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                <title>supreme court - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>MSP: एमएसपी तय करने की मांग वाली याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस भेजा</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। New Delhi: उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, जिसमें सरकार को उचित तरीके से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने के लिए निर्देश देने की मांग की गयी है। महाराष्ट्र के किसान प्रकाश गोपालराव पोहरे, पुरुषोत्तम गावड़े और विशाल ओमप्रकाश रावत द्वारा संविधान के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/the-supreme-court-issued-a-notice-to-the-central-government-on-a-petition-seeking-fixation-of-msp/article-83417"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-04/new-delhi-1.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> New Delhi: उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को एक जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया, जिसमें सरकार को उचित तरीके से न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने के लिए निर्देश देने की मांग की गयी है। महाराष्ट्र के किसान प्रकाश गोपालराव पोहरे, पुरुषोत्तम गावड़े और विशाल ओमप्रकाश रावत द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर इस याचिका में मांग की गई है कि फसलों पर एमएसपी उत्पादन लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक होना चाहिए। इसे तय करते समय संबंधित राज्य सरकारों द्वारा प्रस्तावित खेती की वास्तविक लागत (सी2) को प्रभावी महत्व देना चाहिए। New Delhi</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची की पीठ ने इन दलीलों पर सुनवाई की। सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि यह मुद्दा देश भर के किसानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि एमएसपी की कमी के कारण बड़ी संख्या में किसानों नेआत्महत्याएं की हैं। भूषण ने कहा कि एमएसपी अक्सर खेती की व्यापक लागत से भी कम दर पर तय किया जाता है और एमएसपी पर खरीद केवल गेहूं और चावल जैसी फसलों के लिए ही महत्वपूर्ण है, जिससे अन्य फसलें उगाने वाले किसान अत्यधिक संकट में हैं। याचिकाकतार्ओं ने कहा कि वर्तमान एमएसपी पद्धति मुख्य रूप से ए2 एफएल (लागत और पारिवारिक श्रम) पर आधारित है, जबकि इसमें भूमि की लागत और कार्यशील पूंजी पर ब्याज को छोड़ दिया जाता है। New Delhi</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="जिला स्तरीय किकबॉक्सिंग प्रतियोगिता का सफल आयोजन" href="https://www.sachkahoon.com/successful-organization-of-district-level-kickboxing-competition/">जिला स्तरीय किकबॉक्सिंग प्रतियोगिता का सफल आयोजन</a></p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
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                <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 15:54:11 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>Aadhaar Card News: &amp;#8221;अब बड़ों का आधार बनाने की कोई जरूरत नहीं&amp;#8221;</title>
                                    <description><![CDATA[आधार कार्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई ये बड़ी जनहित याचिका Aadhaar Card Plea: नई दिल्ली (एजेंसी)। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है, जिसमें उन्होंने मांग की है कि भारत में आधार बनवाने की प्रक्रिया केवल छह साल तक के बच्चों तक ही सीमित हो। उनका […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/no-need-to-generate-aadhaar-for-adults-anymore/article-83293"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-04/aadhar-plea.jpg" alt=""></a><br /><div style="text-align:justify;">
<h3>आधार कार्ड को लेकर सुप्रीम कोर्ट में दायर हुई ये बड़ी जनहित याचिका</h3>
<p>Aadhaar Card Plea: नई दिल्ली (एजेंसी)। सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की है, जिसमें उन्होंने मांग की है कि भारत में आधार बनवाने की प्रक्रिया केवल छह साल तक के बच्चों तक ही सीमित हो। उनका कहना है कि अब बड़ों का आधार बनाने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि भारत में पहले ही 144 करोड़ यानी 99 प्रतिशत लोगों के आधार बन चुके हैं।  याचिका में यह भी बताया गया कि अब जो बड़ों का आधार बन रहा है, उसका फायदा कुछ विदेशी लोग उठा रहे हैं। पाकिस्तान, अफगानिस्तान, बांग्लादेश और रोहिंग्या घुसपैठिए कॉमन सर्विस सेंटर (सीएससी) पर जाकर पैसे देकर फर्जी आधार बनवा रहे हैं। इसके चलते देश में फर्जी दस्तावेजों की संख्या बढ़ रही है और यह सुरक्षा व जनसंख्या संतुलन के लिए भी खतरा है। Aadhaar Card News</p>
<p>अश्विनी उपाध्याय ने यह भी कहा कि छह साल से ऊपर के लोगों के आधार के लिए अब तहसीलदार या एसडीएम के आॅफिस में ही आवेदन किया जाए। इससे सभी फर्जी आधार बनाने वालों पर नियंत्रण रखा जा सकेगा। पहले भारत में आधार केवल तहसील पर बनता था, लेकिन अब सीएससी पर आधार बनवाने से इस प्रक्रिया में ढील और घुसपैठियों का फायदा हुआ है। याचिका में यह भी कहा गया है कि आधार, राशन कार्ड या अन्य दस्तावेज के लिए आवेदन करते समय व्यक्ति से एक अंडरटेकिंग ली जाए। इसमें व्यक्ति को लिखित रूप से कहना होगा कि उसने जो जानकारी दी है वह सही है और वह जानता है कि फर्जी दस्तावेज बनाना गंभीर अपराध है। इससे भविष्य में धोखाधड़ी की घटनाओं में कमी आएगी।</p>
