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                <title>Ajab Gajab News - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Ajab Gajab News: धरती की पहली जमीन, जो निकली समंदर से बाहर, वो जगह भारत के इस राज्य में&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[Ajab Gajab News:  एक दौर था जब पूरी पृथ्वी केवल समुंदर के ही अंदर थी, यानी सतह पर केवल पानी ही पानी था, उसके बाद धरती के कुछ हिस्से सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकले,लेकिन सवाल ये है कि वो कौन सा इलाका था जो सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकला था? दरअसल अब तक […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/the-first-land-on-earth-which-came-out-of-the-sea-that-place-is-in-this-state-of-india/article-72900"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-07/ajab-gajab-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Ajab Gajab News:  एक दौर था जब पूरी पृथ्वी केवल समुंदर के ही अंदर थी, यानी सतह पर केवल पानी ही पानी था, उसके बाद धरती के कुछ हिस्से सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकले,लेकिन सवाल ये है कि वो कौन सा इलाका था जो सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकला था? दरअसल अब तक हम सब यहीं मानते आ रहे हैं कि सबसे पहले अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया समुद्र से बाहर आए, लेकिन अब एक नई रिसर्च में सामने आया है कि झारखंड में सिंहभूम जिला समुद्र से बाहर आने वाला दुनिया का पहला जमीनी हिस्सा है, 13 देशों के 8 रिसर्चर्स 7 साल की रिसर्च के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रिसर्च खोज की कहानी.. Ajab Gajab News</h3>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम में रिसर्च टीम की अगुआई करने वाल आॅस्ट्रेलिया के पीटर केवुड ने कहा, कि हमारा सौरमंडल, पृथ्वी या दूसरे ग्रह कैसे बने? इन सवालों की खोज में वे और उनकी टीम के 1 साथी, जिनमें 4 भारत से थे, इन सबने 7 साल तक झारखंड के कोल्हान और ओडिशा के क्योंझर समेत कई दूसरे जिलों के पहाड़-पर्वतों को छान मारा। उन्होंने कहा कि पृथ्वी से जमीन कब बाहर निकली, इस सवाल का जवाब खोजने के लिए जुनून जरूरी था, ये जगह नक्सल प्रभावित हैं, लेकिन हमने तय किया था कि करना है, सो करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं अपने 6-7 साल के फील्ड वर्क में लगभग 300-400 किलो पत्थरों का लेबोरेट्री में टेस्ट किया हैं, इनमें कुछ बलुआ पत्थर थे और कुछ पत्थर ग्रेनाइट थे, उन्होंने जो बलुआ पत्थर देखें, उनकी खासियत यह थी कि उनका निर्माण नदी या समुद्र के किनारे हुआ था, उनका कहना हैं कि नदी या समुद्र का किनार तभी हो सकता हैं, जब आसपास भूखंड हों।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सिंहभूम 320 करोड़ साल पहले बना था</h3>
<p style="text-align:justify;">वहीं पीटर ने कहा, कि जब उन्होंने बलुआ पत्थरों की उम्र निर्धारित करने की कोशिश की, तो तब उन्हें पता चला कि सिंहभूम आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले बना था, इसका मतलब यह हुआ कि आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले यह हिस्सा एक भूखंड के रूप में समुद्र की सतह से ऊपर था।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं अब तक माना जाता रहा है कि अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया के क्षेत्र सबसे पहले समुद्र से बाहर निकले, लेकिन हमने पाया कि सिंहभूमि क्षेत्र उनसे भी 20 करोड़ साल पहले बाहर आया, उन्होंने दावा किया कि सिंहभूम क्रेटान समुद्र से निकला पहला द्वीप है, यह हमारी पूरी टीम के लिए बड़ा ही रोमांचक पल था।</p>
