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                <title>Artical on Manipur Violence - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Manipur Violence: मणिपुर में सख्त कदम उठाने की दरकार</title>
                                    <description><![CDATA[Manipur Violence: मणिपुर में हो रही नस्लीय हिंसा मामले में संसद ठप है। सत्ता पक्ष और विपक्ष इस मामले में एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं। मणिपुर में जो कुछ हो रहा है, उसे देख-सुनकर देशवासी सन्न हैं। असल में पूर्वोत्तर का राज्य मणिपुर बीते ढाई महीने से भी अधिक समय से नस्लीय […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/need-to-take-strict-steps-in-manipur/article-50473"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/massive-shootout-between-cookie-militants-in-manipur.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Manipur Violence: मणिपुर में हो रही नस्लीय हिंसा मामले में संसद ठप है। सत्ता पक्ष और विपक्ष इस मामले में एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं। मणिपुर में जो कुछ हो रहा है, उसे देख-सुनकर देशवासी सन्न हैं। असल में पूर्वोत्तर का राज्य मणिपुर बीते ढाई महीने से भी अधिक समय से नस्लीय हिंसा की आग से जल रहा है। बीती 19 जुलाई को मणिपुर की दो महिलाओं के साथ अनैतिक दुर्व्यवहार का एक वीडियो सामने आया। मणिपुर पुलिस ने इस वीडियो की पुष्टि करते हुए बताया है कि ये महिलाएं बीती चार मई को मणिपुर के थोबल जिले में अनैतिक दुर्व्यवहार की शिकार हुई थीं। इस वीभत्स और मानवता को शर्मसार करने वाले वीडियो के वायरल होने के बाद यह सवाल उठने लगा है कि आखिर इस समस्या का हल क्या है? Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">मणिपुर में बीती तीन मई को हिंसा शुरू होने के बाद से अब तक 142 लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 60,000 लोग बेघर हो गए हैं। राज्य सरकार के मुताबिक इस हिंसा में 5000 आगजनी की घटनाएं हुई हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक रिपोर्ट में मणिपुर सरकार ने कहा कि इस हिंसा से जुड़े कुल 5,995 मामले दर्ज किए गए हैं और 6,745 लोगों को हिरासत में लिया गया है। मणिपुर में मौजूदा समय में कानून व्यवस्था की स्थिति पर कोई आॅन रिकॉर्ड बोलने को तैयार नहीं है। लेकिन राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि हालात धीरे-धीरे सुधर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">मणिपुर में तीन बड़े समुदाय मैतेई, नागा और कुकी हैं। मैतई ज्यादातर हिंदू हैं और वह ओबीसी कैटेगरी में आते हैं। राज्य में मैतई लोगों की जनसंख्या भी ज्यादा है। राज्य में नागा और कुकी ज्यादातर ईसाई हैं और ये दोनों अनुसूचित जनजाति में आते हैं। राज्य में मैतेई की आबादी करीब 60 फीसदी है और ये समुदाय इंफाल घाटी में रहता है। राज्य के कुल 10 फीसदी भूभाग में मैतेई समुदाय रहता है और बाकी का जो ये 90 फीसदी हिस्सा है, वो पहाड़ी है। यहां पर कुकी और नागा समुदाय को मिलाकर राज्य की जनसंख्या के करीब 40 फीसदी लोग बसे हुए हैं। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">पहाड़ में नागा और कुकी को मिलाकर 30 से ज्यादा छोटी-बड़ी जनजातियां हैं। ये अनुसूचित जनजाति में आती है। इनके पास कई सुविधाएं हैं और पहाड़ी इलाकों में सिर्फ यही रह सकते हैं। मैतेई समुदाय इसका विरोध करता है। वो कहते हैं कि हमें भी एसटी का दर्जा मिलना चाहिए क्योंकि उनके पास रहने के लिए रहने को जमीन कम है। अगर एसटी का दर्जा मिलेगा. तो वो पहाड़ों पर शिफ्ट हो सकेंगे। वर्तमान हालात की बात करें तो ये कहने में कुछ भी गलत नहीं है कि इसके लिए राज्य की सरकार जिम्मेदार है जो उच्च न्यायालय द्वारा मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने संबंधी फैसले के बाद उत्पन्न स्थिति से सही ढंग से निपटने में असफल रही। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">कुकी समुदाय द्वारा उच्च न्यायालय के फैसले के बाद की जाने हिंसा के बारे में खुफिया एजेंसियों द्वारा भी सही समय पर जानकारी या तो दी नहीं गई या फिर जिम्मेदार लोगों ने उस पर ध्यान नहीं दिया। मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह ने भी त्यागपत्र देने का ऐलान किया लेकिन मौजूदा परिस्थिति में मुख्यमंत्री बदलने से भी कुछ लाभ नहीं होगा क्योंकि राज्य में ऐसा एक भी राजनीतिक नेता नहीं है जिसे दोनों समुदायों का विश्वास हासिल हो। लेकिन इस सबके बीच गत दिवस 4 मई को मैतेई हमलवारों द्वारा एक गांव पर धावा बोलकर पकड़ी गई दो महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने का वीडियो सोशल मीडिया के जरिए प्रसारित होने के बाद पूरे देश में जबरदस्त रोषपूर्ण प्रतिक्रिया हुई। सर्वोच्च न्यायालय से संसद तक उसकी गूंज सुनाई दी। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">मणिपुर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सामने आकर उक्त घटना को पूरे देश को शर्मसार करने वाला बताया। विपक्ष को भी संसद का सत्र शुरू होते ही केंद्र सरकार को घेरने का जोरदार मुद्दा हाथ लग गया जिसका लाभ लेने में उसने लेश मात्र भी देर नहीं लगाई। आनन-फानन में दोषी लोगों की गिरफ्तारी होने के बाद मुख्यमंत्री ने उन्हें फांसी तक पहुंचाने की बात कही लेकिन उनका ये कहना चौंकाने वाला है कि ऐसे हजारों मामले हैं और उसी लिए इंटरनेट बंद कर दिया गया है। सवाल ये हैं कि यदि ऐसे हजारों मामले थे तो राज्य सरकार ने अब तक क्या कदम उठाए और महिलाओं को नग्न घुमाए जाने की रिपोर्ट थाने में दर्ज हो जाने के दो महीने बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं की गई?</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, ये बात भी विचारणीय है कि 4 मई की घटना का वीडियो संसद के सत्र तक क्यों दबाकर रखा गया? जाहिर है इसके पीछे भी उन ताकतों का हाथ है जो मणिपुर में लगी आग को ठंडी करने के बजाय उसे और भड़काने में जुटे हुए हैं। मणिपुर में कुकी समुदाय मूलत: म्यांमार से आकर पर्वतीय क्षेत्रों में बस गया और अभी भी सीमा पार से अवैध रूप से घुसपैठ जारी है। इनके द्वारा अफीम की खेती कर तस्करी के जरिए उसे विदेश भेजने की बात भी सामने आ चुकी है जिसमें विदेशी हाथ होना अवश्यंभावी है। ये देखते हुए इस राज्य को पूरी तरह स्थानीय प्रशासन के भरोसे छोड़कर रखना भूल साबित हुआ है। महिलाओं के अपमान की जो घटना सामने आई वह किसी भी दृष्टि से सहनीय नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां एक तरफ पहाड़ी इलाकों में एक अलग प्रशासन की मांग उठ रही है, वहीं मैदानी इलाकों के लोग लगातार ये इल्जाम लगाते आ रहे हैं कि इस हिंसा में म्यांमार से मणिपुर में घुसे लोगों की एक बड़ी भूमिका है। इसीलिए घाटी में रहने वाले लोग अब एनआरसी करवा कर अवैध रूप से मणिपुर में घुसे लोगों की पहचान करवाने की मांग कर रहे हैं। पहाड़ी इलाकों में रहने वाले कुकी समुदाय के लोग इस बात का खंडन करते हैं। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">मैतेई और कुकी नामक आदिवासी समुदायों के बीच वर्चस्व की लड़ाई में प्रदेश और प्रशासन दो हिस्सों में बंट गया है। एक दूसरे के हिस्से में जाना मौत को गले लगाने जैसा है। पुलिस और सशस्त्र बलों के हथियार लूटकर दोनों समूहों ने अपनी सेना बना ली है। अस्थाई तौर पर बनाए बंकरों में नौजवान इस तरह तैनात हैं जैसे सामने शत्रु देश की सीमा हो। राजधानी इंफाल तक सुरक्षित नहीं है। प्रशासन पूरी तरह लाचार नजर आ रहा है। राज्य सरकार का कहना है कि हालात सुधर रहे हैं। लेकिन राज्य में हर दिन हो रही हिंसा ये बात बार-बार याद दिला रही है कि दोनों समुदायों के बीच अविश्वास की खाई लगातार गहरी होती जा रही है। एक ऐसी खाई जिसका खामियाजा मणिपुर के हजारों लोग हर दिन भुगत रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विरोध जताना देश के नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है, और कुकी यदि यहीं तक सीमित रहते, तो कहीं ज्यादा प्रभावी हो सकते थे। मगर अब बात हिंसा और हथियार तक पहुंच गई है। चूंकि यहां की जनजातियां सिर्फ अलगाववादी गुट नहीं हैं, इसलिए इस मसले के समाधान में सिविल सोसाइटी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण बन जाती है। सत्ता-प्रतिष्ठान निस्संदेह जरूरी होने पर सख्ती दिखाए, लेकिन अमन का रास्ता मिल-बैठकर बातचीत करने से ही निकलेगा। यहां के समुदाय अपने हितों के लिए अपनों की जान-माल और सुरक्षा को दांव पर नहीं लगा सकते। उनका यह रुख किसी भी सभ्य समाज में उचित नहीं कहा जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>राजेश माहेश्वरी, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="PM Modi to visit Rajasthan: पीएम मोदी सवा लाख पीएम किसान समृद्धि केंद्र राष्ट्र को करेंगे समर्पित" href="http://10.0.0.122:1245/preparations-completed-for-pms-public-meeting-in-sikar/">PM Modi to visit Rajasthan: पीएम मोदी सवा लाख पीएम किसान समृद्धि केंद्र राष्ट्र को करेंगे समर्पित</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 27 Jul 2023 09:47:07 +0530</pubDate>
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                <title>Manipur Violence: जातीय जंजाल में उलझा मणिपुर</title>
                                    <description><![CDATA[Manipur Violence: आपसी वैमनस्य और जातीय हिंसा का जो दृश्य मणिपुर में दिखा है, उसने संपूर्ण मानवता को झकझोर देने का काम किया है। दो महिलाओं की निर्वस्त्र परेड और उनके अंगों के साथ बेशर्मी की हद तक खिलवाड़ ने साफ कर दिया है कि मनुष्य को यदि मनमानी करने की छूट मिलती रही तो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/manipur-embroiled-in-ethnic-web/article-50286"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/manipur.