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                <title>मोटे अनाज की खेती</title>
                                    <description><![CDATA[देश में इस बार फिर धान रोपाई पर ही जोर नजर आ रहा है। खरीफ की अन्य फसलें विशेष रूप से (Coarse Grains) की कृषि को बढ़ाने के लिए कोई प्रयास नजर नहीं आ रहे। भले ही केंद्र सरकार ने मोटे अनाज की खेती को उत्साहित करने के लिए बजट में राशि आरक्षित रखी और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/cultivation-of-coarse-cereals/article-47671"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/course-grain1.jpg" alt=""></a><br /><p>देश में इस बार फिर धान रोपाई पर ही जोर नजर आ रहा है। खरीफ की अन्य फसलें विशेष रूप से (Coarse Grains) की कृषि को बढ़ाने के लिए कोई प्रयास नजर नहीं आ रहे। भले ही केंद्र सरकार ने मोटे अनाज की खेती को उत्साहित करने के लिए बजट में राशि आरक्षित रखी और हैदराबाद के रिसर्च सेंटर प्रोत्साहित करने की घोषणा भी की, तमाम प्रयासों के बावजूद किसान मोटे अनाज की खेती करने में दिलचस्पी नहीं दिखा रहे। यह अच्छी बात है कि कुछ संगठनों और किसानों ने अपने स्तर पर ही प्रयास किए, जिससे मोटे अनाज का कृषि अधीन रकबा तो बढ़ा है, परंतु संतोषजनक नहीं है। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अनुसार 5 मई तक 11.44 लाख हेक्टेयर में मोटे अनाज की बिजाई हुई, जोकि विगत वर्ष 10.72 लाख हेक्टेयर थी। यह मामली वृद्धि स्वास्थ्य और कृषि क्षेत्र में क्रांतिक्रारी बदलाव लाने के लिए पर्याप्त नहीं। जिस गति से लोग बीमारियों से पीड़ित हैं और उपचार पर खर्च हो रहा है, उसके अनुसार मोटे अनाज की खेती को युद्ध स्तर पर करना चाहिए।</p>
<p>स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार (Coarse Grains) स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांति लाने की क्षमता रखते हैं। पुरात्तन समय में लोग जब गेहूँ नहीं खाते थे तब स्वस्थ रहते थे। अब कीटनाशकों का प्रयोग इतने बड़े स्तर पर हो गया है कि गेहूँ और चावल इंसान के खाने योग्य अनाज नहीं रहे। गेहूँ/चावल की खेती करने से न तो किसानों और न ही दूसरे लोगों को फायदा है, क्योंकि किसान भी कीटनाशकों व अन्य खर्चों पर इतना पैसा खर्च कर देता है कि उसे कुछ बचता ही नहीं। दूसरी तरफ कीटनाशक वाले अनाजों को खाने से लोगों की सेहत बिगड़ रही है, जिसका पैसा वे अस्पतालों में भर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि न तो किसान को फायदा हो रहा है और न ही अन्य लोगों को। केंद्र सरकार ने वर्ष 2023 को मिलेट्स ईयर घोषित किया हुआ है। सेना, पुलिस और अन्य विभागों के कर्मचारियों की डाइट में मोटे अनाज को शामिल किया जा रहा है।</p>
<p>पंजाब, हरियाणा जैसे राज्यों में जहां अस्पताल की गिनती और मरीजों की भीड़ निरंतर बढ़ रही है, यह राज्य (Coarse Grains) की कृषि को बढ़ावा देकर जनता के हित में कारगर कदम उठा सकते हैं। सरकारों को मोटे अनाज की बिजाई के लिए प्रचार करने पर बल देने के साथ-साथ मंडीकरण के व्यापक प्रबंध करने चाहिए। किसानों को सस्ते दामों पर बीज व आसान भाषा में उन्हें जानकारी मुहैया करवानी चाहिए। इसके साथ ही (Coarse Grains) को नई पीढ़ी के साथ जोड़ने के लिए इसके उत्पादों को आधुनिक रूप दिया जाए। उत्पादों की बिक्री के लिए भी सरकारी स्तर पर स्टॉलों का प्रबंध करना चाहिए। जब तक मोटे अनाज को संस्कृति का अंग नहीं बनाया जाता, तब तक इसके प्रयोग व कृषि को बढ़ावा देना संभव नहीं। मोटे अनाज की खेती की खेती प्रफुल्ल्ति होने से जनता की सेहत में सुधार होगा और सरकार का स्वास्थ्य क्षेत्र में आने वाले खर्च भी घटेगा। रोगों के उपचार पर खर्च बढ़ाने से अच्छा है कोई रोगी ही नहीं हो।</p>
