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                <title>Space - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Earth's Atmosphere: पृथ्वी का वायुमंडल कैसे बचाता है हमारी जान? जानिए इसके हैरान करने वाले राज</title>
                                    <description><![CDATA[धरती से अंतरिक्ष तक का रोमांचक सफर – आखिर अंतरिक्ष कहाँ से शुरू होता है?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/earths-atmosphere/article-87477"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/earth&#039;s-atmosphere.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Earth's Atmosphere:  अनु सैनी। </strong>क्या आपने कभी रात के आसमान को देखकर सोचा है कि आखिर अंतरिक्ष शुरू कहाँ से होता है? क्या 10 किलोमीटर की ऊँचाई पर उड़ता हवाई जहाज अंतरिक्ष में होता है? या फिर चाँद तक पहुँचने के बाद ही अंतरिक्ष शुरू माना जाता है? इन सवालों का जवाब जानने के लिए हमें धरती के ऊपर मौजूद वायुमंडल की पाँच परतों को समझना होगा। जिस तरह पृथ्वी के अंदर कई परतें होती हैं, उसी तरह पृथ्वी के ऊपर भी गैसों से बनी पाँच मुख्य परतें हैं। इन्हीं परतों की वजह से धरती पर जीवन संभव है। ये हमें साँस लेने के लिए हवा देती हैं, सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती हैं और अंतरिक्ष से आने वाले अधिकांश उल्कापिंडों को धरती तक पहुँचने से पहले ही जला देती हैं।<br />आइए अब एक-एक करके इन पाँचों परतों की यात्रा करते हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">1. ट्रोपोस्फियर (Troposphere) – जीवन की परत</h3>
<p style="text-align:justify;">धरती की सतह से लगभग 8 से 12 किलोमीटर तक फैली पहली परत को ट्रोपोस्फियर या क्षोभमंडल कहा जाता है। यही वह परत है जहाँ इंसान, जानवर, पेड़-पौधे और लगभग सभी जीव रहते हैं। धरती के वायुमंडल का लगभग 75 प्रतिशत भाग और लगभग सारा जलवाष्प इसी परत में मौजूद होता है। यही वह जगह है जहाँ बादल बनते हैं, बारिश होती है, आँधी-तूफान आते हैं, बिजली चमकती है और इंद्रधनुष दिखाई देता है। दूसरे शब्दों में कहें तो धरती का पूरा मौसम इसी परत में बनता और बदलता है।<br />जैसे-जैसे हम ऊपर जाते हैं, हवा का दबाव और ऑक्सीजन कम होने लगती है। लगभग 5 किलोमीटर की ऊँचाई पर साँस लेना कठिन होने लगता है और 8 से 10 किलोमीटर की ऊँचाई पर बिना ऑक्सीजन के अधिक देर तक जीवित रहना लगभग असंभव हो जाता है। यात्री विमान सामान्यतः 9 से 12 किलोमीटर की ऊँचाई पर उड़ते हैं। इस ऊँचाई पर हवा पतली होती है, जिससे ईंधन की बचत होती है और मौसम का प्रभाव भी अपेक्षाकृत कम रहता है। यदि ट्रोपोस्फियर न होता, तो न बारिश होती, न नदियाँ बहतीं और न ही धरती पर जीवन संभव होता।</p>
<h4 style="text-align:justify;">2. स्ट्रैटोस्फियर (Stratosphere) – धरती की सुरक्षा ढाल</h4>
<p style="text-align:justify;">ट्रोपोस्फियर के ऊपर लगभग 12 से 50 किलोमीटर तक फैली दूसरी परत स्ट्रैटोस्फियर या समतापमंडल कहलाती है। इस परत में मौसम लगभग शांत रहता है। यहाँ बादल, बारिश और तूफान बहुत कम होते हैं। इसी कारण कुछ विशेष विमान और मौसम संबंधी गुब्बारे इस क्षेत्र तक पहुँचते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस परत की सबसे बड़ी विशेषता है ओज़ोन परत। यही ओज़ोन सूर्य से आने वाली खतरनाक पराबैंगनी (UV) किरणों का अधिकांश भाग रोक लेती है। यदि ओज़ोन परत न होती, तो त्वचा का कैंसर, आँखों की गंभीर बीमारियाँ और पौधों को भारी नुकसान होता। शायद धरती पर जीवन आज जैसा है, वैसा कभी विकसित ही नहीं हो पाता। ट्रोपोस्फियर में ऊपर जाने पर तापमान घटता है, लेकिन स्ट्रैटोस्फियर में इसके विपरीत ऊपर जाते-जाते तापमान बढ़ने लगता है। इसका कारण यही है कि ओज़ोन सूर्य की ऊर्जा को अवशोषित करके वातावरण को गर्म करती है। यदि कोई व्यक्ति बिना स्पेस सूट के यहाँ पहुँच जाए, तो ऑक्सीजन की कमी और बेहद कम वायुदाब के कारण कुछ ही समय में उसकी जान खतरे में पड़ जाएगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;">3. मेसोस्फियर (Mesosphere) – धरती की अग्नि ढाल</h4>
<p style="text-align:justify;">लगभग 50 से 85 किलोमीटर तक फैली तीसरी परत मेसोस्फियर या मध्यमंडल कहलाती है। यह पृथ्वी के लिए एक प्राकृतिक सुरक्षा कवच है। अंतरिक्ष से आने वाले अधिकांश छोटे उल्कापिंड इसी परत में प्रवेश करते ही अत्यधिक गति के कारण हवा से टकराकर गर्म हो जाते हैं और जलकर नष्ट हो जाते हैं। रात के समय जो "टूटते तारे" दिखाई देते हैं, वे वास्तव में तारे नहीं बल्कि जलते हुए उल्कापिंड होते हैं।<br />इस परत का तापमान लगभग -90 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच सकता है, इसलिए यह पृथ्वी के वायुमंडल का सबसे ठंडा क्षेत्र माना जाता है। यहाँ हवा इतनी कम होती है कि बिना विशेष स्पेस सूट के साँस लेना असंभव है। हालाँकि हवा बहुत पतली होती है, लेकिन उल्कापिंड लगभग 40 से 70 किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से प्रवेश करते हैं। इतनी अधिक गति के कारण उनके सामने की हवा अत्यधिक संपीड़ित होती है और वही उन्हें अत्यधिक गर्म कर देती है। इसी वजह से वे जलते हुए दिखाई देते हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">4. थर्मोस्फियर (Thermosphere) – जहाँ से अंतरिक्ष का एहसास शुरू होता है</h4>
