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                <title>पाकिस्तान के विश्वविद्यालय में हिंसक झड़प, 18 छात्र घायल</title>
                                    <description><![CDATA[इस्लामाबाद (एजेंसी)। पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक विश्वविद्यालय इस्लामाबाद (आईआईयूआई) में इस्लामी जमीयत-ए-तालाब तथा पश्तून परिषद के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प में 18 छात्र घायल हुए हैं। स्थनीय मीडिया ने मंगलवार को अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विश्वविद्यालय में सोमवार को दोनों समूहों के छात्रों ने अलग-अलग प्रदर्शन किया। पश्तून […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/news-brief/violent-clashes-in-pakistani-university-18-students-injured/article-29668"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-01/iiui.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>इस्लामाबाद (एजेंसी)।</strong> पाकिस्तान के अंतरराष्ट्रीय इस्लामिक विश्वविद्यालय इस्लामाबाद (आईआईयूआई) में इस्लामी जमीयत-ए-तालाब तथा पश्तून परिषद के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़प में 18 छात्र घायल हुए हैं। स्थनीय मीडिया ने मंगलवार को अपनी रिपोर्ट में यह जानकारी दी। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक विश्वविद्यालय में सोमवार को दोनों समूहों के छात्रों ने अलग-अलग प्रदर्शन किया। पश्तून परिषद के सदस्यों ने आरोप लगाया कि आईजेटी से संबंधित छात्रों ने उनकी रैली पर हमला किया।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तानी अखबार डॉन ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि आईजेटी के छात्रों ने दावा किया कि विश्वविद्यालय में दो साल पहले हुई उनके एक सहयोगी की हत्या का आरोपी अभी में खुलेआम सड़कों पर घूम रहा है। द फ्राइडे टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि बाद में विश्वविद्यालय ने इस घटना की पुष्टि करते हुए कहा कि छात्र संगठनों के बीच संघर्ष की दुखद घटना है। प्रशासन इस घटना की निंदा करता है और इस पर सख्त संज्ञान लिया है। विश्वविद्यालय प्रशासन स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जिला प्रशासन के साथ काम करेगा। विश्वविद्यालय ने कहा कि इस घटना की जांच के लिए अनुशासन समिति गठित की जाएगी।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Jan 2022 14:06:52 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>चुनाव में हिंसक एवं अराजक बयानों की उग्रता</title>
                                    <description><![CDATA[यह कैसा लोकतांत्रिक ढ़ांचा बन रहा है, जिसमें पार्टियां अपनी सीमा से कहीं आगे बढ़कर लोक-लुभावन वादे एवं बयानबाजी करने में लगी हैं, वे जोड़ने की बजाय तोड़ने वाली राजनीति कर रहे हैं। उसे किसी भी तरह से जनहित में नहीं कहा जा सकता। समाज एवं राष्ट्र-तोड़कर बयान पार्टियों को तात्कालिक लाभ तो जरूर पहुंचा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/violence-of-violent-and-chaotic-statements-in-elections/article-12836"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2020-01/violent-and-chaotic-statements-in-elections.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:center;">यह कैसा लोकतांत्रिक ढ़ांचा बन रहा है, जिसमें पार्टियां अपनी सीमा से कहीं आगे बढ़कर लोक-लुभावन वादे एवं बयानबाजी करने में लगी हैं, वे जोड़ने की बजाय तोड़ने वाली राजनीति कर रहे हैं। उसे किसी भी तरह से जनहित में नहीं कहा जा सकता। समाज एवं राष्ट्र-तोड़कर बयान पार्टियों को तात्कालिक लाभ तो जरूर पहुंचा सकते हैं, पर इससे देश के दीर्घकालिक सामाजिक और राष्ट्रीय सौहार्द एवं सद्भावना पर प्रतिकूल असर पड़ने की भी आशंका है।</h3>
