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                <title>Artical on Manipur - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Artical on Manipur RSS Feed</description>
                
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                <title>Manipur: महिलाओं एवं बच्चियों के लापता होने की त्रासदी</title>
                                    <description><![CDATA[Manipur: मणिपुर में 19 जुलाई को दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाने का वीडियो वायरल हुआ था, उस घटना ने देश-विदेश के सभ्य समाजों को झकझोर दिया है। अब ऐसी ही एक घटना पश्चिम बंगाल के मालदा में सामने आई है। यहां भीड़ ने दो महिलाओं की पिटाई की, फिर उन्हें अर्धनग्न कर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/tragedy-of-missing-women-and-girls/article-51081"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-08/manipur.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Manipur: मणिपुर में 19 जुलाई को दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर गांव में घुमाने का वीडियो वायरल हुआ था, उस घटना ने देश-विदेश के सभ्य समाजों को झकझोर दिया है। अब ऐसी ही एक घटना पश्चिम बंगाल के मालदा में सामने आई है। यहां भीड़ ने दो महिलाओं की पिटाई की, फिर उन्हें अर्धनग्न कर दिया गया। यह घटना मालदा के बामनगोला पुलिस स्टेशन के पाकुआ हाट इलाके में हुई। दोनों पीड़ित महिलाएं आदिवासी हैं। जब उनकी पिटाई हो रही थी और कपड़े उतारे जा रहे थे तो पुलिस वहां मूकदर्शक बनी खड़ी हुई थी। Manipur</p>
<p style="text-align:justify;">बात केवल आदिवासी महिलाओं की नहीं है, बात केवल महिलाओं पर हो रहे अपराधों, उत्पीड़न, हिंसा की भी नहीं है, बल्कि अधिक विचलित करने वाली बात महिलाओं एवं बच्चियों के लापता होने की है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की ओर से संकलित आंकड़ों के अनुसार 2019 से 2021 के बीच यानी मात्र तीन सालों में देश भर में 13 लाख से अधिक लड़कियां और महिलाएं लापता हुई हैं। इन लापता होने वाली लड़कियों और महिलाओं में दलित, आदिवासी जनजाति की संख्या ज्यादा है। Manipur</p>
<p style="text-align:justify;">दुनिया की तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था वाले देश की महिलाएं मध्ययुग से भी ज्यादा सामंती सोच, असंवेदना, असुरक्षा, हिंसा, वीभत्स अपराधों और हवस की शिकार बन रही हैं। आज जब देश में हर मुद्दे पर बहस छिड़ जाना आम बात हो गई है, दर्जनों टी.वी. चैैनल एक से ही सवाल पर घंटों बहस करते हैं, आम चुनाव की चौखट पर खड़े देश के राजनीतिक दल ज्वलंत मुद्दों के नाम पर सरकार को घेरने की तलाश में रहते हैं तो इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं के लापता होने एवं यौन-उत्पीड़न के सवालों पर बहस क्यों नहीं छेड़ी जाती? बहस इस बात पर भी होनी चाहिए कि दिल्ली के निर्भया कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा से संबंधित कानूनों को कठोर किया गया लेकिन कानून बन जाने के बाद भी स्थितियां क्यों नहीं सुधरी हैं? चिन्ता का कारण है कि महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों में कोई विशेष कमी आती नहीं दिख रही है। Manipur</p>