<p style="text-align:justify;">मेसोस्फियर के ऊपर लगभग 85 किलोमीटर से 600 किलोमीटर तक फैली चौथी परत थर्मोस्फियर कहलाती है। यहीं पर लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई पर कार्मान रेखा (Kármán Line) मानी जाती है, जिसे अधिकांश वैज्ञानिक अंतरिक्ष की शुरुआत मानते हैं।<br />इस परत में सूर्य की तीव्र ऊर्जा के कारण तापमान 1500 से 2000 डिग्री सेल्सियस या उससे भी अधिक हो सकता है। लेकिन यहाँ हवा इतनी विरल होती है कि यदि कोई वस्तु यहाँ हो, तो उसे उतनी गर्मी महसूस नहीं होगी जितनी पृथ्वी पर होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहीं पर अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) लगभग 400 किलोमीटर की ऊँचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करता है। कई उपग्रह भी इसी क्षेत्र में मौजूद रहते हैं। ध्रुवीय क्षेत्रों में दिखाई देने वाली अद्भुत रोशनी, जिसे ऑरोरा कहा जाता है, इसी परत में बनती है। यह सूर्य से आने वाले आवेशित कणों और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के बीच होने वाली क्रिया का परिणाम है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">5. एक्सोस्फियर (Exosphere) – अंतरिक्ष का द्वार</h4>
<p style="text-align:justify;">थर्मोस्फियर के ऊपर लगभग 600 किलोमीटर से लेकर लगभग 10,000 किलोमीटर तक फैली अंतिम परत एक्सोस्फियर कहलाती है। यह पृथ्वी के वायुमंडल और अंतरिक्ष के बीच की अंतिम सीमा है। यहाँ हवा इतनी कम होती है कि गैसों के कण एक-दूसरे से शायद ही कभी टकराते हैं। यहीं से पृथ्वी का वातावरण धीरे-धीरे समाप्त होकर अंतरिक्ष में मिल जाता है। इस क्षेत्र में कई संचार और मौसम उपग्रह पृथ्वी की परिक्रमा करते हैं। यदि कोई अंतरिक्ष यात्री इस क्षेत्र में बिना स्पेस सूट के पहुँच जाए, तो कुछ ही सेकंड में ऑक्सीजन की कमी और निर्वात के कारण उसका जीवित रहना असंभव होगा।</p>
<h4 style="text-align:justify;">आखिर अंतरिक्ष कहाँ से शुरू होता है?</h4>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिकों के अनुसार लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई पर स्थित कार्मान रेखा को अंतरिक्ष की शुरुआत माना जाता है। इस ऊँचाई के बाद हवा इतनी कम हो जाती है कि सामान्य विमान उड़ नहीं सकते। इसलिए अंतरिक्ष तक पहुँचने के लिए रॉकेट का उपयोग किया जाता है। रॉकेट पहले ट्रोपोस्फियर, फिर स्ट्रैटोस्फियर, उसके बाद मेसोस्फियर और थर्मोस्फियर को पार करता है। लगभग 100 किलोमीटर की ऊँचाई पार करते ही वह तकनीकी रूप से अंतरिक्ष में प्रवेश कर जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">धरती का वायुमंडल केवल गैसों की परत नहीं, बल्कि जीवन की सुरक्षा करने वाला एक अद्भुत कवच है। ट्रोपोस्फियर हमें साँस लेने की हवा और मौसम देता है, स्ट्रैटोस्फियर की ओज़ोन परत हमें सूर्य की हानिकारक किरणों से बचाती है, मेसोस्फियर उल्कापिंडों को जलाकर पृथ्वी की रक्षा करता है, थर्मोस्फियर अंतरिक्ष स्टेशन और ऑरोरा का घर है, जबकि एक्सोस्फियर हमें धीरे-धीरे अनंत अंतरिक्ष से जोड़ देता है। यही कारण है कि जब कोई रॉकेट पृथ्वी से उड़ान भरता है, तो वह केवल ऊपर नहीं जाता, बल्कि जीवन की रक्षा करने वाली इन पाँचों परतों को पार करके उस विशाल ब्रह्मांड में प्रवेश करता है, जिसे हम अंतरिक्ष कहते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 02 Jul 2026 11:44:14 +0530</pubDate>
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                <title>NASA Helicopter Flying On Mars: मंगल ग्रह पर उड़ा नासा का हेलीकॉप्टर, नासा ने दी जानकारी, देखें&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[NASA Helicopter Flying On Mars: नासा के मंगल हेलीकॉप्टर ने लाल ग्रह पर अपनी 56 उड़ानें पूरी कर ली। यह जानकारी एजेंसी ने दी। नासा के अनुसार, मंगल हेलीकॉप्टर ने 25 अगस्त को अपनी 56वीं उड़ान शुरू की थी, जिसमें वह 12 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचा और 141 सेकंड में 410 मीटर की यात्रा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/nasas-helicopter-flew-on-mars-nasa-sent-video-see/article-51811"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/nasa-helicopter-flying-on-mars.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">NASA Helicopter Flying On Mars: नासा के मंगल हेलीकॉप्टर ने लाल ग्रह पर अपनी 56 उड़ानें पूरी कर ली। यह जानकारी एजेंसी ने दी। नासा के अनुसार, मंगल हेलीकॉप्टर ने 25 अगस्त को अपनी 56वीं उड़ान शुरू की थी, जिसमें वह 12 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचा और 141 सेकंड में 410 मीटर की यात्रा की। इंजेनुइटी नामक यह हेलीकॉप्टर 18 फरवरी, 2021 को मंगल ग्रह के जेजेरो क्रेटर पर पहुंचा था, जो नासा के पर्सिवरेंस रोवर से जुड़ा हुआ था। यह हेलीकॉप्टर एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शन है, जिसे किसी अन्य ग्रह पर संचालित उड़ान का परीक्षण करने के लिए पहली बार डिजाइन किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">नासा के अनुसार, हेलीकॉप्टर को 90 सेकंड तक उड़ान भरने, एक समय में लगभग 300 मीटर की दूरी तक करने और जमीन से लगभग तीन से 4.5 मीटर की दूरी तक उडने के लिए डिजाइन किया गया था। नासा के अनुसार, अब तक, इस हेलीकॉप्टर ने मंगल ग्रह पर 100.2 उड़ान मिनट पूरा किया है, 12.9 किलोमीटर की दूरी तय की है और 18 मीटर की ऊंचाई तक पहुंचा है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Sep 2023 11:01:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>तुर्की ने स्वदेशी परीक्षण रॉकेट को अंतरिक्ष में किया प्रक्षेपित</title>
