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                <title>Artical Hindi - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>सतलुज-यमुना लिंक नहर मामला : सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अहम बिंदु</title>
                                    <description><![CDATA[Sutlej-Yamuna Link: सतलुज-यमुना लिंक नहर मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सख्त रुख अपनाते हुए पंजाब सरकार (Punjab Government) को नहर का सर्वे कराने का आदेश दिया है। दशकों से चल रहे इस मामले में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने इतना सख्त रवैया अपनाया है। कोर्ट ने पंजाब सरकार से इस मामले में राजनीति […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/sutlej-yamuna-link-canal-case-important-points-of-supreme-court-order/article-53324"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-10/supreme-court.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Sutlej-Yamuna Link: सतलुज-यमुना लिंक नहर मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सख्त रुख अपनाते हुए पंजाब सरकार (Punjab Government) को नहर का सर्वे कराने का आदेश दिया है। दशकों से चल रहे इस मामले में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने इतना सख्त रवैया अपनाया है। कोर्ट ने पंजाब सरकार से इस मामले में राजनीति नहीं करने को कहा है। इस सख्ती से यह भी साबित हो गया है कि कोर्ट ने समझ लिया है कि यह मामला पंजाब और हरियाणा के बीच आपसी बातचीत से नहीं सुलझ सकता। केंद्र को इसमें सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। इन आदेशों से हरियाणा को बड़ी राहत मिली है। कोर्ट के आदेश का केवल एक ही बिंदु पंजाब के पक्ष में नजर आता है, जो पंजाब की दलीलों से काफी मेल खा रहा है। Sutlej-Yamuna Link</p>
<p style="text-align:justify;">कोर्ट ने कहा है कि पंजाब में पानी की उपलब्धता कितनी है, इसकी भी रिपोर्ट दी जाए। अदालत में पंजाब की मुख्य दलील यही रही है कि उसके पास जरूरत से ज्यादा पानी नहीं है तो फिर दूसरे राज्यों को पानी कैसे दिया जाए। अदालत के आदेश का बिंदु पंजाब के लिए लाभदायक साबित हो सकता, बशर्ते बदल रही परिस्थितियों में पानी की उपलब्धता चिंताजनक हो। यह बात वास्तव में वजनदार है कि आज स्थिति वैसी नहीं है जैसी 50 साल पहले थी, आबादी बहुत बढ़ गई है, पानी की घरेलू खपत के साथ-साथ पानी की बबार्दी भी बढ़ गई है। पानी का उपयोग केवल घरेलू उपयोग के लिए नहीं हो रहा, वाहनों को धोने के लिए भी धड़ल्ले से हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">वाहनों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। जहां तक पंजाब-हरियाणा का संबंध है, दोनों राज्यों में अधिक पानी की खपत वाली फसलें बोने का चलन है, दोनों राज्य धान का रकबा कम करने में विफल रहे हैं और पानी की मांग बढ़ती जा रही है। इसी प्रकार, वर्षा की कमी के कारण नदियों का जल स्तर सामान्य दिनों में अच्छा नहीं रहा। भूमिगत जल का उपयोग लगातार बढ़ रहा है और बड़ी संख्या में ब्लॉकों को ब्लैक जोन घोषित किया जा चुका है। इन परिस्थितियों में नदियों में पानी की उपलब्धता की कमी भी एक नया मुद्दा बन जाएगा। किस राज्य को कितना पानी दिया जाएगा, यह एक नया मुद्दा होगा जिसके लिए पानी की जरूरतों का वर्गीकरण और उसका महत्व जैसे बिंदु चर्चा का विषय बनेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में राजनीतिक कारणों के चलते यह भुगौलिक व प्राकृतिक महत्व वाला विषय भावनात्मक बन चुका है। जल वितरण के सिद्धांतों को प्राकृतिक सिद्धांतों, स्थानीय हितों और राष्ट्रीय हितों के संबंध में तय करना होगा। पंजाब को बाढ़ के रूप में नुकसान भी उठाना पड़ता है। सवाल यह भी उठता है कि क्या जल प्राप्त करने वाले राज्य नुकसान की भरपाई में हिस्सा लेंगे? इस संवेदनशील मुद्दे पर दोनों राज्यों को सद्भाव और मानवता की भावना से पानी बचाने पर बल देने के लिए आधुनिक और वैज्ञानिक तरीकों तथा कृषि तकनीक पर जोर देना चाहिए। पानी की मांग में गिरावट दर्ज करनी होगी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Indian Railways: रामेश्वरम से फिरोजपुर तक वाया हनुमानगढ़ ट्रेन शुरू" href="http://10.0.0.122:1245/rameshwaram-to-firozpur-via-hanumangarh-train-started/">Indian Railways: रामेश्वरम से फिरोजपुर तक वाया हनुमानगढ़ ट्रेन शुरू</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 06 Oct 2023 16:31:51 +0530</pubDate>
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                <title>One Nation, One Election: एक राष्ट्र, एक चुनाव और चुनौतियाँ</title>
                                    <description><![CDATA[One Nation, One Election: लोकसभा और राज्य की विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने का मामला लम्बे समय से बहस में है मगर अब इस पर कुछ कदम उठाए जा रहे हैं। विदित हो कि स्वस्थ एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला होती हैं और भारत में निष्पक्ष चुनाव हमेशा चुनौती रही है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/one-nation-one-election-and-challenges/article-52493"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/one-nation-one-election-1.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">One Nation, One Election: लोकसभा और राज्य की विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने का मामला लम्बे समय से बहस में है मगर अब इस पर कुछ कदम उठाए जा रहे हैं। विदित हो कि स्वस्थ एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला होती हैं और भारत में निष्पक्ष चुनाव हमेशा चुनौती रही है। पड़ताल बताती है कि हर साल भारत में किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। मौजूदा समय में देखें तो लोकसभा के साथ आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, सिक्किम और अरूणाचल प्रदेश के विधानसभा के चुनाव सम्पन्न कराए जाते जबकि 28 राज्यों में 23 राज्य और 2 केन्द्र शासित प्रदेश पुदुचेरी और दिल्ली के चुनाव अलग-अलग समय में होते हैं। One Nation, One Election</p>
<p style="text-align:justify;">खास यह भी है कि लोकसभा चुनाव के 6 महीने पहले छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना का चुनाव होता है जो कि साल 2023 में होने जा रहा है और साल 2024 के अप्रैल-मई में लोकसभा का चुनाव होगा। इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव के 6 महीने बाद महाराष्ट्र और हरियाणा का चुनाव होता है यदि इन राज्यों को लोकसभा के साथ जोड़कर चुनाव कराया जाए तब भी कम से कम ये छह राज्य एक चुनाव में आ सकते हैं और 5 पहले से हैं तो ऐसे में 11 राज्य लोकसभा के साथ चुनाव कराने में संवैधानिक कोई दिक्कत दिखती नहीं है। बस कुछ की विधानसभा पहले भंग करनी है, कुछ के लिए कुछ पेचीदगियों से निपटना है। One Nation, One Election</p>
<p style="text-align:justify;">देखा जाए तो अलग-अलग समय में चुनाव होना मतलब लोकसभा का एक बार जबकि विधानसभा का हर साल कोई न कोई चुनव रहता है। नतीजन मानव संसाधन और खजाना दोनों दबाव से गुजरते रहते हैं साथ ही चुनाव आयोग के लिए आदर्श चुनाव आचार संहिता भी चुनौती लिए रहती है। कहा जाए तो देश हमेशा चुनावी मोड में रहता है फलस्वरूप प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय भी निरंतरता लिए रहते हैं, प्रभावित भी होते हैं और खजाने पर भी भारी बोझ पड़ता है। इन्हीं सब कारणों के चलते लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ कराने का इरादा मजबूत होता दिख रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बीते एक सितम्बर को मोदी सरकार ने वन नेशन, वन इलेक्शन को लेकर एक कदम और तब बढ़ा दिया जब विधि मंत्रालय ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित कर दी जिसमें सात अन्य सदस्य भी शामिल हैं। एक देश एक चुनाव की वकालत स्वयं प्रधानमंत्री मोदी 2020 में पहले ही कर चुके हैं। हालांकि साल 1983 में भारत निर्वाचन आयोग ने एक चुनाव कराने का प्रस्ताव दिया था जिसका जिक्र विधि आयोग की 1999 की रिपोर्ट में भी है। इसके पीछे सबसे बड़ा तर्क चुनावी खर्च को बचाने को माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">देखा जाए तो एक अरब चालीस करोड़ की जनसंख्या वाला भारत एक विकासशील देश है और महज तीन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से युक्त है। अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी समेत कई ढांचागत विकास और समावेशी संदर्भ को अभी बहुत उठान देना है। ऐसे में बड़ी और बढ़ी हुई अर्थव्यवस्था बेफिजूल की खर्ची रोकने से भी सम्भव है। वन नेशन, वन इलेक्शन इस बचत को कुछ हद तक बढ़ावा दे सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बानगी के तौर पर देखें 1951-52 के चुनाव में जहां 11 करोड़ रूपए खर्च हुए थे वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा 60 हजार करोड़ की भारी-भरकम राशि के खर्च से भरा हुआ है। इसके अलावा 28 राज्यों और 2 केन्द्रशासित अर्थात दिल्ली और पुदुचेरी के विधानसभा चुनाव भी अलग-अलग खर्चों से पटे हैं। जाहिर है संरचनात्मक व तकनीकी तौर पर चुनाव आयोग को सशक्त करने के साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराना मशीनरी, समय और खजाना तीनों की सेहत के लिए ठीक हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दो टूक यह भी है कि वन नेशन, वन इलेक्शन कोई नई बात नहीं है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते थे। 1968 और 1969 में कई विधानसभाएं समय से पहले भंग हो गयी और लोकसभा भी समय से पहले 1970 में भंग हो गयी। फलस्वरूप वन नेशन, वन इलेक्शन की परम्परा यहीं से बिखर सी गयी। मगर एक सच यह है कि एक देश, एक चुनाव की राह आसान नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">1999 की विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट से यह स्पश्ट होता है कि हर साल और सत्र के बाहर चुनाव के चक्र को समाप्त किया जाना चाहिए और वापसी वहां पर करनी चाहिए जहां लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ होते हैं। 2015 की संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी एक चुनाव करने की व्यावहारिकता पर अपनी राय मुखर की जिसमें समिति ने भारी खर्च, आचार संहिता को बनाए रखना, आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति पर प्रभाव और चुनाव के दौरान मानव शक्ति पर अतिरिक्त बोझ पड़ना आदि की पहचान की थी। 2018 की विधि आयोग की रिपोर्ट में एक साथ चुनाव एक बेहतर मसौदा था। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">इसमें कहा गया कि संविधान के मौजूदा ढांचे के तहत एक साथ चुनाव नहीं कराए जा सकते। संविधान, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और लोकसभा व राज्य विधानसभाओं की प्रक्रिया के नियमों में उचित संशोधन के मामले में एक साथ चुनाव कराए जा सकते हैं। आयोग ने यह भी सुझाया था कि कम से कम 50 फीसद राज्यों को संवैधानिक संशोधनों की पुश्टि करनी चाहिए। वैसे सरकार बड़ी व्यवस्था होती है और संविधान उसी व्यवस्था को चलाने की एक सर्वोच्च विधि है। समय-समय पर संविधान में आवश्यकता और प्रासंगिकता को देखते हुए संशोधन किए जाते रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलहाल लगभग लोकसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े देश में एक साथ चुनाव की बात जोर ले चुकी है। मानसून सत्र के दौरान केन्द्रीय कानून मंत्री ने कहा था कि एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करना होगा। एक साथ चुनाव के फायदे अनेक हैं मगर क्या इसका कोई नुकसान भी हो सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि लोकसभा के चुनाव के अलग एजेण्डे होते हैं जबकि विधानसभा के चुनाव के लिए अलग चुनौतियां होती हैं। इसमें क्षेत्रीय दलों का नुकसान हो सकता है क्योंकि एक साथ चुनाव में दो अलग-अलग मुद्दे उठा पाना मुश्किल होगा। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">क्षेत्रीय दल के आभाव में राश्ट्रीय दल सरकार के तौर पर कम दबाव वाले हो सकते हैं जिसमें अंकुश और नियंत्रण प्रभावित हो सकता है। इतना ही नहीं लोकतंत्र को जनता का शासन कहा जाता है। देश में संसदीय प्रणाली में एक साथ चुनाव न होना कोई बड़ी बात नहीं है जिस खजाने में चुनावी खर्च की बात हो रही है वह देश में हुए अब तक के किसी घोटाले की तुलना में बहुत मामूली है। सरकारें साफ-सुथरी और भ्रश्टाचार पर लगाम लगाने वाली हों तो चुनावी खर्च के बावजूद भी विकास को गगनचुम्बी बनाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही जन प्रतिनिधि जवादेह बने रहेंगे। पड़ताल बताती है कि दुनिया के कई देश साउथ अफ्रीका, स्वीडन व बेल्जियम आदि एक साथ चुनाव में होते हैं। कुछ देश तो संसद से लेकर नगरपालिका तक एक ही साथ चुनाव में रहते हैं। इसके अलावा जर्मनी, फिलिपीन्स, ब्राजील आदि जैसे देश भी एक साथ चुनाव में रहते हैं। संदर्भ निहित परिप्रेक्ष्य यह भी है कि यह एक संवैधानिक मुद्दा है और संवेदनशील भी है। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए ही एक साथ चुनाव वाली अवधारणा को जमीन पर उतारना उचित होगा। संविधानविद् और कानूनविद् तथा सरकार इसकी बारीकियों को ध्यान में रखते हुए इस कसौटी से पार पाएंगे इसकी सम्भावना दिखती है। बावजूद इसके इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वन नेशन, वन इलेक्शन की राह पूरी तरह समतलतो नहीं है। One Nation, One Election</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="हमारे सैनिकों, निर्दोष नागरिकों के खून की हर बूंद का बदला लिया जाएगा:सिन्हा" href="http://10.0.0.122:1245/every-drop-of-blood-of-our-soldiers-innocent-civilians-will-be-avenged-sinha/">हमारे सैनिकों, निर्दोष नागरिकों के खून की हर बूंद का बदला लिया जाएगा:सिन्हा</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Mon, 18 Sep 2023 10:40:51 +0530</pubDate>
