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                <title>मानव संसाधन विकास मंत्रालय की टीम पहुंची सरसा,  जाने क्या है वजह</title>
                                    <description><![CDATA[– पहले दिन टीम ने जेएनवी ओढां में निरीक्षण कर जांची व्यवस्थाएं सरसा (सुनील वर्मा)। मानव संसाधन विकास मंत्रालय (human resource development ministry) की टीम रविवार को सरसा पहुंची। टीम ने प्रथम दिन ओढ़ां स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय में निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। टीम का नेतृत्व एनसीईआरटी से ऐश्वर्या, प्रवक्ता आसीमा, समग्र शिक्षा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/human-resource-development-ministry/article-39824"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2022-11/sirsa-13.jpg" alt=""></a><br /><h4><strong>– पहले दिन टीम ने जेएनवी ओढां में निरीक्षण कर जांची व्यवस्थाएं</strong></h4>
<p><strong>सरसा (सुनील वर्मा)।</strong> मानव संसाधन विकास मंत्रालय <strong>(<span class="HwtZe" lang="en" xml:lang="en"><span class="jCAhz ChMk0b"><span class="ryNqvb">human resource development ministry</span></span></span>)</strong> की टीम रविवार को सरसा पहुंची। टीम ने प्रथम दिन ओढ़ां स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय में निरीक्षण कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। टीम का नेतृत्व एनसीईआरटी से ऐश्वर्या, प्रवक्ता आसीमा, समग्र शिक्षा अभियान के जिला परियोजना समन्वयक बूटाराम, सहायक जिला समन्वयक शशि सचदेवा कर रही है। टीम सोमवार को कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय व आरोही विद्यालय में विद्यार्थियों को दी जा रही सुविधाओं का जायजा लेगी। जिले के छह खंडों में 12 कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय व आरोही विद्यालय है।</p>
<p><strong>ये भी पढ़ें– <a href="http://10.0.0.122:1245/cattle-free-city/">कैटल फ्री शहर में पशुओं की भरमार, हादसों का इंतजार</a></strong></p>
<h3><strong>– विद्यार्थियों से की बातचीत | <span class="HwtZe" lang="en" xml:lang="en"><span class="jCAhz ChMk0b"><span class="ryNqvb">human resource development ministry</span></span></span><br />
</strong></h3>
<p>केंद्रीय टीम रविवार को जवाहर नवोदय विद्यालय में पहुंची। टीम ने विद्यार्थियों को दी जा रही शिक्षा के स्तर की जांच की। इसी के साथ छात्रावास में विद्यार्थियों को दिए जा रहे खाने की क्वालिटी जांची गई। उन्होंने विद्यार्थियों को खाने के बारे में पूछताछ की। वहीं विद्यार्थियों को दी जा रही सुविधाओं के बारे में आंकलन किया गया। टीम ने जांच रिपोर्ट भी तैयार की ताकि उच्च अधिकारियों को रिपोर्ट भेजी जा सके। समग्र शिक्षा अभियान की सहायक जिला परियोजना समन्वयक शशि सचदेवा ने बताया कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय की टीम आवासीय स्कूलों में निरीक्षण करेगी। टीम सभी खंडों में कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय व आरोही स्कूलों में निरीक्षण करेगी।</p>
<h3><strong>– टीम इन स्कूलों में करेगी निरीक्षण</strong></h3>
<p><strong>खंड, कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय, आरोही विद्यालय</strong></p>
<ul>
<li><strong>बड़ागुढ़ा, फतेहपुरिया झिड़ी</strong></li>
<li><strong>डबवाली, रत्ताखेड़ा, कालुआना</strong></li>
<li><strong>ऐलनाबाद, धोलपालिया, खारी सुरेरा</strong></li>
<li><strong>ना. चौपटा, रामपुरा ढिल्लो, नाथूसरी कलां</strong></li>
<li><strong>ओढां, च_ा, श्रीजलालआना साहिब</strong></li>
<li><strong>रानियां, केहरवाला, मोहम्मदपुरिया</strong></li>
</ul>
<p><b>अन्य </b><strong><a href="http://10.0.0.122:1245/">अपडेट</a></strong><b> हासिल करने के लिए हमें </b><strong><a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a></strong><b> और </b><strong><a href="https://twitter.com/SACHKAHOON">Twitter</a></strong><b>, <a href="https://www.instagram.com/sachkahoon/">Instagram</a>, <a href="https://www.linkedin.com/company/sachkahoon">LinkedIn</a> , <a href="https://www.youtube.com/channel/UCOcEoUWkETVpZIzmQPVlpfg">YouTube</a>  पर फॉलो करें।</b></p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 13 Nov 2022 20:29:46 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>आपदा प्रशिक्षण से रोकी जा सकेगी मानव क्षति</title>