<p>अश्विनी उपाध्याय ने यह भी मांग की है कि फर्जी दस्तावेज बनाने वालों को कॉन्करेंट सजा नहीं, बल्कि लगातार सजा दी जाए। भारत में वर्तमान में कनकरेन्ट सजा होती है, मतलब एक साथ सभी धाराओं की सजा शुरू हो जाती है और कुल सजा कम हो जाती है। उन्होंने सुझाव दिया है कि अगर पांच धाराएं हों, तो एक पूरी होने के बाद दूसरी शुरू हो, ताकि सजा का प्रभाव और डर लोगों में हो। याचिका में मांग की गई है कि सीएससी या तहसील में जहां भी आधार बनता है, वहां स्पष्ट रूप से डिस्प्ले बोर्ड लगाया जाए। बोर्ड पर लिखा होना चाहिए कि फर्जी आधार बनाना और बनवाना गंभीर अपराध है और पकड़े जाने पर पांच साल की सजा हो सकती है। यह नियम राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और जन्म प्रमाण पत्र जैसे अन्य दस्तावेजों पर भी लागू किया जाए। Aadhaar Card News</p>
</div>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>शिक्षा और रोजगार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 09:47:46 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, सिर्फ हिंदू, सिख और बौद्ध को अनुसूचित जाति का दर्जा</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज़)। Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा और उससे मिलने वाले कानूनी लाभों का हकदार नहीं रहेगा। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/supreme-courts-decision-to-grant-scheduled-caste-status-only-to-hindus-sikhs-and-buddhists/article-82673"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-03/supreme-court.jpeg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज़)।</strong> Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम निर्णय देते हुए स्पष्ट किया है कि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा किसी अन्य धर्म को अपनाने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति (SC) का दर्जा और उससे मिलने वाले कानूनी लाभों का हकदार नहीं रहेगा। कोर्ट ने आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए यह टिप्पणी की।</p>
<h3 style="text-align:justify;">क्या था पूरा मामला?</h3>
<p style="text-align:justify;">आंध्र प्रदेश के पित्तलवानीपालेम के निवासी चिंथदा आनंद ने खुद को अनुसूचित जाति का सदस्य बताते हुए कुछ लोगों के खिलाफ SC/ST एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज कराई। उनका आरोप था कि उनके साथ मारपीट की गई और जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल कर अपमानित किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, आरोपी पक्ष ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि शिकायतकर्ता ईसाई धर्म अपना चुका है और पिछले 10 वर्षों से पादरी के रूप में कार्य कर रहा है। इस आधार पर वह अब अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">30 अप्रैल 2025 को हाई कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए एफआईआर को रद्द कर दिया।<br />
सुप्रीम कोर्ट का क्या कहना है?</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट की बेंच, जिसमें जस्टिस प्रशांत मिश्रा और जस्टिस एन वी अंजारिया शामिल थे, ने संविधान (अनुसूचित जाति आदेश, 1950) का हवाला दिया।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा | Supreme Court</h3>
<ul>
<li style="text-align:justify;">आदेश के खंड 3 के अनुसार, केवल हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के लोग ही SC श्रेणी में आते हैं।</li>
<li style="text-align:justify;">यदि कोई व्यक्ति अन्य धर्म (जैसे ईसाई या मुस्लिम) अपनाता है, तो वह तुरंत SC दर्जा खो देता है।</li>
<li style="text-align:justify;">ऐसे व्यक्ति को आरक्षण, कानूनी सुरक्षा या अन्य संवैधानिक लाभ नहीं मिल सकते।</li>
<li style="text-align:justify;">जाति प्रमाण पत्र पर भी सख्त टिप्पणी</li>
</ul>
<p style="text-align:justify;">शिकायतकर्ता ने यह दलील दी कि उसके पास तहसीलदार द्वारा जारी SC प्रमाण पत्र है, जिसमें उसे ‘माडिगा’ जाति का सदस्य बताया गया है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">इस पर कोर्ट ने स्पष्ट कहा:</h3>
<p style="text-align:justify;">यह प्रमाण पत्र पहले ही रद्द हो जाना चाहिए था।<br />
केवल प्रमाण पत्र के आधार पर SC/ST एक्ट की सुरक्षा नहीं मांगी जा सकती, यदि व्यक्ति की धार्मिक स्थिति बदल चुकी हो।<br />
फैसले का व्यापक असर</p>
<h3 style="text-align:justify;">इस निर्णय से यह साफ हो गया है कि:</h3>
<p style="text-align:justify;">SC दर्जा केवल जन्म पर आधारित नहीं, बल्कि धर्म से भी जुड़ा हुआ है।<br />
धर्म परिवर्तन करने पर व्यक्ति को SC से जुड़े अधिकार स्वतः समाप्त हो जाते हैं।<br />
सरकारी दस्तावेजों की वैधता भी व्यक्ति की वास्तविक सामाजिक और धार्मिक स्थिति पर निर्भर करेगी।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 16:35:37 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने इस शख्स को दी इच्छामृत्यु की मंजूरी, देश में हुआ पहली बार!</title>
