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                <title>Agriculture News - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Agriculture News RSS Feed</description>
                
                            <item>
                <title>Cotton Farming: नरमा तैयार होते ही खेतों में पहुंचने लगे प्रवासी मजदूर, चुगाई शुरू</title>
                                    <description><![CDATA[सफेद सोना कही जाने वाली नरमे की फसल खेतों में खिलकर तैयार होने लगी है और इसके साथ ही चुगाई का काम भी शुरू हो गया है। नरमे की चुगाई के लिए पंजाब और भरतपुर क्षेत्र से प्रवासी मजदूर किसानों के यहां पहुंचने लगे हैं। किसानों के अनुसार इस बार पिछले साल की तुलना में नरमे की फसल बेहतर है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/cotton-farming-as-soon-as-narma-was-ready-migrant-laborers/article-90890"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-09/cotten-farming.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Cotton Farming: ओढ़ां, (सच कहूँ/राजू)। </strong>सफेद सोना कही जाने वाली नरमे की फसल खेतों में खिलकर तैयार होने लगी है और इसके साथ ही चुगाई का काम भी शुरू हो गया है। नरमे की चुगाई के लिए पंजाब और भरतपुर क्षेत्र से प्रवासी मजदूर किसानों के यहां पहुंचने लगे हैं। किसानों के अनुसार इस बार पिछले साल की तुलना में नरमे की फसल बेहतर है। फसल में सुंडी का प्रकोप नहीं होने और अधिक बारिश न होने से उत्पादन अच्छा रहने की उम्मीद है। हालांकि, किसानों की चिंता बढ़ी हुई मजदूरी और नरमे के कम भाव को लेकर है। इस बार प्रवासी मजदूर 1300 से 1400 रुपए प्रति क्विंटल चुगाई ले रहे हैं, जो पिछले वर्ष की तुलना में करीब 200 रुपए अधिक है। इसके अलावा किसानों को मजदूरों के आने-जाने का किराया, चाय और राशन का खर्च भी उठाना पड़ रहा है। इन सभी खर्चों को जोड़ने पर नरमे की चुगाई किसान को करीब 1800 रुपए प्रति क्विंटल तक पड़ रही है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">दो माह रुककर तीन बार करेंगे चुगाई</h3>
<p style="text-align:justify;">गांव नुहियांवाली में पंजाब से पहुंचे मजदूर राजा सिंह, टिंकू सिंह और बलजिंदर सिंह ने बताया कि पंजाब में नरमे की अपेक्षा धान की फसल अधिक है। वहां खेतों में काम कम होने के कारण वे परिवार सहित यहां नरमे की चुगाई के लिए आए हैं। करीब दो माह रुककर वे नरमे की तीन बार चुगाई करने के बाद दिवाली के आसपास वापस लौटेंगे। मजदूरों का कहना है कि महंगाई बढ़ने के कारण चुगाई के दाम बढ़ाने पड़े हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">किसानों को भाव बढ़ने की उम्मीद</h3>
<p style="text-align:justify;">किसान जगदीश सहारण ने बताया कि इस बार नरमे की फसल पिछले वर्ष से अच्छी है, लेकिन लागत भी काफी बढ़ गई है। मजदूर करीब 1800 रुपए प्रति क्विंटल पड़ रहे हैं। नरमे का भाव 12 हजार रुपए प्रति क्विंटल तक मिले, तभी किसान के लिए कुछ बचने की उम्मीद है। किसान जसराज ने बताया कि इस बार नरमे की बिजाई अधिक हुई है और भरतपुर क्षेत्र से भी मजदूर पहुंच रहे हैं। एक तरफ का किराया और 1300 रुपए प्रति क्विंटल चुगाई तय हुई है। इसके अलावा दिन में तीन बार चाय और राशन भी देना पड़ता है। वहीं सुखदेव सिंह ने कहा कि नरमे की फसल ठीक है, लेकिन ग्वार की फसल हुई ही नहीं। किसान की लागत लगातार बढ़ रही है और फसलों के उचित भाव नहीं मिल रहे। उन्होंने नरमे का भाव करीब 15 हजार रुपए प्रति क्विंटल होने की जरूरत बताई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 09:04:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Rice Pest Control: धान-बासमती में कीटों का बढ़ रहा खतरा! पत्ती लपेट सुंडी और तेले से फसल बचाने के आसान उपाय</title>
                                    <description><![CDATA[धान और बासमती की फसल में पत्ती लपेट सुंडी और तेले के बढ़ते खतरे को देखते हुए पीएयू विशेषज्ञों ने किसानों को नियमित निगरानी और संतुलित कीट प्रबंधन की सलाह दी है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/rice-pest-control-increasing-threat-of-pests-in-paddy-basmati-easy/article-89996"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-08/paddy-pest.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>लुधियाना (सच कहूँ न्यूज़)।</strong> धान और बासमती की फसल में इस समय कीटों की नियमित निगरानी किसानों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को विशेष रूप से पत्ती लपेट सुंडी और रस चूसने वाले तेले के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि खेत में कीटों की वास्तविक स्थिति का पता लगाए बिना कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग नहीं करना चाहिए। शुरुआती अवस्था में कीटों की पहचान और सही प्रबंधन से फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोका जा सकता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">पत्ती लपेट सुंडी की ऐसे करें पहचान :</h4>
<p style="text-align:justify;">पत्ती लपेट सुंडी धान के पत्तों को मोड़कर या लपेटकर उनके भीतर छिप जाती है। यह पत्तियों के हरे भाग को नुकसान पहुंचाती है, जिसके कारण पत्तों पर सफेद या हल्के रंग की धारियां दिखाई देने लगती हैं।प्रकोप बढ़ने पर पत्तियां कमजोर होकर सूख सकती हैं। इसका असर पौधे की प्रकाश संश्लेषण प्रक्रिया पर पड़ता है और फसल की सामान्य बढ़वार प्रभावित हो सकती है।किसानों को समय-समय पर पत्तियों को खोलकर जांच करनी चाहिए कि उनके भीतर सुंडी या उसके नुकसान के लक्षण मौजूद हैं या नहीं।</p>
<h4 style="text-align:justify;">शुरुआती प्रकोप में क्या करें? </h4>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआती अवस्था में 5 प्रतिशत अजाडिरैक्टिन वाली ईकोटिन 80 मिलीलीटर या 0.15 प्रतिशत अजाडिरैक्टिन वाली अचूक/नीम कवच 1000 मिलीलीटर प्रति एकड़ का उपयोग किया जा सकता है। इन्हें करीब 100 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव किया जा सकता है। यदि प्रकोप अधिक हो, तो पीएयू की सिफारिशों में कुछ अन्य कीटनाशक विकल्प भी शामिल हैं। इनमें फेम 480 एससी, टाकूमी 20 डब्ल्यूजी, कोराजन 18.5 एससी और मॉर्टर 75 एसजी जैसी दवाएं निर्धारित मात्रा के अनुसार उपयोग की जा सकती हैं। किसानों को स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह लेकर ही उचित विकल्प का चयन करना चाहिए।</p>
