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                <title>param pita shah satnam ji - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>param pita shah satnam ji RSS Feed</description>
                
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                <title>MSG Maha Rahmokaram Month: ‘‘यह सामान किसका है?’’</title>
                                    <description><![CDATA[Param Pita Shah Satnam Ji: सरदार हरबंस सिंह जी (पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज का पहला नाम) अपने घर का छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा सामान पूजनीय साईं जी के हुक्मानुसार डेरे ले आए। अभी भी आप जी की कोई और परीक्षा होनी बाकी रह गई थी। शाम को पूजनीय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/whose-stuff-is-this/article-81601"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-02/param-pita-shah-satnam-ji-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Param Pita Shah Satnam Ji: सरदार हरबंस सिंह जी (पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज का पहला नाम) अपने घर का छोटे से छोटा और बड़े से बड़ा सामान पूजनीय साईं जी के हुक्मानुसार डेरे ले आए। अभी भी आप जी की कोई और परीक्षा होनी बाकी रह गई थी। शाम को पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज ‘तेरावास’ से निकल कर सीधे आप जी द्वारा श्री जलालआणा साहिब गाँव से लाए गए सामान के पास आ गए। सामान के इतने बड़े ढेर को देखकर पूजनीय शाह मस्ताना जी महाराज ने फरमाया, ‘‘यह सामान किसका है?’’ MSG Maha Rahmokaram Month</p>
<p style="text-align:justify;">साध-संगत ने बताया कि साईं जी, यह सामान श्री जलालआणा साहिब वाले सरदार हरबंस सिंह जी का है। पूजनीय बेपरवाह जी एकदम जोश में आकर बोले, ‘‘यह सामान डेरे में क्यों लाया गया है? किसने कहा था यहाँ लाने को? अगर कोई हमसे आकर पूछे कि भाई किसका घर तोड़ कर लाए हो, तो हम क्या जवाब देंगे? इसे अभी बाहर निकालो और सरदार हरबंस सिंह से कहो कि वह अपने सामान का आप ही पहरा दें।’’</p>
<p style="text-align:justify;">पूजनीय साईं शाह मस्ताना जी महाराज के हुक्मानुसार आप जी द्वारा लाया गया सारा सामान डेरे के आगे पूर्व दिशा की ओर, सड़क के बराबर में रखवा दिया गया और आप जी को उसकी निगरानी हेतु बैठा दिया गया। प्यारे सतगुरु जी के खेल को देखकर आप जी जरा भी नहीं डोले। MSG Maha Rahmokaram Month</p>
]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 23 Feb 2026 09:25:33 +0530</pubDate>
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                <title>MSG Maha Rahmokaram Month: दूसरी ओर श्री जलालआणा साहिब का हर व्यक्ति उदास था!</title>
                                    <description><![CDATA[Param Pita Shah Satnam Ji: पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज ने पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को (गुरुगद्दी से पहले) यह संदेश भिजवाया कि हरबंस सिंह (पूजनीय परम पिता जी का बचपन का नाम) अपना मकान ढहा दें और घर का सारा सामान डेरे में लेकर आ जाएँ। आप जी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/no-order-of-sai-ji-should-be-ignored/article-81496"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-02/param-pita-ji-feild1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Param Pita Shah Satnam Ji: पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज ने पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज को (गुरुगद्दी से पहले) यह संदेश भिजवाया कि हरबंस सिंह (पूजनीय परम पिता जी का बचपन का नाम) अपना मकान ढहा दें और घर का सारा सामान डेरे में लेकर आ जाएँ। आप जी तो पहली बार दर्शन करते ही अपने प्यारे सतगुरु जी पर न्यौछावर हो चुके थे। MSG Maha Rahmokaram Month</p>
<p style="text-align:justify;">जैसे ही आप जी को अपने प्यारे सतगुरु का हुक्म मिला, आपने बिना कोई देरी किए तुरंत ही कुदाल उठाई और ‘धन-धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ का नारा लगाकर अपने मकान को अपने ही हाथों से ढहाना शुरू कर दिया। आप जी के पूजनीय माता जी ने भी आपका साथ देते हुए कहा कि साईं जी के किसी भी आदेश को नहीं टालना चाहिए। जैसे भी वे कहें, वैसा ही करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">पूजनीय माता जी भी आप जी के साथ मकान ढहाने लग गईं। उसी दौरान एक प्रेमी ने आकर आप जी को सतगुरु जी का वचन सुनाते हुए कहा कि एक कमरा और एक बैठक को नहीं ढहाना है।  आप जी अपने प्यारे सतगुरु की कृपा और प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए उनके आदेश अनुसार खुशी-खुशी अपना मकान ढहा रहे थे, लेकिन दूसरी ओर श्री जलालआणा साहिब का हर व्यक्ति उदास था, क्योंकि गांव का प्रत्येक निवासी आप जी से बहुत प्रेम करता था।<br />
<strong>स्त्रोत: सच्चे रूहानी रहबर, भाग-2 | MSG Maha Rahmokaram Month</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Fri, 20 Feb 2026 09:32:36 +0530</pubDate>
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                <title>MSG Maha Rahmokaram Month: &amp;#8221;देखों ईश्वर ने कैसा सुंदर नौजवान ढूंढकर हमें दिया है, सारे हिन्दुस्तान में ढूंढे भी नहीं मिलेगा’’</title>