                                    <description><![CDATA[अंकारा (एजेंसी)। तुर्की ने स्वदेश में निर्मित परीक्षण रॉकेट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया है। तुर्की अंतरिक्ष एजेंसी ने जानकारी दी है। अंतरिक्ष एजेंसी ने शनिवार को ट्वीट कर कहा, ‘अंतरिक्ष तक पहुंचने के हमारे देश के प्रयासों के तहत, घरेलू और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकियों से विकसित परीक्षण रॉकेट को इग्नेडा से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/turkey-launches-indigenous-test-rocket-into-space/article-51143"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/turkiye.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>अंकारा (एजेंसी)।</strong> तुर्की ने स्वदेश में निर्मित परीक्षण रॉकेट को सफलतापूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित किया है। तुर्की अंतरिक्ष एजेंसी ने जानकारी दी है। अंतरिक्ष एजेंसी ने शनिवार को ट्वीट कर कहा, ‘अंतरिक्ष तक पहुंचने के हमारे देश के प्रयासों के तहत, घरेलू और राष्ट्रीय प्रौद्योगिकियों से विकसित परीक्षण रॉकेट को इग्नेडा से सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया।<br />
इस रॉकेट को प्रमुख तुर्की हथियार और मिसाइल निमार्ता रोकेटसन द्वारा विकसित किया गया है। तुर्की अंतरिक्ष एजेंसी ने बताया कि रॉकेट का इच्छित लक्ष्य 550 किलोमीटर की ऊंचाई तक पहुंच रहा है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 13 Aug 2023 09:40:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Laika Doggy: जब अंतरिक्ष में पहली बार कुत्ता गया तो&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[लाइका, जिसकी जिदगी  यूं ही सड़कों पर घूमते फिरते कट रही थी (Laika Doggy ) लेकिन उसे क्या पता था कि ये सब जल्दी ही बदलने वाला था। बात 1950 के दशक की है। इंसान जब भी आकाश की ओर देखता, एक उत्सुकता जाग उठती थी। अंतरिक्ष की अनंत गहराइयों को हम कब नाप पाएंगे। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/when-the-dog-went-into-space-for-the-first-time-what-happened/article-46145"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-04/laika-doggy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लाइका, जिसकी जिदगी  यूं ही सड़कों पर घूमते फिरते कट रही थी (Laika Doggy ) लेकिन उसे क्या पता था कि ये सब जल्दी ही बदलने वाला था। बात 1950 के दशक की है। इंसान जब भी आकाश की ओर देखता, एक उत्सुकता जाग उठती थी। अंतरिक्ष की अनंत गहराइयों को हम कब नाप पाएंगे। लिहाजा रॉकेट बनाए गए, जिनमें बैठकर इंसान आकाश गंगाओं का रुख करने वाला था। इसे किस्मत कहेंगे या बदकिस्मती कि वैज्ञानिकों ने इस मिशन के लिए लाइका को चुना। वैज्ञानिक ये जानना चाहते थे कि स्पेस फ्लाइट का किसी जीवित प्राणी पर क्या असर होता है। रॉकेट की मदद से स्पेस क्राफ्ट ने टेक आॅफ किया और 162 दिन बाद धरती पर लौटा। धरती के 2570 चक्कर लगाने के बाद। लेकिन लाइका न लौटी। उसकी मौत हो चुकी थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">‘लम्बी छलांग में एक पंजा भी शामिल’ | Laika Doggy</h3>
<p style="text-align:justify;">बात वाजिब थी लेकिन पूरी नहीं। असलियत में ये छोटा सा कदम सिर्फ इंसान का नहीं था। एक छोटा पंजा भी इसमें शामिल था। एक कुत्ते का, जिसका नाम था लाइका।</p>
<h3 style="text-align:justify;">अंतरिक्ष का सफर | Laika Doggy</h3>
<p style="text-align:justify;">दिन 4 अक्टूबर 1957, अमेरिकी राष्ट्रपति आइजनहावर के आॅफिस में गहमागहमी और दिनों से कुछ ज्यादा थी। लोग फाइलें लिए इधर उधर दौड़ रहे थे। प्रेस रूम में पत्रकार अपने तीखे सवालों के साथ तैयार खड़े थे। टीवी पर ब्रेकिंग न्यूज चल रही थीं। सोवियत रूस से हार गया अमेरिका। लानत हो, वाले लहजे में एंकर फिकरे बरसा रहे थे। ये सब हो रहा था एक छोटे से चमकते गोले के कारण। महज 23 इंच व्यास था जिसका, लेकिन आइजनहावर के लिए मुसीबत का सबब बन गया था, क्योंकि ये गोला अंतरिक्ष में था और धरती के चक्कर लगा रहा था।<br />
स्पेस रेस में सोवियत रूस ने पहली बाजी मार ली थी। स्पूतनिक-1, ये नाम था दुनिया की पहली आर्टिफिशियल सैटेलाइट का। स्पूतनिक- रूसी भाषा के इस शब्द का मतलब होता है हमसफर। सफर जो अनंत आकाश में चल रहा रहा लेकिन इस यात्रा में हमसफर बनने की होड़ में एक और देश लगा हुआ था। – अमेरिका।</p>