<p style="text-align:justify;">बड़ा प्रश्न है कि तमाम कानून एवं सुरक्षा व्यवस्थाएं होने के बावजूद आखिर इतनी बड़ी संख्या में लड़कियां और महिलाए कहां गायब हो रही हैं? यह वह प्रश्न है, जिसका उत्तर नीति-नियंताओं के साथ ही समाज को भी देना होगा, क्योंकि यह ऐसा मामला नहीं, जिसके लिए केवल सरकारों को कठघरे में खड़ा कर कर्तव्य की इतिश्री कर ली जाए। गायब होती लड़कियों और महिलाओं के मामले में समाज भी उत्तरदायी है। राजनीतिक दल भी इसके दोषी हैं। इन सबकोे अपने अंदर झांकना होगा और स्वयं से यह प्रश्न करना होगा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि देश के कई हिस्सों में अभी बालक-बालिकाओं का अनुपात संतुलित नहीं हुआ है, क्योंकि कन्या भ्रूण हत्या का सिलसिला कायम है। यह सिलसिला कानूनों को कठोर करने के बाद भी कायम है।</p>
<p style="text-align:justify;">गायब होने वाली लड़कियों में ज्यादा संख्या नाबालिग लड़कियों की भी है। इसका मतलब है कि नारी सुरक्षा का मामला बहुत ही गंभीर है। यह मानने का कोई कारण नहीं कि 2021 के बाद स्थितियों में सुधार आया होगा, क्योंकि लड़कियों और महिलाओं के लापता होने या उनका अपहरण किए जाने अथवा बहला-फुसलाकर भगा ले जाने के समाचार आए दिन आते ही रहते हैं। महिलाओं के प्रति यह संवेदनहीनता एवं बर्बरता कब तक चलती रहेगी? भारत विकास के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन अभी भी कई हिस्सों में महिलाओं को लेकर गलत धारणाएं बनी हुई हैं। एक विकृत मानसिकता भी कायम है कि वे भोग्य वस्तुएं हैं? उन्हें पांव के नीचे रखा जाना चाहिए। लापता होने की</p>
<p style="text-align:justify;">घटनाएं आए दिन होने वाले जघन्य अपराधों की ही अगली कड़ी है, मगर यह पुरुषवादी सोच और समाज के उस ढांचे को भी सामने करती है, जिसमें महिलाओं की सहज जिंदगी लगातार मुश्किल बनी हुई है, संकटग्रस्त एवं असुरक्षित है। भले ही महिलाओं ने अपनी जंजीरों के खिलाफ बगावत कर दी है, लेकिन देश में ऐसा वर्ग भी है जहां आज भी महिलाएं अत्याचार का शिकार होती हैं। आदिवासी महिलाएं भी बड़ी संख्या में लापता हो रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">भले ही एक खास महिला वर्ग ने आर्थिक मोर्चे पर आजादी हासिल की है, लेकिन एक बड़ा महिला वर्ग आज भी पुरुषप्रधान समाज की संकीर्ण एवं विकृत सोच का शिकार है। ऐसे में महिलाएं अपनी अस्मिता एवं अस्तित्व की सुरक्षा की गुहार लगातीं हुई दिखाई देती है। इसलिये कि उन्हें सदियों से चली आ रही मानसिकता, साजिश एवं सजा के द्वारा भीतरी सुरंगों में धकेल दिया जाता है, अत्याचार भोगने को विवश किया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चिन्ता की बात यह है कि इन शर्मसार करने एवं झकझोर देने वाली घटनाओं पर भी राजनीतिक दल राजनीति करने से बाज नहीं आते। इन अति संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक लाभ की रोटियां सेंकना दुर्भाग्यपूर्ण है। अच्छा हो सभी मिलकर नारी सम्मान के प्रति सचेत और संवेदनशील होकर उनके लापता होने, उन पर लगातार हो रहे अत्याचारों को रोकने की दिशा में कोई प्रभावी एवं सार्थक पहल करें। गायब होती लड़कियों और महिलाओं की बड़ी संख्या यही बताती है कि भारतीय समाज उनके प्रति अनुदार है। इस अनुदारता को दूर करने के लिए सबसे अधिक राजनीतिक वर्ग को ही आगे आना होगा और अनिवार्य रूप से समाज को भी। Manipur</p>