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Manipur Violence: आपसी वैमनस्य और जातीय हिंसा का जो दृश्य मणिपुर में दिखा है, उसने संपूर्ण मानवता को झकझोर देने का काम किया है। दो महिलाओं की निर्वस्त्र परेड और उनके अंगों के साथ बेशर्मी की हद तक खिलवाड़ ने साफ कर दिया है कि मनुष्य को यदि मनमानी करने की छूट मिलती रही तो उसे असभ्यता की चरम बर्बरता तक पहुंचने में देर नहीं लगेगी? मनुष्य के अवचेतन में पैठ जमाए बैठी क्रूरता, निर्ममता और हिंसा की सभी सीमाएं लांघकर मानवीय गरिमा को तार-तार कर देंगी। 1979-80 में कश्मीर घाटी में जब हिंदुओं को आतंकवादी-अलगाववादियों ने कश्मीर से बाहर हो जाने की मुनादी पीटी थी, तब महिलाओं के साथ ऐसे ही या इनसे भी बदतर अत्याचार हुए थे।</p>
<p style="text-align:justify;">तब प्रधानमंत्री वीपी सिंह के मुंह पर ताला पड़ गया था और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला लंदन भाग गए थे। आज देर से ही सही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा है कि हैवानियत की यह घटना अक्षम्य है। घटना पर पीड़ा भी होती है और क्रोध भी आता है। दोषियों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा। इस घटना के कारण 140 करोड़ देशवासियों को शर्मसार होना पड़ा है। आखिरकार इस मुद्दे पर भी विचार करना जरूरी है कि आजादी के बाद से ही यह भूखंड अस्थिर क्यों है? Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करने वाली मणिपुर की आग इतनी बेकाबू हो गई है कि वहां की आबादी में अब यह विभाजन करना नामुमकिन है कि कौन फरियादी है और कौन अपराधी ! क्योंकि दोनों पक्ष ही आगजनी और हिंसा में भागीदार हैं और दोनों ही पीड़ित? यह भी कहना मुश्किल है कि प्रशासन और पुलिस निष्पक्ष एवं निर्विवादित है? सच्चाई तो यह है कि पुलिस ने अपने कर्तव्य का पालन भी ठीक से नहीं किया। घटना चार मई 2023 की बताई जा रही है। इसके एक-दो दिन पहले ही मणिपुर में तीन विवादित कानूनों को लेकर मैतेई और नगा-कुकी समुदायों के बीच वर्चस्व की लड़ाई छिड़ना शुरू हो गई थी। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">शुरुआत में ही एक समुदाय के पुरुषों ने शत्रु समुदाय की स्त्रियों की अस्मिता से घिनौने खेल की शुरुआत कर दी थी। पीड़ित कुकी समुदाय की महिलाओं ने अब कार्रवाई आरंभ होने पर बयान दिया है कि करीब एक हजार हथियारबंद लोग उनके गांव में घूसे चले आए। घरों में आग और कत्ल-ए-आम का तांडव रच दिया। जब ये महिलाएं प्राण और आबरू  बचाने की कोशिश में सुरक्षित जगह तलाश रही थीं, तब पुलिस ने अपने वाहन में इन्हें शरण दे दी। पुलिस जब महिलाओं को थाने ले जाने लगी, तभी भीड़ वाहन के सामने खड़ी हो गई और बैठी महिलाओं को उनके हवाले करने की मांग करने लगी। आफत में पड़ी पुलिस को खुद की जान बचाने की चिंता हो गई और पुलिस ने लाचार महिलाओं को भीड़ के सुपुर्द कर दिया। फिर भीड़ ने जो किया वह वीडियो के जरिए दो माह बाद अब सामने आया है। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह को इस घटना और ऐसी ही वीभत्स सैकड़ों घटनाओं की जानकारी पहले से ही थी, इसलिए उनसे जब घटना की प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने सच्चाई उगल भी दी। कहा, ‘ऐसी हजारों घटनाएं घटित हो चुकी हैं। उन सबके बारे में जांच चल रही है। ‘मसलन राजनीति के कुटिल व चतुर खिलाड़ी बीरेन सिंह कतई संवेदनशील नहीं हैं। मुख्यमंत्री का बयान और निर्वस्त्र महिलाओं की सार्वजनिक परेड से जाहिर है कि मणिपुर के दंगाग्रस्त एक बड़े इलाके में कानून व्यवस्था ढाई माह से पूरी तरह ठप है। