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                <title>Scientist - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>इसरो में वैज्ञानिक बना भिवानी का छात्र</title>
                                    <description><![CDATA[जिले के गांव डूडीवाला का रहने वाला है अमित भिवानी (सच कहूँ/इन्द्रवेश)। अगर हौंसले बुलंद हों और इंसान हिम्मत रखें तो मंजिल को हासिल कर लेता है। कुछ ऐसे ही बुलंद हौसलों ने एक गरीब किसान के बेटे को इसरो तक पहुंचा दिया है। हम बात कर रहे हैं भिवानी जिले के गांव डूडीवाला निवासी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/bhiwani-student-becomes-scientist-in-isro/article-34163"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-06/amit-sharma-bhiwani.jpg" alt=""></a><br /><h4>जिले के गांव डूडीवाला का रहने वाला है अमित</h4>
<p style="text-align:justify;"><strong>भिवानी (सच कहूँ/इन्द्रवेश)।</strong> अगर हौंसले बुलंद हों और इंसान हिम्मत रखें तो मंजिल को हासिल कर लेता है। कुछ ऐसे ही बुलंद हौसलों ने एक गरीब किसान के बेटे को इसरो तक पहुंचा दिया है। हम बात कर रहे हैं भिवानी जिले के गांव डूडीवाला निवासी अमित शर्मा की, जिन्होंने अपनी मेहनत के बूते पर बतौर वैज्ञानिक इसरो में जगह बनाई है।</p>
<h4><strong>गाँव से शुरू हुआ पढ़ाई का सफर</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">ग्रामीण तबके में स्थित सरस्वती विद्या विहार आसलवास दुबिया के स्कूल में अमित शर्मा ने 12वीं तक तालीम हासिल की थी और सपना संजोया कि वैज्ञानिक बनकर देश सेवा करेगा। उस सपने को साकार करने के लिए पिता ने कर्ज लिया तो स्कूल के प्रबंध निदेशक ने भी समय-समय पर सहायता की। इस विद्यार्थी की मेहनत का परिणाम है कि उसने इसरो में जगह बनाई। इसरो में वैज्ञानिक चुने जाने पर स्कूल पहुंचे अमित शर्मा का विद्यार्थियों, स्कूल स्टाफ, स्कूल प्रबंधन द्वारा जोरदार स्वागत किया गया। इस मौके पर विद्यालय के प्रबंध निदेशक राजवीर सिंह ने विद्यार्थी की यादों को ताजा किया तो अमित शर्मा ने भी अपनी उपलब्धियों का श्रेय विद्यालय स्टाफ व अपने माता-पिता को दिया।</p>
<h4><strong>किस्मत से ज्यादा काम करती है मेहनत</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">प्रबंध निदेशक राजवीर सिंह के अनुसार इंसान हिम्मत के बूते पर कुछ भी हासिल कर सकता है तो वहीं दूसरी ओर अमित शर्मा ने बताया कि किस्मत कम काम करती है और मेहनत ज्यादा काम करती है। इन्सान को मेहनत पर विश्वास करना चाहिए। अमित शर्मा का कहना है कि स्पेस में बहुत सारी संभावनाएं हैं तथा वह इस क्षेत्र में देश के लिए काम करना चाहता है।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 04 Jun 2022 15:54:46 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>इटली में अंतरिक्ष वैज्ञानिक बना खन्ना का कमलप्रीत</title>
                                    <description><![CDATA[खन्ना (लुधियाना)। ‘‘मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।’’ वास्तव में इन पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया है पंजाब के खन्ना में जन्मे कमलप्रीत सिंह स्लैच ने। कमलप्रीत ने अपनी मेहनत, लग्न और दृढ़ इच्छा शक्ति की बदौलत इटली में अंतरिक्ष […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/kamalpreet-of-india-become-space-scientist-in-italy/article-26569"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-09/kamalpreet.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>खन्ना (लुधियाना)।</strong> ‘‘मंजिल उन्हीं को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है।’’ वास्तव में इन पंक्तियों को सार्थक कर दिखाया है पंजाब के खन्ना में जन्मे कमलप्रीत सिंह स्लैच ने। कमलप्रीत ने अपनी मेहनत, लग्न और दृढ़ इच्छा शक्ति की बदौलत इटली में अंतरिक्ष वैज्ञानिक बने हैं। उन्होंने इटली में स्पेस और एस्ट्रोनोट्स में मास्टर डिग्री प्राप्त की है। इसके साथ ही कमलप्रीत सिंह अपने सपनों को साकार करने के बहुत ही करीब पहुंच गया है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">ऐसा करने वाला पंजाब का पहला विद्यार्थी</h4>
