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                <title>प्रणव दा के नाम पर सर्वसम्मति क्यों जरूरी?</title>
                                    <description><![CDATA[आगामी 17 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवारों को लेकर चल रही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गयी हैं। सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है तो कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने संकेत दिए हैं कि अगर सरकार को स्वीकार हो तो प्रणव मुखर्जी के लिए दूसरे कार्यकाल पर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/why-is-the-consensus-on-the-name-of-pranav-da/article-1199"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/mukhrjee.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आगामी 17 जुलाई को होने वाले राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवारों को लेकर चल रही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गयी हैं। सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने अपनी रणनीति बनानी शुरू कर दी है तो कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने संकेत दिए हैं कि अगर सरकार को स्वीकार हो तो प्रणव मुखर्जी के लिए दूसरे कार्यकाल पर विचार किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन मोदी सरकार ने इस बात का कोई संकेत नहीं दिया है कि इस सर्वोच्च पद के लिए उसके दिमाग में कौन है? लेकिन मोदी सरकार ने इसके लिए तीन वरिष्ठ मन्त्रियों राजनाथ सिंह, अरुण जेतली व वैंकय्या नायडू की एक समिति बनाई गई है जो विपक्षी दलों से बातचीत करके राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के नाम पर आम सहमति बनाने की कोशिश करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह भारत के लोकतंत्र के लिये शुभ एवं ऐतिहासिक घटना होगी यदि राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद के लिए सत्ताधारी व विपक्षी दलों के बीच सर्वसम्मति बनती है और यह भी बड़ी घटना ही कही जायेगी यदि इस सर्वोच्च पद के लिये उदाहरणीय किरदार का चयन होता है और प्रामाणिकता एवं नैतिकता को महत्व मिलता है। आवश्यकता है कि इस पद के लिये जिस व्यक्ति को लेकर भी हम आगे बढ़े तो प्रामाणिकता का बिल्ला उसके सीने पर हो और उसका कुर्ता कबीर की चादर हो।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान परिप्रेक्ष्य में सभी राजनीतिक दलों में वर्तमान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी के नाम पर ही सर्वसम्मति बनती है तो यह राष्ट्र के लिये प्रेरक घटना होगी क्योंकि वर्तमान राष्ट्रपति परिस्थितियों में उनसे बेहतर कोई दूसरा प्रत्याशी सामने दिखाई नहीं दे रहा है। हालांकि किसी राष्ट्रपति कोे दो बार चुने जाने की ऐतिहासिक स्थिति केवल एक बार ही आयी है</p>
<p style="text-align:justify;">और प्रथम राष्ट्रपति डा़ॅ राजेन्द्र प्रसाद को ही यह गौरव प्राप्त हुआ। प्रणव दा के नाम पर यदि सर्वसम्मति बनती है तो यह कई मायनों में लोकतंत्र को मजबूती देगा। कांग्रेस पार्टी ने भले ही सन् 2012 में उन्हें राष्ट्रपति बनाया हो, लेकिन प्रणव दा ने इस सर्वोच्च पद की गरिमा एवं गौरव को कभी भी राजनीतिक पूर्वग्रहों का शिकार नहीं बनने दिया। संविधान के रक्षक के रूप उनकी भूमिका ऐतिहासिक एवं यादगार बनी है और उन्होेंने इस पद की नयी परिभाषा गढ़ी।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी ऐसी ही अनेक विशेषताओं, योग्यता व गुणों को देखते हुए मोदी सरकार उन्हें अपना प्रत्याशी बनाती है तो पूरे विश्व में एक अनूठा संंदेश जायेगा और भारत का लोकतंत्र गौरवान्वित होगा। विशेषत: भाजपा के लिये यह दूरगामी सकारात्मक सन्देश का प्रेरक बनेगा कि उसकी नजर में पार्टी से ज्यादा राष्ट्रीय हित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">राजनीतिक गलियारों में अब जबकि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार की खोज हो रही है, प्रणव दा के पुननिर्वाचन की संभावनाओं को भी गंभीरता से तलाशा जा रहा है, क्योंकि प्रणव मुखर्जी ने देश के 13वें राष्ट्रपति के रूप में नये मानक गढ़े हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">राष्ट्रपति बनने के पहले तक प्रणव मुखर्जी राजनीति की मुख्य धारा में पूरी तरह से सक्रिय थे। वे न सिर्फ कांग्रेस पार्टी के, बल्कि यूपीए-2 के भी संकट मोचक थे। वे तीन ऐसी भूमिकाएं निभा रहे थे, जो और कोई नेता नहीं निभा पा रहा था। एक तो वे पार्टी में संगठन और सरकार के बीच पुल का काम करते थे। दूसरे, जनता और सरकार के बीच संवाद बनाते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">और तीसरे, खुद कांग्रेस और गठबंधन के बीच की कड़ी बने हुए थे। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने राजनीति की भांति ही संवैधानिक जिम्मेदारियों को भी बखूबी निभाया। राष्ट्रपति भवन में प्रवेश करते ही वे पूरी तरह से राजनीतिक सोच से निष्क्रिय हो गये और अपनी जिम्मेदारियों को राजनीतिक नहीं, बल्कि संवैधानिक ढंग से सफल बनाने लगे।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारा संविधान यह नहीं कहता कि राष्ट्रपति पद पर अराजनीतिक व्यक्ति को ही आना चाहिए और राष्ट्रपति बनने के बाद उसे हर मोर्चे पर निष्क्रिय हो जाना चाहिए। वह सिर्फ दो मोर्चों पर राष्ट्रपति को निष्क्रिय रखता है। एक तो उससे राजनीति में सक्रिय न रहने की अपेक्षा की जाती है, ताकि उसकी निष्पक्षता बनी रहे और वह किसी खास दल के प्रति भेदभाव या पक्षपात न बरते।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरे, वह राष्टÑपति को सरकार के किसी भी अंग-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के परिचालन में सीधे हस्तक्षेप करने से रोकता है। इन दोनों मोर्चों पर प्रणव दा ने सफलता हासिल की और इस पद को एक ऊंचाई प्रदत्त की। उन्होंने हमेशा अपनी आंखें खुली और विवेक को जाग्रत रखा।</p>
<p style="text-align:justify;">जो लोग यह मानते हैं कि राष्ट्रपति सिर्फ एक रबर स्टांप होता है, वे हमारे संविधान की व्यवस्था को ठीक से नहीं समझते। वे ताकत और अधिकार को सिर्फ कार्यपालिका के दायरे में बांधकर देखते हैं, लिहाजा राष्ट्रपति उन्हें बेचारा लगता है। लेकिन प्रणव दा ऐसी सोच से उपरत थे।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने आंख मूंदकर किसी बिल पर हस्ताक्षर नहीं किये तो किसी पूर्वाग्रह से किसी भी बिल को वापस नहीं लौटाया, राष्ट्रहित में जो उचित था, वही किया। लोकतांत्रिक राज्य सत्ता के नियंत्रण का यह एक बिल्कुल अलग उपकरण है, जिसकी ताकत को अक्सर लोग समझ नहीं पाते। लेकिन राष्टÑपति के रूप में प्रणव मुखर्जी की यह भूमिका निर्विवाद रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रणव दा ने अपने सम्मुख खड़ी इस चुनौती को न केवल स्वीकारा बल्कि सफलतापूर्वक पार भी लगाया। वे राष्टÑपति बनने के बाद पार्टी पलिटिक्स से मुक्त हुए, लेकिन वे सक्रिय रहे और निष्पक्ष भी बने रहे। राष्ट्रपति प्रणव दा की एक और अनूठी सफलता रही कि वे राजनीतिक दृष्टि से भले ही निष्क्रिय रहे लेकिन राष्ट्रीय हितों के लिये सदैव सक्रिय बने रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी सक्रियता से कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका के कार्यक्षेत्र में कभी भी अतिक्रमण नहीं हुआ। लेकिन वे भारत की समस्याओं के लिये सदैव जागरूक बने रहे, लोकतंत्र को मजबूती देने के लिये उनके प्रयास जारी रहे। साहित्य, शिक्षा एवं चिन्तन के लिये वे एक-एक पल का उपयोग करते हुए दिखाई दिये।</p>
<p style="text-align:justify;">जैसे कि एस़ राधाकृष्णन राष्ट्रपति बनने के बाद भी अकादमिक रूप से काफी सक्रिय थे। एपीजे अब्दुल कलाम राष्ट्रपति के रूप में काफी विजिबल और एक्टिव रहे। इन दोनों ने राजनीति और सरकार से खुद को हमेशा बिल्कुल अलग रखा।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी तरफ नारायणन जैसे राष्ट्रपति भी हुए हैं, जो सामान्य दिनों में तो बहुत सक्रिय नहीं रहे, लेकिन विशेष परिस्थितियों में अभूतपूर्व राजनैतिक दृढ़ता का परिचय दिया। उन्होंने उन स्थितियों के लिए तर्कपूर्ण आधार तैयार किया, जब राष्ट्रपति को सिर्फ अपने विवेक के अनुसार चलना होता है। प्रणव दा ने भी ऐसे ही विलक्षण एवं अनूठे प्रयोगों से अपने पांच वर्ष को यादगार बनाया है।</p>
<p style="text-align:justify;">
प्रणव मुखर्जी को पुन: राष्ट्रपति बनाया जाना इस देश की जरूरत की ओर इंगित करता है। इसकी वजह यह है कि श्री मुखर्जी संवैधानिक बारीकियों और इसकी पेचीदगियों को भलीभांति समझते हैं और अपने लम्बे संसदीय जीवन में उन्होंने सभी प्रकार के उतार-चढ़ावों को देखा है मगर सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पूरे देश के लगभग प्रत्येक राजनीतिक दल में उनके प्रशंसक हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी भी राजनीतिक दल में उनके नाम पर असहमति नहीं हो सकती। जद (यू) के नेता नीतीश कुमार ने उनके नाम का सुझाव पहले ही दे दिया है। अन्य राजनीतिक दलों में भी सहमति के स्वर सुनाई दे रहे हैं अब मोदी सरकार एवं भाजपा इस बारे में अपना दिल बड़ा करके सोचे और वक्त की जरूरत को देखते हुए मुखर्जी के नाम पर विचार करे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-ललित गर्ग</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Tue, 13 Jun 2017 23:07:27 +0530</pubDate>
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