                                    <description><![CDATA[भारत में बीते कुछ वर्षो से प्राकृतिक और मानवजनित आपदाएं-घटनाएं बढ़ी हैं। मानवीय हिमाकत ने पिछले दिनों दिल्ली के अनाज मंडी इलाके में बड़ी घटना को जन्म दिया। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (Disaster training)ने आगजनी को मानवजनित आपदाओं में अव्वल स्थान दिया है। लेकिन आपदा विशेषज्ञों की मानें तो ऐसी घटनाओं को आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/disaster-training-will-prevent-human-loss/article-12089"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-12/disaster-training.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:center;"><strong><em><span style="text-decoration:underline;">भारत में बीते कुछ वर्षो से प्राकृतिक और मानवजनित आपदाएं-घटनाएं बढ़ी हैं। मानवीय हिमाकत ने पिछले दिनों दिल्ली के अनाज मंडी इलाके में बड़ी घटना को जन्म दिया। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (Disaster training)ने आगजनी को मानवजनित आपदाओं में अव्वल स्थान दिया है। लेकिन आपदा विशेषज्ञों की मानें तो ऐसी घटनाओं को आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण से रोका जा सकता है। इस क्षेत्र में एक नाम ऐसा है जो वर्षों से न सिर्फ सरकारी अधिकारियों, बल्कि आमजनों को भी आपदाओं से निपटने का गुर सिखा रही है। डॉ. अंजलि क्वात्रा अंतराष्ट्रीय आपदा प्रबंधन विशेषज्ञ जो स्वयंसेवी संगठन फिलांथ्रोफे की प्रमुख भी हैं। वह कहती हैं कि देश में बाढ़, भूकंप, चक्रवात व भूस्लखन कभी भी दस्तक दे देते हैं। इसलिए स्वंय के जानमाल के बचाव को प्रत्येक इंसान को आपदा प्रबंधन के हुनर सीखने चाहिए। दिल्ली की घटना को ध्यान में रखकर डॉ. अंजलि क्वात्रा से आपदा प्रबंधन मुद्दे पर रमेश ठाकुर की विस्तृत बात हुई। पेश हैं बातचीत के प्रमुख हिस्से।</span></em></strong></p>
<h3></h3>
<h3 style="text-align:justify;">दिल्ली जैसी अचानक घटने वाली घटनाओं को आपदा प्रबंधन के जरिए कैसे बचाया जा सकता है?</h3>
<p style="text-align:justify;">घटना नि:संदेह दर्दनाक थी। लेकिन आगे ऐसी घटनाएं न घटें इसके लिए सबक लेना चाहिए। हमारी टीम पिछले 12 सालों से राष्ट्रीय और अंर्तराष्ट्रीय स्तर पर आपदा प्रबंधन (Disaster training) का प्रशिक्षण दे रही है। आपने पूछा दिल्ली घटना को कैसे टाला जा सकता था। दिल्ली की घटना में फायर ब्रिगेड के एक कर्मी ने अपनी जान जोखिम में डाल कर कईंयों को बचाया। हमें ऐसे ही कर्मियों की संख्या बढ़ानी है। पुलिसकर्मियों के लिए आपदा प्रशिक्षण का ज्ञान अनिवार्य कर देना चाहिए। हमारी संस्था ने कॉमनवेल्थ गेम के समय ऐसे कई वॉलेंटियर तैयार किए थे, दिल्ली, मुंबई और औरंगाबाद के पुलिसकर्मियों को प्रशिक्षण देने के साथ ही हमने पांच सितारा होटल के कर्मचारियों को भी हादसों में क्षति को रोकने का प्रशिक्षण दिया है जिसका रिजल्ट बहुत अच्छा है। घटना के वक्त दोषारोपण के बजाय बचाव के विकल्प खोजने चाहिए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">प्राकृतिक आपदाओं के अलावा मानवजनित घटनाओं में ज्यादा इजाफा हो रहा है। कोलकाता के कोचिंग सेंटर में लगी आग और दिल्ली में शॉर्ट सर्किट होना ताजा उदाहरण है?</h3>
<p style="text-align:justify;">देखिए, प्राकृतिक आपदाएं कुदरती होती हैं। पर, मानवजनित आपदाएं रोकी जा सकती हैं। हम छोटी लेकिन बेहद जरूरी बातों को नजरअंदाज करते हैं, जिसका परिणाम बड़े हादसे से चुकाना पड़ता है। घर में यदि बिजली के उपकरण पुराने हो गए हैं, किसी तार से चिंगारी निकल रही है या फिर करंट आ रहा है तो तुरंत सतर्क हो जाना चाहिए। आग अधिकतर शार्ट सर्किट से लगती है जिसपर आसानी से काबू किया जा सकता है। एक अहम बात और भी है लोगों को बचाव करने की जानकारी अधूरी होती है। यूं कहें कि आपदा प्रबंधन का ज्ञान न के बराबर होता है। घटनाओं के वक्त लोग मूकबधिर बनकर तमाशा देखते हैं। हालांकि उस वक्त वह कर भी क्या सकते हैं। कई लोग बिजली से लगी आग में पानी के इस्तेमाल को गलत मानते हैं हम लगभग सभी वर्ग के लोगों में आपदा प्रबंधन की क्लास के समय यही बताते हैं कि शॉट सर्किट के वक्त पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है। दिल्ली के कारखाने में जब आग लगी थी तो समय रहते अगर पानी डाला जाता तो धुंआ नहीं निकलता।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कुछ घटनाएं ऐसी जगहों पर घट जाती हैं जहां आपदा के वक्त बचाव कार्य संभंव नहीं हो पाता ?</h3>
