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                <title>Artical on Climate Change - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>WMO ALERT: संयुक्त राष्ट्र के मौसम वैज्ञानिकों ने दी पूरी दुनिया को चेतावनी!</title>
                                    <description><![CDATA[WMO ALERT: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) व प्रशांत महासागर में बने अलनीनो का प्रभाव (El Nino effect) भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक तौर पर देखने को मिल रहा है। जिसकी वजह से विश्व में किसी देश में सूखे जैसी स्थिति है तो कोई देश बाढ़ की चपेट में है। जिन देशों में अब तक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/un-meteorologists-warned-the-whole-world/article-54739"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/el-nino-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">WMO ALERT: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) व प्रशांत महासागर में बने अलनीनो का प्रभाव (El Nino effect) भारत में ही नहीं बल्कि वैश्विक तौर पर देखने को मिल रहा है। जिसकी वजह से विश्व में किसी देश में सूखे जैसी स्थिति है तो कोई देश बाढ़ की चपेट में है। जिन देशों में अब तक सर्दी का मौसम बन जाना था, वह देश भी अब तक गर्म बने हुए हैं, जिनमे भारत भी शामिल है। संयुक्त राष्ट्र के मौसम वैज्ञानिकों की ताजा रिपोर्ट के अनुसार इस बार अक्टूबर महीना सबसे गर्म रहा है ऐसा 2020-21 के बाद पहली बार हुआ है। El Nino Effect</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र के मौसम वैज्ञानिकों ने पूरी दुनिया को चेतावनी देते हुए कहा कि वर्ष 2023 अन्य वर्षो की तुलना में गर्म रहने की ही संभावना है। विश्व मौसम विज्ञान संगठन डब्ल्यूएमओ (WMO) ने अपने सन्देश में कहा है कि अल नीनो प्रभाव अगले वर्ष भी जारी रहेगा, जिससे तापमान वृद्धि के जारी रहने की संभावना बनी रहेगी संगठन ने कहा है कि इस वर्ष अभी तक, वैश्विक औसत तापमान, अभी तक के रिकॉर्ड के अनुसार, सबसे ऊँचा है, जोकि पूर्व-औद्योगिक स्तरों से, 1.43 डिग्री सैल्सियस ऊपर है।</p>
<h3>अल नीनो जलवायु रुझान अप्रैल 2024 तक जारी रहेगा</h3>
<p style="text-align:justify;">साथ ही, अंटार्कटिक में समुद्री हिम का स्तर रिकॉर्ड निम्न है यूएन मौसम विज्ञान संगठन की अपेक्षा के अनुसार, गर्माता अल नीनो जलवायु रुझान,अप्रैल 2024 तक जारी रहेगा जिससे,तापमान में और अधिक वृद्धि होगी। इसे भारत जैसे देश के लिए एक चेतावनी के रूप में समझ जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">संगठन के अध्यक्ष पैटेरी टालस ने कहा कि वैसे तो अल नीनो प्रभाव प्राकृतिक रूप से घटता है,मगर यह जलवायु परिवर्तन के सन्दर्भ में होता है जिसे, मानव गतिविधियों के परिणाम स्वरूप गर्मी को सोख़ने वाली ग्रीनहाउस गैसों के बढ़ते जमाव से बढ़ावा मिलता है। जिसका असर पूरी मानव जाति के साथ-साथ प्रकृति पर भी पड़ता है। उन्होंने आगाह किया कि ताप लहरें, सूखा, जंगली आग, भारी वर्षा और बाढ़ जैसी मौसम की अत्यन्त चरम घटनाएँ, कुछ क्षेत्रों में और भी बदतर होंगी। पैटेरी टालस ने कहा, ‘इसीलिए, विश्व मौसम संगठन, ज़िन्दगियों को बचाने और आर्थिक नुक़सान कम करने के लिए, सभी के लिए पूर्व चेतावनी पहल, के लिए प्रतिबद्ध है।’</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले वर्ष 2016 में भी एलनीनो का प्रभाव पूरे विश्व भर में देखने को मिला था। जिसमें असाधारण रूप से मज़बूत अल नीनो और जलवायु परिवर्तन का बहुत बड़ा हाथ रहा था।</p>
<h3 style="text-align:justify;">0.40 फीसदी अधिक रहा तापमान</h3>
