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                <title>Soybean - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>शरीर को पौष्टिकता प्रदान करता है सोयाबीन</title>
                                    <description><![CDATA[सोयाबीन (Soybean) में विटामिन ए, बी, सी, डी, ई पाया जाता है। यह अत्यन्त बलकारक, मस्तिष्क की निर्बलता व पुंसत्वहीनता को दूर करने वाला होता है। सोयाबीन को अंकुरित करके प्रतिदिन सुबह लगभग दो तोला खाने से शरीर को बल और कान्ति देने वाला होता है। बहुमूत्र के रोगियों के लिए और मधुमेह के रोगी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/health/soybean-provides-nutritional-value-to-the-body/article-23298"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2021-04/soybean.gif" alt=""></a><br /><h6 style="text-align:justify;">सोयाबीन (Soybean) में विटामिन ए, बी, सी, डी, ई पाया जाता है। यह अत्यन्त बलकारक, मस्तिष्क की निर्बलता व पुंसत्वहीनता को दूर करने वाला होता है। सोयाबीन को अंकुरित करके प्रतिदिन सुबह लगभग दो तोला खाने से शरीर को बल और कान्ति देने वाला होता है। बहुमूत्र के रोगियों के लिए और मधुमेह के रोगी के लिए यह अत्यन्त उपयोगी और हितकारी होता है। कुछ लोग सोयाबीन को गेहूं के साथ मिलाकर, पीसकर इनके आटे की रोटी या पूड़ी बनाकर खाते हैं अथवा सोयाबीन के आटे की रोटी या इसकी दाल बनाकर खाते हैं। कुछ लोग आलू के साथ इसको मिलाकर रसेदार सब्जी बनाकर खाते हैं। इनसे मिलने वाला प्रोटीन अंडे और मांस से भी अधिक पुष्टकर होता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">सोयाबीन से मिलने वाली प्रोटीन में जो गुण हैं, वे अन्य किसी में नहीं हैं। यह अत्यन्त श्रेष्ठ गुणकारक विटामिन युक्त बलकारक अन्न है। इसका प्रयोग अन्य अन्नों की तरह अधिक मात्र में नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह स्वल्प मात्र में ही वे सब उत्तम पदार्थ शरीर को देता है, जो अन्य अन्नों के अधिक सेवन से भी नहीं मिलते। इससे आप दूध भी बनाकर सेवन कर सकते हैं। एक कटोरी सोयाबीन को लेकर अच्छी तरह से धोकर रात में भिगो दें। सुबह इसको मलकर ऊपर से छिलका उतार कर बाकी बचे सोयाबीन को बारीक पीस कर इसमें लगभग तीन कटोरी खौलता हुआ पानी और मीठा सोडा मिलाकर खूब अच्छी तरह से मिला दें और फिर इसको बारीक छलनी से छान कर सेवन करने से शरीर पुष्ट हो जाता है।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">इससे दही अथवा पनीर भी इस विधि से बनाया जाता है। बाजार में उपलब्ध सोयाबीन का आटा निश्चित रूप से ठीक नहीं रहता, क्योंकि बाजार में मिलने वाला आटा यदि कुछ दिन पुराना होगा तो इसमें कसैलापन, स्वाद और पौष्टिकता नहीं मिलेगी। यदि सोयाबीन का आटा भी घर पर तैयार कर लें तो बेहतर होगा। सर्वप्रथम आप सोयाबीन को अच्छी तरह से साफ करके उसे दो-तीन बार धोकर रात भर पानी में भिगोकर रख दें। सुबह भीगी हुई सोयाबीन को हाथ से रगड़कर छिलके उतार दें। बाकी बचे सोयाबीन को कुकर में डालकर एक सीटी बजने तक उबाल लें। फिर कुकर को उतार कर उसे ठंडा होने देना चाहिए। उबली हुई सोयाबीन को धूप में सूखने के लिए डाल दें। जब यह सूख जाए तो इसको पिसवा लें। वैसे बेहतर तो यह है कि आवश्यकतानुसार उक्त विधि से उबालकर, सुखाकर इनको मिक्सी में पीस लें।</h6>
<h6 style="text-align:justify;">सोयाबीन के आटे में जुड़ने की शक्ति बिलकुल नहीं होती, इसलिए इनको दूसरे आटे, बेसन अथवा मैदे में मिलाना पड़ता है। जितनी सामग्री तैयार करना हो, उतना ही सोयाबीन का आटा इस्तेमाल करें तो ज्यादा बेहतर होगा। आमतौर पर आटे, बेसन अथवा मैदे की तीन कटोरियों के साथ एक कटोरी सोयाबीन का आटा मिलाया जा सकता है। सोयाबीन के आटे में मैदा, मूंग, गेहूं व बेसन के आटे में मिलाकर सिवई, पकौड़ी, कढ़ी, मठरी आदि नमकीन व्यंजनों और मिठाई में भी मिलाकर सेवन करने से भी आपको ताकत मिलेगी।<br />