<p style="text-align:justify;">अगर आप किसी और की जान नहीं भी बचा पा रहे तो ऐसे हादसे में सबसे जरूरी है खुद को सुरक्षित रखें। हमने बीते कुछ सालों से ऐसी संकरी बस्तियों में भी शिविर लगाए हंै। अभी दक्षिण दिल्ली के कुछ इलाकों में रोजाना आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण कैंप का आयोजन किया जा रहा है, जिससे यदि संबंधित अधिकारी या अग्निशमन दल को पहुंचने में देर हो तो पहला प्रयास खुद किया जा सके। आग लगने में सबसे अधिक मौत दम घुटने की वजह से होती हैं, ऐसे में लिफ्ट का प्रयोग बिल्कुल न करें, आग की लपटे क्योंकि नीचे से ऊपर की ओर उठती हैं, इसलिए सीढ़ियों से नीचे उतरने का प्रयास करें, यदि किसी को एफेक्सियां या सांस लेने में तकलीफ तो बाहर निकलने के बाद तुरंत उसे सीपीआर दें, जिससे सांस को तुरंत वापस लाया जा सकता है। इसमें हथेली के बल से मरीज की पसली पर पांच से दस मिनट तक दबाना होता है यह बहुत आसान प्रक्रिया है, जिसे हर कोई कर सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">घरेलू स्तर पर छोटी आपदाओं से लोग कैसे अपना बचाव कर सकते हैं?</h3>
<p style="text-align:justify;">देखिए, हम किसी बड़ी घटना की बात न भी करें, तो हमारी जानकारी घरों में रोज होने वाली ऐसी घटनाओं के बारे में बहुत कम होती है, उदाहरण के लिए किसी की सांस नली में खाना अटक गया या फिर गाड़ी पानी में फंस गई, घरों में बच्चे अकसर बर्तन सिर में फंसा लेते हैं। ऐसे में सही जानकारी नहीं होने पर जान तक जा सकती है। सांस नली में खाना फंसने पर व्यक्ति के पीछे से कमर के हिस्से से नाभि पर मुठ्ठी रखकर उसे दो से दिन बार झटके के साथ दबाना है, जिससे तुरंत सांस नली में फंसा हुआ खाना बाहर आ जाएगा। इसी तरह चाकू से यदि हाथ कट गया है तो जिस तरफ खून का बहाव होता है उस तरफ हाथ सीधा न करके विपरित दिशा में किया जा जाए तो खून की क्षति को रोका जा सकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सरकारी स्तर पर आपदा प्रबंधन के लिए किए जा रहे प्रयासों से आप कितना संतुष्ट हैं ?</h3>
<p style="text-align:justify;">आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में प्रशिक्षण के लिए अभी देश में बहुत कुछ किया जाना बाकी है, दिल्ली या सूरत या कहीं भी ऐसे हादसे न हों इसके लिए आपदा प्रबंधन के साथ ही बेसिक लाइफ सपोर्ट कोर्स भी कराया जाना चाहिए। ऐसे किसी भी हादसे में क्षति को कम करना और अपनी जान बचाना यह दो काम प्रमुख होते हैं, हालांकि विदेशी में इमारतों का निर्माण इस तरह किया जाता है कि आपात स्थिति में अधिक से अधिक लोगों को आपातकालीन मार्ग से निकाला जा सकता है, इसके लिए कई आधुनिक उपकरणों का प्रयोग किया जा रहा है, जहां वॉटर केनिन नहीं पहुंच सकते वहां वॉटर बॉल या पानी के बड़े गोलों का इस्तेमाल किया जाता है, इसके साथ ही कई ऐसी अग्निरोधक चीजों का प्रयोग आपदा प्रबंधन के लिए किया जा रहा है। इमारतों का नक्शा पास करते हुए इस बात पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए कि इमारत में आपदा से बचाव के पर्याप्त इंतजाम हों, इसके साथ ही सुरक्षा संयंत्र भी मानकों के अनुसार लगाए जाने चाहिए।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आप इस बात को मानती हो, इस क्षेत्र में हमारी तैयारियां अभी भी काफी कमजोर हैं?</h3>
<p style="text-align:justify;">सरकार को आपदा प्रबंधन के प्रति जागरूक मुहिम चलानी चाहिए, जिससे प्रत्येक व्यक्ति आपदा प्रबंधन प्रशिक्षण प्राप्त करें, ताकी समय पड़ने पर किसी की जान बचा सकें, हम अपने प्रशिक्षण शिविर में बेहद सामान्य तरीकों को समझाते हैं, जिससे जरूरत पड़ने पर कोई भी किसी और को भी यह सिखा सकता है। पिछले कई सालों में हमने मेडिकल इमरजेंसी जैसे हृदयघात या सड़क दुर्घटना आदि में इसका प्रयोग अधिक देखा है अब लोग जागरुक हो रहे हैं उन्हें अपने साथ ही दूसरों की जान की परवाह होती है। लेकिन सरकारी एजेंसियों को भी अपना काम जिम्मेदारी से करना होगा, जिससे हादसे ही न हों।</p>
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<p> </p>
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</div>
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</div>
<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 29 Dec 2019 20:53:16 +0530</pubDate>
