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                <title>Article - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Climate Change: जलवायु परिवर्तन और बढ़ता बच्चों का जीवन संकट</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की रिपोर्ट ‘लर्निंग इंटरप्टेड: ग्लोबल स्नैपशॉट ऑफ क्लाइमेट-रिलेटेड स्कूल डिसरप्शंस इन 2024’ ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर एक महत्वपूर्ण और चौंकाने वाली तस्वीर प्रस्तुत की है। इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के कारण बच्चों पर होने वाले शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य संबंधित प्रभावों का गहरा विश्लेषण किया गया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/climate-change-and-the-growing-threat-to-childrens-lives/article-67061"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-02/new-generation-suffering-from-climate-change.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र बाल कोष (यूनिसेफ) की रिपोर्ट ‘लर्निंग इंटरप्टेड: ग्लोबल स्नैपशॉट ऑफ क्लाइमेट-रिलेटेड स्कूल डिसरप्शंस इन 2024’ ने जलवायु परिवर्तन के प्रभावों पर एक महत्वपूर्ण और चौंकाने वाली तस्वीर प्रस्तुत की है। इस रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के कारण बच्चों पर होने वाले शारीरिक, मानसिक, शैक्षिक और स्वास्थ्य संबंधित प्रभावों का गहरा विश्लेषण किया गया है। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">अब तक जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के पर्यावरणीय और कृषि पर प्रभावों के बारे में कई अध्ययन सामने आए थे, लेकिन बच्चों की शिक्षा पर इसके प्रभाव पर यह पहला गंभीर अध्ययन है, जो पूरी दुनिया के नीति-निर्माताओं, शिक्षाविदों, और अभिभावकों को गंभीर चिंता में डालने के लिए पर्याप्त है। यह रिपोर्ट सरकारों पर भी दबाव डाल रही है कि वे जलवायु परिवर्तन के बच्चों और शिक्षा पर होने वाले घातक प्रभावों को कम करने के लिए तत्काल प्रभावी नीतियाँ बनाएं और उन्हें लागू करें।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में भारत में लगभग पांच करोड़ छात्रों की शिक्षा पर लू और अत्यधिक गर्मी का गंभीर असर पड़ा। ओस्लो विश्वविद्यालय के मनोविज्ञान के पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो डॉ. केटलिन एम. प्रेंटिस और उनके सहकर्मियों ने जलवायु परिवर्तन के इस प्रभाव पर विस्तृत अध्ययन किया है, जो ‘नेचर क्लाइमेट चेंज’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इस अध्ययन में विशेष रूप से दक्षिण एशिया के देशों, जैसे भारत, बांग्लादेश, और कंबोडिया में अप्रैल महीने में आने वाली अत्यधिक गर्म हवाओं (हीटवेव) के कारण शिक्षा व्यवस्था पर पड़े नकारात्मक प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। भारत को जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में एक अत्यधिक संवेदनशील देश माना गया है। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में दुनिया के 85 देशों में कुल 24.2 करोड़ बच्चों की पढ़ाई मौसम की चरम स्थितियों के कारण प्रभावित हुई। इसका मतलब यह है कि हर सात में से एक बच्चा जलवायु संकट के कारण कभी न कभी स्कूल नहीं जा सका। शोध में यह भी बताया गया कि बढ़ती गर्मी और अधिक गर्म दिनों ने न केवल बच्चों के स्वास्थ्य को प्रभावित किया, बल्कि उनके परीक्षा परिणामों को भी खराब किया। रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि यदि ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन इस तरह जारी रहता है, तो वर्ष 2050 तक बच्चों के अत्यधिक गर्मी और लू के संपर्क में आने की संभावना आठ गुना बढ़ सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे यह स्पष्ट होता है कि जलवायु परिवर्तन न केवल बच्चों की शिक्षा, बल्कि उनके समग्र भविष्य को भी गंभीर खतरे में डाल रहा है। अगर इस संकट से निपटने के लिए तत्काल प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो इसके दीर्घकालिक परिणाम न केवल शिक्षा पर बल्कि बच्चों के समग्र विकास पर भी गहरे असर डालेंगे। जलवायु परिवर्तन का बच्चों पर प्रभाव शारीरिक, मानसिक और शैक्षिक दोनों दृष्टिकोणों से घातक हो सकता है। गर्मी से होने वाली बीमारियाँ और मौतों का खतरा बढ़ जाता है। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">हैजा, मलेरिया, डेंगू, और जीका जैसी बीमारियाँ बच्चों के जीवन के लिए खतरनाक हो सकती हैं। गर्भावस्था के दौरान अत्यधिक गर्मी के संपर्क में आने से बच्चों के जन्म के समय कम वजन होने की संभावना भी बढ़ जाती है। इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रहे विषाक्त पदार्थों के संपर्क में आने से बच्चों के स्वास्थ्य पर और भी बुरा असर पड़ सकता है। मानसिक स्वास्थ्य भी इस संकट से प्रभावित होता है। बच्चों में अवसाद, चिंता, नींद संबंधी विकार और सीखने में कठिनाइयाँ जैसी समस्याएँ उभर सकती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चे वयस्कों की तुलना में जलवायु और पर्यावरणीय बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। वे बाढ़, सूखा, तूफान, और गर्मी जैसी चरम मौसम की घटनाओं से निपटने में वयस्कों से कम सक्षम होते हैं। इसके परिणामस्वरूप, बच्चों के लिए यह संकट उनके अस्तित्व, संरक्षण, विकास, और सामाजिक भागीदारी के मौलिक अधिकारों को प्रभावित करता है। जलवायु परिवर्तन के अन्य प्रभावों में बच्चों के अनाथ होने, तस्करी, बाल श्रम, शिक्षा और विकास के अवसरों की हानि, परिवार से अलग होना, बेघर होना, और मानसिक आघात शामिल हैं। यह संकट पूरी दुनिया में मौजूद है, लेकिन विशेष रूप से भारत जैसे विकासशील देशों में इसका प्रभाव अधिक है। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक प्रयासों की कमी ने इस संकट को और भी गंभीर बना दिया है। अमीर और शक्तिशाली देशों द्वारा इस मुद्दे को नजरअंदाज करना जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को और बढ़ावा दे रहा है। पिछले साल में ही जलवायु परिवर्तन के घातक प्रभावों ने पूरी दुनिया को चिंतित कर दिया है। अगर वैश्विक तापमान में और वृद्धि होती है, तो यह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक भयानक संकट बन सकता है। भारत को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए गंभीर कदम उठाने होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों और परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा प्रणालियाँ मजबूत हों, और बच्चों पर जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की पहचान की जाए। जलवायु परिवर्तन के कारण प्रभावित देशों को बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक मंचों पर अपनी प्रतिबद्धता बढ़ानी होगी। इसके साथ ही, जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का मूल्यांकन करने के लिए व्यापक शोध और अध्ययन की आवश्यकता है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसके प्रभाव दीर्घकालिक हो सकते हैं। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">समग्र रूप से, जलवायु परिवर्तन ने दुनिया के बच्चों के भविष्य को खतरे में डाल दिया है। अगर हमें इस संकट से बचना है, तो हमें जलवायु परिवर्तन को लेकर तत्काल कार्रवाई करनी होगी। यह केवल पर्यावरण का संकट नहीं है, बल्कि यह बच्चों के अस्तित्व, विकास, और शिक्षा का संकट भी है। हमें जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने के लिए ठोस नीतियों और वैश्विक सहयोग की आवश्यकता है। अगर हम अब भी चुप रहे, तो यह हमारे बच्चों और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ी नासमझी और अपराध साबित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>ललित गर्ग (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><a title="Turmeric Milk Benefit: दूध में हल्दी डालकर पीने के हैं अनोखे फायदे, जानें क्यों है ये हेल्थ के लिए वरदान" href="http://10.0.0.122:1245/haldi-wale-doodh-ke-fayde/">Turmeric Milk Benefit: दूध में हल्दी डालकर पीने के हैं अनोखे फायदे, जानें क्यों है ये हेल्थ के लिए व…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
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                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 03 Feb 2025 16:02:28 +0530</pubDate>
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                <title>Struggle and Passion: हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के छोटे से कस्बे की गरीब परिवार की बेटी नारी जगत के लिए बनी प्रेरणा</title>
                                    <description><![CDATA[हॉकी की ‘गोल मशीन’ के संघर्ष व सफलता की कहानी प्रतिभा और मेधा किसी की बपौती नहीं होती। जोश, जुनून और पक्के इरादे के साथ-साथ बेहतर मार्गदर्शन मिले, तो साधारण से साधारण व्यक्ति भी न केवल अपने लिए बल्कि अपने देश और समाज के लिए बहुत कुछ कर गुजरता है। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/kurukshetras-daughter-from-a-poor-family-became-an-inspiration-for-women/article-63765"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-10/rani-rampal-hockey.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">हॉकी की ‘गोल मशीन’ के संघर्ष व सफलता की कहानी</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रतिभा और मेधा किसी की बपौती नहीं होती। जोश, जुनून और पक्के इरादे के साथ-साथ बेहतर मार्गदर्शन मिले, तो साधारण से साधारण व्यक्ति भी न केवल अपने लिए बल्कि अपने देश और समाज के लिए बहुत कुछ कर गुजरता है। हरियाणा के कुरुक्षेत्र जिले के छोटे से कस्बे शाहबाद मारकंडा में 1994 में बहुत ही गरीब परिवार में पैदा हुई बेटी रानी रामपाल ने गरीबी, तंगहाली और समाज के तानों का मुंह तोड़ते हुए अपना ही नहीं, बल्कि देश का नाम रोशन किया और नारी जगत के लिए प्रेरणा बनी। Struggle and Passion</p>
