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                <title>Climate - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Climate RSS Feed</description>
                
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                <title>जलवायु को दुरूस्त रखने के प्रयास करने होंगे तेज</title>
                                    <description><![CDATA[इस वर्ष का जलवायु सम्मेलन मिस्र की सैरगाह शर्म अल-शेख में हो रहा है। साल 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के सहभागी बने लगभग 200 देशों का यह 27वां सम्मेलन है। इसमें अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और इटली समेत लगभग 90 देशों के राष्ट्राध्यक्ष भाग ले रहे हैं। इस वर्ष […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/efforts-will-have-to-be-made-to-keep-the-climate-right/article-39692"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-11/climate-change.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इस वर्ष का जलवायु सम्मेलन मिस्र की सैरगाह शर्म अल-शेख में हो रहा है। साल 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन की रोकथाम के सहभागी बने लगभग 200 देशों का यह 27वां सम्मेलन है। इसमें अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन और इटली समेत लगभग 90 देशों के राष्ट्राध्यक्ष भाग ले रहे हैं। इस वर्ष विकासोन्मुख देशों के लिए विकसित देशों की आर्थिक और तकनीकी मदद का मुद्दा प्रमुख रहने की संभावना है, जिस पर 2009 के सम्मेलन में सहमति हुई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">विकसित देशों ने विकासोन्मुख देशों को अक्षय ऊर्जा अपनाने और जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का सामना करने के लिए हर साल 100 अरब डॉलर की सहायता देने का वादा किया था, क्योंकि जलवायु परिवर्तन के लिए विकसित देशों का औद्योगीकरण ही मुख्य रूप से जिम्मेदार है। जलवायु न्याय के रूप में दी जाने वाली यह सहायता हर साल बढ़ी जरूर है, लेकिन अभी तक भी 100 अरब डॉलर तक नहीं पहुंची है। पिछले साल भी 85 अरब डॉलर ही जुट पाये थे। अगले साल पहली बार 100 अरब डॉलर मिलने की आशा है। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी और महंगाई के माहौल में विकसित देशों को 100 अरब डॉलर जुटाना भी भारी पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">विकसित देशों ने 2015 के पेरिस जलवायु सम्मेलन में वादा किया था कि वे अपने कार्बन उत्सर्जन को तेजी से कम करेंगे, जिससे वायुमंडल का तापमान औद्योगिक क्रांति से पहले की तुलना में 1.5 डिग्री सेल्सियस से ऊपर न जा सके, लेकिन यूक्रेन पर पुतिन के हमले से पैदा हुए ऊर्जा संकट की वजह से पिछले साल भर में कुछ देशों का कार्बन उत्सर्जन अपेक्षित रफ्तार से नहीं घटा है। यूरोप के देशों को रूस की पाइपलाइन से मिलने वाली प्राकृतिक गैस की सप्लाई बाधित होने से तरलीकृत गैस का आयात करना पड़ रहा है। पर्यावरणवादियों का कहना है कि विश्व का सबसे विनाशकारी संकट जलवायु परिवर्तन है, इसलिए दूसरे संकटों को इस पर वरीयता नहीं दी जा सकती।</p>
<p style="text-align:justify;">विख्यात अर्थशास्त्री जैफरी का सुझाव है कि विकासोन्मुख देशों की जलवायु सहायता को स्थायी बनाने के लिए उत्सर्जन के सामाजिक दायित्व के सिद्धांत पर ऊंची और मध्यम आय वाले देशों पर उत्सर्जन शुल्क लगाया जाना चाहिए। कोयले और तेल की जगह सौर, पवन और हाइड्रोजन जैसी अक्षय ऊर्जा का प्रयोग बढ़ा कर प्रदूषण से फैलने वाली बीमारियों पर होने वाले खर्च से भी बचा जा सकता है। इसकी शुरूआत सरकारी उपक्रमों और दफ्तरों, सरकारी वाहनों, नलकूपों, गांव-देहात, आदिवासी और पहाड़ी इलाकों को अक्षय ऊर्जा चालित बना कर की जा सकती है। स्वच्छता अभियान के बाद अब देश को स्वच्छ ऊर्जा अभियान की जरूरत है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शर्म अल-शेख के सम्मेलन में नहीं जा रहे हैं, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि वे देश की जलवायु की बेहतरी के लिए नये उपाय सोच रहे हैं।</p>
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                <pubDate>Wed, 09 Nov 2022 10:08:48 +0530</pubDate>
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                <title>पिछले 150 साल में जलवायु परिवर्तन ने 24 हजार साल को पीछे छोड़ा</title>
                                    <description><![CDATA[लंदन (एजेंसी)। स्टडी प्रसिद्ध साइंस जर्नल नेचर में प्रकाशित एक शोध ने सभी को परेशानी में डाल दिया है। दरअसल मामला ये है कि पिछले 150 वर्षों में दुनिया का तापमान जितनी तेज गति से बढ़ा है, उतना तो 24 हजार सालों में नहीं बढ़ा था। शोध बताता है कि इंसानी गतिविधियों और उद्योगों के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/climate-change-has-left-24-thousand-years-behind-in-the-last-150-years/article-28359"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/climate-change3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>लंदन (एजेंसी)।</strong> स्टडी प्रसिद्ध साइंस जर्नल नेचर में प्रकाशित एक शोध ने सभी को परेशानी में डाल दिया है। दरअसल मामला ये है कि पिछले 150 वर्षों में दुनिया का तापमान जितनी तेज गति से बढ़ा है, उतना तो 24 हजार सालों में नहीं बढ़ा था। शोध बताता है कि इंसानी गतिविधियों और उद्योगों के चलते जलवायु परिवर्तन की वजह से ग्लोबल गर्मी बहुत तेजी से बढ़ रही है। यूनिवर्सिटी आॅफ एरिजोना में जियोसाइंसेज के पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर मैथ्यू ओस्मान कहते हैं कि इंसानों ने जो काम प्रकृति के साथ किया है, वह उसने खुद के साथ कभी नहीं किया। इसलिए पिछले 150 सालों में वैश्विक स्तर पर तापमान बहुत तेजी से बढ़ा है। वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं में जलवायु को लेकर चल रही आपातकालीन स्थिति की चिंता है। वो हर साल दुनियाभर को इस बात की चेतावनी देते आए हैं।</p>
