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                <title>Story Last Wish - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>कहानी अन्तिम इच्छा</title>
                                    <description><![CDATA[अब हमारे माँ-बाप और बड़े भईया तो इस दुनिया में रहे नहीं, जिनसे हम अपने गुनाहों की माफी माँग सकें, लेकिन मरने के बाद हम अपने पिता जी की अंतिम इच्छा को जरूर पूरा करेंगे। (Story Last Wish) सत्तर की आयु पार करते ही देवधर के शरीर ने साथ देना छोड़ दिया। दमे की शिकायत […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/literature/story-last-wish/article-48089"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-05/story-last-wish.jpg" alt=""></a><br /><h5 style="text-align:justify;">अब हमारे माँ-बाप और बड़े भईया तो इस दुनिया में रहे नहीं, जिनसे हम अपने गुनाहों की माफी माँग सकें, लेकिन मरने के बाद हम अपने पिता जी की अंतिम इच्छा को जरूर पूरा करेंगे। (Story Last Wish)</h5>
<p style="text-align:justify;">सत्तर की आयु पार करते ही देवधर के शरीर ने साथ देना छोड़ दिया। दमे की शिकायत तो उन्हें काफी समय पहले से थी। सर्दी के दिनों में जब उनकी साँस उखड़ जाती तो खाँसते-खाँसते वह बेदम हो जाते। कई-कई रातें उनकी खाँसी की भेंट चढ़ जातीं, मगर दमे से उन्होंने कभी हार नहीं मानी, न कभी अपनी इस बीमारी से टूटे। वह टूटे तो तब भी नहीं थे, जब पाँच साल पहले अचानक हृदय गति रुक जाने से उनकी पत्नी उन्हें हमेशा के लिए अकेला छोड़कर संसार से चली गईं थीं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="कसाईखाना" href="http://10.0.0.122:1245/slaughter-house/">कसाईखाना</a></p>
<p style="text-align:justify;">दु:ख की उस घड़ी में भी उन्होंने यह सोचकर अपने मन को समझा लिया था कि जीना और मरना तो विधि का विधान है, इंसान इसमें कुछ नहीं कर सकता। मगर अचानक सड़क दुर्घटना में हुई बड़े बेटे की मौत ने उन्हें दिल-ओ-दिमाग से ही नहीं, शरीर से भी तोड़ दिया था। उस दिन तो वह ऐसे फूट-फूट कर रो रहे थे कि किसी के चुप कराए चुप नहीं हो रहे थे। किसी की तसल्ली, किसी की सहानुभूति उनके आँसुओं को नहीं रोक पा रही थी। उस दिन लोगों को इस बात का अहसास हो गया था कि देवधर अपने बच्चों से बेहद प्यार करते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">औलाद के नाम पर भगवान् ने देवधर को तीन बेटे ही दिये थे, जिनकी परवरिश उन दोनों पति-पत्नी ने बड़ी हसरतों से की थी। जिन्दगी की सारी पूँजी देवधर ने अपने तीनों बेटों की पढ़ाई-लिखाई और उनके शादी-ब्याह में खर्च कर दी थी। जायदाद के नाम पर उनके पास एक छोटा-सा पुश्तैनी मकान और दो छोटी दुकानें थीं, जिनके किराये से वह अपनी बड़ी विधवा बहू और उसके बच्चों की गुजर-बसर कर रहे थे। दोनों छोटे बेटे अपने-अपने बीबी-बच्चों के साथ दिल्ली में रहते थे। पत्नी की मृत्यु के बाद देवधर ने उन दोनों से कहा भी था कि दोनों भाई उनके पास आकर