<p style="text-align:justify;">नरेन्द्र मोदी की पहल पर निश्चित ही महिलाओं पर लगा दोयम दर्जे का लेबल हट रहा है। हिंसा एवं अत्याचार की घटनाओं में भी कमी आ रही है। बड़ी संख्या में छोटे शहरों और गांवों की लड़कियां पढ़-लिखकर देश के विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। वे उन क्षेत्रों में जा रही हैं, जहां उनके जाने की कल्पना तक नहीं की जा सकती थी। वे टैक्सी, बस, ट्रक से लेकर जेट तक चला-उड़ा रही हैं। सेना में भर्ती होकर देश की रक्षा कर रही है। अपने दम पर व्यवसायी बन रही हैं। होटलों की मालिक हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">बहुराष्ट्रीय कंपनियों की लाखों रुपये की नौकरी छोड़कर स्टार्टअप शुरू कर रही हैं। वे विदेशों में पढ़कर नौकरी नहीं, अपने गांव का सुधार करना चाहती हैं। अब सिर्फ अध्यापिका, नर्स, बैंकों की नौकरी, डॉक्टर आदि बनना ही लड़कियों के क्षेत्र नहीं रहे, वे अन्य क्षेत्रों में भी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">इस तरह नारी एवं बालिका शक्ति ने अपना महत्व तो दुनिया को समझाया है, लेकिन नारी एवं बालिका के प्रति हो रहे अपराधों में कमी न आना, घरेलू हिंसा का बढ़ना, आदिवासी-दलित महिलाओं एवं बालिकाओं पर अत्याचारों का बढ़ना एवं उनका लापता होना, उनकी सुरक्षा खतरे में होना- ऐसे चिन्तनीय प्रश्न हैं, जिन पर सरकार को कठोर बनना होगा, सख्त व्यवस्था बनानी होगी। सरकार ने सख्ती बरती है, लेकिन आम पुरुष की सोच को बदलने बिना नारी एवं बालिका सम्मान की बात अधूरी ही रहेगी। इस अधूरी सोच को बदलना नये भारत का संकल्प हो।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>ललित गर्ग, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Haryana Nuh Violence: नूंह में स्कूलों को लेकर आई बड़ी अपडेट" href="http://10.0.0.122:1245/schools-open-after-ten-days-of-violence/">Haryana Nuh Violence: नूंह में स्कूलों को लेकर आई बड़ी अपडेट</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Aug 2023 16:09:51 +0530</pubDate>
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                <title>मणिपुर से पहले भी देश कई बार जल चुका है आरक्षण की आग में</title>
                                    <description><![CDATA[जब तक आरक्षण (Reservation) की आग में वोटों की रोटी सेंकते रहेंगे, तब तक मणिपुर (Manipur) जैसे हादसे होते रहेंगे। आरक्षण की मांग को लेकर मणिपुर जल रहा है। मैतेई समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर हिंसा भड़की हुई है। इसमें कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। दंगाइयों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/the-country-has-been-scorched-many-times-in-the-fire-of-reservation/article-48509"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/manipur-protest.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जब तक आरक्षण (Reservation) की आग में वोटों की रोटी सेंकते रहेंगे, तब तक मणिपुर (Manipur) जैसे हादसे होते रहेंगे। आरक्षण की मांग को लेकर मणिपुर जल रहा है। मैतेई समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर हिंसा भड़की हुई है। इसमें कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। दंगाइयों ने भारी संख्या में सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया है। मणिपुर में 16 जिले हैं। जिसमें से वैली 10 फीसदी है और यहां पर 53 प्रतिशत मैतेई समुदाय के लोग रहते हैं। इसके साथ ही 90 फीसदी पहाड़ी इलाका है और यहां पर 42 प्रतिशत कुकी, नागा के अलावा दूसरी जनजातियां रहती हैं। गैर-जनजातीय मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा राज्य सरकार को दिए गए निर्देश के बाद मणिपुर में सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई।</p>