<p> </p>
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                <pubDate>Sun, 14 Nov 2021 11:00:47 +0530</pubDate>
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                <title>जलवायु परिवर्तन से बीमार होने वाली दुनिया की पहली मरीज कनाडा में मिली</title>
                                    <description><![CDATA[महिला को सांस लेने में तकलीफ ओटावा (एजेंसी)। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कितना भयावह हो सकता है। इसका उदाहरण अब देखा जाने लगा है। जलवायु परिवर्तन से बीमार होने का पहला मामला सामने आया है। कनाडा की रहने वाली 70 साल की एक बुजुर्ग महिला दुनिया की पहली महिला हैं जो जलवायु परिवर्तन के कारण […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/the-world-first-patient-to-get-sick-from-climate-change-found-in-canada/article-28233"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/climate-change2.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;">महिला को सांस लेने में तकलीफ</h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>ओटावा (एजेंसी)।</strong> प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कितना भयावह हो सकता है। इसका उदाहरण अब देखा जाने लगा है। जलवायु परिवर्तन से बीमार होने का पहला मामला सामने आया है। कनाडा की रहने वाली 70 साल की एक बुजुर्ग महिला दुनिया की पहली महिला हैं जो जलवायु परिवर्तन के कारण बीमार हुई हैं। उन्हें सांस लेने की दिक्कत के अलावा कई तकलीफों से गुजरना पड़ रहा है। कनाडा की एक महिला को जलवायु परिवर्तन से पीड़ित दुनिया की पहली मरीज बताया जा रहा है। इस महिला को सांस लेने में समस्या का सामना करना पड़ रहा है। मरीज की जांच कर रहे डॉक्टरों का कहना है कि लू और खराब वायु गुणवत्ता के कारण मरीज की स्वास्थ्य स्थिति खराब हुई है। महिला कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत की एक सीनियर सिटीजन है और अस्थमा के गंभीर स्टेज से जूझ रही हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्या है मामला</h4>
<p style="text-align:justify;">कनाडा के स्थानीय दैनिक अखबार ‘टाइम्स कॉलमनिस्ट’ को अस्पताल के आपातकालीन विभाग ने जानकारी दी कि महिला का स्वास्थ्य लगातार बिगड़ रहा है। उन्हें डायबिटीज है। उन्हें कुछ दिल की बीमारी भी है। वह बिना एयर कंडीशनिंग वाले ट्रेलर में रहती हैं। लिहाजा गर्मी और लू से उनकी सेहत पर बुरा असर हुआ है। वह वास्तव में हाइड्रेटेड रहने के लिए संघर्ष कर रही हैं। डॉक्टर मेरिट का कहना है कि सिर्फ रोगियों के लक्षणों का इलाज करने के बजाय कारणों की पहचान करके उन्हें हल करने की जरूरत है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">ब्रिटिश कोलंबिया में लू से कम से कम 233 लोगों की मौत</h4>
<p style="text-align:justify;">अखबार की रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटिश कोलंबिया में लोगों ने इस वर्ष भयानक लू की स्थिति का सामना किया। हवा की गुणवत्ता अगले 2-3 महीनों के लिए 40 गुना अधिक खराब हो गई है। बता दें कि कनाडा और संयुक्त राज्य अमेरिका के कुछ हिस्सों में रिकॉर्ड तोड़ लू से सैंकड़ों लोगों की मौत हुई। ब्रिटिश कोलंबिया में लू से कम से कम 233 लोगों की मौत हुई है।</p>
<p> </p>
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                <pubDate>Tue, 09 Nov 2021 16:37:37 +0530</pubDate>
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                <title>जलवायु संकट पर सभी पहलुओं को ध्यान में रख हो हल</title>
                                    <description><![CDATA[जलवायु संकट पर चर्चा करने के लिए जब तमाम वैश्विक नेता कॉप-26 (संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन) के लिए ब्रिटेन में मिले, यह अच्छा है कि वो सब मन बनाकर बैठे कि इस बार संकट से निपटने के लिए तत्काल और कठोर कार्रवाई की जरूरत से कतई पीछे नहीं हटना है। जलवायु परिवर्तन के आसन्न खतरे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/the-climate-crisis-should-be-resolved-keeping-in-mind-all-the-aspects/article-28219"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/climate-change1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जलवायु संकट पर चर्चा करने के लिए जब तमाम वैश्विक नेता कॉप-26 (संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन) के लिए ब्रिटेन में मिले, यह अच्छा है कि वो सब मन बनाकर बैठे कि इस बार संकट से निपटने के लिए तत्काल और कठोर कार्रवाई की जरूरत से कतई पीछे नहीं हटना है। जलवायु परिवर्तन के आसन्न खतरे को समझने के लिए हमें अब किसी विज्ञान की दरकार नहीं है। हम इसे अपने आसपास देख रहे हैं। चरम मौसमी घटनाओं की आमद बढ़ रही है, और वे अर्थव्यवस्था व जान-माल के लिए भी विनाशकारी साबित होने लगी है। तो कॉप-26 का एजेंडा क्या होना चाहिए? सबसे पहला और महत्वपूर्ण एजेंडा तो यही हो कि यह सम्मेलन जलवायु न्याय की अनिवार्यता को समझे। यह केवल नैतिकता का मसला नहीं है। इसके कारण बेशक असहज करते हैं, लेकिन काफी सरल है।</p>