रहेंगे तो अच्छा रहेगा, लेकिन उन दोनों ने दिल्ली से आने के बाद अच्छी जॉब न मिलने का बहाना बनाकर उनकी बात को हमेशा टाल दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">माँ की मृत्यु से पहले दोनों भाई कभी-कभार माँ-बाप से मिलने भी आ जाते थे और देवधर को थोड़ा-बहुत खर्चे-पानी के लिए पैसे भी दे जाते थे, लेकिन माँ के मरने के बाद दोनों अपने पिता और बड़े भाई-भाभी को भूल से गये थे। देवधर कभी उनसे न आने की शिकायत भी करते तो दोनों अपने बच्चों की पढ़ाई का नुकसान होने का बहाना बना देते या फिर यह कहकर देवधर को समझा देते कि उनकी बीबियों को ए.सी. में रहने की आदत है और आपके यहाँ एक कूलर भी नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके यहाँ घर के काम के लिए नौकर हैं, और आपके यहाँ सारा काम अपने हाथों से करना पड़ता है। ऐसे में हम यहाँ आकर कैसे रह सकते हैं? फिर हम सोसायटी वाले लोग हैं। हमारा अपना एक स्टेटस है, लेकिन यहाँ क्या है? न कोई स्टेटस और न कोई सोसायटी। उनकी बातें सुनकर देवधर को दु:ख तो बहुत होता, मगर वह उस दु:ख को व्यक्त नहीं कर पाते और चुप होकर मन में सोचते रहते कि मेरा ही खून होकर, मुझसे ही स्टेटस और सोसायटी की बात करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जब छोटे बेटों ने उनकी नहीं सुनी तो उन्होंने बड़े बेटे से आग्रह किया कि वह भी अच्छा-भला पढ़ा-लिखा है। यहाँ रहकर प्राइवेट नौकरी करके अपना और अपने बच्चों का भविष्य काला करने से तो अच्छा है, दिल्ली चला जाये और अपने छोटे भाइयों की तरह खुशहाल जिन्दगी बसर करे। लेकिन बड़े बेटे ने तंगहाली और बदहाली झेलकर पिता की सेवा और देख-रेख करना उचित समझा।</p>
<p style="text-align:justify;">दो साल पहले बड़े बेटे की मौत के बाद उसकी पत्नी सुनंदा ने देवधर को बहुत समझाया कि वह अपने दोनों छोटे बेटों के पास दिल्ली चले जायें। वहाँ रहकर कम-से-कम बुढ़ापा तो चैन से कटेगा। अच्छी-भली चीज खाने को मिलेगी तो आयु के कुछ दिन और बढ़ जायेंगे। यहाँ क्या है, मुश्किल से एक वक़्त की रोटी मिल पाती है, वो भी रूखी-सूखी, जिन्हें बूढ़े दाँतों को चबाना और बूढ़ी आँतों को पचाना मुश्किल हो जाता है। लेकिन देवधर यही कहकर खामोश हो जाते कि ताने और दुत्कार की खीर खाने से तो इज्जत की सूखी रोटी भली है।</p>
<p style="text-align:justify;">समय का चक्र अपनी धुरी पर घूम रहा था। बीमारी के बिस्तर पर पड़े-पड़े देवधर यही सोच-सोचकर दिन-व-दिन मोमबत्ती की तरह पिघल रहे थे कि सुनंदा की पहाड़-सी जिन्दगी कैसे कटेगी? कैसे पढ़एगी-लिखाएगी अपने बच्चों को? यहाँ तो मदद के नाम पर भी इंसान अकेली अबला के शरीर को भूखे भेड़िए की तरह घूरने लगता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यही सब सोचते-सोचते उनकी कमजोरी ने रफ़्तार पकड़ ली। सही इलाज और दवा न मिलने के कारण खाँसी एक मिनट के लिए भी खामोश नहीं होती। खाँसते-खाँसते फेफड़े दुखने लगते। आँखें बाहर को निकल आतीं। सुनंदा मन मसोसकर और छटपटाकर रह जाती। बेचारी कर भी क्या सकती थी? उसके पास-पल्ले कुछ होता तो कुछ करती भी। दुकान के किरायेदारों से भी काफी कुछ एडवांस में ले चुकी थी। हार-झक मारकर बेचारी बार-बार अपने छोटे देवरों को फोन मिलाती और देवधर की पल-पल बिगड़ती हालत के बारे में बताती और उनसे आने और आकर पिताजी को देख जाने की गुहार लगाती, लेकिन उन दोनों में से किसी के ऊपर कोई असर न होता। दोनों कोई-न-कोई बहाना बनाकर उसे टाल देते।