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                            </item>
            <item>
                <title>बड़ी खोज: इथोपिया में मिली 38 लाख साल पुरानी मानव खोपड़ी</title>
                                    <description><![CDATA[शोधकर्ताओं ने इसको एमआरडी के नाम दिया है। अदीस अबाबा। इथोपिया में पुरातत्वविदों को 38 लाख साल पुरानी एक खोपड़ी का अवशेष मिला है, जो मनुष्य के विकास के बारे में हमारी वर्तमान समझ को बदल सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह किसी छोटे लूसी (प्राचीन मनुष्य की प्रजाति) का अवशेष होगा, जो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/3-8-million-year-old-human-skull-found-in-ethiopia/article-10345"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-08/human-head.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं ने इसको एमआरडी के नाम दिया है।</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>अदीस अबाबा।</strong> इथोपिया में पुरातत्वविदों को 38 लाख साल पुरानी एक खोपड़ी का अवशेष मिला है, जो मनुष्य के विकास के बारे में हमारी वर्तमान समझ को बदल सकता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह किसी छोटे लूसी (प्राचीन मनुष्य की प्रजाति) का अवशेष होगा, जो मानव के विकास के संबंध में अब तक की अवधारणाओं को पूरी तरह बदल सकता है। नेचर नामक पत्रिका में इस खोपड़ी के बारे में विस्तार से बताया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं ने इस खोपड़ी को ‘एमआरडी’ के नाम दिया है। क्लीवलैंड म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री के पुरातत्वविद योहानेस हैले सेलासी ने कहा कि यह खोपड़ी लगभग तीन लाख वर्ष से अधिक पुराने होमीनिड का जीवाश्म है। लंदन के नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम के फ्रेड स्पूर ने कहा कि यह मानव विकास का एक और प्रतीक बनने के लिए तैयार है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">पहले भी मिल चुके हैं अवशेष</h2>
<p style="text-align:justify;">पुरातत्वविदों ने वर्ष 2001 में चाड में टूमई (सहेलंथ्रोपस टेडेंसिस की प्रजाति के जीव) के लगभग सात लाख वर्ष पुराने अवशेष खोजे थे, जिन्हें मानव वंश का पहला प्रतिनिधि माना जाता है। अर्डी (होमीनिड की एक अन्य प्रजाति) 1994 में इथोपिया में पाई गई थी और माना जाता है कि यह लगभग 45 लाख साल पुरानी है और लूसी के अवशेषों को इथोपिया में ही वर्ष 1974 में खोजा गया था, जो लगभग 32 लाख वर्ष पुराने हैं। लूसी को ऑस्ट्रेलोपिथेकस एफरेंसिस भी कहा जाता है। यह सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाला और सबसे अधिक अध्ययन की जाने वाली प्रारंभिक मानव प्रजाति है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">वर्नसो-मिल की साइट से मिले जीवाश्म</h2>
<p style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं ने कहा कि पुरातत्ववेत्ताओं ने जो नई खोपड़ी ‘एमआरडी’ खोजी है, वह ऑस्ट्रेलोपेथेकस एनामेंसिस प्रजाति के जीवों से संबंधित है। फरवरी 2016 में पूवरेत्तर इथोपिया के अफार क्षेत्र में वर्नसो-मिल की एक साइट पर खोदाई के दौरान लूसी के कुछ अवशेष मिले थे। पहली नजर में यह आधुनिक मनुष्यों की खोपड़ी की तरह ही दिखाई देती है। शोधकर्ताओं ने कहा कि ऑस्ट्रेलोपेथेकस के बारे में लोग अभी बहुत ज्यादा नहीं जानते। पुरातत्वविदों को इसका जो जीवाश्म मिला है, वह लगभग 39 लाख साल पुराना है</p>
<h2 style="text-align:justify;">मिलेंगी अहम जानकारियां</h2>
<p style="text-align:justify;">शोधकर्ताओं ने कहा कि इन जीवाश्मों के मिलने से लाखों साल पहले विलुप्त हो चुके होमिनिड्स के बारे में कई अहम जानकारियां मिल सकती है। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि यह खोज मानव विकास के बारे में मौजूद वर्तमान विश्वास को चुनौती दे सकती है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">हजारों वर्षों तक साथ रहे एनामेंसिस और एफरेंसिस</h2>
<p style="text-align:justify;">अध्ययन के सह-लेखक और मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर इवोल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी के स्टेफनी मेलिलो ने कहा कि पहले हमारा अनुमान था कि एनामेंसिस (एमआरडी) समय के साथ धीरे-धीरे एफरेंसिस (लुसी) में बदला होगा, लेकिन होमीनिड के जीवाश्मों के अध्ययन से पता चलता है कि इन दोनों प्रजातियों का अस्तित्व लगभग दस लाख वर्षो तक रहा। इसका मतलब है कि यह मानव विकास की हमारी समझ को बदल कर रख सकता है।</p>