<p style="text-align:justify;">विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने कहा है कि इस वर्ष अक्टूबर महीना, रिकॉर्ड पर अभी का सबसे गर्म महीना रहा है, जोकि 1991-2020 के औसत तापमान से 0.85 डिग्री सैल्सियस, और अतीत में सर्वाधिक गर्म रहे अक्टूबर महीने से, 0.40 डिग्री सैल्सियस अधिक रहा।अक्टूबर ऐसा लगातार छठा महीना रहा है, जिसमें अंटार्कटिक समुद्र में हिम विस्तार रिकॉर्ड निम्न स्तर पर रहा। आर्कटिक समुद्र का हिम विस्तार, अक्टूबर के लिए,अपने सातवें निम्न बिन्दु पर पहुँचा। संगठन का कहना है कि अक्टूबर 2023 में, कुल बारिश या नमी, लगभग पूरे योरोप में, औसत से ऊपर रही।</p>
<p style="text-align:justify;">बाबेट तूफ़ान ने उत्तरी योरोप में दस्तक दी,और ऐलीन तूफ़ान ने, पुर्तगाल और स्पेन को प्रभावित किया,जिस दौरान भारी बारिश हुई और बाढ़ें आईं। ध्यान रहे कि दक्षिण पश्चिम मानसून की शुरुआत से ही भारत में भी बिपरजाय चक्रवात ने पूरे मॉनसून चक्र को बिगाड़ कर छोड़ दिया था। जिसकी वजह से राजस्थान जैसे इलाके में भी बाढ़ के हालात देखने को मिले व हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड जैसे राज्यों में बादल फटने के कारण हिमस्खलन हुआ तो हरियाणा ऐसा राज्य बना जिसके हिसार, फतेहाबाद, सिरसा, जींद, भिवानी, चरखी-दादरी जिलों में सूखे जैसे हालात बने।</p>
<h3 style="text-align:justify;">उत्तर भारत मे बदला मौसम,प्रदूषण से मिली राहत | El Nino Effect</h3>
<p style="text-align:justify;">हरियाणा राज्य सहित दिल्ली एनसीआर में पश्चिमिविक्षोभ के आंशिक प्रभाव से 9 नवंबर रात्रि से मौसम बदल चुका है। इस बदलाव के बाद 9 नवंबर रात्रि से ही बदलवाई बनी हुई है। दिल्ली एनसीआर में रात भर से हो रही बूंदाबांदी के बाद वायु गुणवत्ता सूचकांक में सुधार हुआ है। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के कृषि मौसम विभागाध्यक्ष डॉ मदन खीचड़ ने 10 नवंबर को कहीं कहीं गरजचमक व हवाओं के साथ छिटपुट बूंदाबांदी होने की संभावना जताई है। हरियाणा में कहीं कहीं पर हल्की बूंदाबांदी की शुरुआत हो भी चुकी है। इस बूंदाबांदी के बाद वायुमंडल की परत में बने प्रदूषण के स्तर में भी गिरावट की संभावना है। इसके बाद 11 नवंबर से मौसम खुश्क तथा उत्तरपश्चिमी हवाएं चलने से रात्रि तापमान में गिरावट की संभावना बनी रहेगी। El Nino Effect</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Gold-Silver Price Today : धनतेरस पर सोना-चांदी सस्ता, जानें आज के भाव!" href="http://10.0.0.122:1245/gold-is-cheap-on-dhanteras-know-todays-price/">Gold-Silver Price Today : धनतेरस पर सोना-चांदी सस्ता, जानें आज के भाव!</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 10 Nov 2023 17:35:53 +0530</pubDate>
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                <title>जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को समझिए</title>
                                    <description><![CDATA[पृथ्वी का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक बताते हैं कि पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। पृथ्वी का तापमान बीते 100 सालों में 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। पृथ्वी के तापमान में यह परिवर्तन संख्या की दृष्टि से काफी कम हो सकता है, परंतु इस प्रकार के किसी भी परिवर्तन का मानव […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/understand-the-seriousness-of-climate-change/article-48884"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-06/climate-change.