<h3 style="text-align:justify;">ललित गर्ग</h3>
<h4 style="text-align:justify;">दिल्ली में विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे निकट आता जा रहा है, अपने राजनीतिक भाग्य की संभावनाओं की तलाश में आरोप-प्रत्यारोप, हिंसक बयानों-वचनों और छींटाकशी का वातावरण उग्र होता जा रहा है। आम आदमी पार्टी, भारतीय जनता पार्टी एवं कांग्रेस तीनों ही दलों के नेता अपने चुनाव प्रचार में जिस तरह की उग्र भाषा का इस्तेमाल कर रहे है, वह दुर्भाग्यपूर्ण एवं लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है। सभी अपने कड़वे बोल एवं वाणी से लोकतांत्रिक परंपराओं को लांछित करने में लगे हुए हैं। जिस तरह राजनीतिक दल अपने लोकलुभावन बयानों से आम लोगों को गुमराह कर रहे हंै, उसे आखिर जनविरोधी राजनीति की संज्ञा न दी जाए तो और क्या कहा जाए? इन चुनावों में चुनाव-प्रचार का वही हाल है, वही घोड़े, वही मैदान, खुदा खैर करे।<br />
दिल्ली में चुनाव प्रचार में उद्देश्यपूर्ण एवं जनकल्याणकारी मुद्दों पर शालीन एवं सार्थक बयानों की बजाय कड़वी भाषा का प्रयोग बताता है कि राजनीतिक स्तर पर कटुता बहुत ज्यादा बढ़ गई है। अगर समाज का एक वर्ग सरकार के किसी कदम से असहमत है तो उसकी शिकायत सुनना, उसकी गलतफहमी दूर करना और सरकार में उसका भरोसा बहाल करना उन्हीं का काम है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध का अधिकार हर व्यक्ति को है। लेकिन इस अधिकार का कोई वर्ग विशेष गलत इस्तेमाल करे तो उसे भी औचित्यपूर्ण नहीं कहा जा सकता। सरकार, समाज और देश के प्रति विषवमन उचित नहीं है। ऐसे विषवमन के खिलाफ भारत के गृहमंत्री हो या वित्तराज्यमंत्री या कोई सांसद यदि माकूल जबाव देते हैं तो उन बयानों को कैसे गलत कहा जा सकता है? नागरिकता कानून के विरोध में गैरकानूनी ढंग से धरना-प्रदर्शन कर रहे लोगों को कैसे जायज माना जा सकता है?<br />
तीनों ही दलों में तीखे एवं कड़वे बयानोंं का प्रचलन बढ़-चढ़ कर हो रहा है। लोकतंत्र में इस तरह के बेतुके एवं अतिश्योक्तिपूर्ण बयान राजनीति को दूषित करते हैं, जो न केवल घातक हैं, बल्कि एक बड़ी विसंगति का द्योेतक हैं। राजनीतिक दलों में पनप रही ये कड़वे बोल की संस्कृति को क्या सत्ता हथियाने की राजनीति नहीं माना जाना चाहिए? लोकतंत्र एवं चुनाव प्रक्रिया को दूषित करने की राजनीतिक दलों की चेष्टाओं पर कौन नियंत्रण स्थापित करेगा। कहीं चुनाव सुधार की प्रक्रिया शेष न हो जाए, यह एक गंभीर प्रश्न है। दिल्ली चुनाव का बड़बोलापन अवश्य विवादास्पद बनता जा रहा है, अनेक गलत बातों की जड़ चुनाव होते हैं इसलिए वहां निष्पक्षता, शालीनता एवं वाणी का संयम जरूरी है।<br />
दिल्ली के लोगों की वर्षों से एक मान्यता रही है कि हमारी समस्याओं, संकटों व नैतिक हृास को मिटाने के लिए कोई रोशनी अवतरित हो और हम सबको उबारे। कुछ तो राजनीतिक लोग अपनी प्रभावी भूमिका अदा करें, ताकि लोगों में विश्वास कायम रहे कि अच्छे आदमी पैदा होने बन्द नहीं हुए हैं। देश, काल और स्थिति के अनुरूप कोई न कोई विरल परिस्थिति एवं राजनीतिक दल सामने आए, विशेष किरदार अदा करें और लोग उसके माध्यम से आशस्त हो जाएं, लेकिन इन चुनावों में ऐसा चमत्कार घटित होता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है जो अच्छाई-बुराई के बीच भेद रेखा खींच लोगों को मार्ग दिखा सके, तथा विश्वास दिला सके हैं कि वे बहुत कुछ बदलने में सक्षम हैं तो लोग उन्हें सिर माथे पर लगा लें। जैसाकि हम जानते हैं कि लोग शीघ्र ही अच्छा देखने के लिए बेताब हैं, उनके सब्र का प्याला भर चुका है। आज 5 दिनों के क्रिकेट के टेस्ट मैचों के निर्णयों में उतनी रुचि नहीं जितनी एक-दिवसीय मैच में है। इसलिए अब राम की तरह 14 वर्षों का वनवास व महावीर की तरह 12 वर्षों की कठोर तपस्या का इन्तजार नहीं कर सकते। आज प्रतिदिन कोई न कोई घोटाला उद्घाटित होता है। जनता से टैक्स के रूप में लिए करोड़ों-अरबों की राशि कोई डकार जाता है। अपराध और अपराधियों की संख्या बढ़ रही है। एक शांतिप्रिय व्यक्ति का जीना मुश्किल हो गया है। जो कोई सुधार की चुनौती स्वीकार कर सामने आता है, उसे रास्ते से हटा दिया जाता है। कैसे राजनीति एवं राजनीतिक लोगों पर विश्वास करें?<br />