<p style="text-align:justify;">कार्बन डाई-आॅक्साइड लंबे समय तक आबोहवा में बना रहता है, इसलिए अतीत में जो उत्सर्जन हुआ है, वह वायुमंडल में जमा है और तापमान को बढ़ाता है। फिर, कार्बन डाई-आॅक्साइड का जुड़ाव दुनिया के आर्थिक पहिए से भी है। यह आश्चर्य का विषय नहीं होना चाहिए कि राष्ट्रीय निर्धारित योगदान (एनडीसी) दुनिया को न्यूनतम तीन डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि या उससे भी अधिक की ओर ले जाता है। एनडीसी राष्ट्र के स्तर पर कमी लाने संबंधी लक्ष्य के लिए संयुक्त राष्ट्र का महज शब्दजाल है। यही कारण है कि भविष्य की कार्रवाइयां इस सच को जानते-समझते हुए तय की जानी चाहिए कि हमें जलवायु समानता की जरूरत है और इस पर हर हाल में काम होना चाहिए। यदि अन्य देशों के उत्सर्जन के साथ भारत की तुलना करें, तो यह अपेक्षाकृत कम है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन के उत्सर्जन का आंकड़ा जहां 27 प्रतिशत है, वहीं अमेरिका का योगदान 11 प्रतिशत है. यूरोपीय संघ के देश सात प्रतिशत ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करते हैं। भारत की आबादी चीन के लगभग बराबर है, पर अमेरिका और यूरोप से बहुत अधिक है। चीन समेत इन सभी देशों ने तो बड़ी आर्थिक प्रगति की है। भारत के लिए कोयले का सवाल घरेलू वजहों से भी खासा महत्वपूर्ण है। हमें पुराने व बेकार हो चुके बिजली संयंत्रों को चरणबद्ध तरीके से खत्म करना होगा और यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि सभी मौजूदा संयंत्र अत्याधुनिक तकनीक से सुसज्जित हों, ताकि प्रदूषण पर नियंत्रण पाने में सफलता मिले।</p>
<p style="text-align:justify;">निश्चित रूप से भारत की भी जिम्मेदारी है, लेकिन उत्सर्जन में कटौती धीरे-धीरे ही हो सकती है, अन्यथा औद्योगिक और अन्य गतिविधियों पर नकारात्मक असर पड़ेगा। पृथ्वी का तापमान बढ़ाने में ऐतिहासिक रूप से विकसित देश जिम्मेदार हैं। ऐसे में उन्हें अविकसित और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सहयोग भी देना चाहिए। हालिया ऊर्जा संकट ने फिर इंगित किया है कि चीन और पश्चिमी देश भी जीवाश्म-आधारित ईंधनों पर आश्रित हैं तथा उनका प्रति व्यक्ति औसत कार्बन उत्सर्जन भारत से बहुत अधिक है। उम्मीद है कि सम्मेलन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक हल तय करेगा।</p>
<p> </p>
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                <pubDate>Tue, 09 Nov 2021 09:48:26 +0530</pubDate>
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                <title>जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए भारत ने पांच अमृत तत्वों की सौगात दी</title>
                                    <description><![CDATA[ग्लास्गो (एजेंसी)। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जलवायु परिवर्तन को विकासशील देशों के अस्तित्व पर खतरा बताते हुए इस महाचुनौती से निपटने के लिए आज दुनिया के सामने पांच अमृत तत्वों की सौगात की पेशकश करते हुए कहा कि भारत वर्ष 2030 तक अपनी गैर जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुंचायेगा और वर्ष 2070 […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/india-has-gifted-five-elements-to-tackle-the-challenge-of-climate-change/article-28076"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-11/climate-change.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>ग्लास्गो (एजेंसी)।</strong> प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जलवायु परिवर्तन को विकासशील देशों के अस्तित्व पर खतरा बताते हुए इस महाचुनौती से निपटने के लिए आज दुनिया के सामने पांच अमृत तत्वों की सौगात की पेशकश करते हुए कहा कि भारत वर्ष 2030 तक अपनी गैर जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुंचायेगा और वर्ष 2070 तक नेट जीरो लक्ष्य हासिल करेगा। मोदी ने जोर देकर कहा कि जलवायु परिवर्तन से सबसे अधिक प्रभावित विकासशील देशों की आवाज इस सम्मेलन में उठाना भारत का कर्तव्य और जिम्मेदारी है तथा वह इसे निभाने में पीछे नहीं हटेगा। प्रधानमंत्री ने जलवायु परिवर्तन पर सोमवार को संयुक्त राष्ट्र के महासम्मेलन कॉप 26 में भारत का राष्ट्रीय वक्तव्य पेश करते हुए कहा, ‘जलवायु परिवर्तन पर इस वैश्विक मंथन के बीच, मैं भारत की ओर से, इस चुनौती से निपटने के लिए पांच अमृत तत्व रखना चाहता हूं, पंचामृत की सौगात देना चाहता हूं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">दूसरा भारत 2030 तक अपनी 50 प्रतिशत ऊर्जा जरूरत अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पूरी करेगा</h4>