<h4 style="text-align:justify;">तेले के प्रकोप पर रखें विशेष नजर :</h4>
<p style="text-align:justify;">धान में चिट्टी पीठ वाला तेला, जिसे व्हाइट-बैक्ड प्लांट हॉपर भी कहा जाता है, फसल के लिए गंभीर समस्या पैदा कर सकता है। यह कीट पौधे के तनों से रस चूसता है, जिससे पौधे कमजोर होने लगते हैं। अधिक प्रकोप की स्थिति में खेत के कुछ हिस्सों में पौधे तेजी से सूख सकते हैं। इस स्थिति को हॉपर बर्न कहा जाता है। तेले की जांच के लिए किसानों को पौधों के निचले भाग को ध्यान से देखना चाहिए, क्योंकि यह कीट अक्सर पौधे के निचले हिस्से में छिपा रहता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">तेले की स्थिति में क्या करें?</h4>
<p style="text-align:justify;">पीएयू की सिफारिशों के अनुसार प्रकोप की पुष्टि होने पर पेक्सालोन 10 एससी, उलाला 50 डब्ल्यूजी, ओशीन/टोकन/डोमिनेंट 20 एसजी, चेस 50 डब्ल्यूजी, आर्केस्ट्रा 10 एससी, इमेजिन/वायोला 10 एससी और एकालक्स/क्विनगार्ड/क्विनलमास 25 ईसी जैसे विकल्प निर्धारित मात्रा में इस्तेमाल किए जा सकते हैं। प्रति एकड़ करीब 100 लीटर पानी का उपयोग करते हुए दवा का समान रूप से छिड़काव करने की सलाह दी गई है। हालांकि कीटनाशक के चयन और मात्रा के लिए वर्तमान आधिकारिक सिफारिशों और लेबल निर्देशों का पालन करना जरूरी है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">नियमित निगरानी से होगा सबसे बड़ा फायदा:</h4>
<p style="text-align:justify;">कीट प्रबंधन की शुरुआत दवा से नहीं, बल्कि खेत की सही निगरानी से होती है। हर कुछ दिनों में पौधों के निचले हिस्से, पत्तियों के भीतर और खेत में पानी के आसपास मौजूद पौधों की जांच करनी चाहिए। बासमती किसानों को भी इन कीटों को लेकर सतर्क रहने की जरूरत है। शुरुआत में ही लक्षण पहचान लेने से बड़े प्रकोप को रोकने में मदद मिल सकती है और अनावश्यक कीटनाशक छिड़काव से बचा जा सकता है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">पानी का सही प्रबंधन भी जरूरी:</h4>
<p style="text-align:justify;">तेले के अधिक प्रकोप वाले खेत में परिस्थितियों के अनुसार कुछ समय के लिए पानी निकालकर खेत को हल्का सूखने देना भी प्रबंधन में सहायक हो सकता है। हालांकि यह फैसला मिट्टी की स्थिति, मौसम और फसल की अवस्था को ध्यान में रखकर ही लेना चाहिए। अत्यधिक समय तक खेत को सूखा रखने से धान की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए जल प्रबंधन में संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">मेड़ और नालियों को रखें साफ:</h4>
<p style="text-align:justify;">खेत की मेड़ों और पानी की नालियों में उगे खरपतवार कई कीटों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर सकते हैं। इसलिए खेत के साथ-साथ आसपास की मेड़ों और नालियों की सफाई भी जरूरी है।समय पर खरपतवार हटाने से कीटों को छिपने और बढ़ने की जगह कम मिलती है। यह एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">बिना जांच के न करें छिड़काव:</h4>
<p style="text-align:justify;">कृषि विशेषज्ञों ने किसानों से अपील की है कि केवल कीट दिखाई देने पर तुरंत कीटनाशक का छिड़काव न करें। पहले कीट की सही पहचान करें और उसके प्रकोप का स्तर जानें।एक ही कीटनाशक का बार-बार उपयोग करने से कीटों में दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने का खतरा रहता है। इसलिए आवश्यकता पड़ने पर विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार अलग-अलग प्रभाव-प्रणाली वाले अनुमोदित कीटनाशकों का क्रम बदलकर उपयोग करना बेहतर माना जाता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>पंजाब</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/punjab/rice-pest-control-increasing-threat-of-pests-in-paddy-basmati-easy/article-89996</link>
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                <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 17:50:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Tehdil Arora]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Vegetable Farming: अगस्त की बारिश और सब्जियों पर कीटों का खतरा, किसान इन उपायों से बचाएं फसल</title>
                                    <description><![CDATA[अगस्त की बारिश और बढ़ी नमी में टमाटर, मिर्च व बैंगन जैसी सब्जियों में माहू, सफेद मक्खी और थ्रिप्स का खतरा बढ़ सकता है। जानें फसल बचाने के प्रभावी उपाय।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/vegetable-farming-august-rains-and-danger-of-pests-on-vegetables/article-89405"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-08/vegetable-farming-august.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अगस्त माह में लगातार वर्षा और वातावरण में बढ़ी नमी सब्जी उत्पादक किसानों के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकती है। टमाटर, मिर्च, बैंगन सहित कई सब्जी फसलों में इस मौसम के दौरान रस चूसने वाले कीटों की सक्रियता बढ़ने की संभावना रहती है। माहू, सफेद मक्खी और थ्रिप्स जैसे कीट पौधों की पत्तियों से रस चूसकर उनकी बढ़वार और उत्पादन क्षमता को प्रभावित कर सकते हैं। Vegetable Farming</p>
<p style="text-align:justify;">कीटों का प्रकोप बढ़ने पर पत्तियों का रंग पीला पड़ सकता है, पौधों की वृद्धि रुक सकती है और फलियों या फलों की गुणवत्ता एवं उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए किसानों के लिए जरूरी है कि वे फसल में कीटों की पहचान शुरुआती अवस्था में ही करें और स्थिति के अनुसार उचित नियंत्रण उपाय अपनाएं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसानों को सप्ताह में कम से कम दो बार खेत का निरीक्षण करना चाहिए। पौधों की नई पत्तियों, कोमल भागों और पत्तियों की निचली सतह को विशेष रूप से देखना चाहिए। शुरुआत में ही कीटों की उपस्थिति का पता चल जाने पर कम लागत में नियंत्रण करना आसान हो जाता है। उड़ने वाले कीटों की निगरानी के लिए खेत में पीले और नीले चिपचिपे जाल लगाए जा सकते हैं। इनके माध्यम से कीटों की गतिविधि का अनुमान लगाने में सहायता मिलती है और समय रहते नियंत्रण की योजना बनाई जा सकती है। Vegetable Farming</p>