यह कैसा लोकतांत्रिक ढ़ांचा बन रहा है, जिसमें पार्टियां अपनी सीमा से कहीं आगे बढ़कर लोक-लुभावन वादे एवं बयानबाजी करने में लगी हैं, वे जोड़ने की बजाय तोड़ने वाली राजनीति कर रहे हैं। उसे किसी भी तरह से जनहित में नहीं कहा जा सकता। समाज एवं राष्ट्र-तोड़कर बयान पार्टियों को तात्कालिक लाभ तो जरूर पहुंचा सकते हैं, पर इससे देश के दीर्घकालिक सामाजिक और राष्ट्रीय सौहार्द एवं सद्भावना पर प्रतिकूल असर पड़ने की भी आशंका है। प्रश्न है कि राजनीतिक पार्टियां एवं राजनेता सत्ता के नशे में डूबकर इतने आक्रामक एवं गैरजिम्मेदार कैसे हो सकते हंै? चुनाव में जीत पाने के मकसद से होने वाली चुनावी लड़ाइयों में मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए राजनीतिक दलों की ओर से अतिश्योक्तिपूर्ण बयानों का प्रचलन कोई नई बात नहीं है। लेकिन विडंबना यह है कि चुनावी मौसम में वोट पाने के लिए दिए गए ऐसे ज्यादातर बयान राष्ट्रहित की बजाय राजनीतिक हित के होते हैं।<br />
सत्ताधारी आम आदमी पार्टी ने चुनाव की आहट के साथ ही अनेक जनलुभावन बयानों की झड़ी लगा दी है, अब चुनाव प्रचार में भी इसी मकसद से सक्रिय दिख रही है। पार्टी ने लोगों के सामने वोट हथियाने के लिये जिस तरह का वैचारिक परिवेश निर्मित किया है, उससे जनता का हित कम एवं सत्ता तक पहुंच बनाने की मंशा अधिक दिखाई दे रही है। इस तरह का बड़बोलापन एवं समाज को बांटने की संस्कृति असरकारक बन ही जाती है और अधिकांश वोट करने वाला जनसमूह इस बहकावे में आ ही जाता है। वर्तमान दौर की सत्ता लालसा की चिंगारी इतनी प्रस्फुटित हो चुकी है, सत्ता के रसोस्वादन के लिए जनता और व्यवस्था को पंगु बनाने की राजनीति चल रही है। दिल्ली के राजनीतिक दलों के बही-खाते से सामाजिक सुधार, रोजगार, नये उद्यमों का सृजन, स्वच्छ जल एवं पर्यावरण, उन्नत यातायात व्यवस्था, उच्चस्तरीय स्कूल एवं अस्पताल जैसी प्राथमिक जिम्मेवारियों से जुड़ी योजनाओं एवं मुद्दों की बजाय जातीयता एवं साम्प्रदायिकता का जहर उगलने वाली स्थितियां ज्यादा प्रभावी हैं। बिना मेहंदी लगे ही हाथ पीले करने की फिराक में सभी राजनीतिक दल जुट चुके है। सवाल यह खड़ा होता है कि इस अनैतिक राजनीति का हम कब तक साथ देते रहेंगे? इस पर अंकुश लगाने का पहला दायित्व तो हम जनता पर ही है।</h4>
<p> </p>
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                <pubDate>Thu, 30 Jan 2020 21:05:40 +0530</pubDate>
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                <title>लोकतंत्र में हिंसक बनते संवैधानिक अधिकार</title>
                                    <description><![CDATA[लोकतंत्र में हमारे अधिकार हिंसक क्यों बन रहे हैं। हम संविधान उसके विधान और व्यवस्था को हाथ में लेकर खुद न्यायी क्यों बनना चाहते हैं। संविधान में लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात रखने की पूरी आजादी है। हर वह व्यक्ति, संस्था, समूह, दल और संगठन अपनी बात वैचारिक रुप से रख सकता है। यह लोकतांत्रिक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">लोकतंत्र में हमारे अधिकार हिंसक क्यों बन रहे हैं। हम संविधान उसके विधान और व्यवस्था को हाथ में लेकर खुद न्यायी क्यों बनना चाहते हैं। संविधान में लोकतांत्रिक ढंग से अपनी बात रखने की पूरी आजादी है। हर वह व्यक्ति, संस्था, समूह, दल और संगठन अपनी बात वैचारिक रुप से रख सकता है। यह लोकतांत्रिक तरीके से शांतिपूर्ण प्रदर्शन के जरिए भी हो सकता है। अपनी बात रखने के लिए हमारे पास संसद, राज्य विधानसभाएं, संबंधित विभाग और अधिकारी भी हैं। लेकिन हम फिर भी हिंसा का रास्ता क्यों अपनाते हैं। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में आरक्षण की मांग कर रहे निषाद पार्टी के समर्थकों ने जिस तरह का नंगा नाच किया उसे किसी भी तरह से लोेकतांत्रिक नहीं कहा जा सकता। गाजीपुर में उस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा थी। पुलिस वहां से वापस लौट रही थी। अटवा मोड पर निषाद पार्टी की तरफ से आरक्षण की मांग को लेकर प्रदर्शन चल रहा था। जिसकी वजह से पूरी सड़क जाम थी। पुलिस लोगों को समझा-बुझा कर रास्ता खुलवाना चाहती थी।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन उसी दौरान भीड़ हिंसक हो गयी और पुलिस पर पथराव करने लगी जिसकी वजह से सुरेश वत्स की मौत हो गयी। अब भला पुलिस का दोष क्या था? पुलिस पर पथराव की जरुरत क्या थी? पुलिस क्या प्रदर्शनकारियों पर लाठी बरसा रही थी? या फिर फायरिंग कर रही थी? अगर वहां ऐसा कुछ नहीं था तो भीड़ को हिंसक बनने की क्या आवश्यकता थी? क्या पथराव और हिंसा से आरक्षण मिल जाएगा? उत्तर प्रदेश में भीड़ की हिंसा का शिकार कोई पहला पुलिसकर्मी नहीं हुआ। हाल में बुलंदशहर में इंस्पेक्टर सुबोध सिंह को भी माब लिंिचंग का शिकार होना पड़ा। इसके पूर्व समाजवादी सरकार में प्रतापगढ़ में सीओ जियाउल हक और मथुरा में एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी के साथ एक एसएचओ की मौत हो चुकी है। सवाल उठता है कि हम पुलिस को अपने से अलग क्यों समझते हैं। हम अपना गुस्सा पुलिस पर क्यों उतारते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह जघन्य वारदात पूर्वांचल के उस जिले में हुई जहां से सबसे अधिक लोग सेना और यूपी पुलिस में कार्यरत हैं। हमारे दिमाग में शायद यह बात घर कर गई है कि पुलिस सरकार की कठपुतली होती है। वह उसी के इशारे पर नाचती है और भीड़ पर जरुरत पड़ने पर लाठियां भांजती है। लूट, हत्या, डकैती या सामाजिक अपराध से बचाने के लिए पुलिस हमारा साथ नहीं देती। अगर पुलिस हमारे साथ हमेशा खड़ी रहती है तो उसके साथ हमें और समाज को नजरिया बदलना होगा। पुलिस को मित्रवत देखना होगा साथ ही पुलिस को भी अपनी सोच बदलनी होगी। सत्ता के लिए पुलिस का उपयोग भी बंद करना होगा। गाजीपुर में जो कुछ हुआ उसमें पुलिस को कोई गुनाह नहीं है। वहां पुलिस ने बेहद संयम बरता है।उसे अपनी आत्मरक्षा करने का पूरा अधिकार है। वह चाहती तो भीड़ पर पथराव के जबाब में फायरिंग कर सकती थी। उसके बाद की स्थिति क्या होती इसका जबाब निषाद पार्टी के लोगों के पास है। पता नहीं कितने बेगुनाह मारे जाते। पूरा विपक्ष सरकार पर अभी लामबंद है तब यह राष्टीय राजनीति का मसला बन जाता। पूरी यूपी पुलिस कटघरे में होती। संसद से लेकर सड़क तक राजनैतिक लामबंदी देखी जाती। क्योंकि सामने लोकसभा का आम चुनाव है।</p>
<p style="text-align:justify;">निश्चित रुप से यह प्रदर्शन भी निषाद पार्टी की तरफ से लोकसभा चुनावों को ध्यान में रख कर किया गया था। समय भी उचित चुना गया था क्योंकि उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गाजीपुर आ रहे थे। यह सब सरकार का ध्यान खींचने के लिए किया गया था। हम इसका समर्थन करते हंै यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार था। लेकिन अच्छी बात तब थी जब भीड़ ंिहंसक न होती। पुलिस वालों पर वेवजह पथराव न किए जाते। लोकतंत्र तभी संवृृद्ध और मजबूत बन सकता है जब हमारे अंदर वैचारिकता जिंदा होगी। हम हिंसा के जरिए किसी समस्या का समाधान नहीं निकाल सकते हैं। जरा सोचिए बुलंदशहर में माब