<h3 class="entry-title td-module-title"><a title="सावधान! सभी दें ध्यान, कहीं हो जाएं आप ठगी का शिकार!" href="http://10.0.0.122:1245/do-not-transfer-money-in-haste-dcp-meena/">सावधान! सभी दें ध्यान, कहीं हो जाएं आप ठगी का शिकार!</a></h3>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 May 2023 09:46:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>तुलसी की खेती करके खुब कमा रहे बुंदेलखंड के किसान</title>
                                    <description><![CDATA[झांसी। उत्तर प्रदेश के झांसी मंडलायुक्त डॉ़ अजयशंकर पांडेय की पहल पर झांसी जनपद के विभिन्न किसानों ने परंपरागत खेती के स्थान पर तुलसी की खेती को प्रश्रय देकर लाभ हासिल करना शुरू कर दिया है और आर्थिक उन्नति की ओर कदम बढ़ाया है । मण्डलायुक्त ने सोमवार को बताया कि सूखाग्रस्त बुंदेलखंड को प्रकृति […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/bundelkhand-farmers-many-earning-in-by-cultivating-basil/article-36661"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-08/tulsi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>झांसी।</strong> उत्तर प्रदेश के झांसी मंडलायुक्त डॉ़ अजयशंकर पांडेय की पहल पर झांसी जनपद के विभिन्न किसानों ने परंपरागत खेती के स्थान पर तुलसी की खेती को प्रश्रय देकर लाभ हासिल करना शुरू कर दिया है और आर्थिक उन्नति की ओर कदम बढ़ाया है । मण्डलायुक्त ने सोमवार को बताया कि सूखाग्रस्त बुंदेलखंड को प्रकृति ने प्रचुर मात्रा में औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों के उत्पादन के अनुकूल बनाया है। यहां की शुष्क और चट्टानी भूमि में औषधीय पौधों और जड़ी-बूटियों को अच्छी तरह विकसित होने के अनुकूल बनाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">बुन्देलखंड क्षेत्र में औषधीय फसलों की खेती को बढ़ावा देने, प्रसंस्करण और स्टार्टअप के विकास पर चर्चा समय की मांग है। औषधीय पौधों के उत्पादन बढ़ाकर यहां के किसानों की आय में वृद्धि की जा सकती है। यहां औषधीय फसलों की खेती में उत्तरोत्तर वृद्धि हुई है, वर्ष 2021-22 में मंडल स्तर पर गठित विशिष्ट कृषि उत्पाद समिति द्वारा किये गये प्रयासों से कुछ किसानों ने 2000 एकड़ तुलसी, 200 एकड़ अश्वगंधा, 300 एकड़ कैमोमाईल, 300 एकड़ हिबिस्कस और 250 एकड़ दवाना फसलों के साथ प्रयोग किया गया और लाभ कमाया गया।</p>
<h3><strong>वित्तीय वर्ष 2022-23 में 2500-3000 एकड़ क्षेत्र विस्तार का लक्ष्य </strong></h3>
<p style="text-align:justify;">वित्तीय वर्ष 2021-22 में इस क्षेत्र में तुलसी की खेती के तहत लगभग तीन गुना क्षेत्रफल में वृद्धि का एक बड़ा कारण विशिष्ट कृषि उत्पाद संरक्षण समिति का है, जिसका गठन मंडलायुक्त के निर्देशन में किया गया। वित्तीय वर्ष 2022-23 में 2500-3000 एकड़ क्षेत्र विस्तार करने का लक्ष्य है, जिसमें लगभग 1300-1500 किसान लाभान्वित होंगे। अब तक तुलसी की खेती का लगभग पूरा विस्तार बंगरा, गुरसरायं एवं मऊरानीपुर में था। इस वित्तीय वर्ष में इसका विस्तार अन्य विकासखण्डों में किया जायेगा। इस विस्तार में नवगठित एफपीओ बुन्देलखंड फार्मर प्रोड्यूसर कम्पनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">बंगरा क्षेत्र के एफपीओ निदेशक पुष्पेन्द्र सिंह ने बताया कि सामान्यतः विशिष्ट फसलों के उत्पादन के बाद उसके विपणन की एक बड़ी चुनौती होती हैं। औषधीय फसलों के साथ यह चुनौती और बढ़ जाती है, किन्तु झांसी के तुलसी क्लस्टर की एक विशिष्टता यह है कि यहां के किसानों की समस्त तुलसी आर्गेनिक इण्डिया एवं पतंजलि द्वारा किसानों के गांव से ही खरीदी जा रही है और उनको लगभग 10,000 रू़ प्रति क्विंटल की दर मिल रही है, जिससे प्रति एकड़ 40-50 हजार रू़ का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है, जो परम्परागत फसलों से लगभग दो गुना है।</p>
<h3><strong>105 एकड़ में प्राप्त हुआ 418 क्विंटल उत्पादन </strong></h3>