                                    <description><![CDATA[Supreme Court of India ने बुधवार (11 मार्च 2026) को पैसिव यूथेनेसिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा का मेडिकल सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दे दी। हरीश के परिवार ने याचिका दाखिल कर उनकी हालत को देखते हुए लाइफ सपोर्ट हटाने और निष्क्रिय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/the-supreme-court-granted-euthanasia-to-this-man-a-first-in-the-country/article-82173"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-03/supreme-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Supreme Court of India</span></span> ने बुधवार (11 मार्च 2026) को पैसिव यूथेनेसिया (निष्क्रिय इच्छामृत्यु) से जुड़े एक अहम मामले में बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने गाजियाबाद के हरीश राणा का मेडिकल सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दे दी। हरीश के परिवार ने याचिका दाखिल कर उनकी हालत को देखते हुए लाइफ सपोर्ट हटाने और निष्क्रिय इच्छामृत्यु की मंजूरी देने की अपील की थी। करीब 13 वर्षों से हरीश राणा बिस्तर पर हैं। कॉलेज के दौरान हुई एक दुर्घटना में उनके सिर में गंभीर चोट लगी थी, जिससे उनके मस्तिष्क को गहरा नुकसान पहुंचा। तब से उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ और वे पूरी तरह से मेडिकल सपोर्ट पर निर्भर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह फैसला <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Justice J. B. Pardiwala</span></span> और <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Justice K. V. Viswanathan</span></span> की बेंच ने सुनाया। अदालत ने कहा कि जिस तरह से हरीश को जीवित रखा जा रहा है, उसे लाइफ सपोर्ट सिस्टम के समान माना जाना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई मरीज स्वयं निर्णय लेने की स्थिति में न हो, तो उसके सबसे करीबी लोगों को उसके सर्वोच्च हित को ध्यान में रखते हुए फैसला लेने का अधिकार होता है।</p>
<h4>13 वर्षों में हरीश की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ</h4>
<p style="text-align:justify;">अदालत ने यह भी कहा कि पिछले 13 वर्षों में हरीश की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है। ऐसे में मरीज को कृत्रिम तरीकों से जीवित रखना तभी उचित माना जा सकता है, जब उससे उपचार का कोई वास्तविक लाभ मिल रहा हो या उसके ठीक होने की संभावना हो।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि हरीश राणा को दिल्ली स्थित <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">All India Institute of Medical Sciences</span></span> में भर्ती कराया जाए और वहां डॉक्टरों की देखरेख में आवश्यक प्रक्रिया पूरी की जाए। साथ ही अदालत ने इस मामले में 30 दिन की पुनर्विचार अवधि को भी हटा दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">जस्टिस पारदीवाला ने अपने आदेश में कहा कि साल 2018 में आए <span class="hover:entity-accent entity-underline inline cursor-pointer align-baseline"><span class="whitespace-normal">Common Cause vs Union of India</span></span> फैसले के कुछ पहलुओं को और बेहतर बनाने की कोशिश की गई है। उन्होंने कहा कि उस निर्णय में जीवन और मृत्यु के बीच मानव गरिमा के महत्व का विश्लेषण किया गया था और अन्य देशों की व्यवस्थाओं से भी इसकी तुलना की गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने भविष्य में ऐसे मामलों के लिए कुछ दिशा-निर्देश भी तय किए हैं। अदालत ने कहा कि मरीज का मेडिकल ट्रीटमेंट मानवीय तरीके से और डॉक्टरों की देखरेख में चरणबद्ध तरीके से हटाया जाना चाहिए। यह प्रक्रिया केवल अस्पताल में ही नहीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर घर पर भी की जा सकती है। यह फैसला पैसिव यूथेनेसिया से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है, जिसमें अदालत ने मरीज की गरिमा और उसके सर्वोच्च हित को सर्वोपरि माना है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 11 Mar 2026 12:14:42 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>NCERT Book Controversy: एनसीईआरटी की किताब को लेकर सुप्रीम कोर्ट का आया ये बड़ा फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[”न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं” NCERT Book Controversy: नई दिल्ली। कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में न्यायपालिका से संबंधित कथित आपत्तिजनक उल्लेखों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने कठोर रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि किसी संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/the-supreme-court-has-given-a-major-decision-regarding-the-ncert-book/article-81723"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-02/supreme-court-of-india-23.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">”न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश बर्दाश्त नहीं”</h3>
<p style="text-align:justify;">NCERT Book Controversy: नई दिल्ली। कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान पुस्तक में न्यायपालिका से संबंधित कथित आपत्तिजनक उल्लेखों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने कठोर रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने प्रारंभिक सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि किसी संवैधानिक संस्था की प्रतिष्ठा को आघात पहुंचाने वाली सामग्री अत्यंत गंभीर विषय है।न्यायालय ने संबंधित पुस्तक को बाजार से वापस लेने तथा विषयवस्तु की विस्तृत समीक्षा कराने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 11 मार्च को निर्धारित की गई है। Supreme Court</p>