लिंिचंग का शिकार हुए इंस्पेक्टर सुबोध सिंह हों या फिर गाजीपुर में सुरेश वत्स की मौत यह पूरे देश को शर्मसार करती है। हम सरकार या सत्ता से बाहर रख कर अपनी जिम्मेदारियों से नहीं बच सकते हैं। जितनी अधिक सरकार की जिम्मेदारी है उससे कहीं अधिक विपक्ष की बनती है। क्या समाजवादी सरकार में इस तरह की घटनाएं नहीं हुई थी। सिर्फ वर्दी धारण करने भर से कोई व्यक्ति हिंसक और हिटलर नहीं बन जाता। वह हमारी संवैधानिक व्यवस्था का एक अंग होता है। उसका भी अपना परिवार और सपना होता है। जरा सोचिए अगर कोई अपना असमय हादसे का शिकार हो जाता है तो हमारी उम्मीद टूट जाती है। फिर सुबोध सिंह और सुरेश सिंह क्या इंसान नहीं थे। उनका अपने परिवार, बच्चों, मां-बाप और पत्नी के प्रति कोई दायित्व नहीं था। उनकी कोई उम्मीद और सपना नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में बढ़ती भीड़ की हिंसा ससंद और आम लोगों के साथ टीवी डिबेट का अहम शब्द बन गया है। सवाल उठता है कि इस तरह की हिंसा के पीछे कौन है? समय रहते हम उन्हें पहचान क्यों नहीं पाते। उकसावे की राजनीति के पीछे मकसद क्या होता है। सरकारों की बदनामी या और कुछ। सरकारों का दोष क्या कहा जा सकता है। लेकिन सरकारें अपनी जिम्मेदारी और से बच नहीं सकती। राज्य की योगी सरकार ने पीडि़त परिवार को 50 लाख की सरकारी सहायता और परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी के अलावा पेंशन का एलान किया है। सरकार अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती है। सवाल उठता है कि जब निषाद पार्टी ने प्रदर्शन की घोषणा कर रखी थी तो उस समय जिला प्रशासन का खुफिया विभाग क्या कर रहा था? प्रदर्शन इतना हिंसक होगा इसकी जानकारी उसे क्यों नहीं लगी? जबकि उस समय पीएम मोदी का दौरा था। इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोषियों के लिखाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए। प्रदर्शन के आयोजकों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए। समाज, सत्ता, विपक्ष को पुलिस के प्रति नजरिया बदलना होगा।</p>
<h3 style="text-align:right;">प्रभुनाथ शुक्ल</h3>
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                <pubDate>Sat, 05 Jan 2019 11:09:15 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>उत्तर प्रदेश में हिंसक भीड़ का कहर</title>
                                    <description><![CDATA[भले ही उत्तर प्रदेश सरकार राज्य में अपराधों के कम करने का दावा करती है लेकिन ताजा घटना ने यह साबित कर दिया है कि हिंसक तत्वों को नियंत्रण करने में पुलिस अभी भी नाकाम है। शामेली क्षेत्र में कुछ लोगों ने पुलिस की वैन में एक व्यक्ति को उतारकर उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/violent-crusade-in-uttar-pradesh/article-6707"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-11/crime.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भले ही उत्तर प्रदेश सरकार राज्य में अपराधों के कम करने का दावा करती है लेकिन ताजा घटना ने यह साबित कर दिया है कि हिंसक तत्वों को नियंत्रण करने में पुलिस अभी भी नाकाम है। शामेली क्षेत्र में कुछ लोगों ने पुलिस की वैन में एक व्यक्ति को उतारकर उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी। पहले तो पुलिस इस घटना से मुकर ही गई फिर पुलिस कर्मियों को निलंबित कर उनके खिलाफ विभागीय जांच भी शुरू कर दी। यह तो सोशल मीडिया का कमाल है जहां एक वीडियो वायरल होने से पुलिस का झूठ सामने आ गया।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला भीड़ द्वारा की गई मारपीट का है। उत्तर प्रदेश में पहले भी ऐसी घटनाएं घट चुकी हैं और सुप्रीम कोर्ट भी इस मामले में केंद्र सरकार को लताड़ लगा चुकी है, लेकिन सुधार होता दिख नहीं रहा। कई राज्यों में भीड़ इतनी तेजी से हिंसा भड़काती है कि पुलिस बल बिल्कुल नाकाम नजर आते है। अब तो हद ही हो गई जब भीड़ ने व्यक्ति को पुलिस के हाथों से छीनकर उसकी हत्या कर दी।