<h3 style="text-align:justify;">संक्रमित पत्तियों को खेत से हटाएं</h3>
<p style="text-align:justify;">जिन पत्तियों पर कीटों का अधिक प्रकोप दिखाई दे, उन्हें सावधानीपूर्वक तोड़कर खेत से बाहर नष्ट करना चाहिए। इससे संक्रमण को अन्य स्वस्थ पौधों तक फैलने से रोकने में मदद मिल सकती है। खेत में अनावश्यक रूप से अत्यधिक सिंचाई या ऐसी परिस्थितियां बनाने से भी बचना चाहिए, जिनसे लंबे समय तक अत्यधिक नमी बनी रहे। उचित जल निकास बनाए रखना भी सब्जी फसलों के लिए महत्वपूर्ण है।</p>
<p style="text-align:justify;">पौध संरक्षण में यथासंभव जैविक और समेकित उपायों को प्राथमिकता देना उपयोगी रहता है। खेत में मौजूद प्राकृतिक शत्रु कीटों और मित्र कीटों का संरक्षण किया जाना चाहिए, क्योंकि ये कई हानिकारक कीटों की संख्या नियंत्रित करने में प्राकृतिक भूमिका निभाते हैं। बिना आवश्यकता कीटनाशकों का छिड़काव करने से उत्पादन लागत बढ़ सकती है और लाभकारी कीटों को भी नुकसान पहुंच सकता है। इसलिए किसी भी रासायनिक दवा का उपयोग फसल की स्थिति और कीटों की संख्या को ध्यान में रखकर ही करना चाहिए। Vegetable Farming</p>
<h3 style="text-align:justify;">कीटनाशक के प्रयोग में रखें सावधानी</h3>
<p style="text-align:justify;">यदि कीटों की संख्या आर्थिक क्षति स्तर तक पहुंचती है और रासायनिक नियंत्रण आवश्यक हो, तो केवल अनुशंसित कीटनाशक का ही प्रयोग करें। दवा की मात्रा और छिड़काव विधि के लिए उत्पाद के लेबल पर दिए निर्देशों का पालन करना आवश्यक है। छिड़काव सामान्यतः सुबह या शाम के समय करना अधिक उपयुक्त रहता है। वर्षा के तुरंत बाद दवा का छिड़काव करने से बचना चाहिए, क्योंकि बारिश होने पर दवा का प्रभाव कम हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कीट नियंत्रण के लिए लगातार एक ही रसायन का प्रयोग करने से कीटों में उस दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार अलग-अलग प्रभावकारी समूहों की अनुशंसित दवाओं का उचित क्रम में उपयोग करना चाहिए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">किसानों के लिए जरूरी पौध संरक्षण उपाय</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">सप्ताह में कम से कम दो बार फसल का निरीक्षण करें।</li>
<li style="text-align:justify;">पत्तियों और पौधों के कोमल हिस्सों पर कीटों की मौजूदगी जांचें।</li>
<li style="text-align:justify;">पीले और नीले चिपचिपे जाल लगाकर उड़ने वाले कीटों की निगरानी करें।</li>
<li style="text-align:justify;">अधिक संक्रमित पत्तियों को हटाकर सुरक्षित तरीके से नष्ट करें।</li>
<li style="text-align:justify;">प्राकृतिक शत्रु एवं मित्र कीटों को बचाने का प्रयास करें।</li>
<li style="text-align:justify;">आवश्यकता के अनुसार ही कीटनाशकों का प्रयोग करें।</li>
<li style="text-align:justify;">दवा की मात्रा और उपयोग की विधि के लिए लेबल पर दिए निर्देशों का पालन करें।</li>
<li style="text-align:justify;">वर्षा के तुरंत बाद रासायनिक छिड़काव न करें।</li>
<li style="text-align:justify;">कीट नियंत्रण के लिए एक ही दवा का लगातार प्रयोग करने से बचें।</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">विशेषज्ञों के अनुसार, अगस्त की नमी वाले मौसम में सब्जी फसलों की नियमित निगरानी ही बचाव का पहला कदम है। किसान यदि प्रारंभिक अवस्था में कीटों की पहचान कर लें और जैविक उपायों, निगरानी जाल तथा आवश्यकतानुसार अनुशंसित पौध संरक्षण उपायों को अपनाएं, तो फसल को होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। Vegetable Farming</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/vegetable-farming-august-rains-and-danger-of-pests-on-vegetables/article-89405</link>
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                <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 16:20:32 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Balram Agriculture Festival: बलराम कृषि महोत्सव में किसानों को मिलेगी आधुनिक खेती की जानकारी, कृषि वैज्ञानिक करेंगे मार्गदर्शन</title>
                                    <description><![CDATA[सीहोर में 7 अगस्त को आयोजित बलराम कृषि महोत्सव में किसानों को आधुनिक खेती, कृषि यंत्र, जैविक खेती, सिंचाई तकनीक और सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाएगी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/balram-agriculture-festival-farmers-will-get-information-about-modern-farming/article-89271"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-08/balram-agriculture-festival.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Balram Agriculture Festival: सीहोर (हि.स.)। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में किसानों को आधुनिक कृषि तकनीकों, वैज्ञानिक खेती और सरकारी योजनाओं की जानकारी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 7 अगस्त को स्थानीय कृषि उपज मंडी परिसर में बलराम कृषि महोत्सव आयोजित किया जाएगा। दोपहर 12 बजे शुरू होने वाले इस कार्यक्रम में बड़ी संख्या में किसानों की भागीदारी अपेक्षित है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव वर्चुअल माध्यम से किसानों को संबोधित करेंगे, जबकि जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी भी कार्यक्रम में मौजूद रहेंगे। Agriculture Festival</p>
