताकत और जीवंतता के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर की ज्ञान विरासत को प्रदर्शित करने के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा, ‘जम्मू-कश्मीर प्रधानमंत्री मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में विकास की एक नई सुबह देख रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति के लागू होने से हम अपने शिक्षा क्षेत्र का अंतरराष्ट्रीयकरण कर रहे हैं। शिक्षा मंत्रालय शेरे कश्मीर कृषि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय-कश्मीर के वैश्वीकरण का समर्थन, प्रोत्साहन और सुविधा प्रदान करेगा।” उन्होंने सभी विश्वविद्यालयों को भारत को वैश्विक अध्ययन गंतव्य के रूप में स्थापित करने के प्रयासों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया।</p>
<h3 style="text-align:justify;">भारत में कृषि स्टार्टअप आंदोलन</h3>
<p style="text-align:justify;">केंद्रीय राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा लाई गई राष्ट्रीय शिक्षा नीति क्षमता निर्माण में योग्यता, कौशल और फ्लेक्सी विकल्पों द्वारा संचालित कैरियर और स्टार्ट-अप के अवसरों को खोलने का वादा करती है। उन्होंने कहा, ह्लजम्मू कश्मीर में कृषि के नए रास्ते, अरोमा मिशन और पर्पल रेवोल्यूशन की एक समृद्ध विरासत है, जो इसे भारत में कृषि स्टार्टअप आंदोलन का पथप्रदर्शक होने की क्षमता प्रदान करती है।”</p>
<p style="text-align:justify;">जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने जम्मू-कश्मीर के विकास में तेजी लाने और इसे छात्रों, यात्रियों और उद्यमियों के लिए एक पसंदीदा गंतव्य में बदलने के लिए प्रधानमंत्री मोदी का आभार व्यक्त किया। उपराज्यपाल ने कहा कि इस पहल के साथ जम्मू-कश्मीर ने विदेशी छात्रों के लिए एक समर्पित कार्यक्रम शुरू किया है। हमारा उद्देश्य विभिन्न विषयों में अल्पकालिक और दीर्घकालिक पाठ्यक्रमों के लिए जम्मू-कश्मीर में अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को आमंत्रित करना और अंतर्राष्ट्रीय संपर्क को मजबूत करना है। पिछले तीन वर्षों में, हमने शिक्षा क्षेत्र को मजबूत करने, उद्योगों, कृषि और स्वास्थ्य देखभाल जैसे क्षेत्रों के लिए ज्ञान श्रमिकों को विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">उपराज्यपाल ने कहा कि नवाचार और विकास की प्रक्रिया के लिए ज्ञान लाभांश को धन में बदलने के लिए गंभीर प्रयास किए गए हैं। इस दिशा में इस विश्वविद्यालय की पहल देश के अन्य विश्वविद्यालयों के लिए भी एक उदाहरण स्थापित करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा, “प्रकृति के स्वर्ग में बसे परिसरों के अलावा, पेशेवर संकाय, उच्च जीवन स्तर, जम्मू-कश्मीर भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स से लेकर कृषि विज्ञान, योग, संस्कृत और अनुसंधान और नवाचार के लिए उद्योगों के साथ इंटरफेस से शुरू होने वाले विभिन्न पाठ्यक्रमों की पेशकश कर रहा है।”</p>
<p style="text-align:justify;">उपराज्यपाल ने कहा कि 150 से अधिक उच्च शिक्षा संस्थानों, दो केंद्रीय विश्वविद्यालयों, सात राज्य विश्वविद्यालयों, दो एम्स, आईआईएम, आईआईटी, एनआईटी, एनआईएफटी, आईआईएमसी और दो कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालयों के साथ जम्मू कश्मीर भारत में छात्रों के लिए एक पसंदीदा स्थान के रूप में उभरा है।<br />
उन्होंने यह भी कहा कि जीवन के सद्गुणों के प्रति आमूल-चूल परिवर्तन, जिसे मानवता देख रही है, देशों के बीच आदान-प्रदान कार्यक्रमों द्वारा जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने और एक-दूसरे से सीखने और एक-दूसरे को हमारी यात्रा में अधिक से अधिक ऊंचाइयों को प्राप्त करने में सक्षम बनाने का एक अवसर है। आज पूरी दुनिया भारत को प्रशंसा और आशा के साथ देख रही है ।