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                <title>Artical on Health - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Health : स्वास्थ्य पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों का हमला</title>
                                    <description><![CDATA[बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खाद्य पदार्थ एवं डिब्बाबन्द उत्पादों के सेहत (Health) पर पड़ने वाले घातक प्रभावों पर दशकों से विमर्श होता रहा है, लेकिन जैसे-जैसे मर्ज की दवा की रोग बढ़ता गया, वाली स्थिति देखने को मिल रही है। अब जाकर विभिन्न शोधों के निष्कर्षों के आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने खाद्य पदार्थों व […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/attack-of-multinational-companies-on-health/article-49644"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/health.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खाद्य पदार्थ एवं डिब्बाबन्द उत्पादों के सेहत (Health) पर पड़ने वाले घातक प्रभावों पर दशकों से विमर्श होता रहा है, लेकिन जैसे-जैसे मर्ज की दवा की रोग बढ़ता गया, वाली स्थिति देखने को मिल रही है। अब जाकर विभिन्न शोधों के निष्कर्षों के आधार पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने खाद्य पदार्थों व पेय पदार्थों में मिलाए जाने वाली कृत्रिम मिठास को कैंसर को बढ़ाने वाला कारक माना है। बात केवल कृत्रिम मिठास की नहीं है, तरह-तरह से भारतीय भोजन के स्वास्थ्यवर्द्धक कारणों को कुचलने एवं स्वास्थ्य पर हो रहे जानलेवा हमलों की भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने हाल ही में अपने एक अध्ययन में बताया कि (Multinational Companies) बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा बेची जाने वाली कुछ स्वादिष्ट खाद्य सामग्रियों में स्वास्थ्य के लिए हानिकारक तत्व हैं। इसकी तीखी प्रतिक्रिया हुई। चाय और भुजिया, कोल्ड ड्रिंक्स और समोसा और नान का मजा लेने वाले भारतीयों में बहस छिड़ गई है कि आखिर यह कैसे नुकसानदेह साबित हो सकता है। भारत में नेस्ले कम्पनी द्वारा बनाई जाने वाली मैगी पर गुणवत्ता को लेकर उठे सवाल भी हैरान करने वाले हैं। Artical Hindi</p>
<p style="text-align:justify;">मिलावट वाले खाद्य पदार्थ एवं डिब्बाबन्द उत्पादों के बढ़ते प्रचलन से देश के लोगों का स्वास्थ्य दांव पर लगा है, लेकिन उन पर नियंत्रण की कोई स्थिति बनती हुई नहीं दिख रही है। विदेशी पूंजी एवं रोजगार की आड़ लेकर इन कम्पनियों की आर्थिक महत्वाकांक्षाओं, गलत हरकतों एवं स्वास्थ्य को चौपट करने वाली स्थितियों को किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। देश में गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थ ही लोगों के स्वास्थ्य की रक्षा कर सकते हैं, इसके लिये सख्त कानून के साथ ही राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखानी होगी। Multinational Companies</p>
