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                <title>crisis - Sach Kahoon Hindi</title>
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                            <item>
                <title>श्रीलंका में लगी इमरजेंसी, भारत ने मदद के लिए बढ़ाया हाथ</title>
                                    <description><![CDATA[भारत ने 40 हजार टन डीजल भेजा, चावल भेजने की तैयारी कोलंबो (एजेंसी)। श्रीलंका सरकार ने राष्ट्रपति भवन के बाहर लोगों के उग्र प्रदर्शन के एक दिन बाद देशव्यापी आपातकाल (Emergency in Sri Lanka) की घोषणा कर दी है। श्रीलंका मीडिया ने शनिवार को रिपोर्ट में यह जानकारी दी। राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने कहा कि […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/emergency-in-sri-lanka-india-extended-its-helping-hand/article-32004"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-04/emergency-in-sri-lanka.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;"><strong>भारत ने 40 हजार टन डीजल भेजा, चावल भेजने की तैयारी</strong></h3>
<p style="text-align:justify;"><strong>कोलंबो (एजेंसी)।</strong> श्रीलंका सरकार ने राष्ट्रपति भवन के बाहर लोगों के उग्र प्रदर्शन के एक दिन बाद देशव्यापी आपातकाल (Emergency in Sri Lanka) की घोषणा कर दी है। श्रीलंका मीडिया ने शनिवार को रिपोर्ट में यह जानकारी दी। राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने कहा कि लोगों की सुरक्षा और जरूरी सामान का आपूर्ति सुचारू रखने के साथ व्यवस्था बनाये रखने के लिए आपातकाल की घोषणा की गयी है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में लोगों को राशन की सुविधा सुचारू रूप से मुहैया कराने पहले सेना को पेट्रोल स्टेशनों पर तैनात किया गया और किसी भी संदिग्ध को बिना वारंट के ही गिरफ्तार करने का भी अधिकार दिया गया। वहीं भारत ने शनिवार को 40,000 टन डीजल श्रीलंका भेजा। सीलोन पेट्रोलियम कॉपोर्रेशन के अध्यक्ष सुमित विजेसिंघे ने कहा कि जल्द ही ईंधन का वितरण शुरू हो जाएगा। उन्होंने कहा कि श्रीलंका (Emergency in Sri Lanka) भर में सैकड़ों ईंधन स्टेशनों के लिए यह अच्छा समाचार है, जहां पिछले कुछ दिनों से इसकी आपूर्ति नहीं थी।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के मुताबिक, 40 हजार टन चावल की खेप भी भारत से श्रीलंका भेजने के लिए तैयार की जा रही है। दोनों देशों ने पिछले महीने 1 बिलियन डॉलर के ऋण समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। इसके बाद भारत की ओर से श्रीलंका को यह पहली बड़ी खाद्य सहायता होगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;">दशकों में सबसे खराब आर्थिक संकट से जूझ रहा श्रीलंका</h4>
<p style="text-align:justify;">डीजल शिपमेंट श्रीलंकाई सरकार के लिए अतिरिक्त 500 मिलियन डॉलर की ईंधन सहायता का हिस्सा है। श्रीलंका दशकों में अपने सबसे खराब आर्थिक संकट से निपटने के लिए संघर्ष कर रहा है। यहां खाद्य और आवश्यक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं। देश में इस सप्ताह पेट्रोल और डीजल की कमी हो गई है, जिससे फिलिंग स्टेशनों पर सशस्त्र सैनिकों की तैनाती करनी पड़ी। साथ ही यहां 13 घंटे तक बिजली कटौती हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे ने आर्थिक संकट को लेकर देशभर में जारी प्रदर्शनों के बीच राष्ट्रव्यापी सार्वजनिक आपातकाल लगाने की घोषणा की है। राजपक्षे ने शुक्रवार देर रात एक विशेष गजट अधिसूचना जारी कर श्रीलंका में एक अप्रैल से तत्काल प्रभाव से सार्वजनिक आपातकाल लागू करने की घोषणा की।</p>
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                                                            <category>अंतरराष्ट्रीय ख़बरें</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Apr 2022 17:05:36 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>कराबख संकट से 90000 से ज्यादा लोग बेघर हुएः अर्मेनियाई विदेश मंत्री</title>
                                    <description><![CDATA[वाशिंगटन। अर्मेनिया के विदेश मंत्री जोहराब मन्त्सकनयन ने कहा है कि हाल ही में अजरबैजान के साथ नागोरनो कराबख में हुए संघर्ष के कारण 90000 से ज्यादा लोग बेघर हो गए और शरणार्थी बन गए। मन्त्सकनयन ने कहा, “करीब 90000 लोग हैं जो विस्थापित हुए हैं और उनका घर तथा संपत्ति छिन गयी है।” उन्होंने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/over-90000-people-left-homeless-due-to-karabakh-crisis-armenian-foreign-minister/article-19450"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/zohrab-mnatsakanyan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन।</strong> अर्मेनिया के विदेश मंत्री जोहराब मन्त्सकनयन ने कहा है कि हाल ही में अजरबैजान के साथ नागोरनो कराबख में हुए संघर्ष के कारण 90000 से ज्यादा लोग बेघर हो गए और शरणार्थी बन गए। मन्त्सकनयन ने कहा, “करीब 90000 लोग हैं जो विस्थापित हुए हैं और उनका घर तथा संपत्ति छिन गयी है।” उन्होंने कहा कि इस दौरान करीब 8000 आधारभूत संरचनाओं को नुकसान पहुंचा है।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>अंतरराष्ट्रीय ख़बरें</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 24 Oct 2020 11:14:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>बंजर होती भूमि गंभीर संकट का संकेत</title>
                                    <description><![CDATA[सेंटर फॉर साइंस एण्ड एनवायरमेंट की हालिया रिपोर्ट बेहद चेताने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में उपजाऊ भूमि निरंतर कम होती जा रही है वहीं बंजर भूमि का दायरा बढ़ता जा रहा है। इससे पहले 2017 में वार्षिक रिपोर्ट में 32 फीसदी भूमि के बंजर होने की चेतावनी पहले ही आ चुकी है। दरअसल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/barren-land-sign-of-serious-crisis/article-10441"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-09/barren-land-sign-of-serious-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सेंटर फॉर साइंस एण्ड एनवायरमेंट की हालिया रिपोर्ट बेहद चेताने वाली है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में उपजाऊ भूमि निरंतर कम होती जा रही है वहीं बंजर भूमि का दायरा बढ़ता जा रहा है। इससे पहले 2017 में वार्षिक रिपोर्ट में 32 फीसदी भूमि के बंजर होने की चेतावनी पहले ही आ चुकी है। दरअसल समूची दुनिया में खेती योग्य उपजाऊ भूमि का दायरा कम होता जा रहा है। एक और दुनिया के देशों में सामने भुखमरी से निजात दिलाने की बड़ी चुनौती है। हालिया रिपोर्टों में दुनिया के देशों में भुखमरी और कुपोषण के आंकड़े बढ़ने के समाचार हैं वहीं यह अवश्य संतोष की बात है कि देश में सरकारी और गैरसरकारी प्रयासों से कुपोषण में कमी आई है। पर कुपोषण में कमी के बावजूद जंक फूड और खान-पान की तरीकों में बदलाव से सेहत के लिए नुकसान दायक मोटापा और अन्य बीमारियों का दायरा बढ़ना अपने आप में चिंतनीय है। हांलाकि सरकार किसानों की आय को दोगुना करने के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">किसान और खेती को प्रोत्साहित करने के उपाय किए जा रहे हैं। रसायनों के अत्यधिक प्रयोग से होने वाले नुकसान से जनजागृति लाई जा रही है वहीं अभियान चलाकर किसानों को जैविक खेती अपनाने को प्रेरित किया जा रहा है। अब तो जीरो बजट खेती की बात की जाने लगी है। किसानों को खेती के साथ ही पशुपालन अपनाने को प्रेरित किया जा रहा है पर जो रिपोर्ट आई है वह निश्चित रुप से चिंतनीय है।