<p style="text-align:justify;">1993 में भी मणिपुर में हिंसा हुई थी,तब एक दिन में नागाओं की तरफ से 100 से ज्यादा से ज्यादा कुकी समुदाय के लोगों को मार दिया गया। यह हिंसक घटना जातीय संघर्ष का परिणाम थी। अब एक बार फिर मणिपुर हिंसा से जूझ रहा है, 54 मौतें हो चुकी हैं। मणिपुर (Manipur) का मामला पहला नहीं है, जहां आरक्षण (Reservation) को लेकर देश जला है। इससे पहले भी आरक्षण को लेकर कई हिंसक आंदोलनों में देश जला है। ऐसे हिंसक आंदोलनों में देश को भारी कीमत चुकानी पड़ी है। ओबीसी आरक्षण के खिलाफ आरक्षण की आग में देश कई बार झुलस चुका है। पहली बार मंडल कमीशन की सिफारिशों को 1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने लागू किया तो देश में सवर्ण समुदाय के लोग इसके विरोध में सड़क पर उतर आए। ओबीसी आरक्षण के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुआ।</p>
<h3>हरियाणा में जमकर हिंसा, आगजनी व तोड़-फोड़ हुई थी | Reservation</h3>
<p style="text-align:justify;">इसके विरोध में आत्मदाह और ऐसी कई घटनाएं सामने आई। कई जगह आगजनी-तोड़फोड़ तक हुई। वर्ष 2016 में हुए जाट आंदोलन के दौरान काफी हिंसा हुई थी। आंदोलनकारियों ने जाट समुदाय को ओबीसी में शामिल करने की मांग को लेकर काफी विरोध प्रदर्शन किया था। हरियाणा में जमकर हिंसा, आगजनी व तोड़-फोड़ हुई थी। इस हिंसक आंदोलन में 30 लोगों की जान चली गई। गुजरात में पाटीदार समुदाय के लोगों ने ओबीसी में शामिल करने को लेकर 2015 में सबसे बड़ा प्रदर्शन किया था। गुजरात में हिंसा और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। इलाके में कर्फ्यू लगाना पड़ गया था। प्रदर्शनकारियों ने सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया था।</p>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा के जाट आरक्षण (Reservation) आंदोलन में करीब 34 हजार करोड़ का नुकसान हुआ था। देश में अब तक आरक्षण आंदोलन से लाखों करोड़ का नुकसान हो चुका है। राजनीतिक दल इसकी भरपाई भी देश के आम लोगों से ही करते हैं। आरक्षित वर्ग भी इससे अलग नहीं है। आर्थिक नुकसान से भरपाई के लिए बढ़ाए गए टैक्स की मार उन पर भी पड़ती है। आरक्षण की मांग को लेकर राजस्थान में गुर्जर समुदाय ने काफी दिनों तक प्रदर्शन किया था। आंदोलनकारियों ने लंबे समय तक रेलवे ट्रैक को जाम रखा। इसका प्रभाव भी पूरे देश पर पड़ा था। पुलिस और आंदोलनकारी आमने-सामने आ गए थे। इस आंदोलन के दौरान गोलीबारी की घटना सामने भी आई थी। इसमें 20 लोगों की जानें चली गई थीं। महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन काफी चर्चा में रहा है। आंदोलनकारियों ने हिंसक झड़प में आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाओं को अंजाम दिया। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में निषाद आरक्षण आंदोलन के चलते एक सिपाही को अपनी जान गंवानी पड़ी।</p>
<h3>देश के आधा दर्जन राज्य 50 फीसदी आरक्षण का दायरा बढ़ाने के पक्ष में</h3>