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल पुलिस प्रबंधों को चुस्त-दरुस्त बनाने की राजनीतिक इच्छा शक्ति ही नजर नहीं आ रही। पुलिस को आधुनिक सुविधाओं से लैस करना तो दूर अभी तक पुलिस में कर्मचारियों की गिनती की समस्या ही हल नहीं हुई। उत्तर प्रदेश पुलिस में एक लाख से अधिक पद खाली हैं। पुलिस कर्मियों की गिनती पूरी नहीं हो रही और न ही कर्मचारियों को आराम देने के लिए कोई कानून पास किया गया है। विभिन्न राज्यों में पुलिस में सप्ताहिक छुट्टी रखने की चर्चा तो होती रहती है लेकिन बात पूरी नहीं होती।</p>
<p style="text-align:justify;">अब मध्य प्रदेश में कांग्रेस पार्टी ने अपने चुनावी मैनीफेस्टो में पुलिस कर्मियों को सप्ताहिक छुट्टी देने का वायदा किया है। हैरानी इस बात की है कि पुलिस विभाग को इतना ज्यादा अनदेखा किया गया कि सप्ताह में एक छुट्टी को चुनाव का मुद्दा बनाना पड़ रहा है। पुलिस आंतरिक सुरक्षा व कानून प्रबंधों के लिए जिम्मेदार होती है। पुलिस प्रबंध की खामियां बहुत समय पहले हल हो जानी चाहिए थी, यह भी कड़वी सच्चाई है कि राजनेताओं ने पुलिस को केवल मंत्रियों के दौरे पर रैलियों को सफल बनाने का स्त्रोत बना लिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">आम लोगों की सुरक्षा को पुलिस की जिम्मेदारी नहीं समझा जाता। पुलिस प्रबंधों में राजनीतिक दखलअंदाजी ने इसकी स्थापना के उद्देश्य को कमजोर कर दिया है। अपराधों की रोकथाम के लिए केवल भाषणों या आंकड़ों का खेल काफी नहीं बल्कि पूरी वचनबद्धता से काम करने की आवश्यकता है। यह समझना होगा कि एक-एक नागरिक की जान कीमती है और हजारों हत्याएं हो जाने पर भी अपराधों की कमी के दावे करना कोई खुश होने वाली बात नहीं। पुलिस प्रबंधों को चुस्त-दुरस्त करने के साथ-साथ पुलिस में राजनीतिक दखलअन्दाजी बंद करने से ही अपराध कम हो सकते हैं।</p>
<p> </p>
<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Nov 2018 12:58:38 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>युवक की मौत के बाद हिंसक हुआ मराठा आंदोलन, आज महाराष्ट्र बंद</title>
                                    <description><![CDATA[महाराष्ट्र के कई इलाकों में गाड़ियों- बसों में तोड़फोड़ महाराष्ट्र (एजेंसी)। मराठा आरक्षण की मांग को लेकर महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक युवक ने गोदावरी नदी में कूद कर खुदकुशी कर ली। युवक की मौत के बाद लोग नाराज हो गए और महाराष्ट्र के कई इलाकों में गाड़ियों- बसों में तोड़फोड़ की गई। युवक की मौत […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/violent-maratha-agitation-after-death-of-youth-maharashtra-closed-today/article-4991"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/maharashtra-2.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">महाराष्ट्र के कई इलाकों में गाड़ियों- बसों में तोड़फोड़</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>महाराष्ट्र (एजेंसी)।</strong> मराठा आरक्षण की मांग को लेकर महाराष्ट्र के औरंगाबाद में एक युवक ने गोदावरी नदी में कूद कर खुदकुशी कर ली। युवक की मौत के बाद लोग नाराज हो गए और महाराष्ट्र के कई इलाकों में गाड़ियों- बसों में तोड़फोड़ की गई। युवक की मौत के बाद आज मराठा क्रांति मोर्चा ने महाराष्ट्र बंद का ऐलान किया है। कोल्हापुर, सातारा, सोलापुर, पुणे और मुंबई में हालात तनाव पूर्ण है। इस बीच मराठा समुदाय की नाराजगी को देखते हुए औरंगाबाद के डीएम उदय चौधरी ने मराठा क्रांति मोर्चा की अधिकांश मांगे मान ली है।</p>