<p style="text-align:justify;">पहला- भारत 2030 तक अपनी गैर जीवाश्म ऊर्जा क्षमता को 500 गीगावाट तक पहुंचाएगा। दूसरा भारत 2030 तक अपनी 50 प्रतिशत ऊर्जा जरूरत अक्षय ऊर्जा स्रोतों से पूरी करेगा। तीसरा भारत अब से लेकर 2030 तक के कुल प्रोजेक्टेड कार्बन एमिशन में एक बिलियन टन की कमी करेगा। चौथा 2030 तक भारत, अपनी अर्थव्यवस्था की कार्बन इंटेन्सिटी को 45 प्रतिशत से भी कम करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">पांचवा- वर्ष 2070 तक भारत, नेट जीरो का लक्ष्य हासिल करेगा। पेरिस सम्मेलन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने वहां कोई खोखला वादा नहीं किया। भारत ने उस सम्मेलन में जो भी वादा किया उसे पूरी तरह निभा रहा है और वह निरंतर कार्बन उत्सर्जन में कमी ला रहा है तथा पेरिस समझौते पर पूरी तरह खरा उतरा है। इस संदर्भ में उन्होंने सरकार की विभिन्न योजनाओं और कदमों का उल्लेख किया।</p>
<h4 style="text-align:justify;">अब समय आ गया है ठोस कदम उठाने का</h4>
<p style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन से संबंधित वित्त दावों की पोल खोलते हुए मोदी ने कहा कि ये खोखले साबित हुए हैं और अब जरूरत इस बात की है कि जो इन वादों को पूरा नहीं करते उन पर दबाव बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, ये सच्चाई हम सभी जानते हैं कि क्लाइमेट फाइनेंस को लेकर आज तक किए गए वायदे, खोखले ही साबित हुए हैं। जब हम सभी क्लाइमेट एक्शन पर अपनी महत्वाकांक्षा बढ़ा रहे हैं, तब क्लाइमेट फाइनेंस पर विश्व के लक्ष्य वही नहीं रह सकते जो पेरिस अग्रीमेंट के समय थे।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि जो देश अपना वादा पूरा नहीं करते हैं उन पर दबाव बनाया जाना जरूरी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत जलवायु परिवर्तन के संबंध में अपनी प्रतिबद्धता को साहस के साथ पूरा कर रहा है और उसका मानना है कि विकासशील देशों और भावी पीढ़ियों के भविष्य को बचाने के लिए सबको एकजुट होना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि विकासशील देशों की आवाज उठाना भारत की जिम्मेदारी तथा कर्तव्य है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 02 Nov 2021 10:27:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>संयुक्त राष्ट्र प्रमुख ने नेताओं से &amp;#8216;जलवायु आपातकाल की स्थिति&amp;#8217; घोषित करने का किया आग्रह</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने 2020 जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि जब तक हम ‘कार्बन न्यूट्रैलिटी’ की स्थिति प्राप्त नहीं कर लेते तब तक ‘जलवायु आपातकाल की स्थिति’ घोषित की जाए। गुटेरेस ने कहा, “आज, मैं दुनिया भर के सभी नेताओं से आह्वान करता हूं कि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/un-chief-urges-leaders-to-declare-climate-emergency/article-20530"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/climate-emergency.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>संयुक्त राष्ट्र।</strong> संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने 2020 जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा कि जब तक हम ‘कार्बन न्यूट्रैलिटी’ की स्थिति प्राप्त नहीं कर लेते तब तक ‘जलवायु आपातकाल की स्थिति’ घोषित की जाए। गुटेरेस ने कहा, “आज, मैं दुनिया भर के सभी नेताओं से आह्वान करता हूं कि जब तक ‘कार्बन न्यूट्रैलिटी’ की स्थिति प्राप्त नहीं हो जाती तब तक वे अपने-अपने देशों में ‘जलवायु आपातकाल की स्थिति’ घोषित करें।” संयुक्त राष्ट्र, ब्रिटेन और फ्रांस ने पेरिस समझौते की पांचवीं वर्षगांठ के अवसर पर 2020 के शिखर सम्मेलन की सह-मेजबानी की। शिखर सम्मेलन के प्रतिभागियों ने जलवायु परिवर्तन के मुद्दे से निपटने के लिए कार्यों पर ध्यान केंद्रित किया।</p>
<p style="text-align:justify;">महासचिव ने इस बात पर जोर दिया कि सभी देशों को अपनी भावी पीढ़ियों के लिए पृथ्वी को बचाने की मुहिम में आगे आना चाहिए। गुटेरेस ने कहा, “मैं हर किसी से आग्रह करता हूं कि वह प्रतिबद्धता दिखाएं और हमारे पृथ्वी के दोहन पर लगाम लगाएं। हमें अपने बच्चों और नाती-पोतों का भविष्य सुनिश्चित करने की जरूरत है।” उन्होंने उम्मीद जताई कि अगर वैश्विक उत्सर्जन में 2010 के स्तर की तुलना में 2030 तक 45 प्रतिशत की कमी हो तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय ‘कार्बन न्यूट्रैलिटी’ हासिल कर सकता है। पेरिस समझौता को 196 देशों ने 12 दिसंबर 2015 को जलवायु परिवर्तन पर एक अंतरराष्ट्रीय संधि के संबंध में अपनाया था। इसे 4 नवंबर 2016 को लागू किया गया था।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 13 Dec 2020 12:25:23 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>रणनीति में बदलाव की आवश्यकता</title>