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के अनुसार देश में 32 प्रतिशत भूमि बंजर होने के कगार पर माना जा रहा है। देश के 26 राज्यों में भूमि के बंजर होने का खतरा बढ़ता जा रहा है। राज्यों में 2007 से 2017 के दौरान भूमि के बंजर होने के जो संकेत मिल रहे है और जो इजाफा हो रहा है वह गंभीर संकट की और इशारा करता है। भूमि की बंजरता के प्रमुख कारण प्रर्यावरणीय है। पर्यावरणीय प्रदूषण के परिणाम सामने आने लगे हैं। स्थिति की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि दुनिया के देशों के कॉप सम्मेलन में स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2.6 करोड़ हैक्टयर भूमि का उपजाऊ बनाने का लक्ष्य रखा है। दरअसल यह लक्ष्य बढ़ाया गया है। इससे पहले यह लक्ष्य कम था। देखा जाए तो भूमि के अनउपजाऊ होने के कई कारणों में से जहां कुछ कारण किसानों और अधिक पैदावार के चक्कर में रसायनों के अत्यधिक प्रयोग के लिए किसानों को प्रेरित करने को जाता है। आज पंजाब जो सबसे अधिक उत्पादन देने वाला प्रदेश रहा है वहां के खाद्यान्न को उपयोग में लेने से डर लगने लगा है। इसका कारण अत्यधिक रसायनों का निरंतर उपयोग रहा है। पंजाब में उत्पादन भी सेचुरेशन की स्थिति में आ गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहां के किसानों में भी तेजी से निराशा बढ़ती जा रही है। वहीं बिना किसी भावी योजना के अंधाधुध शहरीकरण से खेती की जमीन कम होती जा रही है। परिवारों के बंटवारें के चलते खेत छोटे होते जा रहे हैं। आपसी बारहमासी नदियां व पानी के स्रोत अब बीते जमाने की बात होते जा रहे हैं। देश के 86 जल निकायों को गंभीर रुप से प्रदूषित बताया जा रहा है। कर्नाटक, तेलगांना और केरल की स्थिति भी गंभीर मानी जा रही है। अतिवृष्टि व अनावृष्टि के चलते भूमि बंजर होने लगी है। दुनिया के देशों में मरुस्थल का विस्तार होता जा रहा है। शहरीकरण, रसायनों के उपयोग से भूमि के लाभकारी तत्वों और लाभकारी वनस्पतियों के विलुप्त होने, परंपरागत लाभकारी पेड़ों को काटने के कारण समस्या उभरने लगी है।</p>
<p style="text-align:justify;">एक और अत्यधिक बारिश से भूमि में कटाव, दूसरी तरफ धूलभरी आंधी तूफानों से मरुस्थल का विस्तार, भूगर्भीय जल के अत्यधिक दोहन, प्लास्टिक, पेर्टेकेमिकल के अत्यधिक उपयोग व इसी तरह के अन्य कारणों से भूमि बंजर होती जा रही है। यह तो तब है जब आंकड़े यह कहते है कि देश में जंगलों का विस्तार हुआ है। इसके साथ ही पानी का खारापन बढ़ने, वातावरण में हवा-पानी ही नहीं सभी तरह से फैल रहा प्रदूषण आज भूमि के उपजाऊपन को प्रभावित कर रहा है। यही नहीं एक समय केवल मलेरिया ही सबसे अधिक प्रभावित करता था पर आज मलेरिया के ही कई रुप डेंगू, चिकनगुनिया व ना जाने कितने ही रुप में सामने आ गए हैं और दुनिया के देशों को हिलाकर रख दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल सरकार को एक साथ कई मोर्चो पर काम करने की जरुरत हो गई है। एक और बढ़ती आबादी पर अंकुश लगाया जाना जरुरत बन गई हैं वहीं देश के प्रत्येक नागरिक को दो जून की रोटी उपलब्ध कराना चुनौती है। असल में हम एक ही राह पर अंधाधुंध बढ़ने लगते है तो उसके परिणाम इसी तरह के सामने आते हैं।अधिक उत्पादन के लिए रसायनों का जरुरत से ज्यादा उपयोग, शहरीकरण के नाम पर गांवों के अस्तित्व को मिटाने, पेड़-पौधों व वनस्पतियों को बिना सोचे समझे नष्ट करने, पानी का अत्यधिक दोहन और सबसे महत्वपूर्ण जल संरक्षण की परंपरागत व्यवस्था को तहस नहस करने का परिणाम सामने हैं। शहरीकरण के चक्कर में पानी के बहाव व जमाव क्षेत्र की अनदेखी करने से आज पानी खासतौर से भूगर्भीय पानी का संकट सामने है।</p>
<p style="text-align:justify;">वाटर हार्बेस्टिंग सिस्टम किस तरह के बने हैं वह जगजाहिर है। यदि यह सिस्टम सही होते तो मामूली बरसात में ही पानी भरने और शहरों के थम जाने की स्थितियां नहीं आती और भूजल का स्तर तो निश्चित रुप से एक स्तर पर तो रह ही जाता। आज सरकार ने गंभीर होकर जल शक्ति मंत्रालय बनाया है। हमारी सोच ही देखिए कि इस तरह से एनिकट पर एनिकट और इतने अवरोध बना दिए कि बांधों तक पानी पहुंचना ही असंभव हो गया। ऐसे में अब बंजर होती भूमि को उपजाऊ बनाने और भावी प्रभावों को देखते हुए कार्ययोजना बनाने की आवश्यकता है नहीं तो वह दिन दूर नहीं जब गंभीर खाद्यान्न संकट के साथ ही अन्य संकटों से रुबरु होना पड़ेगा।<br />
<strong><em>-डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</em></strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 17 Sep 2019 20:31:19 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>कांग्रेस की स्थिति पर लाल बहादुर शास्त्री के बेटे ने कहा- पार्टी को एक गांधी की जरुरत</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। भारत के पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे, अनिल शास्त्री ने कांग्रेस पार्टी पर वर्तमान संकट को लेकर चिंता व्यक्त की और कहा कि सबसे पुरानी पार्टी को अब एक ‘गांधी’ की जरूरत है। नहीं तो कांग्रेस का हाल भी क्षेत्रीय पार्टियों जैसे टीएमसी, एनसीपी जैसा हो जाएगा। राहुल गांधी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/congress-party-crisis/article-9994"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-07/rahul-gandhi1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> भारत के पूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे, अनिल शास्त्री ने कांग्रेस पार्टी पर वर्तमान संकट को लेकर चिंता व्यक्त की और कहा कि सबसे पुरानी पार्टी को अब एक ‘गांधी’ की जरूरत है। नहीं तो कांग्रेस का हाल भी क्षेत्रीय पार्टियों जैसे टीएमसी, एनसीपी जैसा हो जाएगा। राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में बनें नहीं रहना चाहते, पार्टी को वर्तमान में नेतृत्व संकट का सामना करना पड़ रहा है।</p>
<h2>प्रियंका गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए</h2>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस नेता ने कहा कि प्रियंका गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाया जाना चाहिए क्योंकि उनके अलावा कोई और 100 प्रतिशत स्वीकार्य नहीं होगा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि अगर किसी और को सुप्रीमो बनाया जाता है और संगठन का एक वर्ग उसे स्वीकार नहीं करता है, तो पार्टी के टूटने की संभावना है। देखें यहां ममता कांग्रेस (TMC), शरद पवार कांग्रेस (NCP), जगनमोहन कांग्रेस (वाईएसआरसी) है। इसलिए यदि कोई मजबूत नेतृत्व नहीं है, तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा यदि क्षेत्रीय कांग्रेस राज्यों में उभरती है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रियंका गांधी के अलावा कोई और नहीं है जो अधिक स्वीकार्य होगा। मेरा यह भी मानना ​​है कि वह पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को साथ ले जाने की क्षमता रखती है। उन्होंने कहा कि जनता के बीच भी उनकी कुछ खासियत है। तो एक शक्तिशाली नेता, जो सभी के लिए स्वीकार्य हो कांग्रेस को उसकी आवश्यकता है। अगर हम ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं, तो गांधी परिवार के सदस्यों के अलावा कोई नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">शास्त्री ने आगे कहा कि कांग्रेस पार्टी की ऐसी स्थिति है कि गांधी परिवार के बिना इसके अस्तित्व पर सवालिया निशान लग जाएगा। ” राहुल के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के 50 दिन बाद, लोकसभा चुनावों में अपमानजनक हार की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए। सबसे पुरानी पार्टी को अपना नया अध्यक्ष निर्धारित करना बाकी है। यह कहते हुए कि पार्टी को मजबूत नेतृत्व की आवश्यकता है, उन्होंने कहा कि कांग्रेस राहुल की भावनाओं का सम्मान करती है। मैं भी उनका सम्मान करता हूं। कांग्रेस पार्टी को नेतृत्व की आवश्यकता है। जिस स्थिति से कांग्रेस अभी गुजर रही है, मेरा मानना ​​है कि पार्टी को जल्द से जल्द एक अध्यक्ष मिलना चाहिए।</p>