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन्दगी और मौत से जूझते हुए देवधर को एक दिन अचानक ऐसी खाँसी उठी, कि उसने थमने का नाम ही नहीं लिया। सुनंदा कभी अपने ससुर को पानी गरम करके पिलाती तो कभी उनकी पीठ मसलती, मगर खाँसी ने अपना जोर कम नहीं किया। सुनंदा की समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे, अपने ससुर को कैसे तसल्ली दिलाए। डॉक्टर भी सुनंदा की मजबूरी को सुनते-सुनते ऊब चुके थे, कोई भी उसे उधार दवा देने के लिए तैयार नहीं था।</p>
<p style="text-align:justify;">आखिरकार वही हुआ, जो होना था। खाँसते-खाँसते देवधर के मुँह से खून का फव्वारा छूटा और वह हमेशा के लिए खामोश हो गये। सुनंदा के हाथ से जैसे जिन्दगी खिसक गई। कुछ पल के लिए तो वह ऐसी हो गई, जैसे वह अपनी सुध-बुध खो बैठी हो। फिर उसने अपने आपको सँभाला और चिर-परिचितों को अपने ससुर के मरने की सूचना दे डाली। सूचना मिलते ही सभी नाते-रिश्तेदार आ गये, और देवधर के अंतिम संस्कार की सभी तैयारियाँ भी पूरी कर ली गईं, लेकिन देवधर के दोनों छोटे बेटे और उनके बीबी-बच्चे दिल्ली से अभी तक नहीं आये थे। सभी को उनका बेसब्री से इंतजार था। लम्बी प्रतीक्षोपरांत दोनों बेटे अपनी-अपनी कारों से आ गये। उन्हें देखकर उनके दूर के चाचा ने कहा, ‘‘बेटा, हम सब तुम लोगों की ही राह देख रहे थे। इतनी देर कैसे हो गई?’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘चाचा जी, दिल्ली कोई दस कदम पर तो है नहीं, जो छलाँग लगाते ही आ जाते। इतनी दूर से आने में देर तो लगती ही है। फिर मरने वाला तो मर गया, उसके चक्कर में अपना बिजनेस थोड़े ही छोड़ दिया जायेगा, उसे भी देखना पड़ेगा।’’<br />
मँझले की बात पूरी होने से पहले ही छुटका एकदम झल्ला कर बोला, ‘‘ओ हो चाचा जी, अब इन सब बेकार की बातों में वक़्त बरबाद करने से कोई फायदा नहीं है, जो करना है, जल्दी करो, क्योंकि हमें वापस भी जाना है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘तो क्या तुम दोनों आज ही चले जाओगे? और बाकी के संस्कार….?’’ चाचा जी ने आश्चर्य से पूछा तो मँझला झुँझला कर बोला, ‘‘चाचा जी, हिन्दू रीति-रिवाज और परम्परा के मुताबिक हमारे लिये पिता जी को मुखाग्नि देना जरूरी था, वरना हमारे पास तो साँस लेने की भी फुर्सत नहीं है।’’</p>