                                    <description><![CDATA[Param Pita Shah Satnam Ji: पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज एक दिन शाह मस्ताना शाह सतनाम जी धाम, डेरा सच्चा सौदा सरसा के मुख्य द्वार के सामने खड़े सेवादारों को सेवा कार्यों के बारे में समझा रहे थे। इस दौरान पूजनीय बेपरवाह जी ने सच्चे सतगुरु पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/mercy-of-satguru-ji/article-81256"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-02/param-pita-ji-purpul-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Param Pita Shah Satnam Ji: पूजनीय बेपरवाह साईं शाह मस्ताना जी महाराज एक दिन शाह मस्ताना शाह सतनाम जी धाम, डेरा सच्चा सौदा सरसा के मुख्य द्वार के सामने खड़े सेवादारों को सेवा कार्यों के बारे में समझा रहे थे। इस दौरान पूजनीय बेपरवाह जी ने सच्चे सतगुरु पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज (गुरगद्दी की बख्शीश से पहले) को डेरा के लिए कुछ सामान लेकर आने के लिए सरसा शहर भेजा। आपजी पैदल ही शहर की तरफ चल दिए। पूजनीय बेपरवाह जी ने आपजी की तरफ इशारा करते हुए सेवादारों को वचन फरमाए कि ‘‘देखो भाई- क्या सुंदर बॉडी है। इतना गुणवान, लंबा और सुंदर नौजवान सारे हिन्दुस्तान में ढूंढे भी नहीं मिलेगा।’’ देखों ईश्वर ने कैसा सुंदर नौजवान ढूंढकर हमें दिया है। MSG Maha Rahmokaram Month<br />
<strong>स्त्रोत: सच्चे रूहानी रहबर, भाग-2</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sat, 14 Feb 2026 09:38:38 +0530</pubDate>
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                <title>दर्द से कराह रहे कुत्ते के बच्चे को परम पिता जी ने एक बोरी में लपेटकर कमरे में बैठा दिया</title>
                                    <description><![CDATA[MSG Maha Rahmokaram Month: एक बार सच्चे सतगुरु पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज अपने गांव, पवित्र धरती श्री जलालआणा साहिब में अपने घर की ओर आ रहे थे (गुरुगद्दी से पहले)। रास्ते में एक कुत्ते का बच्चा दर्द से कराह रहा था। उस बेजुबान जीव की पीड़ा देखकर आप जी का हृदय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/shah-satnam-singh-ji-maharaj-saved-the-life-of-the-puppy/article-81156"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-02/param-pita-shah-satnam-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">MSG Maha Rahmokaram Month: एक बार सच्चे सतगुरु पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज अपने गांव, पवित्र धरती श्री जलालआणा साहिब में अपने घर की ओर आ रहे थे (गुरुगद्दी से पहले)। रास्ते में एक कुत्ते का बच्चा दर्द से कराह रहा था। उस बेजुबान जीव की पीड़ा देखकर आप जी का हृदय दया से भर आया। ठंड से कांपते हुए उस जीव को उठाकर आप जी अपने घर ले आए। इसके बाद उसे स्नेहपूर्वक सहलाते हुए एक बोरी में लपेटकर कमरे में बैठा दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">फिर आप जी ने गर्म पानी के साथ उसे दवाई पिलाई और दूध भी पिलाया। इसके पश्चात उस पर कंबल डाल दिया। अगले दिन सुबह जब देखा गया तो वह कुत्ते का बच्चा बिल्कुल स्वस्थ था और पूंछ हिलाकर अपना प्यार प्रकट कर रहा था। आप जी कभी अपने सुख की चिंता ना करते, बल्कि अन्य जीवों की परेशानियों और दुखों के निवारण में सदैव समर्पित रहते। MSG Maha Rahmokaram Month<br />
<strong>स्त्रोत: सच्चे रूहानी रहबर, भाग-2</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>मानवता भलाई कार्य</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
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                <pubDate>Wed, 11 Feb 2026 09:35:03 +0530</pubDate>
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                <title>MSG BHANDARA Month: नाम-शब्द दिए बिना ही परम पिता शाह सतनाम जी महाराज ने ऐसे किया जीव का उद्धार!</title>
                                    <description><![CDATA[Param Pita Shah Satnam Ji: 2 फरवरी 1976, पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज गांव हठूर जिला लुधियाना में सत्संग फरमाकर गांव दीवाना की तरफ जा रहे थे। थोड़ी दूर जाने के बाद ड्राईवर रास्ता भूलकर गांव छीनीवाल वाली सड़क पर चल पड़ा। जब गांव के बाहर पहुंचे तो एक आदमी रास्ते में हाथ जोड़कर […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/thout-even-uttering-a-name-the-supreme-father-thus-redeemed-the-soul/article-80123"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-01/param-pita-shah-satnam-ji-maharaj.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">
<p>Param Pita Shah Satnam Ji: 2 फरवरी 1976, पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज गांव हठूर जिला लुधियाना में सत्संग फरमाकर गांव दीवाना की तरफ जा रहे थे। थोड़ी दूर जाने के बाद ड्राईवर रास्ता भूलकर गांव छीनीवाल वाली सड़क पर चल पड़ा। जब गांव के बाहर पहुंचे तो एक आदमी रास्ते में हाथ जोड़कर खड़ा था। पूजनीय परम पिता जी ने ड्राईवर को फरमाया, ”मोहन सिंह, गाड़ी रोको! जब गाड़ी रुकी तो उस आदमी ने विनती की, महाराज जी! मैं तो दो घंटों से यहां खड़ा हूं कि यहां महाराज जी आएंगे और मैं दर्शन करूंगा व आपजी को दूध पिलाऊंगा। मेरी दिल की इच्छा पूरी हो गई है। MSG BHANDARA Month</p>
<p>आप धन्य हो। ”पूजनीय परम पिता जी ने आशीर्वाद देते फरमाया, ” तेरा प्रेम ही हमें यहां खींच लाया है। जाना तो हमने गांव दीवाने था, लेकिन प्रेम ने रास्ता ही भुला दिया।” फिर फरमाया, ”अब दूध भी ले आ।”उस आदमी ने दूध का गिलास पहले पूजनीय परम पिता जी को दिया और फिर सभी सेवादारों को, जो परम पिता जी के साथ थे। पूजनीय परम पिता जी ने दूध पीते हुए फरमाया,”अब आप नाम-शब्द भी ले लेना।” उस आदमी ने कहा, ”जी! सत् वचन।” इसके बाद काफिला गांव दीवाना की तरफ चल पड़ा। रास्ते में शहनशाह जी उस आदमी की बातें करते हुए कहने लगे कि ”इस बेचारे का उद्धार होना था। ”</p>