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 19 Jul 2019 09:50:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>आज दोपहर डेढ़ बजे तय होगी कुमारस्वामी सरकार की किस्मत</title>
                                    <description><![CDATA[कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला ने मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी से विधानसभा में शुक्रवार अपराह्न डेढ़ बजे से पहले बहुमत साबित करने को कहा कर्नाटक (एजेंसी) । (Karnataka Crisis) के राज्यपाल वजुभाई वाला ने मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी (HD Kumaraswamy) से विधानसभा में शुक्रवार अपराह्न डेढ़ बजे से पहले बहुमत साबित करने को कहा। उन्होंने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/karnataka-crisis/article-9992"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-07/100.jpg" alt=""></a><br /><h2>कर्नाटक के राज्यपाल वजुभाई वाला ने मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी से विधानसभा में शुक्रवार अपराह्न डेढ़ बजे से पहले बहुमत साबित करने को कहा</h2>
<p><strong>कर्नाटक (एजेंसी) ।</strong> (Karnataka Crisis) के राज्यपाल वजुभाई वाला ने मुख्यमंत्री एच डी कुमारस्वामी (HD Kumaraswamy) से विधानसभा में शुक्रवार अपराह्न डेढ़ बजे से पहले बहुमत साबित करने को कहा। उन्होंने कहा कि 15 सत्तारूढ़ विधायकों के इस्तीफे और दो निर्दलीय विधायकों के समर्थन वापस लेने से ‘प्रथमदृष्या’ लगता है कि सदन में कुमारस्वामी ने विश्वास खो दिया है। सत्तारूढ़ कांग्रेस-जद(से) के एक वर्ग के बागी होने की पृष्ठभूमि में कुमारस्वामी ने विश्वास प्रस्ताव पेश किया था। राज्यपाल ने सदन में इस प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान हंगामे के बाद कार्यवाही स्थगित होने को ध्यान में रखते हुए समय सीमा दी।</p>
<p>गुरुवार को वजुभाई वाला ने कुमारस्वामी को लिखे एक पत्र में कहा, ‘‘मुझे सूचित किया गया है कि सदन की कार्यवाही आज (गुरुवार को) स्थगित हो गई है. इन परिस्थितियों में मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप सदन में कल (शुक्रवार) अपराह्न डेढ बजे तक या इससे पहले बहुमत साबित करे।.”</p>
<h2>बागी विधायक मुंबई से नहीं लौटे</h2>
<p>विधानसभा की कार्यवाही 11 बजे शुरू हुई। इस दौरान कुमारस्वामी को विश्वास मत साबित करना था। सत्ता पक्ष के भाषणों के दौरान भाजपा विधायकों ने सवाल उठाया कि इतने लंबे-लंबे भाषण किसलिए दिए जा रहे हैं। इस तरह के भाषण तो चुनावी रैलियों में दिए जाते हैं। भाजपा का आरोप था कि राज्यपाल खुद विश्वास मत को टालना चाहते हैं। वे अल्पमत की सरकार चलते रहने देना चाहते हैं।</p>
<h2>5 विधायक सदन से गैर-हाजिर रहे</h2>
<p>विश्वास मत के दौरान सदन से 5 विधायक गैर-हाजिर रहे। इनमें 2 कांग्रेस, 1 बसपा और और 2 निर्दलीय विधायक थे। 15 गैर-हाजिर, 15 बागी विधायकों के अलावा स्पीकर को हटाकर सदन की संख्या 203 हो गई। इस स्थिति में बहुमत साबित करने का आंकड़ा 102 हो गया। लेकिन, कांग्रेस-जेडीएस के पास 116 के मुकाबले विधायकों का आंकड़ा 98 रह गया था, जबकि भाजपा के पास 105।</p>
<h2>कांग्रेस विधायक की अनुपस्थिति पर हंगामा</h2>
<p>कांग्रेस ने अपने विधायक श्रीमंत पाटिल की अनुपस्थिति पर सवाल उठाया। दरअसल, पाटिल ने अस्वस्थ होने और इलाज के लिए मुंबई जाने से संबंधित पत्र स्पीकर को सौंपा था। कर्नाटक कांग्रेस अध्यक्ष दिनेश गुंडु राव ने कहा- जिस रिजॉर्ट में हमने अपने विधायकों को ठहराया, वहां पास ही अस्पताल है। ऐसे में मुंबई क्यों गए? कांग्रेस ने आरोप लगाया कि भाजपा ने हमारे एक विधायक को अगवा कर लिया। इसके कुछ ही देर बाद पाटिल की मुंबई के एक अस्पताल में इलाज कराते हुए तस्वीरें सामने आईं।</p>
<h2>राज्यपाल ने स्पीकर को विश्वास मत पर विचार को कहा</h2>
<p>विश्वास मत साबित करने में देरी को देखते हुए भाजपा के एक प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल वजूभाई वाला से मुलाकात की। उन्होंने राज्यपाल से अपील की कि विश्वास मत गुरुवार को ही साबित किया जाए। सदन में भी येदियुरप्पा ने कहा कि भले ही रात में 12 बज जाएं, लेकिन कुमारस्वामी को विश्वास मत आज ही साबित करना चाहिए। राज्यपाल ने स्पीकर से कहा कि वे शुक्रवार को ही विश्वास मत कराए जाने पर विचार करें।</p>
<h2>सदन में ही धरने पर भाजपा विधायक</h2>
<p>करीब साढ़े सात घंटे की बहस और आरोपों-प्रत्यारोपों के दौरान के बाद स्पीकर ने सदन की कार्यवाही शुक्रवार तक के लिए स्थगित कर दी। इसके बाद भाजपा विधायकों ने विरोध स्वरूप सदन में ही धरना शुरू कर दिया। उन्होंने कहा कि वे रात विधानसभा के भीतर ही बिताएंगे।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
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                <pubDate>Fri, 19 Jul 2019 09:05:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>पानी के लिए तरस रही चेन्&amp;#x200d;नई को मिलेगी राहत, एक करोड़ लीटर पानी लेकर जाएगी ट्रेन</title>
                                    <description><![CDATA[चेन्नई, एजेंसी। गंभीर जल संकट से जूझ रहे चेन्नई के लोगों को कुछ राहत मिलने जा रही है। तमिलनाडु (Tamil Nadu) के मुख्यमंत्री के पलानीस्वामी (Chief Minister K. Palaniswami) ने कहा है कि वेल्लोर ( Vellore district) के जोलारपेट ( Jolarpettai) से एक करोड़ लीटर पानी विशेष ट्रेन के जरिए चेन्‍नई भेजा जाएगा। ट्रेन द्वारा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/chennai-water-crisis/article-9693"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-06/chennai-water-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>चेन्नई, एजेंसी।</strong> गंभीर जल संकट से जूझ रहे चेन्नई के लोगों को कुछ राहत मिलने जा रही है। तमिलनाडु (Tamil Nadu) के मुख्यमंत्री के पलानीस्वामी <strong>(Chief Minister K. Palaniswami</strong>) ने कहा है कि वेल्लोर ( Vellore district) के जोलारपेट ( Jolarpettai) से एक करोड़ लीटर पानी विशेष ट्रेन के जरिए चेन्‍नई भेजा जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">ट्रेन द्वारा जलापूर्ति का यह काम छह महीने तक किया जाएगा। इसके लिए 65 करोड़ रुपये की राशि अलग से आवंटित की गई है। उन्‍होंने बताया कि चेन्नई मेट्रोपोलिटन वाटर सप्लाई एंड सीवरेज बोर्ड ने जल वितरण के लिए 158.42 करोड़ रुपये का आवंटन किया है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">शहर में मेट्रो वॉटर की ओर से 525 एमएलडी तक जलापूर्ति की जा रही है।</h2>