<p style="text-align:justify;">बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खाद्य उत्पादों से अस्वास्थ्य एक व्यापक समस्या बन गई है। शिक्षित-अशिक्षित, गरीब-अमीर, स़्त्री-पुरुष, युवा-प्रौढ़ सभी इन उत्पादों के आदी होकर परेशान हैं। इनके अधिक सेवन के कारण सबको किसी-न-किसी बीमारी की शिकायत है। चारों ओर बीमारियों का दुर्भेद्य घेरा है। निरन्तर बढ़ती हुई बीमारियों का प्रमुख कारण बहुराष्ट्रीय कंपनियों के खाद्य उत्पादों का भारतीय भोजन में शामिल होना है। इन बीमारियों को रोकने के लिये नई-नई चिकित्सा पद्धतियां एवं आविष्कार असफल हो रहे हैं। जैसे-जैसे विज्ञान रोग प्रतिरोधक औषधियों का निर्माण करता है, वैसे-वैसे बीमारियां नये रूप, नये नाम और नये परिवेश में प्रस्तुत हो रही हैं, इन बढ़ती हुई बीमारियों का कारण जंक फूड, डिब्बा बन्द उत्पाद एवं कृत्रिम मिठास है। जांच एजेंसियों की लापरवाही, संसाधनों के अभाव, भ्रष्टाचार, केन्द्र-राज्य सहयोग का अभाव और लचर दंड-व्यवस्था का खामियाजा उपभोक्ताओं को अपने स्वास्थ्य को खतरे में डालकर चुकाना पड़ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया में बहुराष्ट्रीय शीतल पेय कंपनियों के पेय, सोडा, च्यूइंग गम आदि पदार्थों में कृत्रिम मिठास का धड़ल्ले से प्रयोग किया जाता है। दरअसल, मनुष्य पर कैंसरकारक असर के बाबत अंतर्राष्ट्रीय एजेंसी आईएआरसी और विश्व स्वास्थ्य संगठन के कैंसर अनुसंधान प्रभाग के अध्ययन का हवाला दिया गया है। निस्संदेह, इन निष्कर्षों ने दुनियाभर के उपभोक्ताओं की चिंताओं को बढ़ा दिया है, जो लंबे समय से इन उत्पादों के सेवन को लेकर दुविधा में थे। विशेषज्ञों ने उस पुरानी दलील को तरजीह नहीं दी कि एक सीमित मात्रा में कृत्रिम मिठास से बने उत्पाद घातक नहीं होते और इनका उपयोग किया जा सकता है। निश्चित ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अपने मुनाफे के लिये लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ कर रही है, बावजूद इसके दुनिया के शक्तिशाली देशों में प्रभावी इन कंपनियों के खिलाफ कोई भी बात नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती थी। भारत में भी ऐसी कम्पनियां तेजी से पांव पसार रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय परिवारों में इंस्टैंट नूडल्स, आलू की चिप्स, कोल्ड ड्रिंक्स ने कहर बरपाया है, ये तमाम खाद्य एवं पेय उत्पाद भले ही जायकेदार होते हैं लेकिन इनका सेवन स्वास्थ्य को चौपट कर रहा है। इनका प्रचलन बढ़ता जा रहा है, आखिर क्यों न बढ़े, हमारे तमाम बड़े सुपरस्टार्स उनका विज्ञापन जो करते हैं। आखिर, कोई ऐसा उत्पाद हानिकारक कैसे हो सकता है, जिसके विज्ञापन में किसी प्यारे-से बच्चे की आवाज सुनाई देती हो या जिनमें ‘अपने ग्रैंडपैरेंट्स से प्यार करो’ ‘कुछ मीठा हो जाए’ जैसे विज्ञापन जन्मदिन से लेकर शादी तक हर अवसर के लिये पसरे हैं, जो भावनात्मक मूल्यों से खिलवाड़ करते हैं। यदि हम इन विज्ञापनों पर भरोसा करें तो पाएंगे कि कैडबरी, चिप्स और कोला का सेवन करने वाले लोग साधारण लोगों की तुलना में ज्यादा प्रेमपूर्ण, सभ्य, आधुनिक व संवेदनशील होते हैं और बर्गर और पिज्जा के कारण आप बेहतर दोस्त साबित हो सकते हैं। तो आखिर माजरा क्या है? कैडबरी ने तो भारतीय देशी मिठाइयों के भविष्य को ही धुंधला दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वास्थ्य स्थितियां बेहद चिंताजनक हैं। भारतीय मध्यम वर्ग की डाइट बद से बदतर होती जा रही है। जैसे-जैसे मध्यम वर्ग की आमदनी और व्ययशीलता बढ़ती जा रही है, उसे