                                    <description><![CDATA[जलवायु परिवर्तन के कारण धरती के तापमान में वृद्धि और अन्य वातावरणीय समस्याएं लंबे समय से सुर्खियों में है। अब हाल ही में सरकारी वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा की गयी एक मूल्यांकन रिपोर्ट में कुछ बातों को स्पष्ट किया गया है जैसे कि भारत में औसत तापमान 40 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ेगा। हीट वेव भी चार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/need-to-change-required-in-strategy/article-17895"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-08/new-generation-suffering-from-climate-change.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन के कारण धरती के तापमान में वृद्धि और अन्य वातावरणीय समस्याएं लंबे समय से सुर्खियों में है। अब हाल ही में सरकारी वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा की गयी एक मूल्यांकन रिपोर्ट में कुछ बातों को स्पष्ट किया गया है जैसे कि भारत में औसत तापमान 40 डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ेगा। हीट वेव भी चार गुणा बढ़ेंगी, चक्रवात बढ़ते जाएंगे और समुद्र का जल स्तर 30 सेंटीमीटर तक बढ़ेगा। यह सब पिछले दो-तीन दशकों की तुलना में इस सदी के अंत तक हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस रिपोर्ट का नाम भारतीय क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन का मूल्यांकन है और यह रिपोर्ट पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने तैयार की है तथा इसका संपादन इंडियन इंस्टिटयृट आॅफ ट्रापिकल मीटियोरोलॉजी, पूणे के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि किसी वर्ष में सबसे गर्म दिन और सबसे ठंडी रात के तापमान में 1986-2015 के बीच 0.63 डिग्री सेंटीग्रेड और 0.40 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हुई है और इस सदी के अंत तक इन तापमानों में लगभग 4.7 डिग्री सेंटीग्रेड और 5.5 डिग्री सेंटीगे्रड की वृद्धि होने की संभावना है। इस रिपोर्ट में विभिन्न अध्ययनों का हवाला दिया गया है कि किस तरह मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों में जलवायु परिवर्तन, शहरीकरण, समुद्री जल स्तर में वृद्धि और अन्य क्षेत्रीय कारकों के कारण बाढ़ आयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस संबंध में उत्तराखंड का उदाहरण दिया गया है जहां पर 968 ग्लेशियरों का तापमान बढ़ता जा रहा है और राज्य के प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा 1912-2012 की अवधि के 100 वर्षों के जलवायु और वर्षा के आंकड़ों के आधार पर पाया है कि यहां पर औसत तापमान में 0.45 डिग्री सेंटीगे्रड की वृद्धि हुई है। हालांकि यह वृद्धि मामूली सी दिखती है किंतु लंबे समय से तापमान बढ़ रहा है। 1990 से तापमान में लगातार वृद्धि हो रही है। राज्य में पिथौरागढ़ में तापमान में सर्वाधिक 0.58 डिग्री सेल्सियस वृद्धि हुई है। उसके बाद चमोली में 0.54 डिग्री सेल्सियस, रूद्रप्रयाग में 0.5 डिग्री सेल्सियस और उत्तरकाशी में 0.51 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई और ये राज्य के सभी पर्वतीय जिले हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछली सदी में वर्षा में 13.05 सेंटीमीटर की कमी हुई है और देश के अधिकतर भागों की यही स्थिति है। वर्षा में कमी विशेषकर जून से सितंबर के माहों में वर्षा में कमी बताती है कि राज्य में जलवायु तेजी से बदल रहीा है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 20वीं सदी के मध्य से भारत में औसत तापमान में वृद्धि देखने को मिली है और मानसून में कमी आई है। तापमान और वर्षा में अत्यधिक वृद्धि देखने को मिल रही है। सूखा और समुद्र का जल स्तर का बढ़ रहा है, भीषण चक्रवात की संख्या बढी है। इसके अलावा मानूसन प्रणाली में अनेक बदलाव देखने को मिल रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बात के वैज्ञानिक प्रमाण हैं कि क्षेत्रीय जलवायु में इन बदलावों का कारण मानवीय कार्यकलाप हैं। मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन 21वीं सदी के दौरान भी जारी रहेगा। भविष्य में जलवायु के बारे में सटीक भविष्यवाणी के लिए आवश्यक है कि पृथ्वी प्रणाली की प्रक्रियाओं के ज्ञान में सुधार के लिए रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाया जाए और जलवायु मॉडल पर काम किया जाए। वैश्विक भविष्यवाणी और मात्रात्मक विश्लेषण में अग्रणी संस्था आॅक्सफोर्ड इकोनोमिस्ट ने पाया है कि भारत में जहां जनसंख्या अधिक है वहां पर तापमान में 0.5 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हुई है और जहां तापमान लगभग 26 डिग्री सेंटीग्रेड है वहां पर सकल घरेलू उत्पाद के स्तर में वृद्धि हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अध्ययन के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण प्रति व्यक्ति आय के मामले में 75 प्रतिशत देशों की प्रति व्यक्ति आय में गिरावट आएगी। इस अध्ययन के अनुसार भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण अनेक देशों में लोगों की आजीविका प्रभावित होगी। जलवायु परिवर्तन परिदृृश्य का दूसरा पहलू कोरोना महामारी है। जिसके चलते प्रकृति की पारिस्थितिक प्रणाली बिगड़ी है हालांकि कोरोना महामारी के दौरान प्रदूषण स्तर में काफी गिरावट आयी है। इसी तरह मानव द्वारा प्रकृति के दोहन के कारण जलवायु परिवर्तन हुआ है। रिपोर्ट मे कहा गया है न केवल भारत में अपितु 2014 के बाद संपूर्ण विश्व में पांच वर्ष सबसे गर्म रहे हैं। आर्कटिक क्षेत्र का तापमान तेजी से बढ़ रहा है। वर्ल्ड मीटियोरोजिकल आर्गेनाइजेशन के आकलन के अनुसार 2016 से 2019 के बीच तापमान सर्वाधिक रहा है और इस वर्ष इसके और बढ़ने की संभावना है। हालांकि