<p style="text-align:justify;">झांसी जनपद में वित्तीय वर्ष 2014-15 में उद्यान विभाग द्वारा राष्ट्रीय आयुष मिशन योजना के अन्तर्गत 71 किसानों द्वारा 90 एकड़ में तुलसी की खेती करायी गयी। इसके बाद निरन्तर धीरे-धीरे क्षेत्रफल में वृद्धि होती रही, जो वित्तीय वर्ष 2019-20 में 116 किसानों ने 105 एकड़ में खेती की, जिसका उत्पादन 418 क्विंटल प्राप्त हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2020-21 में 286 किसानों ने 318 एकड़ में खेती की, जिसमें 1272 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ । वित्तीय 2021-22 में 535 किसानों ने 1205 एकड़ में खेती की, जिसमें 4820 क्विंटल उत्पादन प्राप्त हुआ, जिसमें कुल 4.82 करोड़ का उत्पादन किसानों द्वारा किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वित्तीय वर्ष 2022-23 में 2500 से 3000 एकड क्षेत्रफल में विस्तार करने का लक्ष्य है । इस योजना से 1300-1500 किसान लाभांवित होंगे। अभी तक जनपद के ब्लाक बंगरा, गुरसरायं एवं मऊरानीपुर में होती थी लेकिन अब तुलसी की खेती का पूरे मण्डल में इसका विस्तार कराया जायेगा। इस विस्तार में नवगठित एफपीओ बुन्देलखंड फार्मर प्रोड्यूसर कम्पनी की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। तुलसी आर्गेनिक इण्डिया एवं पतंजली कं० द्वारा किसानों के गांव से ही तुलसी की खरीद की जा रही है और उनको लगभग 10,000 रू० प्रति कु० की दर मिल रही है, जिससे प्रति एकड़ 40-50 हजार रू० का शुद्ध लाभ प्राप्त हो रहा है, जो परम्परागत फसलों से लगभग दो गुना है।</p>
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                                                            <category>कृषि</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Aug 2022 10:19:29 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>ड्रैगन फ्रूट की काश्त से 90 फीसदी पानी बचाकर भी अच्छा मुनाफा कमा रहा किसान हरबंत सिंह</title>
                                    <description><![CDATA[बरनाला(सच कहूँ/जसवीर सिंह गहल)। जिला बरनाला के गांव ठुल्लेवाल का एक किसान ड्रैगन फ्रूट की खेती से जहां अच्छा मुनाफा कमा रहा है वहीं साथ ही टपका सिंचाई तकनीक अपना कर 80 से 90 फीसदी तक पानी की भी बचत कर रहा है। एकत्रित की गई जानकारी के अनुसार पूर्व सरपंच हरबंत सिंह द्वारा मौजूदा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/agriculture/harbant-singh-a-farmer-making-good-profits-from-the-cultivation-of-dragon-fruit/article-35330"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-07/dragon-fruit-cultivation.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बरनाला(सच कहूँ/जसवीर सिंह गहल)।</strong> जिला बरनाला के गांव ठुल्लेवाल का एक किसान ड्रैगन फ्रूट की खेती से जहां अच्छा मुनाफा कमा रहा है वहीं साथ ही टपका सिंचाई तकनीक अपना कर 80 से 90 फीसदी तक पानी की भी बचत कर रहा है। एकत्रित की गई जानकारी के अनुसार पूर्व सरपंच हरबंत सिंह द्वारा मौजूदा समय में 3 एकड़ के करीब रकबे में ड्रैगन फ्रूट व अन्य फलों की काश्त की जा रही है, जबकि शुरूआती रकबा डेढ कनाल था। हरबंत सिंह ने बताया कि उसने टैलीविजन पर ड्रैगन फ्रूट की खेती के बारे में देखा तो उसे पता चला कि जहां यह फसल बहुत कम पानी लेती है, और साथ ही मुनाफा भी अच्छा मिलता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दौरान उन्होंने और उनके बेटे सतनाम सिंह ने ड्रैगन फ्रूट की खेती का तर्जुबा करने का सोचा और इस संबंधी जानकारी हासिल कर साल 2016 में अहमदाबाद (गुजरात) का दौरा किया और वहां से 70- 80 के करीब कलमां लेकर आए। उन्होंने बताया कि 2016 में ट्रायल किया और 2018 में पूर्ण तौर पर यह खेती अपना ली। उन्होंने बताया कि 3 एकड़ में 1300 के करीब सीमिंट के पोल पौधों को सहारा देन के लिए लगाए गए हैं। उन्होंने बताया कि शुरूआती समय में इसे शुरू करने में पोलोंं, सिंचाई प्रबंध, लेबर आदि पर 4 लाख