<h3>”परमपिता परमात्मा को बना लो सच्चा दोस्त” | MSG BHANDARA Month</h3>
<p>सच्चे रूहानी रहबर पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम (Ram Rahim) सिंह जी इन्सां फरमाते हैं कि परमपिता परमात्मा, अल्लाह, वाहेगुरु, गॉड, खुदा, रब्ब हर जगह मौजूद है। जहां तक निगाह जाती है और जहां तक निगाह नहीं जाती, वहां भी वो प्रभु-परमात्मा मौजूद है। इसलिए उसे हासिल करने के लिए अपनी भावना व विचारों का शुद्धिकरण करो। सच्ची श्रद्धा बनाकर रखो। पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि इन्सान की फितरत है कि वह जानना चाहता है कि भगवान का रंग कैसा है? उसका रूप कैसा है?</p>
<h3>भगवान का कोई रंग या रूप नहीं होता</h3>
<p>पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि वैसे तो भगवान का कोई रंग या रूप नहीं होता है, उसको आप जहां भी जिस भी रूप में देखते हैं, वहां वह नजर आता है। उदाहरण देते हुए पूज्य गुरू जी ने फरमाया कि किसी ने पूछा, तेरा गुरु कैसा है? क्या वो दूध जैसा है या फिर चंद्रमा जैसा, सूर्य जैसा, शहद या चीनी जैसा? उसने बताया कि मेरा गुरु तो गुरु जैसा है, उस जैसा कोई नहीं है। उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती। वो उन सबसे अरबों-खरबों गुणा बढ़कर है। उसकी जिंदा तस्वीर हर जगह होती है।</p>
<p>ऐसे परमपिता परमात्मा को अपना सच्चा यार, दोस्त बनाना चाहिए, क्योंकि दुनिया की यारी, मित्रता सिर्फ मतलबी व गर्जी है। जब तक मतलब है, तब तक बात और जब मतलब निकल गया तो मुंह फेर लेते हैं। पूज्य गुरु जी ने मालिक, अल्लाह, राम, भगवान, खुदा, गॉड, रब्ब को पाने का तरीका बताते हुए फरमाया कि भगवान ही एक ऐसा है, जो आपकी हर गर्ज को पूरी कर सकता है और वो भी बिना किसी स्वार्थ के। इसलिए भगवान को हासिल करने के लिए अपनी भावना को शुद्ध रखो। विचारों का शुद्धिकरण करो।</p>
<p>सच्ची श्रद्धा बनाकर रखो। दूसरे के दु:ख-दर्द को दूर करो, ऐसा करने से इतनी खुशियां मिलेंगी कि आपकी झोलियां छोटी पड़ जाएंगी। पूज्य गुरू जी ने फरमाया कि खुद को पाक-पवित्र बनाने का एकमात्र उपाय है रूहानियत से जुड़ो। सेवा-सुमिरन और परहित के कार्य करो। दिखावा ना करो, दीनता-नम्रता धारण करो, इससे आप मालिक के करीब होते चले जाएंगे। MSG BHANDARA Month</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 08 Jan 2026 09:58:53 +0530</pubDate>
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                <title>Param Pita Shah Satnam Ji: पौधे पेड़ बनने से पहले ही साध-संगत इतनी ज्यादा बढ़ गई कि&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[सन् 1970 की बात है। ‘शाह मस्ताना शाह सतनाम जी धाम, डेरा सच्चा सौदा सरसा’ के मुख्य गेट के नजदीक सचखंड हॉल बन चुका था। डेरे के पंडाल में साध-संगत की सुविधा के लिए छोटे-छोटे पौधे लगाए गए थे ताकि बड़े होने पर साध-संगत इनकी छाया के नीचे बैठकर सत्संग सुन सके। एक दिन पूजनीय परम […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/even-before-the-plant-could-grow-into-a-tree-the-congregation-had-grown-so-large-that/article-80060"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-01/param-pita-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सन् 1970 की बात है। ‘शाह मस्ताना शाह सतनाम जी धाम, डेरा सच्चा सौदा सरसा’ के मुख्य गेट के नजदीक सचखंड हॉल बन चुका था। डेरे के पंडाल में साध-संगत की सुविधा के लिए छोटे-छोटे पौधे लगाए गए थे ताकि बड़े होने पर साध-संगत इनकी छाया के नीचे बैठकर सत्संग सुन सके। एक दिन पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज घूमते हुए उधर आ गए, वहां कुछ सेवादार खडे थे। सभी ने पूजनीय सतगुरू जी के सामने नतमस्तक होकर नारा लगाया। पूज्य सतगुरू जी ने सभी सेवादारों को अपना पावन आशीर्वाद दिया व चलते-चलते उनके पास रुक गए। Param Pita Shah Satnam Ji</p>
<p style="text-align:justify;">पूजनीय सतगुरु जी ने सभी का हालचाल पूछा। तब सेवादारों ने पूज्य गुरू जी के चरणों में प्रार्थना की, ‘‘पिता जी! अब तो आनंद आ जाएगा क्योंकि गर्मी के मौसम में साध-संगत को खुले आसमान के नीचे बैठकर सत्संग सुनने में बहुत परेशानी होती थी। जब यह पौधे बड़े पेड़ का रूप धारण कर लेंगे तो समूह साध-संगत उन पेड़ों की छाया नीचे बैठकर सत्संग सुन सकेगी और आराम कर सकेगी’’। यह सुनकर पूजनीय सतगुरू जी ने उस प्रेमी को बहुत ही प्यार से देखा व कुछ रुक कर सर्व-समर्थ सतगुरू जी ने वचन फरमाए,</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘भोले! जब तक पौधे पेड़ बनेंगे तब साध-संगत इतनी ज्यादा हो जाएगी कि अपने को सरसा से बाहर टिब्बों (रेत के टीलों) पर जाकर सत्संग करना पडेगा। यह जगह जो ज्यादा लगती है साध-संगत के उठने बैठने व रुकने के काम आएगी।’’ पूज्य सतगुरू जी के पवित्र वचनों अनुसार पेड़ बनने से पहले ही साध-संगत इतनी ज्यादा हो गई थी कि डेरे के अंदर बैठना तक मुश्किल हो गया। आखिर टिब्बों पर जाना ही पड़ा, जहां आज विशाल रूहानी आश्रम ‘शाह सतनाम शाह मस्ताना जी धाम, डेरा सच्चा सौदा सरसा’ बना हुआ है। Param Pita Shah Satnam Ji</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
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                <pubDate>Tue, 06 Jan 2026 10:02:24 +0530</pubDate>