<p style="text-align:justify;">पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान निर्माताओं ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन और स्वतंत्रता की व्यवस्था सुनिश्चित की है। ऐसे में किसी भी संस्था के प्रति अविश्वास उत्पन्न करने वाली सामग्री को हल्के में नहीं लिया जा सकता। न्यायालय ने यह भी कहा कि यदि इस प्रकार की बातें विद्यार्थियों और अभिभावकों के मन में बैठ जाती हैं, तो न्यायिक व्यवस्था के प्रति विश्वास प्रभावित हो सकता है। सुनवाई के दौरान न्यायालय के समक्ष यह प्रश्न भी उठा कि क्या पुस्तक की प्रतियां अभी बाजार या ऑनलाइन माध्यमों पर उपलब्ध हैं। अदालत ने निर्देश दिया कि यदि प्रतियां उपलब्ध हैं तो उन्हें तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">विवादित अध्याय की समीक्षा की जा रही है</h3>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई के दौरान राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद की ओर से प्रस्तुत पक्ष ने बताया कि विवादित अध्याय की समीक्षा की जा रही है तथा संशोधित संस्करण प्रकाशित किया जाएगा। साथ ही अध्याय तैयार करने से जुड़े व्यक्तियों के विरुद्ध प्रशासनिक कार्रवाई की जानकारी भी दी गई। हालांकि, पीठ ने संकेत दिया कि केवल सीमित कार्रवाई पर्याप्त नहीं मानी जाएगी और संपूर्ण प्रक्रिया की जांच आवश्यक है, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि सामग्री के प्रकाशन की जिम्मेदारी किस स्तर पर तय होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुनवाई में वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने भी चिंता व्यक्त की कि माध्यमिक स्तर के विद्यार्थियों को न्यायपालिका में कथित भ्रष्टाचार संबंधी सामग्री पढ़ाया जाना संवेदनशील विषय है। न्यायालय ने कहा कि इस प्रकरण की गहन जांच कर संस्थागत उत्तरदायित्व सुनिश्चित किया जाएगा। अदालत ने दोहराया कि न्यायपालिका की गरिमा और साख से कोई समझौता स्वीकार्य नहीं है। Supreme Court</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>शिक्षा और रोजगार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 26 Feb 2026 12:40:04 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>Supreme Court: “ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह में शिव मंदिर दावे पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला”</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। Dargah Dispute: सुप्रीम कोर्ट ने अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह में शिव मंदिर होने के दावे से जुड़े मामले में सुनवाई पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है। यह याचिका दरगाह को मानने वाले दरवेश समुदाय के लोगों ने दायर की थी। कोर्ट […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/supreme-court-dismisses-plea-seeking-stay-on-hearing-on-claim-of-shiva-temple-at-ajmer-dargah/article-81436"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-02/supreme-court-delhi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> Dargah Dispute: सुप्रीम कोर्ट ने अजमेर की ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह में शिव मंदिर होने के दावे से जुड़े मामले में सुनवाई पर रोक लगाने की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह याचिका दरगाह को मानने वाले दरवेश समुदाय के लोगों ने दायर की थी। कोर्ट ने याचिका को तकनीकी आधार पर खारिज करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता अजमेर की निचली अदालत में चल रहे मुख्य मामले के पक्षकार नहीं हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने अपनी याचिका में उन मूल पक्षकारों को भी शामिल नहीं किया था, जिन्होंने यह दावा किया है कि दरगाह किसी प्राचीन शिव मंदिर के अवशेषों पर बनी है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस आधार पर याचिका पर विचार नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिका में दावा किया गया था कि प्लेसेस ऑफ वर्शिप (एक्ट) 1991 की वैधता से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 12 दिसंबर 2024 को अंतरिम आदेश दिया था। इस आदेश में कहा गया था कि धार्मिक स्थलों से जुड़े किसी नए मुकदमे को देश भर की कोई निचली अदालत स्वीकार न करे और ऐसे मामलों में कोई प्रभावी आदेश न पास करे। New Delhi</p>
<p style="text-align:justify;">याचिकाकर्ताओं का कहना था कि इस आदेश की अवहेलना करते हुए अजमेर की अदालत ने इस विवाद पर सुनवाई शुरू की है और नोटिस जारी किए हैं, इसलिए अजमेर कोर्ट में चल रही कार्यवाही पर रोक लगाई जाए।</p>