अपने शरीर में कैलोरीज की मात्रा बढ़ाने के और मौके मिल रहे हैं। यूं भी भारतीय परंपरागत रूप से भोजनप्रेमी होते हैं। ऐसे में अगर जायकेदार लेकिन सस्ते खाद्य पदार्थ आसानी से मुहैया हों तो क्या कहने। भले ही यह जायका जहरीला हो। इसी में जागरूकता की कमी और अनैतिक विज्ञापन संस्कृति को भी जोड़ लें तो हम पाएंगे कि हम भयावह स्थिति की ओर बढ़े चले जा रहे हैं। यह जांचने के लिए हमें किसी लैबोरेटरी स्टडी की जरूरत नहीं है कि हम जो खा रहे हैं, उनमें से कुछ चीजें हमारी सेहत के लिए वाकई नुकसानदेह हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">एक ज्यूस ब्रांड ऐसा आमरस बेचता है, जिसके हर गिलास में आठ चम्मच शकर हो सकती है। इंस्टैंट नूडल्स का एक पैक अशुद्ध और अपरिष्कृत स्टार्च से बढ़कर कुछ नहीं होता। बच्चों को दूध के साथ पिलाए जाने वाले जौ निर्मित तथाकथित पोषक आहार शकर से भरे होते हैं। नाश्ते में जो महंगे खाद्य पदार्थ लिए जाते हैं, उनकी हेल्थ वैल्यू एक मामूली रोटी जितनी भी नहीं होती। तली हुई आलू की चिप्सें और पेटीज बर्गर निश्चित ही सेहतमंद चीजें नहीं हैं। इसके बावजूद इन उत्पादों के निमार्ता ब्रांड टीवी पर विज्ञापन के लिए करोड़ों रुपए खर्च करते हैं ताकि हमारे मन में इन उत्पादों के प्रति चाह जगाई जा सके।</p>
<p style="text-align:justify;">इन उत्पादों के कारण हमारा वजन बढ़ रहा है, तनाव एवं अवसाद में जी रहे हैं, मधुमेह के रोगी चरम पर पहुंच रहे हैं, हृदयरोग के आंकडेÞ भी इन खाद्य पदार्थों के बढ़ते प्रचलन के कारण चौंकाने वाले हैं। निश्चित रूप से पूरी दुनिया में घातक कृत्रिम मिठास, डिब्बा बन्द उत्पाद एवं जंक फूड के दुष्प्रभावों को लेकर नये सिरे से बहस का आगाज होगा। सवाल केवल बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों का ही नहीं है, जिन मिठाइयों और नमकीन को हम अपनी परंपरागत विरासत का एक हिस्सा समझते हैं, घरों और रेस्तरांओं में जिस तरह का फॉस्ट फूड परोसा जाता है, रेलवे स्टेशनों पर जिस तरह के समोसे और पकौड़े बेचे जाते हैं, वे सभी हमारे लिए नुकसानदेह हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन न तो सरकार, न ये कंपनियां और न ही हम इसे लेकर चिंतित हैं। हो सकता है आने वाले कुछ सालों में हमें इसकी कीमत चुकानी पड़े। आज हम जिस समृद्धि पर गर्व करते हैं, वही हमारे लिए महंगा सौदा साबित हो सकती है। जिन लोगों के पास खाने को कुछ नहीं है, वे भोजन को बुनियादी जरूरत मानते हैं, लेकिन जिनके सामने भरण-पोषण की कोई समस्या नहीं है, वे इसे आनंद का एक और माध्यम मानते हैं। अलबत्ता अति हर चीज की बुरी है। हमें बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर लगाम कसने की जरूरत है, क्योंकि लगता नहीं कि वे अपने उत्पादों में पौष्टिकता परोसती हैं या विज्ञापनों में किसी तरह की नैतिकता का निर्वाह करती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि वे कोई ऐसी चीज बेच रही हैं, जिसके दीर्घकालिक परिणाम घातक हो सकते हैं तो उन्हें इसका खुलासा करना चाहिए। जंक बेचने वाली कंपनियों से हमारे बच्चों की रक्षा की जानी चाहिए। विज्ञापनों को नियम-कायदों के दायरे में लाया जाना चाहिए। भोजन में जहर परोसने वाले देश के लोगों के लिये एक बड़ा खतरा है, इस खतरे से लोगों को बचाने के लिये महज