<p style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री के पलानीस्वामी ने कहा कि जहां तक चेन्‍नई का सवाल है तो सरकार जितनी जल्द पानी मुहैया करा सकती है, करा रही है। जल भंडारण को बढ़ाने के लिए जल इकाइयों की मरम्मत और उन्हें मजबूत करने का कार्य पहले ही शुरू हो चुका है। शहर में मेट्रो वॉटर की ओर से 525 एमएलडी तक जलापूर्ति की जा रही है। उन्होंने केरल के मुख्‍यमंत्री पी. विजयन से जल संकट के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लागू करने के लिए सहयोग बढ़ाने का अनुरोध किया।</p>
<h2 style="text-align:justify;">सीएम पलानीसामी ने पड़ोसी राज्यों पर सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया है।</h2>
<p style="text-align:justify;">सीएम पलानीसामी ने पड़ोसी राज्यों पर सहयोग नहीं करने का आरोप लगाया है। हालांकि उन्होंने केरल के मुख्‍यमंत्री के जलापूर्ति के ऑफर के लिए धन्‍यवाद दिया। उन्‍होंने यह भी कहा कि केरल ने केवल एक बार में दो मिलियन लीटर पानी उपलब्ध कराने का प्रस्‍ताव दिया है, लेकिन चेन्‍नई जिस भीषण जल संकट से जूझ रहा है उसके लिए यह नाकाफी है। इसके साथ ही उन्‍होंने उन आरोपों को खारिज कर दिया जिसमें दावा किया गया था कि मुख्यमंत्री और उनके सहयोगी मंत्रियों को निजी इस्‍तेमाल के लिए दो टैंकर पानी हर रोज मुहैया कराया जा रहा है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">चेन्‍नई को पानी की सप्‍लाइ करने वाली चार झीलें सूख गई हैं।</h2>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि चेन्‍नई को पानी की सप्‍लाइ करने वाली चार झीलें सूख गई हैं। ऐसे में शहर की लगभग चालीस लाख से ज्‍यादा आबादी के लिए एकमात्र आसरा अब केवल सरकारी पानी टैंकर ही हैं। शहर में जल संकट को देखते हुए छोटे रेस्त्रां बंद किए जा रहे हैं जबकि कुछ कार्यालयों में घर से काम करने का नियम लागू किया गया है। नौबत यहां तक आ गई है कि पानी बचाने के लिए शहर के मेट्रो सिस्टम ने अपने स्टेशनों पर एयर कंडीशनिंग का उपयोग करना भी बंद कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">घरों से लेकर होटल तक के नल सूख चुके हैं। लाखों लोग टैंकरों के पानी पर आश्रित हैं। तमिलनाडु के पूझल जलाशय से जल आपूर्ति सिर्फ 52.5 करोड़ लीटर की ही हो पा रही है। इस जलाशय से चेन्नई तक पानी की सप्लाई होती है। चेन्नई में जल संकट के कारण 100 से ज्यादा छात्रवासों को भी बंद करना पड़ा है। पानी भरने के लिए लंबी-लंबी कतारें लग रही हैं। यही नहीं कतारों में लगे लोगों के बीच अक्‍सर लड़ाई झगड़े तक की नौबत आ रही है। पानी की किल्लत के चलते अधिकांश लोग नहा नहीं पा रहे हैं। चेन्‍नई के होटल में पानी के इस्तेमाल को लेकर चेतावनियां जारी की जा रही हैं।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/chennai-water-crisis/article-9693</link>
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                <pubDate>Sat, 22 Jun 2019 11:01:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>तमिलनाडु के कई हिस्सों में &amp;#8216;जल संकट&amp;#8217;, भीषण गर्मी के कारण सूखे कुएं</title>
                                    <description><![CDATA[तापमान बढ़ने की वजह से राज्य के कई हिस्सों में जल संकट खड़ा हो गया रामेश्वरम, sach kahoon। देशभर में पड़ रही भीषण गर्मी से जनजीवन अस्त-व्यस्त है। ज्यादातर राज्यों में पारा 45 डिग्री को पार कर गया है, जिसकी वजह से लोगों का जीना मुहाल हो गया है। तमिलनाडु के ज्यादातर इलाके भीषण गर्मी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/water-crisis/article-9648"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-06/water.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">तापमान बढ़ने की वजह से राज्य के कई हिस्सों में जल संकट खड़ा हो गया</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>रामेश्वरम, sach kahoon</strong>। देशभर में पड़ रही भीषण गर्मी से जनजीवन अस्त-व्यस्त है। ज्यादातर राज्यों में पारा 45 डिग्री को पार कर गया है, जिसकी वजह से लोगों का जीना मुहाल हो गया है। तमिलनाडु के ज्यादातर इलाके भीषण गर्मी की मार झेल रहे हैं। तापमान बढ़ने की वजह से राज्य के कई हिस्सों में पानी का संकट खड़ा हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">गर्मी के कारण राज्य के ज्यादातर इलाकों में पीने के पानी का आभाव हो गया है। लोगों का कहना है कि इससे पहले हमने कभी भी एसी स्थिती का सामना नहीं किया है। हालात इतने ज्यादा खराब हो गए हैं कि बोरवेल से पानी नहीं आ रहा है। कुएं का पानी भी औसत से बहुत नीचे चला गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं, चेन्नई में लोगों ने शहर में पानी के संकट की शिकायत की है। उन्होंने आरोप लगाया है कि उनके क्षेत्र में टैंकरों के माध्यम से पानी की आपूर्ति नियमित रूप से नहीं की जा रही है। लोगों का कहना है कि पहले पानी की आपूर्ति नियमित थी, लेकिन अब ये बहुत कम हो गई है।</p>
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                                            <category>देश</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/water-crisis/article-9648</link>
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                <pubDate>Wed, 19 Jun 2019 10:24:30 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>राजस्थान में पानी ने रूलाया और गर्मी ने झुलसाया</title>
                                    <description><![CDATA[आजादी के बाद से ही मरुस्थलीय क्षेत्र राजस्थान पेयजल के संकट से जूझता रहा है। पहले लोग कुंए, तालाब और बावड़ियों के पानी पर निर्भर थे। आबादी बढ़ने के साथ पानी की मांग भी बढ़ने लगी। जलप्रदाय की अनेक योजनाएं बनी मगर पानी का संकट कम होने के बजाय बढ़ता ही गया। परम्परागत श्रोत सूख […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/rajasthan-drinking-water-crisis/article-8504"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-04/rajasthan-drinking-water-crisis.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आजादी के बाद से ही मरुस्थलीय क्षेत्र राजस्थान पेयजल के संकट से जूझता रहा है। पहले लोग कुंए, तालाब और बावड़ियों के पानी पर निर्भर थे। आबादी बढ़ने के साथ पानी की मांग भी बढ़ने लगी। जलप्रदाय की अनेक योजनाएं बनी मगर पानी का संकट कम होने के बजाय बढ़ता ही गया। परम्परागत श्रोत सूख गए और जल प्रदाय योजनाओं के नए केंद्र बनने शुरू हुए। हर साल करोड़ों अरबों की राशि इन कार्यों पर खर्च होने के बाद भी प्रदेश में पेयजल की किल्लत से हम जूझ रहे हैं। जल ही जीवन है। हम भोजन के बिना एक महीने से ज्यादा जीवित रह सकते हैं, लेकिन जल के बिना एक सप्ताह से अधिक जीवित नहीं रह सकते।</p>