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                <title>Reservation: मैं पिछड़ा हूँ, आप कौन?</title>
                                    <description><![CDATA[Reservation: पिछला सप्ताह भारत विश्व मंच पर छाया रहा और कैसे? स्पष्टत: जी 20 शिखर सम्मेलन सफल रहा तथा प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) ने संपूर्ण विश्व को झुका दिया किंतु सोमवार आते-आते हम पुराने ढर्रे पर पहुंच गए। भारत बनाम इंडिया पर विवाद जिसके लिए अगले सप्ताह संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/i-am-backward-who-are-you/article-52313"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/reservation.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Reservation: पिछला सप्ताह भारत विश्व मंच पर छाया रहा और कैसे? स्पष्टत: जी 20 शिखर सम्मेलन सफल रहा तथा प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) ने संपूर्ण विश्व को झुका दिया किंतु सोमवार आते-आते हम पुराने ढर्रे पर पहुंच गए। भारत बनाम इंडिया पर विवाद जिसके लिए अगले सप्ताह संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है से लेकर महाराष्ट्र में चल रहे आरक्षण के बारे में जारी तमाशा शिन्दे-फडनवीस-पवार सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। Reservation</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पूर्व पुलिस ने हिंसक प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। महाराष्ट्र के जालना जिले के अनजान से आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जारंगे जो पिछले दिनों से भूख हड़ताल पर हैं, उन्होंने मराठाओं के लिए आरक्षण की मांग में एक नया मोड़ दे दिया है कि उनहें कुनबी अर्थात अन्य पिछड़े वर्ग का दर्जा दिया जाए। यहां तक कि मुख्यमंत्री शिन्दे भी इस आरक्षण को देना चाहते हैं किंतु वे चाहते हैं कि इससे पहले इस मुद्दे की ठोस कानूनी समीक्षा की जाए और अन्य पिछड़े वर्गों और मराठाओं में किसी तरह का टकराव पैदा न किया जाए। Reservation</p>
<p style="text-align:justify;">शिन्दे का सौभाग्य यह है कि विपक्षी दल मराठाओं के लिए आरक्षण का सम्मान करते हैं किंतु वे अन्य पिछड़े वर्ग के कोटे में सेंध लगाने से चिंतित हैं। राकांपा के शरद पवार चाहते हैं कि मराठाओं को आरक्षण देने के लिए उन्हें 15-16 प्रतिशत अतिरिक्त कोटा दिया जाए और यह शर्त रखी जाए कि अन्य पिछड़े वर्ग का कोटा प्रभावित न हो। यही बात कांगे्रस और ठाकरे की शिव सेना भी कहते हैं। वस्तुत: उन्होंने केन्द्र से आग्रह किया है कि वे आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ाए तथापि जारंगे अपनी बात पर अड़े हुए हैं।</p>
<h3>मराठा लंबे समय से आरक्षण की मांग कर रहे हैं | Reservation</h3>
<p style="text-align:justify;">नि:संदेह राज्य सरकार की दुविधा को समझा जा सकता है क्योंकि राजनीतिक दृष्टि से प्रभावशाली मराठा राज्य की जनसंख्या में 20 प्रतिशत से अधिक है तथा उनका सरकारी तथा अर्ध-सरकारी सेवाओं में बहुत कम प्रतिनिधित्व है अ‍ैर वे लंबे समय से आरक्षण की मांग कर रहे हैं। इसका दूरगामी प्रभाव हो सकता है। अन्य पिछड़े वर्गों के लिए नहीं अपितु यह उन्हें और अलग-थलग करेगा तथा राज्य की राजनीति में मराठाओं की पकड़ और मजबूत करेगा। आरक्षण औसत प्रतिभा की लागत पर नहीं दिया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सच है कि मराठाओं की इस नई राजनीतिक आकांक्षाओं का संज्ञान न लेना आत्मघाती होगा किंतु जातीय आधार पर राजनीतिक सत्ता का खेल करना खतरनाक है। निश्चित रूप से सामाजिक न्याय वांछनीय और प्रशंसनीय लक्ष्य है। इसके अलावा सरकार कानून उद्देश्य लोगों को शिक्षित करना और उन्हें समान अवसर तथा जीवन की बेहतर गुणवत्ता प्रदान करना है। तथापि भारत की स्वतंत्रता के बाद के 70 वर्षों में पता चलता है कि आरक्षण प्रदान करने के लिए बनाए गए किसी भी कानून से किसी भी वर्ग, जाति, उपजाति और वंचित वर्ग का उत्थान नहीं हुआ है। उनमें से केवल कुछ लोगों को रोजगार और शैक्षणिक सस्थानों में प्रवेश ही मिल पाया है। Reservation</p>
<p style="text-align:justify;">लोगों के उत्थान का एकमात्र रामबाण आरक्षण नहीं है तथा झूठे आधारों पर विभिन्न वर्गों के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा करना खतरनाक है कि यह दलित वंचित लोगों का उत्थान करेगा। वस्तुत: इससे पीड़ित और झूठे विजेता पैदा हुए हैं जहां पर केवल जन्म के आधार पर यह तय किया जाता है कि यह विजेता है या हारने वाला है जो गरीब पैदा हुए हैं वे कष्ट सह रहे हैं और जो उच्च जातियों में पैदा हुए हैं वे विजेता हैं। Reservation</p>
<h3>क्या आरक्षण भारत के सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखने का समाधान है</h3>
<p style="text-align:justify;">इस बात का अध्ययन करने का कोई प्रयास नहीं किया गया कि क्या आरक्षण मिलने के बाद उन लोगों के मनोबल को बढ़ाने के लिए कोई प्रयास किया गया है जिन्हें आरक्षण दिया गया है ताकि उन्हें मुख्यधारा में लाया जा सके जो इस बात को रेखांकित करता है कि कोटा इस बात का समाधान नहीं करता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में क्या खामी है या यह जीवन की बेहतर गुणवत्ता प्रदान नहीं करता है। प्रश्न उठता है कि क्या आरक्षण अपने आप में एक साध्य है।</p>
<p style="text-align:justify;">बिल्कुल नहीं। क्या कभी इस बात का आकलन किया गया है कि जिन लोगों को आरक्षण दिया गया है उन्हें लाभ हुआ है या हानि हुई है। बिल्कुल नहीं। क्या आरक्षण भारत के सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखने का समाधान है? बिल्कुल नहीं क्योंकि यह लोगों में मतभेद पैदा करता है और राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाता है। क्या यह बात समझ में आती है कि इंजीनियंरिग में 90 प्रतिशत लाने वाला कोई छात्र दवाई बेचता है जबकि 40 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाला दलितत डॉक्टर बन जाता है और इन सब का कारण आरक्षण है। Reservation</p>
<p style="text-align:justify;">2023 का भारत 1989 का भारत नहीं है जब 18 वर्षीय छात्र राजीव गोस्वामी ने सार्वजनिक रूप से स्वयं को आग लगा दी थी। उस समय राजनेताओं द्वारा उत्पन्न मंडल आग उन्हें ही सताने लगी है। हमारे नेतागणों को समझना होगा कि वे आज जनरेशन एक्स और जनरेशन वाई का सामना कर रहे हैं और जिनकी जनसंख्या 50 र्प्रतिशत से अधिक है और वे कार्यवाही में विश्वास करते हैं न कि प्रतिक्रिया में। वे भीड़भाड़ भरे रोजगार बाजार में गुणवत्ता के आधार पर रोजगार की मांग करते हैं जहां पर श्रम शक्ति में प्रति वर्ष 3 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है और रोजगार में केवल 2.3 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है जिसके चलते बेरोजगारी 7.1 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।</p>
<h3>रोजगार बाजार में प्रति वर्ष ड़ेढ करोड़ नए लोग प्रवेश कर रहे | Reservation</h3>
<p style="text-align:justify;">मोदी सरकार द्वारा हाल ही में संयुक्त सचिव के 10 पदों के दिए गए विज्ञापन के प्रत्युत्तर में 7 हजार से अधिक लोग आवेदन करते हैं। किसी ने भी इस बात पर विचार नहीं किया कि रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे नए लोगों को रोजगार देने की चुनौती का कैसे सामना किया जाए। रोजगार बाजार में प्रति वर्ष ड़ेढ करोड़ नए लोग प्रवेश कर रहे हैं और ऐसी स्थिति में आरक्षण कहां फिट बैठता है। आरक्षण का दायरा निरंतर बढ़ाना व्यावहारिक नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">सामाजिक रूप से प्रभावशाली समूह हमेशा आरक्षण प्राप्त करने के लिए आंदोलन करते रहेंगे और जिसके चलते सभी लोगों को अच्छी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए यह अदूरदर्शी उपाय अपनाया जाता है और इसके चलते विभिन्न समूहों की पहचान का मुद्दा और बढ़ जाता है। फलत: ऐसी स्थिति बन गयी है जहां पर चुनावी सत्ता की राजनीति के चलते संख्या की दृष्टि से प्रभावशाली समूह अन्य समूहों की कीमत पर लाभ प्राप्त करता है। Reservation</p>
<p style="text-align:justify;">अन्याय तब बढ़ता है जब समान लोगों के साथ असमान व्यवहार किया जाता है और तब भी बढ़ता है जब असमान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाता है। इसके दो उदाहरण हैं। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलत है कि आईआईटी से 48 प्रतिशत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी और आईआईएम से ऐसे छात्र 62 प्रतिशत थे क्योंकि उन्हें ये पाठ्यक्रम बहुत कठिन लगे।</p>
<h3>असमानताएं हैं और उन्हें दूर किया जाना चाहिए | Reservation</h3>
<p style="text-align:justify;">आईआईटी गोहाटी का रिकार्ड बहुत खराब है। उसके बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले 25 छात्रों में से 88 प्रतिशत आरक्षित वर्ग के हैं। उसके बाद आईआईटी दिल्ली का स्थान है जहां पर ऐसे छात्रों की संख्या 76 प्रतिशत है। देश के 23 आईआईटी के 6043 शिक्षकों में से 149 अनुसूचित जाति, 21 अनुसूचित जनजाति के थे जो उन शिक्षकों में से थे जिनकी संख्या 3 प्रतिशत से कम है तथा 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में से अधिकतर में अन्य पिछड़े वर्गों के शिक्षक न के बराबर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे नेताओं को इस बात को स्वीकार करना होगा कि असमानताएं हैं और उन्हें दूर किया जाना चाहिए। केवल शिक्षा में आरक्षण देने से या रोजगार में आरक्षण देने से उत्कृष्टता नहीं आएगी। उन्हें नए प्रयोग करने होंगे जिसके चलते वे शिक्षा और रोजगार में परीक्षाओं को पास करे और वे सामान्य श्रेणी के छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा करे। हमारे नेताओं के लिए आवश्यक है कि वे सभी लोगों के लिए समान अवसर प्रदान करे क्योंकि आरक्षण विभाजनकारी है। समय आ गया है कि केन्द्र और राज्य सरकारें संपूर्ण आरक्षण नीति पर पुनर्विचार करे और उसे पुनर्निर्धारित करें और उसे आंख मूंदकर लागू न करें अन्यथा भारत शीघ्र ही अक्षम और औसत दर्जे के लोगों का देश बन जाएगा। Reservation</p>
<p style="text-align:right;"><strong>पूनम आई कौशिश, वरिष्ठ लेखिका एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार </strong><br />
<strong>(यह लेखिका के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Ayodhya Ram Mandir : खुदाई में मिले राम जन्मभूमि का सच साबित करने वाले अवशेष की फोटो जारी" href="http://10.0.0.122:1245/photo-of-the-remains-found-during-excavation-proving-the-truth-of-ram-janmabhoomi-released/">Ayodhya Ram Mandir : खुदाई में मिले राम जन्मभूमि का सच साबित करने वाले अवशेष की फोटो जारी</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/national/i-am-backward-who-are-you/article-52313</link>
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                <pubDate>Thu, 14 Sep 2023 10:45:48 +0530</pubDate>
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                <title>G20 Summit: बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की आवाज बनेगा जी-20</title>
                                    <description><![CDATA[G20 Summit: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (UNSC) में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व और सदस्यता में वृद्धि का मुद्दा एक अंतराल के बाद पुन: चर्चा में आ गया है। जी-20 की दिल्ली शिखर बैठक से पहले और उसके बाद यूएनएससी के भीतर सुधारों को लेकर जिस तरह से वैश्विक नेताओं की प्रतिक्रिया आ रही है, उससे लगता है […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/g-twenty-will-become-the-voice-of-reform-in-multilateral-institutions/article-52277"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/g20.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">G20 Summit: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (UNSC) में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व और सदस्यता में वृद्धि का मुद्दा एक अंतराल के बाद पुन: चर्चा में आ गया है। जी-20 की दिल्ली शिखर बैठक से पहले और उसके बाद यूएनएससी के भीतर सुधारों को लेकर जिस तरह से वैश्विक नेताओं की प्रतिक्रिया आ रही है, उससे लगता है वर्ल्ड लीडर इसे लेकर गंभीर है। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">जी-20 समिट में शामिल होने के लिए नई दिल्ली आए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पीएम मोदी के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक के दौरान कहा कि ग्लोबल गवर्नेस में ज्यादा लोगों की साझेदारी और प्रतिनिधित्व होना चाहिए। हम यूएनएससी में भारत को परमानेंट मेंबर बनाए जाने का समर्थन करते हैं। बैठक से पहले यूएन चीफ एंटोनियो गुटरेस ने भी कहा कि यूएनएससी की मेंबरशिप का फैसला उनके हाथ में नहीं है, लेकिन वो चाहते हैं कि यूएनएससी में सुधार हो और इसमें भारत भी शामिल हो। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">और अब बैठक के बाद जिस तरह से पाकिस्तान के खास मित्र तुर्किये ने भारत का समर्थन किया है, उससे मामले की गंभीरता को समझा जा सकता हैै। तुर्किये के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन ने कहा कि अगर भारत जैसा देश यूएनएससी का स्थायी सदस्य बनता है, तो तुर्किये को गर्व होगा। दुनिया पांच से भी बड़ी है। हम सुरक्षा परिषद में सिर्फ इन पांच को नहीं रखना चाहते है। G20 Summit</p>