व्यावसायिक या व्यवस्थागत समस्या मान कर समाधान करना उचित नहीं है, बल्कि कठोर एवं निष्पक्ष कानून व्यवस्था बननी चाहिए। बहरहाल, इस मुद्दे को दुनिया में नया विमर्श मिलना तय है। जन स्वास्थ्य की दृष्टि से यह कदम जरूरी भी है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Tomato Price Hike : टमाटर के बढ़ते दाम और गड़बड़ाता मौसम" href="http://10.0.0.122:1245/rising-prices-of-tomatoes-and-bad-weather/">Tomato Price Hike : टमाटर के बढ़ते दाम और गड़बड़ाता मौसम</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                                            <category>स्वास्थ्य</category>
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                <pubDate>Thu, 06 Jul 2023 10:52:25 +0530</pubDate>
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                <title>सेहत की बदहाली बता रही सच्चाई</title>
                                    <description><![CDATA[भारत संयुक्त राष्ट्र की एक रपट में यह जानकारी दी गई है कि (ill health) प्रसव एवं उसके पश्चात जच्चा-बच्चा की मौतों के मामले में जिन देशों की स्थिति बहुत नकारात्मक पाई गई है, उसमें भारत की तस्वीर सबसे खराब है। भारत में प्रसव के दौरान महिलाओं, मृत शिशुओं के जन्म और नवजात शिशुओं की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/ill-health-telling-the-truth/article-47715"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/aritcal.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत संयुक्त राष्ट्र की एक रपट में यह जानकारी दी गई है कि (ill health) प्रसव एवं उसके पश्चात जच्चा-बच्चा की मौतों के मामले में जिन देशों की स्थिति बहुत नकारात्मक पाई गई है, उसमें भारत की तस्वीर सबसे खराब है। भारत में प्रसव के दौरान महिलाओं, मृत शिशुओं के जन्म और नवजात शिशुओं की मौत के मामले सबसे ज्यादा हैं। सन् 2020-2021 में दुनिया के अलग-अलग देशों में तेईस लाख नवजात शिशुओं की मौत हो गई, जिनमें से भारत में मरने वालों की संख्या सात लाख अठासी हजार रही है। यह चिन्ताजनक स्थिति भारत का एक कड़वा सच है लेकिन एक शर्मनाक सच भी है और इस शर्म से उबरना जरूरी है। सवाल है कि विकास के ढांचे में शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को लेकर हमारी प्राथमिकताएं क्या हैं? सवाल यह भी है कि जिस दौर में केंद्र सरकार स्वास्थ्य को लेकर सबसे ज्यादा संवेदनशील होने और प्राथमिकता में सबसे ऊपर मानकर काम करने का दावा कर रही है, उसमें आज भी प्रसव के दौरान महिलाओं और नवजात की मौत के मामले क्यों अधिक हैं?</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Sirsa Nia Raid: सरसा में देखिये एनआईए ने मारी किसके घर रेड" href="http://10.0.0.122:1245/sirsa-nia-raid-news/">Sirsa Nia Raid: सरसा में देखिये एनआईए ने मारी किसके घर रेड</a></p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, जच्चा-बच्चा मौतों को लेकर यह दुखद एवं त्रासद तस्वीर नई नहीं है। (ill health) लंबे समय से यह विडंबना एक तरह से स्थिर और कायम है कि प्रसव के दौरान महिलाओं या नवजात की जान चली जाती है। चिकित्सा सुविधाओं का दायरा फिलहाल इतना है कि उस तक बहुत सारे जरूरतमंद