<p style="text-align:justify;">सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता निचली अदालत के मूल केस में शामिल नहीं हैं, इसलिए वे सीधे सुप्रीम कोर्ट में इस तरह की मांग नहीं कर सकते। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस फैसले का मुख्य केस पर कोई असर नहीं पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला काफी संवेदनशील है क्योंकि अजमेर शरीफ दरगाह सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह है, जो लाखों श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र है। अजमेर की निचली अदालत में यह मामला अभी भी लंबित है और आगे की सुनवाई जारी रहेगी। New Delhi</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="मुजफ्फरपुर में विजिलेंस टीम की कार्रवाई, रिश्वत लेते पकड़ा गया दारोगा" href="http://10.0.0.122:1245/vigilance-team-takes-action-in-muzaffarpur-police-inspector-caught-taking-bribe/">मुजफ्फरपुर में विजिलेंस टीम की कार्रवाई, रिश्वत लेते पकड़ा गया दारोगा</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 18 Feb 2026 17:00:21 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>Supreme Court News: आवारा कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की आई बड़ी अपडेट!</title>
                                    <description><![CDATA[Stray Dogs Case: नई दिल्ली। देश में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया। इन याचिकाओं में 7 नवंबर 2025 को पारित आदेश में संशोधन की मांग की गई है। Supreme Court News न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/major-update-from-the-supreme-court-regarding-stray-dogs/article-80808"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-01/supreme-court-of-india-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Stray Dogs Case: नई दिल्ली। देश में आवारा कुत्तों की बढ़ती समस्या से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर अपना निर्णय सुरक्षित रख लिया। इन याचिकाओं में 7 नवंबर 2025 को पारित आदेश में संशोधन की मांग की गई है। Supreme Court News</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की पीठ ने मामले में नियुक्त न्याय मित्र (एमिकस क्यूरी) गौरव अग्रवाल की दलीलें सुनीं। उन्होंने पंजाब, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और राजस्थान सहित कई राज्यों द्वारा उठाए गए कदमों का विवरण न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया। पीठ ने राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) की ओर से पेश अधिवक्ता को भी सुना। कोर्ट ने पूर्व आदेश में एनएचएआई को राष्ट्रीय राजमार्गों से आवारा पशुओं को हटाने तथा सड़कों की घेराबंदी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था।</p>
<h3>सर्वोच्च न्यायालय का पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई) को निर्देश</h3>
<p style="text-align:justify;">सर्वोच्च न्यायालय ने पशु कल्याण बोर्ड (एडब्ल्यूबीआई) को निर्देश दिया कि पशु आश्रय गृह अथवा पशु जन्म नियंत्रण केंद्र स्थापित करने की अनुमति मांगने वाले गैर-सरकारी संगठनों के आवेदनों पर शीघ्र निर्णय लिया जाए। पीठ ने स्पष्ट कहा कि आवेदन या तो स्वीकृत किए जाएं अथवा अस्वीकृत, लेकिन अनावश्यक विलंब न हो। न्यायालय ने सभी पक्षों को निर्देश दिया कि वे इस मामले में अपने लिखित उत्तर शीघ्र दाखिल करें। सुनवाई के दौरान पीठ ने राज्य सरकारों की निष्क्रियता पर चिंता जताते हुए कहा कि नसबंदी क्षमता बढ़ाने के निर्देशों का अपेक्षित पालन नहीं हो रहा है। Supreme Court News</p>
<p style="text-align:justify;">यह मामला 7 नवंबर 2025 के उस आदेश से संबंधित है, जिसमें शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों और रेलवे स्टेशनों जैसे संवेदनशील क्षेत्रों से आवारा कुत्तों को हटाकर नसबंदी एवं टीकाकरण के बाद निर्धारित आश्रय स्थलों में भेजने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया था कि पकड़े गए कुत्तों को उनके मूल स्थान पर पुनः नहीं छोड़ा जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अतिरिक्त, अदालत ने राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों तथा एक्सप्रेसवे से मवेशियों और अन्य आवारा पशुओं को हटाने का भी निर्देश दिया था। इससे पूर्व 13 जनवरी को अदालत ने संकेत दिया था कि कुत्ते के काटने की घटनाओं में राज्यों को पीड़ितों को पर्याप्त मुआवजा देने और लापरवाही के मामलों में जवाबदेही तय करने पर विचार करना होगा। यह कार्यवाही उस स्वतः संज्ञान याचिका से जुड़ी है, जिसकी शुरुआत पिछले वर्ष 28 जुलाई को एक मीडिया रिपोर्ट के आधार पर की गई थी। रिपोर्ट में राष्ट्रीय राजधानी में आवारा कुत्तों के काटने से रेबीज संक्रमण, विशेषकर बच्चों में, बढ़ने की चिंता जताई गई थी। Supreme Court News</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 29 Jan 2026 16:14:52 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>Unnao Rape Case Update: सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर पीड़िता ने जताई खुशी, कहा -कुलदीप सेंगर को फांसी दिलवाऊंगी</title>
                                    <description><![CDATA[Kuldeep Sengar Bail: नई दिल्ली। उन्नाव दुष्कर्म प्रकरण में दोषसिद्ध पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत पर अंतरिम रोक लगा दी। इसके साथ ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका पर सेंगर को नोटिस जारी किया गया […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/unnao-rape-case-update-the-victim-expressed-happiness-over-the-supreme-courts-decision/article-79789"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-12/supreme-order.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Kuldeep Sengar Bail: नई दिल्ली। उन्नाव दुष्कर्म प्रकरण में दोषसिद्ध पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा दी गई जमानत पर अंतरिम रोक लगा दी। इसके साथ ही केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की याचिका पर सेंगर को नोटिस जारी किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश पर पीड़ित परिवार ने संतोष और खुशी व्यक्त की है। Unnao Rape Case Update</p>