<p style="text-align:justify;">बात महिला हाकी टीम की पूर्व कप्तान और हाकी की ‘गोल मशीन’ कही जाने वाली रानी रामपाल की है, जिन्होंने गत 24 अक्टूबर को हाकी से संन्यास लेने की घोषणा की है। याद रहे, उन्होंने हाकी खेलने से संन्यास लिया है, हाकी खिलाने से नहीं, क्योंकि वह इस समय भारत की जूनियर महिला हाकी टीम की कोच हैं। अब रानी रामपाल गोल नहीं करेंगी, बल्कि नई गोल मशीन तैयार करने का काम करेंगी। रानी रामपाल जिस त्याग, तपस्या और कठोर परिश्रम के बाद इस मुकाम पर पहुंची हैं, वह आज के युवाओं, विशेषकर महिलाओं के लिए प्रेरणादायक है। उनके पिता रामपाल ठेला-रेहड़ी चलाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे, और उनकी माता लोगों के घरों में काम करती थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">रानी रामपाल कहती हैं कि बचपन में उनके घर में गरीबी के चलते कई बार जब एक समय की रोटी मिल जाती, तो दूसरे समय की रोटी की आस नहीं होती थी। इस प्रकार से वह बचपन में कुपोषण का शिकार भी रहीं। इसके कारण ही बचपन में रानी रामपाल शरीर से बहुत दुबली-पतली थीं। उन्होंने पड़ोसी के घर पर टीवी पर हाकी मैच देखा, तो उनके मन में हाकी के प्रति जुनून पैदा हो गया। अगले ही दिन शाहबाद मारकंडा के हॉकी स्टेडियम में हाकी खेलने के लिए द्रोणाचार्य अवार्डी कोच बलदेव सिंह के पास पहुंची। तब कोच बलदेव सिंह ने कहा था कि आप बहुत दुबली-पतली हैं, हॉकी कैसे खेल पाओगी। फिर भी, कोच बलदेव सिंह ने उन्हें हौसला दिया और उत्साहित किया। इसके बाद रानी ने हॉकी स्टिक पकड़ी और अपने कोच बलदेव सिंह से हॉकी की बारीकियां सीखी।</p>
<h3>संघर्ष और जुनून: बेटियों को उनके सपने पूरे करने का अवसर दें</h3>
<p>रानी रामपाल का कहना है कि बलदेव सिंह ने उनकी जिंदगी बदल दी, और उनके द्वारा सिखाए गए हाकी के गुर की बदौलत उन्हें 14 वर्ष की आयु में 2008 में इंडियन जर्सी पहनने का मौका मिला और हॉकी में डेब्यू किया। यह हर भारतीय खिलाड़ी का सपना होता है। इसके बाद रानी रामपाल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा और 2010 में भारत की जूनियर हाकी टीम में देश के लिए खेली। 2017 के एशियन कप में गोल्ड, 2018 में सिल्वर और 2020 में इंडिया के लिए मेडल जीते। भारतीय टीम की कप्तान के रूप में टोकियो ओलंपिक 2020 में भाग लिया। हालांकि, भारतीय महिला हॉकी टीम मेडल जीतने से चूक गई और टीम को चौथे स्थान पर संतोष करना पड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">रानी रामपाल आगे कहती हैं कि जीवन में उन्हें सबसे ज्यादा गर्व तब हुआ जब 2020 में वह अपने पिता के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी से मिली थीं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने मेरे पिता को सीने से लगाकर कहा था, “मुझे रानी से भी ज्यादा आप पर गर्व है, क्योंकि जो आपने अपनी बेटी के लिए किया है, वो हर बाप अपनी बेटी के लिए करे।” रानी को अपने जीवन में खेल के दौरान कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा था।</p>
<p style="text-align:justify;">शुरूआती दौर में इंजरी के चलते लोगों ने यहां तक कह डाला था कि रानी शायद ही अब हाकी खेल पाए। इतना ही नहीं, समाज के कई प्रकार के ताने सहने पड़े। इसके बावजूद, उन्होंने हाकी खेली और 254 बेहतरीन हाकी मैच खेले तथा अंतरराष्ट्रीय मैचों में 205 गोल किए। तभी तो रानी रामपाल को हाकी की गोल मशीन कहा जाता है। रानी रामपाल को 2020 में भारत सरकार द्वारा मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार और अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उसी वर्ष, देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म श्री से भी सम्मानित किया गया। अपनी इस सफलता में रानी रामपाल उड़ीसा, हरियाणा और भारत सरकार के साथ-साथ भारतीय खेल प्राधिकरण का भी महत्वपूर्ण योगदान मानती हैं और धन्यवाद प्रकट करती हैं।</p>
<h3>16 साल के खेल करियर के बाद संन्यास लेने की घोषणा कर सबको चौंका दिया</h3>
<p style="text-align:justify;">रानी ने गत 24 अक्टूबर को 30 साल की उम्र में 16 साल के खेल करियर के बाद भावुक होते हुए हाकी खेल से संन्यास लेने की घोषणा कर सबको चौंका दिया। उन्होंने महिला हाकी इंडिया लीग में कोच के रूप में नई पारी का आगाज करने का भी ऐलान किया है। हाकी की गोल मशीन कही जाने वाली रानी रामपाल अब खुद मशीन न बनकर नई गोल मशीन तैयार करेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">रानी रामपाल का कहना है कि जब वे अपने शाहबाद मारकंडा आती हैं, तो लोग अपनी बेटियों को कहते हैं कि तुम्हें भी रानी जैसा बनना है। यह सुनकर ऐसा लगता है कि मैं अपने मकसद में कामयाब हो गई हूं। उनका कहना है कि वे हर माता-पिता से यही गुजारिश करेंगी कि वे अपनी बेटियों को उनके सपने पूरे करने का अवसर दें। एक दिन आपको उन पर गर्व होगा, और इस प्रकार से आगे और कई रानी पैदा होंगी, जो विभिन्न क्षेत्रों में देश का नाम रोशन करेंगी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>                                                                         सतीश मेहरा (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><a title="Haryana-Rajasthan Roadways: महिला पुलिसकर्मी ने 50 रुपये का बस टिकट नहीं लिया तो राजस्थान-हरियाणा के बीच चालान की जंग शुरू" href="http://10.0.0.122:1245/challan-war-between-rajasthan-and-haryana/">Haryana-Rajasthan Roadways: महिला पुलिसकर्मी ने 50 रुपये का बस टिकट नहीं लिया तो राजस्थान-हरियाणा के…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/kurukshetras-daughter-from-a-poor-family-became-an-inspiration-for-women/article-63765</link>
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                <pubDate>Mon, 28 Oct 2024 10:37:42 +0530</pubDate>
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                <title>Modi Sarkar : चुनौतीपूर्ण होगा मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल</title>
                                    <description><![CDATA[एक और इतिहास रचते हुए नरेन्द्र मोदी ने तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इसके साथ ही वह पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार तीसरा कार्यकाल हासिल करने वाले पहले प्रधानमंत्री बन गए। यह देश ही नहीं दुनिया के लिए एक अद्भुत एवं विलक्षण राजनीतिक घटना है, क्योंकि दुनिया में बहुत कम […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/modi-sarkar-third-term-will-be-challenging/article-58596"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/modi.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">एक और इतिहास रचते हुए नरेन्द्र मोदी ने तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। इसके साथ ही वह पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद लगातार तीसरा कार्यकाल हासिल करने वाले पहले प्रधानमंत्री बन गए। यह देश ही नहीं दुनिया के लिए एक अद्भुत एवं विलक्षण राजनीतिक घटना है, क्योंकि दुनिया में बहुत कम शासनाध्यक्षों को यह सौभाग्य प्राप्त हुआ। मोदी के इस तीसरे कार्यकाल पर देश-दुनिया की नजरें इसलिये भी टिकी हैं कि मोदी सरकार (Modi Sarkar) 3.0 का अजेंडा पिछली गठबंधन सरकारों से अलग होकर भी सशक्त है। 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य को लेकर काम करने वाली इस सरकार में 71 मंत्रियों ने प्रधानमंत्री के साथ शपथ ली। मोदी के करिश्माई नेतृत्व में पिछले दस साल में देश को विकास के कहीं ज्यादा ऊंचे मुकाम पर खड़े करते हुए दुनिया को चौंकाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">उम्मीद की जा रही है कि बिना बाधा एवं गठबंधन की शर्तों के वे देश-विकास के अपने एजेंडे को सफलतापूर्वक एक नई ऊंचाई देंगे। उनकी लोकसभा चुनाव-2024 की उपलब्धि की महत्ता इसलिये भी कम नहीं हो जाती, क्योंकि भाजपा बहुमत से कुछ ही दूर है। चूंकि सहयोगी दल मोदी सरकार को सहयोग और समर्थन देने के लिए प्रतिबद्ध हैं और मंत्रियों का चयन सुगम तरीके से हो गया इसलिए यह आशा की जाती है कि मोदी की तीसरी पारी भी सुगमता एवं त्वरित गति से चलेगी। इसका एक कारण यह भी है कि उनके पास व्यापक राजनीतिक अनुभव है और चुनौतियों का सामना करने की क्षमता तथा समन्वय की राजनीति करने का कौशल भी। गठबंधन दलों को भी समन्वय एवं सौहार्द का वातावरण बनाना जो उनके राजनीतिक हित में भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी के सामने चुनौतियां पूर्ण बहुमत के दौर में भी रही है और अब भी कायम है। इस राह पर दो बड़ी चुनौतियां खड़ी हैं, जिनकी अनदेखी करते हुए आगे बढ़ना मुमकिन नहीं है। ये हैं बेरोजगारी और असमानता। इंटरनैशनल लेबर आॅर्गनाइजेशन की इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट के मुताबिक देश में 80 प्रतिशत बेरोजगार युवा हैं। गरीब मुक्त भारत बनाने का लक्ष्य भी सामने हैं। पूर्व के दो कार्यकाल में मोदी ने इसमें बड़ी सफलता हासिल की है। जहां तक असमानता की बात है तो उसे अक्सर तेज विकास के आगे ज्यादा तवज्जो नहीं मिलती, लेकिन याद रखने की बात है कि तेज विकास को अगर टिकाऊ बनाना हो तो असमानता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी मौलिक सोच एवं दृष्टि से मोदी सरकार 3.0 का एजेंडा दुनिया में भारतीय अर्थव्यवस्था को एक चमकते सितारे के रूप में स्थापित करने एवं सुदृढ़ आर्थिक विकास के लिये आगे की राह दिखाने वाला होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">निश्चित रूप से भाजपा अपने सहयोगी दलों के प्रति उदार एवं समन्वयमूलक रवैया अपनाएगी। राजग की कोशिश है कि गठबंधन को मजबूत करके इस बार सशक्त होकर उभरे विपक्ष का मुकाबला किया जा सके। इतना तय है कि कांग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन अग्निवीर, समान नागरिक संहिता, बेरोजगारी व महंगाई जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राजग सरकार के लिये कड़ी चुनौती पेश करेगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>विचार</category>
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                <pubDate>Wed, 12 Jun 2024 11:15:32 +0530</pubDate>
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                <title>Dementia : बदलती जीवनशैली से डिमेंशिया से पीड़ित हो रहे बुजुर्ग</title>