<h4 style="text-align:justify;">सिंहभूम महाद्वीप के नाम से जाना जाता है ये इलाका</h4>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने जब सिंहभूम के ग्रेनाइट पत्थर की जांच की तो यह पता चला, कि सिंहभूम महाद्वीप आज से तकरीबन 350 से 320 करोड़ साल पहले लगातार ज्वालामुखी गतिविधियों से बना था, इसका मतलब यह हुआ कि 320 करोड़ साल पहले सिंहभूम महाद्वीप समुद्र की सतह से ऊपर आया, लेकिन उसके बनने की प्रक्रिया उससे भी पहले शुरू हो गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि यह क्षेत्र उत्तर में जमशेदपुर से लेकर दक्षिण में महागिरी तक, पूर्व में ओडिशा के सिमलीपाल से पश्चिम में वीर टोला तक फैला हुआ है, इस क्षेत्र को हम सिंहभूम क्रेटान या महाद्वीप कहते हैं, पीटर ने बताया, कि शोध के लिए उन्होंने पिछले 6-7 साल में कई बार सिंहभूम महाद्वीप के कई हिस्सों में फील्ड वर्क किया जैसे कि समलीपाल, जोड़ा, जमशेदपुर, क्योंझर इत्यादि… अध्ययन के दौरान हमारा केंद्र जमशेदपुर और ओडिशा का जोड़ा शहर था, यहीं से कभी बाइक से कभी बस-कार से फील्ड वर्क पर निकलते थे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आगे की रिसर्च के लिए खुली राह | Ajab Gajab News</h3>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम दुनिया का पहला द्वीप हैं, जो समुद्र से बाहर निकला, यानी यहां के आयरन ओर की पहाड़ियों समेत दूसरी पहाड़ियां 320 करोड़ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं, इस रिसर्च के मॉड्यूल से पहाड़ी से इलाकों अथवा पठारी क्षेत्र में आयरन, गोल्ड माइंस खोजने में सहूलियत होगी। इसके अलावा बस्तर, धारवाड़ इलाकों में भूमिगत घटनाओं की उत्पति की जानकारी मिलेगी, भू-गर्भीय अध्ययन के लिए भी यह रिसर्च बहुत उपयोगी साबित होगी।</p>
<h4 style="text-align:justify;">कोलकाता-बारीपदा से कूरियर के जरिए आॅस्ट्रेलिया भेजे जाते थे पत्थर</h4>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि उनकी टीम अलग-अलग समय पर शोध के लिए भारत पहुंची, इस दौरान तीन से 4 क्विंटल पत्थर रिसर्च के लिए इकट्ठे किए, उन्हें बारीपदा और कोलकाता के रास्ते आॅस्ट्रेलिया के लिए कूरियर से भेजा। उन्होंने बताया कि वे सब होटल या किसी ढाबे में खाना खाते थे, और रिसर्च के लिए जंगल-पहाड़ों को निकलते थे। उन्होंने बताया कि उनका फिल्ड वर्क 2017 और 2018 में ज्यादा रहा। उन्होंने खासतौर पर बताया कि नक्सल प्रभावित एरिया होने के बावजूद भी उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई।</p>
<h4 style="text-align:justify;">सैंपल कलेक्शन करने में स्थानीय लोगों ने की मदद</h4>
<p style="text-align:justify;">वे पत्थरों को उनके प्राकृतिक रूप में समझने की कोशिश करते थे, जैसे उनका स्वरूप कैसा है, उनका रंग क्या है, वे कितनी आसानी से टूट सकते हैं, कितनी दूर तक फैले हुए हैं, हम अलग-अलग समय में आते थे, कभी बरसात, तो कभी गर्मी के दिनों में फील्ड वर्क में सबसे कठिन काम यह ढूंढना होता था कि पत्थर कहां पर मौजूद हैं।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/the-first-land-on-earth-which-came-out-of-the-sea-that-place-is-in-this-state-of-india/article-72900</link>
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                <pubDate>Wed, 02 Jul 2025 15:34:11 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>OMG News: वैज्ञानिकों को 71000 वर्ष पहले की महिला का कंकाल मिला, जांच हुई तो ये हुए बड़े खुलासे&amp;#8230;</title>