<h3>भारत लंबे समय से यूएनएससी की परमानेंट सीट के लिए दावा कर रहा है</h3>
<p style="text-align:justify;">पिछले डेढ-दो दशकों से इस बात की चर्चा लगातार बल पकड़ रही है कि संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में कई बहुपक्षीय संस्थान बदलते हुए भू-राजनीतिक परिदृश्य में तालमेल बैठाने में असफल हुए हैं। ये संस्थान बड़ी शक्तियों के बीच आम सहमति विकसित करने और संघर्ष को रोकने में विफल रहे है। ऐसी ही एक संस्था संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिष्द अर्थात यूएनएससी है। ग्लोबल पर्सपेक्टिव में इस स्पेस को भरने के लिए हाल के दौर में कई वैकल्पि समूहों का उभार हुआ है। इनमें से कई ऐसे समूह है, जिनमें भारत न केवल शामिल है, बल्कि अहम भूमिका में है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब चूंकि, जी-20 शिखर बैठक की मेजबानी भारत के पास थी, और भारत लंबे समय से यूएनएससी की परमानेंट सीट के लिए दावा कर रहा है। भारत के अलावा, ब्राजील, जर्मनी और जापान भी स्थायी सदस्यता का दावा कर रहे हैं, लेकिन ‘कॉफी क्लब‘ (यूएनएससी में सुधार का विरोध करने वाले राष्ट्रों का अनौपचारिक समूह) के अड़ियल रूख के कारण इन देशों को परमानेंट सीट नहीं मिल पा रही है। ऐसे में यह पहले से ही तय था कि दिल्ली शिखर बैठक के दौरान भारत इस मुद्दे को प्रमुखता के साथ उठाएगा। भारत ने ऐसा किया भी।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, 1945 में जिस समय संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी उस समय संयुक्त राष्ट्र में 51 और सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी और छह निर्वाचित अस्थायी कुल 11 सदस्य थे। साल 1965 में महासभा ने संकल्प 1991 पारित कर चार्टर में संशोधन करते हुए अस्थायी सदस्यों की संख्या 6 से बढ़ाकर 10 कर दी और सदस्य देशों को भौगालिक आधार पर प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान किया गया। ये बदलाव एक सीमा तक तो उपयोगी साबित हुआ लेकिन पी-5 (पांच परमानेंट सदस्य) की वीटो पावर में संशोधन न किए जाने के कारण सुधार की पूरी कवायद बेकार हो गई ।</p>
<h3>संयुक्त राष्ट्र 1945 में बनाया गया एक ‘फ्रोजेन मैकेनिज्म‘ बन कर रह गया</h3>
<p style="text-align:justify;">यूएनएससी में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व का सवाल और सदस्यता में वृद्धि का मुद्दा यूएन की वार्षिक बैठकों में हमेशा उठता रहा है। भारत सहित दुनिया के कई अन्य देश इस बात की मांग करते आए हैं कि बदलती वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप यूएनएससी में सुधार कर भारत, ब्राजील, जापान और जर्मनी को स्थायी सदस्य बनाया जाए। लेकिन महासभा आज तक किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पायी है। इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले छह दशकों से चार्टर में सुधार को लेकर कोई कदम नहीं उठाया जा सका है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी वॉयस आॅफ द ग्लोबल साउथ समिट में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र 1945 में बनाया गया एक ‘फ्रोजेन मैकेनिज्म‘ बन कर रह गया है। एस. जयशंकर ने तो यहां तक कह दिया है कि यूएनएससी पांच लोगों की तरह है, जो ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठे हैं, और नहीं चाहते कि अन्य लोग उसमें प्रवेश करें। उन्होंने टिकट की कीमत बढ़ाने और अन्य प्रतिबंध जैसी बाधाएं डाल दी है। सच तो यह है कि यूएन में सुधार की भारत की मांग को यूएनएससी की स्थायी सदस्यता पाने की आकांक्षा से जोड़कर देखा जाता रहा है। इसका परिणाम यह हुआ कि अलग-अलग मौकों पर विभिन्न देश संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता दिलाने में भारत को समर्थन का आश्वासन तो देते रहे है, लेकिन वे इस मसले पर गंभीर नहीं हुए है। G20 Summit</p>
<h3>आज भारत 1945 वाला भारत नहीं है | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">जहां तक यूएनएससी में भारत की स्थायी सदस्यता का सवाल है, मैं समझता हूं भारत को इस मामले में ज्यादा लामबंदी की जरूरत नहीं है। क्योंकि आज जहां भारत खड़ा है, वहां उसे यूएनएससी की नहीं बल्कि यूएनएससी को भारत की जरूरत होनी चाहिए। आज भारत 1945 वाला भारत नहीं है। आज वह दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करता हैं। अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी ताकत और चांद के दक्षिणी धू्रव पर पहलकदमी करने वाला पहला देश बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को गंभीरता से लिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सार्क, आसियान, बिम्सटेक, एससीओ, ईब्सा, ब्रिक्स, क्वाड, जी-20 जैसे संगठन वर्तमान वैश्विक व्यवस्था को किसी न किसी रूप में प्रभावित करते हैं, भारत इन संगठनों में अहम भूमिका में है। ऐसे में यूएनएससी की परमानेंट सीट पर भारत का होने का मतलब यूएनएससी के सम्मान में वृद्धि होना है। दूसरा, जिस तरह से पूरी यूएनएससी पर पी-5 देशों का नियंत्रण है, उसे देखते हुए भी भारत जैसे बड़े देश के लिए यह आकर्षण का कोई खास केन्द्र नहीं होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">जब तक यूएन चार्टर में परिवर्तन कर वीटो प्रक्रिया को वोटिंग प्रकिया में नहीं बदला जाता तब तक सुरक्षा परिषद् से उसकी वास्तविक भूमिका की उम्मीद नहीं की जा सकती है। यूके्रन युद्ध ने इस अंतरराष्ट्रीय संस्था की बढ़ती हुई अप्रासंगिकता को एक झटके में उजागर कर दिया। पूरी दुनिया गवाह है कि कैसे यूएनएससी के एक परमानेंट मैम्बर (रूस) ने अपने पड़ोसी देश पर आक्रमण किया उसकी क्षेत्रीय अखंडता से खिलवाड़ किया और दुनिया की ‘पुलिस मैन’ कहलाने वाली संस्था मूकदर्शक बनी रही। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">संक्षेप में कहें तो बहुधु्रवीय विश्व व्यवस्था में आज भी कुछ देश इस मुगालते में हैं कि दुनिया उनकी जेब में है, और वे इसको जैसे चाहे चला सकते हैं। लेकिन अब जी-20 के नए अध्यक्ष ब्राजील ने यूएनएससी में सुधार को लेकर किसी रोडमैप तक पहुंचने की बात कही है, उसे देखते हुए लगता है कि निकट भविष्य में शायद यूएनएससी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप व्यवहार करती दिखे। G20 Summit</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. एन.के. सोमानी, अंतर्राष्टÑीय मामलों के जानकार </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
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                <pubDate>Wed, 13 Sep 2023 15:28:04 +0530</pubDate>
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                <title>G20 Summit: जी-20 का नेतृत्व एवं भारत के समक्ष चुनौतियां</title>
                                    <description><![CDATA[G20 Summit: जी-20 वैश्विक अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा तय करने वाला दुनिया की बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। यह वैश्विक स्तर पर आर्थिक मामलों को समझने और परस्पर सहयोग करने में बड़ी भूमिका निभाता है। दुनिया के राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर विचार-विमर्श करना इसके एजेंडे का अहम बिन्दू है। यह विश्व […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/leadership-of-g-twenty-and-challenges-before-india/article-52187"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/g-20.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">G20 Summit: जी-20 वैश्विक अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा तय करने वाला दुनिया की बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। यह वैश्विक स्तर पर आर्थिक मामलों को समझने और परस्पर सहयोग करने में बड़ी भूमिका निभाता है। दुनिया के राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर विचार-विमर्श करना इसके एजेंडे का अहम बिन्दू है। यह विश्व की दो-तिहाई से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। विश्व के कुल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 80 फीसदी भागीदारी अकेले जी-20 देशों की रहती है। विश्व की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी वाले इस संगठन की इस साल भारत अध्यक्षता कर रहा है। G20 Summit</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>जी-20 का इतिहास | G20 Summit </strong></h3>
<p style="text-align:justify;">जी-20 की स्थापना का विचार 90 के दशक में उस वक्त अस्तित्व में आया जब दुनिया के अलग-अलग कोनों में स्थित विकसित और विकासशील देश आर्थिक एवं वित्तीय रूप से विभिन्न समस्याओं का सामना कर रहे थे। पूंजीवादी प्रभाव से उत्पन्न होने वाली समस्याओं के सामूहिक निराकरण की राह तलाशने के उदेश्य को लेकर जी-20 अस्तित्व में आया। समूह की स्थापना की परिकल्पना वर्ष 1999 के वैश्विक मंदी से निबटने के उपायों के लिए जी-7 देशों कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेट किंग्डम और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा की गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">1998 में इस समूह में रूस भी जुड़ गया था और समूह का नाम जी- 7 से जी-8 हो गया। वर्ष 1999 में जर्मनी के कोलोन में जी-8 देशों की बैठक हुई इसमें एशिया के आर्थिक संकट पर चर्चा हुई इसके बाद दुनिया के बीस शक्तिशाली अर्थव्यवस्था वाले देशों को एक मंच पर लाने का फैसला किया गया। अत: 25 सिंतबर, 1999 को औपचारिक रूप से अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में जी-20 की स्थापना की गई। आगे चलकर जी-8 को राजनीतिक और जी-20 को आर्थिक मंच के रूप में स्वीकार किया गया। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">प्रांरभ में जी-20 केवल सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों के वार्षिक सम्मेलनों तक सीमित था। लेकिन जब 2008 की वैश्विक मंदी ने यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में लिया तो सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्क्ष्ज्ञ स्वयं इस संगठन के वार्षिक सम्मेलनों में उपस्थित होकर आर्थिक मुददों पर चर्चा करने लगे। राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्षों की उपस्थिति के कारण 2008 के बाद जी-20 और अधिक प्रासंगिक हो गया। वर्ष 2014 में क्रीमिया पर कब्जा कर लेने के कारण रूस को इस समूह से बाहर कर दिया गया। क्रीमिया पर कब्जे की घटना के बाद जी-20 की राजनीतिक इकाई अर्थात जी-8 पुन: जी-7 में बदल गया।</p>
<p style="text-align:justify;">आरंभ में जी-20 का एक मात्र उदेश्य केवल मध्यम आय वाले देशों की वित्तीय स्थिति को सुरक्षित करना था। लेकिन बाद में इसके एजेंडे में जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, पर्यावरण, भ्रष्टाचार विरोध और अन्य वैश्विक चुनौतियां के समाधान को भी शामिल कर लिया गया। हालांकि, अभी तक इसका कोई स्थायी मुख्यालय नहीं है। ऐसे में प्रतिवर्ष जिस देश द्वारा जी-20 शिखर बैठक की अध्यक्षता की जाती है, वही देश अनौपचारिक रूप से इसके मुख्यालय का काम करता है। जहां तक समूह की अध्यक्षता का सवाल है, तो अध्यक्षता का निर्धारण प्रत्येक वर्ष सदस्य देश रोटेशन पद्धति के आधार पर करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कौन-कौन से देश शामिल है: आॅस्ट्रेलिया, चीन, ब्राजिल, कोरिया गणराज्य, फ्रांस, जर्मनी, सउदी अरब, रूस, टर्की, यूनाइटेड किंगडम, अर्जेंटीना, कनाडा, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, इटली, भारत, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका व यूरोपीय संघ शामिल हैं। अब भारत के प्रस्ताव से इस संगठन में अफ्रीकन यूनियन भी स्थायी सदस्य के रूप में शामिल हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">जी-20 की कार्यप्रणाली और उद्धेश्य: जी-20 की कार्यप्रणाली को दो भागों में विभाजित किया गया है। प्रथम, वित्त ट्रैक और द्वितीय शेरपा ट्रैक। वित्त ट्रैक में सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और केद्रीय बैंक के गवर्नरों द्वारा वित्तीय मामलों को लेकर विचार-विमर्श और संवाद किया जाता है, जबकि शेरपा ट्रैक के अंतर्गत नेताओं के निजी दूत राजनीतिक मुद्दों पर बातचीत करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक जी-20 के उद्धेश्यों की बात है जी-20 समूह से जुड़े देश वित्तीय नियमों को बढावा देने और भविष्य के वित्तीय संकटों को रोकने की दिशा में भी प्रयासरत रहते हैं। समूह आर्थिक ढांचे के विकास हेतू तो कार्य करता ही है, साथ ही ग्लोबल परिस्थितियों में आने वाले बदलावों पर भी नजर रखता है। इसके अंतर्गत कृषि, रोेजगार, ऊर्जा, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, वैश्विक खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुददों पर विश्व समुदाय को साथ लेकर काम करता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>जी-20 की अध्यक्षता और भारत</strong>  | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">भारत की विदेश नीति हालिया दौर में वैश्विक मंच पर नेतृतव के तौर पर विकसित हुई है। इसी कड़ी में 1 दिसंबर, 2022 से भारत जी-20 का नेतृत्व ( अध्यक्षता) कर रहा है। भारत द्वारा तैयार किया गया जी-20 लॉगो भी समूह के प्रति भारत की सोच को प्रदर्शित करता है। भारत द्वारा डिजायन किया गया जी-20 लॉगो भारत के राष्ट्रीय घ्वज के रंगों केसरिया, सफेद, हरे समेत नीले रंग से भी प्रेरित है। यह लॉगो भारत के राष्ट्रीय फूल कमल के साथ पृथ्वी ग्रह की तुलना करता है। जो प्रतिकुल परिस्थितियों में भी विकास का प्रतिनिधित्व करता है। अध्यक्षता के दौरान भारत के छोटे-बड़े शहरों में 200 से अधिक बैठकों का आयोजन किया गया था।