<p style="text-align:justify;">द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने चुपके से नाजी जर्मन वैज्ञानिकों और इंजीनियरों अपने यहां भर्ती किया। इनमें से एक का नाम था वर्नर वॉन ब्रॉन। ब्रॉन ने WW2 के दौरान V2 नाम की एक उन्नत तकनीक वाली मिसाइल बनाई थी। उनकी इसी योग्यता के चलते अमेरिका ने अपने इंटरकांटिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम की कमान उसके हाथ में सौंप दी। हालांकि तब राकेट और मिसाइल का मतलब एक ही था। इसलिए यही स्पेस प्रोग्राम का शुरूआती चरण भी बन गया। ब्रॉन खुद भी स्पेस प्रोग्राम में बहुत रूचि रखता था। बल्कि युद्ध के दौरान जब उसकी मिसाइलें लन्दन पर कहर बरसा रही थीं, वो कहता था, ये राकेट काम तो ठीक से कर रहे है लेकिन इनकी लैंडिंग बस गलत ग्रह पर हो रही है. ब्रान धरती दरअसल अपने रॉकेटों को धरती के पार सुदूर अंतरिक्ष में पहुंचाना चाहता था। जल्द ही उसका ये मंसूबा भी पूरा हो गया।</p>
<h3 style="text-align:justify;">अमेरिका-रूस आमने-सामने | Laika Doggy</h3>
<p style="text-align:justify;">आइजनहावर ने 1955 में घोषणा की कि अमेरिका जल्द ही अपनी पहली आर्टफिशियल सैटेलाइट लॉन्च करेगा। चार दिन बाद रूस ने भी ऐसा ही ऐलान किया और दोनों देश स्पेस रेस की स्टार्टिंग लाइन पर आकर खड़े हो गए। अमेरिका तैयारी में लगा था लेकिन रूस ने पहली बाजी मारते हुए अक्टूबर 1957 में पहली सैटेलाइट लॉन्च भी कर दिया। इससे पहले कि अमेरिका रियेक्ट कर पाता, रूस ने स्पूतनिक टू के लॉन्च की तैयारी भी पूरी कर ली और 30 दिन के भीतर उसे भी लॉन्च कर दिया। हालांकि स्पूतनिक वन और टू में एक अंतर था। इस बार ये सैटेलाइट अकेले नहीं जा रहा था। एक जीवित हमसफर भी इसके साथ था। यहां से इस कहानी में एंट्री होती है लाइका की।</p>
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                                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 15 Apr 2023 11:41:35 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>अंतरिक्ष क्षेत्र में नई ऊंचाइयां हासिल कर रहा है देश : पीएम</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में देश नयी ऊंचाई हासिल कर रहा है और हमारे युवा सरकार के स्टार्टअप कार्यक्रम के जरिए अंतरिक्ष के क्षेत्र मे भी नए आयाम उपलब्ध कर रहा है। प्रधानमंत्री ने रविवार को रेडियो पर प्रसारित अपने मासिक कार्यक्रम ‘मन की बात’, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/the-country-is-achieving-new-heights-in-the-space-sector-pm/article-34903"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-06/pm-narendra-modi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि अंतरिक्ष क्षेत्र में देश नयी ऊंचाई हासिल कर रहा है और हमारे युवा सरकार के स्टार्टअप कार्यक्रम के जरिए अंतरिक्ष के क्षेत्र मे भी नए आयाम उपलब्ध कर रहा है। प्रधानमंत्री ने रविवार को रेडियो पर प्रसारित अपने मासिक कार्यक्रम ‘मन की बात’, में कहा कि स्टार्टअप कार्यक्रम उनकी सरकार की अनूठी योजना है और इसके जरिए देश का युवा नए आकाश को छूने की कोशिश में लगा हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी सरकार ने हर युवा को उद्यमिता के क्षेत्र प्रोत्साहित करने के लिए इस योजना की शुरूआत की थी और यह कार्यक्रम आज अंतरिक्ष क्षेत्र में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह की योजना से आज देश सफलता के नए आकाश को छू रहा है। इसरो अंतरिक्ष क्षेत्र में जो काम कर रहा है उसे देश की जनता कैसे भूल सकती हैं। इसरो अंतरिक्ष क्षेत्र में कई अवसर युवाओं के लिए पैदा कर रहा है और दुनिया में अपना रुतबा लगातार बढ़ा रहा है। पिछले दिनों इसरो ने अंतरिक्ष क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने कहा कि पहले अंतरिक्ष क्षेत्र में स्टार्टअप के बारे में सोचता तक नहीं था लेकिन आज 100 से अधिक स्टार्टअप अंतरिक्ष क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इसमे एक हैदराबाद का स्टार्टअप है जो रूस की टेक्नोलॉजी लेकर काम कर रहा है। यह स्टार्टअप अंतरिक्ष में कचरे को साफ करने के लिए काम कर रहा हैं। इसी तरह का एज अनूठा स्टार्टअप बेंगलुरु में भी चल रहा है।</p>
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                <pubDate>Sun, 26 Jun 2022 16:38:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>अंतरिक्ष, साइबर क्षेत्र में सामरिक संवाद स्थापित करेंगे भारत-फ्रांस</title>
                                    <description><![CDATA[पेरिस (एजेंसी)। भारत और फ्रांस ने अंतरिक्ष एवं साइबर क्षेत्रों में द्विपक्षीय सामरिक संवाद प्रणालियां स्थापित करने तथा विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भर भारत अभियान में फ्रांस की अधिकाधिक भूमिका के लिए रास्ते तलाशने पर सहमति व्यक्त की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की बुधवार देर शाम हुई मुलाकात के बाद […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/india-france-to-establish-strategic-dialogue-in-space-cyber-sector/article-32983"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-05/cyber-security-expert.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>पेरिस (एजेंसी)।</strong> भारत और फ्रांस ने अंतरिक्ष एवं साइबर क्षेत्रों में द्विपक्षीय सामरिक संवाद प्रणालियां स्थापित करने तथा विभिन्न क्षेत्रों में आत्मनिर्भर भारत अभियान में फ्रांस की अधिकाधिक भूमिका के लिए रास्ते तलाशने पर सहमति व्यक्त की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों की बुधवार देर शाम हुई मुलाकात के बाद जारी संयुक्त वक्तव्य में यह जानकारी दी गई। दोनों नेताओं के बीच हुई बैठक में समकालीन वैश्विक एवं क्षेत्रीय मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण चर्चा हुई और दोनों पक्षों ने यूक्रेन में तुरंत युद्ध समाप्त करने की अपील करते हुए वहां मानवीय सहायता मुहैया कराने की आवश्यकता जताई तथा अफगानिस्तान में एक सर्वसमावेशी सरकार के गठन का आह्वान किया।