<p style="text-align:justify;">जिला प्रशासन के अनुसार महोत्सव की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। आयोजन के दौरान कृषि एवं कृषक कल्याण विभाग सहित विभिन्न विभागों द्वारा विशेष प्रदर्शनी और जानकारी केंद्र स्थापित किए जाएंगे। इन स्टॉलों के माध्यम से किसानों को आधुनिक कृषि उपकरण, उन्नत बीज, प्राकृतिक एवं जैविक खेती, सूक्ष्म सिंचाई प्रणाली, फसल विविधीकरण, उद्यानिकी, पशुपालन और कृषि से जुड़ी सरकारी योजनाओं की विस्तृत जानकारी दी जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">महोत्सव का प्रमुख आकर्षण कृषि वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों का मार्गदर्शन रहेगा। विशेषज्ञ किसानों को मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण, फसल सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन के अनुरूप खेती, उन्नत उत्पादन तकनीकों तथा कृषि प्रबंधन के आधुनिक तरीकों की जानकारी देंगे। किसान अपनी खेती से जुड़ी समस्याओं पर विशेषज्ञों से सीधे चर्चा कर समाधान भी प्राप्त कर सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">कार्यक्रम के दौरान किसानों को कृषि यंत्रीकरण, अनुदान योजनाओं, उत्पादन लागत कम करने के उपाय तथा आय बढ़ाने वाली नई कृषि पद्धतियों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी जाएगी। प्रशासन ने जिले के किसानों से अधिक से अधिक संख्या में महोत्सव में शामिल होकर आधुनिक कृषि तकनीकों और सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने की अपील की है। Agriculture Festival</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 15:50:06 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Agriculture News: किसानों तक गुणवत्तापूर्ण बीज पहुंचाने की दिशा में पहल, कई राज्यों के किसानों को मिलेगा लाभ</title>
                                    <description><![CDATA[चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (हकृवि) द्वारा विकसित उन्नत फसल किस्मों का बीज देशभर के किसानों तक पहुंचाने के उद्देश्य से निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ समझौते किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में विश्वविद्यालय ने सरसों की उन्नत किस्म आरएच-1975 के बीज उत्पादन एवं प्रसार के लिए केडीएम सीड्स एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड, खांडवा के साथ समझौता किया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/agriculture-news-initiative-towards-providing-quality-seeds-to-farmers-farmers/article-89201"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-08/hisar-kisan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>Agriculture News: हिसार, (सच कहूँ/मुकेश)।</strong> चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय (हकृवि) द्वारा विकसित उन्नत फसल किस्मों का बीज देशभर के किसानों तक पहुंचाने के उद्देश्य से निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ समझौते किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में विश्वविद्यालय ने सरसों की उन्नत किस्म आरएच-1975 के बीज उत्पादन एवं प्रसार के लिए केडीएम सीड्स एंड इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड, खांडवा के साथ समझौता किया है। Hisar News</p>
<p style="text-align:justify;">कुलपति प्रो. बी.आर. काम्बोज ने बताया कि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक लगातार विभिन्न फसलों की उन्नत किस्में विकसित कर रहे हैं, जिन्हें देशभर के किसान अपना रहे हैं। उन्होंने कहा कि किसानों को विश्वसनीय बीज एवं आधुनिक तकनीक उपलब्ध कराने से प्रदेश और देश के खाद्य उत्पादन में वृद्धि होगी तथा किसानों की आय बढ़ाने में भी मदद मिलेगी। विश्वविद्यालय की ओर से अनुसंधान निदेशक डॉ. राजबीर गर्ग तथा कंपनी की ओर से चेयरमैन सुभाष महता ने कुलपति प्रो. बी.आर. काम्बोज की उपस्थिति में समझौता पत्र पर हस्ताक्षर किए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आरएच-1975 की विशेषताएं</h3>
<p style="text-align:justify;">सरसों की आरएच-1975 किस्म की औसत उत्पादन क्षमता 11 से 12 क्विंटल प्रति एकड़ तथा अनुकूल परिस्थितियों में 14 से 15 क्विंटल प्रति एकड़ तक है। इस किस्म में लगभग 39.5 प्रतिशत तेल की मात्रा पाई जाती है। अधिक उत्पादन और बेहतर तेल प्रतिशत के कारण यह किस्म किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। यह किस्म हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, जम्मू तथा उत्तरी राजस्थान के सिंचित क्षेत्रों में खेती के लिए अनुशंसित है, जिससे इन राज्यों के किसानों को इसका सीधा लाभ मिलेगा। Hisar News</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 09:35:33 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>White Gold News: भारत का 'सफेद सोना' बना अर्थव्यवस्था की ताकत, ग्लोबल फाइबर उत्पादन में करीब 19% रही हिस्सेदारी </title>
                                    <description><![CDATA[भारत कपास के रकबे में दुनिया में पहले और उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। सरकार उत्पादकता बढ़ाने, निर्यात मजबूत करने और किसानों की आय बढ़ाने पर विशेष ध्यान दे रही है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/delhi/white-gold-news-indias-white-gold-becomes-the-strength-of/article-88422"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/white-gold.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">India's Cotton Production: नई दिल्ली। कपास उत्पादन और खेती के क्षेत्रफल के मामले में भारत ने वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत स्थिति बनाए रखी है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश दुनिया में कपास के सर्वाधिक रकबे वाला देश है, जबकि उत्पादन और घरेलू खपत के मामले में दूसरा स्थान रखता है। कृषि और वस्त्र क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में कपास की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है।  White Gold News</p>