<p style="text-align:justify;">जल की उपलब्धता को लेकर वर्तमान में भारत ही नहीं अपितु समूचा विश्व चिन्तित है। मानव का अस्तित्व जल पर निर्भर करता है। पृथ्वी पर कुल जल का अढ़ाई प्रतिशत भाग ही पीने के योग्य है। इनमें से 89 प्रतिशत पानी कृषि कार्यों एवं 6 प्रतिशत पानी उद्योग कार्यों पर खर्च हो जाता है। शेष 5 प्रतिशत पानी ही पेयजल पर खर्च होता है। यही जल हमारी जिन्दगानी को संवारता है। एक रपट में बताया गया है कि पृथ्वी के जलमण्डल का 97.5 प्रतिशत भाग समुद्रों में खारे जल के रूप में है और केवल 2.4 प्रतिशत ही मीठा पानी है। राजस्थान में भीषण गर्मी और आंधी तूफान ने आमजन के होश उड़ा दिए हैं। गर्मी शुरू होते ही सूर्य की किरणें आग उगलने लगी हैं। धरती का वातावरण गर्म हो उठता है। हवाएं भी गर्म होकर अपना रौद्र रूप दिखाने लगती हैं। बरसात कम होने से गर्मी जल्दी आ गई।</p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान में गर्मियों में स्थानीय चक्रवात के कारण जो धूल भरे बवंडर बनते हैं उन्हें भभुल्या कहा जाता है। प्रदेश के कई जिले इस समय भभुल्या की चपेट में है। गर्मी और पानी का चोली दामन का साथ है। गर्मी अपने साथ पानी संकट भी लेकर आयी है। दोनों आपदाओं ने मिलकर लोगों का जीना हराम कर दिया है। जब तक प्रदेश में मानसून मेहरबान नहीं होंगे तब तक आम आदमी की मुश्किलें कम नहीं होंगी। राजस्थान में गत मानसून में औसत से कम बारिश ने प्रदेश में पेयजल संकट की स्थिति खड़ी कर दी है। सबसे बुरी स्थिति राजधानी जयपुर की दिख रही है। यहा जलापूर्ति के मुख्य स्रोत बीसलपुर बांध से पानी की सप्लाई बंद किए जाने की तैयारी की जा रही है, क्योंकि इस बार बांध में बहुत कम पानी आ पाया है। हालात से निपटने के लिए विभाग ने कार्ययोजना भी तैयार की है।</p>
<p style="text-align:justify;">शहरों में बोरिंग खोदे जा रहे हंै ताकि किसी भी स्थिति का मुकाबला किया जा सके। गर्मी के रौद्र रूप धारण करते ही प्रदेश में एक बार फिर पेयजल संकट खड़ा हो गया है। एक तो भीषण गर्मी ऊपर से पानी की बेरहम मार ने हमारे सामने दुगुना संकट उपस्थित कर दिया है। मानव के साथ पशु धन भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति शहरों से अधिक गंभीर है जहाँ कई कई किलोमीटर दूर से पानी ढ़ोया जा रहा है। नीति आयोग की मानें तो राजस्थान में महज 44 फीसदी गांवों में राज्य सरकार पेयजल की आपूर्ति कर पा रही है। आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान पेयजल आपूर्ति स्तर के मामले में पीछे है और सिर्फ 44 प्रतिशत ग्रामीण बस्तियों में ही पूरी तरह से जलापूर्ति हो रही है। राजस्थान में मानसून के दौरान औसतन 508 मिमी बारिश होती है, लेकिन पिछली बार 497 मिमी बारिश दर्ज की गई यानी औसत से कम बारिश हुई। राज्य के सात में से पांच सम्भाग जयपुर, अजमेर, उदयपुर, बीकानेर और जोधपुर में सामान्य से कम बारिश हुई। जोधपुर में सामान्य के मुकाबले आधी बारिश भी नहीं हुई। इसी के चलते बांधों और तालाबों में भी पानी की आवक कम हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">बारिश कम होने के कारण राजस्थान के कुल 831 छोटे बडेÞ बांधों और तालाबों में से सिर्फ 123 ही पूरे भर पाए है, जबकि 385 आंशिक भरे हुए,वहीं 323 पूरी तरह खाली हैं। इस बार पेयजल संकट के मामले मे सबसे बुरी स्थिति जयपुर की होती दिख रही है। जयपुर राजस्थान की राजधानी है जहाँ प्रतिदिन प्रदेश के विभिन्न स्थानों से हजारों लोग मजदूरी सहित विभिन्न कामों से जयपुर आते है। जयपुर महानगर की 40 लाख से ज्यादा आबादी के लिए पेयजल का एकमात्र स्रोत टोंक जिले में स्थित बीसलपुर बांध है। इस बांध ने कम भराई के कारण इस बार धोखा दे दिया है जिसका खामियाजा हमें भोगना पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">गर्मी में पारा अभी से 45 डिग्री पार हो गया है। पानी की अधिक जरुरत महसूस की जा रही है कूलरों को भी पानी चाहिए ,पानी कहाँ से आएगा यह यक्ष प्रश्न हमारे सामने आ खड़ा हुआ है जिसका समाधान फिलहाल दिखाई नहीं दे रहा है। जब तक मानसून की बारिश नहीं होगी तब तक गर्मी के साथ पानी भी हमारी जिंदगानी को कष्ट देता रहेगा।सरकार को जनता में जागरूकता लाने के लिए विशेष प्रबन्ध और उपाय करने होंगे। आम आदमी को जल संरक्षण एवं समझाइश के माध्यम से पानी की बचत का सन्देश देना होगा। वर्षा की अनियमितता और भूजल दोहन के कारण भी पेयजल संकट का सामना करना पड़ रहा है। आवश्यकता इस बात की है कि हम जल के महत्व को समझें और एक-एक बूंद पानी का संरक्षण करें तभी लोगों की प्यास बुझाई जा सकेगी।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>बाल मुकुन्द ओझा</strong></p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Apr 2019 20:11:37 +0530</pubDate>
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                <title>महिला क्रिकेट का गहराता संकट</title>
                                    <description><![CDATA[भारतीय महिला क्रिकेट टीम की वरिष्ठ खिलाड़ी मिताली राज को पिछले दिनों टी-20 विश्व कप के सेमीफाइनल से बाहर रखे जाने के बाद मचे बवाल के उस वक्त शांत होने की उम्मीदें जगी थी, जब टीम के कोच रमेश पोवार का करार 30 नवम्बर को खत्म होते ही बीसीसीआई द्वारा उनकी इस पद से छुट्टी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/women-cricket-deep-crisis/article-7004"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/women-cricket.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारतीय महिला क्रिकेट टीम की वरिष्ठ खिलाड़ी मिताली राज को पिछले दिनों टी-20 विश्व कप के सेमीफाइनल से बाहर रखे जाने के बाद मचे बवाल के उस वक्त शांत होने की उम्मीदें जगी थी, जब टीम के कोच रमेश पोवार का करार 30 नवम्बर को खत्म होते ही बीसीसीआई द्वारा उनकी इस पद से छुट्टी कर दी गई थी किन्तु अब जिस प्रकार महिला टीम की मौजूदा कप्तान हरमनप्रीत कौर तथा उपकप्तान स्मृति मंधाना सहित प्रशासकों की समिति (सीओए) की सदस्य और भारतीय महिला टीम की पूर्व खिलाड़ी डायना एडुल्जी भी खुलकर कोच रमेश पोवार के समर्थन में खड़ी हो गई हैं और इतनी फजीहत होने के बावजूद पोवार ने एक बार फिर जिस तरह कोच पद के लिए फिर से आवेदन किया है, उससे महिला क्रिकेट टीम का विवाद और गहरा गया है और महिला टीम के खिलाड़ियों की आपसी लड़ाई खुलकर सामने आ गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">मिताली विवाद के बाद टीम से हटाए गए पोवार को ही कोच बनाए रखने के लिए पिछले दिनों हरमनप्रीत तथा मंधाना ने बीसीसीआई को ईमेल भेजी थी लेकिन बीसीसीआई ने कोच पद के लिए विज्ञापन जारी करते हुए एक समिति बना दी। डायना इस समिति के गठन के खिलाफ थी और पोवार को ही कोच बनाए रखने के लिए दबाव बना रही थी किन्तु सीओए प्रमुख विनोद राय द्वारा उनकी अपील खारिज करने के बाद जिस प्रकार डायना द्वारा उनके खिलाफ भी तीखे तेवर अपनाए गए, उससे महिला क्रिकेट के भीतर पनप रही राजनीति का भी पदार्फाश हो गया है</p>