                                    <description><![CDATA[Dementia डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा। जैसे जैसे बुजुर्गों की संख्या बढ़ने लगी है वैसे वैसे ही डिमेंशिया (Dementia) की बीमारी का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। डिमेंशिया के लिए बहुत कुछ हमारी आज की सामाजिक व्यवस्था व सामाजिक परिवेश बनता जा रहा है। एक ओर एकल परिवार, अपने में खोये रहना और दिन प्रतिदिन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/dementia/article-58559"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/whatsapp-image-2024-06-11-at-10.35.47-am.jpeg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:center;"><strong>Dementia</strong></h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा।</strong> जैसे जैसे बुजुर्गों की संख्या बढ़ने लगी है वैसे वैसे ही डिमेंशिया (Dementia) की बीमारी का खतरा भी बढ़ता जा रहा है। डिमेंशिया के लिए बहुत कुछ हमारी आज की सामाजिक व्यवस्था व सामाजिक परिवेश बनता जा रहा है। एक ओर एकल परिवार, अपने में खोये रहना और दिन प्रतिदिन की भागम भाग है तो दूसरी ओर पढ़ने पढ़ाने की आदत कम होना एक प्रमुख कारण है। गूगल गुरु ने तो सबकुछ बदल कर ही रख दिया है। दुनिया में डिमेंशिया प्रभावितों की संख्या में दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की माने तो अगले 25 सालों में डिमेंशिया की रोगियों की संख्या में तीन गुणा बढ़ोेतरी हो जाएगी। डिमेंशिया खासतौर से बुजुर्गों की होने वाली बीमारी है। इसमें मनोभ्रंस की स्थिति हो जाती है और भूलने या निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित होती है। इसमें बुजुर्ग धीरे धीरे अपनी याददास्त को खोने लगते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के संदर्भ में यह इसलिए गंभीर हो जाती है कि चीन और जापान की तरह भारत में भी आने वाले सालों में बुजुर्गों की संख्या अधिक हो जाएगी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के अनुसार दुनिया के देशों में डिमेंशिया की बीमारी से पांच करोड़ लोग जूझ रहे हैं। एक अध्ययन के अनुसार 2050 तक डिमेंशिया से प्रभावितों की संख्या 15 करोड़ से अधिक होने की संभावना है। दुनिया के देशों में हर साल करीब 10 लाख लोग इस बीमारी की गिरफ्त में आ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल एक समय लोगों में लिखने-लिखाने और पढ़ने-पढ़ाने की आदत होती थी। किस्सा गोई की परंपरा थी तो गांवों-शहरों में चौपालें होती थी। बड़े बुजुर्ग वहां बैठकर मौहल्ले में घटने वाली घटनाओं पर नजर रखते थे वहीं आपसी चर्चा, ताश, चौपड़, शतरंज आदि खेल, गाना-बजाना या इसी तरह की गतिविधियां चलती रहती थी। इसके अपने फायदें भी थे। बड़े बुजुर्गों की इस चौपाल से जहां मौहल्ले की सुरक्षा चाक चोबंद रहती थी वहीं मौहल्ले में असामाजिक गतिविधियों पर अंकुश लगता था। बडे-बुजुर्गों की व्यस्तता के साथ ही आपसी दुख दर्द को भी साझा किया जाता था तो समस्या के समाधान खोजने के साझा प्रयास होते थे। काफी हद तक मन का बोझ भी कम हो जाता था। पर आज हालात इसके ठीक विपरीत होते जा रहे हैं। चौपालों की परंपरा तो लगभग खत्म ही हो गई है। ले देकर ड्राइंम रुम संस्कृति रह गई है। उसमें भी अब सोशियल मीडिया और कम्प्यूटर-मोबाईल ने एक ही कमरें को अलग अलग हिस्सोें में बांट कर रख दिया है। सब अपने अपने मोबाईल पर अंगूलियां घुमाने में व्यस्त रहते हैं और एक दूसरे से बात करने, सुनने और सुनाने का तो समय ही नहीं रह गया है। इसके दुष्परिणाम भी सामने आने लगे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एक अध्ययन में सामने आया है कि लिखने-लिखाने और पढ़ने-पढ़ाने की आदत से बुजुर्गों को डिमेंशिया (Dementia) की बीमारी से काफी हद से बचाया जा सकता है। पढ़ने-पढ़ाने से व्यक्ति किताबों की दुनिया में खो जाता हैं। इससे उसे अलग तरह का ही अनुभव होता है। पढ़ने-पढ़ाने या लिखने लिखाने की आदत से डिमेंशिया की बीमारी का खतरा 11 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। जिसे हम हॉबी कहते हैं वह हॉबी यानी कि चित्रकारी, कुछ गाना बजाना, गुनगुनाना, अखबार पढ़ना, किताबों की दुनिया से जुड़ना आदि से भी डिमेंशिया के खतरे को कम किया जा सकता है। दरअसल जितना अधिक बुजुर्गों का गतिविधियों में इनवोल्वमेंट होगा उतनी ही अधिक संभावनाएं डिमेंशिया के खतरे को कम करने में होगी। परिवार जनों के साथ नियमित रूप से संवाद कायम रखने यानी कि हंसने बोलने, खेलने-खिलाने से भी डिमेंशिया का खतरा कम होता जाता है। इसके साथ ही बुजुर्गों का सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय हिस्सेदारी से भी बहुत कुछ राहत मिल सकती है। बुजुर्गों को किसी ना किसी गतिविधि से जोेड़कर उसमें सक्रिय किया जाता है तो डिमेंशिया के शिकार होने की संभावनाएं कम होती जाएगी। आज भूलने भुलाने की आदत तो युवाओं तक में देखने को मिलने लगी है। ऐसे में बुजुर्गों की सक्रियता को बनाए रखना आवश्यक हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">डिमेंशिया के बढ़ते खतरे को देखते हुए गैरसरकारी संगठनों, सामाजिक सस्थानों आदि को भी सक्रिय होना होगा क्योंकि आने वाले समय में यह समस्या और अधिक बढ़ेगी। ऐसे में मनोविश्लेषकों, चिकित्सकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं आदि को अधिक गंभीरता से प्रयास करने होंगे। एकल परिवार, नौकरी के कारण एक दूसरे से दूरी, प्रतिस्पर्धा के चलते अलग तरह की कुंठा और मानसिक परेशानी सबको परेशान करने लगी है। समय रहते इसका हल खोजना होगा।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 11 Jun 2024 10:58:49 +0530</pubDate>
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                <title>Youth : बच्चे देश का भविष्य हैं तो युवा निकट भविष्य</title>
                                    <description><![CDATA[बच्चे देश का भविष्य हैं तो युवा निकट भविष्यगत दशकों में जिन युवाओं (Youth) द्वारा राजनीति में प्रभावी प्रवेश लिया गया था, वे अब लगभग उम्रदराज होते जा रहे हैं। वर्तमान दौर के अधिकांश स्थापित राजनीतिज्ञ बीते समय में युवा नेता के रूप में राजनीति में वर्चस्व स्थापित किए हुए थे। समय की धारा का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/youth-are-the-near-future/article-58494"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/whatsapp-image-2024-06-09-at-10.48.38-am.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बच्चे देश का भविष्य हैं तो युवा निकट भविष्यगत दशकों में जिन युवाओं (Youth) द्वारा राजनीति में प्रभावी प्रवेश लिया गया था, वे अब लगभग उम्रदराज होते जा रहे हैं। वर्तमान दौर के अधिकांश स्थापित राजनीतिज्ञ बीते समय में युवा नेता के रूप में राजनीति में वर्चस्व स्थापित किए हुए थे। समय की धारा का प्रवाह निरंतर गतिमान होता है। इस आधार पर इन दिनों राजनीति में नए स्वरूप में युवाओं की एक नई पौध आकार लेती दिखाई देती है। यही नहीं अपितु इस पौध को व्यापक रूप से जनमत के बहुमत द्वारा स्वीकार भी किया गया है। ऐसी स्थिति में ऐसा प्रतीत होता है कि बुजुर्गवार नेता सत्ता और संगठन में अपने वर्चस्व का परित्याग करना नहीं चाहते। इसके चलते बहुत स्वाभाविक है कि विभिन्न राजनीतिक दलो में आंतरिक रूप से वर्चस्व की लड़ाई दिखाई दे। इस संदर्भ में राजनीतिक दलों का निर्णायक कदम, समय की मांग है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे भी राजनीति में सत्ता का रसास्वादन कर लेने के उपरांत कोई भी राजनेता इससे वंचित नहीं होना चाहता। यह भी एक मनोविज्ञान है कि राजनीति में एक दूसरे को धकेल कर अपनी जगह बनाने की मनोवृति दिखाई देती है। राजनीति में राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बढ़ती उम्र के साथ-साथ कम नहीं होती, अपितु बढ़ती ही चली जाती है। इन दिनों विशेष रूप से हिंदी भाषी राज्यों में उक्त परिस्थितियां राजनीतिक उलटफेर का कारण बनते हुए नजर आती है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति केवल कांग्रेस में ही है। दरअसल किसी न किसी रूप में हर किसी दल के समक्ष उक्त स्थिति निर्मित होना अवश्यंभावी है। बेहतर हो यदि विभिन्न राजनीतिक दल इन तमाम संदर्भों में अपना अभिमत ऐसा कोई संकट आने के पूर्व ही स्पष्ट रूप से घोषित कर देवें।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक योग्यता का प्रश्न है, पुरानी और नई पीढ़ी के पक्ष विपक्ष में अलग-अलग तर्कसम्मत दृष्टिकोण व्यक्त किए जा सकते हैं। लेकिन कुल मिलाकर किसी एक निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। दरअसल दोनों ही वर्ग में बेहतरीन तालमेल ही श्रेयस्कर होगा। इस संदर्भ में एक कदम आगे बढ़कर विभिन्न राजनीतिक दलों में सक्रिय राजनीति की अधिकतम आयु सीमा सुनिश्चित कर देनी चाहिए। यही नहीं अपितु सत्ता में भागीदारी होने पर भी पृथक रूप से एक निश्चित आयु सीमा निर्धारित कर देनी चाहिए। रहा सवाल वनवास का, तो वरिष्ठ नेताओं को दिशा निर्देशक के रूप में स्थापित किया जा सकता है । नए दौर में नई सोच की आज देश प्रदेश को जरूरत है। बीते दौर की राजनीति के पट्टी पहाड़े भी अब अप्रासंगिक सिद्ध हो रहे हैं। ऐसी स्थिति में समय रहते राजनीतिक दलों को संज्ञान ले लेना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे भी इस समय देश प्रदेश में युवा वर्ग की स्थानीय से लेकर शीर्ष स्तर तक राजनीति में सक्रिय भागीदारी नए आयाम स्थापित कर रही है। ऐसे में यदि सत्ता या संगठन का दामन संभाले बुजुर्गवार युवाओं के लिए स्थान रिक्त नहीं करेंगे, तो असंतोष तो पनपेगा ही। इस संदर्भ में यह गौर करने लायक है कि कल के युवा नेता आज वृद्धावस्था को प्राप्त करते जा रहे हैं लेकिन पदलिप्सा से उबरना नहीं चाहते। दरअसल इन्हें अपना मनोविज्ञान बदलने की जरूरत है। बेहतर हो यदि सक्रिय राजनीति में आयुबंधन हो न हो, लेकिन पदासीन होने की स्थिति में आयु बंधन का अनिवार्य रूप से पालन किया जाए। राजनीति में यह प्रयोग काफी हद तक सफल सिद्ध हो सकता है। सक्रिय राजनीति से विदाई का तरीका सम्मानजनक भी तो हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस समय देश-प्रदेश में युवा वर्ग की प्रधानता है। युवा मतदाता का स्वाभाविक रुझान युवा प्रत्याशी पर ही अधिक रहता है। हालांकि राजनीतिक प्रतिबद्धता भी अपनी जगह महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन करती है। जैसे-जैसे शिक्षा का विस्तार होता जा रहा है, वैसे-वैसे युवा वर्ग महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के परिपालन में सक्षम सिद्ध हो रहे हैं। यही नहीं अपितु निरंतर परिवर्तित दौर में राजनीति के तौर-तरीकों में भी व्यापक बदलाव आया है। कहीं-कहीं तो ऐसा प्रतीत होता है कि जहां अनुभव घुटने टेक देता है, वहां नई सोच कैसी भी परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम सिद्ध होती है। निश्चित रूप से तकनीकी दुनिया में युवाओं की बौद्धिक क्षमता में भी आमूलचूल परिवर्तन हुए हैं। विषयों को समझने की गहरी समझ युवा रखने लगे हैं। बावजूद इस सबके अनुभव के महत्व को भी दरकिनार नहीं किया जा सकता। ऐसे में सामंजस्य ही अंतिम समाधान हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर वर्तमान संदर्भों के चलते विभिन्न राजनीतिक दलों को उक्त विषय के बारे में स्पष्ट नीति घोषित कर देनी चाहिए। माना कि यह सब इतना आसान भी नहीं होगा लेकिन वर्तमान नेतृत्व को इस संदर्भ में दृढ़निश्चय करना जरूरी है। अन्यथा जो कुछ घटनाक्रम आज कांग्रेस में चलता दिखाई दे रहा है ,उसकी अन्य दलों में पुनरावृति होने की संभावना से एकदम इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में बेहतर यही रहेगा कि दोनों ही वर्ग को परस्पर एक दूसरे के पूरक के रूप में सक्रिय रखा जाए।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 09 Jun 2024 11:12:01 +0530</pubDate>