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे भी मणिपुर चीन और म्यांमार के सीमाई क्षेत्र से लगा होने के कारण संवेदनशील क्षेत्र है। स्थानीय उपद्रवियों, घुसपैठियों और नशा कारोबारियों की टोह लेने के लिए इस पूरे पूर्वोत्तर क्षेत्र में केंद्रीय व राज्य स्तरीय गुप्तचर संस्थाएं और उनके गुप्तचर बड़ी संख्या में तैनात हैं, आखिर ये क्या कर रहे थे ? इसे राज्य सरकार समेत तमाम शासकीय एजेंसियों की अक्षमता ही कहा जाएगा कि सरेआम घटना भी घट गई और कानों में लाचार स्त्रियों को पुकार भी नहीं गूंजी ?</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि थाउबल जिले में घटी इस घटना की जो अब जानकारियां छनकर सामने आ रही हैं, उससे साफ हुआ है कि 4 मई की इस घटना की रिपोर्ट 13 मई को कांग्पोक्पी जिले के साइकुल थाने में शून्य पर दर्ज कर ली गई थी। बाद में 21 जून को प्राथमिकी साईकुल थाने से थाउबल थाने में दर्ज हुई। लेकिन मुख्य आरोपी हेरादास सिंह व तीन अन्य की गिरफ्तारियां 19 जुलाई को वीडियो वायरल होने के 24 घंटे बाद हुईं। तब तक पुलिस इस मामले को दबाए रखने के लिहाज से हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">एक लोकतांत्रिक राज्य व्यवस्था में इस तरह की समाज को जलील करने वाली घटना केंद्र व राज्य सरकार के मातहत एजेंसियां महीनों तक छुपाए रखें, तो इसे कानून की असफलता ही माना जाएगा? सड़क से संसद तक हंगामा खड़ा करने वालों से पूछा जाना चाहिए कि आखिर वे कैसा समाज गढ़ रहे हैं या गढ़ना चाहते हैं? क्योंकि मानवता को कलंकित करने वाली यह इकलौती घटना नहीं है। इसी कालखंड में राजस्थान और छत्तीसगढ़ में महिलाओं के साथ दुष्कर्म और नृशंस हत्या की घटनाएं सामने आई हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">महिलाओं को हिंसा के साधन के रूप में इस्तेमाल करना नामंजूर है। मुख्यमंत्री बीरेन सिंह ने भी कह दिया कि आपको ग्राउंड पर जाकर रियलिटी देखनी चाहिए। राज्य में ऐसे हजारों मामले दर्ज हैं। इसीलिए तो इंटरनेट बंद किया है !</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार गंभीर है, दोषियों को फांसी के तख्ते तक पहुंचाया जाएगा।ह्य इस घटना के ट्वीट वीडियो से भी यह पता चलता है कि मुख्यधारा का मीडिया चाहे प्रिंट हो या टीवी समाचार चैनल मणिपुर में हिंसक व स्त्रीजन्य निर्लज्जता की खबरों तक पहुंच ही नहीं पाया। वैसे भी स्वतंत्रता के बाद से पूर्वोत्तर के राज्य शेष भारत से लगभग अलग-थलग रहे हैं, इसलिए वहां न केवल उग्रवाद को पनपने के नए-नए अवसर मिलते रहे, बल्कि बांग्लादेशी मुस्लिम और म्यांमार के रोहिंग्या घुसपैठिए आग में घी डालने का काम करते रहे हैं। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">ईसाई मतांतरण के चलते यहां जनसंख्यात्मक घनत्व का संतुलन बिगड़ जाना भी उपद्रव का एक प्रमुख कारण है। चीनी दखल इस उपद्रव को उकसा कर जीवंत बनाए रखने का काम करता है। चीन और म्यांमार यहां अलगाव वादियों को चारा डालते रहे हैं। हालांकि नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से पूर्वोत्तर के सातों राज्यों पर विशेष ध्यान देना शुरू हुआ है। ढ़ांचागत विकास के साथ-साथ आवागमन के साधन बढ़े हैं। पर्यटन के रूप में भी इलाका जाने जाना लगा है। नशे के कारोबार पर लगाम लगी है और आतंकी समूहों को जमींदोज किया है।</p>
