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                <title>implications - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>नीतीश कुमार की घर-वापसी के निहितार्थ</title>
                                    <description><![CDATA[बिहार में जदयू के नेतृत्व वाले गठबंधन के बिखराव की पटकथा नीतीश कुमार के शपथग्रहण करने के साथ ही लिखी जानी प्रारम्भ हो गयी थी, क्योंकि नीतीश कुमार और लालू यादव राजनीति के दो ध्रुवों की भांति थे जिनको केवल राजनीतिक परिस्थितियों ने एक दूसरे का दामन थामने पर मजबूर कर दिया था। नीतीश कुमार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/implications-of-nitish-kumars-return/article-2680"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/nitish-kumar-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बिहार में जदयू के नेतृत्व वाले गठबंधन के बिखराव की पटकथा नीतीश कुमार के शपथग्रहण करने के साथ ही लिखी जानी प्रारम्भ हो गयी थी, क्योंकि नीतीश कुमार और लालू यादव राजनीति के दो ध्रुवों की भांति थे जिनको केवल राजनीतिक परिस्थितियों ने एक दूसरे का दामन थामने पर मजबूर कर दिया था। नीतीश कुमार की छवि जहाँ सुशासन बाबू के रूप में विकसित हुई वहीं लालू यादव का अधिकांश राजनीतिक जीवन विवादों और आरोपों में घिरा रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में सशक्त और सम्भावित उम्मीदवार के रूप में नीतीश कुमार को विपक्षी दलों के प्रस्तावित राष्ट्रीय गठबंधन के रूप में प्रधानमन्त्री पद की राह आसान दिखाई पड़ी। जिसके कारण उन्होंने विपक्षी गठबंधन का अंग बनना स्वीकार किया लेकिन विपरीत विचारों के कारण लालू और नीतीश का एक साथ चल पाना मुश्किल था। दरअसल एक दूसरे के धुर राजनीतिक विरोधी रहे नीतीश और लालू यादव का यह साथ लम्बा चलनेवाला भी नहीं था। परिणामस्वरूप नीतीश कुमार ने विपक्षी एकता को झटका देते हुए अपने पुराने राजनीतिक साथी भाजपा से गठबंधन कर लिया।</p>
<h1 style="text-align:justify;">छवि को प्राथमिकता</h1>
<p style="text-align:justify;">आरोपों से घिरे और परस्पर विरोधी राजनीतिज्ञों से बने बेमेल विपक्षी गठ्बन्धन का अंग होने के कारण नीतीश कुमार सामाजिक और राजनीतिक तौर पर अपनी छवि को लेकर चिंतित थे। उनके लिए अपनी जनसामान्य में प्रचलित छवि को बरकरार रखना प्रथमिकता थी कि नीतीश कुमार सत्ता के लिए अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं करते,  और इसीलिए भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उन्होंने त्यागपत्र दे दिया। बेदाग छवि के नीतीश, उपमुख्यमंत्री तेजस्वी के विरुद्ध लगे भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद निरंतर सवालों के घेरे में थे। स्पष्ट है कि आसानी से विकल्प उपलब्धता की स्थिति में नीतीश ने बोझ बन चुकी गठबंधन सरकार के बदले अपनी छवि को चुन लिया।</p>
<h1 style="text-align:justify;">दूरियां यूँ बढ़ती गयी</h1>
<p style="text-align:justify;">दरअसल जदयू-कांग्रेस और राजद गठबंधन में विरोधाभास की स्थिति काफी पहले ही उत्पन्न हो गयी थी जब कई मुद्दों पर नितीश ने गठबंधन से अलग रुख अपनाया नीतीश ने गठबंधन के विरुद्ध जीएसटी, नोटबंदी और राष्ट्रपति चुनावों में भाजपा उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन किया।</p>
<p style="text-align:justify;">शहाबुद्दीन आॅडियो, उपमुख्यमंत्री पर लगते भ्रष्टाचार के आरोप, लालू यादव की हठधर्मिता ने रही-सही कसर पूरी कर दी। ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार के लिए सरकार चलाना एक दुष्कर कार्य साबित हो रहा था, जिससे मुक्त होकर पुराने और स्वाभाविक सहयोगी भाजपा के साथ जाना उन्हें बेहतर विकल्प लगा।</p>