<p style="text-align:justify;">आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान देश में लगभग 290.91 लाख गांठ कपास का उत्पादन हुआ, जबकि घरेलू उद्योगों की मांग 328 लाख गांठ तक पहुंच गई। वैश्विक फाइबर उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी करीब 19 प्रतिशत आंकी गई है, जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में देश की मजबूत उपस्थिति को दर्शाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने कपास क्षेत्र को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए कई योजनाएं लागू की हैं। इनका उद्देश्य किसानों की उत्पादकता बढ़ाना, गुणवत्ता में सुधार करना, बाजार तक आसान पहुंच उपलब्ध कराना तथा मूल्य संवर्धन को प्रोत्साहित करना है। बाजार में कीमतों में गिरावट आने पर किसानों को राहत देने के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के तहत खरीद अभियान भी संचालित किए जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके साथ ही कॉटन प्रोडक्टिविटी मिशन के माध्यम से वर्ष 2031 तक कपास उत्पादन को लगभग 498 लाख गांठ तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। आधुनिक तकनीकों के उपयोग, डिजिटल खरीद व्यवस्था और उत्पाद की स्रोत-आधारित पहचान (ट्रेसबिलिटी) जैसी पहल भारतीय कपास की गुणवत्ता और वैश्विक स्वीकार्यता को और मजबूत बना रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत में कपास की खेती लगभग 114.84 लाख हेक्टेयर भूमि पर की जाती है। इस फसल से करीब 60 लाख किसान परिवारों की आजीविका जुड़ी हुई है। वहीं कपास की प्रसंस्करण इकाइयों, वस्त्र उद्योग, व्यापार और अन्य संबद्ध क्षेत्रों में 4 से 5 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है। यही कारण है कि कपास को देश की अर्थव्यवस्था में 'सफेद सोना' कहा जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">निर्यात के क्षेत्र में भी भारतीय कपास ने अपनी मजबूत पहचान बनाई है। वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान भारत ने लगभग 18 लाख गांठ कपास का निर्यात किया, जिससे वैश्विक कपास व्यापार में देश की महत्वपूर्ण भागीदारी बनी रही। कपास और उससे तैयार वस्त्रों के निर्यात से देश को 11.49 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा प्राप्त हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय कपास से निर्मित वस्त्रों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका सबसे बड़ा विदेशी बाजार रहा। इसके अलावा बांग्लादेश, श्रीलंका, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त अरब अमीरात भी प्रमुख आयातक देशों में शामिल रहे। यह स्थिति दर्शाती है कि भारतीय कपास और उससे तैयार उत्पादों की मांग अंतरराष्ट्रीय बाजार में लगातार बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में कपास का उत्पादन मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों में होता है। इसके अतिरिक्त ओडिशा और तमिलनाडु में भी कपास की खेती की जाती है, जिससे यह फसल देश के कृषि एवं औद्योगिक विकास का महत्वपूर्ण आधार बनी हुई है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कारोबार</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                            <category>दिल्ली</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 17:25:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Groundnut Farming: वैज्ञानिक तरीके से करें मूंगफली की खेती, बढ़ाएं मुनाफा</title>
                                    <description><![CDATA[मूंगफली देश की प्रमुख तिलहनी फसलों में शामिल है, जिसकी खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम मानी जाती है। यदि इसकी बुवाई उचित समय और वैज्ञानिक विधि से की जाए, तो कम लागत में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ मौसम में मूंगफली की बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक करना सबसे उपयुक्त रहता है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/groundnut-farming-cultivate-groundnut-scientifically-and-increase-profits/article-88089"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/nut-farming.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मूंगफली देश की प्रमुख तिलहनी फसलों में शामिल है, जिसकी खेती किसानों के लिए आय बढ़ाने का प्रभावी माध्यम मानी जाती है। यदि इसकी बुवाई उचित समय और वैज्ञानिक विधि से की जाए, तो कम लागत में भी बेहतर उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खरीफ मौसम में मूंगफली की बुवाई जून के अंतिम सप्ताह से लेकर जुलाई के प्रथम सप्ताह तक करना सबसे उपयुक्त रहता है। इस अवधि में भूमि में पर्याप्त नमी उपलब्ध होने के कारण बीजों का अंकुरण समान रूप से होता है और पौधों का विकास भी तेजी से होता है। Groundnut Farming</p>
<p style="text-align:justify;">उन्नत उत्पादन के लिए किसानों को प्रमाणित एवं उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का चयन करना चाहिए। एमएच-4 तथा पंजाब मूंगफली नंबर-1 जैसी उन्नत किस्में अधिक उपज देने के साथ रोगों के प्रति अपेक्षाकृत सहनशील मानी जाती हैं। बुवाई के समय कतार से कतार की दूरी लगभग 30 सेंटीमीटर रखना लाभदायक होता है। वहीं पौधों के बीच उचित दूरी बनाए रखने से उन्हें पर्याप्त पोषण, धूप और वायु मिलती है, जिससे फसल का विकास बेहतर होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">अच्छे उत्पादन के लिए संतुलित पोषण प्रबंधन भी अत्यंत आवश्यक है। खेत की तैयारी के दौरान मृदा परीक्षण के आधार पर नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश तथा जिंक जैसे पोषक तत्वों का उपयोग करना चाहिए। साथ ही जिप्सम का प्रयोग फली बनने की अवस्था में करने से दानों का विकास बेहतर होता है तथा कैल्शियम और सल्फर की कमी भी पूरी होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">खरपतवार नियंत्रण, समय-समय पर सिंचाई (जहां आवश्यकता हो), रोग एवं कीटों की नियमित निगरानी और वैज्ञानिक सलाह के अनुसार फसल प्रबंधन अपनाकर किसान मूंगफली की पैदावार और गुणवत्ता दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। उचित तकनीक और आधुनिक कृषि पद्धतियों का पालन करने से यह फसल किसानों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। Groundnut Farming</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/groundnut-farming-cultivate-groundnut-scientifically-and-increase-profits/article-88089</link>