प्रति एकड़ के करीब खर्च आया, लेकिन बाद में फसल ने अच्छा मुनाफा देकर उनकी सभी परेशानियों को दूर कर दिया। जिसके तहत शुरूआती खर्च करीब 2 सालों में पूरा हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि पहले साल प्रति पोल एक किलो के करीब फल, दूसरे साल के बाद 4 से 5 किलो उपज होती है। जिसके मंडीकरण की कोई दिक्कत पेश नहीं आती, क्योंकि खेत पर से ही सारी फसल आॅर्डर पर बिक जाती है। उन्होंने बताया कि 200 से 250 रुपए प्रत्ीि किलो के हिसाब से इसका रेट मिल जाता है। पिछले साल प्रति एकड़ 3 लाख रूपये की फसल की बिक्री हुई है। किसान हरबंत सिंह ने बताया कि ड्रैगन फ्रूट की कलमां लगाई जाती हैं और हुन वह खुद भी कलमां तैयार कर अपनी नर्सरी में रखते हैं, जो पंजाब भर से किसान लेकर जाते हैं। किसान हरबंत सिंह मुताबक ड्रैगन फ्रूट कम पानी लेने वाली फसल है, जिस पर तुपका सिंचाई बेहद्द कामयाब है। इस समय उन्होंने एक और फसल पर तुपका सिंचाई तकनीक अपनाई है, जिस पर सब्सिडी भी प्राप्त की है।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>ऐसे प्रयास बेहद्द जरूरी</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">डिप्टी कमिशनर डॉ. हरीश नैयर ने गांव ठुल्लेवाल के किसान हरबंत सिंह के प्रयासों की प्रशंसा करते अन्य किसानों को भी फसली विभिन्नता और कम पानी की खपत वाली फसलें अपनाने की अपील की। उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में पानी का स्तर तेजी से नीचे जा रहा है, जिसे लेकर ऐसे प्रयास करने बेहद्द जरूरी हैं।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>कलम लगाने का उपयुक्त समय</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">डिप्टी डायरैकटर बागबानी निरवंत सिंह ने किसान के इन प्रयासों की प्रशंसा करते आह्वान किया कि और भी किसान इस तरफ आएं। उन्होंने बताया कि कलम लगाने का उपयुक्त समय जुलाई-अगस्त है, जबकि ड्रैगन फ्रूट की तुड़ायी सितम्बर से दिसम्बर तक होती है। बागबानी विकास अधिकारी नरपिन्दर कौर ने बताया कि पहली तुड़ायी फल लगने के 45 दिन बाद और दूसरी और तीसरी तुड़ाई 30 दिन बाद की जाती है। उन्होंने प्र्रगतिशील किसानों को किसान हरबंत सिंह से प्रेरणा लेने के लिए कहा।</p>
<h4 style="text-align:justify;"><strong>फुहारा सिंचाई अपनाओ, सब्सिडी पाओ</strong></h4>
<p style="text-align:justify;">भूमि रक्षा अधिकारी मनदीप सिंह ने बताया कि हरवंत सिंह की तरह तुपका/फुहारा सिंचाई तकनीक अपनाकर किसान 80 फीसदी तक पानी की बचत कर सकते हैं। जिसके लिए विभाग द्वारा छोटे और दरमियाने भाव 5 एकड़ तक भूमि वाले किसानोंं और जमीन की मालकी वाली महिलाओं को 90 फीसदी सब्सिडी दी जाती है, जबकि अन्यों को 80 फीसदी सब्सिडी दी जाती है।</p>
<p><b>अन्य </b><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a></strong><b> हासिल करने के लिए हमें </b><strong><a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a></strong><b> और </b><strong><a href="https://twitter.com/SACHKAHOON">Twitter</a></strong><b>, <a href="https://www.instagram.com/sachkahoon/">Instagram</a>, <a href="https://www.linkedin.com/company/sachkahoon">LinkedIn</a> , <a href="https://www.youtube.com/channel/UCOcEoUWkETVpZIzmQPVlpfg">YouTube</a>  पर फॉलो करें।</b></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>कृषि</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 Jul 2022 11:02:21 +0530</pubDate>
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                <title>छुट्टियों में परिवार का बोझ हलका कर रहे बच्चे</title>