                                    <description><![CDATA[OMG News अनु सैनी| पुरातत्वविदों ने हाल ही में एक ऐसी महिला के कंकाल के अवशेष खोजे हैं, जो करीब 71000 साल पहले जीवित थी। यह खोज चीन के एक प्राचीन पुरातात्विक स्थल शिंगयी में हुई। इस महिला को वैज्ञानिकों ने “Shingyi_EN” नाम दिया है। उसके डीएनए ने वैज्ञानिकों के सामने एक नए और रहस्यमयी […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/discovery-of-a-7100-year-old-woman-deep-into-the-mysterious-roots-of-the-tibetan-dynasty/article-72142"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-06/omg-news.jpg" alt=""></a><br /><p class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;"><strong>OMG News अनु सैनी|</strong> पुरातत्वविदों ने हाल ही में एक ऐसी महिला के कंकाल के अवशेष खोजे हैं, जो करीब 71000 साल पहले जीवित थी। यह खोज चीन के एक प्राचीन पुरातात्विक स्थल शिंगयी में हुई। इस महिला को वैज्ञानिकों ने “Shingyi_EN” नाम दिया है। उसके डीएनए ने वैज्ञानिकों के सामने एक नए और रहस्यमयी मानव वंश के दरवाज़े खोल दिए हैं, जो अब तक पूरी तरह अज्ञात था।</p>
<p class="ai-optimize-8"><a href="http://10.0.0.122:1245/air-india-plane-crash-when-the-sky-became-a-flight-of-regret/">Air India Plane Crash: Air India के विमान हादसे, जब आसमान बना अफसोस की उड़ान</a></p>
<h3 class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">कहां मिला यह अनमोल कंकाल? OMG News</h3>
<p class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">यह अवशेष नवपाषाण काल से संबंधित हैं और शिंगयी पुरातात्विक स्थल (चीन) से प्राप्त हुए हैं। अध्ययन के अनुसार, यह महिला एक शिकारी और संग्रहकर्ता जीवनशैली जीती थी। जब वैज्ञानिकों ने उसके डीएनए और आहार पर आइसोटोप विश्लेषण किया, तो पता चला कि उसका वंश वर्तमान तिब्बतियों में पाए जाने वाले ‘घोस्ट वंश’ से मिलता है।</p>
<h4 class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">क्या होता है ‘घोस्ट वंश’?</h4>
<p class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">‘घोस्ट वंश’ से आशय ऐसे मानव समूहों से है जिनके कंकाल तो नहीं मिले, लेकिन उनके जीन के संकेत आज भी कुछ मानव समुदायों में मौजूद हैं। इनके अस्तित्व के प्रमाण केवल डीएनए विश्लेषण से मिलते हैं। शिंगयी_ईएन का वंश निएंडरथल या डेनिसोवन जैसे पुराने मानव समूहों से भी नहीं जुड़ता, बल्कि यह एक बिल्कुल अलग और नया वंश है, जिसे अब वैज्ञानिकों ने नाम दिया है – बेसल एशियन शिंगयी वंश।</p>
<h3 class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">तिब्बती वंश की जड़ें हो सकती हैं इससे जुड़ी</h3>
<p class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">तिब्बती पठार पर रहने वाले लोगों की उत्पत्ति को लेकर अब तक कई सवाल उठते रहे हैं। पूर्व के अध्ययनों में यह बात सामने आई थी कि तिब्बतियों में एक ऐसा वंश मौजूद है जिसका कोई ठोस कंकाल प्रमाण नहीं मिला — और यही ‘घोस्ट वंश’ अब शिंगयी_ईएन की मदद से वैज्ञानिकों की समझ में आने लगा है।</p>
<h3 class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">क्यों है यह खोज बेहद अहम? OMG News</h3>
<ul>
<li class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">यह वंश हजारों साल तक अन्य मानव समूहों से पूरी तरह अलग रहा।</li>
<li class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">इसमें किसी भी अन्य प्रजाति के साथ कोई आनुवंशिक मिश्रण नहीं पाया गया।</li>