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>भारत के समक्ष चुनौतियां</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद दुनिया दो भागों में बंट गई है। रूस को जी-20 से बहार करने की मांग भी पश्चिमी देशों द्वारा की जा रही है। अहम बात यह है कि भारत के पश्चिमी देशों और रूस दोनों के साथ घनिष्ठ संबंध है। जहां एक और वह पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस से तेल का आयात जारी रखे हुए है, वहीं दूसरी और भारत लगातार रूस से शांतिपूर्ण समाधान की बात कर रहा है। ऐसे में भारत को न केवल जी-20 को बचाना होगा बल्कि समूह के बहुआयामी एजेंडे की विविध क्षेत्रों में बहुपक्षीय सहयोग भी कायम करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा विभाजित दुनिया में 20 बड़े नेताओं को सामूहिक घोषणा पत्र के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए राजी करना भी सरल कार्य नहीं रहने वाला है। बाली शिखर बैठक के दौरान ऐसा हो चुका है। जहां राष्ट्रपति जोको विडोडी ने संयुक्त घोषणा पत्र पर सहमति के लिए अपने देश की राजनीतिक पूंजी को दाव पर लगा दिया था। ऐसे में भारत को सभी मतभेदों के समाधान तलाशने होंगे और वैश्विक शांति के लिए विभिन्न विचारधाराओं के बीच सेतुओं का निर्माण करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>क्या रहेगा भारत का विजन:</strong> जहां तक भारत के विजन का सवाल है तो भारत को इस अठारवें शिखर सम्मेलन में अपने आधार वाक्य एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य पर धैर्य और गंभीरता से के साथ आगे बढ़ना होगा। भारत को जी-20 की अध्यक्षता के दौरान उन देशों के विचारों को भी सामने लाना होगा जिनका समूह में प्रतिनिधित्व नहीं है। इसके अलावा जी-20 के अध्यक्ष और विकासशील देशों की तिकड़ी के हिस्से के रूप में भारत से उन मुद्दों को आगे बढ़ाने की उम्मीद भी की जा रही है, जो गरीब देशों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करेंगे। भारत की जी-20 की अध्यक्षता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत कितनी कुशलता से देशों के बीच दूरियां पाटने, विवादों को खत्म करने, शांति स्थापित करने, संघर्ष को शांत करने और टूट चुकी आपूर्ति श्रृखलाओं को फिर से बहाल करने के लिए रास्ते और साधन खोज पाता है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. एन.के. सोमानी, अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 10 Sep 2023 16:11:41 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>G20 Summit: जी-20 सम्मेलन से नए विश्व की संरचना संभव</title>
                                    <description><![CDATA[G20 Summit: हिंसा, आतंक एवं युद्ध से संत्रस्त दुनियाभर की नजरें 9 और 10 सितंबर को दिल्ली में होने वाले जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन पर टिकी हैं। यह सम्मेलन इसलिए भी खास है कि भारत इस साल जी-20 का अध्यक्ष होते हुए दुनिया को नई दिशाएं एवं नए आयाम दिए हैं। सम्मेलन ऐसे समय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/structure-of-new-world-possible-through-conference/article-52017"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/g-20-summit.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">G20 Summit: हिंसा, आतंक एवं युद्ध से संत्रस्त दुनियाभर की नजरें 9 और 10 सितंबर को दिल्ली में होने वाले जी-20 देशों के शिखर सम्मेलन पर टिकी हैं। यह सम्मेलन इसलिए भी खास है कि भारत इस साल जी-20 का अध्यक्ष होते हुए दुनिया को नई दिशाएं एवं नए आयाम दिए हैं। सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है, जब दुनिया रूस-यूक्रेन युद्ध, चीन-ताइवान की तनातनी और उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षण को लेकर असुरक्षा एवं अशांति की चिंताओं से घिरी हुई है। हालांकि जी-20 सुरक्षा संबंधी मुद्दों का नहीं, आर्थिक मुद्दों का मंच है, लेकिन सुरक्षा, शांति एवं युद्धमिुक्त से होकर ही आर्थिक उन्नति के रास्ते खुलते हैं। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">सुरक्षा चिंताओं ने दुनिया की अर्थव्यवस्था को जिस तरह प्रभावित कर रखा है, जी-20 देशों के लिए इसे पूरी तरह नजरअंदाज करना संभव नहीं है। जी-20 के सदस्य देशों की संयुक्त रूप से दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद में करीब 85 फीसदी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में 75 फीसदी की भागीदारी है। इस मंच के अध्यक्ष होने के नाते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आर्थिक उन्नति के लिए शांति का सन्देश दिया है, उनका कहना है कि ‘यह युग युद्ध का नहीं है’ सन्देश फिर दुनिया को देने की जरूरत है। चीन की विस्तारवादी नीतियों पर अंकुश के लिए भी सम्मेलन में निर्णायक रूपरेखा एवं दिशाएं तय होनी चाहिए। जाहिर है, दिल्ली शिखर सम्मेलन में जो भी फैसले किए जाएंगे, पूरी दुनिया के लिए महत्त्वपूर्ण होंगे एवं उसी से नई विश्व संरचना संभव होगी।</p>
<h3>विश्व इतिहास के अगले पृष्ठ सचमुच में स्वर्णिम होंगे | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">समूची दुनिया युद्ध नहीं चाहती, अहिंसा एवं शांति की तेजस्विता ही विश्वजनमत की सबसे बड़ी अपेक्षा है, अब अहिंसा कायरता नहीं है बल्कि उन्नत एवं आदर्श विश्व संरचना का आधार है। अब एक दौर अहिंसा का चले, उसकी तेजस्विता का चले तो विश्व इतिहास के अगले पृष्ठ सचमुच में स्वर्णिम होंगे, जी-20 के माध्यम से आर्थिक उन्नति के रास्ते कपोतों के मुंह में गेहूं की बाली लिये होंगे। लेकिन इसकी सबसे बड़ी बाधा चीन एवं रूस पर निर्णय एवं निर्णायक रूपरेखा को तैयार करना ही होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">दिल्ली सम्मेलन में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की दूसरे देशों के नेताओं के साथ द्विपक्षीय बैठकों पर सबकी नजरें टिकी थीं, पर दोनों सम्मेलन में शामिल नहीं होंगे। इससे सम्मेलन के उद्देश्यों और संभावनाओं पर खास असर नहीं पड़ेगा। जब अमरीका, ब्रिटेन, आॅस्ट्रेलिया, फ्रांस, इटली, जर्मनी, दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया जैसे बड़े देशों के राष्ट्राध्यक्ष सम्मेलन में भाग लेने वाले हैं तो दुनिया की मौजूदा चुनौतियों से निपटने की कोई न कोई दिशा जरूर उभरेगी। इसकी संभावनाएं इसलिए भी बढ़ गई हैं, क्योंकि भारत ने नीदरलैंड्स, मिस्र, स्पेन, नाइजीरिया, संयुक्त अरब अमीरात और बांग्लादेश समेत नौ ऐसे देशों को भी आमंत्रित किया है, जो जी-20 के सदस्य नहीं हैं।</p>
<h3>मोदी ने दुनिया को एक परिवार बनाने की ओर कदम बढ़ाये हैं | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">भारत ने सारी वसुधा को अपना परिवार मानते हुए ही जी-20 के अध्यक्षीय दायित्व को संभाला है। आज से एक सदी पूर्व अमरीका के शिकागो में सर्वधर्म सम्मेलन में उपस्थित प्रतिनिधियों को ‘बहिनों और भाइयों’ के रूप में सम्बोधित कर स्वामी विवेकानंद ने ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘सर्वे भवन्तु सुखिन:’ की भारतीय भावना का ही विचार तो दिया था, जिसे सुनकर वहां उपस्थित सभी प्रतिनिधि आश्चर्यचकित रह गये और इस संबोधन से गद्गद् होकर बहुत देर तक करतल ध्वनि करते रहे। आज भी मोदी उसी वसुधैव कुटुम्बकम मंत्र को जी-20 का उद्घोष एवं लोगों बनाकर दुनिया को एक परिवार बनाने की ओर कदम बढ़ाये हैं, लेकिन इन राहों में चीन एवं रूस जैसे महत्वाकांक्षी देश कांटे बो रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, दुनिया के देशों को यह समझना होगा कि इस वक्त चीन और रूस, दोनों ही अपने हिसाब से दुनिया को संचालित करना चाहते हैं। दोनों की मंशा अपने पड़ोसी देशों की संप्रभुता को नष्ट करने की है और साथ ही, इस सरासर अन्यायपूर्ण व अमानवीय कृत्य में वे जी-20 जैसे मंचों का समर्थन भी चाहते हैं। कैसे भुला दिया जाए कि पुतिन यूक्रेन के खिलाफ बाकायदा युद्ध लड़ रहे हैं, तो चीन ताइवान व भारतीय इलाकों पर लगातार गिद्ध दृष्टि गड़ाकर बैठा है? इसके बावजूद दुनिया में निरंतर सशक्त होते भारत को न तो निराश होना चाहिए और न हार मानकर बैठ जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत को अपनी परम्परा से मिली ऊर्जा से दुनिया में शांति, सुख एवं समृद्धि की कामना एवं प्रयत्न करते रहना हैं। इतिहास साक्षी है कि सभी प्राणियों के सुख-शांति की कामना करने वाले हमारे पूर्वजों ने कहीं भी राजनैतिक सत्ता की प्राप्ति का लक्ष्य रखकर आक्रमण नहीं किया, किसी देश पर अतिक्रमण नहीं किया, किसी देश की सीमाओं पर कब्जा नहीं किया। यदि कहीं संघर्ष की स्थिति आई थी तो लक्ष्य रहा सज्जनों का परित्राण और दुष्टों का विनाश।</p>
<h3>जी-20 में चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग आ रहे हैं | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">इसके अतिरिक्त जहां कहीं वे गये, वहां अपने सद्व्यवहार और ज्ञान के बल पर उन्होंने भाईचारे और भारतीय संस्कृति की पताका ही लहराई न कि सत्ता के मद में किसी पर आक्रमण किया। आज भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में गिरावट के लिए अकेले चीनी राष्ट्रपति जिम्मेदार हैं। एकाधिक ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे यह सिद्ध किया जा सकता है कि भारत में होने वाले शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग आ रहे हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि जोड़ने-जुड़ने के शिखर मंच पर चीन की ओर से तोड़ने-टूटने की बातें नहीं होंगी। निश्चित ही भारत ने अपनी अध्यक्षता में जी-20 को और ज्यादा समावेशी मंच बनाया है, अनेक नये देशों को इस मंच से जोड़ा गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत के प्रयासों से अफ्रीकी संघ भी जी-20 से जुड़ा, जबकि पहले इस मंच पर अफ्रीका के लोगों की आवाज नहीं थी। वैश्विक आर्थिक संकट से उबरने के लिए 1999 में जब जी-20 का गठन किया गया था तो शुरूआत में सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और प्रमुख बैंक गवर्नर ही सम्मेलन में बुलाए जाते थे। दिल्ली सम्मेलन में पहली बार करीब 40 देशों के राष्ट्राध्यक्ष व कई वैश्विक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल होने वाले हैं, निश्चित ही यह सम्मेलन अनूठा एवं विलक्षण होगा और भारत ने इसकी गरिमा के अनुकूल तैयारियां भी भव्य एवं अद्वितीय की है।</p>
<h3>पुतिन यूक्रेन के साथ युद्ध की वजह से आने में असमर्थ हैं</h3>
<p style="text-align:justify;">भारत के लिए यह सम्मेलन सदस्य देशों के साथ रूस-यूक्रेन युद्ध खत्म करने के आधार तलाशने के प्रयास तेज करने का अच्छा मौका है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन यूक्रेन के साथ युद्ध की वजह से आने में असमर्थ हैं। इसके पीछे उनकी कोई गहरी कूटनीति नहीं है। बावजूद इसके देखने वाले रूस-चीन के शीर्ष नेताओं की जी-20 को गंभीरता से न लेने एवं उनकी बेरूखी का कोई तो मतलब निकालेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा इसलिए भी होगा, क्योंकि जी-20 में शांतिप्रिय पश्चिमी देशों का वर्चस्व हैै। इसके अलावा, शांति के पक्षधर और पंचशील की बुनियाद रखने वाले युद्ध विरोधी भारत के पास इसकी अध्यक्षता है, जिसे लेकर शुरू से चीन असहज है। उसकी असहजता का कारण उसकी विस्तारवादी गतिविधियों एवं कूटनीति पर पानी फिरना है। भारत के विरोध में वह अलग-थलग है। कूटनीति के जानकार मानते हैं कि शी जिनपिंग ने अपने देश का नया नक्शा ऐसे समय में यूं ही नहीं जारी कराया था।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन के नए नक्शे में कई देशों की सीमाओं का उल्लंघन है। चीन ने केवल भारत के अरुणाचल समेत कुछ इलाकों को ही अपने नये नक्शे में नहीं दिखाया है बल्कि मलेशिया, फिलीपींस, विएतनाम को भी अपने नक्शे में दिखाया है। भारत ने इस पर अपना एतराज जाहिर किया है। सत्य तो यह है कि भारतीय संस्कृति एवं राजनीति की सुदीर्घ यात्रा में विश्व-कल्याण और मानव-कल्याण की भावना सदैव सक्रिय रही है। इस संस्कृति के अंतर्गत उपलब्ध संपूर्ण वाङ्मय में वसुधैव कुटुम्बकम और सर्वे भवन्तु सुखिन: की भावना अंत:सलिला सरिता के समान सदा प्रवहमान रही है। इसमें व्यक्ति की अपेक्षा समष्टि को, देश के साथ संपूर्ण विश्व को प्रधानता दी गई है। जी-20 दिल्ली सम्मेलन में विश्व-परिवार की भावना को ही बल दिया जायेगा। G20 Summit</p>
<p style="text-align:right;"><strong> ललित गर्ग, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 06 Sep 2023 13:18:42 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
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                <title>Coaching Institute: बच्चों की मनोदशा को समझें कोचिंग संस्थान</title>