<p style="text-align:justify;">खन्ना के कृष्णा नगर में रहने वाले दविन्द्र सिंह ने बताया कि उनका बेटा कमलप्रीत इटली के शहर रोम में सपैनजा यूनिवर्सिटी का छात्र है। लड़के की इस प्राप्ति पर उन्हें व कमलप्रीत की माँ जतिंदर कौर को रिश्तेदारों व दोस्तों की ओर से बधाई संदेश मिल रहे हैं। उन्होंने कहा कि वह पंजाब का अकेला ऐसा विद्यार्थी है, जिसने इस विषय में इटली में मास्टर डिग्री प्राप्त की है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">चांद पर जाने की इच्छा</h4>
<p style="text-align:justify;">कमलप्रीत सिंह ने फोन पर बताया कि उसका सपना रहा है कि वह अंतरिक्ष वैज्ञानिक बनकर बड़ी-बड़ी खोजें करे। वो कहता है कि उसकी एक दिली इच्छा है कि वो एक दिन अंतरिक्ष की उड़ान भरकर चाँद पर जाए। इसी के चलते उसने ये पढ़ाई की है। कमलप्रीत सिंह ने आगे बताया कि वह पीएचीडी की पढ़ाई के साथ-साथ अपने रिसर्च संबंधी कार्य को भी जारी रखेगा। उसकी इच्छा है कि वो एक दिन नासा टीम का सदस्य बने।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 06 Sep 2021 12:24:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>प्रसिद्ध अंतरिक्ष वैज्ञानिक रोड्डम नरसिम्हा का निधन</title>
                                    <description><![CDATA[बेंगलुरू। जाने-माने अंतरिक्ष वैज्ञानिक एवं पद्मविभूषण से सम्मानित प्रो. रोड्डम नरसिम्हा का सोमवार की रात यहां निधन हो गया। वह 87 वर्ष के थे। उनके परिवार में पत्नी और एक पुत्री है। दिवंगत वैज्ञानिक के पारिवारिक सदस्यों ने बताया कि प्रो. नरसिम्हा हृदय संबंधी बीमारी से पीड़ित थे और एक निजी अस्पताल में उनका उपचार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/renowned-space-scientist-roddam-narasimha-died/article-20579"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-12/roddam-narasimha.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बेंगलुरू।</strong> जाने-माने अंतरिक्ष वैज्ञानिक एवं पद्मविभूषण से सम्मानित प्रो. रोड्डम नरसिम्हा का सोमवार की रात यहां निधन हो गया। वह 87 वर्ष के थे। उनके परिवार में पत्नी और एक पुत्री है। दिवंगत वैज्ञानिक के पारिवारिक सदस्यों ने बताया कि प्रो. नरसिम्हा हृदय संबंधी बीमारी से पीड़ित थे और एक निजी अस्पताल में उनका उपचार चल रहा था , जहां उन्होंने कल रात अंतिम सांस ली। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वैज्ञानिकी सलाहकार और राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रयोगशाला के निदेशक रहे प्रो. नरसिम्हा का लड़ाकू विमान लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एलसीए) तेजस की डिजाइनिंग और इसे विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">केन्द्र सरकार ने प्रो. नरसिम्हा को अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में योगदान के लिये 2013 में देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया था। कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा , वरिष्ठ कांग्रेसी नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारामैया तथा गणमान्य हस्तियों ने प्रो नरसिम्हा के निधन पर शोक व्यक्त किया है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 15 Dec 2020 11:44:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>वैज्ञानिकों की नई तकनीक से चल सकेंगे लकवे के मरीज</title>
                                    <description><![CDATA[good news: चल सकेंगे लकवे के मरीज 
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/fatafat-news/scientist-makes-exoeleton-devices/article-10626"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-10/exoskeleton-device.jpg" alt=""></a><br /><h2>मस्तिष्क से नियंत्रित होती है ये डिवाइस | Exoeleton device</h2>
<ul>
<li><strong> फ्रांस के रहने वाले एक मरीज पर किया गया सफल ट्रायल</strong></li>
<li><strong>चार साल पहले हुए हादसे के बाद पैरालिसिस का शिकार हो गए थे थिबॉल्ट</strong></li>
</ul>
<p><strong>पेरिस (एजेंसी)।</strong> लकवाग्रस्त मरीजों के लिए अच्छी खबर है। वैज्ञानिकों ने मस्तिष्क से नियंत्रित होने वाला एक ऐसा <strong>एक्सोस्केलेटन (Exoeleton device)</strong> तैयार किया है, जिससे पैरालिसिस <strong>(Paralysis)</strong> के शिकार लोग भी चल फिर सकेंगे। एक्सोस्केलेटन हड्डियों के ढांचे की तरह काम करने वाला डिवाइस है, जो बाहर से शरीर को सहारा देता है। मस्तिष्क से संचालित होने वाले इस नए सिस्टम से टेट्राप्लेजिक्स के मरीजों के लिए उम्मीद की किरण जगी है।</p>
<h2>इस नई तकनीक का इस्तेमाल फ्रांस के रहने वाले थिबॉल्ट (28) पर किया जा रहा है।</h2>