<li class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">यह खोज यह संकेत देती है कि पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया की प्राचीन आबादी को समझने की कुंजी शायद इन्हीं रहस्यमयी लोगों के पास है।</li>
<li class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">अध्ययन से यह भी पता चला कि शिंगयी_ईएन के जैसे और लोग भी हो सकते हैं, लेकिन अभी उनके अवशेष वैज्ञानिकों के हाथ नहीं लगे हैं।</li>
</ul>
<h3 class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">आगे की रिसर्च की आवश्यकता</h3>
<p class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">हालांकि यह अध्ययन सिर्फ एक व्यक्ति के डीएनए पर आधारित है, लेकिन इससे भविष्य में मानव विकास और वंशावली के कई अनसुलझे रहस्यों को जानने की उम्मीद जगी है। वैज्ञानिक मानते हैं कि इस दिशा में और अधिक खोज और विश्लेषण की जरूरत है ताकि हम तिब्बती जनजातियों और उनके रहस्यमयी पूर्वजों को और गहराई से समझ सकें।<br />
निष्कर्ष:-<br />
शिंगयी_ईएन की यह ऐतिहासिक खोज हमें मानव विकास की एक नई दिशा में ले जा रही है। यह केवल एक कंकाल नहीं, बल्कि पुरातत्व और आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक क्रांतिकारी खोज है, जिसने हमें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि इंसानी इतिहास जितना दिखता है, शायद उससे कहीं अधिक गहरा और रहस्यमयी है।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/national/discovery-of-a-7100-year-old-woman-deep-into-the-mysterious-roots-of-the-tibetan-dynasty/article-72142</link>
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                <pubDate>Sat, 14 Jun 2025 16:57:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>OMG News: धरती की वो पहली खास जगह, जो समुंदर से बाहर निकली, क्या आप जानते हैं भारत के किस राज्य में स्थित है वो जगह?</title>
                                    <description><![CDATA[OMG News: (सच कहूं/अनु सैनी)। एक दौर था जब पूरी पृथ्वी केवल समुंदर के ही अंदर थी, यानी सतह पर केवल पानी ही पानी था, उसके बाद धरती के कुछ हिस्से सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकले,लेकिन सवाल ये है कि वो कौन सा इलाका था जो सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकला था? दरअसल […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/the-first-special-place-on-earth-that-came-out-of-the-sea/article-61751"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-09/omg-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>OMG News: (सच कहूं/अनु सैनी)। </strong>एक दौर था जब पूरी पृथ्वी केवल समुंदर के ही अंदर थी, यानी सतह पर केवल पानी ही पानी था, उसके बाद धरती के कुछ हिस्से सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकले,लेकिन सवाल ये है कि वो कौन सा इलाका था जो सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकला था? दरअसल अब तक हम सब यहीं मानते आ रहे हैं कि सबसे पहले अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया समुद्र से बाहर आए, लेकिन अब एक नई रिसर्च में सामने आया है कि झारखंड में सिंहभूम जिला समुद्र से बाहर आने वाला दुनिया का पहला जमीनी हिस्सा है, 13 देशों के 8 रिसर्चर्स 7 साल की रिसर्च के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/use-rice-water-to-keep-your-skin-glowing/">Skin Care: स्किन को ग्लोइंग रखने के लिए करें चावल के पानी का इस्तेमाल, एक्सपर्ट से जानें इसे बनाने और यूज करने का तरीका…</a></p>