                                    <description><![CDATA[Coaching Institute: इंजीनियर और डॉक्टर बनने की चाह लिए लाखों की तादाद में बच्चे राजस्थान के कोटा में अपना अस्थाई आशियाना बनाते हैं। नीट और आईआईटी जेईई में जगह बनाने के लिए जी जान लगा देते हैं। खाने, सोने और रहने जैसे तमाम चुनौतियों के बीच पढ़ने को प्राथमिकता दिए रहते हैं। साप्ताहिक, पाक्षिक और […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/coaching-institute-should-understand-the-mood-of-children/article-51887"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/kota-junction.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Coaching Institute: इंजीनियर और डॉक्टर बनने की चाह लिए लाखों की तादाद में बच्चे राजस्थान के कोटा में अपना अस्थाई आशियाना बनाते हैं। नीट और आईआईटी जेईई में जगह बनाने के लिए जी जान लगा देते हैं। खाने, सोने और रहने जैसे तमाम चुनौतियों के बीच पढ़ने को प्राथमिकता दिए रहते हैं। साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक आदि टेस्ट से भी गुजरते रहते हैं। अधिक अंक पाने की होड़ में सब कुछ मानो लुटाने के लिए तैयार रहते हैं। कम नींद और अधिक पढ़ाई के बीच सामंजस्य बनाना 11वीं और 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों के लिए किसी संकट से कम नहीं है और यह संकट तब विकराल रूप ले लेता है जब तमाम कोशिशों के बावजूद अंकों का ग्राफ ढलान पर होता है। Rajasthan News</p>
<h3>इन दिनों कोटा फलक पर है | Coaching Institute</h3>
<p style="text-align:justify;">नतीजन एक अबोध छात्र आत्महत्या को अंतिम विकल्प समझने लगता है। गौरतलब है कि इन दिनों कोटा फलक पर है जिसमें पहला कारण इंजीनियर और डॉक्टर बनने की पहचान के रूप में तो दूसरा बढ़ते दबाव के बीच व्यापक होती आत्महत्या के चलते। आंकड़ा यह बताता है कि साल 2023 में महज 8 महीने में 24 बच्चे आत्महत्या कर चुके हैं जिसमें दो बच्चों ने अगस्त के अंतिम सप्ताह में एक ही दिन में आत्महत्या को अंजाम दिया। Coaching Institute</p>
<p style="text-align:justify;">पड़ताल बताती है कि साल 2015 से कोटा में होने वाले आत्महत्या के आंकड़े सरकार ने जुटाना शुरू किया है जो 2023 में अभी सर्वाधिक की ओर है। आत्महत्या के बढ़ते मामलों से सरकार, समाज, कोचिंग संस्थान और अभिभावक से लेकर पढ़ने वाले सभी विद्यार्थी बेशक चिंतित है मगर इसे लेकर कोई रणनीति अभी तक सामने नहीं आई कि आखिर नौनिहालों की आत्महत्या कैसे रोकी जाये। कोई पंखे से लटक रहा है तो कोई ऊँचे भवन से छलांग लगा रहा है जो हर हाल में सभ्य समाज के माथे पर बल लाने वाला विषय है। Coaching Institute</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे इसके कारणों को वर्गीकृत किया जाए तो पहली जिम्मेदारी अभिभावक की ओर होती है। भारतीय दिमागी तौर पर अनेक अपेक्षाओं से भरे हैं और उसी के अनुपात में कई दबाव को स्वयं पर प्रभावी किये रहते हैं। इस बात को बिना जाने-समझे अभिभावक बच्चों को प्रतिस्पर्धा की उस होड़ में झोंक देते हैं कि उसमें डॉक्टर या इंजीनियर बनने की क्षमता है भी या नहीं। बच्चे दोस्ती करने की उम्र में एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं और अंकों के दबाव में अध्ययन को अपनी मनोदशा पर इतना प्रभावी कर लेते हैं कि गलत कदम के लिए भी तैयार हो जाते हैं। प्रत्येक बच्चे के दबाव सहने और पढ़ने-लिखने की क्षमता है उसे दूसरों की तुलना में श्रेष्ठ बनाने की फिराक में मनोवैज्ञानिक दबाव से बाज आएं।</p>
<p style="text-align:justify;">भारी-भरकम फीस चुका देना और घर से जरूरी खर्चे भेज देना और अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर देना यह अभिभावक के लक्षण के लिए सही नहीं है। कोचिंग में क्या हो रहा है, बच्चे जहां रहते हैं वहां के पर्यावरण और उनके विचार में क्या ताल-मेल है कहीं वह अतिरिक्त दबाव से तो नहीं जूझ रहा है। ऐसा तो नहीं कि उसके मन मस्तिष्क में तुलनात्मक कुछ ऐसा चल रहा है जिससे आप अज्ञान बने हुए हैं आदि तमाम बातें इसलिए जानना जरूरी है ताकि अभिभावक अपने बच्चों को बचा पायें। Coaching Institute</p>
<p style="text-align:justify;">जिन बच्चों ने ऐसी तमाम समस्याओं के चलते अपने जीवन को समाप्त करने का निर्णय लिया उनके माता-पिता आज इस बात का अफसोस कर रहे होंगे कि काश समय रहते हम अपने बच्चे के मन को पढ़ पाते। स्वयं बच्चों का मन न पढ़ पाने वाले अभिभावक उसे पढ़ने के लिए कोटा भेज देते हैं। सवाल है कि क्या कम उम्र के बच्चे घर से दूर रहकर बहुत खुश रहेंगे इसकी उम्मीद थोड़ी कम ही है। इंजीनियर और डॉक्टर बनाने की चाह में कई अभिभावकों ने इस मामले में नासमझी तो की होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">राजस्थान के कोटा में सैकड़ों की तादाद में कोचिंग सेंटर हैं जिसमें आधा दर्जन कोचिंग सेंटर पूरे देश में अपनी पहचान रखती है। इन सेंटरों में अध्ययन करने वाले ये अबोध बच्चे इस मनोदशा से गुजरते हैं इनकी पहचान कोचिंग संस्थानों को भी होनी चाहिए। लाखों रुपये बच्चों से जुटाने वाले संस्थान केवल पढ़ाने और टेस्ट में नम्बर लाने तथा अंतिम नतीजे में उसे एक प्रोडक्ट के रूप में इस्तेमाल करने तक ही सीमित न हों बल्कि उसके दिमाग पर बढ़ता दबाव भी अपनी खुली आंखों से देखें और समझें। परेशानी की स्थिति में अभिभावक से सम्पर्क साधे और बच्चे के स्वास्थ्य और उसके रखरखाव को लेकर अपनी जिम्मेदारी निभाने से कोचिंग स्वयं को न रोके।</p>
<p style="text-align:justify;">शायद यही कारण है कि राजस्थान सरकार ने कोचिंग संस्थानों में दो माह तक किसी भी प्रकार के टेस्ट की पाबंदी लगा दी है। इसे लेकर प्रशासन का मत है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर टेस्ट का बुरा प्रभाव पड़ता है। गौरतलब है कि न केवल टेस्ट का बच्चों पर दबाव होता है बल्कि जब अंकों को सार्वजनिक किया जाता है तो यह एक अलग तरीके की मनोदशा का विकास करता है। कोटा में कोचिंग कारोबार जिस अवस्था में है उसके इर्द-गिर्द हर प्रकार के बाजार का होना स्वाभाविक है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां हजारों की तादाद में मान्यता प्राप्त हॉस्टल हैं साथ ही निजी कमरे भी किराये पर बच्चे लेते हैं। जहां कम-ज्यादा किराये का दबाव स्वाभाविक है। आर्थिक दबाव भी बच्चों के मन:स्थिति पर कमोबेश असर तो डाल ही रहा होगा। ऐसे में मकान मालिक या हॉस्टल संचालक की भी यह जिम्मेदारी बनती है कि वो बच्चों की आर्थिक वेदना को भी समझे। पढ़ाई, टेस्ट और अंकों की होड़ आदि के दबाव के साथ आर्थिक दबाव भी उसके मन मस्तिष्क को गलत अनुभव जरूर करा रहा होगा। Rajasthan News</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि राजस्थान में जयपुर और सीकर जिला भी अच्छा खासा कोचिंग का विस्तार ले चुका है। स्वयं के व्याख्यान के दौरान मैंने महसूस किया कि सीकर का प्रिंस कॉलेज जो स्नातक और परास्नातक के साथ-साथ सिविल सेवा परीक्षा ही नहीं बल्कि डॉक्टर, और इंजीनियर सहित रक्षा सेवा में भी कोचिंग प्रदान करता है और स्वयं में एक अनूठा संस्थान है। 40 हजार के अधिक विद्यार्थी वाला यह परिसर मोबाइल मुक्त है तथा छात्रों की सुरक्षा के मामले में कहीं अधिक उत्कृष्ट है।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे शैक्षणिक दबाव तनाव का कारण तो है, असफलता और निराशा की भावनाएं कभी भी प्रभावी हो सकती है। अवसाद, चिंता और विकार जैसी मानसिक समस्याएं भी आत्महत्या में भूमिका निभा रही हैं। तनाव, अकेलेपन और उपेक्षा की स्थितियां भी बच्चों को मुसीबत दे रही हैं। यह समझना कहीं अधिक आवश्यक है कि पढ़ाई प्रोडक्ट नहीं है और बच्चे किसी फैक्ट्री में नहीं है। इंजीनियर, डॉक्टर की तैयारी का मतलब यह कहीं से नहीं है कि बच्चों पर उनकी उम्र से अधिक बोझ डाला जाये, उन्हें नौनिहाल जीवन से काट दिया जाये और केवल प्रतिस्पर्धा से जोड़ दिया जाये। जानकारी तो यह भी मिलती है कि सालों से तैयारी करने और कोचिंग संस्थाओं में लाखों की फीस भरने के बावजूद जब बच्चों का चयन नहीं होता है तो वह सुसाइड जैसा कदम उठा लेता है। Rajasthan News</p>
<p style="text-align:justify;">अभिभावक को यह समझ लेना चाहिए कि बच्चा स्वस्थ रहेगा और जीवित रहेगा तभी कुछ बनने की ललक भी सम्भव होगी और कोचिंग संस्थान भी यह समझ लें कि केवल फीस लेकर अपनी तिजोरी भरने और बच्चों के दिमाग में दबाव भरने तक ही सीमित न रहें। जबकि समाज के लोगों को इस बात का चिंतन-मनन करना चाहिए कि आईएएस, पीसीएस या डॉक्टर, इंजीनियर न बनने की स्थिति के बावजूद एक अच्छे इंसान बनने की दरकार बनी रहती है ऐसे में असफल या कम अंक प्राप्त बच्चे या प्रतियोगी उपेक्षा नहीं बल्कि सम्मान की दृष्टि से देखें। फिलहाल माता-पिता के लिए उसकी संतान सर्वोपरि है, सबसे अधिक चिंता वह स्वयं करें और कोचिंग संस्थान भी बच्चों की मनोदशा से अनभिज्ञ न रहें।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं प्रशासनिक चिंतक </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Fig Water Benefits: दो भीगे अंजीर, बदल दे बिगड़े स्वास्थ्य की तकदीर एक्सपर्ट की राय, फायदे जाए नहीं गिनाए" href="http://10.0.0.122:1245/two-soaked-figs-can-change-the-fate-of-poor-health-experts-opinion-the-benefits-are-not-counted/">Fig Water Benefits: दो भीगे अंजीर, बदल दे बिगड़े स्वास्थ्य की तकदीर एक्सपर्ट की राय, फायदे जाए नहीं ग…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/coaching-institute-should-understand-the-mood-of-children/article-51887</link>
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                <pubDate>Sun, 03 Sep 2023 13:18:26 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>Brics Summit 2023: ब्रिक्स में संभावनाओं की नई विवेचना</title>
                                    <description><![CDATA[Brics Summit 2023: दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में 22 से 24 अगस्त के बीच 15वें ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन किया गया। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो ये 5 ऐसे देशों का समूह है जो लगभग दुनिया की आधी आबादी से युक्त है और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका एवं एशिया महाद्वीप समेत यूरेशिया को समेटे हुए है। […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/new-interpretation-of-possibilities-in-brics/article-51607"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/briks.gif" alt=""></a><br /><div class="vJOb1e aIfcHf">
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<div class="n0jPhd ynAwRc tNxQIb nDgy9d">
<p style="text-align:justify;">Brics Summit 2023: दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में 22 से 24 अगस्त के बीच 15वें ब्रिक्स सम्मेलन का आयोजन किया गया। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो ये 5 ऐसे देशों का समूह है जो लगभग दुनिया की आधी आबादी से युक्त है और दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका एवं एशिया महाद्वीप समेत यूरेशिया को समेटे हुए है। सभी देशों के शीर्ष नेतृत्व की भागीदारी सम्मेलन में हमेशा रही है मगर इस बार तस्वीर थोड़ी अलग है। दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और चीन के राष्ट्रपति ने जहां इसमें शिरकत की वहीं रूस की ओर से विदेश मंत्री ने भागीदारी की। Brics Summit 2023</p>
<p style="text-align:justify;">जबकि भारत के प्रधानमंत्री मोदी की उपस्थिति रही। हालांकि वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ब्रिक्स के प्रभाव पर अपने विचार रखते हुए स्पष्ट किया कि दुनिया भर में ब्रिक्स का प्रभाव बढ़ रहा है। ब्रिक्स का तात्पर्य ब्राजील, रूस, चाइना, इण्डिया और दक्षिण अफ्रीका होता है। फिलहाल यूक्रेन युद्ध के बीच सम्पन्न ब्रिक्स सम्मेलन कई उलझे सवालों को शायद ही सुलझा पाया हो। मगर तमाम वैश्विक समूहों की तुलना में यह संगठन कई उतार-चढ़ाव के बावजूद अपनी प्रासंगिकता को बरकरार बनाये हुए है। तकनीकी पक्ष यह भी है कि चीन ब्रिक्स का सदस्य होने के नाते मंच भरपूर साझा करता है मगर डोकलाम विवाद, उत्तरी लद्दाख में घुसपैठ और भारत की सीमा पर समस्या खड़ा करने के साथ पाकिस्तानी आतंकियों का बड़ा समर्थक है, जो हर लिहाज से भारत के विरूद्ध है।</p>