परिवारों की पहुंच नहीं है या फिर वहां बुनियादी सुविधाओं की कमी है। सरकार की योजनाओं एवं समुचित बजट में प्रावधान के बावजूद उसकी असरकारी तस्वीर सामने न आने का बड़ा भ्रष्टाचार भी है। कहीं-ना-कहीं हमारे विकास के मॉडल में खामी है। ऐसा लगता है कि हमारे यहां विकास के लुभावने स्वरूप को मुख्यधारा की राजनीति का मुद्दा बनाने एवं चुनाव में वोट हासिल करने में तो कामयाबी मिली है, लेकिन इसके बुनियादी पहलुओं को केंद्र में रखकर जरूरी कदम नहीं उठाए गए या उन पर अमल नहीं किया गया। यह बेवजह नहीं है कि नेपाल, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देश भी इस मामले में हमसे बेहतर स्थिति में पहुंच गए, जो अपनी बहुत सारी बुनियादी जरूरतों तक के लिए आमतौर पर भारत या दूसरे देशों पर निर्भर रहते हैं।</p>
<h3>दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कुपोषित आबादी भारत में है (ill health)</h3>
<p style="text-align:justify;">साफ है कि हमारी प्रगति की तस्वीर काफी विसंगतिपूर्ण है और ताजा (ill health) रिपोर्ट भारत की एक बड़ी जनसंख्या की बदहाली का अकेला सबूत नहीं है। खुद देश में सरकार एवं अन्य एजेन्सियों की तरफ से कराए गए सर्वेक्षण और कई दूसरे अध्ययनों के जरिए कंगाली, भुखमरी और कुपोषण के दहलाने वाले आंकड़े समय-समय पर विकास की शर्मनाक तस्वीर प्रस्तुत करते रहे हैं। एक बड़े तबके के बीच महिलाओं को गर्भधारण के बाद जिन पोषक तत्वों की जरूरत होती है, कई कारणों से उससे वे वंचित होती हैं। इसका सीधा असर उनकी सेहत, शारीरिक क्षमता और प्रसव पर पड़ता है, जिसमें कई बार प्रसव के समय महिला की जान चली जाती है या बच्चा इतना कमजोर पैदा होता है कि उसे बचाया नहीं जा पाता। यह स्थिति तब है जब महिलाओं की सेहत और प्रजनन स्वास्थ्य को लेकर सरकारों की ओर से अनेक तरह की योजनाओं और कार्यक्रमों का संचालन हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि सुरक्षित प्रसव के लिए प्रसूता महिलाओं को अस्पतालों में सुविधाएं (ill health) और नगदी सहायता मुहैया कराई जाती है। 2005 से लागू जननी सुरक्षा योजना की शुरूआत ही गर्भवती महिलाओं और नवजात की सेहत में सुधार लाने के मकसद से हुई थी। इसके तहत कई राज्यों में गर्भवती महिलाओं के खाते में छह हजार रुपए दिए जाते हैं, ताकि जच्चा-बच्चा को जरूरी पोषण मिल सके। एक तरफ भारत खाद्यान्न के मामले में न केवल आत्मनिर्भर हैं, बल्कि अनाज का एक बड़ा हिस्सा निर्यात करते हैं। वहीं दूसरी ओर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी कुपोषित आबादी भारत में है। भारत में महिलाओं की पचास फीसदी से अधिक आबादी एनीमिया यानी खून की कमी से पीड़ित है। इसलिए ऐसे हालात में जन्म लेने वाले बच्चों का कम वजन होना लाजिमी है। राइट टु फूड कैंपेन नामक संस्था का विश्लेषण है कि पोषण गुणवत्ता में काफी कमी आई है।</p>
<h3>भारत की विशाल आबादी एक चुनौती</h3>