                                    <description><![CDATA[मेहनत: खेतों में परिजनों के साथ लगा रहे हैं धान भटिंडा (मनप्रीत मान)। हमारा भी दिल करता है कि हम भी ठंडें इलाकों में जाकर अपनी छुट्टियां मनाए पर क्या करें कि परिवार की स्थिति ठीक न होने के कारण हम घूमने से वंचित रह जाते हैं। स्कूलों, कॉलेजों में पढ़ते विद्यार्थियों के लिए जून […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/punjab/chirdren-help-family-on-paddy-cultivation/article-1737"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/paddy.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">मेहनत: खेतों में <strong>परिजनों के साथ लगा रहे हैं धान</strong></h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>भटिंडा (मनप्रीत मान)।</strong> हमारा भी दिल करता है कि हम भी ठंडें इलाकों में जाकर अपनी छुट्टियां मनाए पर क्या करें कि परिवार की स्थिति ठीक न होने के कारण हम घूमने से वंचित रह जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्कूलों, कॉलेजों में पढ़ते विद्यार्थियों के लिए जून माह छुट्टियां मनाने का होता है। इस महीने में स्कूली विद्यार्थी अपने रिश्तेदारों के घरों में जाकर छुट्टियां व्यत्तीत करते हैं। इन दिनों में जहां कुछ विद्यार्थी अपने मां-बाप के साथ पहाड़ी क्षेत्रों में घूमने के लिए जाते हैं वहीं कुछ विद्यार्थी अपनी, छुट्टियां ननिहाल गांव में मनाते हैं लेकिन कुछ ऐसे विद्यार्थी भी होते हैं जो अपने माता-पिता के साथ काम में हाथ बंटाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पंजाब में धान की फसल लगाने का काम जोरों पर चल रहा है। इस मौके बड़ी संख्या में स्कूलों, कॉलेजों में पढ़ते विद्यार्थी अपने माता-पिता के साथ धान की फसल लगा रहे हैं।</p>
<h2 style="text-align:justify;">पिता की मदद कर रही हूँ</h2>
<p style="text-align:justify;">खेत में अपने पिता बिक्कर खान के साथ धान की फसल लगा रही दसवीं कक्षा की छात्रा विजेता ने बताया कि उसका पिता मजदूरी कर घर का गुजारा चलाता है। वह अपने घर के हालातों को देखते हुए स्कूल की छुट्टियां फुर्सत में बिताने की बजाए अपने पिता के साथ काम में हाथ बंटाकर मना रही है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">पढ़-लिखकर नौकरी करूंगी</h2>
<p style="text-align:justify;">बीए में पढ़ाई कर रही सिमरजीत कौर ने कहा कि उसके परिवार की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। ऊपर से उसकी शिक्षा पर भी हजारों रुपए खर्च हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि सारी उम्र मजदूरी करने की बजाए अब सख्त मेहनत कर पढ़ लिखकर कोई नौकरी करना चाहती हूं। यही कारण है कि वह अपने परिवार के साथ पैसे कमाने के लिए धान लगा रही हूँ।</p>
<h2 style="text-align:justify;">मजदूरी पर निर्भर है परिवार</h2>
<p style="text-align:justify;">11वीं कक्षा के विद्यार्थी सुखपाल सिंह निवासी दोदा अपने परिवार के साथ धान की फसल लाने के लिए गांव जयसिंहवाला में आया हुआ है। सुखपाल सिंह ने बताया कि वह दो बहनों का इकलौता भाई है। परिवार का गुजारा मेहनत मजदूरी से चलता है। महंगाई के युग में परिवार के अच्छे दिनों के लिए उसने अपनी छुट्टियों में अपने परिवार के साथ मिलकर पैसे कमाने का फैसला किया।</p>
<h2 style="text-align:justify;">सरकार गरीब परिवारों के बच्चों के बारे में सोचे</h2>
<p style="text-align:justify;">धान की फसल के लिए खेत तैयार कर रहे किसान जगजीत सिंह ने कहा कि मजदूरों के साथ बड़ी संख्या में उनके स्कूलों, कालेजों में पढ़ते बच्चे भी पहुंच रहे हैं। उन्होंने कहा कि गरीब मजदूरों के बच्चे पढ़ लिखकर कुछ बनना चाहते हैं और सख्त मेहनत कर रहे हैं। सरकार उन्हें विशेष तौर पर वित्तीय मदद दे ताकि यह बच्चे भी अन्य की तरह अपनी, छुट्टियां का आनंद लें सकें।</p>
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                                                            <category>पंजाब</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Jun 2017 00:59:46 +0530</pubDate>