<p style="text-align:justify;">रूस व पूर्व में सोवियत संघ भारत का नैसर्गिक मित्र है जो हर परिस्थितियों में चाहे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो की बात हो सदैव भारत का पक्षधर रहा है। ब्राजील के साथ भारत की जहां संतुलित दोस्ती है, वहीं दक्षिण अफ्रीका के साथ तो औपनिवेशिक सत्ता से अब तक नजदीकी का एहसास बना हुआ है। महात्मा गांधी का टॉलस्टॉय का जिक्र व भारत की विविधता की ताकत समेत कई ऐसे प्रभावशाली संदर्भ ब्रिक्स सम्मेलन में बेहतर चर्चा से भरे थे। प्रधानमंत्री मोदी ने ब्रिक्स की प्रासंगिकता और इसकी प्रगतिशीलता को काफी बेहतर करार देते हुए इसके विस्तार पर भी जोर दिया। एक रिपोर्ट से भी पता चलता है 40 से अधिक देशों ने ब्रिक्स में शामिल होने की रूचि व्यक्त की है। यदि ऐसा होता है तो इस समूह की वैश्विक स्थिति और सघन व प्रगाढ़ हो जायेगी। फलस्वरूप जी-7 जैसे देशों को कड़ी टक्कर भी मिलेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि 2016 में भारत की अध्यक्षता के दौरान ब्रिक्स को एक समूह के रूप में परिभाषित किया गया था जो उत्तरदायी, समावेशी और सामूहिक समाधान से युक्त है। अब इसे 7 साल और बीत गये है जाहिर है अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करना, नवाचार को प्रेरित करना और बड़े अवसरों को बढ़ावा देना ब्रिक्स देशों की जिम्मेदारी होनी चाहिए। परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण यह भी है कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत ने चन्द्रयान-3 को सफलतापूर्वक चांद के दक्षिणी हिस्से पर उतारकर दुनिया में यह संदेश दे दिया कि वह ब्रिक्स में ही नहीं बल्कि संसार में उसकी ताकत तकनीकी तौर पर बेहतर हुई है और यह सब ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान ही हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री मोदी ने 5 सूत्री प्रस्ताव रखते हुए भारत की ताकत को न केवल और बड़ा किया है बल्कि ब्रिक्स के तमाम सदस्यों के लिए भी एक सारगर्भित मापदण्ड को प्रारूपित किया है। मसलन अंतरिक्ष के क्षेत्र में सहयोग, स्किल मैपिंग, पारम्परिक चिकित्सा समेत विभिन्न पहलुओं को भी विमर्षीय बनाया। देखा जाये तो लगभग दो दशकों में ब्रिक्स ने एक लम्बी और शानदार यात्रा तय की है।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि जब ब्रिक्स का पहली बार प्रयोग वर्ष 2001 में गोल्डमैन साक्स ने अपने वैश्विक आर्थिक पत्र द वर्ल्ड नीड्स बेटर इकोनोमिक ब्रिक्स में किया था जिसमें इकोनोमीट्रिक के आधार पर यह अनुमान लगाया गया कि आने वाले समय में ब्राजील, रूस, भारत एवं चीन की अर्थव्यवस्थाओं का व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों रूपों में विश्व के तमाम आर्थिक क्षेत्रों पर नियंत्रण होगा तब यह अनुमान नहीं रहा होगा कि आतंकवाद से पीड़ित भारत से मंचीय हिस्सेदारी रखने वाला चीन पाकिस्तान के आतंकियों का बड़ा समर्थक सिद्ध होगा। हालांकि चीन और भारत के बीच रस्साकशी वर्षों पुरानी है जबकि ब्रिक्स का एक अन्य सदस्य रूस भारत का दुर्लभ मित्र है। साफ है कि पांच देशों के इस संगठन में भी नरम-गरम का परिप्रेक्ष्य हमेशा से निहित रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">साल 2016 में ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में सदस्य देशों ने जिस तर्ज पर बैठकों में आतंक के खिलाफ एक होने का निर्णय लिया उससे भी यह साफ था कि मंच चाहे जिस उद्देश्य के लिए बनाये गये हों पर प्राथमिकताओं की नई विवेचना समय के साथ होती रहेगी और यह आज भी मानो इसमें समाहित है। सितम्बर 2016 की उरी घटना के बाद भारत ने जिस विचारधारा के तहत पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकियों को सर्जिकल स्ट्राइक के तहत निशाना बनाया वह भी देश के लिए किसी नई अवधारणा से कम नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही पड़ोसी बांग्लादेश समेत विश्व के तमाम देशों ने भारत के इस कदम का समर्थन करके यह भी जता दिया कि आतंक से पीड़ित देश को जो बन पड़े उसे करना चाहिए। सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ब्रिक्स के माध्यम से 2016 में गोवा में सभी सदस्यों समेत भारत और चीन का एक मंच पर होना और प्रधानमंत्री मोदी का यह कहना कि आतंक के समर्थकों को दण्डित किया जाना चाहिए, में भी बड़ा संदेश छुपा हुआ था जाहिर है यह संदेश चीन के कानों तक भी पहुंचे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">देखा जाए तो ब्रिक्स पांच उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समूह है जहां विश्व भर की 43 फीसदी आबादी रहती है और पूरे विश्व के जीडीपी का 30 फीसदी स्थान यही घेरता है। इतना ही नहीं वैश्विक पटल पर व्यापार के मामले में भी यह 20 फीसदी से अधिक हिस्सेदारी रखता है। अब तक जोहान्सबर्ग सहित 15 ब्रिक्स सम्मेलन हो चुके हैं। इसका पहला सम्मेलन जून 2009 में रूस में आयोजित हुआ था। विवेचना और संदर्भ यह भी है कि क्या कोविड-19 के आर्थिक संकट से अभी भी देश बाहर नहीं निकल पाये हैं। अर्थव्यवस्था में सुस्ती और चुनौतियां अभी भी बरकरार हैं। ब्रिक्स देशों के लिए नवीनता इस सुस्ती से निपटने का सबसे कारगर तरीका होगा जिसके लिए सदस्यों के बीच पारदर्शिता, सारगर्भिता और सच्ची आत्मीयता की तिकड़ी भी होनी चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया जानती है कि भारत को नीचा दिखाने के लिए चीन पाकिस्तान की हर गलतियों पर साथ देता है। फिर वह चाहे आतंक को ही बढ़ावा देने वाली क्यों न हो परन्तु चीन के लिए यह भी समझना ठीक रहेगा कि वह दुनिया के निशाने पर है और भारत दुनिया की निगाहों में बसता है। नीति एवं कूटनीति के तर्ज पर देखें तो भारत ब्रिक्स सम्मेलन में मन-माफिक सफलता हासिल कर ली है। जोहान्सबर्ग का ब्रिक्स सम्मेलन भारत के चन्द्रयान-3 की सफलता के साथ जोड़कर जरूर देखा जायेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">सबके बावजूद सुविचारित और विवेचित दृष्टिकोण यह भी है कि दुनिया में भारत की बढ़ी साख का प्रभाव ब्रिक्स सम्मेलन में भी देखने को मिला। शायद यही कारण है कि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि अन्तर्राष्ट्रीय नियमों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उद्देश्यों और सिद्धांतों के आधार पर सभी देशों को संयुक्त रूप से लिखना चाहिए न कि किसी मजबूत देश के कहने पर। साथ ही यह भी चिंता कि ब्रिक्स देशों को एक-दूसरे के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर खड़ा होना चाहिए और विभाजनकारी नीतियों से दूर रहना चाहिए। फिलहाल यह सम्मेलन आगे आने वाले सम्मेलन तक विमर्श और विवेचना की अगुवाई करता रहेगा। Brics Summit 2023</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक</strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="PM Modi to Meet ISRO Scientists: चंद्रयान-3 के ‘चांदों’ से मिलकर भावुक हुए मोदी" href="http://10.0.0.122:1245/pm-modi-to-meet-isro-scientists/">PM Modi to Meet ISRO Scientists: चंद्रयान-3 के ‘चांदों’ से मिलकर भावुक हुए मोदी</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 26 Aug 2023 16:06:10 +0530</pubDate>
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                <title>West Africa&amp;#8217;s: पश्चिम अफ्रीका के बिगड़ते हालात</title>
                                    <description><![CDATA[West Africa’s: नाइजर में तख्तापलट के बाद स्थिति गंभीर हो गई है। पश्चिमी अफ्रीकी देशों के संगठन इकोनॉमिक कम्यूनिटी ऑफ वेस्ट अफ्रीकन स्टेट ( ईसीओडब्लयूएएस) अर्थात इकोवास ने नाइजर के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का एलान किया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने वहां रहने वाले भारतीय नागरिकों को नाइजर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/west-africas-worsening-situation/article-51326"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/afrika-contory.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">West Africa’s: नाइजर में तख्तापलट के बाद स्थिति गंभीर हो गई है। पश्चिमी अफ्रीकी देशों के संगठन इकोनॉमिक कम्यूनिटी ऑफ वेस्ट अफ्रीकन स्टेट ( ईसीओडब्लयूएएस) अर्थात इकोवास ने नाइजर के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का एलान किया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए भारत के विदेश मंत्रालय ने वहां रहने वाले भारतीय नागरिकों को नाइजर छोड़ने की सलाह दी है। हालांकि, तख्तापलट को अंजाम देने वाले सेना के कमांडर जनरल अब्दुर्रहमान ने देश में जल्द चुनाव करवाकर सत्ता हस्तांतरण की बात कही है। लेकिन साथ ही उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को धमकाते हुए मामले से दूर रहने की हिदायत दी है। West Africa’s</p>
<p style="text-align:justify;">नाइजर में हुए तख्तापलट की घटना को विस्तृत परिपेक्ष में देखें तो तीन बड़े सवाल निकल कर सामने आते हैं। प्रथम, नाइजर में तख्तापलट की घटना क्यों हुई? द्वितीय, जिस तरह से इकोवास ने नाइजर में सैन्य हस्तक्षेप का एलान किया है, उसका आधार क्या है? और तृतीय, नाइजर में लोकतंत्र की बहाली के लिए पश्चिमी देश किस रणनीति पर आगे बढ़ेंगे? कहीं ऐसा तो नहीं कि बुर्किना फासो और माली की तरह नाइजर में भी पश्चिमी देशों की रणनीति केवल बयानों तक ही सिमट कर रह जाए। West Africa’s</p>
<p style="text-align:justify;">नाइजर में तख्तापलट का इतिहास कोई नया नहीं है। साल 1960 में नाइजर को फ्रांस के औपनिवेशिक शासन से आजादी मिली थी। तब से अब तक यहां चार बार तख्तापलट हो चुका है। साल 2021 में मोहम्मद बजौम पहली बार लोकतांत्रिक ढंग से हुए सत्ता हस्तांरण में नाइजर के राष्ट्रपति बने थे। नाइजर को विकास के पथ पर आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने अमेरिका और फ्रांस जैसी पश्चिमी ताकतों के साथ मजबूत संबंध बनाए। देश में लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया। शासन में सेना के दखल को सीमित किया।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकतांत्रिक सुधारों की इस प्रकिया से सेना नाखुश थी। देश के भीतर एक के बाद एक हो रही जिहादी घटनाएं बजौम के सुरक्षा तंत्र पर सवाल खड़े कर रही थीं। बीते तीन सालों में नाइजर में अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों ने कई हमले किए हैं। हमलों में नाइजर के कई सैनिक हताहत हुए हैं। महंगाई पर नियंत्रण नहीं लगा पाने के कारण देश की आवाम बजौम सरकार के खिलाफ लामबंद हो रही थी। सेना भला ऐसे माकूल अवसर को कब हाथ से जाने देती। ऐसे में प्रेसिडशियल गार्ड ने सुरक्षा की बिगड़ती स्थिति और खराब सामाजिक और आर्थिक प्रबंधन का हवाला देकर राष्ट्रपति बजौम को अपदस्थ कर सत्ता पर कब्जा कर लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक इकोवास के सैन्य हस्तक्षेप का सवाल है। तो इकोवास का दावा भी हवा-हवाई साबित होता दिख रहा है। दरअसल, नाइजर क्षेत्र के सात देशों- नाइजीरिया, अल्जीरिया, लीबिया, बुर्किना फासो, माली, बेनिन और चाड के साथ सीमाएं साझा करता है। नाइजीरिया, बेनिन, माली और बुर्किना फासो इकोवास के सदस्य हैं। इन चार देशों में से माली और बुर्किना फासो में सैन्य जुंटा का शासन है। अगस्त 2020 में माली में और अक्टूबर 2022 में बुर्किना फासो में तख्तापलट के बाद दोनों देशों में सैन्य जुंटा की सरकार है।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों देशों ने धमकी दी है कि नाइजर पर किया गया कोई भी बल प्रयोग उन पर किया गया बल प्रयोग होगा। संभवत: इसी वैचारिक मोह के चलते माली और बुर्किना फासो का जुटां प्रशासन नाइजर के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है। शेष दो देश नाइजीरिया और बेनिन हैं। नाइजीरिया समूह का सबसे बड़ा देश और इकोवास का प्रमुख वित्तपोषक है। लेकिन नाइजीरियाई सीनेटरों ने बल के अलावा अन्य साधनों के उपयोग की बात कहकर राष्ट्रपति बोला टीनूबू को संशय में डाल दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हाल ही में सत्ता में आए टीनूबू के लिए सीनेटरों की राय को नजरअंदाज करना उनके राजनीतिक भविष्य को मुश्किल में डाल सकता है। बेनिन ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। दूसरी ओर इकोवास के बाहर चाड और अल्जीरिया ने भी सैन्य कार्रवाई का समर्थन करने से इनकार कर दिया है । लीबिया की अपनी मजबूरियां है। कुल मिलाकर तो सैन्य कार्रवाई के नाम पर इकोवास पूरी तरह विभाजित नजर आ रहा है। तो क्या इकोवास पश्चिमी देशों के भरोसे नाइजर को धमकी दे रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">रही बात पश्चिमी देशों की रणनीति की तो सबके अपने-अपने हित हैं। अमेरिका नाइजर का एक अहम सहयोगी है। नाइजर के विकास में अमेरिका का बड़ा योगदान रहा है। दोनों देशों के बीच शांति, सुरक्षा और विकास को बढ़ावा देने की प्रतिबद्वता पर आधारित एक मजबूत साझेदारी है। कट्टरपंथी समूहों से मुकाबला करने और रक्षा क्षमताओं में सुधार के लिए अमेरिका नाइजर की सेना और सुरक्षा बलों के साथ मिलकर काम कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका लगातार नाइजर की आर्थिक मदद भी करता आ रहा है। बीते दो सालों मे अमेरिका ने करीब 400 मिलियन डॉलर बतौर मानवीय मदद नाइजर को दिए हैं। दूसरी ओर अमेरिका की मिडिल ईस्ट और अफ्रीकी देशों पर नियंत्रण की नीति में नाइजर अहम सहयोगी रहा है। हालांकि, नाइजर के पड़ोसी देश माली और बुर्किना फासो सैन्य तख्तापलट के बाद पश्चिमी देशों के खेमे से निकल कर रूस के करीब आ गए हैं। लेकिन नाइजर के आज भी पश्चिमी देशों के साथ मधुर संबंध हैं ।</p>
<p style="text-align:justify;">मीडिया में चल रही खबरों के मुताबिक तख्तापलट में रूस का हाथ होने की संभावना भी जताई जा रही है। रूस पर शक की एक बड़ी वजह राजधानी नियामी में निकाला गया मार्च है। दरअसल, नाइजर में तख्तापलट के बाद 30 जुलाई को राजधानी नियामी में एक मार्च निकाला गया। मार्च में बड़ी संख्या में लोग रूसी झंडा लहराते हुए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के नाम से नारे लगा रहे थे।</p>
<p style="text-align:justify;">कहा तो यह भी जा रहा है कि रूस के मिलिट्री गु्रप येवेगनी प्रिगोझिन ने नाइजर को सुरक्षा का भरोसा दिया है। बदले में नाइजर ने यूरेनियम की खदानों पर वैगनर की हिस्सेदारी का आश्वासन दिया है। यह खबर पश्चिमी देशों के लिए ठीक नहीं है, क्योंकि यूरेनियम की खदानों पर वैगनर का कब्जा होने से इसके दुरूपयोग की संभावना बढ़ गई है। यही वजह है कि तख्तापलट से अमेरिका और उसके सहयोगी देश नाखुश है। Artical Hindi</p>