<h1 style="text-align:justify;">सुशासन और भ्रष्टाचार बने राष्ट्रीय विमर्श के मुद्दे</h1>
<p style="text-align:justify;">बिहार की राजनीतिक उठापठक के कारण सुशासन और भ्रष्टाचार देश के राजनीतिक गलियारों में मुख्य मुद्दा बना। अन्यथा ऐसा प्रतीत होने लगा था जैसे इस देश में साम्प्रदायिकता के अलावा कोई समस्या बची नहीं है। गरीबी, भ्रष्टाचार, बेरोजगारी, आदि समस्याओं को उठाना विपक्ष का कार्य है, परन्तु असहिष्णुता और साम्प्रदायिकता के सामने विपक्ष को आम जनता की समस्याएँ गौण नजर आईं।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में नीतीश का विपक्षी गठबंधन को छोड़ना, साम्प्रदायिकता विरोध के गलीचे के तले सब तरह के भ्रष्टाचार और अपराधों को छुपाने की राजनीतिक बाजीगरी के दिन लदने का संकेत है। साम्प्रदायि विरोध के नाम पर शोर मचाकर मुद्दाविहीन विपक्ष, जनता का ध्यान अपनी कमियों की ओर से भटकाए रखना चाहता है। नीतीश के इस कदम ने सुशासन और भ्रष्टाचार के विषय को जनता की चर्चा का केन्द्रीय बिंदू बना दिया है।</p>
<h1 style="text-align:justify;">आत्मघात की मुद्रा में विपक्ष</h1>
<p style="text-align:justify;">भ्रष्टाचार के प्रति उदासीन कांग्रेसनीत गठबंधन ने अपना सबसे भरोसेमंद और स्वीकार्य चेहरा खो दिया है। कबूतर की भांति आँखें मूंद बैठे विपक्ष के पास अब कोई ऐसा चेहरा नहीं बचा है जिसकी राष्ट्रीय स्वीकार्यता हो। राहुल गाँधी के नेतृत्व में विभिन्न चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन किसी से छुपा नहीं है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का खाली पड़ा पद, विपक्ष की राजनीति के लिए अच्छा संकेत नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">आत्मघाती मुद्रा में आ चुकी कांग्रेस ने अगर समय रहते बिहार के राजनीतिक घटनाक्रम को सम्भाला होता तो आज विपक्ष के पास राष्ट्रीय नेतृत्व के नाम पर एक सर्व-स्वीकार्य नेता होता। विपक्ष भले ही केजरीवाल या ममता बनर्जी को राष्ट्रीय स्तर पर आगे बढ़ाने का प्रयास करे परन्तु एक ओर जहाँ इनकी स्वीकार्यता नीतीश कुमार जैसी नहीं हो सकती, वहीं भानुमती के कुनबे जैसा विपक्षी गठबंधन कब बिखर जाये, इसका पता किसी को नहीं।</p>
<h1 style="text-align:justify;">नये राजनीतिक क्षत्रप भी जुड़ सकते हैं भाजपा से</h1>
<p style="text-align:justify;">विपक्षी दलों द्वारा निरंतर भाजपा को राजनीतिक रूप से अछूत माना जाता रहा है। विभिन्न राजनीतिक दलों ने भाजपा के विरोध को ही अपनी अस्तित्व-रक्षा का उपकरण समझा है। भाजपा के विरोध को आधार बनाकर ही कई प्रकार के गठबन्धनों के प्रयोग भारतीय राजनीति में किया गया। विपक्षी दलों द्वारा परस्पर विरोधी विचारों ओर विचारधाराओं के बेमेल गठबंधन निर्माण करने के प्रयास भी किये गये।</p>
<p style="text-align:justify;">नीतीश का भाजपा से गठबंधन विपक्ष की गठबंधन राजनीति के लिए बड़ा झटका है जो कई अन्य राजनीतिक क्षत्रपों और क्षेत्रीय नेताओं जैसे नवीन पटनायक तथा चंद्रबाबू नायडू आदि नेताओं को भाजपा के निकट ला सकता है। अगर ऐसा हो जाता है तो विपक्ष की स्थिति काफी कमजोर हो जाएगी और अगले लोकसभा चुनावों में भाजपा की राह अधिक आसान हो जाएगी।</p>
<h1 style="text-align:justify;">बिहार में लालू युग का अवसान</h1>