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त वक्तव्य में कहा गया कि दोनों देशों के बीच वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग की महान परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अंतरिक्ष में पैदा होने वाली समकालीन चुनौतियों का मुकाबला करने और अंतरिक्ष को सबके लिए सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करने के लिए भारत एवं फ्रांस अंतरिक्ष संबंधी मामलों पर द्विपक्षीय सामरिक संवाद स्थापित करने पर सहमत हुए हैं। वक्तव्य के अनुसार इस द्विपक्षीय सामरिक संवाद के स्थापित होने से अंतरिक्ष एवं रक्षा एजेंसियों, प्रशासन एवं बाह्य अंतरिक्ष में सुरक्षा संबंधी एवं आर्थिक चुनौतियों पर विचार करने वाले विशेषज्ञों का एक मंच पर लाया जा सकेगा।अंतरिक्ष से जुड़े नियम एवं सिद्धांतों के लागू होने से सहयोग के नये क्षेत्रों का खुलासा होगा। दोनों पक्षों ने इसकी पहली बैठक इसी वर्ष आयोजित करने पर भी सहमति व्यक्त की है।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों पक्षों ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकी, विनिर्माण एवं निर्यात के लिए भारत एवं फ्रांस के बीच सघन संपर्क एवं भूमिका के उपाय करने पर भी सहमति जतायी। इसमें औद्योगिक संस्थानों के बीच सहयोग को बढ़ावा देने की बात कही गयी है। वक्तव्य में स्कोर्पीन पनडुब्बी समेत वर्तमान में शस्त्र निर्माण के क्षेत्र में सहयोग की सराहना की गयी। वक्तव्य में दोनों देशों की सशस्त्र सेनाओं के बीच संयुक्त अभ्यासों -शक्ति, वरुण, पेगासे, डेजर्ट नाइट और गरुड़ की सराहना की गयी और कहा कि हिन्द महासागर में दोनों नौसेनाओं के बीच तालमेल प्रगाढ़ रहेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग के बारे में दोनों पक्षों ने साइबर नियमों एवं सिद्धांतों को बढ़ावा देने वाले कार्यबलों को मजबूत करने पर जोर दिया ताकि साइबर खतरों का मुकाबला किया जा सके। उन्होंने द्विपक्षीय साइबर संवाद भी स्थापित करने पर सहमति जताई ताकि साइबर स्पेस को खुला, शांतिपूर्ण एवं सुरक्षित रखा जा सके। दोनों देशों ने आतंकवाद निरोधक सहयोग को बढ़ाने, आतंकवादियों को धन मुहैया कराए जाने, कट्टरपन एवं हिंसक विचारधारा का मुकाबला करने, इंटरनेट को आतंकवादियों के हाथों दुरुपयोग नहीं होने देने, प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन एवं लोगों पर कार्रवाई किए जाने तथा हिन्द प्रशांत क्षेत्र में सामरिक साझीदारी को मजबूत करने की भी बात कही। दोनों देशों ने समकालीन अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों पर बात करते हुए यूक्रेन पर रूस का हमला तत्काल रोकने, यूक्रेन को मानवीय संकट में सहायता देने और अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के सर्वसमावेशी होने की भी वकालत की।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 05 May 2022 14:11:11 +0530</pubDate>
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                <title>हबल ने अब तक के सबसे दूर स्थित तारे की खोज की</title>
                                    <description><![CDATA[पेरिस (एजेंसी)। हबल स्पेस टेलीस्कॉप ने अब तक का सबसे दूर का व्यक्तिगत तारा खोजा है, जिसके प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने के लिए 12.9 अरब वर्ष की लगेगा। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) ने यह जानकारी दी है। ईएसए ने बुधवार को एक बयान में कहा, “नासा / ईएसए हबल स्पेस टेलीस्कोप ने एक असाधारण […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/hubble-space-telescope-discovered-the-farthest-star-ever-found/article-31940"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-03/galaxy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>पेरिस (एजेंसी)।</strong> हबल स्पेस टेलीस्कॉप ने अब तक का सबसे दूर का व्यक्तिगत तारा खोजा है, जिसके प्रकाश को पृथ्वी तक पहुंचने के लिए 12.9 अरब वर्ष की लगेगा। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) ने यह जानकारी दी है। ईएसए ने बुधवार को एक बयान में कहा, “नासा / ईएसए हबल स्पेस टेलीस्कोप ने एक असाधारण नया बेंचमार्क स्थापित किया है। बिग बैंग (6.2 की रेडशिफ्ट पर) में ब्रह्मांड के जन्म के बाद अरब वर्षों से मौजूद एक तारे के प्रकाश का पता लगाया, जो अब तक का सबसे दूर का व्यक्तिगत तारा है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>क्या है मामला</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि हबल नासा और ईएसए की संयुक्त परियोजना है और दुनिया की सबसे बड़ी अंतरिक्ष दूरबीनों में से एक है, जिसे 1990 में लॉन्च किया गया था।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 31 Mar 2022 14:29:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>धरती की ओर बढ़ रहे &amp;#8216;अंतरिक्ष के पहाड़&amp;#8217;, एस्टेरॉयड्स की बारिश मचाएगी तबाही?