<p style="text-align:justify;">पीड़िता ने अदालत के फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से उन्हें न्याय की अनुभूति हुई है। उन्होंने भरोसा जताया कि आगे भी न्याय की प्रक्रिया निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ेगी। पीड़िता का कहना है कि वह इस संघर्ष को अंतिम परिणाम तक जारी रखेंगी और जब तक दोषी को कठोरतम सजा नहीं मिलती, तब तक उनके परिवार को पूर्ण न्याय नहीं मिलेगा। उन्होंने उन सभी लोगों का आभार जताया, जिन्होंने इस कठिन समय में उनका साथ दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">पीड़िता की मां ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने उनके पति की हत्या की, उन्हें सबसे कड़ी सजा मिलनी चाहिए। उनके अनुसार, न्याय तभी पूरा होगा जब दोषियों को उनके अपराध का उचित दंड मिलेगा।</p>
<h3>किसी भी परिस्थिति में कुलदीप सिंह सेंगर को जेल से बाहर नहीं आने दिया जाएगा</h3>
<p style="text-align:justify;">पीड़ित पक्ष के अधिवक्ता हेमंत कुमार मौर्य ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश से यह स्पष्ट हो गया है कि किसी भी परिस्थिति में कुलदीप सिंह सेंगर को जेल से बाहर नहीं आने दिया जाएगा। उन्होंने यह भी बताया कि पीड़ित परिवार को अब भी धमकियां मिल रही हैं, इसके बावजूद उन्हें न्यायपालिका पर पूरा विश्वास है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस मामले में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता योगिता भयाना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही संकेत दे दिया था कि वह इस प्रकरण में हस्तक्षेप करने को तैयार है। अब अदालत ने औपचारिक रूप से जमानत पर रोक का आदेश पारित कर दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि अदालत ने पीड़िता को स्वयं भी हस्तक्षेप याचिका दायर करने का अवसर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की ओर से दिल्ली हाईकोर्ट के जमानत आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई हुई। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने कुलदीप सिंह सेंगर की जमानत पर तत्काल रोक लगा दी और आगे की सुनवाई के लिए नोटिस जारी किया है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Dec 2025 16:07:51 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Gujarat: पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट की जमानत याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा अपडेट</title>
                                    <description><![CDATA[Former IPS Sanjiv Bhatt Rejects Bail Plea: नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात के पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को एक बार फिर बड़ी कानूनी निराशा दी है। अदालत ने वर्ष 1996 के अफीम प्रकरण में मिली 20 वर्ष की सज़ा के निलंबन तथा जमानत की उनकी याचिका को अस्वीकार कर दिया। आरोपों के अनुसार, […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/major-update-from-the-supreme-court-on-former-ips-officer-sanjeev-bhatts-bail-plea/article-79086"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-12/60-bed-temporary-covid-care-center-to-be-built-in-new-building-of-supreme-court.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Former IPS Sanjiv Bhatt Rejects Bail Plea: नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने गुजरात के पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट को एक बार फिर बड़ी कानूनी निराशा दी है। अदालत ने वर्ष 1996 के अफीम प्रकरण में मिली 20 वर्ष की सज़ा के निलंबन तथा जमानत की उनकी याचिका को अस्वीकार कर दिया। आरोपों के अनुसार, भट्ट पर राजस्थान के एक अधिवक्ता को फँसाने हेतु होटल कक्ष में अवैध रूप से अफीम रखवाने का आरोप है। Gujarat News</p>
<p style="text-align:justify;">न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और न्यायमूर्ति विजय बिश्नोई की खंडपीठ ने याचिका पर विस्तृत सुनवाई की और माना कि इस चरण पर किसी प्रकार की राहत देने का कोई आधार नहीं बनता। संजीव भट्ट कई वर्षों से कारावास में हैं और पहले भी कई बार जमानत के लिए गुहार लगा चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भट्ट की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि उनके मुवक्किल लंबी अवधि तक सज़ा काट चुके हैं और बरामद अफीम की मात्रा भी वाणिज्यिक श्रेणी में नहीं आती। उन्होंने यह भी बताया कि भट्ट की स्वास्थ्य स्थिति चिंताजनक है, ऐसे में उन्हें अंतरिम राहत मिलनी चाहिए। Gujarat News</p>
<h3>गुजरात सरकार की ओर से अधिवक्ता ने जमानत का कड़ा विरोध किया</h3>