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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 16:27:21 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Vegetable Farming: हांसी में सिमट रही सब्जी की खेती, बाहरी सब्जियों ने छीना बाजार</title>
                                    <description><![CDATA[एक समय पूरे क्षेत्र में सब्जी उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में पहचान रखने वाला हांसी अब धीरे-धीरे अपनी यह पहचान खोता जा रहा है। कभी यहां की मंडी में भिंडी, गोभी, मिर्च, बैंगन, टिंडा, तोरी और कद्दू जैसी स्थानीय सब्जियों की भरमार रहती थी।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/vegetable-farming-vegetable-farming-is-shrinking-in-hansi-outside-vegetables/article-88032"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/vegetable-farming.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हांसी, (सच कहूँ/मुकेश)। एक समय पूरे क्षेत्र में सब्जी उत्पादन के बड़े केंद्र के रूप में पहचान रखने वाला हांसी अब धीरे-धीरे अपनी यह पहचान खोता जा रहा है। कभी यहां की मंडी में भिंडी, गोभी, मिर्च, बैंगन, टिंडा, तोरी और कद्दू जैसी स्थानीय सब्जियों की भरमार रहती थी। छोटे व्यापारी किसानों से ताजा सब्जियां खरीदकर सीधे दिल्ली समेत कई शहरों की मंडियों तक पहुंचाते थे। इससे किसानों को अच्छा भाव मिलता था और सब्जी की खेती लाभ का सौदा मानी जाती थी। लेकिन अब तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी है। Vegetable Farming</p>
<p style="text-align:justify;">हांसी की मंडियों में दिल्ली और दूसरे राज्यों से आने वाली सस्ती तथा देखने में आकर्षक सब्जियों की आवक लगातार बढ़ गई है। अधिक मुनाफे के कारण व्यापारी भी स्थानीय किसानों की बजाय बाहरी माल खरीदने लगे हैं। इसका सीधा असर हांसी के सब्जी उत्पादकों पर पड़ रहा है और हर साल सब्जियों का रकबा सिमटता जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">मंडी में इन दिनों टिंडा 15 से 20 रुपये, कद्दू 5 से 10 रुपये, तोरी 10 से 15 रुपये और भिंडी 15 से 20 रुपये प्रति किलो के थोक भाव में बिक रही है। किसानों का कहना है कि इन कीमतों में बीज, खाद, दवाइयों, सिंचाई, मजदूरी और ढुलाई का खर्च निकालना भी मुश्किल हो गया है। ऐसे में सब्जी की खेती घाटे का सौदा बनती जा रही है। हांसी के हाजमपुर, पुठ्ठी मंगल खां, रोहनात और आसपास के गांव कभी पूरे हरियाणा में सब्जी उत्पादन और नर्सरी तैयार करने के लिए प्रसिद्ध थे। यहां से तैयार पौधे लेने के लिए दूर-दूर से किसान पहुंचते थे। Vegetable Farming</p>
<p style="text-align:justify;">स्थानीय सब्जियां अपनी ताजगी और स्वाद के लिए भी जानी जाती थीं, क्योंकि इन्हें खेत से तोड़कर कुछ ही घंटों में मंडी तक पहुंचा दिया जाता था। इसके विपरीत बाहर से आने वाली सब्जियां लंबी दूरी तय करके बाजार तक पहुंचती हैं। इसके बावजूद कम कीमत और अधिक मुनाफे के कारण व्यापारी बाहरी सब्जियों को प्राथमिकता दे रहे हैं। कई उपभोक्ताओं का भी मानना है कि स्थानीय खेतों की ताजा सब्जियों का स्वाद और गुणवत्ता बेहतर होती है, लेकिन बाजार में अब बाहरी सब्जियों की उपलब्धता अधिक होने से उनके पास विकल्प सीमित रह गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसानों का कहना है कि सब्जी की खेती में मेहनत और जोखिम दोनों अधिक हैं। मौसम की मार के साथ-साथ लागत लगातार बढ़ रही है, जबकि मंडी में उचित भाव नहीं मिल रहा। ऐसे में किसान धीरे-धीरे धान, कपास और अन्य पारंपरिक फसलों की ओर लौट रहे हैं। इसका असर केवल किसानों की आय पर ही नहीं, बल्कि खेतिहर मजदूरों, नर्सरी संचालकों और सब्जी व्यापार से जुड़े लोगों के रोजगार पर भी पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि यदि स्थिति यही रही तो आने वाले वर्षों में हांसी की सब्जी उत्पादक क्षेत्र के रूप में पहचान पूरी तरह समाप्त हो सकती है। Vegetable Farming</p>
<h3 style="text-align:justify;">रिहायशी कॉलोनियों ने भी घटाया सब्जियों का रकबा</h3>
<p style="text-align:justify;">हांसी के आसपास जिन क्षेत्रों में कभी बड़े पैमाने पर भिंडी, गोभी, बैंगन और अन्य सब्जियों की खेती होती थी, वहां अब तेजी से रिहायशी कॉलोनियां विकसित हो रही हैं। खेती योग्य जमीन लगातार कम होने से सब्जी उत्पादन भी प्रभावित हुआ है। किसानों का कहना है कि उपजाऊ कृषि भूमि के सिकुड़ने का असर सीधे सब्जी उत्पादन पर पड़ रहा है। Vegetable Farming</p>
<h3 style="text-align:justify;">क्यों घट रही है सब्जी की खेती</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">थोक मंडियों में लगातार गिर रहे भाव।</li>
<li style="text-align:justify;">बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी की बढ़ती लागत।</li>
<li style="text-align:justify;">दिल्ली व अन्य राज्यों से सस्ती सब्जियों की बढ़ती आवक।</li>
<li style="text-align:justify;">खेती योग्य जमीन पर तेजी से विकसित हो रही कॉलोनियां।</li>
<li style="text-align:justify;">मौसम की अनिश्चितता और फसल खराब होने का बढ़ता जोखिम।</li>
</ul>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 15:22:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Digital Agriculture: 3 करोड़ के करीब किसान सारथी प्लेटफॉर्म से जुड़े डिजिटल कृषि परामर्श सेवाओं का उठा रहे लाभ</title>
                                    <description><![CDATA[केंद्र सरकार ने सोमवार को बताया कि किसान सारथी प्लेटफॉर्म के साथ 4,767 आईसीएआर वैज्ञानिक और 113 आईसीएआर संस्थान जुड़े हुए हैं। इस प्लेटफॉर्म पर अब तक 2.95 करोड़ किसान पंजीकृत हो चुके हैं, जिनमें 56.16 लाख महिला लाभार्थी भी शामिल हैं।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/digital-agriculture-nearly-3-crore-farmers-are-taking-advantage-of/article-87330"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-11/all-farmers-will-get-tubewell-connection-by-november-2.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Digital Agriculture: नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सोमवार को बताया कि किसान सारथी प्लेटफॉर्म के साथ 4,767 आईसीएआर वैज्ञानिक और 113 आईसीएआर संस्थान जुड़े हुए हैं। इस प्लेटफॉर्म पर अब तक 2.95 करोड़ किसान पंजीकृत हो चुके हैं, जिनमें 56.16 लाख महिला लाभार्थी भी शामिल हैं। एक आधिकारिक बयान में कहा गया है कि जुलाई 2021 में शुरू किए गए इस एकीकृत डिजिटल कृषि-सलाहकार मंच पर अब तक 19.21 लाख प्रश्नों का समाधान किया जा चुका है। इसके अलावा, किसानों के लिए 351 कृषि उत्पादों से संबंधित 21,900 कृषि सलाह भी जारी की गई हैं। Agriculture News</p>
