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                <title>Artical on Reservation - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Reservation: मैं पिछड़ा हूँ, आप कौन?</title>
                                    <description><![CDATA[Reservation: पिछला सप्ताह भारत विश्व मंच पर छाया रहा और कैसे? स्पष्टत: जी 20 शिखर सम्मेलन सफल रहा तथा प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) ने संपूर्ण विश्व को झुका दिया किंतु सोमवार आते-आते हम पुराने ढर्रे पर पहुंच गए। भारत बनाम इंडिया पर विवाद जिसके लिए अगले सप्ताह संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/i-am-backward-who-are-you/article-52313"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/reservation.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Reservation: पिछला सप्ताह भारत विश्व मंच पर छाया रहा और कैसे? स्पष्टत: जी 20 शिखर सम्मेलन सफल रहा तथा प्रधानमंत्री मोदी (PM Modi) ने संपूर्ण विश्व को झुका दिया किंतु सोमवार आते-आते हम पुराने ढर्रे पर पहुंच गए। भारत बनाम इंडिया पर विवाद जिसके लिए अगले सप्ताह संसद का विशेष सत्र बुलाया गया है से लेकर महाराष्ट्र में चल रहे आरक्षण के बारे में जारी तमाशा शिन्दे-फडनवीस-पवार सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। Reservation</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पूर्व पुलिस ने हिंसक प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया। महाराष्ट्र के जालना जिले के अनजान से आरक्षण कार्यकर्ता मनोज जारंगे जो पिछले दिनों से भूख हड़ताल पर हैं, उन्होंने मराठाओं के लिए आरक्षण की मांग में एक नया मोड़ दे दिया है कि उनहें कुनबी अर्थात अन्य पिछड़े वर्ग का दर्जा दिया जाए। यहां तक कि मुख्यमंत्री शिन्दे भी इस आरक्षण को देना चाहते हैं किंतु वे चाहते हैं कि इससे पहले इस मुद्दे की ठोस कानूनी समीक्षा की जाए और अन्य पिछड़े वर्गों और मराठाओं में किसी तरह का टकराव पैदा न किया जाए। Reservation</p>
<p style="text-align:justify;">शिन्दे का सौभाग्य यह है कि विपक्षी दल मराठाओं के लिए आरक्षण का सम्मान करते हैं किंतु वे अन्य पिछड़े वर्ग के कोटे में सेंध लगाने से चिंतित हैं। राकांपा के शरद पवार चाहते हैं कि मराठाओं को आरक्षण देने के लिए उन्हें 15-16 प्रतिशत अतिरिक्त कोटा दिया जाए और यह शर्त रखी जाए कि अन्य पिछड़े वर्ग का कोटा प्रभावित न हो। यही बात कांगे्रस और ठाकरे की शिव सेना भी कहते हैं। वस्तुत: उन्होंने केन्द्र से आग्रह किया है कि वे आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक बढ़ाए तथापि जारंगे अपनी बात पर अड़े हुए हैं।</p>
<h3>मराठा लंबे समय से आरक्षण की मांग कर रहे हैं | Reservation</h3>
<p style="text-align:justify;">नि:संदेह राज्य सरकार की दुविधा को समझा जा सकता है क्योंकि राजनीतिक दृष्टि से प्रभावशाली मराठा राज्य की जनसंख्या में 20 प्रतिशत से अधिक है तथा उनका सरकारी तथा अर्ध-सरकारी सेवाओं में बहुत कम प्रतिनिधित्व है अ‍ैर वे लंबे समय से आरक्षण की मांग कर रहे हैं। इसका दूरगामी प्रभाव हो सकता है। अन्य पिछड़े वर्गों के लिए नहीं अपितु यह उन्हें और अलग-थलग करेगा तथा राज्य की राजनीति में मराठाओं की पकड़ और मजबूत करेगा। आरक्षण औसत प्रतिभा की लागत पर नहीं दिया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सच है कि मराठाओं की इस नई राजनीतिक आकांक्षाओं का संज्ञान न लेना आत्मघाती होगा किंतु जातीय आधार पर राजनीतिक सत्ता का खेल करना खतरनाक है। निश्चित रूप से सामाजिक न्याय वांछनीय और प्रशंसनीय लक्ष्य है। इसके अलावा सरकार कानून उद्देश्य लोगों को शिक्षित करना और उन्हें समान अवसर तथा जीवन की बेहतर गुणवत्ता प्रदान करना है। तथापि भारत की स्वतंत्रता के बाद के 70 वर्षों में पता चलता है कि आरक्षण प्रदान करने के लिए बनाए गए किसी भी कानून से किसी भी वर्ग, जाति, उपजाति और वंचित वर्ग का उत्थान नहीं हुआ है। उनमें से केवल कुछ लोगों को रोजगार और शैक्षणिक सस्थानों में प्रवेश ही मिल पाया है। Reservation</p>