<p style="text-align:justify;">रमेश पोवार ने कोच पद के लिए पुन: आवेदन किया है और इसका कारण बताया है कि वो उनका समर्थन करने वाली वरिष्ठ खिलाड़ियों हरमनप्रीत तथा मंधाना को ‘नीचा गिराये’जाते नहीं देख सकते थे। उनकी इस टिप्पणी से एक बात और साफ हो गई है कि महिला टीम के भीतर सब कुछ ठीक नहीं है। ऐसे में यह गंभीर सवाल भी खड़ा हो गया है कि हरमनप्रीत टीम की कप्तान हैं जबकि स्मृति उप कप्तान, फिर भला उन्हें कौन नीचे गिरा रहा था? महिला क्रिकेट के भीतर गहराये इस विवाद से टीम के अंदर व्याप्त गुटबाजी के स्पष्ट संकेत मिले हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">निश्चित रूप से महिला टीम के इस विवाद से टीम की साख बुरी तरह से प्रभावित हुई है। डायना एडुल्जी ने जिस प्रकार सीओए प्रमुख तथा बीसीसीआई के सीईओ राहुल जौहरी पर निशाना साधा है, उससे भी विवाद और गहरा गया है। डायना ने सीधे-सीधे बीसीसीआई के सीईओ पर आरोप लगाया है कि उन्होंने पिछले साल जुलाई माह में नियमों का उल्लंघन कर अनिल कुंबले के इस्तीफे के बाद रवि शास्त्री को कोच नियुक्त किया था। डायना का कहना है कि उन्होंने उस वक्त भी इसके लिए विरोध जताया था क्योंकि रवि शास्त्री के लिए बोर्ड ने अंतिम तिथि को आगे बढ़ा दिया था और अब वह महिला टीम के नए कोच के लिए समिति बनाए जाने के बोर्ड के फैसले का पुरजोर विरोध कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह पूरा प्रकरण इतना विवादित हो गया है कि इसके चलते महिला क्रिकेट की साख पर लगे ग्रहण को मिटा पाना आसान नहीं होगा। इंग्लैंड के खिलाफ टी-20 विश्व कप के सेमीफाइनल से बाहर रखे जाने पर जब मिताली ने बीसीसीआई को लिखे ई-मेल में कोच पोवार तथा डायना एडुल्जी पर बरसते हुए उन प्रकार पक्षपातपूर्ण व्यवहार कर उनके कैरियर को बर्बाद करने की कोशिश करने का गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि अपने 20 साल के कैरियर में उन्होंने इतना अपमानित कभी महसूस नहीं किया तो खेल जगत में हड़कम्प मच गया। मिताली ने ट्वीट भी किया कि उनकी देशभक्ति पर संदेह जताकर और खेल के प्रति प्रतिबद्धता पर सवाल उठाकर उनकी 20 वर्षों की मेहनत को मिट्टी में मिला दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि कोच पोवार ने मिताली से अपने तनावपूर्ण रिश्तों को स्वीकार करते हुए मिताली पर कोचों पर दबाव डालने, उन्हें ब्लैकमेल करने, पारी की शुरूआत करने का अवसर नहीं दिए जाने पर दौरा बीच में छोड़ने की धमकी देने, टीम के बजाय अपने निजी रिकॉर्ड के लिए खेलने, टीम प्लान को नहीं मानने के आरोप मढ़े थे। उनका कहना था कि खराब स्ट्राइक रेट के कारण मिताली को इंग्लैंड के खिलाफ मैच से बाहर किया गया क्योंकि टीम प्रबंधन पिछले मैच में जीत दर्ज करने वाली टीम को ही कायम रखना चाहता था लेकिन पोवार इस बात का कोई जवाब नहीं दे सके कि आयरलैंड और पाकिस्तान के खिलाफ मैचों में मिताली का स्ट्राइक रेट आड़े क्यों नहीं आया?</p>
<p style="text-align:justify;">उन दोनों मैचों में मिताली ने अर्धशतक जड़े थे और उन्हें प्लेयर आॅफ द मैच चुना गया था। मिताली के इस आरोप का भी किसी के पास कोई जवाब नहीं था कि अंतिम एकादश की घोषणा प्राय: एक दिन पहले ही की जाती है जबकि मिताली को टॉस से ठीक पहले बताया गया कि वो टीम का हिस्सा नहीं है। पोवार के आरोप हैरान करने वाले इसलिए भी लगे क्योंकि उनसे पहले किसी ने भी मिताली पर इस तरह के आरोप नहीं लगाए। मिताली जैसी सीनियर खिलाड़ी को दो बार प्लेयर आॅफ द मैच बनने, विश्व कप में खेले तीन मैचों में 103 रन के स्ट्राइक रेट तथा 53.5 की औसत से दो अर्धशतक के साथ 127 रन बनाने और पूरी तरह फिट होने के बाद भी अचानक सेमीफाइनल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है और टीम बुरी तरह से मैच हार जाती है तो कोच सहित चयनकतार्ओं पर भी सवाल तो उठने ही थे।</p>
<p style="text-align:justify;">मिताली हों या हरमनप्रीत, दोनों ही महिला टीम की दिग्गज खिलाड़ी हैं और टीम की जान हैं, इसलिए अगर ऐसी प्रतिभाशाली वरिष्ठ खिलाड़ियों में किसी को भी सवालों के घेरे में खड़ा कर उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव किया जाता है तो यह टीम के सुखद भविष्य के लिए उचित नहीं। बेहतर होता कि कोच एक वरिष्ठ खिलाड़ी को बेवजह टीम से बाहर रखने के बजाय टीम की वरिष्ठ खिलाड़ियों के बीच पनपते मतभेदों तथा गुटबाजी को दूर करने की कोशिश करते ताकि भारतीय महिला क्रिकेट पूरी दुनिया में अपना परचम लहराता रहता। इस प्रकार के विवादों से न टीम का कोई भला हो सकता है और न ही विवादों में घिरी ऐसी टीम के प्रति खेल प्रेमियों का जुनून बरकरार रह सकता है। इसलिए जरूरत है कि सीओए तथा बीसीसीआई अब ऐसे सख्त कदम उठाएं, जिससे भारतीय महिला क्रिकेट में गहराये इस संकट का तत्काल कोई समाधान संभव हो और भविष्य में इस प्रकार के विवाद न पनपने पाएं।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>योगेश कुमार गोयल</strong></p>
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<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 16 Dec 2018 20:22:30 +0530</pubDate>
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                <title>नदियों पर गहराता संकट</title>
                                    <description><![CDATA[प्राचीन समय में भारत अपनी कई महान नदियों के कारण विश्व विख्यात था। प्राचीनकाल में नदियों (Deep crisis on rivers) के किनारे ही हमारी मानव सभ्यताओं का जन्म व विकास हुआ था। नदियां केवल धरती के प्राण ही नहीं हैं बल्कि मानव संस्कृतियों की जननी भी हैं। हमारे पूर्वजों के मन में नदियों के प्रति […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/deep-crisis-on-rivers/article-6862"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/rivar.jpg" alt=""></a><br /><h2>प्राचीन समय में भारत अपनी कई महान नदियों के कारण विश्व विख्यात था।</h2>
<p style="text-align:justify;">प्राचीनकाल में नदियों <strong>(Deep crisis on rivers)</strong> के किनारे ही हमारी मानव सभ्यताओं का जन्म व विकास हुआ था। नदियां केवल धरती के प्राण ही नहीं हैं बल्कि मानव संस्कृतियों की जननी भी हैं। हमारे पूर्वजों के मन में नदियों के प्रति अपार श्रद्धा व सम्मान का भाव विद्यमान था। वे नदियों को देवी-देवता मानकर उनकी पूजा किया करते थे। नदियों की महानता से प्रसन्न होकर ऐतिहासिक काल में कई महर्षियों ने नदी पुराण व ग्रंथों की रचना भी की हैं। उस समय नदियों के बिना जीवन की कल्पना संभव नहीं मानी जाती थी। क्योंकि प्राचीनकाल में नदियों का केवल धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व ही नहीं था बल्कि ये सामाजिक और आर्थिक महत्व को भी समेटे हुए थी। इन्हीं महत्वों को उजागार करने के लिए कई मेलों व त्योहारों का आयोजन भी नदियों को केंद्र में रखकर किया जाता था। प्राचीन समय में भारत अपनी कई महान नदियों के कारण विश्व विख्यात था।</p>
<h2>देश की 62 फीसदी नदियां भयंकर रूप से प्रदूषित हो चुकी हैं।</h2>
<p style="text-align:justify;">भारत की धरती पर कई नदियां खेला करती थी और उनके जल से हजारों खेतों में फसलें खिला करती थीं। प्राचीन भारत को सोने की चिड़िया का गौरव भी इन्हीं नदियों की बदौलत हासिल था। लेकिन बदलते दौर में नदियों के मूल्यों और अस्मिता के साथ छेड़छाड़ हुई। उनके निर्मल व पवित्र जल में जहर घोला गया और उन्हें मृतप्राय सा बनाकर छोड़ दिया गया। यही कारण है कि आज देश में तकरीबन 223 नदियों का पानी इतना प्रदूषित हो चुका है कि उनके पानी में नहाने या पीने पर बीमारी का खतरा हो सकता है। देश की 62 फीसदी नदियां भयंकर रूप से प्रदूषित हो चुकी हैं। इनमें गंगा और यमुना समेत इनकी सहायक नदियां भी शामिल हैं। निश्चित ही शहरीकरण और औद्योगीकरण ने नदियों के प्राण हरने का कार्य किया है। कृषि अपशिष्ट, रासायनिक उर्वरक और कीटनाशक ने नदियों के जल को सर्वाधिक क्षति पहुंचायी है।</p>