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                <title>Param Pita Shah Satnam Ji: &amp;#8221;आपके गांव का पहला नंबर है’’</title>
                                    <description><![CDATA[17 जून 1967 को पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज गांव केले बांदर (आजकल नसीबपुरा) जिला बठिंडा में सत्संग फरमाने के लिए पधारे। पूरा गांव सत्संग की खुशी में फूले नहीं समा रहा था। इस गांव में उस समय 317 व्यक्तियों को आप जी ने नाम की अनमोल दात प्रदान की। साध-संगत के प्रेम […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/when-the-connection-has-been-established-with-the-master-himself-what-is-left-to-worry-about/article-79966"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-01/param-pita-shah-satnam-ji1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">17 जून 1967 को पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज गांव केले बांदर (आजकल नसीबपुरा) जिला बठिंडा में सत्संग फरमाने के लिए पधारे। पूरा गांव सत्संग की खुशी में फूले नहीं समा रहा था। इस गांव में उस समय 317 व्यक्तियों को आप जी ने नाम की अनमोल दात प्रदान की। साध-संगत के प्रेम व नाम शब्द लेने वालों का उत्साह देखकर पूजनीय परम पिता जी बेअंत खुश हुए व वचन फरमाए ‘‘बेटा, आपके गांव का पहला नंबर है।’’ परम पिता जी ने गांव के बारे में वचन फरमाए, ‘‘बेटा, यह तो नसीबों वाला नगर है।’’ Param Pita Shah Satnam Ji</p>
<p style="text-align:justify;">परम पिता जी ने सत्संग में चल रही कव्वाली में एक और तुक जोड़ दी-‘‘पिंड तर गिया नसीबपुरा सारा, गुरू दे नाल तार जोड़ के।’’ एक प्रेमी भाई ने परम पिता जी के आगे बेनती की कि, ‘‘पिता जी’’ हमारी प्रेम रूपी तार ही आप जी के चरणों के साथ हमेशा जुड़ी रहे तब परम पिता जी ने फरमाया, ‘‘बेटा। आप तो सबकुछ पा गए जब तार ही मालिक से जुड़ गई तो पीछे क्या रह गया।’’ यह वचन सुनकर सारी साध-संगत खुशी से नाच उठी। Param Pita Shah Satnam Ji</p>
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                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 03 Jan 2026 09:36:15 +0530</pubDate>
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                <title>जब पूजनीय परमपिता जी की जीप आकर पुल पर रुकी&amp;#8230;और फिर&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[Param Pita Shah Satnam Ji: प्रे्रमी मास्टर गुरजंट सिंह इन्सां सुपुत्र सचखण्डवासी श्री सेवा सिंह जी गाँव संगत खुर्द, जिला भटिण्डा से पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपने पर हुई अपार रहमत का वर्णन इस प्रकार करते हैं- सन् 1975 में गाँव लेलेवाला, जिला भटिण्डा में पूजनीय परमपिता जी का सत्संग था। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/when-the-revered-fathers-jeep-came-and-stopped-on-the-bridge-and-then/article-79902"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-01/param-pita-shah-satnam-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Param Pita Shah Satnam Ji: प्रे्रमी मास्टर गुरजंट सिंह इन्सां सुपुत्र सचखण्डवासी श्री सेवा सिंह जी गाँव संगत खुर्द, जिला भटिण्डा से पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपने पर हुई अपार रहमत का वर्णन इस प्रकार करते हैं-</p>
<p style="text-align:justify;">सन् 1975 में गाँव लेलेवाला, जिला भटिण्डा में पूजनीय परमपिता जी का सत्संग था। उन दिनों मैं सरकारी प्राईमरी स्कूल संगत खुर्द में पढ़ाता था। स्कूल के सामने रजबाहे के पुल पर लोगों का भारी इकट्ठ देखकर मैंने बच्चों से पूछा कि ये इकट्ठ क्यों है? बच्चों ने बताया कि आज गाँव लेलेवाला में सरसा वाले संतों का सत्संग है और उनके पावन दर्शनों के लिए ये भक्तजन (प्रेमी) यहाँ आए हैं। इतने में पूजनीय परमपिता जी की जीप आकर पुल पर रुकी। सभी प्रेमीजनों की आँखों में आई चमक व बेइंतहा प्यार देखकर मुझे भी मालिक ने ख्याल दिया कि तू भी संतों के दर्शन करले। देखना तो चाहिए कि ऐसे कौन-से संत हैं, जिनके दर्शनों के लिए ये लोग इतने लालायित हैं। मैं स्कूल के गेट से पुल की तरफ जाने लगा तो मैंने देखा परमपिता जी की जीप मेरी ही ओर आ रही है। पूजनीय पिता जी को देखते ही मेरा सर अपने आप श्रद्धापूर्वक सजदे में झुक गया और मैंने अपने दोनों हाथ जोड़कर पूजनीय परमपिता जी को नमस्कार किया। परमपिता जी ने मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान किया तो मेरे हृदय में ऐसी खुशी की लहर दौड़ गई, जो वर्णन नहीं हो सकता। जैसे मेरी रूह ने अपने सच्चे रहबर को पहचान लिया हो। मुझे अपने आप की होश न रही।</p>
<p style="text-align:justify;">गाड़ी दूर जा रही थी लेकिन मेरी नजर हटने का नाम नहीं ले रही थी। इतने में प्रेमीजन मेरे पास आ गए। उन्होंने मेरे हृदय की भावना को भाँपते हुए मुझे प्रशाद देते हुए कहा कि मास्टर जी, ये लो प्रसाद! आज गाँव लेलेवाला में सत्संग है, वहाँ चलो और जी-भरकर दर्शन कर लेना। प्रेमियों की प्रेरणा व सतगुरु के प्रेम में खिंचा मैं गाँव लेलेवाला में पहुँच गया। मैंने परमपिता जी का रूहानी सत्संग पहली बार सुना था, जिससे मेरी रूह को बहुत ही आनंद मिला। मुझे सच्चे प्रेम की चिंगारी लग चुकी थी जो आज भी ज्यों की त्यों है। उसी वर्ष मुझे नाम की अनमोल दात भी मिल गई।</p>