<p>टेट्राप्लेजिक्स के कारण मरीज के कंधे के नीचे का हिस्सा काम करना बंद कर देता है। फिलहाल इस नई तकनीक का इस्तेमाल फ्रांस के रहने वाले थिबॉल्ट (28) पर किया जा रहा है। एक नाइट क्लब में हुए हादसे के कारण चार साल पहले थिबॉल्ट के कंधे के नीचे का पूरा हिस्सा लकवाग्रस्त हो गया था। कई महीने कंप्यूटर पर प्रशिक्षण लेने के बाद वह एक्सोस्केलेटन की मदद से चलने लगे हैं। उन्होंने कहा, इस तकनीक से मुझे नई जिंदगी मिली है। मैं अभी एक्सोस्केलेटन की मदद से अपने घर तो नहीं जा सकता, लेकिन कुछ दूरी तक चल लेता है। जब मैं चाहता हूं, चलता हूं और जब रुकना चाहता हूं, रुक जाता हूं।’</p>
<h2>किस तरह काम करता है डिवाइस</h2>
<p>फ्रांस स्थित हॉस्पिटल ऑफ ग्रेनोबेल एल्पेस के अलीम लुईस बेनाबिड ने कहा, ‘पैरालिसस के बाद भी मस्तिष्क हाथ व पैरों को घूमने का सिग्नल दे सकता है। हालांकि, हाथ व पैर मस्तिष्क के कमांड को लागू कर पाने में अक्षम होते हैं।’ इसी के चलते शोधकर्ताओं ने थिबॉल्ट के सिर के दोनों हिस्से में एक रिकार्डिग डिवाइस प्रत्यर्पित किया। ये डिवाइस सेंसोरिमोटर कार्टेक्स की जानकारियां रिकार्ड कर सकते थे। मस्तिष्क में मौजूद ये कार्टेक्स ही शरीर की चलने-फिरने की क्षमता को नियंत्रित करते हैं। इस रिकॉर्डर के जरिये मस्तिष्क के सिग्नल को एक एल्गोरिदम में बदला जाता है, जिससे एक्सोस्केलेटन को चलने का कमांड मिलता है।</p>
<h2>संजीवनी से कम नहीं होगी डिवाइस</h2>
<ul>
<li><strong>एक्सोस्केलेटन बाहरी रूप से देखने में किसी रोबोट की आकृति लगती है</strong></li>
<li><strong> पर वास्तविकता में यह रोबोट नहीं है। </strong></li>
<li><strong>वैज्ञानिकों ने कहा कि यह डिवाइस पैरालिसिस के शिकार लोगों के लिए किसी संजीवनी से कम नहीं होगी। </strong></li>
<li><strong>इसकी मदद से लोग आसानी से चल-फिर सकेंगे और अपने दैनिक भी काम कर पाएंगे। </strong></li>
<li><strong>लेकिन इससे पहले इसके डिजाइन पर और काम करने की जरूरत है।</strong></li>
</ul>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/fatafat-news/scientist-makes-exoeleton-devices/article-10626</link>
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                <pubDate>Sun, 06 Oct 2019 10:15:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ISRO लॉन्च कर रहा यंग साइंटिस्ट प्रोग्राम</title>
                                    <description><![CDATA[बेंगलुरु(एजेंसी)। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) प्रमुख के. सिवन ने बताया है कि इसरो एक महीने का युवा विज्ञानी कार्यक्रम लॉन्च कर रही है। इस कार्यक्रम के तहत प्रत्येक राज्य से तीन विद्यार्थी चुने जाएंगे। इन्हें शिक्षित किया जाएगा और शोध तथा विकास प्रक्रिया से जुड़ी प्रयोगशालाओं तक उनकी पहुंच बनाई जाएगी, ताकि वे उपग्रह […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;"><strong>बेंगलुरु(एजेंसी)।</strong> भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) प्रमुख के. सिवन ने बताया है कि इसरो एक महीने का युवा विज्ञानी कार्यक्रम लॉन्च कर रही है। इस कार्यक्रम के तहत प्रत्येक राज्य से तीन विद्यार्थी चुने जाएंगे। इन्हें शिक्षित किया जाएगा और शोध तथा विकास प्रक्रिया से जुड़ी प्रयोगशालाओं तक उनकी पहुंच बनाई जाएगी, ताकि वे उपग्रह बनाने का वास्तविक अनुभव हासिल हो सके।</p>
<h2>2019 में इसरो बॉर्डर सिक्यॉरिटी सैटलाइट लांच करेगा</h2>
<p style="text-align:justify;">इसरो प्रमुख ने बताया कि हमने त्रिपुरा में इनक्यूबेशन सेंटर विकसित किया है और त्रिची, नागपुर, राउरकेला तथा इंदौर में चार और इनक्यूबेशन सेंटर बनाए जाएंगे। गगनयान मिशन को लेकर इसरो चेयरमैन के सिवन ने कहा, ‘इस साल गगनयान मिशन हमारी प्राथमिकता रहेगी और गृह मंत्रालय की मदद के लिए भी सैटलाइट लॉन्च की जाएगी। साल 2019 में इसरो बॉर्डर सिक्यॉरिटी सैटलाइट लांच करेगा। 2020 में पहला मानव रहित मिशन और 2022 में दूसरा मानव रहित मिशन पूरा किया जाएगा।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;">इसमें पहली उपलब्धि सोवियत संघ (आज के रूस) के नाम है</li>
<li style="text-align:justify;">जिसने 1957 में दुनिया का पहला कृत्रिम उपग्रह अंतरिक्ष में छोड़ा था।</li>
<li style="text-align:justify;">इसकी सफलता से उत्साहित सोवियत संघ ने 12 अप्रैल, 1961 को अपने नागरिक यूरी एलेकसेविच गागरिन को वोस्टॉक-1 नामक यान से स्पेस में भेजा था।</li>