<p style="text-align:justify;">मँझले की बात सुनकर सुनंदा ने कहा, ‘‘देवर जी, आप लोग परेशान मत होइए। अगर आप लोगों के पास फुर्सत नहीं है तो आप लोग वापस दिल्ली चले जाइए और अपना काम-धन्धा देखिए। वैसे भी पिता जी की अंतिम इच्छा के मुताबिक उन्होंने मुखाग्नि देने का भी अधिकार आप दोनों को नहीं, मुझे दिया है, इसलिए यह काम मैं कर लूँगी, आप लोग जाना चाहें तो जा सकते हैं।’’ सुनंदा की बात सुनकर वहाँ खड़े सभी लोग भौचक्के रह गये और उसका मुँह ताकने लगे। ‘‘मैं ठीक कह रही हूँ देवर जी, अगर आप लोगों को मेरी बात पर यकीन नहीं हो रहा है तो वकील साहब खड़े हैं, यह खुद आप लोगों को बता देंगे, कि पिता जी की अंतिम इच्छा क्या थी।’’</p>
<p style="text-align:justify;">सुनंदा के कहते ही पास खड़े वकील साहब ने सबको सम्बोधित करते हुए कहा, ‘‘सुनंदा ठीक कह रही हैं। देवधर जी ने मरने से कुछ ही दिन पहले अपने पूरे होशो-हवास में अपनी वसीयत लिखवायी थी, लेकिन यह वसीयत पढ़ने का समय नहीं है, फिर भी मैं वसीयत पढ़कर सुना देता हूँ, ताकि आगे के लिए आप लोगों में कोई विवाद न रहे।’’ कहकर उन्होंने देवधर द्वारा लिखवायी वसीयत को पढ़ना शुरू किया, ‘‘मैं देवधर वल्द लीलाधर अपने पूरे होशो-हवास में अपनी वसयीत लिखवा रहा हूँ, इसमें किसी ने मुझसे कोई जोर-जबरदस्ती नहीं की है। न ही यह वसीयत किसी के दबाव में लिखी जा रही है। वैसे तो इस वसीयत को लिखवाने की कोई जरूरत नहीं थी, फिर भी मैं यह वसीयत लिखवा रहा हूँ, क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे मरने के बाद मेरे दोनों बेटों में से मुझे कोई बुरा-भला कहे। हालाँकि जायदाद के नाम पर मेरे पास इस समय सिर्फ एक पुश्तैनी मकान और दो छोटी दुकानें हैं, जो किराये पर चल रही हैं, जिनके किराये से मैं अपनी विधवा बहू और पोते-पोती का कर्चा चला रहा हूँ।’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘वैसे तो मेरी इस जायदाद पर मेरे दोनों छोटे बेटों का कोई हक नहीं बनता है, क्योंकि वह अपने बीबी-बच्चों समेत दिल्ली में रहते हैं और खुशहाल जिन्दगी बिता रहे हैं। दोनों के पास अच्छा बिजनेस भी हैं और सब कुछ होने के बावजूद भी इन दोनों ने मेरी कभी कोई सुधि नहीं ली, न ही मेरे सुख-दु:ख में कभी काम आये। जबकि मेरी बड़ी बहू सुनंदा विधवा है, उसके पास न तो कोई नौकरी है और न ही आय का कोई अन्य साधन, जिससे वह अपनी और अपने बच्चों की जीविका चला सके। इसलिए मेरी जो भी अचल संपत्ति है, उसकी हकदार केवल और केवल सुनंदा को ही होना चाहिए, क्योंकि सुनंदा ने साथ रहकर हर-हाल में मेरी सेवा-टहल की है।</p>
<p style="text-align:justify;">सुख-दु:ख में मेरा साथ दिया, फिर भी मैं उसका यह हक छीनकर अपने दोनों छोटे बेटों को दे रहा हूँ। क्योंकि मैं नहीं चाहता कि मेरे मरने के बाद वह दोनों मेरी बड़ी बहू सुनंदा को परेशान करें, उसे मारें-पीटें और उसका जीना मुश्किल कर दें, क्योंकि इनकी प्रवृत्ति पैसा हो गई है। इंसानी रिश्तों की इन्हें जरा भी परवाह नहीं है, मुझे मालूम है कि ये मेरे मरने के बाद सुनंदा का जीना दुश्वार कर देंगे। मुझे दु:ख है कि सुनंदा ने मेरे लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। मेरे लिए उसने अपनी खुशियाँ होम कर दीं और नि:स्वार्थ भाव से मेरी सेवा-टहल की, फिर भी मैं उसे सम्पत्ति के नाम पर कुछ नहीं दे रहा हूँ, क्योंकि