<p style="text-align:justify;">लोगों के उत्थान का एकमात्र रामबाण आरक्षण नहीं है तथा झूठे आधारों पर विभिन्न वर्गों के बीच प्रतिस्पर्धा पैदा करना खतरनाक है कि यह दलित वंचित लोगों का उत्थान करेगा। वस्तुत: इससे पीड़ित और झूठे विजेता पैदा हुए हैं जहां पर केवल जन्म के आधार पर यह तय किया जाता है कि यह विजेता है या हारने वाला है जो गरीब पैदा हुए हैं वे कष्ट सह रहे हैं और जो उच्च जातियों में पैदा हुए हैं वे विजेता हैं। Reservation</p>
<h3>क्या आरक्षण भारत के सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखने का समाधान है</h3>
<p style="text-align:justify;">इस बात का अध्ययन करने का कोई प्रयास नहीं किया गया कि क्या आरक्षण मिलने के बाद उन लोगों के मनोबल को बढ़ाने के लिए कोई प्रयास किया गया है जिन्हें आरक्षण दिया गया है ताकि उन्हें मुख्यधारा में लाया जा सके जो इस बात को रेखांकित करता है कि कोटा इस बात का समाधान नहीं करता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में क्या खामी है या यह जीवन की बेहतर गुणवत्ता प्रदान नहीं करता है। प्रश्न उठता है कि क्या आरक्षण अपने आप में एक साध्य है।</p>
<p style="text-align:justify;">बिल्कुल नहीं। क्या कभी इस बात का आकलन किया गया है कि जिन लोगों को आरक्षण दिया गया है उन्हें लाभ हुआ है या हानि हुई है। बिल्कुल नहीं। क्या आरक्षण भारत के सामाजिक ताने-बाने को बनाए रखने का समाधान है? बिल्कुल नहीं क्योंकि यह लोगों में मतभेद पैदा करता है और राष्ट्रीय एकता को नुकसान पहुंचाता है। क्या यह बात समझ में आती है कि इंजीनियंरिग में 90 प्रतिशत लाने वाला कोई छात्र दवाई बेचता है जबकि 40 प्रतिशत अंक प्राप्त करने वाला दलितत डॉक्टर बन जाता है और इन सब का कारण आरक्षण है। Reservation</p>
<p style="text-align:justify;">2023 का भारत 1989 का भारत नहीं है जब 18 वर्षीय छात्र राजीव गोस्वामी ने सार्वजनिक रूप से स्वयं को आग लगा दी थी। उस समय राजनेताओं द्वारा उत्पन्न मंडल आग उन्हें ही सताने लगी है। हमारे नेतागणों को समझना होगा कि वे आज जनरेशन एक्स और जनरेशन वाई का सामना कर रहे हैं और जिनकी जनसंख्या 50 र्प्रतिशत से अधिक है और वे कार्यवाही में विश्वास करते हैं न कि प्रतिक्रिया में। वे भीड़भाड़ भरे रोजगार बाजार में गुणवत्ता के आधार पर रोजगार की मांग करते हैं जहां पर श्रम शक्ति में प्रति वर्ष 3 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है और रोजगार में केवल 2.3 प्रतिशत की वृद्धि हो रही है जिसके चलते बेरोजगारी 7.1 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है।</p>
<h3>रोजगार बाजार में प्रति वर्ष ड़ेढ करोड़ नए लोग प्रवेश कर रहे | Reservation</h3>
<p style="text-align:justify;">मोदी सरकार द्वारा हाल ही में संयुक्त सचिव के 10 पदों के दिए गए विज्ञापन के प्रत्युत्तर में 7 हजार से अधिक लोग आवेदन करते हैं। किसी ने भी इस बात पर विचार नहीं किया कि रोजगार बाजार में प्रवेश कर रहे नए लोगों को रोजगार देने की चुनौती का कैसे सामना किया जाए। रोजगार बाजार में प्रति वर्ष ड़ेढ करोड़ नए लोग प्रवेश कर रहे हैं और ऐसी स्थिति में आरक्षण कहां फिट बैठता है। आरक्षण का दायरा निरंतर बढ़ाना व्यावहारिक नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">सामाजिक रूप से प्रभावशाली समूह हमेशा आरक्षण प्राप्त करने के लिए आंदोलन करते रहेंगे और जिसके चलते सभी लोगों को अच्छी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए यह अदूरदर्शी उपाय अपनाया जाता है और इसके चलते विभिन्न समूहों की पहचान का मुद्दा और बढ़ जाता है। फलत: ऐसी स्थिति बन गयी है जहां पर चुनावी सत्ता की राजनीति के चलते संख्या की दृष्टि से प्रभावशाली समूह अन्य समूहों की कीमत पर लाभ प्राप्त करता है। Reservation</p>