<li style="text-align:justify;">इसके बाद से रूस वोस्टॉक, वोस्खोड और सोयूज यानों से करीब 74 मानव मिशनों को अंतरिक्ष में भेज चुका है।</li>
<li style="text-align:justify;">इसके बाद बारी आई अमेरिका की, जिसने 5 मई, 1961 को अपने नागरिक एलन बी शेपर्ड को प्रोजेक्ट मरकरी मिशन के तहत स्पेसक्राफ्ट फ्रीडम-7 से अंतरिक्ष में रवाना किया।</li>
</ul>
<h2 style="text-align:justify;"> हर राज्य से चुने जाएंगे तीन विद्यार्थी</h2>
<p style="text-align:justify;">इसके बाद से अमेरिकी स्पेस एजेंसी-नासा 200 से ज्यादा मानव मिशन अंतरिक्ष में भेज चुकी है। यह करिश्मा करने वालों की सूची में तीसरा देश चीन है, जिसने 15 अक्टूबर, 2003 को अपने नागरिक यांग लिवेई को शिंझोऊ-5 यान से अंतरिक्ष में भेजा था। वैसे तो इस अवधि में कई अमीर पर्यटक भी स्पेस टूरिज्म के तहत अंतरिक्ष की सैर कर चुके हैं और आने वाले वक्त में संभवत: दर्जनों लोग निजी कंपनियों की मदद से स्पेस की यात्र का आनंद ले सकेंगे, लेकिन जो बात देश का प्रतिनिधित्व करते हुए स्वदेशी यानों से अंतरिक्ष में पदार्पण करने में है, उसकी तुलना नहीं हो सकती है।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 18 Jan 2019 13:08:45 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>अब साथ देगी सौर ऊर्जा</title>
                                    <description><![CDATA[आज मानव को कदम-कदम पर ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। खाना पकाने से लेकर हर वैज्ञानिक सुख-सुविधा के उपयोग में ऊर्जा प्रथम जरूरत है मगर दुनिया में ऊर्जा के स्रोत सीमित हैं और जरूरतें असीमित। इसी समस्या के निदान हेतु सौर ऊर्जा के उपयोग पर वैज्ञानिक दिन-रात परिश्रम कर रहे हैं। सौर ऊर्जा का महत्वपूर्ण […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hindi-article-on-solar-energy/article-3334"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-09/solar.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आज मानव को कदम-कदम पर ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। खाना पकाने से लेकर हर वैज्ञानिक सुख-सुविधा के उपयोग में ऊर्जा प्रथम जरूरत है मगर दुनिया में ऊर्जा के स्रोत सीमित हैं और जरूरतें असीमित। इसी समस्या के निदान हेतु सौर ऊर्जा के उपयोग पर वैज्ञानिक दिन-रात परिश्रम कर रहे हैं। सौर ऊर्जा का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इससे प्रदूषण बिल्कुल नहीं फैलता। आज कई कार्यों में सौर ऊर्जा का उपयोग हो रहा है। जापान ने एक ऐसे घर का निर्माण किया है, जो अपनी बिजली संबंधी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति सौर ऊर्जा से कर सकेगा। इस घर के एक कमरे की छत सोन्यो इलेक्ट्रिक कंपनी द्वारा निर्मित 75 सौर दर्पण टाइलों से तैयार की गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन सौर दर्पण टाइलों को सोलर बैटरी से जोड़कर 1.1 किलो वॉट की बिजली प्राप्त की जा सकेगी। इससे पहले सोलर पैनल इतने बड़े आकार के थे कि सौर ऊर्जा प्राप्त करने में काफी समय लगता था और कठिनाइयां भी अनुभव की जाती थीं। भारत में हरियाणा स्थित गुड़गांव में देश का प्रथम सौर ताप बिजली घर बनाया गया, जिसकी क्षमता 50 किलोवॉट है। यह बिजलीघर पूर्णत: स्वदेशी तकनीक पर आधारित है। यह अन्य बिजलीघरों की तुलना में न केवल किफायती है, बल्कि इससे पर्यावरण प्रदूषण भी कम होता है। इस सफलता को देखते हुए सरकार अन्य स्थानों पर भी ऐसे ही बिजली घर बनाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">सूर्य की गर्मी से बचने के लिये जापानी वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा से ही चलने वाला एक ऐसा एयरकंडीशनर तैयार कर लिया, जो आकाश में बादल छाये रहने पर भी काम करता रहेगा। वैज्ञानिकों के अनुसार जिस वक्त सूर्य का ताप अपने चरमोत्कर्ष पर होता है, उस समय यह एयरकंडीशनर सौर ऊर्जा को ग्रहण कर संग्रहित कर लेता है। बाद में रात के समय यह इसी ऊर्जा के बल पर काम करता रहता है। सौर ऊर्जा चलित उपकरणों के निर्माण के मामले में ‘जापान’ अग्रणी है। यहीं के वैज्ञानिकों ने सौर ऊर्जा से चलने वाली कार निर्मित की है। ‘साइंस एण्ड टेक्नोलॉजी पत्रिका के अनुसार यह कार सौ किलोमीटर प्रतिघंटा की रफ्तार से दौड़ सकेगी और इसका वजन 150 किलोग्राम होगा। सोलर कॉरपोरेशन ने अपनी इस कार के इंजन में ऐसे उपकरण लगाए हैं, जो सौर ऊर्जा को विद्युतधारा में परिवर्तित कर 1.4 किलोवॉट बिजली का उत्पादन कर सकते हैं। कार के इंजन में इस केंद्र का नाम फोटोवाल्टिक केंद्र रखा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">20 नवंबर, 1980 को सोलर चैलेंजर वायुयान को पूर्णत: सौर शक्ति से उड़ाया गया। इसका निर्माण डॉ. पॉल के नेतृत्व वाली टीम ने किया था। 