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                <title>Inflation, Unemployment : महंगाई, बेरोजगारी व असंतोष पर पाना होगा काबू</title>
                                    <description><![CDATA[Inflation and Unemployment ललित गर्ग। अठाहरवीं लोकसभा चुनाव के नतीजे भले ही अपने अंदर कई संदेशों को समेटे हुए हैं, भले ही भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला हो, भले ही इंडिया गठबंधन एक चुनौती के रूप में खड़ा हुआ हो, फिर भी तीसरी बार नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनते हुए नये […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/inflation-and-unemployment/article-58457"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-06/inflation.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>Inflation and Unemployment</strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>ललित गर्ग।</strong> अठाहरवीं लोकसभा चुनाव के नतीजे भले ही अपने अंदर कई संदेशों को समेटे हुए हैं, भले ही भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला हो, भले ही इंडिया गठबंधन एक चुनौती के रूप में खड़ा हुआ हो, फिर भी तीसरी बार नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बनते हुए नये भारत एवं सशक्त भारत को निर्मित करने के लिये वे पहले दो कार्यकाल से अधिक शक्ति, संकल्प एवं जिजीविषा के साथ आगे बढ़ रहे हैं। सीटों के लिहाज से भाजपा को भले ही नुकसान हुआ, लेकिन लगातार तीसरी बार वह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। ओडिशा और तेलंगाना में पार्टी ने अपने शानदार प्रदर्शन से सबको चौंकाया है। ओडिशा में लोकसभा ही नहीं, विधानसभा में भी पार्टी ने बीजू जनता दल का 24 साल से चला आ रहा वर्चस्व तोड़ा। अरुणाचल प्रदेश की 60 सदस्यीय विधानसभा चुनाव में 54 प्रतिशत मत और 46 सीटों के प्रचंड बहुमत के बल पर भाजपा सरकार बनाने में सफल हुई है। वहीं, गुजरात, छतीसगढ़ और मध्य प्रदेश भाजपा के गढ़ बने हुए हैं, जबकि देश की राजनीति में अब भी मोदी सबसे बड़े एवं वर्चस्वी नेता है। वे अब भी अपने चौंकाने वाले एवं आश्चर्य में डालने वाले विलक्षण एवं अनूठे फैसलों से राष्ट्र को विकास की नई उड़ान देते रहेंगे। भाजपा को कम सीटें मिले कारणों की समीक्षा एवं मंथन करते हुए अपनी हार के कारणों को सहजता एवं उदारता से स्वीकारना चाहिए एवं जिन गलतियों के कारण कम सीटें मिली, उन्हें दूर करना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बार के चुनाव को नियोजित एवं प्रभावी तरीके से सम्पन्न करने में चुनाव आयोग की भूमिका सराहनीय रही। भले ही इंडिया गठबंधन ने ईवीएम और चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगाकर देश एवं लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को कलंकित किया था। लेकिन चुनाव परिणाम ने न केवल इस प्रकार के भ्रामक, गुमराह करने वाली बातों एवं मिथकों को तोड़ दिया, बल्कि इसने भारत के जीवंत, बहुलतावादी, पंथनिरपेक्षी और स्वस्थ लोकतांत्रिक छवि को पुनर्स्थापित किया है। प्रधानमंत्री मोदी का अंधविरोध करने वाला वाम-जिहादी-सम्प्रदायवादी राजनीतिक समूह अपने इस वाहियात प्रलाप एवं राष्ट्र-विरोधी षड़यंत्र में कोई कमी नहीं छोड़ी। बावजूद इसके इंडिया गठबंधन के घटक दलों के लिये चुनाव परिणाम अनेक अर्थों में संतोषजनक रहे हैं। कांग्रेस के लिये यह चुनाव नये जीवन का वाहक बना हैं। वैसे भी एक आदर्श लोकतंत्र के लिये सशक्त विपक्ष का होना जरूरी है, यही लोकतंत्र को खूबसूरती देता है। भारतीय मतदाताओं ने इंडिया गठबंधन को विपक्षी भूमिका प्रभावी ढंग से निभाने का संदेश दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बार के चुनाव परिणाम अनेक राजनीतिक दलों के सामने भी अनेक प्रश्न खड़े किए हैं। कौन जेल में रहेगा, इसका फैसला अदालतें करती हैं। परंतु दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस चुनाव को अपने जेल के अंदर रहने या बाहर रहने का अधिकार मतदाताओं को सौंपा था, जिसका नतीजा यह रहा कि उनके शासित वाले दिल्ली में ‘आप’ का खाता तक नहीं खुला, तो वहीं उनकी पार्टी पंजाब में विधानसभा चुनाव-2022 का चमत्कार दोहराने में विफल हो गई और 13 में से केवल 3 सीटें ही जीत पाई। शरद पवार का राजनीतिक वारिस कौन और असली शिवसेना किसकी? क्या माया और ममता अब भी ताकतवर हैं? यह चुनाव ऐसे ही कई सवालों के साथ शुरू हुआ था। इनमें से कुछ के जवाब मिल गए हैं और कुछ के बाकी हैं। जिस तरह के नतीजे आए हैं, उससे यह संदेह भी पैदा हुआ है कि क्या देश में आर्थिक सुधार जारी रहेंगे? क्या देश विकास के पथ पर अग्रसर होता रहेगा? नीतिगत स्थिरता का क्या होगा? शायद इसी संदेह की वजह से शेयर बाजार में भारी गिरावट आई। लेकिन नरेन्द्र मोदी के पहले भाजपा मुख्यालय में दिये उद्बोधन एवं गठबंधन दलों के साथ हुई बैठक में इन सवालों के जवाब काफी हद तक मिल गए, जिससे शेयर बाजार ने भी तेजी पकड़ी है एवं भाजपा एवं सहयोगी दलों के कार्यकर्ताओं में उत्साह का संचार हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">गठबंधन सरकारों के कुछ सकारात्मक पक्ष होते हैं तो कुछ नकारात्मक पक्ष भी। गठबंधन सरकारों का नेतृत्व करने वाले को घटक दलों से समन्वय के साथ चलना होता है। इसमें समस्या तब आती है, जब घटक दल अनुचित मांगें मनवाने लगते हैं अथवा सौदेबाजी करने की कोशिश करते हैं या फिर अपने संकीर्ण हितों की पूर्ति के लिए दबाव की राजनीति करने लगते हैं। इन स्थितियों से निबटने के लिये मोदी सरकार पहले ही अन्य निर्दलयी सांसदों एवं अन्य राजनीतिक दलों को अपने साथ जोड़ने का उपक्रम कर रही है। सहयोगी दल अनुचित मांग एवं दबाव की बजाय अपने राज्य के राजनीतिक एवं आर्थिक हितों की चिंता करें, लेकिन ऐसा करते समय उन्हें राष्ट्रीय हितों को ओझल नहीं करना चाहिए। यह उन्हें भी सुनिश्चित करना चाहिए कि गठबंधन सरकार सुगम तरीके से चले।</p>
<p style="text-align:justify;">निश्चित ही मोदी सरकार के सामने चुनौतीपूर्ण स्थितियां हैं, जिस तरह महाभारत युद्ध में पांडवों के सामने जटिल स्थितियां थी। आज द्रोण नहीं तुष्टिकरण है, कृपाचार्य नहीं भ्रष्टाचार है, अश्वत्थामा नहीं आतंकवाद है, दुर्याेधन नहीं महत्वाकांक्षा एवं अनैतिकता है, शकुनि नहीं आंतरिक और वैश्विक षड्यंत्र है, राष्ट्रवाद नहीं समस्त प्रकार की विघटनकारी शक्तियां-भाषावाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, स्वार्थवाद आदि हैं और कर्ण नहीं कट्टरवाद है। साथ में महंगाई, बेरोजगारी, असंतोष आदि की अत्यंत जटिल समस्याएं भी हैं और अब भी भारत इनमें फंसा हुआ है। नरेन्द्र मोदी अपने तीसरे कार्यकाल में इन सबसे कैसे निपटेंगे यह तो समय ही बताएगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विचार</category>
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                <pubDate>Sat, 08 Jun 2024 10:45:50 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>Human Trafficking : मानव तस्करी के जाल में मासूम</title>
                                    <description><![CDATA[– Human Trafficking – हाल ही में सीमांचल एक्सप्रेस (12487) से 93 बच्चों को मानव तस्करी (Human Trafficking) के लिए राजस्थान और उत्तराखंड ले जाया जा रहा था। शुक्र है कि सभी बच्चों को प्रयागराज जंक्शन पर मानव तस्करों के चंगुल से सुरक्षित बचा लिया गया। इस मामले में नौ एजेंटों ने सीमांचल एक्सप्रेस के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/human-trafficking/article-57519"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/human-trafficking-1.