</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। कई विशालकाय क्षुद्र ग्रह लगातार पृथ्वी की ओर बढ़ रहे हैं। अगले कुछ दिनों में ये धरती के बेहद करीब से गुजरेंगे। उनमें से कुछ गीजा के पिरामिडों से भी बड़े हैं। इससे पहले क्षुद्रग्रह 2021 एसएम3 पृथ्वी के बेहद करीब से गुजरा था, जिसके बारे में नासा ने जानकारी दी थी। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/the-mountains-of-space-moving-towards-the-earth-will-the-rain-of-asteroids-wreak-havoc/article-27785"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-10/mountains-of-space.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> कई विशालकाय क्षुद्र ग्रह लगातार पृथ्वी की ओर बढ़ रहे हैं। अगले कुछ दिनों में ये धरती के बेहद करीब से गुजरेंगे। उनमें से कुछ गीजा के पिरामिडों से भी बड़े हैं। इससे पहले क्षुद्रग्रह 2021 एसएम3 पृथ्वी के बेहद करीब से गुजरा था, जिसके बारे में नासा ने जानकारी दी थी। सितंबर में क्षुद्रग्रह की खोज की गई थी। विशालकाय क्षुद्रग्रह 525 फीट व्यास का है। 2021 एसएम3 को पृथ्वी के सबसे नजदीकी चीज के रूप में पहचाना गया। नासा के अनुसार, इसकी निकटतम दूरी पर, यह पृथ्वी से 3.6 मिलियन मील की दूरी पर था। इस दूरी पर पृथ्वी को कोई खतरा नहीं है। पृथ्वी से 25 मिलियन मील की दूरी पर, ग्रह शुक्र की तुलना में क्षुद्रग्रह के करीब था। वैज्ञानिकों के अनुसार, 2021 एसएम3 पृथ्वी के करीब से गुजरने वाला एकमात्र विशालकाय क्षुद्रग्रह नहीं है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">क्या है मामला</h4>
<p style="text-align:justify;">अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा लगातार पृथ्वी के करीब क्षुद्रग्रहों की निगरानी कर रही है। क्षुद्रग्रहों से जुड़े खतरों से बचने के लिए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ‘डार्ट मिशन’ शुरू करेगी। एमएम3 से बड़े सात क्षुद्रग्रह नवंबर के अंत तक पृथ्वी के करीब से गुजरेंगे। इनमें से सबसे नजदीकी 1996 का वीबी3 है, जो 20 अक्टूबर को पृथ्वी से 2.1 मिलियन मील की दूरी से गुजरेगा। 1996 का वीबी3 क्षुद्रग्रह लगभग 754 फीट व्यास का है। वहीं, पृथ्वी की ओर बढ़ने वाला सबसे बड़ा क्षुद्रग्रह 2004 यूई है, जिसका व्यास 1,246 फीट है। 13 नवंबर 2004 को, यूई पृथ्वी से 2.6 मिलियन मील की दूरी तय करेगा।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/the-mountains-of-space-moving-towards-the-earth-will-the-rain-of-asteroids-wreak-havoc/article-27785</link>
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                <pubDate>Fri, 22 Oct 2021 11:55:28 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>स्पेस सेक्टर में भारत की बढ़ती भागीदारी सराहनीय</title>
                                    <description><![CDATA[अंतरिक्ष क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय बाजार के विस्तार को देखते हुए अपनी भागीदारी बढ़ाने की भारत की कोशिशें सराहनीय हैं। इस क्षेत्र में दशकों के हमारे व्यापक अनुभव और अब तक की उपलब्धियों से इन प्रयासों को बड़ा आधार मिल सकता है। स्पेस सेक्टर को दो हिस्सों- अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम- में बांट कर देखा जा सकता […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/indias-growing-participation-in-the-space-sector-is-commendable/article-27013"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-09/manned-space-mission.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अंतरिक्ष क्षेत्र के अंतरराष्ट्रीय बाजार के विस्तार को देखते हुए अपनी भागीदारी बढ़ाने की भारत की कोशिशें सराहनीय हैं। इस क्षेत्र में दशकों के हमारे व्यापक अनुभव और अब तक की उपलब्धियों से इन प्रयासों को बड़ा आधार मिल सकता है। स्पेस सेक्टर को दो हिस्सों- अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम- में बांट कर देखा जा सकता है। अपस्ट्रीम भाग में मुख्य रूप से मैनुफैक्चरिंग गतिविधियां, जैसे- सैटेलाइट बनाना, प्रक्षेपण वाहन का निर्माण, संबंधित कल-पूर्जे तैयार करना, उप-तंत्रों का निर्माण आदि आते हैं। डाउनस्ट्रीम हिस्से में सेवाओं को गिना जाता है, मसलन- सैटेलाइट टीवी, दूरसंचार, रिमोट सेंसिंग, जीपीएस, इमेजरी आदि। अभी मुख्य रूप से डाउनस्ट्रीम के हिस्से पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, लेकिन प्रक्षेपण आदि भी नजर में हैं। इसकी वजह यह है कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के पास मैनुफैक्चरिंग को प्राथमिकता देने के लिए पर्याप्त बजट उपलब्ध नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर मुद्रास्फीति को ध्यान में रखें, तो बजट और आवंटन में कमी के रुझान हैं। सरकार की नीति है कि सैटेलाइट दूरसंचार, रिमोट सेंसिंग आदि सेवा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागीदारी और निवेश को प्रोत्साहित किया जाए और वे इसरो के साथ मिलकर वैश्विक बाजार में भारत की हिस्सेदारी में वृद्धि करें। ऐसे प्रयासों से इसरो के पास जो धन आयेगा, उससे निर्माण और प्रक्षेपण में भी स्थिति मजबूत करने की स्थिति बनेगी। हमारे देश में स्पेस उद्योग में जो स्टार्टअप आये हैं या आ रहे हैं, उन्हें