<h3 style="text-align:justify;">रिसर्च खोज की कहानी.. OMG News</h3>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम में रिसर्च टीम की अगुआई करने वाल आॅस्ट्रेलिया के पीटर केवुड ने कहा, कि हमारा सौरमंडल, पृथ्वी या दूसरे ग्रह कैसे बने? इन सवालों की खोज में वे और उनकी टीम के 1 साथी, जिनमें 4 भारत से थे, इन सबने 7 साल तक झारखंड के कोल्हान और ओडिशा के क्योंझर समेत कई दूसरे जिलों के पहाड़-पर्वतों को छान मारा। उन्होंने कहा कि पृथ्वी से जमीन कब बाहर निकली, इस सवाल का जवाब खोजने के लिए जुनून जरूरी था, ये जगह नक्सल प्रभावित हैं, लेकिन हमने तय किया था कि करना है, सो करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं अपने 6-7 साल के फील्ड वर्क में लगभग 300-400 किलो पत्थरों का लेबोरेट्री में टेस्ट किया हैं, इनमें कुछ बलुआ पत्थर थे और कुछ पत्थर ग्रेनाइट थे, उन्होंने जो बलुआ पत्थर देखें, उनकी खासियत यह थी कि उनका निर्माण नदी या समुद्र के किनारे हुआ था, उनका कहना हैं कि नदी या समुद्र का किनार तभी हो सकता हैं, जब आसपास भूखंड हों।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सिंहभूम 320 करोड़ साल पहले बना था | OMG News</h3>
<p style="text-align:justify;">वहीं पीटर ने कहा, कि जब उन्होंने बलुआ पत्थरों की उम्र निर्धारित करने की कोशिश की, तो तब उन्हें पता चला कि सिंहभूम आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले बना था, इसका मतलब यह हुआ कि आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले यह हिस्सा एक भूखंड के रूप में समुद्र की सतह से ऊपर था।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं अब तक माना जाता रहा है कि अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया के क्षेत्र सबसे पहले समुद्र से बाहर निकले, लेकिन हमने पाया कि सिंहभूमि क्षेत्र उनसे भी 20 करोड़ साल पहले बाहर आया, उन्होंने दावा किया कि सिंहभूम क्रेटान समुद्र से निकला पहला द्वीप है, यह हमारी पूरी टीम के लिए बड़ा ही रोमांचक पल था।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सिंहभूम महाद्वीप के नाम से जाना जाता है ये इलाका</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने जब सिंहभूम के ग्रेनाइट पत्थर की जांच की तो यह पता चला, कि सिंहभूम महाद्वीप आज से तकरीबन 350 से 320 करोड़ साल पहले लगातार ज्वालामुखी गतिविधियों से बना था, इसका मतलब यह हुआ कि 320 करोड़ साल पहले सिंहभूम महाद्वीप समुद्र की सतह से ऊपर आया, लेकिन उसके बनने की प्रक्रिया उससे भी पहले शुरू हो गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि यह क्षेत्र उत्तर में जमशेदपुर से लेकर दक्षिण में महागिरी तक, पूर्व में ओडिशा के सिमलीपाल से पश्चिम में वीर टोला तक फैला हुआ है, इस क्षेत्र को हम सिंहभूम क्रेटान या महाद्वीप कहते हैं, पीटर ने बताया, कि शोध के लिए उन्होंने पिछले 6-7 साल में कई बार सिंहभूम महाद्वीप के कई हिस्सों में फील्ड वर्क किया जैसे कि समलीपाल, जोड़ा, जमशेदपुर, क्योंझर इत्यादि… अध्ययन के दौरान हमारा केंद्र जमशेदपुर और ओडिशा का जोड़ा शहर था, यहीं से कभी बाइक से कभी बस-कार से फील्ड वर्क पर निकलते थे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आगे की रिसर्च के लिए खुली राह | OMG News</h3>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम दुनिया का पहला द्वीप हैं, जो समुद्र से बाहर निकला, यानी यहां के आयरन ओर की पहाड़ियों समेत दूसरी पहाड़ियां 320 करोड़ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं, इस रिसर्च के मॉड्यूल से पहाड़ी से इलाकों अथवा पठारी क्षेत्र में आयरन, गोल्ड माइंस खोजने में सहूलियत होगी। इसके