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पृथ्वी का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक बताते हैं कि पृथ्वी का तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। पृथ्वी का तापमान बीते 100 सालों में 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ गया है। पृथ्वी के तापमान में यह परिवर्तन संख्या की दृष्टि से काफी कम हो सकता है, परंतु इस प्रकार के किसी भी परिवर्तन का मानव जाति पर बड़ा असर हो सकता है। जलवायु परिवर्तन के कुछ प्रभावों को वर्तमान में भी महसूस किया जा सकता है। पृथ्वी के तापमान में वृद्धि होने से हिमनद पिघल रहे हैं और महासागरों का जल स्तर बढ़ता जा रहा है, परिणामस्वरूप प्राकृतिक आपदाओं और कुछ द्वीपों के डूबने का खतरा भी बढ़ गया है। पिछले 150 वर्षों में वैश्विक औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। Climate Change</p>
<p style="text-align:justify;">विश्व भर में जलवायु परिवर्तन का विषय सर्वविदित है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में जलवायु परिवर्तन वैश्विक समाज के समक्ष मौजूद सबसे बड़ी चुनौती है एवं इससे निपटना वर्तमान समय की बड़ी आवश्यकता बन गई है। आंकड़े दर्शाते हैं कि 19वीं सदी के अंत से अब तक पृथ्वी की सतह का औसत तापमान लगभग 1.62 डिग्री फॉरनहाइट अर्थात लगभग 0.9 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। इसके अतिरिक्त पिछली सदी से अब तक समुद्र के जल स्तर में भी लगभग 8 इंच की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि यह समय जलवायु परिवर्तन की दिशा में गंभीरता से विचार करने का है।</p>
<h3>रोजमर्रा की चीजों में कैमिकल का इस्तेमाल होता है | (Climate Change)</h3>
<p style="text-align:justify;">खेतीबाड़ी में रासायनिक कीटनाशकों का इस्तेमाल होता है और यदि यह आवश्यकता से ज्यादा हो जाए तो कृषि उपज का जहरीला होना लाजिमी है। इसी तरह पशु पालन, डेयरी उद्योग, फूड प्रोसैसिंग, डिब्बाबंद चीजें हैं जो हमारी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करती हैं। इनमें भी कैमिकल का इस्तेमाल होता है जो इन्हें लंबे समय तक इस्तेमाल करने लायक बनाए रखता है। इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कानून भी हैं। लेकिन फिर भी नकली, मिलावटी, दूषित और अपौष्टिक खाद्य पदार्थों के सेवन से लोगों का जीवन संकट में पड़ जाता है। लोग बीमारियों का शिकार होते हैं, उनका स्वास्थ्य खतरे में पड़ जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">इन सबको रोकने के उपाय जरूर हैं, लेकिन उसके लिए विज्ञान के साथ-साथ समाज और कानून की भी भूमिका है। प्रश्न यह है कि जीवन को मौत तक देने वाले मिलावटियों को मृत्यु दंड क्यों नहीं दिया जाना चाहिए? इसी तरह उद्योगों से निकला विषैला रसायन नदियों और दूसरे जल स्रोतों को जहरीला बनाता है। विज्ञान ने इसके लिए पूरी व्यवस्था की है लेकिन ऐसे उद्योगों को चलने ही क्यों दिया जाता है जिनके लिए न तो वैज्ञानिक तरीकों का कोई अर्थ है और न ही कानून का डर है।</p>
<h3>…तो 15 फीसदी प्रजातियां खत्म हो जाएंगी | (Climate Change)</h3>
<p style="text-align:justify;">दुनिया के 197 देशों के सहयोग से यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन आॅन क्लाइमेट चेंज यानी यूएनएफसीसीसी पृथ्वी के तापमान को 2 डिग्री सेल्सियस से कम रखने के उद्देश्य को पूरा करने की कोशिश में हर साल 1995 से लेकर अब तक बैठक करता आ रहा है। लेकिन उसके नतीजे क्या निकले ये दुनिया से छिपा नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र ने आशंका जाहिर की है कि अगले पांच साल में पृथ्वी का औसत तापमान 1.5 डिग्री की सीमा को पार कर जाएगा। अगर धरती का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस बढ़ता है तो 15 फीसदी प्रजातियां खत्म हो जाएंगी। धरती जैसे ही 2.