<p style="text-align:justify;">मैतेई और कुकी समुदायों के बीच अब यह विरोध वैमनस्यता में बदलकर इतना गहरा हो गया है कि समुदायों से जुड़े आम लोग ही नहीं सरकारी नौकरी-पेशा भी जातिगत समूहों में बंट गए हैं। इनमें प्रशासन और पुलिस के अधिकारियों से लेकर वे बुद्धिजीवी भी हैं, जो समरसता की थोथी बातें करते रहे हैं। अत: अब मणिपुर को गंभीरता से लेते हुए समस्या का समाधान युद्धस्तर पर निकालने की जरूरत है। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>प्रमोद भार्गव, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="बच्चे की पलकों पर ये कैसा जीव जिसे देख उड़े डाक्टरों के होश!" href="http://10.0.0.122:1245/what-kind-of-creature-is-this-on-the-eyelids-of-the-child/">बच्चे की पलकों पर ये कैसा जीव जिसे देख उड़े डाक्टरों के होश!</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <link>https://www.sachkahoon.com/national/manipur-embroiled-in-ethnic-web/article-50286</link>
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                <pubDate>Sat, 22 Jul 2023 12:25:46 +0530</pubDate>
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                <title>Manipur Violence : सुशासन के दौर में सुलगता मणिपुर</title>
                                    <description><![CDATA[Manipur Violence : दो टूक कहें तो सुशासन (good governance) का अभिप्राय शांति और खुशहाली है जो लोक सशक्तिकरण की अवधारणा पर टिकी है। मगर इन दिनों पूर्वोत्तर का मणिपुर जिस तरह हिंसा में झुलसा हुआ है उससे कई सवाल खड़े हो गये हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह समस्या पनपी ही […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/manipur-smolders-in-the-era-of-good-governance/article-49504"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-07/manipur-protest.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Manipur Violence : दो टूक कहें तो सुशासन (good governance) का अभिप्राय शांति और खुशहाली है जो लोक सशक्तिकरण की अवधारणा पर टिकी है। मगर इन दिनों पूर्वोत्तर का मणिपुर जिस तरह हिंसा में झुलसा हुआ है उससे कई सवाल खड़े हो गये हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर यह समस्या पनपी ही क्यों। विदित हो कि मणिपुर में मैतेई और कूकी समुदाय के बीच मई के शुरुआती दिनों में भड़की हिंसा से सौ से अधिक मौतें हो चुकी हैं। अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की मैतेई समुदाय की मांग के विरोध में 3 मई को पर्वतीय जिलों में आदिवासी एकजुटता मार्च के आयोजन के बाद यह घटना घटित हुई। गौरतलब है कि मणिपुर की 53 फीसदी आबादी इसी समुदाय की है जो मुख्य रूप से इम्फाल घाटी में निवास करती है जबकि नगा और कूकी की आबादी भी 40 फीसदी है जिनका आवास पर्वतीय जिले हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">घटना का स्वरूप कुछ भी हो पर लम्बे समय तक नियंत्रण का पूरी तरह न हो पाना सुशासनिक पहलू की कमजोरी को तो दर्शाता ही है। इतना ही नहीं सुलगते मणिपुर ने इस बात को भी जता दिया है कि सरकार से भरोसा भी कम हुआ है। शायद यही