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                <title>सोयाबीन की खेती</title>
                                    <description><![CDATA[प्रोटीन का एक उत्कृष्ट स्रोत सोयाबीन भारतवर्ष में एक महत्वपूर्ण फसल है। इसे भटमास, भटवार, रामकुल्थी तथा गरिकालिया नाम से भी जाना जाता है। हमारे देश में सोयाबीन की खेती दक्षिण हरियाणा के कुछ हिस्सोें तथा मध्य भारत में प्राचीनकाल से होती आई है। सोयाबीन कई शारीरिक क्रियाओं को भी प्रभावित करता है। भारतवर्ष में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/culture-and-society/soybean-cultivation/article-1050"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/soyabin.jpg" alt=""></a><br /><p>प्रोटीन का एक उत्कृष्ट स्रोत सोयाबीन भारतवर्ष में एक महत्वपूर्ण फसल है। इसे भटमास, भटवार, रामकुल्थी तथा गरिकालिया नाम से भी जाना जाता है। हमारे देश में सोयाबीन की खेती दक्षिण हरियाणा के कुछ हिस्सोें तथा मध्य भारत में प्राचीनकाल से होती आई है। सोयाबीन कई शारीरिक क्रियाओं को भी प्रभावित करता है।</p>
<h2>भारतवर्ष में 1985 से लगातार बढ़ रहा है सोया का उत्पादन</h2>
<p>आधुनिक शोध में पाया गया है कि सोया प्रोटीन मानव रक्त में कोलेस्ट्रोल की मात्रा कम करने में सहायक होता है। शायद यही वजह है कि सोयाबीन का उत्पादन 1985 से लगातार बढ़ता जा रहा है और सोयाबीन के तेल की खपत मूँगफली एवं सरसों के तेल के पश्चात सबसे अधिक मांग होने लगी है। यों तो सोयाबीन दाल की तरह ही है,</p>
<p style="text-align:justify;">किन्तु इससे दूध, दही, पनीर बनाने की परम्परा बहुत अधिक प्रचलित हो रही है, इसमें सोयाबीन की विषमुक्त खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। इसकी उपयोगिता को ध्यान में रखकर इजराइल तथा कोलम्बिया सरकार ने चपाती के अन्दर 5 प्रतिशत सोया आटा मिलाना कानूनन अनिवार्य कर रखा है। सोयाबीन की खेती अधिक हल्की-हल्की व रेतीली भूमि को छोड़कर सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है। परंतु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिए अधिक उपयुक्त होती है। जिन खेतों में पानी रुकता हो, उनमें सोयाबीन न लें।</p>
<p style="text-align:justify;">खेत तैयारी करते समय 2 बार हैरो या मिट्टी पलट हल से जुताई करने के उपरान्त देशी हल से जुताई कर पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए, तदोपरान्त पलेवा (सिंचाई) करते समय एक हजार लीटर ‘संजीवक खाद’ प्रति एकड़ की दर से डालें। पलेवा के 6-8 दिन पश्चात खेत की पुन: देशी हल से जुताई कर देनी चाहिए, इसके पश्चात ही बीज बुवाई करनी चाहिए। बीज बुवाई (सोयाबीन के बीज की मात्रा भूमि में उपस्थित नमी, बुवाई समय, बीज की किस्म पर निर्भर करती हैं। बुवाई के लिए लगभग 25 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की जरूरत है। बीज की बुवाई 3-4 सेमी. गहरी तथा बीज से बीज की दूरी 30सेमी. तक रखनी चाहिए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">2-3 बार करें खेत को तैयार</h3>
<p style="text-align:justify;">ग्रीष्मकालीन जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य करनी चाहिए। वर्षा प्रारम्भ होने पर 2 या 3 बार खेत को तैयार कर लेना चाहिए, इससे हानि पहुंचाने वाले कीटों की सभी अवस्थायें नष्ट होंगीं। ढेला रहित और भुरभुरी मिट्टी वाले खेत सोयाबीन के लिये उत्तम होते हैं। खेत में पानी भरने से सोयाबीन की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अत: अधिक उत्पादन के लिये खेत में जल निकास की व्यवस्था करना आवश्यक होता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बोने का समय एवं तरीका</h3>