<p style="text-align:justify;">इकोवास के प्रतिबंधों के कारण देश में आर्थिक स्थिति खराब हो रही है। यूएस से मिलने वाला सहयोग बंद हो चुका है। प्रतिबंधों के कारण नाइजर की ढाई करोड़ से ज्यादा आबादी तो अंधेरे में डूबी हुई ही है, साथ ही नाइजर के नवजात लोकतंत्र की अभिवृद्धि की कोशिशों को एक बड़ा झटका है। कुल मिलाकर कहें तो हाल-फिलहाल नाइजर के भीतर जो हालात बन रहे हैं, उन्हें देखते हुए लगता है, देश में लोकतंत्र बहाली का काम आसन नहीं रहने वाला है। West Africa’s</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. एन.के. सोमानी, अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>अंतरराष्ट्रीय ख़बरें</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/international/west-africas-worsening-situation/article-51326</link>
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                <pubDate>Fri, 18 Aug 2023 12:23:12 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>Monsoon Session: आरोप-प्रत्यारोप से तर-बतर रहा मानसून सत्र</title>
                                    <description><![CDATA[20 जुलाई से 11 अगस्त तक चलने वाला यह मानसून सत्र मणिपुर और अविश्वास प्रस्ताव के लिए ही जाना जाएगा इसमें सकारात्मक दृष्टि से कोई बड़ी पहल शायद ही संभव हुई हो। लोकतंत्र में यह रहा है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत से जनहित को सुनिश्चित करने वाले कानून और कार्यक्रम की उपादेयता सुनिश्चित […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/monsoon-session-drenched-in-allegations-and-counter-allegations/article-51156"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/monsoon-session.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">20 जुलाई से 11 अगस्त तक चलने वाला यह मानसून सत्र मणिपुर और अविश्वास प्रस्ताव के लिए ही जाना जाएगा इसमें सकारात्मक दृष्टि से कोई बड़ी पहल शायद ही संभव हुई हो। लोकतंत्र में यह रहा है कि देश की सबसे बड़ी पंचायत से जनहित को सुनिश्चित करने वाले कानून और कार्यक्रम की उपादेयता सुनिश्चित होती है पर संसद अगर शोर-शराबे की ही शिकार होती रहेगी तो ऐसा सोचना बेमानी होगा। पूरे मानसून सत्र में हुए शोर-शराबे से तो यही लगता है कि गैर मर्यादित भाषा और तनी हुई भंवों के बीच पक्ष और विपक्ष दोनों पानी-पानी तो हुए मगर देश की प्यास बुझाना मुश्किल बना रहा। Monsoon Session</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि मणिपुर हिंसा का मुद्दा लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव तक पहुंचने के बाद सरकार और विरोधी पक्ष के बीच संसद के बाहर और भीतर घमासान जारी रहा। विदित हो कि बीते मई की शुरूआत से ही मणिपुर वर्ग संघर्ष में कहीं अधिक हिंसा से लिप्त रहा जिसे लेकर विपक्ष मुखर था। यह रार तब और पेचीदा हुआ जब विपक्षी गठबंधन ने अविश्वास प्रस्ताव को बहस से पहले संसद में बिना चर्चा किए विधेयक सत्र के शुरू में ही पारित करा लिया। जाहिर है विपक्ष ने ऐतराज करते हुए सरकार पर संसदीय नियमों और परम्पराओं को तोड़ने का आरोप लगाया। 303 सीट वाली अकेले बीजेपी और गठबंधन सहित 350 का आंकड़ा रखने वाली बीजेपी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा क्यों हुई यह नए सिरे से चिंतन का विषय है। Monsoon Session</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष का एक औजार है और कई मौकों पर इसका उपयोग होता रहा है। वजह जो भी हो फिलहाल विरोधियों को इस अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता था। देखा जाए तो मणिपुर से मानसून सत्र सराबोर था। विपक्षी नेता राहुल गांधी की लगभग साढ़े चार महीने बाद एक बार सदन में एंट्री हुई। गौरतलब है देश की शीर्ष अदालत ने उनकी सजा पर रोक लगाते हुए राहुल गांधी को सदन तक पहुंचाया। सत्ता को अपनी छवि बचाने का पूरा ध्यान था। मानसून सत्र तमाम आरोप-प्रत्यारोप की बाढ़ लिए हुए था। इसमें जनता को क्या फायदा है यह विचारणीय जरूर है कि सत्र आते हैं और बिना खास प्रदर्शन के अगले की बाट जोहने को मजबूर कर देते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अविश्वास का प्रस्ताव एक संसदीय प्रस्ताव है जिसे पारम्परिक रूप से विपक्ष द्वारा संसद में एक सरकार को हराने या कमजोर करने की उम्मीद से रखा जाता है। आमतौर पर जब संसद अविश्वास प्रस्ताव में वोट करती है या सरकार विश्वास मत में विफल रहती है तो उसे त्यागपत्र देना पड़ता है या संसद को भंग करने और आम चुनाव की बात शामिल रहती है। फिलहाल इसके आसार दूर-दूर तक नहीं थे क्योंकि 543 सदस्यों वाली लोकसभा में अकेले भाजपा 300 के पार हैं और गठबंधन के साथ यह आंकड़ा कहीं अधिक बढ़त लिए हुए है ऐसे में अविश्वास को लेकर बहस बड़ी हो सकती थी पर सरकार को हिलाया नहीं जा सकता था और हुआ भी यही।</p>
<p style="text-align:justify;">अविश्वास तथा निंदा जैसे प्रस्ताव विपक्षियों के औजार हैं पर इसे कब प्रयोग करना है इसे भी समझना बेहद जरूरी है। इसके पहले साल 2018 के बजट सत्र में भी मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की मांग तेज हुई थी। देखा जाए तो यह दूसरा मौका है जब विरोधी अविश्वास प्रस्ताव को लेकर सजग दिखाई दिए मगर दोनों स्थितियों से उनका दूर-दूर तक नाता नहीं था। पड़ताल बताती है लोकतंत्र के संसदीय इतिहास में सबसे पहले जवाहरलाल नेहरू सरकार के खिलाफ यह प्रस्ताव अगस्त 1963 में जेबी कृपलानी ने रखा था लेकिन इसके पक्ष में केवल 52 वोट पड़े थे जबकि प्रस्ताव के विरोध में 347 वोट थे।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि मोदी सरकार के विरूद्ध पिछले नौ सालों में दूसरी बार अविश्वास प्रस्ताव लाए जाने की बात हो रही है जबकि इन्दिरा गांधी सरकार के खिलाफ सर्वाधिक 15 बार तथा लाल बहादुर शास्त्री और नरसिम्हाराव राव सरकार को तीन-तीन बार ऐसे प्रस्तावों का सामना करना पड़ा है। नेहरू शासनकाल से अब तक 25 बार अवश्विास प्रस्ताव सदन में लाए जा चुके हैं जिसमें 24 बार ये असफल रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">1978 में ऐसे ही एक प्रस्ताव से सरकार गिरी थी। वैसे मोरारजी देसाई सरकार के खिलाफ दो अविश्वास प्रस्ताव रखे गए थे पहले में तो उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई परन्तु दूसरे प्रस्ताव के समय उनकी सरकार के घटक दलों में आपसी मतभेद थे। हालांकि उन्हें अपनी हार का अंदाजा था और मत विभाजन से पहले इस्तीफा दे दिया था। देखा जाय तो विपक्ष में रहते हुए अटल बिहारी वाजपेयी भी एक बार इन्दिरा गांधी के खिलाफ और दूसरी बार नरसिंह राव के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव रख चुके हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गौरतलब है कि लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए नोटिस तभी स्वीकार किया जाता है जब उसके समर्थन में 50 सदस्य हों। मुख्य विपक्षी कांग्रेस के पास कुल 52 का आंकड़ा तो है। हालांकि जिस प्रकार विरोधी इन दिनों इण्डिया के बैनर तले एकजुटता दिखाई गई उससे मनोबल तो बढ़ सकता है मगर बहुमत से भरी सरकार को रौंदा नहीं जा सकता था। मुद्दा यह है कि अविश्वास प्रस्ताव लाने वाले के पास जब चंद आंकड़े जुटाना भी मुश्किल था तो बड़ी कूबत वाली सरकार की कुर्सी कैसे हिला पाते। खीज के चलते कांग्रेस समेत वामपंथ या अन्य सरकार के विरोधी हो सकते हैं पर इनकी स्थिति भी बहुत दयनीय है। वैसे भाजपा तथा उनके सहयोगियों में सब कुछ अच्छा ही चल रहा है पूरी तरह कहना कठिन है पर सरकार बचाने में उनका मत सरकार के साथ न हो यह भी नहीं हो सकता था।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलहाल अविश्वास प्रस्ताव एक विरोधी संकल्पना है जिसका उपयोग किया जाना कोई हैरत वाली बात नहीं। संदर्भित बात यह है कि सदन का कीमती वक्त रोज हंगामे की भेंट चढ़ता रहा भारी-भरकम पूर्ण बहुमत वाली सरकार का बीते नौ सालों में कोई भी ऐसा सत्र नहीं रहा जिसमें विरोधियों ने सरकार को न घेरा हो। सत्र से पहले सर्वदलीय बैठक भी यहां काम नहीं आ रही है। एक-दूसरे की लानत-मलानत और छींटाकशी में वक्त बीतता गया। जबकि 2024 मुहाने पर है जहां 18वीं लोकसभा का एक बार फिर गठन होना है। देश के राजनेता जो राजनीति करें वही जनता को देखना होता है चाहे अच्छा करें या अच्छा न करे।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलहाल विपक्ष सत्ता की परछाई होती है। विरोधियों की आपत्ति भी जनहित में काम आती है और सरकार की नीतियां भी हित सुनिश्चित ही करती हैं। ऐसे में भाषा की मर्यादा, जन भावनाओं का सम्मान के साथ ही संसद के भीतर शोर करने की बजाय शान्ति और खुशहाली से जुड़े नियोजन पर काम किया जाए तो सरकार और विपक्ष दोनों के लिए अच्छा रहेगा। आगे यह ध्यान देना कहीं अधिक जरूरी है कि सत्ता और विपक्ष दोनों संयम का भी पालन करें और सरकार के मंत्री विरोधियों के मामले में दुश्मन की तरह पेश न आएं। यह लोकतंत्र है यहां जनता की ताकत से नेताओं को कूबत मिलती है। सदन कोई जंग का मैदान नहीं है। Monsoon Session</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं प्रशासनिक चिंतक (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="India Wins Asian Champions Trophy Hockey: भारतीय टीम ने रचा इतिहास, मलेशिया को हरा चौथी बार जीती एशियन हॉकी चैम्पियंस ट्रॉफी" href="http://10.0.0.122:1245/india-wins-asian-champions-trophy-hockey/">India Wins Asian Champions Trophy Hockey: भारतीय टीम ने रचा इतिहास, मलेशिया को हरा चौथी बार जीती एशि…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 13 Aug 2023 15:21:45 +0530</pubDate>
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                <title>Food Grains: गहराते खाद्यान्न संकट पर भारत का रूख</title>
                                    <description><![CDATA[Food Grains: काला सागर अनाज समझौते से बाहर निकल जाने के कारण दुनिया के बाजार पहले से ही खाद्यान्न संकट से जूझ रहे थे। अब भारत सरकार के इस फैसले ने बाजार की नींद उड़ा दी है। प्रतिबंध की खबर आते ही वैश्विक बाजारों में हलचल बढ़ गई। जनता से लेकर व्यापारियों तक ने चावल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/indias-stand-on-the-deepening-food-crisis/article-50996"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/wheat.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Food Grains: काला सागर अनाज समझौते से बाहर निकल जाने के कारण दुनिया के बाजार पहले से ही खाद्यान्न संकट से जूझ रहे थे। अब भारत सरकार के इस फैसले ने बाजार की नींद उड़ा दी है। प्रतिबंध की खबर आते ही वैश्विक बाजारों में हलचल बढ़ गई। जनता से लेकर व्यापारियों तक ने चावल का भंडारण करना शुरू कर दिया है। अमेरिका के सुपर मार्केट्स में चावल की कीमतें आसमान पर पहुंच गई हैं। दुकानों के बाहर ग्राहकों को लंबी कतारें दिख रही है। कहा तो यह भी जा रहा है कि जो माल रास्ते में है, उसकी कीमत भी 50-100 डॉलर प्रति टन तक बढ़ गई है। पुरे घटनाक्रम पर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने आक्रामक रूख दिखाया है और कहा है कि भारत को प्रतिबंध हटा लेना चाहिए अन्यथा भारत को जवाबी कार्रवाई के लिए तैयार रहना चाहिए। Food Grains</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, पिछले कुछ समय से देश के भीतर खाद्य पदार्थों की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। चावल की घरेलू कीमतों में साल भर में करीब 11.5 फीसदी का इजाफा हुआ है। विपक्ष मंहगाई के नाम पर सरकार को कठघरे में खड़े कर रहा है। टमाटर की कीमतों को लेकर लोग सरकार से सवाल कर रहे हैं। अगले कुछ महीनों में राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ व तेलगाना में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में सरकार को अंदेशा था कि अनाज की बढ़ती हुई कीमतें चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बन सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इसलिए सरकार ने घरेलू बाजार में गैर-बासमती चावल की पर्याप्त उपलब्धता सुनिश्चित करने और कीमतों पर लगाम लगाने के लिए तत्काल प्रभाव से चावल के निर्यात पर रोक लगाने का फैंसला किया। हालांकि, इससे पहले सरकार ने पिछले साल अगस्त में गैर-बासमती चावल के निर्यात पर 20 फीसदी का निर्यात शुल्क लगा कर देश में चावल की उपलब्धता बढ़ाने की कोशिश की थी। लेकिन स्थिति में बहुत ज्यादा परिवर्तन न देखकर अब इसके निर्यात पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, सरकार के इस निर्णय को सियासी लाभ की दृष्टि से उठाया हुआ कदम कहा जा रहा है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल की बढ़ती कीमतों के लिए अकेले भारत को ही जिम्मेदार ठहरना सही नहीं है। दरअसल, दुनियाभर में निर्यात होने वाले चावल की 90 फीसदी फसल एशिया में पैदा होती है। पिछले कुछ समय से अल-नीनो और मौसम में बदलाव की वजह से चावल में उत्पादन की कमी आने की आशंका व्यक्त की जा रही थी। उत्पादन से जुड़ी तमाम अनिश्चितताओं के कारण बड़े अनाज व्यापारियों ने चावल का स्टॉक करना शुरू कर दिया। परिणाम स्वरूप कीमतों में अप्रत्याशित वृद्धि हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">द्वितीय, रूस के काला सागर अनाज समझौते से बाहर निकलने के निर्णय के चलते खाद्यन की कीमतें बढ़ी। अब भारत सरकार के इस फैंसले के बाद उसमें और तेजी आ गई । तृतीय, चावल निर्यात करने वाले देशों की सूची में भारत के बाद क्रमश: दूसरे और तीसरे स्थान पर थाईलैंड और वियतनाम आते है। चावल निर्यात के