ऐसी गतिविधियों में उल्लेखनीय क्षमता हासिल करने में समय लगेगा। इसलिए इस मामले में इसरो की बढ़त बहुत अधिक है। लेकिन उपभोक्ता सेवाओं, जो बहुत उच्च स्तरीय हैं और उनकी मांग बढ़ती जा रही है, में नीतिगत पहल और निजी क्षेत्र की भागीदारी के अच्छे परिणाम निकल सकते हैं। इसरो के सैटेलाइटों और अन्य सेवाओं का इस्तेमाल तो रक्षा क्षेत्र द्वारा भी किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">भू-राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए ऐसा करना जरूरी भी है। इस मामले को व्यावसायिक विस्तार की पहल से कैसे अलग किया जायेगा, इस पर विचार होना चाहिए। यह एक कानूनी सवाल है। ऐसी ठोस व्यवस्था की आवश्यकता अंतरिक्ष क्षेत्र में भी होगी। यह करना मुश्किल नहीं है क्योंकि सरकार ने कुछ अहम हिस्सों को छोड़कर रक्षा क्षेत्र में भी निजी और विदेशी निवेश को आमंत्रित किया है। उसके नियमों और रूप-रेखा से स्पेस सेक्टर के लिए भी व्यवस्था की जा सकती है। भारत अंतरिक्ष सुरक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय है। स्पेस कारोबार में उस पहलू को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। निश्चित रूप से सरकार की पहल से संभावनाओं के द्वारा खुलेंगे और तकनीक व निवेश का विस्तार होगा। इसके साथ, रोजगार के मौके भी बनेंगे। यह भी देखना है कि क्या हम इस क्षेत्र में स्टार्टअप पर ही निर्भर होंगे या बाहर से कुछ स्थापित बड़ी कंपनियां भी भारत आयेंगी। एक संभावना यह भी है कि कुछ बड़े भारतीय उद्योग स्पेस इंडस्ट्री में निवेश करें।</p>
<p> </p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Sep 2021 09:37:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘इंस्पिरेशन-4’ क्रू पृथ्वी पर लौटा</title>
                                    <description><![CDATA[वाशिंगटन। अमेरिका की निजी अंतरिक्ष परिवहन सेवा कंपनी स्पेसएक्स का पहला ऑल-सिविलियन क्रू ‘ इंस्पिरेशन-4’ अंतरिक्ष में तीन दिन बिताने के बाद शनिवार को सफलतापूर्वक पृथ्वी पर लौट आया। स्पेसएक्स ने क्रू के उतरने का ट्विटर पर वीडियो जारी करते हुए कहा , “ स्प्लैशडाउन। ‘ इंस्पिरेशन-4’ , पृथ्वी पर आपका स्वागत है। Splashdown! Welcome […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/inspiration-4-crew-returns-to-earth/article-26977"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-09/inspiration-4-crew.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>वाशिंगटन।</strong> अमेरिका की निजी अंतरिक्ष परिवहन सेवा कंपनी स्पेसएक्स का पहला ऑल-सिविलियन क्रू ‘ इंस्पिरेशन-4’ अंतरिक्ष में तीन दिन बिताने के बाद शनिवार को सफलतापूर्वक पृथ्वी पर लौट आया। स्पेसएक्स ने क्रू के उतरने का ट्विटर पर वीडियो जारी करते हुए कहा , “ स्प्लैशडाउन। ‘ इंस्पिरेशन-4’ , पृथ्वी पर आपका स्वागत है।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p lang="en" dir="ltr" xml:lang="en">Splashdown! Welcome back to planet Earth, <a href="https://twitter.com/inspiration4x?ref_src=twsrc%5Etfw">@Inspiration4x</a>! <a href="https://t.co/94yLjMBqWt">pic.twitter.com/94yLjMBqWt</a></p>
<p>— SpaceX (@SpaceX) <a href="https://twitter.com/SpaceX/status/1439365668952940545?ref_src=twsrc%5Etfw">September 18, 2021</a></p></blockquote>
<p></p>
<p style="text-align:justify;">इंस्पिरेशन4 क्रू को क्रू ड्रैगन अंतरिक्ष यान के साथ 15 सितंबर को फ्लोरिडा के कैनेडी स्पेस सेंटर से प्रक्षेपित किया गया था। इंस्पिरेशन4 मिशन के चालक दल के सदस्यों में जेरेड इसाकमैन, सियान प्रॉक्टर, हेले आर्सीनॉक्स और क्रिस्टोफर सेम्ब्रोस्की शामिल थे।। उन्होंने अंतरिक्ष में तीन दिनों तक रहने के दौरान कई वैज्ञानिक शोध किये।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p lang="en" dir="ltr" xml:lang="en">The <a href="https://twitter.com/hashtag/Inspiration4?src=hash&amp;ref_src=twsrc%5Etfw">#Inspiration4</a> Crew Makes Evening Splashdown, Completing World’s First All-Civilian Orbital Mission to Space: <a href="https://t.co/NB4dV6DYgA">https://t.co/NB4dV6DYgA</a> <a href="https://t.co/TTUVhkmnJF">pic.twitter.com/TTUVhkmnJF</a></p>
<p>— Inspiration4 (@inspiration4x) <a href="https://twitter.com/inspiration4x/status/1439372743263363073?ref_src=twsrc%5Etfw">September 18, 2021</a></p></blockquote>
<p></p>
<p> </p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Sep 2021 10:02:57 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>इंसान ने पहली बार अंतरिक्ष में लगाई थी छलांग</title>