<p style="text-align:justify;">जून के अंतिम सप्ताह में जुलाई के प्रथम सप्ताह तक का समय सबसे उपयुक्त है। बोने के समय अच्छे अंकुरण हेतु भूमि में 10 सेमी गहराई तक उपयुक्त नमी होना चाहिए। जुलाई के प्रथम सप्ताह के पश्चात बोने की बीज दर 5-10 प्रतिशत बढ़ा देना चाहिये। कतारों से कतारों की दूरी 30 सेमी (बोने किस्मों के लिये) तथा 45 सेमी बड़ी किस्मों के लिये। 20 कतारों के बाद एक कूंड़ जल निथार तथा नमी सरंक्षण के लिए खाली छोड़ देना चाहिए। बीज 2.50 से 3 सेमी गहरा बोयें।</p>
<h3 style="text-align:justify;">अंतरवर्तीय फसलें</h3>
<p style="text-align:justify;">सोयाबीन के साथ अंतरवर्तीय फसलों के रुप में अरहर सोयाबीन (2:4), ज्वार सोयाबीन (2:2), मक्का सोयाबीन (2:2), तिल सोयाबीन (2:2) अंतरवर्तीय फसलें उपयुक्त हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">खरपतवार प्रबंधन</h3>
<p style="text-align:justify;">फसल के प्रारम्भिक 30 से 40 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण बहुत आवश्यक होता है। बतर आने पर डोरा या कुल्फा चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें व दूसरी निदाई अंकुरण होने के 30 और 45 दिन बाद करें।</p>
<p style="text-align:justify;">15 से 20 दिन की खड़ी फसल में घांस कुल के खरपतवारों को नष्ट करने के लिये क्यूजेलेफोप इथाइल 400 मिली प्रति एकड़ अथवा घांस कुल और कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिये इमेजेथाफायर 300 मिली प्रति एकड़ की दर से छिड़काव की अनुशंसा है। नींदानाशक के प्रयोग में बोने के पूर्व फ्लुक्लोरेलीन 800 मिली प्रति एकड़ आखरी बखरनी के पूर्व खेतों में छिड़कें और दवा को भलीभाँति बखर चलाकर मिला देवें।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सिंचाई:</strong> खरीफ मौसम की फसल होने के कारण सामान्यत: सोयाबीन को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। फलियों में दाना भरते समय अर्थात सितम्बर माह में यदि खेत में नमी पर्याप्त न हो तो आवश्यकतानुसार एक या दो हल्की सिंचाई करना सोयाबीन के विपुल उत्पादन लेने हेतु लाभदायक है।<br />
पौध संरक्षण</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कीट:</strong> सोयाबीन की फसल पर बीज एवं छोटे पौधे को नुकसान पहुंचाने वाला नीलाभृंग (ब्लूबीटल) पत्ते खाने वाली इल्लियां, तने को नुकसान पहुंचाने वाली तने की मक्खी एवं चक्रभृंग (गर्डल बीटल) आदि का प्रकोप होता है, एवं कीटों के आक्रमण से 5 से 50 प्रतिशत तक पैदावार में कमी आ जाती है। इन कीटों के नियंत्रण के उपाय निम्नलिखित हैं:</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कृषिगत नियंत्रण:</strong> खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें। मानसून की वर्षा के पूर्व बोनी नहीं करें। मानसून आगमन के पश्चातबोनी शीघ्रता से पूरी करें। खेत नींदा रहित रखें। सोयाबीन के साथ ज्वार अथवा मक्का की अंतरवर्तीय फसल लें। खेतों को फसल अवशेषों से मुक्त रखें तथा मेढ़ों की सफाई रखें।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सोयाबीन की सफेद मक्खी</h3>
<p style="text-align:justify;">यह मक्खी सोयाबीन के पौधों में विषाणु रोग (पीला मोजैक) के लिए वेक्टर का कार्य करती है तथा पत्तियों का रस चूसती है, इससे फसल की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । प्रभावित पौधों पर सप्ताह में 2 बार ‘हींगादि कुदरती कीट रक्षक’ का छिड़काव करते रहना चाहिए, इसके छिड़काव के उपरान्त फसल पर राख अवश्य छिड़क देनी चाहिए ।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ऐसे करें भूमि चयन एवं खेत की तैयारी</h3>
<p style="text-align:justify;">सोयाबीन की खेती के लिए उचित जल-निकास वाली दोमट भूमि सबसे अच्छी रहती है । पर अम्लीय, क्षारीय अथवा खारे पानी वाली भूमि कतई अनुकूल नहीं होती। कृषि विशेषज्ञों ने अपने शोध में पाया कि पानी के उच्च स्तर वाली भूमि में फाइटोफ्बोरा कवक रोग का प्रकोप हो जाता है, अत: ऐसी भूमि पर सोयाबीन की खेती से बचना चाहिए। सोयाबीन की खेती के लिए भूमि की तैयारी करते समय भूमि में जैविक कार्बनिक पदार्थो का प्रतिशत ज्यादा से ज्यादा हो। इसके लिए खेत में हरी खाद फसल लेकर, तदोपरान्त सोयाबीन की बुवाई करना लाभप्रद रहता है।<br />