<strong>                                                                                                                                        इन्दीवर मिश्र</strong></h6>
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                                                            <category>स्वास्थ्य</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Apr 2021 16:06:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>सोयाबीन की खेती</title>
                                    <description><![CDATA[प्रोटीन का एक उत्कृष्ट स्रोत सोयाबीन भारतवर्ष में एक महत्वपूर्ण फसल है। इसे भटमास, भटवार, रामकुल्थी तथा गरिकालिया नाम से भी जाना जाता है। हमारे देश में सोयाबीन की खेती दक्षिण हरियाणा के कुछ हिस्सोें तथा मध्य भारत में प्राचीनकाल से होती आई है। सोयाबीन कई शारीरिक क्रियाओं को भी प्रभावित करता है। भारतवर्ष में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/culture-and-society/soybean-cultivation/article-1050"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/soyabin.jpg" alt=""></a><br /><p>प्रोटीन का एक उत्कृष्ट स्रोत सोयाबीन भारतवर्ष में एक महत्वपूर्ण फसल है। इसे भटमास, भटवार, रामकुल्थी तथा गरिकालिया नाम से भी जाना जाता है। हमारे देश में सोयाबीन की खेती दक्षिण हरियाणा के कुछ हिस्सोें तथा मध्य भारत में प्राचीनकाल से होती आई है। सोयाबीन कई शारीरिक क्रियाओं को भी प्रभावित करता है।</p>
<h2>भारतवर्ष में 1985 से लगातार बढ़ रहा है सोया का उत्पादन</h2>
<p>आधुनिक शोध में पाया गया है कि सोया प्रोटीन मानव रक्त में कोलेस्ट्रोल की मात्रा कम करने में सहायक होता है। शायद यही वजह है कि सोयाबीन का उत्पादन 1985 से लगातार बढ़ता जा रहा है और सोयाबीन के तेल की खपत मूँगफली एवं सरसों के तेल के पश्चात सबसे अधिक मांग होने लगी है। यों तो सोयाबीन दाल की तरह ही है,</p>
<p style="text-align:justify;">किन्तु इससे दूध, दही, पनीर बनाने की परम्परा बहुत अधिक प्रचलित हो रही है, इसमें सोयाबीन की विषमुक्त खेती किसानों के लिए वरदान साबित हो रही है। इसकी उपयोगिता को ध्यान में रखकर इजराइल तथा कोलम्बिया सरकार ने चपाती के अन्दर 5 प्रतिशत सोया आटा मिलाना कानूनन अनिवार्य कर रखा है। सोयाबीन की खेती अधिक हल्की-हल्की व रेतीली भूमि को छोड़कर सभी प्रकार की भूमि में सफलतापूर्वक की जा सकती है। परंतु पानी के निकास वाली चिकनी दोमट भूमि सोयाबीन के लिए अधिक उपयुक्त होती है। जिन खेतों में पानी रुकता हो, उनमें सोयाबीन न लें।</p>
<p style="text-align:justify;">खेत तैयारी करते समय 2 बार हैरो या मिट्टी पलट हल से जुताई करने के उपरान्त देशी हल से जुताई कर पाटा लगाकर खेत को समतल कर लेना चाहिए, तदोपरान्त पलेवा (सिंचाई) करते समय एक हजार लीटर ‘संजीवक खाद’ प्रति एकड़ की दर से डालें। पलेवा के 6-8 दिन पश्चात खेत की पुन: देशी हल से जुताई कर देनी चाहिए, इसके पश्चात ही बीज बुवाई करनी चाहिए। बीज बुवाई (सोयाबीन के बीज की मात्रा भूमि में उपस्थित नमी, बुवाई समय, बीज की किस्म पर निर्भर करती हैं। बुवाई के लिए लगभग 25 किलोग्राम बीज प्रति एकड़ की जरूरत है। बीज की बुवाई 3-4 सेमी. गहरी तथा बीज से बीज की दूरी 30सेमी. तक रखनी चाहिए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">2-3 बार करें खेत को तैयार</h3>
<p style="text-align:justify;">ग्रीष्मकालीन जुताई 3 वर्ष में कम से कम एक बार अवश्य करनी चाहिए। वर्षा प्रारम्भ होने पर 2 या 3 बार खेत को तैयार कर लेना चाहिए, इससे हानि पहुंचाने वाले कीटों की सभी अवस्थायें नष्ट होंगीं। ढेला रहित और भुरभुरी मिट्टी वाले खेत सोयाबीन के लिये उत्तम होते हैं। खेत में पानी भरने से सोयाबीन की फसल पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अत: अधिक उत्पादन के लिये खेत में जल निकास की व्यवस्था करना आवश्यक होता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बोने का समय एवं तरीका</h3>