<p style="text-align:justify;">वहीं, गुजरात सरकार की ओर से प्रस्तुत अधिवक्ता मनिंदर सिंह ने जमानत का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि यह मामला मात्र अवैध पदार्थ रखने का नहीं, बल्कि एक व्यक्ति को झूठे आरोप में फँसाने की गंभीर साजिश से जुड़ा है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि अधिकारी पद का दुरुपयोग करते हुए हथकंडे अपनाए गए, जिससे यह अपराध एनडीपीएस अधिनियम के तहत अत्यंत गंभीर बन जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि यह घटना 1996 की है, जब संजीव भट्ट बनासकांठा जिले में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात थे। उसी समय राजस्थान के अधिवक्ता सुमेरसिंह राजपुरोहित को पालनपुर के एक होटल से अफीम मिलने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। बाद में जांच में यह सामने आया कि यह मामला कथित रूप से रचा गया था। वर्ष 1999 में तत्कालीन पुलिस निरीक्षक आई.बी. व्यास की शिकायत पर इस प्रकरण की जांच शुरू हुई और आगे चलकर भट्ट के विरुद्ध मुकदमा दर्ज हुआ। Gujarat News</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Dec 2025 16:02:53 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>CJI Surya Kant: जस्टिस सूर्यकांत ने ली भारत के 53वें चीफ जस्टिस की शपथ, संभाला कार्यभार</title>
                                    <description><![CDATA[CJI Surya Kant Oath Ceremony: नई दिल्ली। देश के न्यायिक इतिहास में एक नया अध्याय तब जुड़ गया जब जस्टिस सूर्यकांत ने सोमवार को भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ग्रहण की। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। समारोह में केंद्र […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/justice-surya-kant-takes-oath-as-the-53rd-chief-justice-of-india-assumes-office/article-78504"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-11/oats-cji.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">CJI Surya Kant Oath Ceremony: नई दिल्ली। देश के न्यायिक इतिहास में एक नया अध्याय तब जुड़ गया जब जस्टिस सूर्यकांत ने सोमवार को भारत के 53वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ग्रहण की। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन के दरबार हॉल में उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। समारोह में केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्रियों, संवैधानिक पदाधिकारियों तथा न्यायपालिका से जुड़े कई गणमान्य उपस्थित रहे। जस्टिस सूर्यकांत ने पूर्व मुख्य न्यायाधीश भूषण रमेश गवई का स्थान ग्रहण किया है। संविधान के अनुच्छेद 124(2) के तहत प्रदत्त अधिकारों का उपयोग करते हुए राष्ट्रपति ने सीजेआई गवई की अनुशंसा पर उनकी नियुक्ति को मंजूरी दी थी। CJI Surya Kant</p>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा में 10 फरवरी 1962 को एक सामान्य परिवार में जन्मे सूर्यकांत का विधि-जीवन 1984 में हिसार से प्रारंभ हुआ। इसके बाद वह चंडीगढ़ आकर पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में सक्रिय रूप से अभ्यास करने लगे। अपने करियर के आरंभिक वर्षों में उन्होंने अनेक संवैधानिक, सेवा संबंधी तथा सिविल मामलों में यूनिवर्सिटियों, बोर्डों, सरकारी निकायों, बैंकों और स्वयं उच्च न्यायालय का प्रतिनिधित्व किया।</p>
<p style="text-align:justify;">विधिक क्षेत्र में उनकी दक्षता को देखते हुए वर्ष 2000 में उन्हें हरियाणा का सबसे कम उम्र का एडवोकेट जनरल नियुक्त किया गया। एक वर्ष पश्चात उन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा प्रदान किया गया। 9 जनवरी 2004 को उन्हें पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय का स्थायी न्यायाधीश नियुक्त किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">अक्टूबर 2018 में वे हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश बने और 24 मई 2019 को उनकी पदोन्नति होकर वे भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीश नियुक्त हुए। नवंबर 2024 से वह सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी के अध्यक्ष के रूप में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। CJI Surya Kant</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 24 Nov 2025 11:06:14 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Supreme Court: एसआईआर पर चुनाव आयोग को &amp;#8216;सुप्रीम&amp;#8217; नोटिस! केरल और यूपी में हो रहे एसआईआर को लेकर उठाया ये कदम</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। केरल और उत्तर प्रदेश में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर उठ रही आपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई की। अदालत ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने को कहा है और स्पष्ट किया कि मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर को होगी। याचिकाकर्ताओं का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/supreme-court-issues-notice-to-election-commission-on-sir/article-78390"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-11/supreme-court-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नई दिल्ली। केरल और उत्तर प्रदेश में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया को लेकर उठ रही आपत्तियों पर सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई की। अदालत ने इस मुद्दे पर चुनाव आयोग से विस्तृत जवाब प्रस्तुत करने को कहा है और स्पष्ट किया कि मामले की अगली सुनवाई 26 नवंबर को होगी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि एसआईआर के नाम पर मतदाता सूची का गोपनीय ढंग से सत्यापन किया जा रहा है, जिससे पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। Supreme Court</p>