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Feb 2023 10:14:09 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>हिंद-प्रशांत क्षेत्र में फिजी के साथ महत्वपूर्ण भागीदारी का नजरिया : जयशंकर</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने गुरुवार को कहा कि फिजी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में फिजी के साथ महत्वपूर्ण भागीदारी का नजरिया है। डॉ जयशंकर ने आज फिजी के प्रधानमंत्री सितवेनी राबुका के साथ द्विपक्षीय बैठक की। बैठक में दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सहयोग को तेज करने के तरीकों पर चर्चा की। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/vision-of-important-partnership-with-fiji-in-indo-pacific-region-jaishankar/article-43568"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-02/minister-s-jaishankar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> विदेश मंत्री एस जयशंकर ने गुरुवार को कहा कि फिजी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में फिजी के साथ महत्वपूर्ण भागीदारी का नजरिया है। डॉ जयशंकर ने आज फिजी के प्रधानमंत्री सितवेनी राबुका के साथ द्विपक्षीय बैठक की। बैठक में दोनों नेताओं ने द्विपक्षीय सहयोग को तेज करने के तरीकों पर चर्चा की। श्री राबुका के पास विदेश मंत्रालय भी है। भारतीय विदेश मंत्री इन दिनों फिजी की यात्रा पर हैं। डॉ जयशंकर ने अपने ट्वीट में कहा, ‘सुवा में फिजी के प्रधानमंत्री के साथ बैठक में विस्तार से चर्चा हुई। भारत प्राथमिकता के क्षेत्रों के मुताबिक अपनी साझेदारी को उन्नत करने के लिए प्रतिबद्ध है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने आगे कहा, ‘गिरमिटियों का योगदान भारत-फिजी संबंधों को मजबूत करने की दिशा में काम करने के लिए प्रेरणादायक है। फिजी-भारतीय अनुभव की कहानी की व्याख्या हमारे लोगों के प्रयास से झलकती है, जिन्होंने घर से दूर रहकर अपने जीवन के तरीको को अपनाया है। उनके योगदान को हमेशा महत्व दिया जाएगा और भारत-फिजी के बीच मजबूत संबंधों की दिशा में काम करने के लिए प्रेरणा के रूप में देखा जाएगा। बाद में उन्होंने फिजी संग्रहालय का दौरा किया और वहां भारत द्वारा समर्थित गिरमिट गैलरी का उद्घाटन किया।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 16 Feb 2023 18:25:52 +0530</pubDate>
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                <title>जयशंकर रूस की दो दिवसीय यात्रा पर</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। विदेश मंत्री एस. जयशंकर सोमवार से रूस की दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर जा रहे हैं। डॉ. जयशंकर अपनी यात्रा के दौरान रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात करेंगे और उनके साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चाओं की कड़ी के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विकास के मुद्दों पर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/jaishankar-on-a-two-day-visit-to-russia/article-39646"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-11/minister-s-jaishankar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> विदेश मंत्री एस. जयशंकर सोमवार से रूस की दो दिवसीय आधिकारिक यात्रा पर जा रहे हैं। डॉ. जयशंकर अपनी यात्रा के दौरान रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव से मुलाकात करेंगे और उनके साथ द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चाओं की कड़ी के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विकास के मुद्दों पर बात होने की उम्मीद है।<br />
विदेश मंत्रालय ने कहा डॉ. जयशंकर रूसी संघ के उप प्रधानमंत्री और व्यापार एवं उद्योग मंत्री डेनिस मंटुरोव, व्यापार, आर्थिक, वैज्ञानिक, तकनीकी और सांस्कृतिक सहयोग पर भारत-रूस अंतर-सरकारी आयोग (आईआरआईजीसी-टीईसी) के लिए उनके समकक्ष से भी मुलाकात करेंगे। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने कहा कि बैठकों के दौरान विभिन्न क्षेत्रों में द्विपक्षीय आर्थिक सहयोग से संबंधित मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। डॉ. जयशंकर की यह यात्रा दोनों पक्षों के बीच नियमित उच्च स्तरीय वार्ता के क्रम में है। इससे पहले डॉ. जयशंकर ने जुलाई 2021 में रूस का दौरा किया था और उसके बाद इस वर्ष अप्रैल में रूसी विदेश मंत्री लावरोव की भारत की यात्रा पर आये थे।</p>