<p style="text-align:justify;">जून के अंतिम सप्ताह में जुलाई के प्रथम सप्ताह तक का समय सबसे उपयुक्त है। बोने के समय अच्छे अंकुरण हेतु भूमि में 10 सेमी गहराई तक उपयुक्त नमी होना चाहिए। जुलाई के प्रथम सप्ताह के पश्चात बोने की बीज दर 5-10 प्रतिशत बढ़ा देना चाहिये। कतारों से कतारों की दूरी 30 सेमी (बोने किस्मों के लिये) तथा 45 सेमी बड़ी किस्मों के लिये। 20 कतारों के बाद एक कूंड़ जल निथार तथा नमी सरंक्षण के लिए खाली छोड़ देना चाहिए। बीज 2.50 से 3 सेमी गहरा बोयें।</p>
<h3 style="text-align:justify;">अंतरवर्तीय फसलें</h3>
<p style="text-align:justify;">सोयाबीन के साथ अंतरवर्तीय फसलों के रुप में अरहर सोयाबीन (2:4), ज्वार सोयाबीन (2:2), मक्का सोयाबीन (2:2), तिल सोयाबीन (2:2) अंतरवर्तीय फसलें उपयुक्त हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">खरपतवार प्रबंधन</h3>
<p style="text-align:justify;">फसल के प्रारम्भिक 30 से 40 दिनों तक खरपतवार नियंत्रण बहुत आवश्यक होता है। बतर आने पर डोरा या कुल्फा चलाकर खरपतवार नियंत्रण करें व दूसरी निदाई अंकुरण होने के 30 और 45 दिन बाद करें।</p>
<p style="text-align:justify;">15 से 20 दिन की खड़ी फसल में घांस कुल के खरपतवारों को नष्ट करने के लिये क्यूजेलेफोप इथाइल 400 मिली प्रति एकड़ अथवा घांस कुल और कुछ चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों के लिये इमेजेथाफायर 300 मिली प्रति एकड़ की दर से छिड़काव की अनुशंसा है। नींदानाशक के प्रयोग में बोने के पूर्व फ्लुक्लोरेलीन 800 मिली प्रति एकड़ आखरी बखरनी के पूर्व खेतों में छिड़कें और दवा को भलीभाँति बखर चलाकर मिला देवें।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>सिंचाई:</strong> खरीफ मौसम की फसल होने के कारण सामान्यत: सोयाबीन को सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है। फलियों में दाना भरते समय अर्थात सितम्बर माह में यदि खेत में नमी पर्याप्त न हो तो आवश्यकतानुसार एक या दो हल्की सिंचाई करना सोयाबीन के विपुल उत्पादन लेने हेतु लाभदायक है।<br />
पौध संरक्षण</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कीट:</strong> सोयाबीन की फसल पर बीज एवं छोटे पौधे को नुकसान पहुंचाने वाला नीलाभृंग (ब्लूबीटल) पत्ते खाने वाली इल्लियां, तने को नुकसान पहुंचाने वाली तने की मक्खी एवं चक्रभृंग (गर्डल बीटल) आदि का प्रकोप होता है, एवं कीटों के आक्रमण से 5 से 50 प्रतिशत तक पैदावार में कमी आ जाती है। इन कीटों के नियंत्रण के उपाय निम्नलिखित हैं:</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कृषिगत नियंत्रण:</strong> खेत की ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करें। मानसून की वर्षा के पूर्व बोनी नहीं करें। मानसून आगमन के पश्चातबोनी शीघ्रता से पूरी करें। खेत नींदा रहित रखें। सोयाबीन के साथ ज्वार अथवा मक्का की अंतरवर्तीय फसल लें। खेतों को फसल अवशेषों से मुक्त रखें तथा मेढ़ों की सफाई रखें।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सोयाबीन की सफेद मक्खी</h3>
<p style="text-align:justify;">यह मक्खी सोयाबीन के पौधों में विषाणु रोग (पीला मोजैक) के लिए वेक्टर का कार्य करती है तथा पत्तियों का रस चूसती है, इससे फसल की उपज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । प्रभावित पौधों पर सप्ताह में 2 बार ‘हींगादि कुदरती कीट रक्षक’ का छिड़काव करते रहना चाहिए, इसके छिड़काव के उपरान्त फसल पर राख अवश्य छिड़क देनी चाहिए ।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ऐसे करें भूमि चयन एवं खेत की तैयारी</h3>
<p style="text-align:justify;">सोयाबीन की खेती के लिए उचित जल-निकास वाली दोमट भूमि सबसे अच्छी रहती है । पर अम्लीय, क्षारीय अथवा खारे पानी वाली भूमि कतई अनुकूल नहीं होती। कृषि विशेषज्ञों ने अपने शोध में पाया कि पानी के उच्च स्तर वाली भूमि में फाइटोफ्बोरा कवक रोग का प्रकोप हो जाता है, अत: ऐसी भूमि पर सोयाबीन की खेती से बचना चाहिए। सोयाबीन की खेती के लिए भूमि की तैयारी करते समय भूमि में जैविक कार्बनिक पदार्थो का प्रतिशत ज्यादा से ज्यादा हो। इसके लिए खेत में हरी खाद फसल लेकर, तदोपरान्त सोयाबीन की बुवाई करना लाभप्रद रहता है।<br />