<p style="text-align:justify;">नीतीश कुमार का लालू यादव और कांग्रेस का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थामना न केवल राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष के लिए एक बड़ा झटका है, बल्कि क्षेत्रीय दल के रूप में भी राष्ट्रीय जनता दल के लिए बहुत ज्यादा नुकसानदेह साबित हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनीतिक आधुनिकीकरण और सोशल मीडिया के दौर में पहले ही राजद जैसे क्षेत्रीय दलों का जनाधार सिमट रहा है, ऊपर से अगर सरकार बनने की सम्भावना न हो तो परम्परागत वोटरों का एक बड़ा हिस्सा भी पार्टी से छिटक सकता है। अगर नीतीश और भाजपा का गठबंधन स्थायी स्वरुप ग्रहण कर लेता है तो निश्चित ही आने वाले वर्षों में लालू को राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए कठिन परिश्रम करना होगा। भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरा लालू परिवार अपना राजनीतिक वजूद बचा पायेगा, यह सम्भावना अत्यंत क्षीण दिखाई पड़ती है।</p>
<p style="text-align:justify;">निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि नीतीश कुमार का राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबंधन में जाना प्रधानमन्त्री मोदी और भाजपा के लिए सर्वाधिक लाभदायक है। साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर एकजुट होने वाले विपक्ष का तुरुप का इक्का अब भाजपानीत गठबंधन के साथ है।</p>
<p style="text-align:justify;">नीतीश के समर्थन से प्रधानमन्त्री मोदी की स्वीकार्यता में वृद्धि हुई है। इस घटनाक्रम से जहाँ विपक्ष बिखर गया है वहीं इसका फायदा न केवल भाजपा को राज्यसभा में होनेवाला है बल्कि भाजपा के लिए 2019 के लोकसभा चुनावों की राह आसान होती नजर आ रही है। यही नहीं, बिहार की जनता के एक बड़े हिस्से को नीतीश ने भाजपा के साथ जोड़ दिया है जो आनेवाले चुनावों में भाजपा के लिए लाभदायक सिद्ध हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;"><em><strong>-डॉ. कुलदीप कुमार मेहंदीरत्ता</strong></em></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 28 Jul 2017 23:50:55 +0530</pubDate>
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                <title>ब्रिटेन में राष्ट्रीय चुनाव में भारत के निहितार्थ</title>
                                    <description><![CDATA[विश्व के सबसे पुराने संसदीय लोकतंत्र ब्रिटेन में 8 जून को लोकतंत्र का महापर्व अर्थात् संसदीय चुनाव हो रहे हैं। जैसे-जैसे 8 जून करीब आया एकतरफा चुनाव कांटे की टक्कर की ओर अग्रसर हो गए। ब्रेक्जिट का फैसला लिए जाने के बाद गुरुवार के चुनावों का यूरोपीय यूनियन के ब्रिटेन के साथ संबंध निर्धारण में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-implications-for-national-elections-in-britain/article-993"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/vote.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">विश्व के सबसे पुराने संसदीय लोकतंत्र ब्रिटेन में 8 जून को लोकतंत्र का महापर्व अर्थात् संसदीय चुनाव हो रहे हैं। जैसे-जैसे 8 जून करीब आया एकतरफा चुनाव कांटे की टक्कर की ओर अग्रसर हो गए। ब्रेक्जिट का फैसला लिए जाने के बाद गुरुवार के चुनावों का यूरोपीय यूनियन के ब्रिटेन के साथ संबंध निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका होगी। ब्रिटेन में यह चुनाव ऐसे समय संपन्न हो रहा है, जब पिछले 3 माह में ब्रिटेन में 3 बड़े आतंकी हमले हो चुके हैं। आतंकवाद से दहलते ब्रिटेन के इस चुनाव पर संपूर्ण विश्व की नजरें टिकी हुई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लगातार आतंकी हमलों के कारण लग रहा था कि ब्रिटिश चुनाव 8 जून को नहीं हो पाएँगे, लेकिन ब्रिटिश प्रधानमंत्री ने इसका एलान करते हुए कहा कि हिंसा से लोकतंत्रात्मक प्रक्रिया बाधित नहीं होनी चाहिए। इन आतंकवादी हमलों से ब्रिटिश प्रधानमंत्री टेरीजा मे के लोकप्रियता में पहले की तुलना में गिरावट आई