<h2>मृतक काकासाहेब शिंदे के परिवार को 10 लाख रुपये मुआवजा देगी सरकार</h2>
<p style="text-align:justify;">इस बारे में डीएम उदय चौधरी ने बताया कि सरकार मृतक काकासाहेब शिंदे के परिवार को 10 लाख रुपये मुआवजा देगी। साथ ही उनके छोटे भाई को सरकारी नौकरी भी दी जाएगी। बता दें कि वैसे तो मराठा आरक्षण की मांग लंबे समय से हो रही है, लेकिन बीते कुछ दिनों से आरक्षण के लिए आंदोलन तेज हो गया है. मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के खिलाफ लोग कड़ी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं और मुख्यमंत्री पद से इस्तीफे की मांग की जा रही है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">कांग्रेस ने भी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस पर मराठा आरक्षण को लेकर निशाना साधा</h2>
<p style="text-align:justify;">उधर, कांग्रेस ने भी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस पर मराठा आरक्षण को लेकर निशाना साधा। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने खुद आरक्षण देने का वादा किया था, लेकिन आज वो अपनी ही बात से मुकर रहे हैं।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Jul 2018 03:17:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>गोरखालैंड समस्या में ममता को धैर्य से काम लेना होगा</title>
                                    <description><![CDATA[गोरखालैंड आंदोलन ने पश्चिम बंगाल में हिंसक रूप धारण कर लिया है। इसके साथ ही इस मामले में राजनीति भी तेज हो गई है। तीखे भाषण देने वाली प्रदेश की मुख्यमंत्री परिस्थितियों को समझने व संयम से काम लेने की बजाय बदले की भावना से काम कर रही हैं। ममता ने आंदोलनकारियों को आतंकी कहकर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/gorkhaland-andolan-politics-too-fast/article-1375"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/gorkh-andolan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गोरखालैंड आंदोलन ने पश्चिम बंगाल में हिंसक रूप धारण कर लिया है। इसके साथ ही इस मामले में राजनीति भी तेज हो गई है। तीखे भाषण देने वाली प्रदेश की मुख्यमंत्री परिस्थितियों को समझने व संयम से काम लेने की बजाय बदले की भावना से काम कर रही हैं। ममता ने आंदोलनकारियों को आतंकी कहकर नया विवाद खड़ा कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ममता इस सारे विवाद को भाजपा एंव मोदी सरकार की राजनीति करार देकर तुच्छ राजनीति पर भी उतारू हैं। परिस्थितियों के अनुसार, प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह केंद्र सरकार का सहयोग ले। प्रदेश व केंद्र सरकार दोनों मिलकर गोरखा आंदोलन का समाधान निकाल सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन यह काफी दु:खद है कि गोरखा आंदोलन की आड़ में ममता बनर्जी केंद्र सरकार को बदनाम कर अपना कद बढ़ाना चाह रही हैं। प्रदर्शनकारियों के साथ प्रदेश सरकार वार्ता कर इस आंदोलन का पटाक्षेप कर सकती हैं, न कि उन्हें आतंकी कहकर प्रदेश का नुक्सान करवाया जाए। आंदोलन कोई भी हो, तो आम जन मानस में बहुत सी अफवाहें भी फैल जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आजकल तो सोशल मीडिया का दौर है, ऐसे में ये अफवाहें भयवाह रूप भी धर लेती हैं। वर्ष 1985-98 के दौरान गोरखालैंड आंदोलन में 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। अत: प्रदेश सरकार को माहौल शांत करने के प्रयास तेज कर देने चाहिएं। इस वक्त राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा शासन प्रबंध आवश्यक हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दार्जीलिंग पश्चिम बंगाल का ही नहीं, पूरे भारत