<p style="text-align:justify;">विकास के बजाए आरक्षण (Reservation) राजनीतिक दलों के सत्ता पाने का आसान रास्ता बना हुआ है। देश में आरक्षण के हिंसक इतिहास के बावजूद राजनीतिक दल इसे खोना नहीं चाहते। देश के करीब आधा दर्जन राज्य ऐसे हैं, जो 50 फीसदी आरक्षण का दायरा बढ़ाने के पक्ष में खड़े हैं, ताकि उनका राजनीतिक और सामाजिक समीकरण मजबूत हो सके। इनमें महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु, झारखंड और कर्नाटक जैसे राज्य शामिल हैं। कर्नाटक ने भी आरक्षण बढ़ाया था। इसके अलावा बिहार, मध्य प्रदेश और अब छत्तीसगढ़ में भी आरक्षण बढ़ाने की मांग ने जोर पकड़ा हुआ है। इतना ही नहीं राजनीतिक दल वोटों की खातिर नौकरियों में भी अपने राज्य के लोगों के लिए आरक्षण लागू करने में पीछे नहीं रहे हैं। इससे लगता है कि क्षेत्रीय पार्टी भारत का हिस्सा होने के बजाए स्वतंत्र राष्ट्र हैं। राज्यों में निवासियों के लिये रोजगार आरक्षण विधेयक लाया गया है। ऐसा करने वाला झारखंड देश का सातवां राज्य है। इससे पहले आंध्रप्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार में भी यह नियम लागू किया गया है।</p>
<h3>राजनीतिक दलों का पिछड़ी और दलित जातियों की भलाई से सरोकार नहीं</h3>
<p style="text-align:justify;">देश की एकता-अखंडता और सौहार्द के बजाए राजनीतिक दलों की किसी भी सूरत में सत्ता पाने की महत्वाकांक्षा ने खून-खराबे, तोड़फोड़ और हिंसा को जन्म दिया है। आरक्षण आंदोलनों से न सिर्फ लाखों करोड़ की सरकारी-गैर सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ है, बल्कि देश में जातिवाद की जहरीली जड़ों को सींचने का काम किया गया है। हकीकत में राजनीतिक दलों का पिछड़ी और दलित जातियों की भलाई से सरोकार नहीं है। यदि ऐसा होता तो आजादी के 75 साल बाद देश में कोई दलित और पिछड़ा नहीं रहता। इन जातियों और समुदायों के लिए विशेष योजनाएं लागू करके इन्हें देश की मुख्य धारा में शामिल करने के गंभीर प्रयास करने के बजाए राजनीतिक दलों ने आरक्षण के जरिए देश के आतंरिक विभाजन को हवा दी है। (Reservation)</p>
<p style="text-align:justify;">सत्ता के लिए यह रास्ता राजनीतिक दलों को ज्यादा आसान लगता है। जरूरतमंदों के लिए योजनाएं बना कर क्रियान्वित करना टेडी खीर है। भ्रष्टाचार के कारण योजनाओं का लाभ पिछड़े और दलितों तक नाममात्र का पहुंच पाता है। यही वजह भी है कि आरक्षण के साथ ही राजनीतिक दल चुनाव के दौरान धनबल से अपने राजनीतिक मंसूबे पूरे करने के प्रयास करते रहे हैं। चुनाव आयोग द्वारा जब्त की जाने वाली करोड़ों की राशि इसका प्रमाण है। राजनीतिक दलों ने आरक्षण के जरिए सत्ता प्राप्ति का छोटा रास्ता निकाला हुआ है। आरक्षण की बहती गंगा में हाथ धोने से किसी भी दल को गुरेज नहीं है। बेशक यह रास्ता देश में सामाजिक भेदभाव, कटुता और दूरियां बढ़ाने वाला ही क्यों न हो, किन्तु राजनीतिक दलों को यह मुफीद लगता है। यह निश्चित है कि देश के राजनीतिक दल अपने क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर जब तक समग्र रूप से देशहित की नीतियां नहीं अपनाएंगे तब तक मणिपुर जैसे शर्मनाक हादसे होते रहेंगे।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>योगेन्द्र योगी ,देश के राजनीतिक दल</strong><br />
yogendrayogi.yogi@gmail.com</p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Tue, 06 Jun 2023 10:10:10 +0530</pubDate>
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