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                                                            <category>विदेश</category>
                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 30 Aug 2019 10:53:23 +0530</pubDate>
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                <title>स्वच्छ पर्यावरण से दूर होता मानव समाज</title>
                                    <description><![CDATA[चिकित्सा जगत की चर्चित पत्रिका ‘द लांसेट’ ने हाल ही में प्रदूषण से संबंधित हैरान करने वाले दो तरह के आंकड़े जारी किये हैं। पत्रिका की पहली रिपोर्ट के मुताबिक, भारत साल 2015 में प्रदूषण से हुई मौतों के मामले में 188 देशों की सूची में पांचवें स्थान पर रहा। इस तरह, 2015 में दुनियाभर […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/human-society-that-is-away-from-clean-environment/article-3481"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/fogg.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">चिकित्सा जगत की चर्चित पत्रिका ‘द लांसेट’ ने हाल ही में प्रदूषण से संबंधित हैरान करने वाले दो तरह के आंकड़े जारी किये हैं। पत्रिका की पहली रिपोर्ट के मुताबिक, भारत साल 2015 में प्रदूषण से हुई मौतों के मामले में 188 देशों की सूची में पांचवें स्थान पर रहा। इस तरह, 2015 में दुनियाभर में प्रदूषण की वजह से हुई नब्बे लाख मौतों में से 25 लाख लोगों की मौत केवल भारत में ही हुई। प्रदूषण की वजह से हुई मौत के ये आंकड़े साल भर में युद्ध, धूम्रपान, भुखमरी, प्राकृतिक आपदा, एड्स, टीबी और मलेरिया से हुई कुल मौतों से कहीं अधिक हैं। वहीं, पत्रिका की दूसरी रिपोर्ट बताती है कि 2015 में 1.24 लाख भारतीयों की असामयिक मौत की वजह, बाह्य नहीं अपितु घरों के भीतर होने वाला प्रदूषण रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">‘द लांसेट काउंटडाउन:ट्रैकिंग प्रोग्रेस आॅन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट ने निम्न आय वर्गीय भारतीय परिवारों की चिंताएं बढ़ा दी हैं, जिनकी निर्भरता आज भी जलावन के लिए ईंधन के परंपरागत साधनों, मसलन लकड़ी और कोयले पर है। जीवाश्म ईंधन, सिगरेट का धुआं और धूल लोगों को धीमी मौत मार रहा है या उन्हें बीमार कर रहा है।वायु में विद्यमान कार्बन मोनोक्साइड, कार्बन डाई-आॅक्साइड, मिथेन, क्लोरो-फ्लोरो कार्बन, सल्फर व नाइट्स आॅक्साइट, ओजोन और विशेषकर पीएम 2.5 (पार्टिकुलेट मैटर) जैसे प्रदूषकों की बढ़ती मात्रा ने वातावरण को जहरीला बना दिया है। इस वजह से लोगों में कैंसर, अस्थमा तथा सांस संबंधी अन्य शिकायतें भी बढ़ती जा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बढ़ते प्रदूषण की वजह से लाखों लोगों के जान गंवाने के बाद हम पर्यावरण सजगता के प्रति गंभीर नहीं हैं। आलम यह है कि, राष्ट्रीय राजधानी से लेकर देश के छोटे-बड़े अन्य शहरों की आबोहवा दूषित होती जा रही है। देश के अधिकांश शहर ‘गैस चैंबर’ बनकर मौत लोगों को खुलेआम मौत बांट रहे हैं। देश के अन्य छोटे-बड़े शहरों में शुद्ध जल और स्वच्छ वायु की प्राप्ति किसी चुनौती से कम नहीं है। शहरीकरण की वजह से जन्मे शहरों में आधुनिक जीवन का चकाचौंध तो है, लेकिन इंसानी जीवनशैली नरक के समान होती जा रही है। पर्यावरण में चमत्कारिक रुप से विद्यमान वायु का प्रदूषित होकर मानव जीवन के लिए खतरनाक साबित होना, पर्यावरणीय सजगता के प्रति हमारी बेफिक्री को बयां करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विडंबना यह है कि पर्यावरण से निरंतर छेड़छाड़ तथा विकास की अनियंत्रित भूख ने आज इंसान को शुद्ध व स्वच्छ पर्यावरण से भी दूर कर दिया है। इस वजह से लोगों की जीवन-प्रत्याशा लगातार घटती ही जा रही है। वर्तमान समय में पर्यावरण विभिन्न समस्याओं से जूझ रही है। हरित-गृह प्रभाव, ग्लोबल वार्मिंग, ओजोन परत क्षय व सभी प्रकार के प्रदूषणों (जल, वायु, भूमि और ध्वनि) ने पर्यावरण को मैला कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सब नतीजा है, प्राकृतिक नियमों को धता बताते हुए हठधर्मी औद्योगिक विकास का। विगत कुछ वर्षों में सततपोषणीय विकास से इतर, एकाधिकारवादी औद्योगिक समाज की स्थापना की तरफ बढ़ते मानव समुदाय के कदमों ने पर्यावरणीय