इस विषय पर काफी चर्चा हुई है किंतु इस संबंध में सरकार द्वारा कोई खास कार्यवाही नहीं की गयी। एक गरीब देश होने के नाते हम निवारात्मक उपाय नहीं कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी तरह बाढ और सूखा नियंत्रण के लिए दीर्घकालीन कदम उठाने की दिशा में भी ठोस प्रयास नहीं किए जा रहे हंै जिसके चलते देश में लगभग हर वर्ष बाढ और सूखे की स्थिति बनी रहती है। उदाहरण के लिए देश के 870 संरक्षित क्षेत्रों को लें जिनमें राष्ट्रीय पार्क, वन्य जीव अभयारण्य, संरक्षित अभयारण्य, संरक्षित वन सामुदायिक वन आदि शामिल हैं। हालांकि हाल के वर्षों में संरक्षित क्षेत्रों की घोषणा की जाती रही है किंतु उनके संरक्षण, प्रबंधन या उनको वित्तीय सहायता देने के लिए संस्थागत उपाय नहीं किए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">एक हाल की रिपोर्ट के अनुसार 100 वर्ग किमी के कम आकार के 65 प्रतिशत संरक्षित क्षेत्र हमारे पारितंत्र के लिए पर्याप्त नहंी हैं। हमारे देश में केवल 28 संरक्षित क्षेत्र 1000 वर्ग किमी आकार के हैं। शिकारियों और टिम्बर माफिया से संरक्षण के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की कमी के कारण संरक्षित क्षेत्र में अतिक्रमण बढता जा रहा है। जैसा कि सभी जानते हैं कि ये पार्क जीव जन्तुओं और वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियों के लिए अपिरहार्य हैं। संरक्षित क्षेत्र मानव समाज के लिए पारिस्थितिकीय सेवाएं भी उपलब्ध कराते हैं। सरकार द्वारा प्रायोजित एक अध्ययन के अनुसार देश के 10 बाघ अभयारण्य लगभग 330 बिलियन रूपए मूल्य की जनसंवाएं उपलब्ध कराते हैं किंतु उनके संरक्षण के लिए वित्तीय सहायता पर्याप्त नहीं है जिससे उनके संरक्षण के लिएए वांछित उपाय नहीं किए जा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">धरती के तापमान में वृद्धि का भारत सहित अनेक देशों की आर्थिक वृद्धि पर बड़े पैमाने पर दुष्प्रभाव पड़ेगा। इसलिए केवल बड़ी-बड़ी बातें करने के बजाय हमें पर्याववरण के संरक्षण के लिए सुनियोजित रणनीति अपनानी होगी और जमीनी स्तर पर समुचित सुरक्षोपाय करने होंगे। हाल के समय में घटित अनेक घटनाएं इस बात की ओर इंगित करती हैं कि उद्योग आवश्यक सुरक्षोपायों का पालन नहीं करते हैं और राजनेताओं तथा प्रवर्तन एजेंसियों को पैसे देकर अनेक तरह के नियम-विनियमों का उल्लंघन करते हैं। पर्यावरण की निगरानी नियमों और विनियमों को सुदृढ बनाया जाना चाहिए ताकि जलवायु परिवर्तन की गति सीमित की जा सके और इसके चलते देश को होने वाले आर्थिक नुकसान से बचा जा सके। आर्थिक विकास के मार्ग को बदलना होगा। आर्थिक विकास की सतत नीति अपनानी होगी साथ ही प्रशासन को सुदृढ करना होगा ताकि देश के गरीब ग्रामीण लोगों को अनेक प्रकार की पर्यावरणीय आपदाओं से बचाया जा सके।</p>
<p>                                                                                                               <strong>-धुर्जति मुखर्जी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 28 Aug 2020 09:56:09 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जलवायु आपातकाल और भारत</title>
                                    <description><![CDATA[जो प्रदूषण का बड़ा कारण है। ई-वाहनों को बढ़ावा देने के दावे कमजोर साबित हो रहे हैं।
इन हालातों में विकास और प्रदूषण को अलग-अलग रखना सबसे बड़ी समस्या है
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/climate-emergency-and-india/article-11064"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-11/climate.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत के 69 वैज्ञानिकों सहित विश्व के 11250 वैज्ञानिकों ने विश्व स्तर पर जलवायु आपातकाल की घोषणा की है। इस घोषणा का अर्थ यही है कि अमेरिका, रूस, चीन जैसे देशों सहित विश्व के विकासशील देशों ने जलवायु को लेकर पैदा होते खतरों को टालने के लिए सिवाय केवल बातें, एक दूसरे के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप और कागजी कार्रवाई के अलावा कुछ भी नहीं किया। क्योटो संधि भी केवल औपचारिकता बनकर रह गई। अमेरिका जलवायु के मामले में अपनी जिम्मेदारी निभाने की बजाए विश्व के साथ मजाक ही करता आया है। वह पैरिस समझौते से बाहर हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस लापरवाही भरे व्यवहार के कारण ही स्वीडन की 16 वर्षीय युवती थनबर्ग ग्रेटा संयुक्त राष्ट्र में न केवल आंसू बहाती है बल्कि अपने भाषण के समापन के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड से चिंता भी व्यक्त करती है। ग्रीन हाऊस गैसों की निकासी रोकने के मामले में अमेरिका का रवैया थानेदारों वाला रहा है जो जलवायु खतरों का ठीकरा विकासशील देशों के सिर फोड़ता है। चिंताजनक विषय यह है कि भोजन और बिजली जैसी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए ही विश्व ने मानवीय जीवन को दांव पर लगा दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति को मानवीय जीवन से बाहर निकालने का खमियाजा आखिर मानव को ही भुगतना पड़ेगा। इधर हमारा मुल्क है जहां 100 रुपए का समाधान ही नहीं निकल रहा। पराली को आग लगाना प्रदूषण माना जा रहा है जिसके लिए किसानों को प्रति क्विंटल पराली का 100 रुपए देने से समस्या का समाधान होना संभव है। पंजाब केंद्र सरकार को बार-बार