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                <title>अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला</title>
                                    <description><![CDATA[रिलायंस ग्रुप ने पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ सहित कांग्रेस के कई वक्ताआें को लीगल नोटिस भेज कर लोकतंत्र को हलके में लिया है। जाखड़ ने नोटिस का जहाज बनाकर व उसे हवा में उड़ाकर रिलांयस को जवाब भी अपने तरीके से दे दिया है। शायद इस तरीके के साथ जाखड़ का जवाब किसी वकील […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/attack-on-freedom-of-expression/article-5522"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/artical-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">रिलायंस ग्रुप ने पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष सुनील जाखड़ सहित कांग्रेस के कई वक्ताआें को लीगल नोटिस भेज कर लोकतंत्र को हलके में लिया है। जाखड़ ने नोटिस का जहाज बनाकर व उसे हवा में उड़ाकर रिलांयस को जवाब भी अपने तरीके से दे दिया है। शायद इस तरीके के साथ जाखड़ का जवाब किसी वकील द्वारा दिए गए जवाब से कहीं अधिक मजबूत व चर्चित बन गया है। वैसे भी रिलायंस में ऐसी कोई उम्मीद नहीं थी कि वह संसद में चल रही कार्रवाई के खिलाफ किसी नेता को नोटिस भेजेंगे। अगर अनिल अंबानी अपना पक्ष ही रख देते तो यह काफी होना था। दरअसल यह रूझान अनिल अंबानी का गैर-जरूरी उत्साह व अपने आप को राजनीतिक पार्टियों को टक्कर देने के अहसास की उपज है।</p>
<p style="text-align:justify;">नि:संदेह रिलायंस गु्रप देश का बड़ा कारोबारी घराना है, जो देश की आर्थिकता का अटूट अंग भी बन गया है। रिलांयस को अपने उत्पादों व तकनीक का प्रचार-प्रसार करने का भी अधिकार है लेकिन जब कोई जनप्रतिनिधि किसी लोक मसले पर संसद में आवाज उठाता है तो उसकी अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाना लोकतंत्रीय विरोधी कार्रवाई ही मानी जाएगी। अगर देखा जाए तो जाखड़ का विरोध रिलांयस ग्रुप के साथ ही नहीं बल्कि केन्द्र सरकार के साथ है। जाखड़ तो सरकार पर दोष लगा रहे हैं कि सरकार ने उद्योगपति को फायदा पहुंचाने का कार्य किया है। लीगल नोटिस भेजने की कार्रवाई रिलायंस के लिए ही नमोशी वाली बन गई है। कोई भी राजनीतिक पार्टी लीगल नोटिस का समर्थन नहीं करेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">यह घटनाचक्र देश में राजनीतिक व्यवस्था में कार्पोरेट के हावी होने को दर्शाता है। पता नहीं कितने ही नेता संसद के अंदर व बाहर सरकार व निजी कंपनियों की सौदेबाजी के खिलाफ बोल चुके हैं। अगर विधायकों/सांसदों के खिलाफ पैसों के जोर पर बोलने पर पाबंदी लगानी है तो फिर लोकतंत्र की जरूरत ही नहीं रह जाती। कार्पोरेट घरानों ने राजनीति में अपनी मजबूत पकड़ के साथ बेशुमार लाभ कमाया व सरकारी निर्णयों को भी प्रभावित करने की चर्चाएं भी सामने आती रही हैं। रिलायंस ग्रुप की ताजा कार्रवाई के साथ किसी संदेह की गुंजाईश नहीं रह जाती। कार्पोरेट इतना संयम जरूर बरतें कि कम से कम सच-झूठ संबंधी बोलने का अधिकार किसी से न छीना जाए। आम जनता के हितों की अहमियत को समझा जाए या न समझा जाए लेकिन यह बेआवाज नहीं होने चाहिए।</p>
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<p> </p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Aug 2018 08:46:52 +0530</pubDate>
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                <title>चीन में धार्मिक आजादी पर संकट</title>