है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही कारण है कि प्रारंभ में चुनाव थेरेसा मे के पक्ष में पूर्णत: एकपक्षीय लग रहा था, वहीं अब विपक्षी लेबर पार्टी से बढ़त घटती जा रही है। ब्रिटेन की सरकारों ने 2005 में हुए आतंकवादी हमलों के बाद से ही सुरक्षा व्यवस्था पर काफी खर्च किया है। एक बार फिर इन 3 माह के 3 आतंकी हमलों ने इस चुनाव के लिए सुरक्षा को अहम चुनावी मुद्दा बना दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटेन आतंकवाद विरोधी वैश्विक प्रयासों में अहम् भूमिका निभाता है और इराक व सीरिया में आईएस के खिलाफ हमले के लिए तैनात अमरिकी गठबंधन का एक प्रमुख सदस्य है, लेकिन ब्रिटेन के विपक्षी दल के नेता जेरमी कॉर्बिन ने कहा है कि अगर उनकी लेबर पार्टी आज के चुनाव में जीतती है, तो वह ब्रिटेन की विदेश नीति बदल देंगे और आतंक के खिलाफ युद्ध को बंद कर देंगे। लेबर पार्टी मानती है कि 2001 के बाद ब्रिटिश सैन्य हस्तक्षेप न केवल हिंसक हमलों के खतरों को रोकने में विफल रहा है, बल्कि इसके चलते स्थिति और बदतर हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटिश चुनाव में यूरोपीय कस्टम यूनियन में ब्रिटेन की सदस्यता,आतंकवाद,सुरक्षा जैसे प्रमुख मुद्दों के अतिरिक्त सरकार द्वारा संचालित राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा,आव्रजन और अर्थव्यवस्था प्रमुख है।वानाक्राई रैनसमवेयर साइबर हमले के बाद ब्रिटिश राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा तरह बुरी तरह प्रभावित हुई थी,इसलिए वहाँ के इन चुनावों में पहली बार साइबर सुरक्षा जैसे मुद्दों ने भी स्थान बनाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं ब्रिटेन के दक्षिणपंथी यूके इंडिपेंडेंस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में बुर्के पर प्रतिबंध लगाने की बात कही है और इसका दिलचस्प कारण बुर्के के कारण महिलाओं में विटामिन डी की कमी को बताया है।यद्यपि यह पार्टी ब्रिटेन में कोई विशेष जनाधार नहीं रखती है। ब्रिटेन के चुनाव न केवल ब्रिटेन-ईयू संबंधों के लिए महत्वपूर्ण हैं, अपितु भारत-ब्रिटेन संबंधों पर भी इसके व्यापक प्रभाव होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत ब्रिटेन का अहम् ट्रेड पार्टनर है, यही कारण है कि “ग्लोबल ब्रिटेन” का नारा देकर प्रधानमंत्री थेरेसा ने पहला विदेश दौरा भारत का ही किया था। इन सबके बावजूद भारत-ब्रिटेन का व्यापार काफी कम है, जिसे बढ़ाने की आवश्यकता है। इसके लिए भारत को सूक्ष्मतापूर्वक ब्रेक्जिट की प्रक्रिया पर नजर रखनी होगी। अगर ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन के कस्टम यूनियन में बना रहता है, तो भारत को ब्रिटेन की बजाए यूरोपीय यूनियन से डील करनी पड़ेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत-ब्रिटेन रिश्ते पूरी तरह चुनावी नतीजों पर निर्भर करता है, क्योंकि ब्रिटेन की दोनों पार्टियों की राय पूर्णत: अलग-अलग है। लेबर या लिबरल डेमोक्रेटस की जीत से ब्रिटेन यूरोपीय कस्टम यूनियन में बना रह सकता है। ऐसे में भारत-ब्रिटेन वार्ताओं की आवश्यकता नहीं होगी, लेकिन थेरेसा मे के नेतृत्व में कंजरवेटिव यूरोपीय कस्टम यूनियन से भी अलग होने के लिए प्रतिबद्ध है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस स्थिति में भारत-ब्रिटेन वार्ता अपरिहार्य होगा, जो कदापि आसान नहीं होगी। ब्रिटेन कारों पर आयात कर कम करने के साथ ही वित्तीय सेवाओं और कानूनी फर्मों के भारत में प्रवेश की मांग कर सकता है। पहले भी ये मांगे उठ चुकी हैं लेकिन भारत को अपने हितों का विशेष ध्यान देना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटेन अगर