<p style="text-align:justify;">अन्याय तब बढ़ता है जब समान लोगों के साथ असमान व्यवहार किया जाता है और तब भी बढ़ता है जब असमान लोगों के साथ समान व्यवहार किया जाता है। इसके दो उदाहरण हैं। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों से पता चलत है कि आईआईटी से 48 प्रतिशत अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों ने पढ़ाई बीच में छोड़ दी और आईआईएम से ऐसे छात्र 62 प्रतिशत थे क्योंकि उन्हें ये पाठ्यक्रम बहुत कठिन लगे।</p>
<h3>असमानताएं हैं और उन्हें दूर किया जाना चाहिए | Reservation</h3>
<p style="text-align:justify;">आईआईटी गोहाटी का रिकार्ड बहुत खराब है। उसके बीच में पढ़ाई छोड़ने वाले 25 छात्रों में से 88 प्रतिशत आरक्षित वर्ग के हैं। उसके बाद आईआईटी दिल्ली का स्थान है जहां पर ऐसे छात्रों की संख्या 76 प्रतिशत है। देश के 23 आईआईटी के 6043 शिक्षकों में से 149 अनुसूचित जाति, 21 अनुसूचित जनजाति के थे जो उन शिक्षकों में से थे जिनकी संख्या 3 प्रतिशत से कम है तथा 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में से अधिकतर में अन्य पिछड़े वर्गों के शिक्षक न के बराबर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे नेताओं को इस बात को स्वीकार करना होगा कि असमानताएं हैं और उन्हें दूर किया जाना चाहिए। केवल शिक्षा में आरक्षण देने से या रोजगार में आरक्षण देने से उत्कृष्टता नहीं आएगी। उन्हें नए प्रयोग करने होंगे जिसके चलते वे शिक्षा और रोजगार में परीक्षाओं को पास करे और वे सामान्य श्रेणी के छात्रों के साथ प्रतिस्पर्धा करे। हमारे नेताओं के लिए आवश्यक है कि वे सभी लोगों के लिए समान अवसर प्रदान करे क्योंकि आरक्षण विभाजनकारी है। समय आ गया है कि केन्द्र और राज्य सरकारें संपूर्ण आरक्षण नीति पर पुनर्विचार करे और उसे पुनर्निर्धारित करें और उसे आंख मूंदकर लागू न करें अन्यथा भारत शीघ्र ही अक्षम और औसत दर्जे के लोगों का देश बन जाएगा। Reservation</p>
<p style="text-align:right;"><strong>पूनम आई कौशिश, वरिष्ठ लेखिका एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार </strong><br />
<strong>(यह लेखिका के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Ayodhya Ram Mandir : खुदाई में मिले राम जन्मभूमि का सच साबित करने वाले अवशेष की फोटो जारी" href="http://10.0.0.122:1245/photo-of-the-remains-found-during-excavation-proving-the-truth-of-ram-janmabhoomi-released/">Ayodhya Ram Mandir : खुदाई में मिले राम जन्मभूमि का सच साबित करने वाले अवशेष की फोटो जारी</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Thu, 14 Sep 2023 10:45:48 +0530</pubDate>
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                <title>मणिपुर से पहले भी देश कई बार जल चुका है आरक्षण की आग में</title>