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>– Human Trafficking –</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में सीमांचल एक्सप्रेस (12487) से 93 बच्चों को मानव तस्करी (Human Trafficking) के लिए राजस्थान और उत्तराखंड ले जाया जा रहा था। शुक्र है कि सभी बच्चों को प्रयागराज जंक्शन पर मानव तस्करों के चंगुल से सुरक्षित बचा लिया गया। इस मामले में नौ एजेंटों ने सीमांचल एक्सप्रेस के विभिन्न डिब्बों में छह समूहों में बाल तस्करी को अंजाम दिया, जो अपराध की परिष्कृत और संगठित प्रकृति को रेखांकित करता है। यह स्पष्ट है कि मानव तस्कर किस प्रकार बेखौफ होकर काम करते हैं, खुलेआम कानूनों का उल्लंघन करते हैं और हाशिए पर मौजूद लोगों को अपना शिकार बनाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे अनगिनत उदाहरणों के बारे में सोचना चिंताजनक है जब ऐसे मामलों का पता ही नहीं चल पाता और निर्दोष जिंदगियां शोषण और दुर्व्यवहार के चक्र में फंस जाती हैं। हालांकि, मानव तस्करी (Human Trafficking) अंतरराष्ट्रीय अपराध के सबसे तेजी से बढ़ते रूपों में से एक है। विश्व स्तर पर अनुमानित 25 मिलियन वयस्क और बच्चे आधुनिक दासता या मानव तस्करी के अधीन हैं। भारत में 2021 तक मानव तस्करी के करीब 7 हजार मामले सामने आ चुके हैं। मौजूदा मामले में बच्चों की उम्र सीमा 9 से 16 साल के बीच है। जीवन के जिस प्रारंभिक चरण में बच्चों का पालन-पोषण किया जाना चाहिए, उन्हें शिक्षित किया जाना चाहिए और आगे बढ़ने के अवसर दिए जाने चाहिए। इसके बजाय वे तस्करी की अंधेरी खाई में अपने अधिकारों, गरिमा और स्वतंत्रता से वंचित हो जाते हैं। मानव तस्करी सिर्फ एक अपराध नहीं है, यह बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन है। यह व्यक्तियों से उनकी स्वायत्तता, गरिमा और स्वतंत्रता छीन लेता है, उन्हें जबरन श्रम और यौन शोषण से लेकर अंग तस्करी और जबरन विवाह तक अकथनीय भयावहता का शिकार बनाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मानव तस्करी से निपटने के प्रयास बहुआयामी और सहयोगात्मक होने चाहिए। कानून प्रवर्तन एजेंसियों, सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों और समुदायों को तस्करी नेटवर्क को खत्म करने, अपराधियों पर मुकदमा चलाने और बचे लोगों को व्यापक सहायता प्रदान करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। इस जटिल मुद्दे को प्रभावी ढंग से संबोधित करने के लिए रोकथाम, सुरक्षा और अभियोजन साथ-साथ चलना चाहिए। निवारक उपायों को गरीबी, शिक्षा की कमी और सामाजिक असमानता जैसे असुरक्षा के मूल कारणों को संबोधित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। जोखिम वाले व्यक्तियों को शिक्षा, आर्थिक अवसर और सामाजिक सहायता नेटवर्क तक पहुंच प्रदान करने से शोषण के जोखिम को कम करने में मदद मिल सकती है। इसके अतिरिक्त समुदायों के भीतर जागरूकता बढ़ाने और सतर्कता को बढ़ावा देने से व्यक्तियों को तस्करी के मामलों को पहचानने और रिपोर्ट करने के लिए सशक्त बनाया जा सकता है। लिहाजा हम सभी को इस आधुनिक गुलामी को खत्म करने के अपने संकल्प में एकजुट होना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर बच्चे को उनकी परिस्थितियों के बावजूद सम्मान और स्वतंत्रता का जीवन जीने का अवसर मिले।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-देवेन्द्रराज सुथार</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 15 May 2024 10:17:40 +0530</pubDate>
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                <title>Youth Unemployment : आखिर कब दूर होगी युवाओं की उदासीनता </title>
                                    <description><![CDATA[चुनाव और युवा : आत्महत्या करने वालों में आर्थिक रूप से वंचित 75 प्रतिशत युवा हैं शामिल || Youth Unemployment Youth Unemployment: भारत के विदेश मंत्री ने हाल ही में एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र में लिखा कि यह अमृतकाल अर्थात एक सशक्त और समावेशी अर्थव्यवस्था का पहला आम चुनाव है और हमारे युवाओं को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/youth-unemployment-in-india/article-57480"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-05/employment-crisis-in-punjab-unemployment-rate-7.4.gif" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">
<h3 style="text-align:center;"><strong>चुनाव और युवा : आत्महत्या करने वालों में आर्थिक रूप से वंचित 75 प्रतिशत युवा हैं शामिल || Youth Unemployment</strong></h3>
<p>Youth Unemployment: भारत के विदेश मंत्री ने हाल ही में एक प्रमुख राष्ट्रीय समाचार पत्र में लिखा कि यह अमृतकाल अर्थात एक सशक्त और समावेशी अर्थव्यवस्था का पहला आम चुनाव है और हमारे युवाओं को इसके महत्व को समझना चाहिए। इसका तात्पर्य क्या है, यह वर्तमान सरकार को समझना होगा किंतु युवाओं के लिए यह स्पष्ट नहीं है क्योंकि शिक्षित या अशिक्षित वर्गों द्वारा इसके प्रभाव को पूर्णत: नहीं समझा गया। सरकार मानव संसाधनों को पोषित कर रही है और जीवन की जरूरतों की आसानी तथा उद्यमिता को बढावा दे रही है किंतु क्या यह पीढ़ी मानती है कि शब्दों और कार्यों में समानता नहीं है।</p>
<p>सामाजिक विश्लेषकों और युवा नेताओं के विचारों में यह चिंता स्पष्टत: दिखायी देती है कि दुर्भाग्य से सरकार समस्या के आयामों से अवगत नहीं है। हालांकि युवा जनसंख्या का सर्वाधिक गतिशील वर्ग माना जाता है। भारत में विश्व की सर्वाधिक युवा जनसंख्या है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के जनसंख्या आकलन के संबंध में प्रतिनिधि समूह की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर 25 से 29 आयु वर्ग के युवाओं की संख्या 2021 में कुल जनसंख्या का 27.2 प्रतिशत था 2036 तक इनकी संख्या कम होकर 22.7 प्रतिशत रह जाएगी किंतु संख्या की दृष्टि से यह अभी काफी अधिक 34.5 करोड है। किंतु यह दु:खद तथ्य है कि आम युवा चुनावी प्रक्रिया में रूचि नहीं लेता है और यह उसे अपनी आवाज को सुनाने के साधन के रूप में नहीं मानता।</p>
<p>सकल घरेलू उत्पाद की उच्च वृद्धि दर के माध्यम से इस बात को न्यायसंगत ठहराने का प्रयास किया जाता है किंतु ग्रामीण युवा कृषि को अलाभप्रद मान रहे हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे रोजगार (Youth Unemployment) उपलब्ध नहीं है। जेन नेक्सट में हताशा और निराशा है हालांकि इन विषयों पर इन चुनावों में चर्चा हो रही है किंतु इससे युवाओं में आशा नहीं जगी है कि नई सरकार उनके मुद्दों का निराकरण करेगी और इसका कारण भारत में बेरोजगारी के संबंध में अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की हालिया रिपोर्ट है जिसमें पाया गया है कि भारत में कुल बेरोजगारों में 83 प्रतिशत युवा हैं। इन बेरोजगार लोगों में युवाओं की संख्या 66 प्रतिशत है।</p>
<p>वस्तुत: विश्व में भारत में सर्वाधिक बेरोजगारी दर है। यहां पर हेडलाइन दर 23 प्रतिशत है। जिसके चलते भारत यमन, ईरान, लेबनान, सीरिया और ऐसे अन्य देशों की श्रेणी में आ गया है किंतु ये देश एक तेजी से बढ रही अर्थव्यवस्था या पांचवीं सबसे बडी का दावा नहीं करते हैं। हमारे छोटे पड़ोसी बंगलादेश में यह मात्र 12 प्रतिशत है। 20 से 24 वर्ष के आयु वर्ग मे बेरोजगारी दर 44 प्रतिशत है। इसलिए इस बात पर हैरानी नहीं होती है कि जिन लोगों का भविष्य दांव पर लगा है उनकी मतदान में कोई रूचि नहीं है।</p>
<p>वर्ष 2024 के चुनावों में लगभग 38 युवा मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं। बिहार, दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में कम संख्या में लोग मतदाता के रूप में पंजीकृत हो रहे हैं। एसोसिएशन फोर डेमोक्रेटिक रिफार्म ने स्पष्ट किया है कि चुनावी प्रक्रिया के बारे में युवाओं में संशय है। उनमें उदासीनता का कारण यह है कि अधिकतर राजनीतिक दलों में पर्याप्त युवा नेता नहीं है। राजनीतिक नेतृत्व उभरती सामाजिक और आर्थिक समस्याओं के बारे में चिंता प्रदर्शित नहीं करते हैं। बिहार में युवा मतदाताओं की कम संख्या के बारे में एक्शन फोर अकाउंटेबल गवर्नेस के राजीव कुमार का कहना है कि हालांकि बिहार में राजनीतिक जागरूकता है किंतु युवाओं में राजनीतिक नेतृत्व की प्रतिबद्धता के बारे में हताशा और निराशा है। इसलिए राजनीतिक दलों की गारंटी या वायदे से युवा पीढी प्रभावित नहीं हो रही है क्योंकि वे वास्तविक इरादों पर आधारित नहीं है।</p>
<p>सरकार द्वारा भ्रष्टाचार का मुकाबला करने की बातें की जाती हैं और इससे युवा पीढी इस सबंध में ठोस कार्यवाही के बजाय इसे एक नारे के रूप में देखती है। प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया है कि पिछले एक दशक में विभिन्न विकास नीतियों कार्यान्वयन पर 30 लाख करोड रूपए खर्च किए गए और लाभार्थियों को सीधे उनके खातों में पैसे दिए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि यह कांग्रेस के शासन से अलग है जिसने कभी दावा किया था कि यदि दिल्ली से एक रूपया भेजा जाता है तो गंतव्य तक केवल 1 पैसा पहुंचता है। आप कल्पना कीजिए कि यदि उनके नियंत्रण में 30 लाख करोड रूपए होंगे तो इसके क्या परिणाम होंगे। जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार यथावत है। क्या युवा इससे खुश होंगे? इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता है क्योंकि कारपोरेट जगत आटोमेशन की दिशा में बढ रहा है जिसके कारण रोजगार के अवसरों में और कटौती होगी।</p>
<p>राजनीतिक दलों को इस बारे में विचार करना चाहिए कि देश के प्रतिभाशाली युवा अपने मतदान के अधिकार का प्रयोग क्यों नहीं कर रहे हैं। इसका एकमात्र उपाय यह है कि ऐसी रणनीति या योजना बनाए जो उन्हें प्रेरित करे और युवा पीढी लाभप्रद कार्यो में संलिप्त हो जिससे सामंजस्यपूर्ण सामाजिक आर्थिक विकास होगा। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि रिक्त पडे सरकारी पदों को भरने के अलावा निजी सेक्टर में भी पर्याप्त पदों में भर्ती करे और अपनी श्रम शक्ति से अत्यधिक कार्य न करवाए।</p>
<p>जैसा कि कुछ अर्थशास्त्रियों ने सुझाव दिया है कि देश में बेरोजगारी (Youth Unemployment) भत्ता शुरू किया जाना चाहिए। जब बड़ी परियोजनाएं जिनके लाभार्थी युवा होते हैं, वे चलाई जा रही हैं तो फिर गरीब या आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए भत्ते के कार्यान्वयन में कोई समस्या नहीं हो सकती है और इसके लिए यदि आवश्यक हुआ तो अत्यधिक धनी वर्ग पर 1 प्रतिशत कर लगाया जाना चाहिए। किसी राष्ट्र की प्रगति उसकी युवा पीढ़ी पर निर्भर करती है। अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यक है कि वह युवा पीढ़ी की आवश्यकताओं की ओर ध्यान दे क्योंकि यही वह वर्ग है जो देश के भावी विकास में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>-धुर्जति मुखर्जी (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
</div>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
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                <pubDate>Tue, 14 May 2024 10:37:05 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>Mahua Moitra: फोन हैकिंग का बाजार फिर गरम</title>