<p style="text-align:justify;">केरल सरकार, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) सहित कई पक्षों द्वारा दायर याचिकाओं में कहा गया है कि राज्य में स्थानीय निकाय चुनावों की अधिसूचना 9 और 11 दिसंबर के लिए पहले ही जारी हो चुकी है। ऐसे समय में एसआईआर का संचालन, न केवल प्रशासनिक दृष्टि से कठिन है बल्कि चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर भी असर डाल सकता है। याचिकाओं में यह भी उल्लेख है कि सभी सरकारी स्कूलों के शिक्षक चुनावी कार्यों में लगे हुए हैं, इसलिए उनसे एसआईआर की जिम्मेदारी लेना व्यावहारिक नहीं है।</p>
<h3>1.76 लाख से अधिक अधिकारियों व कर्मचारियों की आवश्यकता</h3>
<p style="text-align:justify;">केरल सरकार ने याचिका में यह भी बताया कि स्थानीय निकाय चुनावों के लिए राज्य को 1.76 लाख से अधिक अधिकारियों व कर्मचारियों तथा 68 हजार सुरक्षा कर्मियों की आवश्यकता है। वहीं, एसआईआर प्रक्रिया के लिए 25,600 से अधिक अतिरिक्त अधिकारियों की जरूरत पड़ रही है, जिनमें से अधिकांश वही कर्मचारी हैं जो पहले से चुनावी प्रशिक्षण प्राप्त कर चुके सीमित संसाधन वाले समूह का हिस्सा हैं। सरकार ने दलील दी कि पंचायत राज अधिनियम, 1994 और नगरपालिका अधिनियम, 1994 के तहत 21 दिसंबर से पूर्व चुनाव सम्पन्न कराना कानूनी रूप से आवश्यक है। ऐसे में एसआईआर का संचालन प्रशासनिक भार बढ़ा सकता है और चुनाव की सुगमता पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उत्तर प्रदेश में भी इसी प्रक्रिया को चुनौती दी गई है। बाराबंकी से कांग्रेस सांसद तनुज पूनिया ने अपनी याचिका में कहा कि एसआईआर प्रक्रिया मतदाता सूची में अनावश्यक हस्तक्षेप पैदा कर सकती है और इससे चुनाव की निष्पक्षता पर संदेह हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका पर भी चुनाव आयोग को नोटिस जारी करते हुए स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। Supreme Court</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 21 Nov 2025 14:42:44 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>Kerala SIR: केरल सरकार ने की स्थानीय निकाय चुनाव तक एसआईआर स्थगित करने की सुप्रीम कोर्ट से मांग</title>
                                    <description><![CDATA[तिरुवनंतपुरम। केरल सरकार ने निर्वाचन आयोग द्वारा शुरू की गई विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। राज्य का तर्क है कि स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारियाँ अपने चरम पर हैं, ऐसे में समानांतर रूप से एसआईआर का संचालन न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि प्रशासनिक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/the-kerala-government-has-requested-the-supreme-court-to-postpone-the-sir-until-the-local-body-elections/article-78261"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-11/supreme-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">तिरुवनंतपुरम। केरल सरकार ने निर्वाचन आयोग द्वारा शुरू की गई विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) प्रक्रिया पर गंभीर आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। राज्य का तर्क है कि स्थानीय निकाय चुनावों की तैयारियाँ अपने चरम पर हैं, ऐसे में समानांतर रूप से एसआईआर का संचालन न केवल अव्यवहारिक है, बल्कि प्रशासनिक तंत्र पर अत्यधिक दबाव भी डाल देगा। Kerala SIR News</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार की याचिका अनुच्छेद 32 के तहत प्रस्तुत की गई है। इसमें कहा गया है कि केरल के 1,200 स्थानीय स्वशासन निकायों के लिए चुनाव 9 और 11 दिसंबर को दो चरणों में होंगे तथा मतगणना 13 दिसंबर को निर्धारित है। चुनावी प्रक्रिया को सुचारु रखने हेतु बड़े पैमाने पर कर्मियों और सुरक्षा बलों की आवश्यकता है। वहीं, एसआईआर के लिए अतिरिक्त हजारों कर्मचारियों की तैनाती करनी होगी, जिससे सामान्य शासकीय कार्य प्रभावित हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि संविधान के अनुच्छेद 243-ई और 243-यू के अनुसार स्थानीय निकाय चुनाव निश्चित समयसीमा के भीतर कराना अनिवार्य है, जबकि एसआईआर प्रक्रिया के लिए ऐसा कोई संवैधानिक दायित्व नहीं है। इसलिए राज्य ने आग्रह किया है कि मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण को फिलहाल स्थगित किया जाए और इसे चुनाव समाप्त होने के बाद ही आगे बढ़ाया जाए। Kerala SIR News</p>
<p style="text-align:justify;">इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) ने भी इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। पार्टी का कहना है कि एसआईआर और चुनाव एक साथ चलने से मतदाताओं के अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार का स्पष्ट मत है कि वह भविष्य में एसआईआर की वैधता पर चुनौती दे सकती है, परंतु वर्तमान में उसकी प्राथमिक मांग केवल प्रक्रिया को अस्थायी रूप से रोकने की है, जिससे चुनाव संबंधी व्यवस्थाएँ निर्बाध रूप से संपन्न हो सकें। Kerala SIR News</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Tue, 18 Nov 2025 11:54:30 +0530</pubDate>
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