<h2>परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे हैं</h2>
<p style="text-align:justify;">औद्योगिक अपशिष्ट, भारी धातु, प्लास्टिक की थैलियां व ठोस अपशिष्ट के साथ ही पूजा का सामान, फूल, मालाओं जैसी वस्तुओं के कारण नदियों की अविरल धारा में रुकावट आयी है। वहीं नदियों के किनारे धार्मिक अनुष्ठान करने, पशुओं के नहाने, मानव द्वारा मल-मूत्र त्यागने के कारण नदियां का जल प्रदूषित हुआ है। आज देश में नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए तो कई योजनाएं और परियोजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किये जा रहे हैं पर नदियों को प्रदूषित करने वाले कारकों पर किसी तरह की रोक लगाने को लेकर प्रयास होते नहीं दिख रहे हैं। इसी वजह से जहां एक ओर नदियां साफ हो रही हैं तो दूसरी ओर डाला जा रहा कचरा उन्हें फिर से गंदा भी कर रहा है।</p>
<h2 style="text-align:justify;"> नदियों में औषधीय गुण फिर आएं इसके लिए किनारों पर औषधीय पेड़ रोपित किये जाएं</h2>
<p style="text-align:justify;">जनाओं के बूते देश की नदियों का जल स्वच्छ हो जाएगा? हमारे लिए नदी प्रबंधन का सिद्धांत यह होना चाहिए कि नदी को कोई खराब ही नहीं करें। यदि ऐसा होगा तो नदी को स्वच्छ करने के नाम पर करोड़ों का धन व्यय करने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। नदियों में जैव विविधता लौटाने के लिए नदियों के पानी में जैव आॅक्सीजन की मांग घटानी होगी ताकि नदियों को साफ करने वाले जलीय जीव जिंदा रह सकें। नदियों में औषधीय गुण फिर आएं इसके लिए किनारों पर औषधीय पेड़ रोपित किये जाएं। इसके अतिरिक्त खेती और घरों में डिटर्जेंट आदि में इस्तेमाल हो रहे खतरनाक रसायन और कीटनाशक से नदियों को बचाना होगा। अस्तित्व के लिए जूझ रही नदियों को जीवित नदी का दर्जा देने से अधिक जरूरी है उन्हें जीवित रखना। यह काम केवल खानापूर्ति से नहीं होगा बल्कि इसके लिए मजबूत इच्छाशक्ति व ईमानदारी से प्रयास करने की जरूरत है।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/deep-crisis-on-rivers/article-6862</link>
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                <pubDate>Sat, 08 Dec 2018 08:35:54 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जीडीपी का बदलता पैमाना और विश्वसनीयता का संकट</title>
                                    <description><![CDATA[जीडीपी के संशोधित आँकड़ों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया वर्ष 2007 में पेइचिंग में पदस्थ अमेरिकी राजदूत ने चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव (मौजूदा प्रधानमंत्री) ली कछयांग से मुलाकात की। ली ने राजदूत से कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)  ( Changing scale of GDP and crisis of credibility) के आंकड़ें विश्वसनीय नहीं […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/changing-scale-of-gdp-and-crisis-of-credibility/article-6815"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/gdp.jpg" alt=""></a><br /><h2>जीडीपी के संशोधित आँकड़ों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया</h2>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2007 में पेइचिंग में पदस्थ अमेरिकी राजदूत ने चीन के कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव (मौजूदा प्रधानमंत्री) ली कछयांग से मुलाकात की। ली ने राजदूत से कहा कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)  <strong>( Changing scale of GDP and crisis of credibility)</strong> के आंकड़ें विश्वसनीय नहीं हैं। उन्होंने अचल संपत्ति के तीन संकेतकों में रेलवे कार्गो वॉल्यूम, बिजली की खपत और बैंकों के ऋण वितरण पर भरोसा करने की बात कही। इकोनॉमिस्ट पत्रिका ने इसी आधार पर ली कछयांग सूचकांक बनाया। बाद के विश्लेषण ने दिखाया कि लगभग हर जिंस और मुद्रा के लिए यह सूचकांक जीडीपी की तुलना में कहीं अधिक प्रासंगिक है। क्या वक्त आ गया है कि ली कछयांग सूचकांक का कोई भारतीय संस्करण तैयार किया जाए?यह सवाल इसलिए उत्पन्न हुआ क्योंकि इस सप्ताह आए जीडीपी के संशोधित आँकड़ों को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया है। जीडीपी किसी भी देश की आर्थिक सेहत को मापने का सबसे जरूरी पैमाना है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">जीडीपी किसी खास अवधि के दौरान वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की कुल कीमत है</h2>
<p style="text-align:justify;">जीडीपी किसी खास अवधि के दौरान वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की कुल कीमत है। भारत में जीडीपी की गणना हर तीसरे महीने यानी तिमाही आधार पर होती है। इस वर्ष की शुरूआत में केंद्र सरकार ने सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी पर राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग(एनएससी) की तकनीकी कमेटी के अनुमानों को खारिज कर दिया था,फिर नीति आयोग और केंद्रित सांख्यिकी कार्यालय(सीएसओ) ने वैकल्पिक आंकड़ों को जारी किया। इसके बाद से कई विवाद खुलकर सामने आए। इन आँकड़ों में आर्थिक मोर्चे पर यूपीए सरकार की तुलना में एनडीए सरकार के प्रदर्शन को काफी बेहतर बताया गया। इन अनुमानों के मुताबिक,यूपीए सरकार के कार्यकाल के दौरान जीडीपी ने कभी 9% के आँकड़े को नहीं छुआ। हालांकि इसके उलट राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग (एनएससी)की कमेटी ने 2007-08 में 10.23% और 2010-11 में 10.78% जीडीपी का अनुमान दर्शाया था। इस मसले पर वित्त मंत्री अरुण जेटली और उनके पूर्ववर्ती वित्त मंत्री पी चिदंबरम के बीच राजनीतिक द्वंद्व के अलावा, पूरी प्रक्रिया पर सीएसओ के पूर्व अधिकारियों और अर्थशास्त्रियों ने भी कई सवाल उठाएं हैं।</p>
<h2>जीडीपी की दर एक “आधार वर्ष”के उत्पादन की कीमत पर तय होती है।</h2>
<p style="text-align:justify;">जीडीपी अर्थात ग्रोस डोमेस्टिक प्रोडक्ट की दर एक “आधार वर्ष”के उत्पादन की कीमत पर तय होती है। अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक बदलावों के मद्देनजर आधार वर्ष की अवधि में समय-समय पर बदलाव किए जाते है। 2015 में इसी बदलाव के तहत आधार वर्ष को 2004-05 से बदल कर 2011-12 किया गया। इससे जीडीपी के दो अनुमान मिले – 2004-05 के आधार वर्ष के साथ पुरानी सीरीज और 2011-12 के नए आधार वर्ष पर नई सीरिज। जब आधार वर्ष में बदलाव किया गया तो नई सीरीज में प्रणाली संबंधी कई सुधार भी किए गए। लेकिन वहाँ भी एक समस्या थी। पुरानी सीरीज से 1950-51 से 2014-15 तक के जीडीपी अनुमान मिले,जबकि नए जीडीपी सीरीज ने केवल 2011-12 से आगे का ही अनुमान दिया।</p>
<h2 style="text-align:justify;">2004-05 में जीडीपी सीरीज ने 1950-51  तक की जीडीपी का अनुमान लगाया था।</h2>
<p style="text-align:justify;">पहलत: 2011-12 से पहले के ट्रेंड का कोई सार्थक शोध नहीं किया जा सकता था,यह अकादमिक शोध के साथ ही नीतियाँ बनाने और इसके मूल्यांकन को अंधेरे में रखता है। इस नई सीरीज में ग्रॉस वैल्यू एडेड (जीवीए) में प्राथमिक क्षेत्रों (उत्खनन, विनिर्माण, बिजली, दूरसंचार आदि) की हिस्सेदारी बढ़ा दी गई है,जिस कारण पुराने जीडीपी आँकड़ों में बदलाव आया है। दूसरे आँकड़े जुटाने का तरीका भी इस नई सीरिया में बदल दिया गया है। पहले के दशकों में,आधार वर्ष में जब भी बदलाव किया गया,जैसे कि जब 2004-05 में आधार वर्ष बदला गया,तो जीडीपी सीरीज ने 1950-51  तक की जीडीपी का अनुमान लगाया था। फिर सांख्यिकी विशेषज्ञों वाली राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग अर्थात एनएससी कमेटी ने इस साल अगस्त में एक और बैट सीरीज जारी की।</p>