पत्र लिख रहा है। वातावरण के लिए किसान गिरफ्तार किए जा रहे हैं लेकिन 100 रुपए देने के लिए कोई तैयार नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिर सुप्रीम कोर्ट को कहना पड़ा है कि छोटे व सीमांत किसानों को 100 रुपए क्यों नहीं दिए जा रहे। विश्व में प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए हजारों अरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं लेकिन हमारे देश में 100 रुपए समस्या बने हुए हैं। वातावरण को लेकर एक अन्य चिंताजनक पहलू यह है कि विकास का पैमाना औद्योगिक विकास बन गया है जो प्रदूषण का बड़ा कारण है। ई-वाहनों को बढ़ावा देने के दावे कमजोर साबित हो रहे हैं। इन हालातों में विकास और प्रदूषण को अलग-अलग रखना सबसे बड़ी समस्या है, जिससे निपटने के बजाए जलवायु पर चिंतन केवल बातें ही है जिससे कोई स्थायी हल नहीं निकले वाला। जलवायु आपातकाल इन्हीं दिशाहीन व महत्वहीन प्रयासों की देन है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Nov 2019 20:51:58 +0530</pubDate>
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                <title>पेरिस जलवायु समझौता: मुखरित होता अमेरिकी दंभ</title>
                                    <description><![CDATA[अमेरिका को दोबारा महान् बनाने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा शुरू की गई मुहिम ने पेरिस जलवायु समझौते को संकट में डाल दिया है। इस समझौते पर भारत सहित दुनिया के 200 देशों ने हस्ताक्षर कर विश्व का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक कम करने का संकल्प लिया है। दिसंबर 2015 में कई दिनों की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका को दोबारा महान् बनाने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा शुरू की गई मुहिम ने पेरिस जलवायु समझौते को संकट में डाल दिया है। इस समझौते पर भारत सहित दुनिया के 200 देशों ने हस्ताक्षर कर विश्व का तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक कम करने का संकल्प लिया है। दिसंबर 2015 में कई दिनों की गहन बातचीत के बाद पेरिस जलवायु समझौते की नींव रखी गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">पर्यावरण सुरक्षा और भावी पीढ़ियों को एक सुंदर संसार प्रदान करने के सद्उद्देश्य से अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने इस समझौते को लागू करवाया था। नंवबर 2016 में समझौते के लागू होने के बाद इसके परिणाम आते उससे पहले ही वर्तमान राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिकी हितों की दुहाई देकर समझौते से हाथ पीछे खींच लिए। नि:संदेह अमेरिका के इस कदम ने पर्यावरणवादियों को सकते में डाल दिया है। हालांकी दुनिया के दूसरे नंबर के कार्बन उत्सर्जक देश चीन का रूख सकारात्मक है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन ने स्पष्ट कहा है कि वह अन्य देशों के साथ मिलकर समझौते को आगे बढ़ायेगा, लेकिन प्रश्न यह उठता है कि अमेरिका के हटने के बाद अब समझौते का भविष्य क्या होगा? क्या कार्बन उत्सर्जन करने वाले दूसरे देश जिन्होंने धरती पर पर्यावरण संतुलन बनाए रखने का संकल्प लेते हुए समझौते के मसौदे पर हस्ताक्षर किए थे, वे अब राष्ट्रहित के नाम पर समझौते से अलग होने की कोशिश नहीं करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा जिस तरह से ट्रंप ने अमेरिकी हितों के अनुरूप समझौते के प्रावधानों में परिर्वतन की बात कही है, उससे साफ है कि अमेरिका अपनी शर्तों पर ही समझौते में बने रहना चाहता है। ट्रम्प का मानना है कि पेरिस समझौता अमेरिका पर आर्थिक बोझ डालता है, इसलिए समझौते में कुछ उचित परिवर्तन किए जाएं, जिससे अमेरिका के ओद्यौगिक हितों की रक्षा हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसी स्थिति में क्या गांरटी है कि नए प्रावधानों पर दूसरे देश सहमत हो सकेंगे? अमेरिका के नक्शे कदम पर चलते हुए बाकी सदस्य भी अपने-अपने देशों के लिए रियायती प्रावधानों की मांग करने लगेंगे, तो समझौते का स्वरूप व उद्देश्य क्या रह जाएगा यह भी विचारणीय बिंदू है। हालांकि राष्ट्रपति ट्रंप के इस निर्णय की दुनियाभर में आलोचना हो रही है। अमेरिका के भीतर भी उनको आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<h2 style="text-align:justify;"><strong>क्या है पेरिस समझौता:</strong></h2>
<p style="text-align:justify;">पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचाने और ग्रीन हाउस गैंसों के उत्सर्जन को निश्चित सीमा तक बनाए रखने के उद्देश्य को लेकर सन् 1992 में रियो-डी-जेनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन के अवसर पर पर्यावरण और विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीईडी) में ‘दी यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कंवेंशन आॅन क्लाइमेट चेंज’ (यूएनएफसीसीसी) नामक एक अंतरराष्ट्रीय संधि की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">1994 मेंं निर्मित इस संधि का उद्देश्य तेज गति से बढ़ रहे वैश्विक तापमान में कमी लाने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना था। यूएनएफसीसीसी में शामिल सदस्य देशों का सम्मेलन कॉन्फ्रेंस आॅफ पार्टीज (सीओपी) कहलाता है। वर्ष 1995 से सीओपी के सदस्य देश प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले शिखर सम्मेलन में मिलते है।</p>