मुझे सुनंदा पर पूरा भरोसा है कि वह बहुत हिम्मत वाली है और हर हाल में अपने बच्चों की परवरिश कर सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">मुझे सुनंदा पर यह भी भरोसा है कि वह मेरे इस फैसले के लिए मुझे माफ कर देगी। मेरे बेटे जैसे चाहें, इस सम्पत्ति को बेचकर आपस में बाँट सकते हैं। इसके अलावा मेरी हार्दिक इच्छा है कि मेरी मृत्यु के बाद मेरे मृत शरीर का दाह संस्कार मेरे दोनों बेटों से नहीं, बल्कि मेरी बड़ी बहू सुनंदा से करवाया जाए, यह मेरी अन्तिम इच्छा है और मुझे विश्वास है कि मेरी आत्मा की शांति के लिए मेरी यह इच्छा जरूर पूरी की जायेगी।’’ देवधर।</p>
<p style="text-align:justify;">देवधर की वसीयत के बारे में सुनकर उनके दोनों बेटों का सिर शर्म से नीचे झुक गया। उन्हें खामोश देखकर, उनके चाचा ने कहा, ‘‘बेटा, क्या सोच रहे हो? …ऐसे तो देवधर भईया के अन्तिम संस्कार का समय निकल जाएगा। …..क्या करना है, बोलो…?’’</p>
<p style="text-align:justify;">चाचा जी की बात पर मँझला गंभीर होकर बोला, ‘‘चाचा जी, गलती तो हमसे इतनी बड़ी हुई है कि उसका प्रायश्चित भी अगर हम करना चाहें, तो नहीं कर सकते हैं। सचमुच हमने अपने पैसे और बिजनेस के घमण्ड में जीते-जी अपने माँ-बाप और बड़े भाई-भाभी को कुछ नहीं समझा, हमेशा सबकी उपेक्षा करते रहे। लेकिन आज हमें पता चला कि दुनियां में माँ-बाप और भाई-बहन से बढ़कर कुछ भी नहीं है, पैसा भी नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">अब हमारे माँ-बाप और बड़े भईया तो इस दुनिया में रहे नहीं, जिनसे हम अपने गुनाहों की माफी माँग सकें, लेकिन मरने के बाद हम अपने पिता जी की अंतिम इच्छा को जरूर पूरा करेंगे, ताकि उनकी आत्मा को शांति मिल सके। चाचा जी, मुझे छुटके के बारे में तो नहीं पता कि वह क्या सोच रहा है, लेकिन मैं पिता जी की वसीयत में से कुछ भी नहीं लूँगा। पिता जी की वसीयत में से मेरा जो भी हिस्सा बनता है, उसे मेरी बड़ी भाभी को दे दिया जाए।’’</p>
<p style="text-align:justify;">‘‘भईया ठीक कह रहे हैं चाचा जी, पिता जी ने हमसे मुखाग्नि देने का हक छीनकर हमें यह अहसास करा दिया कि वास्तव में हमसे बहुत बड़ी भूल हुई है, जीते-जी हमने अपने माँ-बाप की सुधि नहीं ली। हमारी वजह से उनका दिल दु:खा। हम इस लायक नहीं हैं कि हमें माफ किया जाए। हम सुनंदा भाभी के भी गुनाहगार हैं, उनके बुरे वक़्त पर भी हमने उनका और उनके बच्चों का ख्याल नहीं किया। जबकि भाभी ने आर्थिक और मानसिक तंगी को झेलकर भी हमारे माता-पिता की सेवा टहल की। मुसीबत के दिनों में भी उनका साथ नहीं छोड़ा, आखिरी साँस तक पिता जी का साथ दिया। हम भाभी के इस ऋण को कभी नहीं उतार सकेंगे। मेरी भी यही इच्छा है वसीयत का मेरा हिस्सा भी भाभी को दे दिया जाए, जिससे उनकी और उनके बच्चों की परवरिश होती रहे।’’</p>
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                <pubDate>Fri, 26 May 2023 15:17:49 +0530</pubDate>
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