7 जुलाई, 1981 को सोलर चैलेंजर, ऐसा पहला सौर शक्ति चलित वायुयान था, जिसने निर्विघ्न इंग्लिश चैनल पार किया हो। इसने पोटोइकोरमीलल, पेरिस, फ्रांस से टेकआॅफ किया और 11 हजार 2 फीट की अधिकतम ऊंचाई पर मेन्सटन, कैट तक की 163 मील की यात्रा को 5 घंटे 23 मिनट में पूरा कर लिया। वायुयान का विंग स्पैन 47 फीट है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश में भी सौर ऊर्जा चलित उपकरणों के उपयोग को प्रोत्साहन देने के लिये सरकार उन उपकरणों के लागत मूल्य पर लगभग 50 प्रतिशत शासकीय अनुदान देती है। ‘सौर चूल्हे’, सौरचलित वाटर पम्प, पानी गर्म करने के उपकरण आदि अब शहरों के साथ ही सुदूर गांवों तक लोकप्रिय होते जा रहे हैं। वैज्ञानिक आकार में छोटे तथा बिना झंझट के कार्य कर सकने वाले सौर ऊर्जा चलित उपकरणों के निर्माण में जी-जान से जुटे हुए हैं। उनका कहना है कि ऊर्जा की कीमतें चढ़ रही हैं तो सूर्य भी तो रोज चढ़ रहा है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 26 Sep 2017 04:00:20 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>छह महीने थी ड्यूटी, 34 महीने बाद भी काम कर रहा मंगलयान</title>
                                    <description><![CDATA[यान की सक्रियता से इसरो गदगद नई दिल्ली। अंतरिक्ष के इतिहास में भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख देने वाला मंगलयान लाल ग्रह का अध्ययन करने के लिए छह महीने के मिशन पर भेजा गया था, लेकिन यह 34 महीने बाद भी काम कर रहा है और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/mangalyaan-working-after-34-months/article-2719"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/mangalyaan.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">यान की सक्रियता से इसरो गदगद</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> अंतरिक्ष के इतिहास में भारत का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिख देने वाला मंगलयान लाल ग्रह का अध्ययन करने के लिए छह महीने के मिशन पर भेजा गया था, लेकिन यह 34 महीने बाद भी काम कर रहा है और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों को लगातार मंगल ग्रह की तस्वीरें तथा डेटा भेज रहा है। वैज्ञानिक इस महायान के हुनर से गदगद हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसरो के एक वैज्ञानिक ने बताया कि मंगलयान को केवल ‘यान’ नहीं, बल्कि ‘महायान’ कहना उचित होगा जो छह महीने की अपनी मिशन अविध पूरी करने के बाद आज 34 महीने बाद भी काम कर रहा है और रोजाना मंगल ग्रह के विभिन्न पहलुओं से संबंधित तस्वीरें और डेटा भेज रहा है। उन्होंने मंगलयान को भारत के अंतिरक्ष इतिहास का सबसे बड़ा मिशन करार देते हुए कहा कि इस मार्स आॅर्बिटर मिशन (एमओएम) का प्रदर्शन अंतरिक्ष विज्ञानियों को प्रसन्न कर देने वाला है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"> मंगल कक्ष में पहुंच यान ने रचा था इतिहास</h3>
<p style="text-align:justify;">पांच नवंबर 2013 को मंगल यात्रा पर भेजे गए इस यान ने 24 सितंबर 2014 को मंगल की कक्षा में पहुंचकर इतिहास रच दिया था और इसके साथ ही भारत अपने पहले प्रयास में ही मंगल पर पहुंच जाने वाला दुनिया का पहला देश बन गया था। मंगल पर पहुंचने वाले अमेरिका और पूर्व सोवियत संघ जैसे देशों को कई प्रयासों में सफलता मिली थी।</p>
<h2 style="text-align:justify;">अभी भी दे रहा डेटा</h2>
<p style="text-align:justify;">इसरो के अधिकारी ने बताया कि मंगलयान को छह महीने के मिशन पर भेजा गया था जो इसने 24 मार्च 2015 को पूरा कर लिया, लेकिन यह आज 34 महीने बाद भी मंगल के अध्ययन में भारतीय अंतिरक्ष विज्ञानियों को लगातार डेटा उपलब्ध करा रहा है। महज 450 करोड़ रुपए की लागत से तैयार हुआ यान 24 सितंबर 2014 से लाल ग्रह का लगातार चक्कर लगा रहा है। इस दौरान इसने मंगल की सतह, वहां की घाटियों, पर्वतों, बादलों और वहां उठने वाले धूल भरे तूफानों की शानदार तस्वीरें तथा डेटा मुहैया कराया है।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 30 Jul 2017 06:41:03 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>अंटार्कटिका में दिल्ली से 4 गुना बड़ा हिमखंड हुआ अलग</title>