तत्वों को गहरा आघात पहुंचाया है। प्राकृतिक नियमों को अनदेखा कर, लूट की बुनियाद पर औद्योगिक विकास, विनाश के जनन को उत्तरदायी होता है। दुर्भाग्य है कि सबकुछ जानने-समझने के बाद ही हम नादान बने हैं और अपनी गतिविधियों से पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इन दिनों, दिल्ली में प्रदूषण के छाये घने आवरण की खबरों ने सार्वजनिक चिंताएं बढ़ा दी हैं। हालांकि, दिल्ली की आबोहवा में जहर घुलने के पीछे कई कारण उत्तरदायी रहे हैं। अलबत्ता, इसकी शुरूआत तब से ही हो गई थी, जब दिल्ली से सटे कुछ राज्यों में प्रशासनिक आदेशों के बावजूद पराली जलाने की शुरूआत हुई थी। ऐसे में, सवाल उठता है कि धरती पर जीवन के अनुकूल परिस्थितियों के लिए आखिर हमने छोड़ा क्या? हमारे स्वार्थी कर्मों का ही नतीजा है कि हवा, जल, भूमि तथा भोजन, सभी प्रदूषित हो रहे हैं। पौधे हम लगाना नहीं चाहते और जो लगे हैं, उसे कथित विकास के नाम पर काटे जा रहे हैं। ऐसे में हमें धरती पर जीने का कोई नैतिक हक ही नहीं बनता।</p>
<p style="text-align:justify;">हर साल, अक्टूबर और नवंबर माह में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों द्वारा, विशेषकर धान की फसल की कटाई के बाद उसके अवशेषों (पराली) को जलाने का सिलसिला शुरू हो जाता है। नयी फसल की जल्द बुआई करने के चक्कर में किसान पराली को अपने खेतों में ही जला देते हैं। यह क्रम साल दर साल यों ही चलता रहता है। हमारे किसान इस बात से अंजान रहते हैं कि इस आग से, एक ओर जहां पर्यावरण में जहर घुल रहा होता है, वहीं खेतों में मौजूद भूमिगत कृषि-मित्र कीट तथा सूक्ष्म जीवों के मरने से मृदा की उर्वरता घटती है।</p>
<p style="text-align:justify;">जिससे अनाजोत्पादन भी प्रभावित होता है। अमरीकी कृषि वैज्ञानिकों की मानें तो भारत में अन्नो त्पादन में कमी का एक बड़ा कारण वायु प्रदूषण है।वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि यदि भारत वायु प्रदूषण का शिकार न हो, तो अन्न उत्पादन में वर्तमान से 50 प्रतिशत अधिक तक की वृद्धि हो सकती है। पराली जलाने से वायुमंडल में कार्बन डाईआॅक्साइड, कार्बन मोनोआॅक्साइड और मिथेन आदि विषैली गैसों की मात्रा बहुत अधिक बढ़ जाती हैं। पराली का बहुतायत में जलाया जाना, दिल्ली व आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण बढ़ने की प्रमुख वजह बन गई है।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल, एक तरह से देखा जाए, तो देश में पर्यावरण प्रदूषण की चिंता सबको है। पर, ना तो कोई इसके लिए पौधे लगाना चाहता है, ना ही अपनी धुआं उत्सर्जन करने वाली गाड़ी की जगह सार्वजनिक बसों का प्रयोग करना और ना ही उसके स्थान पर साइकिल की सवारी को महत्व देना चाहता है। हमारे यहां प्राय: छठी कक्षा से ही भूगोल की पाठ्यपुस्तकों में पर्यावरण संरक्षण को एक महत्वपूर्ण विषय के रुप में शामिल किया गया है। बावजूद इसके, पर्यावरणीय सजगता की बातें केवल किताबों, अखबारों और सोशल मीडिया तक ही सिमट कर रह गई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, लोगों का एक-दूसरे को उपदेश देने और स्वयं उसके पालन न करने की पारंपरिक आदतों ने आज पर्यावरण को उपेक्षा के गहरे गर्त में धकेल दिया है। पर्यावरण प्रदूषण पर रोकथाम के लिए सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) जैसी संस्थाएं जितनी गंभीर है, उतनी सरकारें नहीं। शुद्ध पेयजल वायु व स्वच्छ पर्यावरण को चुनावी घोषणापत्र का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। पर्यावरण संरक्षण के लिए देश में अनेक स्तरों पर मुहिम चलाए जाने की जरुरत है, अन्यथा ‘औद्योगिक आतंकवाद’ का यह स्वरुप धीरे-धीरे पूरी मानव जाति को ही लील लेगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-सुधीर कुमार</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Nov 2017 00:03:18 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>मानवीय लालच पहुंचा रहा है प्रकृति को नुकसान</title>