                                    <description><![CDATA[तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra) समेत विपक्ष के 8 से ज्यादा नेताओं ने 31 अक्टूबर को केंद्र सरकार पर फोन हैकिंग का आरोप लगाया है। मामले में आईटी मंत्रालय की पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी एपल को समन भेजकर पूछताछ के लिए बुला सकती है। 31 अक्टूबर को महुआ मोइत्रा के अलावा कांग्रेस सांसद शशि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/phone-hacking-market-hot-again/article-54712"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/43-mobile-apps-banned.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">तृणमूल कांग्रेस सांसद महुआ मोइत्रा (Mahua Moitra) समेत विपक्ष के 8 से ज्यादा नेताओं ने 31 अक्टूबर को केंद्र सरकार पर फोन हैकिंग का आरोप लगाया है। मामले में आईटी मंत्रालय की पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी एपल को समन भेजकर पूछताछ के लिए बुला सकती है। 31 अक्टूबर को महुआ मोइत्रा के अलावा कांग्रेस सांसद शशि थरूर, पवन खेड़ा, आम आदमी पार्टी सांसद राघव चड्ढा ने सोशल मीडिया पर आईफोन का अलर्ट मैसेज पोस्ट कर लिखा- सरकार उनके फोन और ईमेल को हैक करवाने की कोशिश कर रही है। कुछ घंटे बाद राहुल गांधी भी कांग्रेस कार्यालय पहुंचे और कहा कि एपल की ओर से जो अलर्ट आया है, वो मेरे ऑफिस में सभी को मिला है।</p>
<h3>कथित तौर पर 300 से ज्यादा हस्तियों के फोन हैक किए</h3>
<p style="text-align:justify;">साल 2021 में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने बीजेपी पर स्पाईवेयर पेगासस के जरिए जासूसी करने का आरोप लगाया था। एमनेस्टी इंटरनेशनल और फॉरबिडेन स्टोरीज की एक रिपोर्ट के मुताबिक इजरायली कंपनी एनएसओ के पेगासस सॉफ्टवेयर से भारत में कथित तौर पर 300 से ज्यादा हस्तियों के फोन हैक किए थे। इनमें राजनेताओं, पत्रकारों और कई पूर्व प्रोफेसरों के फोन शामिल थे। राज्यसभा सांसद अमर सिंह ने 2006 में यूपीए सरकार और सोनिया गांधी पर फोन टैपिंग का आरोप लगाया था। उन्होंने दावा किया था इंटेलीजेंस ब्यूरो उनका फोन टैप कर रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाजपा ने मामले में जॉर्ज सोरोस फंडेड एक्सेस नाउ और आईफोन नोटिफिकेशन के बीच संबंध का संकेत दिया। बीजेपी आईटी विभाग प्रमुख अमित मालवीय मालवीय ने एक्स पर एक नेटिजन का पोस्ट किया गया थ्रेड भी शेयर किया। कहा कि यह एक दिलचस्प थ्रेड है जो जॉर्ज सोरोस फंडेड एक्सेस नाउ और ऐप्पल नोटिफिकेशन के बीच एक लिंक खींचता है। नोटिफिकेशन केवल विपक्षी नेताओं को मिला है। इसमें एक्सेस नाउ की भूमिका दिखाई देती है। मालवीय ने कहा कि इसमें कोई आश्चर्य नहीं है क्योंकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी सब कुछ छोड़ कर प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करने दौड़ पड़े। मालवीय ने कहा यहां भयावह साजिश देखें। थ्रेड में एक्सेस नाउ के भारत में बनाए गए नेटवर्क की डिटेल भी है। भाजपा नेता ने एक्स पर लिखा कि यदि आप परियों की कहानियों में भरोसा करते हैं, तो क्या आप सोचेंगे कि यह सब कुछ संयोग है।</p>
<h3>अलर्ट 150 देशों में भी भेजा गया</h3>
<p style="text-align:justify;">असल में, बहुराष्ट्रीय कंपनी एप्पल ने विपक्ष के कुछ नेताओं को अलर्ट भेजा कि आपके आईफोन हैक किए जा सकते हैं। हमलावर आपके फोन के संवेदनशील डाटा, कैमरे और माइक्रोफोन आदि तक पहुंचने की कोशिश भी कर सकते हैं। एप्पल ने यह अलर्ट सिर्फ विपक्षी नेताओं को ही नहीं भेजा, बल्कि ऐसे लोगों तक भी भेजा है, जो सार्वजनिक जीवन में नहीं हैं। कुछ पत्रकारों और स्कॉलर्स तक भी यह अलर्ट पहुंचा है। यह अलर्ट 150 देशों में भी भेजा गया है, जहां एप्पल के आईफोन इस्तेमाल किए जाते हैं। साफ मायने हैं कि यह चेतावनी वैश्विक है, लिहाजा विपक्षी नेताओं की चीखा-चिल्ली महज सियासत है।</p>
<p style="text-align:justify;">विवाद बढ़ने के बाद एपल ने कहा कि स्टेट स्पॉन्सर्ड अटैकर्स को बढ़िया फंड मिलता है और वे बहुत सॉफिस्टिकेटेड तरीके से काम करते हैं। उनके अटैक भी समय के साथ बेहतर होते जाते हैं। ऐसे हमलों का पता लगा पाने के लिए हमें थ्रेट इंटेलिजेंस सिग्नल पर निर्भर रहना पड़ता है, जो कि कई बार परफेक्ट नहीं होते या अधूरे रहते हैं। ये संभव है कि एपल के कुछ थ्रेट नोटिफिकेशन फाल्स अलार्म हों या कुछ अटैक को डिटेक्ट न किया जा सके। हम ये जानकारी दे पाने में अक्षम हैं कि किन कारणों से हम थ्रेट नोटिफिकेशन जारी करते हैं, क्योंकि ऐसा करने से स्टेट स्पॉन्सर्ड अटैकर्स अलर्ट हो जाएंगे और फिर वे अटैक करने के अपने तरीके ऐसे बदल लेंगे कि भविष्य में पकड़ में नहीं आ पाएंगे।</p>
<h3>एप्पल ने हैकिंग के ऐसे खतरों से निपटने वाले सिस्टम से इंकार किया</h3>
<p style="text-align:justify;">एप्पल ने अपने बयान में यह स्पष्टीकरण भी दिया है कि खुफिया संकेतों के आधार पर ऐसे अलर्ट आते हैं, जो अधूरे और गलत भी साबित हो सकते हैं। कंपनी ने सरकार द्वारा प्रायोजित हमलावरों की बात तो की है, लेकिन किसी ‘विशेष सरकार’ का खुलासा नहीं किया है। एप्पल ने हैकिंग के ऐसे खतरों से निपटने वाले सिस्टम से इंकार किया है। कंपनी यह भी नहीं बता सकती कि अलर्ट किन हालात में देना पड़ा, क्योंकि यह जानकारी देने से हैकर्स उससे बचने के रास्ते खोज सकते हैं। Mahua Moitra</p>
<p style="text-align:justify;">यानी स्पष्ट है कि फोन हैकर्स चीन, पाकिस्तान या किसी अन्य देश के भी हो सकते हैं! एप्पल ने एक ही समय, एक ही साथ, विपक्षी नेताओं और 150 देशों को यह चेतावनी-संदेश भेजा है, लिहाजा संदेहास्पद और सवालिया लगता है। यदि हैकिंग हुई है या की जा रही है, तो वह अलग-अलग स्थान पर, अलग-अलग समय में की जानी चाहिए। फिर भी मान सकते हैं कि मोदी सरकार ने विपक्ष के कुछ नेताओं और प्रवक्ताओं के फोन हैक कराए हैं, लेकिन 150 देशों और अराजनीतिक चेहरों के फोन हैक कराने में सरकार के सरोकार क्या हो सकते हैं? उनसे हासिल क्या होगा?</p>
<h3>सरकार ने इन आरोपों को पूरी गंभीरता से लिया है | Mahua Moitra</h3>
<p style="text-align:justify;">निश्चित ही किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की ओर से विपक्षी नेताओं की निजता भंग करने का कोई भी मामला सामने आता है, तो स्वाभाविक ही सरकार को घेरा जाना चाहिए एवं जबाव मांगा जाना चाहिए। लेकिन बिना बुनियाद के ऐसे विवाद खड़े करना उचित नहीं है। अच्छी बात इस मामले में यह है कि सरकार ने इन आरोपों को पूरी गंभीरता से लिया है और तत्परता से निर्णय लेते हुए न केवल पूरे मामले की विस्तृत जांच के आदेश दे दिए गए हैं बल्कि आईफोन कंपनी से भी जांच में शामिल होने को कहा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में 2 करोड़ से अधिक लोग आईफोन का इस्तेमाल करते हैं और दुनिया भर में करीब 146 करोड़ उपयोगकर्ता हैं। क्या ये सभी मोदी सरकार के निशाने पर हैं अथवा सभी को अलर्ट भेजा गया था? एप्पल को इस संदर्भ में तमाम स्पष्टीकरण देने चाहिए। बहरहाल केंद्रीय सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव की घोषणानुसार जांच शुरू कर दी गई है। एप्पल भी जांच के दायरे में होगी। एप्पल से कथित ‘राज्य-प्रायोजित हमलों’ पर वास्तविक और सटीक जानकारी मांगी गई है। इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम इसकी जांच कर तह तक जाने की कोशिश करेगी। मंत्री ने इसे भारत सरकार को बदनाम करने की साजिश और भटकाने वाली विपक्ष की राजनीति करार दिया है। ‘फोन में सेंधमारी’ कोई नया मुद्दा नहीं है। किसी की निजता और गोपनीयता पर हमला भी नहीं है। Mahua Moitra</p>
<h3>इस तरह का कोई भी काम पूर्ण रूप से असंवैधानिक व गैर कानूनी</h3>
<p style="text-align:justify;">भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। लोकतंत्र एक जीवित, निष्पक्ष एवं आदर्श तंत्र है, जिसमें सबको समान रूप से अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुसार चलने, गतिविधियों को संचालित करने की पूरी स्वतंत्रता है। लोकतंत्र की नींव ही निजता की सुरक्षा करने के सिद्धान्तों पर टिकी है, इस व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक संविधान के दायरे में स्वयंभू होता है। अत: इस मुद्दे पर विपक्षी नेताओं की चिन्ता वाजिब मानी जा सकती है मगर इसके साथ ही सरकार की तरफ से तत्परता से व्यक्त इस मामले में संलिप्त न होने की साफगोई बयान को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि सरकार ने इस मामले में तुरन्त कार्रवाई की है तो उसकी नीयत पर भी शक करने की कोई वजह दृष्टिगोचर नहीं होती। सरकार किसी की भी निजता को भंग करने का आरोप स्वयं कर लगता हुआ देख बिन बुलाये संकट को कैसे आमंत्रित कर सकती है? क्योंकि इस तरह का कोई भी काम पूर्ण रूप से असंवैधानिक व गैर कानूनी होती है। ऐसी अराजकता, अव्यवस्था एवं एकाधिपत्य लोकतंत्र का ही विलुप्त कर सकता है। Mahua Moitra</p>
<p style="text-align:right;"><strong>रोहित माहेश्वरी, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Semi-final World Cup: सेमीफाइनल में भिड़ सकते हैं भारत-पाक! जानें समीकरण" href="http://10.0.0.122:1245/india-pak-can-clash-in-the-semi-finals-learn-the-equation/">Semi-final World Cup: सेमीफाइनल में भिड़ सकते हैं भारत-पाक! जानें समीकरण</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/phone-hacking-market-hot-again/article-54712</link>
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                <pubDate>Thu, 09 Nov 2023 18:31:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>नागरिक अधिकार पत्र प्रशासन की पारदर्शिता को सुनिश्चित करता &amp;#8216;हथियार&amp;#8217;</title>
                                    <description><![CDATA[Good Governance: सुशासन प्रत्येक राष्ट्र के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है। सुशासन के लिए यह जरूरी है कि प्रशासन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही दोनों तत्व अनिवार्य रूप से विद्यमान हों। सिटिजन चार्टर (नागरिक अधिकार पत्र) एक ऐसा हथियार है जो कि प्रशासन की जवाबदेहिता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है। जिसके चलते प्रशासन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/citizens-charter-is-a-weapon-ensuring-transparency-of-administration/article-54550"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/good-governance.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Good Governance: सुशासन प्रत्येक राष्ट्र के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण तत्व है। सुशासन के लिए यह जरूरी है कि प्रशासन में पारदर्शिता तथा जवाबदेही दोनों तत्व अनिवार्य रूप से विद्यमान हों। सिटिजन चार्टर (नागरिक अधिकार पत्र) एक ऐसा हथियार है जो कि प्रशासन की जवाबदेहिता और पारदर्शिता को सुनिश्चित करता है। जिसके चलते प्रशासन का व्यवहार आम जनता (उपभोक्ताओं) के प्रति कहीं अधिक संवेदनशील रहता है। दूसरे अर्थों में प्रशासनिक तंत्र को अधिक जवाबदेह और जनकेन्द्रित बनाने की दिशा में किये गये प्रयासों में सिटिजन चार्टर एक महत्वपूर्ण नवाचार है। Citizen’s Charter</p>