कारण है कि जातीय हिंसा से निपटने में नाकाम रहे मुख्यमंत्री एन विरेन्द्र सिंह ने इस्तीफा देने का मन भी बना लिया था। हालांकि ऐसा कहा जा रहा है कि जनता के दबाव में उन्होंने अपना मन बदल लिया। महिलाएं नहीं चाहती थीं कि वे इस्तीफा दें और त्यागपत्र की प्रति भी फाड़ दी गयी। यह घटनाक्रम भी मणिपुर की संवेदना को मुखर करता है और इस बात को इंगित करता है कि किसी भी हिंसा को यदि देर तक जिंदा रखा जाएगा तो बड़े नुकसान के लिए तैयार रहना चाहिए जो सुशासन से भरी सरकारों के लिए कहीं भी से ठीक नहीं है।</p>
<h3>दो समुदायों की लड़ाई कैसे धार्मिक हिंसा में तब्दील हुई | Manipur Violence</h3>
<p style="text-align:justify;">मणिपुर के मुख्यमंत्री की मानें तो आदिवासी समुदाय के लोग संरक्षित जंगलों और वन अभ्यारण्य में गैर कानून कब्जा करके अफीम की खेती कर रहे हैं। यह कब्जा हटाने के लिए सरकार मणिपुर वन कानून 2021 के अंतर्गत वन भूमि पर किसी तरह के अतिक्रमण को हटाने के लिए एक अभियान चला रही है। आदिवासियों का इस पर मत है कि यह उनकी पैतृक जमीन है न कि उन्होंने अतिक्रमण किया है। जिसके कारण विरोध पनपा और सरकार ने धारा 144 लगा कर प्रदर्शन पर पाबंदी लगा दी। नतीजन कूकी समुदाय के सबसे बड़े जातीय संगठन कूकी ईएनपी ने सरकार के खिलाफ बड़ी रैली निकालने का एलान कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">वैसे देखा जाए तो कूकी जनजाति के कई संगठन 2005 तक सैन्य विद्रोह में शामिल रहे हैं। मनमोहन सरकार के दौरान साल 2008 में सभी कूकी विद्रोही संगठनों से केन्द्र सरकार ने उनके खिलाफ सैन्य कार्यवाही रोकने के लिए सस्पेंश्न आॅफ आॅप्रेशन एग्रिमेंट किया था। 60 विधायको वाले मणिपुर में 40 विधायक मैतेई समुदाय से आते हैं जाहिर है इनका दबदबा है और इसमें से ज्यादातर हिन्दु हैं। यहां के पहाड़ी इलाकों में 33 मान्यता प्राप्त जनजातियां रहती हैं जिसमें नागा और कूकी प्रमुख हैं और इनका सरोकार मुख्यत: इसाई धर्म से है। उक्त से यह परिलक्षित होता है कि दो समुदायों की लड़ाई कैसे धार्मिक हिंसा में तब्दील हुई है। Manipur Violence</p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय संविधान के अनुच्छेद 371(ग) को समझें तो मणिपुर की पहाड़ी जनजातियों को संवैधानिक विशेषाधिकार मिले हैं और मेतई समुदाय इससे अलग है। भूमि सुधार अधिनियम के चलते मेतई समुदाय पहाड़ी इलाकों में जमीन खरीदकर प्रवास नहीं कर सकते हैं जबकि दूसरा समुदाय के घाटी में आकर बसने में कोई रोक-टोक नहीं है। नतीजन समुदायों के बीच खाई बढ़ती जा रही है। ऐसे में मणिपुर की ताजी घटना भले ही तात्कालिक परिस्थितियों के चलते पनपी हो मगर यह इसका ऐतिहासिक पहलू और संरचना द्वन्द्व और संघर्ष से भरा दिखता है। इन सबके बावजूद यहां आठ फीसदी मुस्लिम और लगभग इतने ही सनमही समुदाय के लोग रहते हैं। Good Governance</p>
<h3>मणिपुर की कानून व्यवस्था जातीय हिंसा के चलते हाशिये पर</h3>