<p style="text-align:justify;">22 जून 1989 की बात है। उस दिन मैं अपने मित्र मास्टर लछमन दास जी के साथ पूजनीय परमपिता जी के दर्शन करने के लिए सच्चा सौदा दरबार आया हुआ था। वहीं मुझे जीएसएम भाई सुमेर इन्सां जी मिले व मेरे हाथ में 15 चिट्ठियाँ पकड़ाते हुए कहा कि ये चिट्ठियाँ अगले दो-चार दिनों में फलां-फलां गाँवों में पहुँचानी हैं और एक चिट्ठी आपकी भी है। आपने उन्हें कहना है कि पूजनीय परमपिता जी का हुक्म है कि 22 जुलाई 1989 को डेरे में पहुँचना है, ‘गुरु विद सेवादार (जीएसएस) सत्संग’ पर जरूर आएं। मैंंने घर आकर चिट्ठी पढ़ी तो मेरा दिल बहुत उदास हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">मैंने सोचा कि अब पूजनीय परमपिता जी गुरगद्दी बख्शेंगे और पता नहीं क्या होगा और कैसे होगा! ना कुछ खाया, ना पिया। मन में तरह-तरह के विचार आने लगे। गलत बातें यानि नेगेटिव विचार सोच-सोचकर मैं सारी रात रोता रहा व परमपिता जी से अरदास करता रहा कि पिता जी, हमारा क्या बनेगा! आपके बिना हमारा कौन है! हम कहाँ जाएंगे! रोते-रोते सुबह तीन बजे मेरी आँख लग गई। स्वप्न में मैंने देखा कि पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज तथा जीएसएम भाई मोहन लाल जी इन्सां एक बहुत ही सुंदर अजनबी नौजवान के साथ खड़े हैं। पूजनीय परमपिता जी ने मुझे फरमाया, ‘बुद्घुआ! न सोवें, ना सौण देवें।’ परमपिता जी ने उन सुंदर नौजवान की तरफ इशारा करते हुए फरमाया, ‘ये तुम्हारी रक्षा करेंगे। ये तुम्हारे वारिस हैं।’</p>
<p style="text-align:justify;">बालों की सुंदर-सी कटिंग, चेहरे पर छंटी हुई दाड़ी, मक्खन जैसा गोरा रंग और आयु 22-23 साल। ऐसा बांका नौजवान मैंने आज से पहले कभी नहीं देखा था। उस अति सुंदर नौजवान में अजीब-सी कशिश थी, जो मुझे अपनी ओर खींच रही थी, लेकिन मैं समझ नहीं पाया था कि ये कौन हैं और कैसे हमारी रक्षा करेंगे। इस दृष्टांत की समझ मुझे तब आई, जब पूजनीय परमपिता जी ने 23 सितम्बर 1990 को 23 वर्ष के उस नौजवान यानि पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को अपनी अपार बख्शिशों सहित डेरा सच्चा सौदा गुरगद्दी की बख्शिश की। वही डील-डौल, वही नूरानी चेहरा और वही सब कुछ ज्यों का त्यों जो मैंने स्वप्न में देखा था। इस तरह पूजनीय परमपिता जी ने मुझे लगभग पंद्रह महीने पहले ही सब कुछ ज्यों का त्यों दिखा दिया कि ये वो नौजवान हैं जिन्हें डेरा सच्चा सौदा की गुरगद्दी बख्शी जानी है।</p>
<p style="text-align:justify;">मैं पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के परोपकारों का बदला क्या दे सकता हूँ। यह एक तुच्छा-सा भिखारी इतने बड़े शहनशाहों के शहनशाह, इतने महान बादशाह को क्या दे सकता है। बस धन्य-धन्य ही करता हूँ।<br />
<strong>कीते उपकार जेहड़े, किंवे मैं भुलावां। </strong><br />
<strong>गुण तेरे साहिबा दिन-रात पेया गावां।</strong><br />
पूजनीय परमपिता जी के मौजूदा नौजवान स्वरूप हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के पवित्र चरणों में मेरी विनती है कि मुझ पर इसी तरह ही अपनी अपार रहमत बनाए रखना जी तथा मुझे मेरे आखिरी स्वास तक अपने पवित्र चरण-कमलों में लगाकर मेरी ओड़ निभा देना जी।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Jan 2026 13:07:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>गुरु जी की आवाज में आकाशवाणी हुई, ‘बेटा, हिल-जुल कर’ और फिर बच गई जान</title>
                                    <description><![CDATA[जीएसएम सेवादार भाई जरनैल सिंह इन्सां पुत्र श्री सज्जन सिंह जी, निवासी गांव शाह सतनाम जी पुरा सरसा से पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपने पर हुई अपार रहमत का वर्णन करते हैं: सन् 1975 की बात है। पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज एक बार मेरे पैतृक गांव महिमा सरजा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/holy-sermons/a-voice-from-the-sky-said-son-move-around-and-then-his-life-was-saved/article-73813"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-07/param-pita-shah-satnam-ji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जीएसएम सेवादार भाई जरनैल सिंह इन्सां पुत्र श्री सज्जन सिंह जी, निवासी गांव शाह सतनाम जी पुरा सरसा से पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज की अपने पर हुई अपार रहमत का वर्णन करते हैं:<br />
सन् 1975 की बात है। पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज एक बार मेरे पैतृक गांव महिमा सरजा जिला भटिंडा, पंजाब में पधारे हुए थे। आप जी रूहों का उद्धार करने के लिए घूमते-घूमते हमारे गांव के नजदीक एक खेत में पधारे। पूजनीय परमपिता जी की पावन हजूरी में कुछ सेवादार तथा साध-संगत बैठी हुई थी। उस समय मैं साध-संगत के पास से गिरता-पड़ता हुआ उस रास्ते से गुजरा। पूजनीय परमपिता जी ने मेरे बारे साध-संगत से पूछा, ‘भाई, ये कैसे गिरता-पड़ता जा रहा है!’ उस समय पूजनीय परमपिता जी के पास खड़े हमारे गांव के एक प्रेमी सेवादार ने बताया कि पिता जी, ये देखने में ही बंदा लगता है। यह तो राक्षस है। दिन-रात शराब में धुत्त रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर आप जी ने फरमाया, ‘भाई, बंदा कितना भी बुरा हो, उसमें कोई न कोई गुण अवश्य होता है।’ गांव के प्रेमियों ने मुझे पूजनीय परमपिता जी द्वारा मेरे बारे में किए वचन बताए और मुझे शराब छोड़ने व नाम शब्द-गुरुमंत्र लेने के लिए भी प्रेरित किया। पूजनीय परमपिता जी के वचन सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई कि मेरे में भी कोई गुण है! फिर मैंने सोचा कि शराब छोड़ दूं तो बढ़िया है। इस घटना के कुछ महीने बाद गांव बल्लूआणा में पूजनीय परमपिता जी का सत्संग था। मैं उस सत्संग पर पहुंच गया। सत्संग के उपरांत जब पूजनीय परमपिता जी नामाभिलाषी जीवों को नाम-शब्द देने लगे, तो मैंने पूजनीय परमपिता जी की पावन हजूरी में अर्ज कर दी कि पिता जी, मैं हर रोज पांच बोतलें शराब पीता हूं। अगर नहीं पिऊंगा तो तोड़ (तलब) तो नहीं लगेगी? तो पूजनीय परमपिता जी ने फरमाया, ‘भाई, तोड़ लगे, तो दोबारा पी लेना। हम कौन-सा तेरा हाथ पकड़ लेंगे! परन्तु बेटा, नाम में इतना नशा है कि बेशक शराब के सौ मट भी भरे हों, प्रेम की एक घूंट का मुकाबला नहीं कर सकते।’ फिर मैंने गुरुमंत्र ले लिया। गुरुमंत्र, नाम-शब्द लेते ही मुझे नाम का इतना नशा हो गया कि मेरे धरती पर पांव नहीं लगते थे। मैं नाम जपता रहता और अपने आप में मस्त रहता। मुझे शराब से नफरत हो गई। सतगुरु जी की रहमत से सभी नशे व बुराईयां छोड़कर मैं मालिक-सतगुरु का भक्त बन गया।</p>