अलावा बस्तर, धारवाड़ इलाकों में भूमिगत घटनाओं की उत्पति की जानकारी मिलेगी, भू-गर्भीय अध्ययन के लिए भी यह रिसर्च बहुत उपयोगी साबित होगी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कोलकाता-बारीपदा से कूरियर के जरिए आॅस्ट्रेलिया भेजे जाते थे पत्थर</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि उनकी टीम अलग-अलग समय पर शोध के लिए भारत पहुंची, इस दौरान तीन से 4 क्विंटल पत्थर रिसर्च के लिए इकट्ठे किए, उन्हें बारीपदा और कोलकाता के रास्ते आॅस्ट्रेलिया के लिए कूरियर से भेजा। उन्होंने बताया कि वे सब होटल या किसी ढाबे में खाना खाते थे, और रिसर्च के लिए जंगल-पहाड़ों को निकलते थे। उन्होंने बताया कि उनका फिल्ड वर्क 2017 और 2018 में ज्यादा रहा। उन्होंने खासतौर पर बताया कि नक्सल प्रभावित एरिया होने के बावजूद भी उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सैंपल कलेक्शन करने में स्थानीय लोगों ने की मदद</h3>
<p style="text-align:justify;">वे पत्थरों को उनके प्राकृतिक रूप में समझने की कोशिश करते थे, जैसे उनका स्वरूप कैसा है, उनका रंग क्या है, वे कितनी आसानी से टूट सकते हैं, कितनी दूर तक फैले हुए हैं, हम अलग-अलग समय में आते थे, कभी बरसात, तो कभी गर्मी के दिनों में फील्ड वर्क में सबसे कठिन काम यह ढूंढना होता था कि पत्थर कहां पर मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास मैप होते थे, लेकिन ज्यादातर समय छोटी चट्टानें या फिर सड़कों के किनारे या नदी नालों के किनारे स्थित पत्थरों तक पहुंचने के लिए हमें स्थानीय लोगों की मदद लेनी पड़ी। सिंहभूम में फील्ड वर्क करने के दौरान ऐसी परिस्थितियां आई, जब स्थानीय लोगों ने हमें पत्थर ढूंढने में बहुत मदद की थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">5-5 किलो के थैलों में कलेक्ट करते थे सैंपल</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि पत्थरों को प्राकृतिक रूप में जांचने के बाद वे उनका सैंपल कलेक्ट करते और लैबोरेट्रीज में ले जाते थे। वे 5-5 किलो के थैलों में सैंपल कलेक्ट करते थे, सैंपल कलेक्ट करने के लिए वे पत्थरों को हथौडेÞ से मारकर उनके टुकड़े करते थे, उनका कहना है कि ये काम भी बहुत कठीन था।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि उन्हें कभी-कभी ऐसे पत्थर मिलते थे, जिन्हें तोड़ने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी इन सैंपल को हम लैबोरेट्री में ले जाते थे, वहां यह खोज की जाती थी, कि वे किन-किन रासायनिक तत्वों से बने थे जैसे, लोहा, मैग्नीशियम, आॅक्सीजन वगैरह, आखिरकार हमारे संघर्ष का मुकाम सुखद रहा। इस तरह हमने पाया कि समुद्र से निकलने वाला द्वीप हमारा सिंहभूम ही था।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रिसर्च टीम में ये वैज्ञानिक रहे शामिल</h3>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम पर 7 साल तक रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों की टीम में आॅस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिविर्सिटी के पीटर केवुड़, जैकब मल्डर, शुभोजीत राय, प्रियदर्शी चौधरी और आॅलिवर नेबेल, आॅस्ट्रेलिया की ही यूनिवर्सिटी आॅफ मेलबर्न की ऐल्श्री वेनराइट, अमेरिका के कैलिफोर्निया इंस्टूट्यूट आॅफ टेकनोलॉजी के सूर्यजेंदु भट्टाचार्यों के साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी के शुभम मुखर्जी शामिल हैं।</p>
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                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Sep 2024 11:28:51 +0530</pubDate>
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