<p style="text-align:justify;">करीब 2.89 करोड़ किसानों ने अपने नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) जाकर इस प्लेटफॉर्म पर पंजीकरण कराया। इनमें से 5.35 लाख किसान कॉल सेंटर के माध्यम से, 21,517 मोबाइल एप्लिकेशन के जरिए, 2,416 वेब पोर्टल के माध्यम से और 39,193 कॉमन सर्विस सेंटर के जरिए पंजीकरण हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने बताया कि किसान सारथी की सेवाएं देश के 37 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, 768 जिलों और 6.63 लाख गांवों तक पहुंच चुकी हैं। यह प्लेटफॉर्म इंटरैक्टिव इन्फॉर्मेशन डिसेमिनेशन सिस्टम (आईआईडीएस) का उपयोग करता है, जिससे किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच दो-तरफा संवाद संभव हो पाता है। साथ ही, कृषि अनुसंधान से जुड़ी जानकारी सीधे खेतों तक पहुंचाने में भी यह महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। Agriculture News</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से किसानों को समय पर, विश्वसनीय और कई भाषाओं में कृषि संबंधी सलाह उपलब्ध कराई जाती है। इसके अलावा, किसानों को सरकारी योजनाओं की जानकारी, मौसम से जुड़े अपडेट और विशेषज्ञों से सीधे परामर्श की सुविधा भी मिलती है। यह प्लेटफॉर्म इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की संयुक्त पहल है, जिसे भारतीय कृषि सांख्यिकी अनुसंधान संस्थान और डिजिटल इंडिया कॉरपोरेशन ने विकसित और लागू किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार का कहना है कि इन सभी संस्थानों के एक साथ जुड़ने से देश भर में कृषि सलाह का एक मजबूत राष्ट्रीय नेटवर्क तैयार हुआ है, जिससे किसानों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार भरोसेमंद और उपयोगी सलाह मिल रही है। यह प्लेटफॉर्म किसान कॉल सेंटर, कॉमन सर्विस सेंटर, भारत मौसम विज्ञान विभाग, मायस्कीम और भाषिनी जैसी प्रमुख राष्ट्रीय सेवाओं से भी जुड़ा हुआ है, जिसके जरिए किसानों को 610 सरकारी योजनाओं की जानकारी मिलती है, जिनमें 102 योजनाएं केंद्र सरकार की हैं। Agriculture News</p>
<p style="text-align:justify;">इस प्लेटफॉर्म पर सभी प्रमुख अनाज, दलहन, तिलहन, बागवानी फसलों, बागान फसलों और चारा फसलों से संबंधित कृषि सलाह उपलब्ध कराई जाती है। इसके अलावा पशुपालन, पोल्ट्री, मत्स्य पालन और अन्य संबद्ध क्षेत्रों से जुड़ी जानकारी भी किसानों को दी जाती है। किसान अपनी स्थानीय भाषा में कृषि विज्ञान केंद्र के विशेषज्ञों से सवाल पूछ सकते हैं और उसी भाषा में सलाह प्राप्त कर सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसान सारथी प्लेटफॉर्म 13 क्षेत्रीय भाषाओं में विशेषज्ञों से लाइव बातचीत की सुविधा भी देता है। साथ ही, किसानों के लिए एक ज्ञान भंडार भी उपलब्ध कराता है। इससे कृषि अनुसंधान संस्थानों की पहुंच बढ़ी है और वैज्ञानिक सलाह अधिक से अधिक किसानों तक पहुंच रही है।सरकार के अनुसार, यह प्लेटफॉर्म ज्ञान साझा करने की प्रक्रिया को मजबूत बनाने के साथ-साथ कृषि अनुसंधान के व्यावहारिक उपयोग को भी बढ़ावा दे रहा है। Agriculture News</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 15:11:27 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Agriculture News: जलसंभर प्रबंधन पर राष्ट्रीय बैठक, नए तकनीकी दिशा-निर्देशों पर मंथन</title>
                                    <description><![CDATA[ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग और 'राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण' ने यहां एक दो दिवसीय राष्ट्रीय बैठक का आयोजन किया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/a-meeting-was-organized-on-watershed-guidelines-to-strengthen-the/article-86511"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-06/krishi-today-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> Agriculture News: ग्रामीण विकास मंत्रालय के भूमि संसाधन विभाग और 'राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण' ने यहां एक दो दिवसीय राष्ट्रीय बैठक का आयोजन किया। बैठक का मुख्य उद्देश्य विश्व बैंक के सहयोग से चल रहे 'रिवार्ड' कार्यक्रम के तहत देश में जलसंभर (पानी और मिट्टी के संरक्षण) के बेहतर प्रबंधन के लिए नए राष्ट्रीय तकनीकी दिशा-निर्देशों के मसौदे पर चर्चा करना था।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां के पूसा परिसर में चली दो दिवसीय (17 -18 जून) बैठक में राष्ट्रीय तकनीकी दिशा-निर्देशों के मसौदे पर विचार-विमर्श किया गया और देश भर में जलसंभर नियोजन, कार्यान्वयन, निगरानी और स्थिरता को मजबूत करने के लिए विशेषज्ञों के सुझावों पर विचार किया गया। बैठक से हुए विचार-विमर्श वर्षा आधारित क्षेत्रों में जलसंभर शासन में सुधार और जलवायु परिवर्तन के प्रति सहनशीलता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">बैठक में इस बात पर बल दिया कि जलसंभर प्रबंधन विज्ञान, सामुदायिक भागीदारी और प्रशासनिक सरलता पर आधारित होना चाहिए, जिसमें किसानों और स्थानीय जलसंभर संस्थानों पर विशेष ध्यान दिया जाए। दिशा-निर्देश तैयार करते समय वर्षा आधारित क्षेत्रों के विकास, कृषि उत्पादकता में सुधार, फसल सघनता बढ़ाने, जल सुरक्षा और भूजल पुनर्भरण को मजबूत करने, जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन विकसित करने और जलसंभर संपत्तियों की मरम्मत और रखरखाव सुनिश्चित करने के राष्ट्रीय लक्ष्यों को ध्यान में रखना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस चर्चा में निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी, डेटा-आधारित दृष्टिकोण, समन्वय, पीआरआई की भागीदारी और परियोजना के बाद की स्थिरता जैसे बिंदुओं पर जोर दिया गया था। इसके अलावा, उन्होंने चैटबॉट के साथ सक्षम अनुप्रयोगों के एकीकरण, प्रौद्योगिकी-आधारित निगरानी और मूल्यांकन प्रणालियों के उपयोग, मजबूत डीएसएस के विकास और राष्ट्रीय वेब पोर्टल प्रणालियों पर बल दिया गया ताकि भविष्य के जलसंभर कार्यक्रमों के लिए सार्थक परिणाम मिल सकें।</p>