<p style="text-align:justify;">सन् 1978 की बात है कि रंगड़ी वाले खेत में कुएं की सेवा चल रही थी। एक कुआं बंद करना था और दूसरा कुआं खोदकर लगाना था। मैंने दो दिन उस कुएं पर सेवा की जो खोदकर नया लगा रहे थे। दो दिन के बाद मेरे पास एक जिम्मेवार सेवादार आया। वह मुझे कहने लगा कि भाई, आप तो बहुत बहादुर लगते हो! उस कुएं में से र्इंटें निकालनी हैं तथा कुआं बंद करना है। मैंने कहा, बताओ भाई जी कैसे करना है? उसने मुझे तथा हैड कविराज भाई दलीप सिंह जी इन्सां को कुएं में नीचे उतार दिया। पूजनीय परमपिता जी ने सेवादारों को पहले ही समझा दिया था कि ‘पहले पल्ली मिट्टी की ऊपर से मंगवा कर रखो। फिर चार र्इंटें निकालो और वो जगह मिट्टी से भरकर, दबाकर व उसे पूरी करके फिर आगे चार र्इंटें निकालो और साथ की साथ पल्ली मिट्टी की ऊपर से और मंगवाकर रखो।’ हमने बिना सोचे-समझे, जल्दी-जल्दी में, हंसते-खेलते और बिना परवाह किए फुट-डेढ़ फुट कुएं में से र्इंटें निकाल दी। हम आपस में हंसने लगे कि इस तरह तो र्इंटें बहुत आसानी से निकलती हैं और इस तरह हमने कुछ मिनटों में ही चार फुट कुआं नीचे से उधेड़ दिया। वहां बोर लगाने वाली मशीन र्इंटें खींचती थी। र्इंटें खींचने वाली पल्ली नीचे थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अचानक ऊपर से कुआं फट गया और अफरा-तफरी मच गई और हैड कविराज के पांव पल्ली में थे। ऊपर वालों ने पल्ली ऊपर खींच ली तो हैड कविराज ऊपर आ गया। अन्दाजा ऊपर से पचास फुट छोड़कर चार फुट कुआं (र्इंटें, मिट्टी) नीचे बैठ गया। मैं कन्धों के बराबर तक मिट्टी में दब गया। मिट्टी लगातार गिर रही थी। मुझे इस तरह लगा कि अब तो जीवन की कहानी खत्म है। मैंने मदद के लिए अपने पूजनीय सतगुरु परमपिता जी को याद किया। मुझे पूजनीय परमपिता जी की आवाज में आकाशवाणी हुई, ‘बेटा, हिल-जुल कर।’ मैंने बाजुओं को हिलाया, टांगों को हिलाया। मैं ऊपर की तरफ आने के लिए कोशिश करता रहा। मैं मिट्टी के ऊपर आ गया। मुझे इस तरह महसूस हुआ जैसे किसी गैबी ताकत (स्वयं पूजनीय परमपिता जी) ने मुझे ऊपर की तरफ खींचा है। मिट्टी लगातार अभी भी गिर रही थी और फिर अचानक एकदम ज्यादा मिट्टी गिरने से मैं फिर से कमर तक दब गया। मैं घबरा गया, मैं डर गया कि अब तो नहीं बचता। पूजनीय परमपिता जी की फिर आवाज आई, ‘बेटा, हम संभालेंगे, फिक्र न कर।’ मैंने फिर टांगों तथा बाजुओं को हिलाया, तो मिट्टी के ऊपर आ गया। मिट्टी अभी भी गिर रही थी। इतने में मुझे कुएं में लगी सीढ़ी दिखाई दी। मैंने हिम्मत करके सीढ़ी पकड़ ली, और सीढ़ी के द्वारा मैं बाहर आ गया। मैंने ‘धन धन सतगुरु तेरा ही आसरा’ नारा बोल दिया। सभी सेवादार दौड़कर मेरे पास आकर खड़े हो गए।</p>
<p style="text-align:justify;">सभी मालिक-सतगुरु जी का धन्यवाद, शुक्राना करने लगे। उनमें से ज्यादातर भाई तो मेरे जीवित रहने की आशा ही छोड़ चुके थे। उससे लगभग पांच मिनट बाद पूजनीय परमपिता जी पैदल ही चलकर दोपहर के करीब डेढ़ बजे स्वयं उस कुएं के पास पहुंच गए तथा पूछा कि कुएं में कौन था? जिम्मेवार सेवादारों ने बताया कि एक तो हैड कविराज था तथा दूसरा महिमा सरजा गांव का प्रेमी जरनैल सिंह था। पूजनीय परमपिता जी ने जिम्मेवारों को फरमाया, ‘भाई! तुम्हें कितनी बार कहा है कि अपना साधु (जीएसएम) सेवादार ही कुएं में उतारा करो।’ तब मैं साधु (जीएसएम सेवादार) नहीं बना था। बेपरवाह जी के इतना कहने पर मैं ऊंची-ऊंची रोने लगा। वहां एक शीशम का पेड़ था, मैं उस के साथ माथा लगाकर ऊँची-ऊँची रोने लगा। पूजनीय परमपिता जी स्वयं चलकर मेरे पास आए और फरमाया, ‘बेटा, तू हमारा है! तू हमारा है! हमारी बात गौर से सुन! कि अगर तू कुएं में रह जाता तो मनमुखों ने प्रेमियों का पीछा नहीं छोड़ना था।’ फिर मुझे प्रशाद देते समय वचन फरमाया, ‘बेटा, तू हमारा था तो ही तो हम खुद शिखर दोपहरी में पैदल चलकर आए हैं! सिर्फ तेरी खातिर! तू हमारा है! हम पास रखेंगे।’ उससे लगभग अढ़ाई साल बाद पूजनीय सतगुरु परमपिता जी ने मुझे अपने पवित्र चरणों में बुला लिया। मैं उसी दिन से ही दरबार में रह रहा हूं तथा हुक्म की सेवा निभा रहा हूं। पूजनीय परमपिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज के मौजूूदा पावन स्वरूप पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां के पवित्र चरण-कमलों में मेरी यही अरदास है कि प्यारे दाता जी, इसी तरह ही ओड़ निभा देना जी।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अनमोल वचन</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 24 Jul 2025 14:33:03 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>सच्चे सतगुरु जी ने शिष्य को बख्शा नया जीवन</title>