                                    <description><![CDATA[वर्तमान में विकास के तथाकथित मॉडल ने पूरी दुनिया को वैश्विक ग्राम का रूप प्रदान तो किया है, किन्तु मानवीय मूल्य, संवेदनाएं, सामाजिक सरोकार और प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति हमारा व्यवहार सब कुछ कहीं खो गया है। तथाकथित विकास के परिणामस्वरूप जन्मी अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय समस्याएं वस्तुत: हमारी वस्तुपरक भोगवादी दृष्टि का […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/human-greed-is-causing-harm-to-nature/article-1103"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/earth-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वर्तमान में विकास के तथाकथित मॉडल ने पूरी दुनिया को वैश्विक ग्राम का रूप प्रदान तो किया है, किन्तु मानवीय मूल्य, संवेदनाएं, सामाजिक सरोकार और प्रकृति एवं पर्यावरण के प्रति हमारा व्यवहार सब कुछ कहीं खो गया है। तथाकथित विकास के परिणामस्वरूप जन्मी अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय समस्याएं वस्तुत: हमारी वस्तुपरक भोगवादी दृष्टि का ही नतीजा है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमने भोगवादी मंडल को अपनाया है और यही हमारे जीवन तथा पर्यावरण के लिए अभिशाप सिद्ध हो रहा है। अपने स्वार्थ के लिए मनुष्य प्राकृतिक वातावरण को लगातार नुक्सान पहुंचाता चला जा रहा है। वैज्ञानिकों द्वार बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद प्रकृति से अधिकतम पदार्थ प्राप्त कर लेने की इच्छा खत्म नहीं हो रही और प्रकृति का दोहन खूब हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने लाभ के लिए मनुष्य द्वारा विकास के नाम पर कई ऐसे अविष्कार भी कर दिए गये, जो जल, जंगल, जमीन में जहर घोल रहे हैं। प्रकृति के उपहारों का ऐसा दुरूपयोग किया कि धरती, आकाश, पाताल जहां से मिल सकता था उसे लेने में कोई कसर बाकी न रखी। वैज्ञानिकों द्वारा बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद प्रकृति से अधिकतम पदार्थ प्राप्त कर लेने की इच्छा खत्म नहीं हो रही।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति का दोहन खूब हो रहा है। प्राकृतिक संसाधनों के निरंतर एवं असीमित दोहन ने दुनियाभर में पर्यावरण के लिए चिंताजनक स्थिति निर्मित कर दी है। अपने लाभ के लिए मनुष्य द्वारा विकास के नाम पर कई ऐसे आविष्कार भी कर दिए गए जो जल, जंगल, जमीन में जहर घोल रहे हैं, जानवरों की मौत का कारण बन रहे है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति के उपहारों का ऐसा दुरूपयोग किया कि धरती, आकाश, पाताल जहां से मिल सकता था, उसे लेने में कोई कसर बाकी न रखी। इस बेहिसाब दोहन का यह नतीजा है कि आज पर्यावरण का संकट पूरी दुनिया पर छा गया है। पर्यावरण संकट के दुष्परिणाम अकाल, बाढ़, भूकम्प, भूस्खलन जैसी आपदाओं के रूप में हमारे सामने आ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पर्यावरण संकट से उत्पन्न प्राकृतिक आपदाओं के कारण होने वाली जन-धन आदि की हानि भी विकास की अंधाधुंध रफ्तार को नहीं रोक पाई है। उपजाऊ जमीन, घने जंगल, अनेक प्रकार के जल स्त्रोत सहित अन्य प्राकृतिक संसाधन विकास की सीमा रेखा को खतरा साबित हो चुके विकास की सीमा रेखा को बहस से सर्वसम्मति तक की प्रक्रिया तय नहीं हो पाई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विकास की कोई सीमा रेखा तय न होने का नतीजा यह है कि आज अधिकांश जल स्त्रोत प्रदूषित होकर समाप्ति की ओर जा रहे हैं। जल संकट साल-दर-साल गहराता जा रहा है। हरी-भरी जमीन जलविहीन होकर रेगिस्तान में बदलने की स्थिति है। हवा में बढ़ता जहरीला धुआं बढ़ते-बढ़ते ओजोन परत को भी नुकसान पहुंचाने की स्थिति निर्मित कर चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज जब बाढ़ आती है, सूखा पड़ता है, तो सभी बिलखने लगते हैं, चीख पुकार मच जाती है, सरकार विरोधी नारे लगने लगते हैं, कुछ भगवान को भी कोसने लगते हैं। मगर किसी ने नहीं सोचा कि ऐसा होता क्यूं है? हमारी अधिकांश समस्याएं वस्तुपरक भोगवादी दृष्टि से ही पैदा हुई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक आंकड़े के मुताबिक, भारत में लगभग 9.7 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी मयस्सर नहीं होता, लेकिन यह आंकड़ा महज शहरी आबादी का है।</p>