                                    <description><![CDATA[संयुक्त राष्ट्र की नस्ली भेदभाव उन्मूलन समिति का यह खुलासा चीन के दोहरे चरित्र को उजागर करने वाला है कि उसने 10 लाख से ज्यादा उइगर मुस्लिमों को कथित तौर पर कट्टरवाद विरोधी गुप्त शिविरों में कैद रखा है और 20 लाख अन्य को विचारधारा बदलने का दबाव बना रहा है। इस रिपोर्ट में कहा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/the-crisis-on-religious-freedom-in-china/article-5521"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/cinaa-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">संयुक्त राष्ट्र की नस्ली भेदभाव उन्मूलन समिति का यह खुलासा चीन के दोहरे चरित्र को उजागर करने वाला है कि उसने 10 लाख से ज्यादा उइगर मुस्लिमों को कथित तौर पर कट्टरवाद विरोधी गुप्त शिविरों में कैद रखा है और 20 लाख अन्य को विचारधारा बदलने का दबाव बना रहा है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सामाजिक स्थिरता और धार्मिक कट्टरता से निपटने के नाम पर चीन ने इगर स्वायत क्षेत्र को कुछ ऐसा बना दिया है जो गोपनीयता के आवरण में ढंका बहुत बड़ा नजरबंदी शिविर जैसा है। रिपोर्ट से खुलासा हुआ है कि इन शिविरों में जबरन राष्ट्रपति शी चिनफिंग की वफादारी की कसम दिलवाई जाती है और कम्युनिस्ट पार्टी के नारे लगवाए जाते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गौर करें तो इस तरह का खुलासा कोई पहली बार नहीं हुआ है। अभी चंद दिन पहले ही अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पॉपियो द्वारा धार्मिक आजादी के मुद्दे पर चीन की यह कहकर आलोचना की गयी थी कि वहां धार्मिक स्वतंत्रता संकट में है और रह रहे विभिन्न धर्मावलंबियों के धार्मिक क्रियाकलापों पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। अमेरिकी विदेश मंत्री ने यह भी कहा कि चीन द्वारा उइगर मुसलमानों और तिब्बती बौद्धों की धार्मिक स्वतंत्रता का दमन किया जा रहा है जो कि मौलिक मानवाधिकारों का उलंघन है। इस कड़ी टिप्पणी से चीन को शर्मसार होना पड़ रहा है कि वह अपनी सुरक्षा व संप्रभुता के नाम पर अपनी भूमि पर रहने वाले गैर धर्मावलंबियों के साथ सख्ती से पेश आ रहा है। नि:संदेह चीन को अधिकार है कि वह दुनिया भर में इस्लामिक आतंक के कहर से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए ठोस कदम उठाए। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह लोगों की धार्मिक आजादी पर पाबंदी थोप उन्हें कैदी बना ले। अब चीन चाहे जो भी सफाई दे लेकिन यह सत्य है कि वह अपने मुस्लिम बाहुल्य प्रांतों में ऐसा ही अत्याचार कर रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">
चीन की सरकार ने इन प्रांतों में धार्मिक शिक्षा पर रोक लगा दी है। जिन मस्जिदों में कभी हजारों बच्चे कुरान पढ़ने के लिए आते थे, अब वहां उनका प्रवेश पूरी तरह प्रतिबंधित है। बच्चों के परिजनों को भी हिदायत दी गयी है कि वे बच्चों को मस्जिदों में कुरान पढ़ने के लिए न भेजें क्योंकि इससे वे धर्मनिरपेक्ष पाठ्यक्रमों पर ध्यान नहीं दे पाते हैं। यहां के स्थानीय प्रशासन ने उन छात्रों की तादाद घटा दी है जिन्हें 16 साल से अधिक उम्र के चलते मस्जिदों में पढ़ने की अनुमति मिली हुई है। मस्जिदों में नियुक्त किए जाने वाले नए इमामों के लिए प्रमाणपत्र हासिल करने की प्रक्रिया को भी सीमित कर दिया गया है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार शिनजियांग प्रांत में और भी अधिक कठोरता से पेश आ रही है। यहां के रहने वाले उइगर समुदाय के लोगों को शिक्षा शिविरों में डाल दिया गया है जहां उन्हें कुरान पढ़ने या दाढ़ी रखने की सख्त मनाही है।</p>
<p style="text-align:justify;">याद होगा इस वर्ष के जनवरी माह में ही चीन की सरकार ने यहां के मुस्लिम समुदाय के लोगों को चेतावनी दी कि वे नाबालिगों को कुरान पढ़ने के लिए या धार्मिक गतिविधयों में भाग लेने के लिए मस्जिदों में न जाने दें और न ही इसका समर्थन करें। अगर वे ऐसा करते हैं तो उन्हें दंड भुगतना होगा। सरकार के इस रवैए से यहां रह रहे मुसलमानों के मन में इन प्रतिबंधों से यह धारणा पनपने लगी है कि सरकार उनकी रीति-रिवाज और परंपाओं को खत्म करने पर आमादा है। उन्हें लग रहा है कि सरकार 1966 का माहौल निर्मित करना चाहती है, जिस दौरान मस्जिदों को ढहा दिया गयाया फिर जानवरों को रखने की जगह के रुप तब्दील कर दिया गया था। उइगर मुसलमानों की यह चिंता अनायास नहीं है। गौर करें तो चीन की सरकार ने यहां के मस्जिदों पर राष्ट्रीय झंडा लगाना अनिवार्य कर दिया है और ध्वनि प्रदुषण की आड़ में इन मस्जिदों के इमामों को चेताया है कि वह नमाज के लिए माइक के जरिए लोगों को