                                    <description><![CDATA[गांव मलकपुरा जिला सरसा, से प्रेमी लेखराम कुल मालिक की अपार महिमा का एक वृत्तान्त इस प्रकार बयान करता है:- प्रेमी बताता है कि सन् 1964 में पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज उसके गांव मलकपुरा में जब दूसरी बार सत्संग करने पधारे, तो प्रेमी ने पहले से ही निश्चित किए फै सले के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/true-satguru-ji-gave-a-new-life-to-the-disciple/article-47843"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/param-pita-shah-satnam-ji.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">गांव मलकपुरा जिला सरसा, से प्रेमी लेखराम कुल मालिक की अपार महिमा का एक वृत्तान्त इस प्रकार बयान करता है:-</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रेमी बताता है कि सन् 1964 में पूजनीय परम पिता शाह सतनाम जी महाराज उसके गांव मलकपुरा में जब दूसरी बार सत्संग करने पधारे, तो प्रेमी ने पहले से ही निश्चित किए फै सले के अनुसार अपने छोटे लड़के को दरबार में साधु रख लेने के लिए प्रार्थना कर दी। पूजनीय परम पिता जी का उतारा भी प्रेमी लेखराम के घर पर ही था, क्योंकि वह दरबार का एक पुराना सत्संगी व सेवादार प्रेमी है। प्रेमी के दो ही लड़के हैं। बड़े का नाम पृथ्वीराम है, जो उस समय आठवीं कक्षा में पढ़ता था और छोटा लड़का चौथी में था।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="फिर हर शै होगी खुशी की…" href="http://10.0.0.122:1245/poem-written-on-respected-guru-ji/">फिर हर शै होगी खुशी की…</a></p>
<p style="text-align:justify;">प्रेमी ने अपने घर में कुछ दिन पहले ही विचार पक्का कर लिया था कि वह अपने छोटे लड़के को दरबार में साधु रखने के लिए पूजनीय परम पिता जी के पावन चरण कमलों में प्रार्थना करेगा और बड़ा लड़का घर का कारोबार संभाल लेगा। इस प्रकार घर की जिम्मेवारियों से फारिग होकर वह खुद भी दरबार में रहकर सेवा व भजन-सुमिरन करेगा। इसी उद्देश्य से उसने पूजनीय परम पिता जी की हजूरी में उक्त प्रार्थना की थी। कुल मालिक तो आगे-पीछे की सब जानते हैं अपने जीव के लिए क्या ठीक है क्या गलत है, आज सब बातें मालिक के सामने होती हैं, क्योंकि वह दोनों जहानों के मालिक व पालक हैं। संत-जन फिर भी जीव को दिलासा देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पूजनीय शहनशाह जी ने मुस्कुराते हुए फरमाया, ‘‘भाई! काम करने वाले को तो घर पर रखते हो और दूध पीने वाले बच्चे को दरबार में साधु बनाते हो।’’ भाव बड़ा लड़का तो उम्र के अनुसार कुछ समझदार है और थोड़ा-बहुत काम (सेवा) आदि करने योग्य है। उसे छोड़कर वह अपने छोटे लड़के को दरबार में साधु बनाना चाहता था, जो उस समय केवल 10 वर्ष का ही था। शहनशाह जी थोड़ी देर के लिए चुप हो गए और फिर अपने पवित्र मुख से वचन फरमाया, ‘‘लेखराम! तेरी हाजिरी मंजूर है। दोनों</p>
<p style="text-align:justify;">लड़के तू अपने घर ही रख, तेरा घर भी तो साध संगत का डेरा ही है। दोनों यहीं पर ही सेवा करेंगे।’’ थोड़ी देर रुकने के बाद सच्चे पातशाह जी ने फरमाया, ‘‘भाई! छोटा लड़का ही तुम्हारा काम करेगा, बड़ा तो दूसरों का मोहताज (दूसरों पर निर्भर) रहेगा। लेखराम तू फिक्र न कर, तुझे बहुत ही जल्दी तेरी कबीलदारी तथा जिम्मेदारियों से फारिग कर लेंगे।’’ भविष्य में किसी के साथ क्या होना है, किसी को कुछ भी मालूम नहीं होता, क्योंकि प्रभु ने विधान ही ऐसा बनाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">संत-वचन तो टल ही नहीं सकता, चाहे खंड-ब्रह्मण्ड सब उल्ट-पुल्ट हो जाएं, क्योंकि पूर्ण संत-महात्माओं के वचन तो सत्य ही रहते हैं। प्रेमी लेखराम का बड़ा लड़का, जो कॉलेज में पढ़ने के लिए किसी दूसरे शहर में गया हुआ था। बीए की डिग्री लेकर जब अपने घर पहुंचा तो कुछ ही दिनों बाद अचानक उसकी आंखों की ज्योति जाती रही। जिससे वह दूसरों का मोहताज बनकर रह गया, क्योंकि कुल मालिक का वचन था कि वह तो दूसरों पर ही निर्भर रहेगा। सचमुच! वह दूसरों पर ही निर्भर हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">शुरू-शुरू में तो प्रेमी ने एक-दो डॉक्टरों की सलाह ली, पर किसी की समझ में नहीं आया तो वह अपने उस लड़के को लेकर यहां दरबार में पूजनीय परम पिता जी की पावन हजूरी में पेश हो गया। फल तो जीव के अपने ही किए कर्मों का होता है, परंतु पूरा सतगुरु अपने सत्संगी के किसी भी भारी से भारी कष्ट को थोड़े में ही भुगतवा देता है। पूरे सतगुरु की सबसे बड़ी यह महानता है कि जीव को उसके कष्ट का अनुभव भी नहीं होने देता, भाव उसे दु:ख महसूस तक भी नहीं होने देता। दयालु कुल मालिक ने प्रेमी की प्रार्थना सुनी और हुक्म फरमाया, ‘‘भाई लेखराम! बच्चे का किसी अच्छे से अच्छे डॉक्टर से इलाज करवाओ।</p>
<p style="text-align:justify;">फिक्र करने की कोई जरूरत नहीं है।’’ प्रेमी को इस बात का पूरा विश्वास हो गया कि उसके लड़के का बाल भी बांका नहीं हो सकता, परंतु उसके कर्मों में जो थोड़ी-बहुत तकलीफ थी, अथवा किसी से लेन-देन का जो हिसाब-किताब था, वह तो कुल मालिक ने किसी ने किसी बहाने पूरा करवाना ही था। अपने सतगुरु कुल मालिक के हुक्मानुसार उसने अपने लड़के का अच्छे से अच्छे डॉक्टर से इलाज करवाया। वह उसे यूपी स्टेट के सीतापुर शहर के आंखों के एक बड़े अस्पताल में भी लेकर गया था। यहां पर उसका कई महीने लगातार इलाज चलता रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">लड़के की आंखों में करीब डॉक्टरों ने साढ़े तीन सौ टीके लगा दिए थे परंतु फिर भी प्रेमी को वहां से निराश ही वापिस लौटना पड़ा, क्योंकि लड़के की आंखों की स्थिति ज्यों की त्यों ही बनी हुई थी। इसके बाद उसने लड़के को और भी कई डॉक्टरों के पास दिखाया, परंतु सभी ने यही जवाब दिया कि इसकी आंखों की ज्योति जाती रही है, अब वापिस नहीं आ सकती। अंत में वह थक-हारकर फिर पूजनीय परम पिता जी के पास दरबार में आ गया और कुल मालिक के चरणों में बैठकर अपनी बेबसी व मजबूरी प्रार्थना के रूप में प्रकट की।</p>