                                    <description><![CDATA[वैश्विक समुद्री स्तर में होगी 10 सेमी. की बढ़ोतरी वैज्ञानिक बोले-कार्बन उत्सर्जन बना कारण नई दिल्ली (एजेंसी)। अंटार्कटिका में मौजूद आईसबर्ग (हिमचट्टान) लार्सेन सी का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूट कर अलग हो गया है। 5800 वर्ग किलोमीटर के इस टुकड़े के आकार का अंदाजा हम इससे लगा सकते हैं कि ये राजधानी दिल्ली के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/breaks-large-part-of-glacier-in-antarctica/article-2271"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/glacier.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;">वैश्विक समुद्री स्तर में होगी 10 सेमी. की बढ़ोतरी</h2>
<ul>
<li style="text-align:justify;"><strong>वैज्ञानिक बोले-कार्बन उत्सर्जन बना कारण</strong></li>
</ul>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> अंटार्कटिका में मौजूद आईसबर्ग (हिमचट्टान) लार्सेन सी का एक बहुत बड़ा हिस्सा टूट कर अलग हो गया है। 5800 वर्ग किलोमीटर के इस टुकड़े के आकार का अंदाजा हम इससे लगा सकते हैं कि ये राजधानी दिल्ली के आकार से 4 गुना तो गोवा से डेढ़ गुना बड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">लार्सेन सी अंटार्कटिका में मौजूद हिमचट्टानों में चौथी सबसे बड़ी हिमचट्टान है। इससे अलग हुए हिमखंड का वजन खरबों टन और इसे संभवत: हिमचट्टान से अलग हुआ अब तक का सबसे बड़ा खंड बताया जा रहा है। ब्रिटिश अंटार्कटिक सर्वे के अनुसार यह हिमखंड 10 से 12 जुलाई के बीच टूटकर अलग हुआ है। इसका नाम ए68 रखे जाने की संभावना है। इसका आकार बाली के इंडोनेशियाई द्वीप के बराबर हो सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">हिमखंड टूटने का असर</h3>
<p style="text-align:justify;">इस घटना का दुनिया के पर्यावरण पर असर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार इस हिमखंड के अलग होने से वैश्चिवक समुद्री स्तर में 10 सेमी. की बढ़ोतरी हो जाएगी। साथ ही इस महाद्वीप के पास से होकर जाने वाले जहाजों को भी दिक्कत आ सकती है।<br />
वैज्ञानिकों के अनुसार समुद्र स्तर पर इस हिमखंड के अलग होने से तुरंत प्रभाव तो नहीं आएगा लेकिन इससे लार्सेन सी हिमचट्टान का फैलाव 12 प्रतिशत तक कम हो जाएगा। बता दें कि लार्सेन ‘ए’ और ‘बी’ हिमचट्टानें पहले ही ढह चुकी हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">टूटने का कारण</h3>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिक इस हिमखंड के अलग होने का कारण कार्बन उत्सर्जन को बता रहे हैं। उनका कहना है कि कार्बन उत्सर्जन से वैश्विक तापमान बढ़ रहा है जिससे ग्लेशियर जल्दी पिघल रहे हैं। भारत पर इसके असर की बात करें तो अरब सागर पर इसका प्रभाव जल्द नहीं दिखेगा। लंबे समय बाद इसका असर हो सकता है। वहीं, समुद्री स्तर बढ़ने से अंडमान और निकोबार के कई टापू और बंगाल की खाड़ी में सुंदरवन के हिस्से डूब सकते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कहां जा रहा हिमखंड</h3>
<p style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं के अनुसार यह हिमखंड कम समय में तेजी से नहीं बढ़ेगा। लेकिन इस पर निगरानी रखने की जरूरत है। इसके बारे में अभी कुछ निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता। इसके टुकड़े भी हो सकते हैं और यह एक ही टुकड़े में भी रह सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p> </p>
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                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/breaks-large-part-of-glacier-in-antarctica/article-2271</link>
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                <pubDate>Thu, 13 Jul 2017 05:34:39 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भाभा अटोमिक सैंटर में वैज्ञानिक बनी रीतू</title>