मामले में दोनों देशों को भारत का प्रतिस्पर्धी कहा जाता है। जुलाई के अंत में भारत ने जैसे चावल निर्यात पर रोक का ऐलान किया वैसे ही इन दोनों देशों ने निर्यात पर 10 फीसदी कीमतें बढ़ा दी। नतीजतन अंतरराष्ट्रीय बाजार में चावल महंगा हो गया। जहां तक देश के भीतर चावल की कीमते बढ़ने का सवाल है तो इसकी बड़ी वजह न्यूनतम समर्थन मुल्य में हुए इजाफे को कहा जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत पिछले कुछ वर्षों से दुनिया का शीर्ष चावल निर्यातक देश बना हुआ है। विश्व के कुल चावल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 40 फीसदी है। दुनिया के तकरीबन 140 से अधिक देश भारत से गैर बासमती चावल का खरीदते हैं। साल 2022 में भारत ने रिकॉर्ड 22.2 मिलियन टन चावल का निर्यात किया था। देश से गैर-बासमती चावल का कुल निर्यात 2022-23 में 4.2 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था। जो इससे पहले वित्त वर्ष 2021-22 में 3.3 मिलियन डॉलर का था। मौजूदा वित्त वर्ष 2023-24 (अप्रेल-जून) में 15.54 लाख टन गैर बासमती चावल का निर्यात किया गया है, जो पिछले साल 2022-23 के मुकाबले 35 फीसदी ज्यादा हैं। Food Grains</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर कहा जाए तो दुनिया के चार सबसे बड़े निर्यातक देश थाईलैंड, वियतनाम, पाकिस्तान और अमेरिका चावल का जितना निर्यात करते हैं, भारत अकेला उनसे अधिक निर्यात करता है। ऐसे में भारत द्वारा चावल निर्यात पर रोक लगाए जाने के फैसले बाद वैश्विक आपूर्ति मे करीब एक करोड़ टन की कमी आ सकती है। थाईलैंड और वियतनाम की स्थिति ऐसी नहीं है कि इस बड़ी कमी को पूरा कर सके। यही वजह है कि खाद्यान्न संकट से जूझ रहे देशों के माथे पर चिंताएं की लकीरे उभरने लगी हैं। खासतौर से उन छोटे अफ्रीकी देशों के जो भारत से आने वाले अनाज पर निर्भर करते हैं। Food Grains</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, देश के भीतर भी सरकार के इस फैंसले को कोई बहुत अच्छा नहीं माना जा रहा है। अनुमान है कि प्रतिबंध के इस फैंसले से भारत को कई मोर्चों पर नुकसान उठाना पड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि जिस तरह से थाईलैंड और वियतनाम ने आपदा में अवसर को तलाशते हुए निर्यात पर 10 फीसदी की बढ़ोतरी की है, उसी तर्ज पर भारत को भी निर्यात मूल्य में वृद्धि कर बढी हुई कीमतों का फायदा उठाना चाहिए था। दूसरा, भारत के इस कदम से देश के किसानों के भीतर भी निराशा का माहोल बनेगा। Food Grains</p>
<p style="text-align:justify;">निर्यात पर प्रतिबंध के फैंसले के कारण देश के किसान उस लाभ से वंचित रह जाएंगे जो अंतरराष्ट्रीय बाजार में बढ़ी हुई कीमतों के चलते उन्हें मिल सकता था। इससे किसानों के बीच निराशा का भाव उत्पन्न और वे धान की खेती से मुंह फेरने लगेगें। तृतीय, सबसे अहम बात यह है कि सरकार के इस फैंसले से वैश्विक बाजार में भारत की विश्वसनीय व्यापारिक साझेदार की छवि पर बट्टा लग सकता है। ऐसे में भारत को अपने फैंसले पर फिर से विचार करना चाहिए । दुनिया भर में 3 अरब से अधिक लोग चावल को मुख्य खाद्यान्न के रूप में इस्तेमाल करते है। ऐसे में भारत को अपनी विदेश नीति के आधार वाक्य वसुधैव कुटम्बकम के सिद्धांत पर चलते हुए संतुलन का एक ऐसा मार्ग तलाशना चाहिए जिस पर चलकर हम अपने राष्ट्रीय हित को साधने के साथ-साथ दुनिया को आसन्न खाद्यान्न संकट की चिंता से मुक्ति दिला सके। Food Grains</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>डॉ. नंद किशोर सोमानी, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="PM Kisan Scheme: पीएम किसान योजना की 15वीं किस्त के लिए आज से कर सकते हैं आवेदन, जानें आपको कैसे मिलेगा लाभ" href="http://10.0.0.122:1245/pm-kisan-scheme-15th-installment/">PM Kisan Scheme: पीएम किसान योजना की 15वीं किस्त के लिए आज से कर सकते हैं आवेदन, जानें आपको कैसे मिल…</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Wed, 09 Aug 2023 15:09:58 +0530</pubDate>
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                <title>Imran Khan: सेना व कोर्ट की जुगलबंदी का शिकार हुए इमरान खान</title>
                                    <description><![CDATA[Imran Khan: पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को हुई सजा और गिरफ्तारी के दुष्परिणाम समझने के लिए सेना की भूमिका समझनी होगी। सेना और कोर्ट की जुगलबंदी को समझना होगा। पाकिस्तान के लोकतंत्र के भविष्य को देखना होगा। क्या इस घटना से पाकिस्तान में लोकतंत्र कमजोर होगा? पाकिस्तान में अराजकता बढ़ेगी? पाकिस्तान की आर्थिक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/imran-khan-became-victim-of-jugalbandi-of-army-and-court/article-50943"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/artical-imran-khan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Imran Khan: पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान को हुई सजा और गिरफ्तारी के दुष्परिणाम समझने के लिए सेना की भूमिका समझनी होगी। सेना और कोर्ट की जुगलबंदी को समझना होगा। पाकिस्तान के लोकतंत्र के भविष्य को देखना होगा। क्या इस घटना से पाकिस्तान में लोकतंत्र कमजोर होगा? पाकिस्तान में अराजकता बढ़ेगी? पाकिस्तान की आर्थिक समस्याएं और भी गहराएंगी? पाकिस्तान एक असफल देश के रूप में दुनिया के सामने खड़ा होगा? क्या सेना और वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व कीमती वस्तुओं को गबन करने और बेचने का हथकंडा बना कर इमरान खान की राजनीतिक छवि को जमींदोज करना चाहते हैं? Imran Khan</p>
<p style="text-align:justify;">पहले तख्तापलट से सेना राजनीतिक नेतृत्व को कुचलती थी और फांसी पर चढ़ाती थी। लेकिन अब कोर्ट को माध्यम बना कर राजनीतिक नेतृत्व का सेना दमन करती है। न्यायिक फैसलों से लोकतंत्र को कुचलने के लिए सेना की नीति बहुत खतरनाक है। पाकिस्तान में असली सत्ता सेना के पास होती है, चुनी हुई लोकतांत्रिक सरकार भी सेना की गुलाम होती है, न्यायपालिका भी गुलाम होती है, सेना ही तय करती है, आंतरिक नीति, विदेश नीति और सुरक्षा नीति। चुनी हुई सरकार तो सिर्फ मोहरा होती है, हाथी के दांत के समान होती है। Pakisthan</p>
<p style="text-align:justify;">इसीलिए दुनिया कभी पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व पर विश्वास ही नहीं करती है, उसकी स्वतंत्रता को स्वीकार ही नहीं करती है और यह मानती है कि जब तक सेना की इच्छा या सहमति नहीं हो तब तक पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व से किसी भी प्रकार की बातचीत या फिर सहमति और असहमति की कूटनीति बेकार है, समय की बर्बादी है। यह भी सही है कि राजनीतिक नेतृत्व सेना की इच्छा और सहमति के बिना न तो आंतरिक सुरक्षा नीति तय कर पाता है और न ही बाह्य सुरक्षा नीति तय कर सकता है। यही कारण है कि अमेरिका जैसा बलवान देश भी पाकिस्तान से अपनी सुविधाओं और हितों की रक्षा को लेकर सेना को ही विश्वास में लेता था। Artical</p>
<h3>सेना की इच्छा की अवहेलना करने का दुष्परिणाम बहुत ही लोमहर्षक | Imran Khan</h3>
<p style="text-align:justify;">सेना की इच्छा की अवहेलना करने वाले लोकतांत्रिक शासकों की स्थिति और दुष्परिणाम बहुत ही लोमहर्षक होते हैं, खतरनाक होते हैं और बेमौत मरने जैसे होते है। जुल्फीकार अली भुट्टों ने सेना की अवहेलना की थी। अपने आप को सेना का भी बॉस समझने की कोशिश की थी। क्या दुष्परिणाम हुआ? दुष्परिणम बहुत ही भयानक हुआ, जहरीला हुआ और हिंसक हुआ। जुल्फीकार अली भुट्टो का तख्तापलट हो गया। जियाउल हक सीधे तौर पर तानाशाह बन गया। उसने चुने हुए प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो को पकड़ कर जेल में डाल दिया। फर्जी ढंग से मुकदमे चलाए गए, फर्जी ढंग से तथ्य गढेÞ गए। फिर न्यायपालिका गुलाम बन गई। जुल्फीकार अली भुट्टो को फांसी हो गई। भुट्टो को फांसी पर लटका दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">एक भविष्यवान नेता असमय मौत के मुंह में ढकेल दिया गया। नवाज शरीफ ने भी अपने आप को सेना का बॉस समझ लिया था। सेनाध्यक्ष परवेज मुशर्रफ को हटाने की कोशिश की थी। परवेज मुशर्रफ ने तख्ता पलट दिया और खुद शासक बन गया। नवाज शरीफ को जेल में डाल दिया गया। सऊदी अरब के हस्तक्षेप से नवाज शरीफ की जान बची थी, फांसी पर चढ़ने से बचे थे। लेकिन सऊदी अरब में निर्वासित जिंदगी जीने के लिए विवश हुए थे। बेनजीर भुट्टो को सरेआम गोलियां मार दी गईं। आरोप सेना पर ही लगा। एक बार फिर नवाज शरीफ पाकिस्तान की राजनीति में प्रविष्ट जरूर हुए पर सेना द्वारा प्रपंच में उनकी हैसियत और छवि डूब गई, सेना की इच्छा की पूर्ति न्यायपालिका की कसौटी पर हो गई। नवाज शरीफ को सजा हुई और वे राजनीति के अयोग्य घोषित कर दिए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">इमरान खान भी सेना की ही पैदाइश हैं। कभी सेना ने ही उन्हें अपना हथकंडा बनाया था। इस तरह पाकिस्तान की आंतरिक और बाह्य नीतियों पर भी सेना की ही इच्छा और कब्जा रहेगा। इसी कारण चुनावों में धांधली कर इमरान खान को जीताया गया और प्रधानमंत्री बनवाया गया। प्रारंभ में इमरान खान ने सेना की हर स्थितियां-परिस्थितियां अनुकूल बनाई। लेकिन सेना और इमरान खान के बीच में परिस्थिति प्रतिकूल होने के दो कारण प्रमुख रहे। एक बड़ा कारण पीएम नरेन्द्र मोदी हैं और दूसरा कारण सेना का आतंरिक प्रबंधन में हस्तक्षेप है। पीएम नरेन्द्र मोदी ने कश्मीर से धारा 370 हटा कर पाकिस्तान को बड़ा झटका दिया था और पाकिस्तान की पूरी हेकड़ी तोड़ डाली थी।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान की सेना चाहती थी कि इमरान खान अमेरिका को मैनेज करे और पूरे विश्व को भारत के खिलाफ खड़ा कर दे। भारत से युद्ध की भी संभावना तलाशी जाए। लेकिन इमरान खान पूरी कोशिश करने के बाद भी न तो अमेरिका को अपनी ओर झुका सके और न ही शेष दुनिया को भारत विरोधी बना सके। पीएम मोदी के नेतृत्व के सामने दुनिया दुश्मनी मोल लेने के लिए तैयार नहीं हुई, इतना ही नहीं बल्कि मुस्लिम दुनिया यानी कि सऊदी अरब व इस्लामिक आर्गेनाइजेशन के सदस्य देशों ने भी पीएम मोदी की नाराजगी के डर से बहुत तीखी प्रतिक्रिया नहीं दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">अफगानिस्तान को लेकर सेना और इमरान खान में मतभेद थे। सरकार के दिन-प्रतिदिन के काम में सेना का हस्तक्षेप खतरनाक ढंग से बढ़ा हुआ था। इस कारण इमरान खान सेना से नाराज थे। वे चाहते थे कि सेना के शीर्ष पद पर बैठने का फैसला हम करें। ऐसे भी इस प्रसंग में इमरान खान की सोच गैर जरूरी या गलत नहीं थी। चुनी हुई सरकार के अधीन ही सेना कार्य करती है। पाकिस्तान के लोकतांत्रिक संविधान में भी इस तरह का प्रावधान है। खासकर सेना अध्यक्ष और आईएसआई की कुर्सी पर बैठने वाले लोगों का भाग्य तय करने का अधिकार इमरान खान को था। इमरान खान ने इसके लिए प्रयास भी किए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने आईएसआई और सेनाध्यक्ष को बदलने की कोशिश की थी। सेना को यह कैसे सहन हो सकता था कि उनकी बिल्ली ही उन्हें म्याऊं-म्याऊं बोले और आंख तरेरे। सेना के इशारे पर इमरान खान के खिलाफ बगावत होती है, विद्रोह होता है, गठबंधन के समर्थक दल अलग होते हैं। इमरान खान ने भी सेना का सामना किया, सेना को औकात बताने की कोशिश की, कोर्ट के आदेश के प्रति भी सहानुभूति दिखाने से पीछे हट गए। राजनीतिक स्थिति खतरनाक होने के कारण सेना को अप्रत्यक्ष तौर पर हस्तक्षेप करना पड़ा। इस कारण सेना और इमरान खान की पार्टी के बीच हिंसक स्थितियां भी उत्पन्न हुर्इं। विजयी तो वही होता है, जिसके साथ सेना खड़ी होती है। सेना इमरान खान के खिलाफ खड़ी थी। इसलिए इमरान खान की प्रधानमंत्री की कुर्सी चली गई। Imran Khan</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में जितने भी प्रधानमंत्री और राष्टÑपति के पद पर बैठे हुए राजनीतिज्ञ हैं, उन सबका हस्र न्यायपालिका की कसौटी पर ही हुआ है। आसिफ जरदारी आर्थिक गड़बड़ी की कसौटी पर न्यायपालिका के शिकार बने, नवाज शरीफ भी न्यायपालिका के फैसले के कारण राजनीति के क्षेत्र में अयोग्य घोषित किए गए और उन पर भी सजा की चोट पहुंची है। अब यह तय हो गया कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर जो भी बैठेगा उसका हस्र इसी प्रकार से होगा, सेना और कोर्ट की जुगलबंदी इसी तरह से जारी रहेगी। सेना अपनी इच्छा की पूर्ति के लिए न्यायपालिका का इसी तरह से दुरुपयोग करती रहेगी। सेना को कई प्रकार के हथकंडे आगे भी मिलते रहेंगे। Imran Khan</p>
<p style="text-align:justify;">यह सही है कि इमरान खान ने कुछ कीमती सामानों को निजी बता कर इस्तेमाल किया या फिर उसे निजी संपत्ति मान कर बेच दिया। इमरान खान की यह कार्रवाई जरूर नैतिकता और कानून की दृष्टि से सही नहीं है। इसलिए कि ये कीमती वस्तुएं इमरान खान को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठे होने के कारण मिली थी। इसलिए उस पर पूरे पाकिस्तान का अधिकार बनता है। पर न्यायपालिका को लोकतंत्र के प्रति भी सोच विकसित करनी चाहिए थी, चिंता करनी चाहिए थी। सेना और कोर्ट की इस तरह की जुगलबंदी से पाकिस्तान एक सफल देश तो कभी नहीं बनेगा। Imran Khan</p>
<p style="text-align:right;"><strong>विष्णु गुप्त, वरिष्ठ स्तम्भकार एवं स्वतंत्र पत्रकार</strong></p>
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                <pubDate>Tue, 08 Aug 2023 10:14:57 +0530</pubDate>
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