<p style="text-align:justify;">घटना का स्वरूप किसी भी कारण से विकसित हुआ हो मगर यह सुशासन के लिए बड़ी चुनौती है। खास तौर पर तब यह अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जब दौर सुशासन और अमृतकाल का हो। सुशासन एक लोक प्रवर्धित अवधारणा है जिसमें कानून और व्यवस्था को प्राथमिकता देना और बुनियादी विकास को बनाए रखना शामिल है। मणिपुर की कानून और व्यवस्था इस जातीय हिंसा के चलते हाशिये पर है और केन्द्र और मणिपुर सरकार की जमकर किरकिरी हो रही है। मामले पर केन्द्र अपने स्तर पर समाधान खोज रहा है जबकि राज्य की तरकीब समस्या से निपटने में नाकाफी रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">मुख्य विरोधी कांग्रेस के नेता राहुल गांधी भी स्थिति को देखते हुए मणिपुर का दौरा किया और वहां की स्थितियों को समझने का प्रयास किया है। हालांकि इसे लेकर भी सियासत गर्म है। फिलहाल 50 हजार से अधिक लोग राहत शिविरों में शरण लिए हुए हैं जिनमें दोनों समुदाय के लोग शामिल हैं। पड़ताल बताती है कि गुस्से का स्तर बराबरी का है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार सौ मंदिरों के अलावा दो हजार मैतेई घरों पर भी हमला हुआ है। कहा तो जा रहा है कि चर्च को भी नुकसान हुआ है। यानी कि हक की लड़ाई लड़ते-लड़ते हिंसा ने भी धार्मिक रूप ले लिया। Manipur Violence</p>
<h3>इतने लम्बे वक्त तक हिंसा दोनों सरकारों के लिए सही नहीं | Good Governance</h3>
<p style="text-align:justify;">दो टूक यह भी है कि मणिपुर इस कदर तूफान से घिरा मगर केन्द्र हो या राज्य सरकार किसी ने इसे तत्काल प्रभाव से काबू में करने का प्रयास क्यों नहीं किया? वैसे देखा जाए तो भारत में जातीय और धार्मिक हिंसा की छुटपुट घटनाएं कहीं पर भी विकसित हो जाती हैं मगर मणिपुर एक खास ख्याल रखने वाला प्रदेश है। यह पूर्वोत्तर का राज्य है और दिल्ली से भी दूर है। यहां के सामाजिक-सांस्कृतिक पक्ष से शेष भारत उतना वाकिफ नहीं है साथ ही राजनीतिक दृष्टि से भी यह बहुत रसूक की जगह नहीं है। ऐसे में हिंसा का बड़ा हो जाना और हालात को इतने लम्बे वक्त तक बनाए रखना केन्द्र और राज्य दोनों सरकारों के लिए सही नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">राहुल गांधी के मणिपुर दौरे के दौरान राहत शिविरों में जाना और राज्यपाल से मिलना विपक्ष की दृष्टि से सही कदम है। चाहे सरकार केन्द्र की हो या राज्य की जिम्मेदारी को ठीक से निभायें और जिस सुशासन को लेकर गंभीर चिंता से जकड़े हुए हैं उसे देखते हुए मणिपुर को शान्ति और खुशहाली के मार्ग पर ले आएं। 2024 के चुनाव में एक वर्ष से कम समय का रह गया है ऐसे में मोदी सरकार अपनी राजनीतिक सुचिता को सकारात्मक बनाए रखने के लिए मणिपुर को लेकर कम चिंतित नहीं होगी मगर इस राज्य के बढ़े दर्द को सुशासन के मरहम से दूर किया जाना तत्काल की आवश्यकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मणिपुर में जो हुआ वो बेहद कष्टकारी है और इस बात का द्योतक भी कि शासन-सुशासन व प्रशासन सभ्यता की ऊँचाई को कितना भी प्राप्त कर ले पर समावेशी और सतत विकास की अवधारणा के साथ सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक पहलू के साथ कानून और व्यवस्था के बिना सुशासन को दुरूस्त नहीं कर सकती। बड़ी सरकार बड़े मतों से नहीं बल्कि शांति और खुशहाली से संभव है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह,वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक (ये लेखक के अपने निजी विचार हैं)</strong></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>लेख</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 02 Jul 2023 10:36:20 +0530</pubDate>
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