                                    <description><![CDATA[उपलब्धि: गैट परीक्षा में देश भर में हासिल किया था छठा रैंक भिवानी (इन्द्रवेश)। गीता व बबीता बलाली ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहलवानी के क्षेत्र के जहां अपनी पहचान बनाते हुए बेटियों का मान-सम्मान बढाया, वहीं अब विज्ञान के क्षेत्र में रीतू बर्मन ने भिवानी को पहचान देने का काम किया है। भिवानी जिला के […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/ritu-becomes-a-scientist-in-bhabha-atomic-center/article-1954"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/ritu.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">उपलब्धि: गै<strong>ट परीक्षा में देश भर में हासिल किया था छठा रैंक</strong></h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>भिवानी (इन्द्रवेश)।</strong> गीता व बबीता बलाली ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहलवानी के क्षेत्र के जहां अपनी पहचान बनाते हुए बेटियों का मान-सम्मान बढाया, वहीं अब विज्ञान के क्षेत्र में रीतू बर्मन ने भिवानी को पहचान देने का काम किया है। भिवानी जिला के गांव कोंट के किसान की बेटी रीतू बर्मन अपनी कड़ी मेहनत के बल पर अब भाभा अटोमिक रिसर्च सेंटर की वैज्ञानिक बनने जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">गांव कोंट के किसान बलवान की बेटी रीतू बर्मन ने इसी वर्ष फरवरी में हुई गैट परीक्षा में देश भर में छठा रैंक हासिल कर भिवानी क्षेत्र का नाम चमकाया था। रीतू बर्मन ने मात्र 22 वर्ष की उम्र में अटोमिक रिसर्च सेंटर (बीएआरसी) में बतौर मैट्रालॉजी वैज्ञानिक चयनित होकर इस बात को साबित भी कर दिया।</p>
<h2>किसान पिता ने कर्ज लेकर बेटी को पढ़ाया</h2>
<p>भाभा अटोमिक रिसर्च सेंटर ने देश भर के 150 के लगभग मैट्रालॉजी इंजीनियरिंग के छात्रो में से चार का चयन सार्इंटीफिक आॅफिसर के पद पर किया, जिनमें रीतू बर्मन भी एक है। रीतू बर्मन ने बीते जून माह में भाभा अटोमिक रिसर्च सेंटर में सार्इंटीफिक आॅफिसर के पद के लिए परीक्षा दी थी। रीतू ने देश भर के 150 के लगभग धातु वैज्ञानिकों को पछाड़ते हुए सैंटर के अटोमिक एनर्जी विभाग में रीतू ने सार्इंटिफिक आॅफिसर के पद पर अपनी जगह बनाई।</p>
<p style="text-align:justify;">रीतू के पिता बलवान सिंह एक छोटे किसान हैं, जिन्होंने कर्ज लेकर उन्हें पढ़ाया। उन्होंने अपनी हायर एजुकेशन नजदीकी गांव धाहरेडू से पूरी की। उसके बाद 12वीं विज्ञान संकाय से उन्होंने भिवानी से पास की, जिसके बाद एमएनआईटी जयपुर से रीतू बर्मन ने धातु विज्ञान से इंजीनियरिंग की।</p>
<p style="text-align:justify;">इंजीनियरिंग के दौरान उनके पिता बलवान को बेटी की पढ़ाई के लिए क्षेत्रीय ग्रामीण बंैक से तीन लाख रूपये के लगभग कर्ज भी लेना पड़ा। तीन भाई-बहनों में दूसरे नम्बर की बेटी रीतू के बड़े भाई सन्नी आईटीबीपी में सैनिक हैं तथा छोटा भाई साहिल आठवीं कक्षा में पढ़ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">रीतू बर्मन ने बताया कि वे भाभा अटोमिक रिसर्च सेंटर में उनका कार्य नूक्लीयर मैट्रालॉजी रियेक्टर के क्षेत्र में काम करना है। उन्होंने कहा कि भविष्य में वह धातु विज्ञान के क्षेत्र में देश का नाम रोशन करना चाहेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">रीतू ने अपनी सफलता का श्रेय अपने परिजनों व गुरूजनों को दिया। रीतू के पिता बलवान बर्मन, माता सुमन देवी व दादी छोटा देवी ने बताया कि रीतू बचपन से ही पढ़ाई में होशियार थी तथा वह घंटों स्वाध्याय करती थी। जिसका नतीजा उनकी बेटी रीतू को इस सफलता के रूप में मिला है।</p>
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</p><p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Jul 2017 01:04:57 +0530</pubDate>
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                <title>बुल्गारिया का पहला संचार उपग्रह प्रक्षेपित</title>
                                    <description><![CDATA[सोफिया। बुल्गारिया के पहले भूस्थैतिक संचार उपग्रह को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया गया है। सरकारी प्रक्षेपण एजेंसी बुलसेटकाम के मुताबिक इस उपग्रह बुल्गारियासेट-एक को सफलतापूर्वक कक्षा में प्रक्षेपित कर दिया गया है और यह संचार उपग्रह यूरोप और उत्तर अफ्रीका को टेलीविजन तथा दूरसंचार सेवाएं उपलब्ध कराएगा। इसे अमेरिका के नेशनल एयरोनाटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/fatafat-news/bulgaria-communication-satellite-launched/article-1579"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/setelite.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>सोफिया।</strong> बुल्गारिया के पहले भूस्थैतिक संचार उपग्रह को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया गया है। सरकारी प्रक्षेपण एजेंसी बुलसेटकाम के मुताबिक इस उपग्रह बुल्गारियासेट-एक को सफलतापूर्वक कक्षा में प्रक्षेपित कर दिया गया है और यह संचार उपग्रह यूरोप और उत्तर अफ्रीका को टेलीविजन तथा दूरसंचार सेवाएं उपलब्ध कराएगा। इसे अमेरिका के नेशनल एयरोनाटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) के फ्लोरिडा स्थित कैनेडी स्पेस सेंटर से स्पेसएक्स की मदद से शुक्रवार रात साढ़े बारह बजे प्रक्षेपित किया गया।</p>