<p style="text-align:justify;">पिछले वर्ष दिसम्बर में पेरिस में आयोजित सीओपी की 21 वीं बैठक में कार्बन उत्सर्जन में कटौती के जरिये वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने और 1़5 डिग्री सेल्सियस के आदर्श लक्ष्य को लेकर एक व्यापक सहमति बनी थी। इस बैठक के बाद सामने आए 18 पन्नों के दस्तावेज को सीओपी-21 समझौता या पेरिस समझौता कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अक्टूबर, 2016 तक 191 देश इस समझौते पर हस्ताक्षर कर चुके थे। पेरिस समझौते के पहले ही दिन 177 सदस्यों ने इस पर हस्ताक्षर कर दिये थे। समझौते के लागू होने के लिए 2020 को आधार वर्ष माना गया है, लेकिन सदस्य देशों के बीच समझौते के प्रावधानों पर सहमति हो जाने पर इसे पहले भी लागू किये जा सकने का प्रावधान किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत ने 2 अक्टूबर व यूरोपीय संघ ने 5 अक्टूबर 2016 को हस्ताक्षर कर इसके प्रावधानों को स्वीकार कर लिया है। 4 नवंबर, 2016 को पेरिस जलवायु समझौता औपचारिक रूप से अस्तित्व में आ गया। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने सिंतबर 2016 में इस समझौते पर हस्ताक्षर किये थे, तब उन्होंने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 28 प्रतिशत की कमी लाने का निश्चय किया था। समझौते के तहत अमेरिका ने गरीब देशों को तीन बिलियन डॉलर सहायता राशि देने के लिए हामी भरी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन ने भी अगस्त 2016 में समझौते को स्वीकार कर लिया था। क्या होगा परिणाम: पेरिस समझौते से अमेरिका के हाथ खींच लेने से साल 2030 तक विश्वभर में 3 अरब टन ज्यादा कार्बन-डाईआॅक्साइड का उत्सर्जन होने लगेगा, क्योंकि दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन में करीब 15 फीसदी हिस्सेदारी अकेले अमेरिका की है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में अगर अमेरिका समझौते से हटता है तो नि:संदेह जलवायु परिवर्तन को कम करने की दिशा में किये जा रहे प्रयासों को झटका लगेगा। तथ्य यह भी है कि अमेरिका विकासशील देशों में बढ़ते तापमान को रोकने के लिए वित्तीय और तकनीकी मदद उपलब्ध कराने वाला सबसे अहम् स्रोत है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका के हटने से उन देशों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा, जिनको समझौते पर हस्ताक्षर करने की एवज में प्रतिवर्ष बड़ी रकम अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों से मिलती रही है। कोई शक नहीं है कि पेरिस समझौते से ट्रंप के हाथ खींच लेने से इस समझौते के लक्ष्यों का पाना मुश्किल हो जाएगा।</p>
<h2 style="text-align:justify;">ट्रम्प की आपत्ति :</h2>
<p style="text-align:justify;">ट्रम्प आरभ से ही पेरिस समझौते के आलोचक रहे हैं। वे अनेक दफा इस बात को दोहरा चुके हैं कि अमेरिका ने पेरिस में ’सही सौदा’ नहीं किया है। उनका कहना है कि पेरिस समझौते से अमेरिका के औद्योगिक हित प्रभावित होंगे। उनका यह भी आरोप है कि इस समझौते में भारत और चीन के लिए सख्त प्रावधान नहीं किए गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले 31 मई को ट्रम्प ने भारत, रूस ओर चीन पर आरोप लगाते हुए कहा था कि यह देश प्रदूषण रोकने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं, जबकि इसके लिए अमेरिका करोड़ो डॉलर दे रहा हैै। ट्रम्प का मानना है कि विकसित देशों से अरबों डॉलर पाने के लिए भारत पेरिस जलवायु समझौते में शामिल हुआ है। जबकि सच्चाई इसके विपरीत है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत भी जलवायु परिवर्तन के खतरों से प्रभावित होने वाले देशों में से एक है। कार्बन उत्सर्जन में कटौती का असर भारत जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं पर सबसे अधिक पड़ेगा। साल 2030 तक भारत ने अपनी कार्बन उत्सर्जन की गति को 2005 के मुकाबले 33-35 फीसदी तक कम करने का लक्ष्य रखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा यूएनईपी की उत्सर्जन अंतराल संबंधी रिर्पोट भी ट्रंप के आरोप को झूठा साबित करने के लिए काफी है। रिर्पोट में कहा गया है कि जी 20 देशों में से जो उत्सर्जन के अधिकांश हिस्से के लिए जिम्मेदार हैं, केवल यूरोपीय संघ, भारत और चीन ही लक्ष्यों के अनुरूप चल रहे हंै। सच तो यह है कि ट्रंप ने अपने चुनावी एजेंडे में अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से अलग करने का मुद्दा शामिल किया था ऐसे में उनके इस कदम को चुनावी वादे को पूरा करने के तौर पर भी देखा जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर हमें यह समझना होगा कि कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए जताई गई प्रतिबद्धता से मुंह मोड़ना विनाशकारी साबित हो सकता है। अगर इस महाविनाश से मानव सभयता को बचना है तो पेरिस समझौते के पवित्र प्रावधानों को सभी के लिए मानना जरूरी होगा, फिर वो चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ही क्यों न हों।</p>
<p style="text-align:justify;">–<strong>एन.के. सोमानी</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 05 Jun 2017 23:12:10 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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