<p style="text-align:justify;">ग्रामीण इलाकों की बात करें, तो वहां 70 फीसदी लोग अब भी प्रदूषित पानी पीने को ही मजबूर हैं। एक मोटे अनुमान के मुताबिक, पीने के पानी की कमी के चलते देश में हर साल लगभग छह लोग पेट और संक्रमण की विभिन्न बीमारियों की चपेट में आकर दम तोड़ देते हैं। अब जब 2028 तक आबादी के मामले में चीन को पछाड़ कर देश के पहले स्थान पर पहुंचने की बात कही जा रही है, यह समस्या और भयावह हो सकती है। एक और तो गांवों में साफ पानी नहीं मिलता तो दूसरी ओर, महानगरों में वितरण की कामियों के चलते रोजाना लाखों गैलन साफ पानी बर्बाद हो जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">कहने को तो भारत नदियों का देश है, लेकिन विडंबना यह है कि 70 प्रतिशत नदियां जानलेवा स्तर तक प्रदूषित हैं। भारत की कई नदियां जैविक लिहाज से मर चुकी हैं। इसका असर पर्यावरण के साथ लोगों पर भी पड़ रहा है। कई नदियों का अस्तित्व बचाना मुश्किल हो रहा है। देशभर में प्रदूषण की चपेट में करीब 150 नदियों में गंगा और यमुना नदी दुनिया की दस गंदी नदियों में भी शुमार हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">देश के 27 राज्यों में 150 नदियां ऐसी हैं, जो प्रदूषण की चपेट में हैं, इनमें सबसे ज्यादा 28 नदियां महाराष्टÑ राज्य में हैं, तो विकास की मिसाल कायम कर रहे गुजरात की 19 नदियों का भी प्रदूषण के कारण हाल बुरा है। राज्यवार प्रदूषित नदियों की बात की जाए, तो उत्तर प्रदेश तीसरे पायदान है, जहां 12 प्रदूषित नदियां समस्या बनी हुई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी प्रकार कर्नाटक में 11 के अलावा मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में 9-9 नदियां ऐसी हैं, जो प्रदूषण की चपेट में हैं। वहीं राजस्थान की पांच और झारखंड, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की भी तीन-तीन नदियां प्रदूषित नदियों की सूची में शामिल हैं। राष्टÑीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली से गुजरने वाली एकमात्र यमुना नदी का प्रदूषण तो अरसे से सुर्खिंयों में बना हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के वन क्षेत्र पर स्थिति रिपोर्ट 2015 के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर, महाराष्टÑ, केरल, कर्नाटक, उत्तराखंड, अरुणाचल प्रदेश, तेलंगाना में जंगल तेजी से घटे हैं। पूरे भारत की बात करें, तो 19वीं एवं 20वीं शताब्दी में देश में केवल 12 बार सूखा पड़ा, यानी 16 वर्ष में एक बार सूखा पड़ा। लेकिन 1968 के बाद से सूखे की तादाद में वृद्धि आई। जंगलों की अंधाधुंध कटाई पर्यावरणविद् ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण बताया जा रहा है। मानवीय लालच ने वनों की विनाश लीला का काला अध्याय लिखा है।</p>
<p style="text-align:justify;">धरती का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है, जिसके चलते प्रकृति में अनेक नुकसानदेह परिवर्तन हो रहे हैं। कुल मिलाकर देखें, तो बढ़ती गर्मी के लिये कहीं न कहीं मानव जाति ही कसूरवार है।</p>
<p style="text-align:justify;">विकास की दौड़ में सरपट भागते इंसानों ने कार्बन उत्सर्जन, पेड़ों की कटाई, प्रकृति से खिलवाड़ करते वैश्विक तापमान में जो बढ़ोतरी की है, उसका ही दुष्परिणाम अब प्रतिवर्ष बढ़ती हुई गर्मी एवं तापमान के रूप में सामने आ रहा है। आंकड़ों की बात की जाए, तो पिछले डेढ़ दशक में देश में हर वर्ष औसतन तापमान में बढ़ोतरी रिकॉर्ड की जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्ष 2015 में भारत का वार्षिक तापमान औसत से 0.67 डिग्री ज्यादा था, जोकि 1901 के बाद से अब तक तीसरा सबसे ज्यादा गर्म साल रहा। गौरतलब है कि पिछली एक शताब्दी के दौरान देश के अन्य 9 सबसे गर्म वर्षों में 2009, 2010, 2003, 2002, 2014, 1998, 2006 और 2007 है। खास बात यह है कि पिछले 15 वर्षों 2000 से 2015 के दौरान ही रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रतिवर्ष तापमान बढ़ने की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। पिछले वर्ष जानलेवा गर्मी ने ढाई हजार लोगों को मौत की नींद सुला दिया था। ऐसे हालात में यह जरूरी हो गया है कि विकास को इस प्रकार सीमित व व्यवस्थित बनाया जाए कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कायम रह सके।</p>
<p style="text-align:justify;">विकास की प्रक्रिया को इस प्रकार निर्धारित किया जाए कि उससे प्राकृतिक संसाधनों पर विपरीत प्रभाव न हो। यदि विकास के साथ-साथ पर्यावरण की भी गंभीरता से चिंता की जाए तो बिगड़ती प्राकृतिक स्थिति पर कुछ रोक लगाना संभव है। मत भूलिये की प्राकृतिक संसाधन इंसान की आवश्यकतों की पूर्ति तो कर सकता है, किन्तु उसकी लालच की पूर्ति नहीं कर सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">–<strong> आशीष वशिष्ठ</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                <pubDate>Sat, 10 Jun 2017 23:09:48 +0530</pubDate>
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