<p style="text-align:justify;">रहमतों के भंडार, दया के पुंज सतगुरु पूजनीय परम पिता जी ने प्रेमी को धैर्य बंधाया और फरमाया, ‘‘भाई लेखराम! कोई बात नहीं यदि उन डॉक्टरों ने जवाब दे दिया है तो क्या हुआ! आपके असली डॉक्टर बेपरवाह सतगुरु शहनशाह पूजनीय बेपरवाह सार्इं शाह मस्ताना जी महाराज तुम्हे कभी जवाब नहीं देगें।’’ इसके साथ ही सर्व-सामर्थ दातार जी ने प्रेमी को आंखों में डालने वाली दवाई की एक शीशी (आई ड्रोप्स) देते हुए हुक्म फरमाया, ‘‘भाई! यह दवाई हर रोज लड़के की आंखों में डाल दिया करो और आंखों पर रंगदार चश्मा लगाकर रखा करो। अब तुम्हें कहीं और जाने की जरूरत नहीं है, कुल मालिक बेपरवाह मस्ताना जी की मेहर से लड़के की आंखें जल्दी ही ठीक हो जाएंगी, घबराने की कोई बात नहीं है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">प्रेमी लेखराम के यह प्रार्थना करने पर कि उसका लड़का पृथ्वीराम कोई काम-धंधा अथवा नौकरी आदि तो नहीं कर सकता, तो इस संबंध में पूजनीय शहनशाह जी ने फरमाया, ‘‘भाई! इसे नौकरी की क्या जरूरत है? इसके आगे तो कई-कई नौकर काम किया करेंगे।’’ पूजनीय परम पिता जी के हुक्म से रोजाना दवाई डालने तथा आंखों पर रंगदार चश्मा लगाए रखने से उसकी आंखें कुछ दिनों में ही ठीक हो गर्इं। कुछ दिनों बाद उसने फरीदाबाद शहर में एक फैक्ट्री लगा ली। पूजनीय परम पिता जी वाली दो जहान के हुक्मानुसार वह तो केवल फैक्ट्री की देखभाल करता है। बाकी सारा काम तो उसके नौकर ही करते हैं। मालिक स्वयं सर्व-सामर्थ है और सबकुछ उसके हुक्म में ही है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रेमी लेखराम की जो आतंरिक इच्छा थी वह घर-परिवार की जिम्मेदारियों से फारिग होकर सतगुरु जी के दरबार में ही सेवा करे। मालिक जी ने स्वयं अपनी दया-मेहर से वैसा ही साधन बना दिया। पूजनीय परम पिता जी के हुक्म से देखते ही देखते उसका छोटा लड़का इतना जवान व समझदार हो गया कि उसने घर परिवार व खेत आदि की सारी जिम्मेदारी खुद संभाल ली। कुल मालिक ने अपनी कृपा से प्रेमी लेखराम को उसके परिवार की जिम्मेदारियों से बहुत जल्दी आजाद करवा दिया और अपने दरबार का पक्का सेवादार (साधु) बना लिया। अब वह मालिक के हुक्म में रहकर सच्ची हार्दिक भावना से दरबार की सेवा करता है और बाकी का समय भजन-सुमिरन में लगाकर अपने जीवन को सफल बना रहा है।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>अध्यात्म</category>
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                <pubDate>Fri, 19 May 2023 20:58:10 +0530</pubDate>
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                <title>जब परमपिता जी ने फरमाया ‘‘लगे रहो, अपना तो काम ही यही है’’</title>
                                    <description><![CDATA[सतगुरु का हर क्षण मानवता को समर्पित रहता है। एक बार राजस्थान (param pita shah satnam ji) में श्रीगंगानगर जिले के पक्का सहारणा गांव में पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज ने रूहानी सत्संग फरमाया। उस वक्त पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां बाल रूप में थे तो सेवादारों ने पूजनीय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/spiritual/when-the-param-pita-shah-satnam-ji-said-keep-on-working-this-is-your-only-work/article-45104"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-03/msg-141.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">सतगुरु का हर क्षण मानवता को समर्पित रहता है। एक बार राजस्थान (param pita shah satnam ji) में श्रीगंगानगर जिले के पक्का सहारणा गांव में पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज ने रूहानी सत्संग फरमाया। उस वक्त पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां बाल रूप में थे तो सेवादारों ने पूजनीय परमपिता जी के समक्ष अर्ज की कि पिता जी ये श्री गुरुसर मोडिया के नम्बरदार जी के बेटे हैं और इतनी छोटी उम्र में भी ट्रैक्टर-ट्राली भर-भर कर नाम लेने वाले जीवों को लेकर सत्संगों में पहुंचते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस पर बाल स्वरूप को निहार सच्चे दाता, रूहानी रहबर पूजनीय परमपिता शाह सतनाम जी महाराज ने वचन फरमाया कि ऐसा करते रहो, अपना तो काम ही ये है। उस वक्त शायद इन वचनों को बाल रूप सतगुरु के अलावा कोई समझ नहीं पाया था, लेकिन इसका रहस्योद्घाटन बाद में उस वक्त हुआ जब 23 सितंबर 1990 को पूजनीय परम पिता जी ने डेरा सच्चा सौदा की पवित्र मर्यादा अनुसार चमकीले फूलों का एक सुन्दर हार अपने पवित्र कर-कमलों से पूज्य गुरु जी को पहनाया और अपनी पाक-पवित्र दृष्टि का प्रशाद (हलवे का प्रशाद) दिया जो उस पवित्र अवसर पर विशेष तौर पर तैयार किया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस शुभ अवसर पर साध-संगत में भी वह पवित्र प्रशाद बांटा गया। इस अवसर पर पूजनीय परमपिता जी ने साध-संगत में फरमाया, ‘‘अब हम जवान बनकर आए हैं। इस बॉडी में हम खुद काम करेंगे। किसी ने घबराना नहीं। ये हमारा ही रूप हैं। साध-संगत की सेवा व संभाल पहले से कई गुना बढ़कर होगी। डेरा व साध-संगत और गुरुमंत्र लेने वाले जीव दिन दोगुनी रात चौगुनी, कई गुणा बढ़ेंगे। किसी ने चिंता, फिक्र नहीं करना। हम कहीं जाते नहीं, हर समय तथा हमेशा साध-संगत के साथ हैं।</p>
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                                            <category>अध्यात्म</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Mar 2023 10:27:24 +0530</pubDate>
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