<p style="text-align:justify;">केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार मंत्रालय ने जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम की शुरूआत की और इसके दो साल बाद इसके तहत दी जाने वाली सुविधाओं का विस्तार हुआ और उसमें जन्म के बाद नवजात के पोषण और इलाज की सहूलियत भी शामिल की गई। कायदे से अनेक योजनाओं और कार्यक्रमों के बाद जच्चा-बच्चा की मौतों के मामले में स्थिति में सुधार आना चाहिए था। मगर आखिर ऐसा क्यों है कि तमाम प्रयासों के बावजूद प्रसव के दौरान महिलाओं और नवजातों की मौत का सिलसिला आज भी कायम है। समूचे देश में स्वास्थ्य को प्राथमिकता दिए जाने के दावे के दौर में यह तस्वीर एक तरह से आईना दिखाती है कि जमीनी स्तर पर हकीकत क्या है और अभी कितना कुछ किया जाना बाकी है। रिपोर्टें बताती हैं कि ऐसी गंभीर समस्याओं से लड़ते हुए हम कहां से कहां पहुंचे है। इसी में एक बड़ा सवाल यह भी निकलता है कि जिन लक्ष्यों को लेकर भारत अपने प्रयासों के दावे कर रहा है, उनकी कामयाबी कितनी नगण्य एवं निराशाजनक है। कुपोषण, गरीबी, भूख में सीधा रिश्ता है और भारत की विशाल आबादी इसके लिये एक चुनौती बनी हुई है।</p>
<p style="text-align:justify;">गर्भावस्था के दौरान महिलाओं के जीवन में अनेक वित्तीय, सामाजिक और स्वास्थ्य विषयक दुष्प्रभाव देखने को मिलते हैं, वैज्ञानिक तथ्य यह है कि कम उम्र में लड़कियों का विवाह कर देने और फिर उनके मां बन जाने का सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। वे जीवन भर शारीरिक रूप से कमजोर और बीमारियों से घिरी रहती हैं। वे स्वस्थ बच्चों को जन्म नहीं दे पातीं। कम उम्र में ही उनकी मौत हो जाती है। शिशु और मातृ मृत्यु दर पर काबू पाना इसी वजह से चुनौती बना हुआ है। भूखे या अधपेट रह जाने वाली जनसंख्या में दुनिया में हुए इस इजाफे में तीन करोड़ लोग केवल भारत के हैं। इसमें पीने के पानी, कम से कम माध्यमिक स्तर तक शिक्षा और बुनियादी चिकित्सा सुविधाओं के अभाव को जोड़ लें तो हम देख सकते हैं कि भारत आजादी के अमृत काल में भी असल में वंचितों की दुनिया है।</p>
<h3>आम नागरिकों का स्वास्थ्य वहां के विकास की सचाई बयां करता है</h3>
<p style="text-align:justify;">आत्मनिर्भर भारत एवं सशक्त भारत के निर्माण के लिये हमें अपनी विकास योजनाओं को नए सिरे से गढ़ना होगा, जिनमें स्वास्थ्य और शिक्षा के मद में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का एक निश्चित प्रतिशत आवंटन अनिवार्य होना चाहिए। किसी भी देश में आम नागरिकों का स्वास्थ्य वहां के विकास की सचाई को बयां करता है। लोगों की सेहत की स्थिति इस बात पर निर्भर है कि उन्हें भरपेट, उचित चिकित्सा सुविधाएं, शिक्षा और संतुलित भोजन मिले। इस लिहाज से देखें तो विकास और अर्थव्यवस्था की रफ्तार बढ़ने के तमाम दावों के बीच भारत में अपेक्षित प्रगति संभव नहीं हो सकी है। गौरतलब है कि प्रसव एवं उसके पश्चात जच्चा-बच्चा की मौतों के मामले में भारत की स्थिति काफी दुखद, त्रासदीपूर्ण एवं चिंताजनक है। यह कैसा विकास है? यह कैसे आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर होते कदम है? भूख, कुपोषण, अभाव, अशिक्षा, अस्वास्थ्य, बेरोजगारी की त्रासदी को जी रहा देश कैसे विकसित राष्ट्रों में शुमार होगा, कैसे विश्व की बड़ी आर्थिक ताकत बनेगा?</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (ये लेखक के निजी विचार हैं।)</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
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                <pubDate>Wed, 17 May 2023 10:01:36 +0530</pubDate>
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