                                    <description><![CDATA[जब तक आरक्षण (Reservation) की आग में वोटों की रोटी सेंकते रहेंगे, तब तक मणिपुर (Manipur) जैसे हादसे होते रहेंगे। आरक्षण की मांग को लेकर मणिपुर जल रहा है। मैतेई समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर हिंसा भड़की हुई है। इसमें कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। दंगाइयों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/the-country-has-been-scorched-many-times-in-the-fire-of-reservation/article-48509"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/manipur-protest.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जब तक आरक्षण (Reservation) की आग में वोटों की रोटी सेंकते रहेंगे, तब तक मणिपुर (Manipur) जैसे हादसे होते रहेंगे। आरक्षण की मांग को लेकर मणिपुर जल रहा है। मैतेई समाज को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर हिंसा भड़की हुई है। इसमें कई लोगों की जानें जा चुकी हैं। दंगाइयों ने भारी संख्या में सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाया है। मणिपुर में 16 जिले हैं। जिसमें से वैली 10 फीसदी है और यहां पर 53 प्रतिशत मैतेई समुदाय के लोग रहते हैं। इसके साथ ही 90 फीसदी पहाड़ी इलाका है और यहां पर 42 प्रतिशत कुकी, नागा के अलावा दूसरी जनजातियां रहती हैं। गैर-जनजातीय मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने के मणिपुर उच्च न्यायालय द्वारा राज्य सरकार को दिए गए निर्देश के बाद मणिपुर में सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई।</p>
<p style="text-align:justify;">1993 में भी मणिपुर में हिंसा हुई थी,तब एक दिन में नागाओं की तरफ से 100 से ज्यादा से ज्यादा कुकी समुदाय के लोगों को मार दिया गया। यह हिंसक घटना जातीय संघर्ष का परिणाम थी। अब एक बार फिर मणिपुर हिंसा से जूझ रहा है, 54 मौतें हो चुकी हैं। मणिपुर (Manipur) का मामला पहला नहीं है, जहां आरक्षण (Reservation) को लेकर देश जला है। इससे पहले भी आरक्षण को लेकर कई हिंसक आंदोलनों में देश जला है। ऐसे हिंसक आंदोलनों में देश को भारी कीमत चुकानी पड़ी है। ओबीसी आरक्षण के खिलाफ आरक्षण की आग में देश कई बार झुलस चुका है। पहली बार मंडल कमीशन की सिफारिशों को 1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने लागू किया तो देश में सवर्ण समुदाय के लोग इसके विरोध में सड़क पर उतर आए। ओबीसी आरक्षण के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुआ।</p>
<h3>हरियाणा में जमकर हिंसा, आगजनी व तोड़-फोड़ हुई थी | Reservation</h3>
<p style="text-align:justify;">इसके विरोध में आत्मदाह और ऐसी कई घटनाएं सामने आई। कई जगह आगजनी-तोड़फोड़ तक हुई। वर्ष 2016 में हुए जाट आंदोलन के दौरान काफी हिंसा हुई थी। आंदोलनकारियों ने जाट समुदाय को ओबीसी में शामिल करने की मांग को लेकर काफी विरोध प्रदर्शन किया था। हरियाणा में जमकर हिंसा, आगजनी व तोड़-फोड़ हुई थी। इस हिंसक आंदोलन में 30 लोगों की जान चली गई। गुजरात में पाटीदार समुदाय के लोगों ने ओबीसी में शामिल करने को लेकर 2015 में सबसे बड़ा प्रदर्शन किया था। गुजरात में हिंसा और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। इलाके में कर्फ्यू लगाना पड़ गया था। प्रदर्शनकारियों ने सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया था।</p>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा के जाट आरक्षण (Reservation) आंदोलन में करीब 34 हजार करोड़ का नुकसान हुआ था। देश में अब तक आरक्षण आंदोलन से लाखों करोड़ का नुकसान हो चुका है। राजनीतिक दल इसकी भरपाई भी देश के आम लोगों से ही करते हैं। आरक्षित वर्ग भी इससे अलग नहीं है। आर्थिक नुकसान से भरपाई के लिए बढ़ाए गए टैक्स की मार उन पर भी पड़ती है। आरक्षण की मांग को लेकर राजस्थान में गुर्जर समुदाय ने काफी दिनों तक प्रदर्शन किया था। आंदोलनकारियों ने लंबे समय तक रेलवे ट्रैक को जाम रखा। इसका प्रभाव भी पूरे देश पर पड़ा था। पुलिस और आंदोलनकारी आमने-सामने आ गए थे। इस आंदोलन के दौरान गोलीबारी की घटना सामने भी आई थी। इसमें 20 लोगों की जानें चली गई थीं। महाराष्ट्र में मराठा आंदोलन काफी चर्चा में रहा है। आंदोलनकारियों ने हिंसक झड़प में आगजनी और तोड़फोड़ की घटनाओं को अंजाम दिया। उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में निषाद आरक्षण आंदोलन के चलते एक सिपाही को अपनी जान गंवानी पड़ी।</p>