<p style="text-align:justify;">दो टूक कहें तो इस अधिकार के मामले में कथनी और करनी में काफी हद तक अंतर रहा है। देश भर में विभिन्न सेवाओं के लिए सिटिजन चार्टर लागू करने के मामले में अगस्त 2018 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका पर सुनवाई करने से ही इंकार कर दिया था। शीर्ष अदालत का तर्क था कि संसद को इसे लागू करने के निर्देश दे सकते हैं। इस मामले को लेकर न्यायालय ने याचिकाकत्र्ता के लिए बोला कि वे सरकार के पास जायें जबकि सरकारों का हाल यह है कि इस मामले में सफल नहीं हो पा रहीं हैं। यूपी में पहली बार योगी सरकार बनने के बाद मुख्यमंत्री ने कहा था कि सिटिजन चार्टर को कड़ाई से लागू करेंगे पर स्थिति कितनी संतोषजनक है यह पड़ताल का विशय है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में कई वर्शों से आर्थिक विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई। इसके साथ ही साक्षरता दर में पर्याप्त वृद्धि हुई और लोगों में अधिकारों के प्रति जागरुकता आई। नागरिक और अधिकार और अधिक मुखर हो गये तथा प्रशासन को जवाबदेह बनाने में अपनी भूमिका भी सुनिश्चित की। अन्तर्राष्ट्रीय परिदृश्य में देखें तो विश्व का नागरिक पत्र के सम्बंध में पहला अभिनव प्रयोग 1991 में ब्रिटेन में किया गया जिसमें गुणवत्ता, विकल्प, मापदण्ड, मूल्य, जवाबदेही और पारदर्शिता मुख्य सिद्धांत निहित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">चूंकि सुशासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है ऐसे में शासन और प्रशासन की यह जिम्मेदारी बनती है कि जनता की मजबूती के लिए हर सम्भव प्रयास करें साथ ही व्यवस्था को पारदर्शी और जवाबदेह के साथ मूल्यपरक बनाये रखें। इसी तर्ज पर ऑस्ट्रेलिया में सेवा चार्टर 1997 में, बेल्जियम में 1992, कनाडा 1995 जबकि भारत में यह 1997 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में इसे मूर्त रूप देने का प्रयास किया गया। पुर्तगाल, स्पेन समेत दुनिया के तमाम देश नागरिक अधिकार पत्र को अपनाकर सुशासन की राह को समतल करने का प्रयास किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी सुशासन के मामले में कहीं अधिक गम्भीर दिखाई देते हैं परन्तु सर्विस फर्स्ट के अभाव में यह व्यवस्था कुछ हद तक आशातीत नहीं रही। हालांकि भारत सरकार द्वारा इसे लेकर एक व्यापक वेबसाइट भी तैयार की गई जिसका प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग द्वारा दशकों पहले लांच की गई थी। वैसे सुशासन को निर्धारित करने वाले तत्वों में राजनीतिक उत्तरदायित्व सबसे बड़ा है। यही राजनीतिक उत्तरदायित्व सिटिजन चार्टर को भी नियम संगत लागू कराने के प्रति जिम्मेदार है। सुशासन के निर्धारक तत्व मसलन नौकरशाही की जवाबदेहिता, मानव अधिकारों का संरक्षण, सरकार और सिविल सेवा सोसायटी के मध्य सहयोग, कानून का शासन आदि तभी लागू हो पायेंगे जब प्रशासन और जनता के अर्न्तसम्बंध पारदर्शी और संवेदनशील होंगे जिसमें सिटिजन चार्टर महत्वपूर्ण पहलू है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक लोकतांत्रिक देश में नागरिकों को सरकरी दफ्तरों में बिना रिश्वत दिए अपना कामकाज निपटाने के लिए यदि सात दशक तक इंतजार करना पड़े तो शायद यह गर्व का विषय तो नहीं होगा। जिस प्रकार सिटिजन चार्टर के मामले में राजनीतिक भ्रष्टाचार एवं प्रशासनिक संवेदनहीनता देखने को मिल रही है वह भी इस कानून के लिए ही रोड़ा रहा है। सूचना का अधिकार कानून के साथ अगर सिटिजन चार्टर भी कानूनी शक्ल, सूरत ले ले तो यह पारदर्शिता की दिशा में उठाया गया बेहतरीन कदम होगा और सुशासन की दृष्टि से एक सफल दृष्टिकोण करार दिया जायेगा। जिन राज्यों में पहले से सिटिजन चार्टर कानून अस्तित्व में है वहां कोई नये तरीके की अड़चन देखी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रशासनिक सुधार और लोक शिकायत विभाग ने नागरिक चार्टर का आंतरिक व बाहरी मूल्यांकन अधिक प्रभावी, परिणामपरक और वास्तविक तरीके से करने के लिए मानकीकृत मॉडल हेतु पेशेवेर एजेंसी की नियुक्ति दशकों पहले किया था। इस एजेंसी ने केन्द्र सरकार के पांच संगठनों और आन्ध्र प्रदेश, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश राज्य सरकारों के एक दर्जन से अधिक विभागों के चार्टरों के कार्यान्वयन का मूल्यांकन भी कुछ साल पहले किया था। रिपोर्ट में रहा कि अधिकांश मामलों में चार्टर परामर्श प्रक्रिया के जरिये नहीं बनाये गये। इनका पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं किया गया। नागरिक चार्टर के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए किसी प्रकार की कोई धनराशि निर्धारित नहीं की गई।</p>
<p style="text-align:justify;">उक्त मुख्य सिफारिशें यह परिलक्षित करती हैं कि सिटिजन चार्टर को लेकर लेकर जितनी बयानबाजी की गई उतना किया नहीं गया। यद्यपि सिटिजन चार्टर प्रशासनिक सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है तथापि भारत में यह अधिक प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहा। इसके कारण भी हतप्रभ करने वाले हैं। पहला यह कि सर्वमान्य प्रारूप का निर्धारण नहीं हो पाया, अभी भी कई सरकारी एजेंसियां इसका प्रयोग नहीं करती हैं। स्थानीय भाषा में इसे लेकर बढ़ावा न देना, इस मामले में उचित प्रशिक्षण का अभाव तथा जिसके लिए सिटिजन चार्टर बना वही नागरिक समाज भागीदारी के मामले में वंचित रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी की पुरानी सरकार सबका साथ, सबका विकास की अवधारणा से युक्त थी तब भी सिटिजन चार्टर को लेकर समस्याएं कम नहीं हुईं। उल्लेखनीय है कि भारत में नागरिक चार्टर की पहल 1997 में की गयी जो कई समस्याओं के कारण बाधा बनी रही। नागरिक चार्टर की पहल के कार्यान्वयन से आज तक के अनुभव यह बताते हैं कि इसकी कमियां भी बहुत कुछ सिखा रही हैं। जिन देशों ने इसे एक सतत् प्रक्रिया के तौर पर अपना लिया है वे सघन रूप से निरंतर परिवर्तन की राह पर हैं। जहां पर रणनीतिक और तकनीकी गलतियां हुई हैं वहां सुशासन भी डामाडोल हुआ है। चूंकि सुशासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है ऐसे में लोक सशक्तीकरण ही इसका मूल है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुशासन के भीतर और बाहर कई उपकरण हैं। सिटिजन चार्टर मुख्य हथियार है। सिटिजन चार्टर एक ऐसा माध्यम है जो जनता और सरकार के बीच विश्वास की स्थापना करने में अत्यंत सहायक है। एनसीजीजी का काम सुशासन के क्षेत्र में शोध करना और इसे लागू करने के लिए आसान तरीके विकसित करना है ताकि मंत्रालय आसानी से सुशासन सुधार को लागू कर सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारी कामकाज में पारदर्शिता, ई-ऑक्शन को बढ़ावा देना, अर्थव्यवस्था की समस्याओं का हल तलाशना, आधारभूत संरचना, निवेश पर जोर, जनता की उम्मीद पूरा करने पर ध्यान, नीतियों को तय समय सीमा में पूरा करना, इतना ही नहीं सरकारी नीतियों में निरंतरता, अधिकारियों का आत्मविश्वास बढ़ाना और शिक्षा, स्वास्थ, बिजली, पानी को प्राथमिकता देना ये सुशासनिक एजेंण्डे मोदी के सुशासन के प्रति झुकाव को दर्शाते हैं। लोकतंत्र नागरिकों से बनता है और सरकार अब नागरिकों पर शासन नहीं करती है बल्कि नागरिकों के साथ शासन करती है। ऐसे में नागरिक अधिकार पत्र को कानूनी रूप देकर लोकतंत्र के साथ-साथ सुशासन को भी सशक्त बनाया जाना चाहिए। Citizen’s Charter</p>
<p style="text-align:right;"><strong>सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ लेखक एवं प्रशासनिक चिंतक </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Ration Card News: ताऊ खट्टर ने दी राशन कार्ड धारकों को ये बड़ी सौगात!" href="http://10.0.0.122:1245/tau-khattar-gave-this-big-gift-to-the-ration-card-holders/">Ration Card News: ताऊ खट्टर ने दी राशन कार्ड धारकों को ये बड़ी सौगात!</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sun, 05 Nov 2023 16:24:40 +0530</pubDate>
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                <title>परिजनों को औपचारिक जानकारी न देना उठा रहा कतर की मंशा पर सवाल</title>
                                    <description><![CDATA[Death penalty in Qatar Indian marines: अरब देश कतर द्वारा भारत के 8 पूर्व नौसैनिकों को सजा-ए-मौत के फैसले से पूरा देश स्तब्ध है। सभी सैन्य अधिकारी कतर की राजधानी दोहा में ग्लोबल टेक्नालॉजी एंड कंसल्टेंसी नाम की निजी कंपनी में काम करते थे। यह कंपनी कतर की सेना को ट्रेनिंग और टेक्निकल कंसल्टेंसी सर्विस […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/death-penalty-in-qatar-indian-marines/article-54522"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/qatar-marin.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Death penalty in Qatar Indian marines: अरब देश कतर द्वारा भारत के 8 पूर्व नौसैनिकों को सजा-ए-मौत के फैसले से पूरा देश स्तब्ध है। सभी सैन्य अधिकारी कतर की राजधानी दोहा में ग्लोबल टेक्नालॉजी एंड कंसल्टेंसी नाम की निजी कंपनी में काम करते थे। यह कंपनी कतर की सेना को ट्रेनिंग और टेक्निकल कंसल्टेंसी सर्विस प्रोवाइड कराती है। ओमान एयरफोर्स के रिटायर्ड स्क्वॉड्रन लीडर खमिस अल अजमी इसके प्रमुख है। कतर की इंटेलिजेंस के स्टेट सिक्योरिटी ब्यूरों ने इनको 30 अगस्त, 2022 को गिरफ्तार किया था।</p>
<h3>कई बार जमानत याचिकाएं लगाई लेकिन जमानत नहीं</h3>