<ul>
<li style="text-align:justify;"> मोदी सरकार के पहले चार वर्षों की तुलना में यूपीए के 2004-05 से 2013-14 की अवधि में अर्थव्यवस्था में कहीं तेज वृद्धि हुई थी।</li>
<li style="text-align:justify;">सांख्यिकी मंत्रालय की वेबसाइट पर इसे जारी करने के करीब 15 दिनों के बाद सरकार ने इन अनुमानों को औपचारिक बताते हुए रिपोर्ट को ‘ड्राफ्ट’ कहकर खारिज कर दिया।</li>
<li style="text-align:justify;"> जीडीपी के नए आँकड़ों के तकनीकी तौर पर पुराने अनुमानों से बेहतर होने के चाहे कितने भी दावे किए जा रहे हों लेकिन उनकी विश्वसनीयता के लिए जरुरी है कि उन्हें हकीकत की कसौटी पर कसा जाए।</li>
<li style="text-align:justify;">इस मोर्चे पर नए आँकड़े नाकाम साबित हो रहे हैं। वर्ष 2007-08 के तेज वृद्धि वाले दौर की वृद्धि को 9.8% से फीसदी से घटाकर 7.7% कर दिया गया है।</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:right;"><strong>राहुल लाल</strong></p>
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<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Dec 2018 20:00:58 +0530</pubDate>
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                <title>चीन में धार्मिक आजादी पर संकट</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/the-crisis-on-religious-freedom-in-china/article-5521"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/cinaa-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र की नस्ली भेदभाव उन्मूलन समिति का यह खुलासा चीन के दोहरे चरित्र को उजागर करने वाला है कि उसने 10 लाख से ज्यादा उइगर मुस्लिमों को कथित तौर पर कट्टरवाद विरोधी गुप्त शिविरों में कैद रखा है और 20 लाख अन्य को विचारधारा बदलने का दबाव बना रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सामाजिक स्थिरता और धार्मिक कट्टरता से निपटने के नाम पर चीन ने इगर स्वायत क्षेत्र को कुछ ऐसा बना दिया है जो गोपनीयता के आवरण में ढंका बहुत बड़ा नजरबंदी शिविर जैसा है। रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि इन शिविरों में जबरन राष्ट्रपति शी चिनफिंग की वफादारी की कसम दिलवाई जाती है और कम्युनिस्ट पार्टी के नारे लगवाए जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गौर करें तो इस तरह का खुलासा कोई पहली बार नहीं हुआ है। अभी चंद दिन पहले ही अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉपियो द्वारा धार्मिक आजादी के मुद्दे पर चीन की यह कहकर आलोचना की गयी थी कि वहां धार्मिक स्वतंत्रता संकट में है और रह रहे विभिन्न धर्मावलंबियों के धार्मिक क्रियाकलापों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि चीन द्वारा उइगर मुसलमानों और तिब्बती बौद्धों की धार्मिक स्वतंत्रता का दमन किया जा रहा है जो कि मौलिक मानवाधिकारों का उलंघन है। इस कड़ी टिप्पणी से चीन को शर्मसार होना पड़ रहा है कि वह अपनी सुरक्षा व संप्रभुता के नाम पर अपनी भूमि पर रहने वाले गैर धर्मावलंबियों के साथ सख्ती से पेश आ रहा है। नि:संदेह चीन को अधिकार है कि वह दुनिया भर में इस्लामिक आतंक के कहर से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए ठोस कदम उठाए। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह लोगों की धार्मिक आजादी पर पाबंदी थोप उन्हें कैदी बना ले। अब चीन चाहे जो भी सफाई दे लेकिन यह सत्य है कि वह अपने मुस्लिम बाहुल्य प्रांतों में ऐसा ही अत्याचार कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">
चीन की सरकार ने इन प्रांतों में धार्मिक शिक्षा पर रोक लगा दी है। जिन मस्जिदों में कभी हजारों बच्चे कुरान पढ़ने के लिए आते थे, अब वहां उनका प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। बच्चों के परिजनों को भी हिदायत दी गयी है कि वे बच्चों को मस्जिदों में कुरान पढ़ने के लिए न भेजें क्योंकि इससे वे धर्मनिरपेक्ष पाठ्यक्रमों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। यहां के स्थानीय प्रशासन ने उन छात्रों की तादाद घटा दी है जिन्हें 16 साल से अधिक उम्र के चलते मस्जिदों में पढ़ने की अनुमति मिली हुई है। मस्जिदों में नियुक्त किए जाने वाले नए इमामों के लिए प्रमाणपत्र हासिल करने की प्रक्रिया को भी सीमित कर दिया गया है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार शिनजियांग प्रांत में और भी अधिक कठोरता से पेश आ रही है। यहां के रहने वाले उइगर समुदाय के लोगों को शिक्षा शिविरों में डाल दिया गया है जहां उन्हें कुरान पढ़ने या दाढ़ी रखने की सख्त मनाही है।</p>
<p style="text-align:justify;">याद होगा इस वर्ष के जनवरी माह में ही चीन की सरकार ने यहां के मुस्लिम समुदाय के लोगों को चेतावनी दी कि वे नाबालिगों को कुरान पढ़ने के लिए या धार्मिक गतिविधयों में भाग लेने के लिए मस्जिदों में न जाने दें और न ही इसका समर्थन करें। अगर वे ऐसा करते हैं तो उन्हें दंड भुगतना होगा। सरकार के इस रवैए से यहां रह रहे मुसलमानों के मन में इन प्रतिबंधों से यह धारणा पनपने लगी है कि सरकार उनकी रीति-रिवाज और परंपाओं को खत्म करने पर आमादा है। उन्हें लग रहा है कि सरकार 1966 का माहौल निर्मित करना चाहती है, जिस दौरान मस्जिदों को ढहा दिया गयाया फिर जानवरों को रखने की जगह के रुप तब्दील कर दिया गया था। उइगर मुसलमानों की यह चिंता अनायास नहीं है। गौर करें तो चीन की सरकार ने यहां के मस्जिदों पर राष्ट्रीय झंडा लगाना अनिवार्य कर दिया है और ध्वनि प्रदुषण की आड़ में इन मस्जिदों के इमामों को चेताया है कि वह नमाज के लिए माइक के जरिए लोगों को बुलावा न भेंजे। दरअसल विगत वर्षों में चीन में कई आतंकी घटनाएं हुई हैं जिनमें कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों का हाथ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन की सरकार इस नतीजे पर है कि भले ही उसने तत्कालीन आक्रोश को दबा दिया लेकिन उसकी आग अभी बुझी नहीं है। चूंकि इस्लामिक आतंकी संगठन पहले ही शिनजियांग प्रांत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का आह्नान कर चुके हैं ऐसे में चीन एक रणनीति के तरत उइगर मुसलमानों के खिलाफ काम कर रहा है। शिंजियांग प्रांत की बात करें तो यह प्रांत प्रारंभ से ही संवेदनशील रहा है। यहां 40 से 50 फीसदी आबादी उइगर मुसलमानों की है जिसे काबू में करने के लिए वहएक रणनीति के तहत यहां हान वंशीय चीनियों को बड़ी संख्या में बसाना शुरू कर दिया है। नतीजा उइगर मुसलमानों की संख्या सिकुड़ने लगी है। वह चीनी हान वंशियों की आबादी के आगे अल्पसंख्यक बन कर रह गए हैं। ऐसे में उइगर मुसलमानों को अपनी संस्कृति को लेकर चिंता सताना लाजिमी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>अभिजीत मोहन</strong></p>
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                <pubDate>Thu, 23 Aug 2018 08:43:00 +0530</pubDate>
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