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म होगी तो 30 फीसदी प्रजातियां खत्म हो जाएंगी। यूनिवर्सिटी आॅफ केपटाउन, यूनिवर्सिटी आॅफ बफेलो और यूनिवर्सिटी आॅफ कनेक्टिकट ने एक शोध में यह दावा किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र की संस्था विश्व मौसम संगठन ने हाल में अनुमान लगाया कि अब से 2027 के बीच धरती का तापमान 19वीं सदी के मध्य की तुलना में सालाना 1.5 डिग्री से ज्यादा पर पहुंच जाएगा। यह सीमा महत्वपूर्ण है क्योंकि 2015 के पेरिस समझौते में इसी 1.5 डिग्री सेल्सियस औसत तापमान को दुनिया की सुरक्षा के लिए खतरनाक सीमा माना गया था और विभिन्न देशों ने शपथ ली थी कि इस सीमा को पार होने से रोकने के लिए कोशिश करेंगे।</p>
<h3>अनेक प्रजातियां लुप्त होंगी | (Climate Change)</h3>
<p style="text-align:justify;">तीनों यूनिवर्सिटीज के शोध में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से दुनिया में बड़ा बदलाव आएगा। शोध में कहा गया है कि अनेक प्रजातियां सभी महाद्वीपों और समुद्र के किनारों से लुप्त होंगी। वैश्विक स्तर पर ग्लोबल वार्मिंग के दौरान ग्लेशियर पिघल जाते हैं और समुद्र का जल स्तर ऊपर उठता है जिसके प्रभाव से समुद्र के आस-पास के द्वीपों के डूबने का खतरा भी बढ़ जाता है। मालदीव जैसे छोटे द्वीपीय देशों में रहने वाले लोग पहले से ही वैकल्पिक स्थलों की तलाश में हैं। तापमान में वृद्धि और वनस्पति पैटर्न में बदलाव ने कुछ पक्षी प्रजातियों को विलुप्त होने के लिये मजबूर कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">भीषम गर्मी के प्रकोप से किडनी की कार्यक्षमता भी प्रभावित हो रही है। अंग फेल्योर होने से भी लोगों की जान जा रही है। गर्मी के चलते ही डिहाइड्रेशन से लेकर दिल और फेफड़े की बीमारियां भी हो रही हैं। इसके अलावा प्रसव में होने वाली परेशानियां, विभिन्न तरह की एलर्जी और मानसिक बीमारियों की भी वजह जलवायु परिवर्तन ही है। पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, पृथ्वी का तापमान 1.1 से 1.2 डिग्री सेंटीग्रेड बढ़ चुका है। यह जान लीजिए कि न तो जीवन का अंत है और न ही प्रकृति का। दोनों के बीच सही तालमेल न होने से आपस में संघर्ष होना तय है।</p>
<h3>प्रकृति से तालमेल बिठाकर ही जीवन खुशहाल</h3>
<p style="text-align:justify;">प्रकृति से जीतना संभव नहीं क्योंकि मनुष्य चाहे कितनी कोशिश कर ले, प्रकृति के बनाए पर्दे को नष्ट नहीं कर सकता, उसमें एकाध छिद्र बेशक कर ले। यदि हम एक साधारण-सी बात समझ लें और वह भी इस उदाहरण के साथ कि हमारे शरीर के अधिकतर अंग अपनी चिकित्सा, उनका बढ़ना या घटना, फिर से नए बन जाना स्वयं कर लेते हैं अर्थात यह एक प्राकृतिक शारीरिक प्रक्रिया है। जब यह है तो प्रकृति क्यों जरूरत से ज्यादा अपने काम में इंसान की दखलंदाजी बर्दाश्त करेगी? इसलिए उसके साथ तालमेल बिठाकर ही जीवन को सुख और खुशहाली से भरा जा सकता है। जलवायु परिवर्तन के संकट से निपटने के लिए जरूरी है कि वैश्विक तापमान में वृद्धि औसत 1.5 डिग्री सेंटीग्रेड पर स्थिर हो जाए। ऐसा करने के लिए 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों और कार्बन डाई आॅक्साइड उत्सर्जन कम कर 40 प्रतिशत तक लाना होगा।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. आशीष वशिष्ठ , वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
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                <pubDate>Thu, 15 Jun 2023 18:43:34 +0530</pubDate>
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