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                <pubDate>Mon, 07 Nov 2022 11:47:47 +0530</pubDate>
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                <title>रोमानिया से 219 भारतीयों की वापसी यात्रा, जयशंकर खुद रख रहे हैं निगाह</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। विदेश मंत्री एस जयशंकर (Jaishankar) ने शनिवार को कहा कि वह यूक्रेन में फंसे भारतीय नागरिकों को वापस लाने के अभियान की स्वयं निगरानी कर रहे हैं और 219 भारतीयों को लेकर पहली उड़ान रोमानिया से भारत के लिए प्रस्थान कर चुकी है। जयशंकर (Jaishankar) ने कहा कि विदेश मंत्रालय को भारतीय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/jaishankar-is-keeping-an-eye-on-the-return-journey-of-219-indians-from-romania/article-31136"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-02/minister-s-jaishankar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> विदेश मंत्री एस जयशंकर (Jaishankar) ने शनिवार को कहा कि वह यूक्रेन में फंसे भारतीय नागरिकों को वापस लाने के अभियान की स्वयं निगरानी कर रहे हैं और 219 भारतीयों को लेकर पहली उड़ान रोमानिया से भारत के लिए प्रस्थान कर चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">जयशंकर (Jaishankar) ने कहा कि विदेश मंत्रालय को भारतीय नागरिकों को यूक्रेन से निकालने के प्रयास में कामयाबी मिल रही है। इनमें अधिकतर छात्र-छात्राएं हैं। विदेश मंत्री जयशंकर ने ट्विटर पर कहा, ‘यूक्रेन से भारतीय नागरिकों को निकालने के काम प्रगति पर है। हमारी टीमें वहां दिन रात काम में लगी हैं। मैं स्वयं निगरानी कर रहा हूं।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री ने इस काम में सहयोग के लिए रोमानिया के विदेश मंत्री बोगडान ओरेस्कु को धन्यवाद दिया है। उन्होंने ट्विटर पर लिखा, ‘विदेश मंत्री बोगडान ओरेस्कु को उनकी सरकार से मिले सहयोग के लिए हृदय की गहराइयों से धन्यवाद। रोमानिया के विदेश मंत्री ने जयशंकर के ट्विटर संदेश के जवाब में ट्वीट किया, ह्लमित्र और भागीदार तो इसीलिए होते हैं। रोमानिया-भारत मित्रता।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्या है मामला</h4>
<p style="text-align:justify;">शुक्रवार को भारतीय छात्रों का पहला दल यूक्रेन की सीमा से निकलकर रोमानिया पहुंचा था, इस बीच वहां फंसे भारतीयों की ओर से मदद के लिए सोशल मीडिया पर अपील का तांता लगा हुआ। दिल्ली में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो डाला जिसमें यूक्रेन से रोमानिया पहुंचे भारतीय नागरिकों के पहले दस्ते को दशार्या गया है। ये नागरिक सुसेआवा की सीमा चौकी से रोमानिया में प्रवेश किए थे। सीमा से उन्हें बुखारेस्ट पहुंचाने में विदेश मंत्रालय के अधिकारी उनकी मदद कर रहे हैं। जहां से उन्हें भारत भेजा जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">यूक्रेन की राजधानी कीव में भारतीय दूतावास ने इस बीच कहा है कि 470 भारतीय नागरिकों ने पोरुबने-सिरेत सीमा से रोमानिया में प्रवेश किया है। उनमें ज्यादातर छात्र-छात्राएं हैं। इस बीच सोशल मीडिया पर मदद की कुछ अपीलों का विदेश राज्य मंत्री वी. मुरलीधरन ने ट्विटर पर जवाब दिया उन्होंने कहा कि सरकार विद्यार्थियों को यूक्रेन से निकालने में मदद के लिए हर संभव विकल्पों पर ध्यान दे रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले भारतीय दूतावास (Jaishankar) ने वहां फंसे भारतीय नागरिकों को पश्चिमी यूक्रेन की दो सीमा चौकियों के रोमानिया और हंगरी में दो सीमावर्ती कस्बों में पहुंचने की सलाह दी थी। उन्हें चोप-जाहोनी सीमा चौकी से हंगरी में प्रवेश करें जो वहां उझोरोड शहर के पास है। इसी तरह रोमानिया के शेरनिवत्सी कस्बे तक पहुंचने के लिए पोरुबने-सिरेत सीमा चौकी का रास्ता लेने सलाह दी गयी थी।</p>
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                <pubDate>Sat, 26 Feb 2022 17:33:23 +0530</pubDate>
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