ये है सोयाबीन का उत्पादन व पकने का समय</p>
<h2 style="text-align:justify;">किस्म पकने का समय उपज(क्विंटल/हेक्टर)</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>प्रतिष्ठा                     100-105             दिन 20-30</strong><br />
<strong>जेएस                      335 95-100              25-30</strong><br />
<strong>पीके                       1024 110-120           30-35</strong><br />
<strong>एमएयूएस              47 85-90                    20-25</strong><br />
<strong>(अहिल्या-3)           100-105                     25-30</strong><br />
<strong>एनआरसी              37 95-100                   30-35</strong><br />
<strong>एमएयूएस              81 93-96                     22-30</strong><br />
<strong>एमएयूएस            9315 90-95                  20-25</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>कल्चर का उपयोग:</strong> फफूंदनाशक दवाओं से बीजोपचार के पश्चात बीज को 5 ग्राम रायजोबियम एवं 5 ग्राम पीएसबी कल्चर प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करें। उपचारित बीज को छाया में रखना चाहिये एवं शीघ्र बोनी करना चाहिये। ध्यान रहे कि फफूंद नाशक दवा एवं कल्चर को एक साथ न मिलाऐं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">समन्वित पोषण प्रबंधन</h3>
<p style="text-align:justify;">अच्छी सड़ी हुई गोबर की खाद (कम्पोस्ट) 2 टन प्रति एकड़ अंतिम बखरनी के समय खेत में अच्छी तरह मिला देवें तथा बोते समय 8 किलो नत्रजन 32 किलो स्फुर 8 किलो पोटाश एवं 8 किलो गंधक प्रति एकड़ देवें। यह मात्रा मिट्टी परीक्षण के आधार पर घटाई बढ़ाई जा सकती है। यथा सम्भव नाडेप, फास्फो कम्पोस्ट के उपयोग को प्राथमिकता दें। रासायनिक उर्वरकों को कूड़ों में लगभग 5 से 6 से.मी. की गहराई पर डालना चाहिये। गहरी काली मिट्टी में जिंक सल्फेट 25 किलोग्राम प्रति एकड़ एवं उथली मिट्टियों में 10 किलोग्राम प्रति एकड़ की दर से 5 से 6 फसलें लेने के बाद उपयोग करना चाहिये।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बीज दर</h3>
<p style="text-align:justify;">छोटे दाने वाली किस्में – 28 किलोग्राम प्रति एकड़<br />
मध्यम दाने वाली किस्में – 32 किलोग्राम प्रति एकड़<br />
बड़े दाने वाली किस्में – 40 किलोग्राम प्रति एकड़</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बीजोपचार:</strong> सोयाबीन के अंकुरण को बीज तथा मृदा जनित रोग प्रभावित करते हैं। इसकी रोकथाम हेतु बीज को थायरम या केप्टान 2 ग्राम, काबेर्डाजिम या थायोफिनेट मिथाइल 1 ग्राम मिश्रण प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचारित करना चाहिये अथवा ट्राइकोडरमा 4 ग्राम/कार्बेन्डाजिम 2 ग्राम प्रति किलों ग्राम बीज की दर से उपचारित करके बोयें।</p>
<h2 style="text-align:justify;">फसल कटाई एवं गहाई</h2>
<p style="text-align:justify;">सोयाबीन फसल में जब पत्तियों का रंग पीला पड़ जाये और पत्तियां सूखकर गिरनी प्रारम्भ हो जायें, इस अवस्था पर फसल कटाई कर लेनी चाहिए। फसल कटाई के बाद सूखने के लिए फसल को छोड़ दें और 4-5 दिन पश्चात बैलों की सहायता से दाना अलग कर लें। उपरोक्त विधि से सोयाबीन की खेती करने पर 16 क्विंटल सोयाबीन दाना तथा 25 क्विंटल सूखा भूसा हमारे कृषक भाई साधारण ढंग से प्राप्त कर सकते हैं। अत: आप भी यह विधि अपनाकर सोयाबीन का भरपूर लुत्फ उठा सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>संस्कृति एवं समाज</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/culture-and-society/soybean-cultivation/article-1050</link>
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                <pubDate>Fri, 09 Jun 2017 02:17:07 +0530</pubDate>
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