<p style="text-align:justify;">बैठक में जलसंभरण पर योजना बनाने के लिए उच्च रिज़ॉल्यूशन वाली इमेजरी प्राप्त करने हेतु ड्रोन प्रौद्योगिकी के उपयोग, एलआरआई और हाइड्रोलॉजी-लाइट दृष्टिकोणों को अपनाने, प्रभावी जलसंभर कार्यान्वयन के लिए राज्यों में संस्थागत और कार्यान्वयन तंत्रों में सुधार करने और तकनीकी सेवा प्रदाताओं, संस्थानों/एनजीओ की भागीदारी के माध्यम से जलसंभर संपत्तियों के परियोजना-पश्चात रखरखाव और स्थिरता के लिए तंत्रों का पता लगाने पर विचार-विमर्श करने का सुझाव भी सामने आया।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बैठक में भूमि संसाधन विभाग के सचिव नरेंद्र भूषण और राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. चंद्र शेखर कुमार सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। इस बैठक में विश्व बैंक, नाबार्ड, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, और 'रिवार्ड' कार्यक्रम से जुड़े राज्यों के लगभग 100 राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय विशेषज्ञों ने भाग लिया।</p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/2026-06/krishi-today-news.jpg" alt="Krishi-Today-News" width="1435" height="723"></img></p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कृषि</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/agriculture/a-meeting-was-organized-on-watershed-guidelines-to-strengthen-the/article-86511</link>
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                <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:11:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sarvesh Kumar]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Agriculture News: इस ठंड से गेहूं सहित अन्य रबी फसलों को लाभ होने की उम्मीद</title>
                                    <description><![CDATA[रतिया (सच कहूँ/तरसेम सैनी/शामवीर)। Agriculture News: क्षेत्र में लगातार बढ़ रही कड़ाके की ठंड ने आमजन का जीवन प्रभावित कर दिया है। रविवार को सुबह धुंध तो जल्दी छंट गई, लेकिन धूप नहीं निकलने से ठंड का प्रकोप पूरे दिन बना रहा। ठंड इतनी अधिक है कि लोगों के लिए घरों से बाहर निकलना मुश्किल […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/the-cold-is-expected-to-benefit-wheat-and-other-rabi-crops/article-79502"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-12/agriculture-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>रतिया (सच कहूँ/तरसेम सैनी/शामवीर)।</strong> Agriculture News: क्षेत्र में लगातार बढ़ रही कड़ाके की ठंड ने आमजन का जीवन प्रभावित कर दिया है। रविवार को सुबह धुंध तो जल्दी छंट गई, लेकिन धूप नहीं निकलने से ठंड का प्रकोप पूरे दिन बना रहा। ठंड इतनी अधिक है कि लोगों के लिए घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया है और लोग ठिठुरने को मजबूर हैं। ठंड से बचाव के लिए लोग गर्म कपड़ों का सहारा ले रहे हैं तथा जगह-जगह अलाव जलाकर आग सेंकते नजर आ रहे हैं। दीपक कुमार, हेमराज, विकास, प्रदीप और सुरेंद्र सहित कई नागरिकों ने बताया कि भले ही धुंध जल्दी छंट गई थी, लेकिन ठंड में कोई कमी नहीं आई। दोपहर में कुछ समय के लिए धूप जरूर खिली, परंतु उससे भी ठंड से राहत नहीं मिल सकी। हालांकि इस ठंड से गेहूं सहित अन्य रबी फसलों को लाभ होने की उम्मीद जताई जा रही है। Agriculture News</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>कृषि</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 22 Dec 2025 17:11:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Dhaan Ki Ropai: धान की रोपाई शुरु, खेतों में जुटे श्रमिक और किसान</title>
                                    <description><![CDATA[कलायत सच कहूँ/अशोक राणा)। Agriculture News: बरसाती सीजन की शुरुआत होते ही कलायत क्षेत्र के किसान धान की रोपाई में जुट गए हैं। खेतों में ट्रैक्टर चलने लगे हैं। किसान पिछले कई दिनों से तैयारी कर बारिश का इंतजार कर रहे थे। अब बिना मूसलाधार बारिश के ही खेतों में काम शुरु कर दिया गया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/workers-and-farmers-busy-in-rice-field-planting/article-72638"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-06/kalayat-news-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>कलायत सच कहूँ/अशोक राणा)।</strong> Agriculture News: बरसाती सीजन की शुरुआत होते ही कलायत क्षेत्र के किसान धान की रोपाई में जुट गए हैं। खेतों में ट्रैक्टर चलने लगे हैं। किसान पिछले कई दिनों से तैयारी कर बारिश का इंतजार कर रहे थे। अब बिना मूसलाधार बारिश के ही खेतों में काम शुरु कर दिया गया है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार धान की रोपाई का सही समय 15 जून से 15 जुलाई तक है। पिछले कुछ दिनों से रुक-रुक कर हल्की बूंदाबांदी हो रही है। इससे खेतों में नमी आ गई है। इसी का फायदा उठाकर किसानों ने खेतों में ट्रैक्टर उतार दिए हैं। Kalayat News</p>
<p style="text-align:justify;">कई किसानों ने पहले ही खेतों में ढैंचा और मूंग की बिजाई कर रखी थी। ऐसे खेतों को रोपाई से पहले तीन-चार दिन खुला छोड़ना पड़ता है। अब इन खेतों में पानी छोड़कर रोपाई शुरु कर दी गई है। धान की रोपाई शुरु होते ही ग्रामीण मजदूरों को भी काम मिल गया है। अगले डेढ़ महीने तक मजदूरों को लगातार काम मिलेगा। प्रवासी मजदूर भी कलायत पहुंचने लगे हैं। किसानों का कहना है कि इतने बड़े क्षेत्र में रोपाई बिना प्रवासी मजदूरों के संभव नहीं है। Kalayat News</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Jun 2025 16:25:54 +0530</pubDate>
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