यूरोपीय यूनियन से बाहर होता है तो ब्रिटेन का ईयू से व्यापार कम हो जाएगा। इसके क्षतिपूर्ति हेतु ब्रिटेन भारत से व्यापार हेतु जल्दबाजी में दिख सकता है। भारत को इस समय का लाभ अवश्य उठाना चाहिए तथा अप्रवासन संबंधी मुद्दोंं को उठाना चाहिए। ज्ञात हो पिछले बार जब भारत ईयू वार्ता टूटी थी तो उस समय ब्रिटेन के गृहमंत्री तथा आज के प्रधानमंत्री थेरेसा मे यह नहीं चाहती थीं कि भारत को अप्रवासन के मामले में कोई रियायत दी जाए,वहीं भारत ने साफ कर दिया था कि यह रवैया भारत के हित में नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">कंजरवेटिव पार्टी अभी भी ईयू से सिर्फ एक लाख अप्रवासियों को ब्रिटेन आने देना चाहती है,जबकि वर्तमान में यह संख्या दो लाख है। इस फैसले से भारत का प्रभावित होना तय है,जबकि लेबर और लिबरल डेमोक्रेटस इस पर ढील देने को तैयार हैं। भारत और यूरोपीय यूनियन के बीच सबसे बड़ा गतिरोध कृषि क्षेत्र के सब्सिडी को लेकर था,परंतु भारत-ब्रिटेन के बीच ऐसी कोई बाधा कृषि सब्सिडी को लेकर नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि अप्रवासन को लेकर स्थिति उल्टी है। यह भारत-ब्रिटेन के बीच का मुख्य गतिरोध है,परंतु ईयू के साथ यह भारत के लिए उतना महत्वपूर्ण वार्ता अवरोधक नहीं है। इधर भारत में ईवीएम का मुद्दा छाया रहा। लेकिन ब्रिटेन में गुरुवार को हो रहे चुनाव मतपत्र से ही हो रहे हैं। पिछले 3 वर्षों से ब्रिटेन में ईवीएम के प्रयोग पर चर्चा चल रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन वहां की खुफिया एजेंसियों और चुनाव आयोग का मानना है कि ईवीएम फुलप्रूफ नहीं है और उसकी हैंकिंग की जा सकती है। साथ ही यहाँ मतदाताओं की संख्या भी भारत से काफी कम होती है। वहाँ चुनाव खर्च को लेकर प्रतिबंध भी कठोर हैं। वहाँ हर उम्मीदवार 8,700 पाउंड्स से ज्यादा खर्च नहीं कर सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में 48% आबादी महिलाओं की है,जबकि लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व केवल 12% है। वहीं ब्रिटेन में महिलाओं की आबादी 51% है, जबकि संसद में उनका प्रतिनिधित्व 29% है। लेकिन भारत में आजादी के बाद बिना किसी भेदभाव के महिलाओं समेत सभी को मताधिकार एक साथ मिला, वहीं ब्रिटेन में महिलाओं को काफी संघर्ष के बाद 1918 में मताधिकार मिल पाया।</p>
<p style="text-align:justify;">16 लाख भारतीय ब्रिटिश भी ब्रिटेन के चुनाव में महत्वपूर्ण भूमिका रखते हैं। कई छोटी सीटों पर इनके वोट ही तय कर पाएंगे कि सांसद कौन है। इसलिए ब्रिटेन के सभी वरिष्ठ नेता कभी मंदिर तो कभी गुरुद्वारा जाकर वोटरों को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। ब्रिटानी प्रधानमंत्री थेरेसा तो भारतीय प्रधानमंत्री मोदी के साथ वीडियो दिखाकर भारतीय मूल के मतदाताओं को लुभाने का प्रयास कर रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">ब्रिटिश लोकतंत्र का महापर्व के चुनाव परिणाम के बाद ही लोगों की जिज्ञासा खत्म हो सकेगी। इस चुनाव से न केवल ईयू ब्रिटेन अपितु संपूर्ण विश्व प्रभावित होगा। ब्रिटेन सुरक्षा परिषद में वीटो प्राप्त स्थायी सदस्य के अतिरिक्त महत्वपूर्ण जी-7 तथा जी-20 का सदस्य भी है। इसके अतिरिक्त जीडीपी के मामले में दुनिया की 5 वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था भी है। अत: आज के वैश्वीकरण के युग में ब्रिटिश चुनाव परिणाम भारत समेत पुरी दुनिया को अवश्य प्रभावित करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-राहुल लाल</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 07 Jun 2017 22:55:06 +0530</pubDate>
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