<p style="text-align:justify;">कतर का आरोप है कि भारत के पूर्व सैन्य अधिकारी कतर के हाइटेक सबमरीन प्रोगाम की गोपनीय जानकारी इजरायल को दे रहे थे। इस मामले में कंपनी के मालिक को भी गिरफ्तार किया गया था जिसे बाद में रिहा कर दिया गया। दोहा में भारतीय दूतावास को करीब एक माह बाद सिंतबर के मध्य में पहली बार इनकी गिरफ्तारी के बारे में बताया गया। इसी साल मार्च में लीगल एक्शन शुरू हुआ। गिरफ्तार अधिकारियों ने कई बार जमानत याचिकाएं लगाई लेकिन जमानत नहीं मिली। अब पिछले गुरूवार को अचानक इनको दोषी मानते हुए मृत्यु दंड की सजा का ऐलान कर दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय दूतावास के अधिकारियों के संपर्क के बाद जिस तरह से इन अधिकारियों को काउंसलर एक्सेस (परिजनों से बात करने की सुविधा) प्रदान की तो ऐसा लग रहा था कि कतर इस मामले में नरम रुख अपना रहा है। लेकिन अब यकायक मौत की सजा का ऐलान कर भारत को सकते में डाल दिया। कतर सरकार ने आरोपों को सार्वजनिक नहीं किया है। न ही परिवारजनों को आरोपों की कोई औपचारिक जानकारी दी गई है। ऐसे में कतर की मंशा पर सवाल उठ रहे हैं। कतर का दावा है कि उसके पास पर्याप्त सबूत हैं। जिन्हें इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के जरिए प्राप्त किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि अगर कतर के पास गिरफ्तार भारतीय अधिकारियों के खिलाफ कोई सबूत हैं, तो वह उसे भारत सरकार के साथ साझा क्यों नहीं कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर वास्तव में कतर सरकार के पास कोई सबूत है, तो वह इन सबूतों को विश्व समुदाय के सामने रखकर अपने खिलाफ बन रहे परसेप्शन को क्यों नहीं रोक रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि हमास पर भारत के रूख से क्षुब्ध होकर कतर ने यह फैंसला लिया हो। कहा तो यह भी जा रहा है कि भारत के पूर्व नौसैनिक अधिकारियों की फांसी का ऐलान कर कतर भारत के साथ सौदे-बाजी के मनसुबे पाल रहा है। कतर की ओर से पूरे मामले में जिस तरह से भारत सरकार को अंधरे में रखकर हीलाहवाली की गई उससे भी सजा के फैसले पर सवाल खड़े हो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा है कि उसे फैंसले के विस्तृत ब्यौरे का इंतजार हैं। और वह सभी कानूनी रास्ते तलाश रहा है। विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे को कतर के अधिकारियों के सामने उठाने व गिरफ्तार अधिकारियों को काउंसलर एक्सेस मिलते रहने की बात भी कही है। लेकिन अहम सवाल यह है कि भारत इस मामले में क्या कर सकता है। हालांकि, गिरफ्तार अधिकारियों को छुड़ाने के लिए भारत के पास अभी बहुत सारे कानूनी और कूटनीतिक विकल्प है, लेकिन सवाल यही है कि भारत कतर पर दबाव बना पाने में कितना सफल होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कतर सरकार ने चाहे भारत के पूर्व सैन्य अधिकारियों के लिए मृत्यु दंड की सजा का ऐलान कर दिया हो लेकिन सजा को लागू करना उसके लिए आसान नहीं है। भारत के पास कई विकल्प हैं। प्रथम, निचली अदालत के फैसले को भारत के राजनयिकों द्वारा वहां की ऊपरी अदालत मे चुनौती दी जा सकती हैं। राष्ट्रद्रोह के कई मामलों में कतर की सर्वोच अदालत ने मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदला है। साल 2014 में फिलिपींस के एक नागरिक को भी इसी तरह से मौत की सजा सुनाई गई थी। फिलिपींस सरकार द्वारा कतर की सर्वोच अदालत में अपील किए जाने पर अदालत ने मौत की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया था।</p>
<h3>खाद्य आपूर्ति मामले में कतर काफी हद तक भारत पर निर्भर</h3>
<p style="text-align:justify;">द्वितीय, कतर की अदालत के इस फैंसले को भारत इंटरनेशन कोर्ट ऑफ जस्टिस (आईसीजे) में चैलेंज कर सकता है। कुलभुषण जाधव के मामले में भी भारत ने पाकिस्तान की अदालत के निर्णय के विरूद्ध आईसीजे में गुहार लगाई थी। कोर्ट ने जाधव की सजा पर रोक लगा दी थी। तृतीय, व्यापार संबंधों के जरिए भी भारत कतर को झुकने के लिए मजबूर कर सकता है। 2021-22 में दोनों देशों के बीच 15.03 बिलियन डॉलर का व्यापार हुआ। भारत को स्पेशल करोबारी दोस्त के तौर पर ट्रीट करने वाला कतर भारत को 13.19 बिलियन डॉलर का निर्यात करता है। जबकि कतर भारत से महज 1.83 बिलियन डॉलर का आयात करता है। कारोबारी पलड़ा कतर के पक्ष में झुका हुआ है। इसके अलावा भारत अपनी कुल आवश्यकता की 90 फीसदी गैस कतर से आयात करता है। दूसरी ओर खाद्य आपूर्ति के मामले में कतर काफी हद तक भारत पर निर्भर है। लिहाज भारत कतर पर दबाव बना सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चतुर्थ, पूरे मामले को भारत कूटनीति के जरिए भी हल कर सकता है। कतर के साथ भारत के अच्छे संबंध है। साल 2017 में जब गल्फ कॉरपोरेशन काउंसिल ने कतर पर आतंकवाद के समर्थन का आरोप लगाकर काउंसिल से बाहर कर दिया था उस वक्त भारत ने बिना किसी शर्त कतर को अनाज भेजा था। मिडिल ईस्ट के कई देशों से भरत के संबंध अच्छे है। भारत इनके जरिए भी कतर पर दबाव बना सकता है। पंचम, कतर की कुल 25 लाख की आबादी में से 6.5 लाख भारतीय है। 6000 से ज्यादा छोटी-बड़ी भारतीय कंपनियां कतर में कारोबार कर रही हैं। कतर के विकास और उसकी इकॉनमी में भारतीयों की बड़ी भूमिका है। ऐसे में भारत कतर के साथ रिश्तों का उपयोग कर सकता है। व्यक्तिगत तौर पर कतर के अमीर के साथ हमारे प्रधानमंत्री के अच्छे संबंध है। जरूरत पड़ने पर प्रधानमंत्री भी इस मामले में हस्तक्षेप कर सकते हैं। Death Penalty In Qatar</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक कतर-भारत संबंधों का सवाल है तो वर्ष 1973 में दोनों देशों के बीच राजनयिक संबंधों की शुरूआत हुई। दोहा में भारत का दुतावास है। जबकि कतर का नई दिल्ली में दुतावास और मुंबई में वाणिज्य दूतावास है। मार्च 2015 में कतर के अमीर तमीम बिन हमद अल थानी भारत यात्रा पर आए थे। इसके बाद जून 2016 में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी कतर गए थे। राजनयिक दृष्टि से दोनों देशों के संबंध हमेशा से मधुर रहे हैं, ऐसा भी नहीं है। जाकिर नायिक व भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के मामले में दोनों देशों के रिश्तों में कड़वाहट घुलती दिखाई दी। कुल मिलाकर कतर के साथ हमारे रिश्ते अच्छे हैं। ऐसे में भारत को कानूनी दांव पेंच से अधिक कूटनीतिक कौशल से समाधान का मार्ग तलाशना चाहिए।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. एन.के. सोमानी, अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Coconut Oil for Wrinkles: ऐसी चीज, जो रातों-रात गायब कर देगी झुर्रियां! हमेशा खिली-खिली और जवां दिखेगी त्वचा !" href="http://10.0.0.122:1245/such-a-thing-which-will-make-wrinkles-disappear-overnight/">Coconut Oil for Wrinkles: ऐसी चीज, जो रातों-रात गायब कर देगी झुर्रियां! हमेशा खिली-खिली और जवां दिखे…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sat, 04 Nov 2023 17:50:01 +0530</pubDate>
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                <title>Joe Biden in Israel: विश्व शांति के लिए सार्थक प्रयास करें देश!</title>
                                    <description><![CDATA[Joe Biden in Israel: दुनिया के सबसे ज्यादा सुरक्षा घेरे में रहने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति का युद्धग्रस्त इजराइल में जाना कोई आम बात नहीं है। इसके पीछे कोई बड़ा और विशेष मकसद है। अमेरिका कोई भी ऐसा जोखिम नहीं लेता जिसमें उसका फायदा न हो। सन् 1973 में अरब देशों ने इजराइल पर हमले […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/countries-should-make-meaningful-efforts-for-world-peace/article-53878"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-10/joe-biden.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Joe Biden in Israel: दुनिया के सबसे ज्यादा सुरक्षा घेरे में रहने वाले अमेरिका के राष्ट्रपति का युद्धग्रस्त इजराइल में जाना कोई आम बात नहीं है। इसके पीछे कोई बड़ा और विशेष मकसद है। अमेरिका कोई भी ऐसा जोखिम नहीं लेता जिसमें उसका फायदा न हो। सन् 1973 में अरब देशों ने इजराइल पर हमले किए। इस दौरान अमेरिका और कुछ अन्य देश खुलकर इजराइल के समर्थन में आए। अरब देशों ने प्रतिक्रिया स्वरूप अमेरिका पर तेल प्रतिबंध लगा दिए, जिससे अमेरिका को महसूस हुआ कि फिलिस्तीनी राज्य की मांग का स्थायी समाधान अमेरिका के हित में है। Israel News</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन ओस्लो के समझौते के बाद अमेरिका ने फिलिस्तीन राज्य के मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया था। इजराइल भी इस मामले को दबाकर रखना चाहता था। इसी कारण सन् 2014 के बाद से इजराइल ने कभी भी फिलिस्तीन से बातचीत नहीं की। हमास इस बात से खफा था उसे लगता था कि दुनिया का ध्यान फिलिस्तीन मुद्दे की तरफ खिंचने का एकमात्र मार्ग युद्ध है और इसके लिए उसने एक बड़े फिलिस्तीनी युवा वर्ग को अपने पक्ष में कर लिया। हमास को लगता था कि दुनिया के दबाव में इजराइल इतना उग्र रूख नहीं अपनाएगा। यही गलती हमास को भारी पड़ी।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका ने इजराइल को खुला समर्थन दे दिया। दूसरी तरफ अमेरिका ने अपने विदेश मंत्री ब्लिंकन को इजराइल भेजकर युद्ध को तीव्र होने से रोका क्योंकि इजराइल गाजा पर जमीनी मार करने के लिए सेना भेज रहा था। तीसरा अमेरिका ने गाजा के निवासियों को सुरक्षित बाहर निकलने का समय और रास्ता दिलाया। इन प्रयासों से अमेरिका ने एक रणनीति के तहत ईरान को सीधे युद्ध में कूदने से रोक लिया। अब अमेरिकी राष्ट्रपति ने इजराइल में आकर जहां इजराइल को खुश कर लिया वहीं अरब देशों को भी यह संदेश देने की कोशिश की कि उसके प्रयासों से फिलिस्तीनी नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका का यह प्रयास बेशक इजराइल-फिलिस्तीन मसले को पहले की तरह लटकाने का हो लेकिन इजराइल की यह कोशिश होगी कि हमास का नामोनिशान मिट जाए और भविष्य में कोई भी हमास जैसा दुस्साहस न कर सके। लेकिन फिलिस्तीनी नेता यासिर अराफात की कही बात को याद रखना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा था कि फिलिस्तीनी वो नहीं है जो म्यूजियम में एक निशानी या यादगार बनकर रह जाएंगे। जब तक फिलिस्तीन का स्थाई हल नहीं होता कोई भी टालमटोल की नीति मध्यपूर्व में स्थायी शांति बहाल नहीं कर सकती। अमेरिका समेत अन्य देशों को भी अपने स्वार्थों से ऊपर उठकर न केवल मध्य पूर्व बल्कि विश्व शांति के लिए टालमटोल की नीति को छोड़कर सार्थक प्रयास करने चाहिए। Israel News</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 19 Oct 2023 16:39:20 +0530</pubDate>
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