<h3>देश के आधा दर्जन राज्य 50 फीसदी आरक्षण का दायरा बढ़ाने के पक्ष में</h3>
<p style="text-align:justify;">विकास के बजाए आरक्षण (Reservation) राजनीतिक दलों के सत्ता पाने का आसान रास्ता बना हुआ है। देश में आरक्षण के हिंसक इतिहास के बावजूद राजनीतिक दल इसे खोना नहीं चाहते। देश के करीब आधा दर्जन राज्य ऐसे हैं, जो 50 फीसदी आरक्षण का दायरा बढ़ाने के पक्ष में खड़े हैं, ताकि उनका राजनीतिक और सामाजिक समीकरण मजबूत हो सके। इनमें महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, तमिलनाडु, झारखंड और कर्नाटक जैसे राज्य शामिल हैं। कर्नाटक ने भी आरक्षण बढ़ाया था। इसके अलावा बिहार, मध्य प्रदेश और अब छत्तीसगढ़ में भी आरक्षण बढ़ाने की मांग ने जोर पकड़ा हुआ है। इतना ही नहीं राजनीतिक दल वोटों की खातिर नौकरियों में भी अपने राज्य के लोगों के लिए आरक्षण लागू करने में पीछे नहीं रहे हैं। इससे लगता है कि क्षेत्रीय पार्टी भारत का हिस्सा होने के बजाए स्वतंत्र राष्ट्र हैं। राज्यों में निवासियों के लिये रोजगार आरक्षण विधेयक लाया गया है। ऐसा करने वाला झारखंड देश का सातवां राज्य है। इससे पहले आंध्रप्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, बिहार में भी यह नियम लागू किया गया है।</p>
<h3>राजनीतिक दलों का पिछड़ी और दलित जातियों की भलाई से सरोकार नहीं</h3>
<p style="text-align:justify;">देश की एकता-अखंडता और सौहार्द के बजाए राजनीतिक दलों की किसी भी सूरत में सत्ता पाने की महत्वाकांक्षा ने खून-खराबे, तोड़फोड़ और हिंसा को जन्म दिया है। आरक्षण आंदोलनों से न सिर्फ लाखों करोड़ की सरकारी-गैर सरकारी संपत्ति का नुकसान हुआ है, बल्कि देश में जातिवाद की जहरीली जड़ों को सींचने का काम किया गया है। हकीकत में राजनीतिक दलों का पिछड़ी और दलित जातियों की भलाई से सरोकार नहीं है। यदि ऐसा होता तो आजादी के 75 साल बाद देश में कोई दलित और पिछड़ा नहीं रहता। इन जातियों और समुदायों के लिए विशेष योजनाएं लागू करके इन्हें देश की मुख्य धारा में शामिल करने के गंभीर प्रयास करने के बजाए राजनीतिक दलों ने आरक्षण के जरिए देश के आतंरिक विभाजन को हवा दी है। (Reservation)</p>
<p style="text-align:justify;">सत्ता के लिए यह रास्ता राजनीतिक दलों को ज्यादा आसान लगता है। जरूरतमंदों के लिए योजनाएं बना कर क्रियान्वित करना टेडी खीर है। भ्रष्टाचार के कारण योजनाओं का लाभ पिछड़े और दलितों तक नाममात्र का पहुंच पाता है। यही वजह भी है कि आरक्षण के साथ ही राजनीतिक दल चुनाव के दौरान धनबल से अपने राजनीतिक मंसूबे पूरे करने के प्रयास करते रहे हैं। चुनाव आयोग द्वारा जब्त की जाने वाली करोड़ों की राशि इसका प्रमाण है। राजनीतिक दलों ने आरक्षण के जरिए सत्ता प्राप्ति का छोटा रास्ता निकाला हुआ है। आरक्षण की बहती गंगा में हाथ धोने से किसी भी दल को गुरेज नहीं है। बेशक यह रास्ता देश में सामाजिक भेदभाव, कटुता और दूरियां बढ़ाने वाला ही क्यों न हो, किन्तु राजनीतिक दलों को यह मुफीद लगता है। यह निश्चित है कि देश के राजनीतिक दल अपने क्षुद्र स्वार्थों से ऊपर उठकर जब तक समग्र रूप से देशहित की नीतियां नहीं अपनाएंगे तब तक मणिपुर जैसे शर्मनाक हादसे होते रहेंगे।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>योगेन्द्र योगी ,देश के राजनीतिक दल</strong><br />
yogendrayogi.yogi@gmail.com</p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Tue, 06 Jun 2023 10:10:10 +0530</pubDate>
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