ये है सोयाबीन का उत्पादन व पकने का समय</p>
<h2 style="text-align:justify;">किस्म पकने का समय उपज(क्विंटल/हेक्टर)</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>प्रतिष्ठा                     100-105             दिन 20-30</strong><br />
<strong>जेएस                      335 95-100              25-30</strong><br />
<strong>पीके                       1024 110-120           30-35</strong><br />
<strong>एमएयूएस              47 85-90                    20-25</strong><br />
<strong>(अहिल्या-3)           100-105                     25-30</strong><br />
<strong>एनआरसी              37 95-100                   30-35</strong><br />
<strong>एमएयूएस              81 93-96                     22-30</strong><br />
<strong>एमएयूएस            9315 90-95                  20-25</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कल्चर का उपयोग:</strong> फफूंदनाशक दवाओं से बीजोपचार के पश्चात बीज को 5 ग्राम रायजोबियम एवं 5 ग्राम पीएसबी कल्चर प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। उपचारित बीज को छाया में रखना चाहिये एवं शीघ्र बोनी करना चाहिये। ध्यान रहे कि फफूंद नाशक दवा एवं कल्चर को एक साथ न मिलाऐं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">समन्वित पोषण प्रबंधन</h3>
<p style="text-align:justify;">अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद (कम्पोस्ट) 2 टन प्रति एकड़ अंतिम बखरनी के समय खेत में अच्छी तरह मिला देवें तथा बोते समय 8 किलो नत्रजन 32 किलो स्फुर 8 किलो पोटाश एवं 8 किलो गंधक प्रति एकड़ देवें। यह मात्रा मिट्टी परीक्षण के आधार पर घटाई बढ़ाई जा सकती है। यथा सम्भव नाडेप, फास्फो कम्पोस्ट के उपयोग को प्राथमिकता दें। रासायनिक उर्वरकों को कूड़ों में लगभग 5 से 6 से.मी. की गहराई पर डालना चाहिये। गहरी काली मिट्टी में जिंक सल्फेट 25 किलोग्राम प्रति एकड़ एवं उथली मिट्टियों में 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से 5 से 6 फसलें लेने के बाद उपयोग करना चाहिये।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बीज दर</h3>
<p style="text-align:justify;">छोटे दाने वाली किस्में – 28 किलोग्राम प्रति एकड़<br />
मध्यम दाने वाली किस्में – 32 किलोग्राम प्रति एकड़<br />
बड़े दाने वाली किस्में – 40 किलोग्राम प्रति एकड़</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बीजोपचार:</strong> सोयाबीन के अंकुरण को बीज तथा मृदा जनित रोग प्रभावित करते हैं। इसकी रोकथाम हेतु बीज को थायरम या केप्टान 2 ग्राम, काबेर्डाजिम या थायोफिनेट मिथाइल 1 ग्राम मिश्रण प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिये अथवा ट्राइकोडरमा 4 ग्राम/कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलों ग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोयें।</p>
<h2 style="text-align:justify;">फसल कटाई एवं गहाई</h2>
<p style="text-align:justify;">सोयाबीन फसल में जब पत्तियों का रंग पीला पड़ जाये और पत्तियां सूखकर गिरनी प्रारम्भ हो जायें, इस अवस्था पर फसल कटाई कर लेनी चाहिए। फसल कटाई के बाद सूखने के लिए फसल को छोड़ दें और 4-5 दिन पश्चात बैलों की सहायता से दाना अलग कर लें। उपरोक्त विधि से सोयाबीन की खेती करने पर 16 क्विंटल सोयाबीन दाना तथा 25 क्विंटल सूखा भूसा हमारे कृषक भाई साधारण ढंग से प्राप्त कर सकते हैं। अत: आप भी यह विधि अपनाकर सोयाबीन का भरपूर लुत्फ उठा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>संस्कृति एवं समाज</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 09 Jun 2017 02:17:07 +0530</pubDate>
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