<h2 style="text-align:justify;">वैज्ञानिकों को आगे बढ़ाने में मिलेगी मदद</h2>
<p style="text-align:justify;">यह उपग्रह प्राकृतिक आपदाओं जैसे भूंकप, तूफान और बाढ़ के दौरान काफी लाभदायक जानकारी दे सकेगा, क्योंकि उस समय पृथ्वी आधारित संचार नेट काम नहीं करता है। बुल्गारिया सेट और बुलसेटकाम के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मैक्सिम जायाकोव ने कहा कि हमने 10 वर्ष पहले इस अंतरिक्ष परियोजना की शुरुआत की थी और हमें यह पूरी तरह पता था कि इस परियोजना को पूरा करने के लिए हमें धैर्य,प्रतिबद्धवता और मजबूत टीम की जरूरत पड़ेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस उपग्रह के प्रक्षेपण के साथ ही हमने यूरोप के उन देशों के साथ कदम बढ़ा लिया है जो अंतरिक्ष क्षेत्र में अग्रणी हैं। इससे बुल्गारिया में उच्च तकनीकी क्षेत्रों के विकास और प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी।</p>
<p>यह उपग्रह पृथ्वी से 36 हजार किलोमीटर की ऊंचाई पर स्थापित किया जाएगा और अगले 20 वर्षों तक काम करता रहेगा। अगले माह तक नियंत्रण कक्ष आवश्यक परीक्षणों एवं औपचारिकताओं को पूरा कर लेगा ताकि इस उपग्रह को पूरी तरह संचालित किया जा सके। इस परियोजना के लिए बुल्गारिया को अमेरिका,आयात-निर्यात बैंक और जर्मनी तथा यूरोपीय बैंकों से 23.5 करोड़ डालर की वित्तीय सहायता मिली है।</p>
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                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 24 Jun 2017 08:08:56 +0530</pubDate>
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                <title>ब्रह्मांड के सबसे गर्म ज्ञात ग्रह की खोज</title>
                                    <description><![CDATA[ सूर्य से महज 926 डिग्री सेल्सियस ही ठंडा वाशिंगटन। वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से 650 प्रकाशवर्ष दूर स्थित सबसे गर्म ज्ञात ग्रह खोज लिया है। यह ग्रह ब्रह्मांड के अधिकांश तारों से ज्यादा गर्म है और एक धूमकेतू की तरह इसमें से एक चमकदार गैसीय रेखा निकलती दिखती है। अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि बृहस्पति जैसा यह […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/discovered-the-world-most-hottest-known-planets/article-951"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/plenet.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;"> सूर्य से महज 926 डिग्री सेल्सियस ही ठंडा</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन।</strong> वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से 650 प्रकाशवर्ष दूर स्थित सबसे गर्म ज्ञात ग्रह खोज लिया है। यह ग्रह ब्रह्मांड के अधिकांश तारों से ज्यादा गर्म है और एक धूमकेतू की तरह इसमें से एक चमकदार गैसीय रेखा निकलती दिखती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि बृहस्पति जैसा यह ग्रह एक बड़े तारे केईएलटी-9 का चक्कर लगाता है। इसमें उसे डेढ़ दिन का समय लगता है। दिन का अधिकतम तापमान 4,326 डिग्री सेल्सियस रहता है। इसके चलते इस बाहरी ग्रह केईएलटी-9बी को अधिकतर तारों से गर्म करार दिया गया है। यह हमारे सूर्य से महज 926 डिग्री सेल्सियस ही ठंडा है। जिस तारे का यह चक्कर लगाता है, उससे निकलने वाला पराबैंगनी विकिरण इतना तेज है कि ग्रह संभवत: वाष्पित हो रहा हो और एक चमकदार गैसीय रेखा पैदा कर रहा हो। अमेरिका की ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और नेचर नामक जर्नल में प्रकाशित अध्ययन के प्रमुख लेखक स्कॉट गौडी ने कहा कि द्रव्यमान पर आधारित परिभाषाओं के तहत यह एक ग्रह है लेकिन इसका वातावरण निश्चित तौर पर किसी भी अन्य ग्रह की तुलना में अलग है। ऐसा दिन के समय इसके तापमान के कारण है।</p>
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                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 06 Jun 2017 07:52:45 +0530</pubDate>
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