                                    <description><![CDATA[सोवियत यूनियन ने 1957 में पहले मानव निर्मित उपग्रह ‘स्पुतनिक’ प्रक्षेपित किया था। इसे इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना गया था और इसके ही बाद अमरीका से इस क्षेत्र में होड़ शुरू हुई और तब अमरीका ने चंद्रमा पर मानव को भेजा था। स्पुतनिक का प्रक्षेपण मानव इतिहास के लिए बहुत […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/man-first-jumped-into-space/article-18934"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-10/manned-space-mission.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सोवियत यूनियन ने 1957 में पहले मानव निर्मित उपग्रह ‘स्पुतनिक’ प्रक्षेपित किया था। इसे इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक माना गया था और इसके ही बाद अमरीका से इस क्षेत्र में होड़ शुरू हुई और तब अमरीका ने चंद्रमा पर मानव को भेजा था। स्पुतनिक का प्रक्षेपण मानव इतिहास के लिए बहुत बड़ी छलांग थी और इसे सोवियत यूनियन के लिए शीत युद्ध के वक्त प्रचार की एक बड़ी जीत माना गया था। आज से 63 साल पहले सन् 1957 में आज के ही दिन इंसान ने अंतरिक्ष में पहली छलांग लगाई थी। सोवियत संघ ने मानव इतिहास का पहला उपग्रह स्पुतनिक सफलता पूर्वक अंतरिक्ष में पहुंचाया था।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पुतनिक इंसानों की बनाई पहली चीज थी जो पृथ्वी के वायुमंडल से बाहर भेजी गई थी। स्पुतनिक का वजन 83.5 किलोग्राम था। पृथ्वी की परिक्रमा के दौरान स्पुतनिक की गति 29,000 किलोमीटर प्रतिघंटा थी। इंसान द्वारा बनाया गया पहला उपग्रह 96 मिनट में धरती का एक चक्कर पूरा कर रहा था। धातु की गेंद की तरह बनाए स्पुतनिक में चार एंटीने थे। प्रक्षेपण के वक्त वैज्ञानिकों को उम्मीद नहीं थी कि स्पुतनिक अंतरिक्ष से रेडियो सिग्नल भेजेगा। वैज्ञानिकों को लगा कि धरती के वायुमंडल से बाहर निकलते वक्त घर्षण की वजह से धातु का खोल गल जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि ऐसा हुआ भी, लेकिन इसके बावजूद स्पुतनिक वहां से रेडियो सिग्नल भेजने में कामयाब रहा। स्पुतनिक ऐसा पहला उपग्रह था जो अंतरिक्ष से मात्र 22 दिन ही सिग्नल भेज पाया। बैटरी खत्म होने की वजह से 26 अक्टूबर 1957 को स्पुतनिक खामोश हो गया। आम तौर पर सैटेलाइटों की औसत उम्र पांच से 20 साल के बीच होती है। भारत ने अपना पहला सैटेलाइट अप्रैल 1971 में छोड़ा था, इसका नाम आर्यभट्ट था। अमेरिका के करीबन एक हजार, जापान के 100 से ज्यादा, चीन के करीब 80, फ्रांस के 40 और भारत 30 से ज्यादा सैटेलाइट धरती की परिक्रमा कर रहे हैं।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/petrol-and-diesel-price-unchanged-2/">यह भी पढ़े – पेट्रोल-डीजल के दाम अपरिवर्तित</a></p>
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                                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/inspiration/man-first-jumped-into-space/article-18934</link>
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                <pubDate>Sun, 04 Oct 2020 09:55:04 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन की शुरुआत,  रूस में ट्रेनिंग लेंगे भारतीय अंतरिक्ष यात्री</title>
                                    <description><![CDATA[भारत के 2022 में पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन (Manned space mission) के लिए चयनित भारतीय ‘गगनयात्री’ अगले साल रूस के गागरिन कॉस्मोनॉट प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षण लेना शुरू करेंगे।
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/india-first-manned-space-mission-started/article-11204"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-11/manned-space-mission.jpg" alt=""></a><br /><h2>भारत प्रशिक्षण के लिए अगले साल अपने अंतरिक्ष यात्री रूस भेजेगा। Manned space mission</h2>
<p><strong>Edited By Vijay Sharma</strong></p>
<p><strong>दुबई(एजेंसी)।</strong> भारत के 2022 में पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन <strong>(Manned space mission)</strong> के लिए चयनित भारतीय ‘गगनयात्री’ अगले साल रूस के गागरिन कॉस्मोनॉट प्रशिक्षण केंद्र में प्रशिक्षण लेना शुरू करेंगे। रूस के एक वरिष्ठ अंतरिक्ष अधिकारी ने यह जानकारी दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि भारत के महत्वाकांक्षी गगनयान मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन के लिए रूस भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को प्रशिक्षण देगा। 2022 में अंतरिक्ष में जाने वाले इस मिशन में तीन यात्री होंगे, जिन्हें भारतीय सशस्त्र बलों के पायलटों में से चुना जाएगा।</p>
<h2>2022 में अंतरिक्ष में जाने वाले इस मिशन में तीन यात्री होंगे</h2>
<p>पीएम मोदी ने चार सितंबर को रूस के सुदूर पूर्वी शहर व्लादिवोस्तोक में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कहा था कि रूस गगनयान परियोजना के लिए भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को प्रशिक्षित करने में मदद करेगा। रूस की रोसकॉस्मॉस अंतरिक्ष एजेंसी का हिस्सा ग्लावकॉस्मॉस के प्रमुख दमित्री लोस्कुतोव ने सोमवार को ‘दुबई एयरशो 2019’ में तास समाचार एजेंसी से कहा, ‘कोस्मोनॉट प्रशिक्षण केंद्र में गगनयात्रियों की शिक्षा और प्रशिक्षण अगले वर्ष शुरू होना है। लेकिन यह भारत की ओर से चयन पर निर्भर करता है कि वह आखिरकार किसका चयन करता है और प्रशिक्षण के लिए रूस भेजता है।’</p>
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<p>India, Manned, Space, Mission, Started</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 20 Nov 2019 11:11:12 +0530</pubDate>
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