का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है, जिससे पश्चिम बंगाल सरकार को अच्छी आय भी होती है। आंदोलन चलता रहता है तब इस सीजन में पर्यटन प्रभावित होगा, जिसका नुक्सान आंदोलकारियों को भी होगा व प्रदेश सरकार को भी होगा। जहां तक पृथक गोरखलैंड राज्य के निर्माण की बात है तो पृथक राज्यों की मांग देश के अन्य हिस्सों में भी हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्षेत्र के महत्व व स्थानीय लोगों की समस्याओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने नये राज्यों का भी गठन किया है। अत: जब आमजन को लगता है कि किसी विशेष भू-भाग से जुड़े रहने पर उनके विकास की अनदेखी हो रही है, तब वह आंदोलन कर सकते हैं जोकि उनका संवैधानिक अधिकार भी है। यह सरकार का दायित्व है कि वह अंसतुष्टों को कैसे संतुष्ट कर पाती है।</p>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/gorkhaland-andolan-politics-too-fast/article-1375</link>
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                <pubDate>Sun, 18 Jun 2017 23:41:49 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>दार्जिलिंग में GJM का हिंसक प्रदर्शन, 12 घंटे का बंद</title>
                                    <description><![CDATA[प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े दार्जिलिंग: देश के कई राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं कहीं किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। तो कहीं भाषा की राजनीति ने हिंसक रूप ले लिया है। ताजा मामला बंगाल का है जहां ममता बनर्जी के पूरे बंगाल में स्कूलों में बंगाली पढ़ाए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/gjms-violent-demonstration-in-darjeeling-12-hours-off/article-1029"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/darjeeling.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>दार्जिलिंग: </strong>देश के कई राज्यों में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं कहीं किसान प्रदर्शन कर रहे हैं। तो कहीं भाषा की राजनीति ने हिंसक रूप ले लिया है। ताजा मामला बंगाल का है जहां ममता बनर्जी के पूरे बंगाल में स्कूलों में बंगाली पढ़ाए जाने को अनिवार्य किए जाने के फैसले के खिलाफ हो रहा प्रदर्शन हिंसक हो गया है। स्थिति पर नियंत्रण के लिए आर्मी तैनात की गई है।आज 12 घंटे का बंद है। दार्जिलिंग घुमने आए हजारों सैलानी बंद के कारण फंसे गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पूरे बंगाल के स्कूलों में बंगाली पढ़ाए जाने को अनिवार्य किए जाने और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के दौरे के खिलाफ गोरखा जनमुक्ति मोर्चा पूरे पहाड़ी इलाके में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रही है। इसी प्रदर्शन को रोकने के लिए पुलिस ने आंसू गैस के गोले छोड़े ताकि प्रदर्शनकारियों को अलग-थलग किया जा सके। विरोध प्रदर्शन के चलते कई सारे पर्यटक पहाड़ी इलाकों में फंसे हुए हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">अलग गोरखालैंड की मांग</h3>
<p style="text-align:justify;">ममता बनर्जी के आने से पहले और आने के बाद हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। ‘जय गोरखा’ के नारे के साथ हजारों जीजेएम समर्थक दार्जिलिंग की सड़कों पर काले झंडों के साथ गोरखालैंड की मांग कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/other-news/gjms-violent-demonstration-in-darjeeling-12-hours-off/article-1029</link>
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                <pubDate>Thu, 08 Jun 2017 22:28:09 +0530</pubDate>
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