बुलावा न भेंजे। दरअसल विगत वर्षों में चीन में कई आतंकी घटनाएं हुई हैं जिनमें कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों का हाथ रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन की सरकार इस नतीजे पर है कि भले ही उसने तत्कालीन आक्रोश को दबा दिया लेकिन उसकी आग अभी बुझी नहीं है। चूंकि इस्लामिक आतंकी संगठन पहले ही शिनजियांग प्रांत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने का आह्नान कर चुके हैं ऐसे में चीन एक रणनीति के तरत उइगर मुसलमानों के खिलाफ काम कर रहा है। शिंजियांग प्रांत की बात करें तो यह प्रांत प्रारंभ से ही संवेदनशील रहा है। यहां 40 से 50 फीसदी आबादी उइगर मुसलमानों की है जिसे काबू में करने के लिए वहएक रणनीति के तहत यहां हान वंशीय चीनियों को बड़ी संख्या में बसाना शुरू कर दिया है। नतीजा उइगर मुसलमानों की संख्या सिकुड़ने लगी है। वह चीनी हान वंशियों की आबादी के आगे अल्पसंख्यक बन कर रह गए हैं। ऐसे में उइगर मुसलमानों को अपनी संस्कृति को लेकर चिंता सताना लाजिमी है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>अभिजीत मोहन</strong></p>
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<p> </p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Aug 2018 08:43:00 +0530</pubDate>
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                <title>आजादी अभी अधूरी</title>
                                    <description><![CDATA[देश आज 72वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। लगभग पौनी सदी गुजरने तक देश हथियारों, खाद्य व जन्म दर घटाने के पक्ष से तरक्की कर गया है किंतु जिस राजनीति व सरकारी पक्षपात के खिलाफ स्वतंत्रता सेनानियों ने कुर्बानियां दी थी वह पक्षपात आज भी देश के माथे पर कलंक बना हुआ है। स्वतंत्रता संग्रामियों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/freedom-is-just-incomplete/article-5396"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/freedom.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश आज 72वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। लगभग पौनी सदी गुजरने तक देश हथियारों, खाद्य व जन्म दर घटाने के पक्ष से तरक्की कर गया है किंतु जिस राजनीति व सरकारी पक्षपात के खिलाफ स्वतंत्रता सेनानियों ने कुर्बानियां दी थी वह पक्षपात आज भी देश के माथे पर कलंक बना हुआ है। स्वतंत्रता संग्रामियों की याद में स्मारक जरूर बन गए हैं, जिन पर अरबों रुपए खर्च किए गए हैं, लेकिन केवल इमारतों का निर्माण ही स्वतंत्रता सैनानियों को सच्चा सलाम नहीं।</p>
<p style="text-align:justify;">हालात तो तब अजीबो -गरीब नजर आते हैं, जब देश भक्तों की यादगारों के नींव पत्थर रखने या उद्घाटन करने वाले राजनेता खुद भ्रष्टाचार के आरोप का सामना कर रहे होते हैं। सत्ता हाथ में आने के बाद सरकारी पैसे को राजनेता पानी की तरह बहाते हैं। लेकिन जनता मूलभूत सुविधाओं को तरसती रह जाती है। आज भी अमीरों, राजनीतिज्ञों व गरीबों के लिए दो अलग-अलग भारत हैं। एक वह भारत है जहां आम किसान बारिश से बर्बाद हुई फसल का मुआवजा लेने के लिए सरकारी दफ्तरों में चक्कर काटता थक जाता है और उसे एक एकड़ फसल का मुआवजा 100 रुपए मिलता है। दूसरी तरफ एक असर रसूख वाला नेता है जिसे पटवारी 20 एकड़ फसल के नुकसान का मुआवजा डेढ़ लाख रुपए उसके घर खुद देकर आता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज भी अत्याचार के शिकार हुए लोगों की सुनवाई होनादूर उल्टा मुकदमा ही उनके खिलाफ दर्ज हो जाता है। भ्रष्टाचार देश को खोखला कर रहा है जिसे रोकने के लिए राजनीतिक बयान ज्यादा दागे जा रहे हैं। राष्ट्रीय पार्टियों के लिए भ्रष्टाचार सत्ता पाने के लिए एक सहारा बन गया है। एनडीए ने कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाकर सत्ता तो प्राप्त कर ली किंतु वही आरोपों का सामना भाजपा भी कर रही है। भ्रष्टाचार विरुद्ध लड़ाई बयानबाजी से आगे बढ़ रही है। सरकारें बदलतीं है, घोटाले भी चल रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अनाज का उत्पादन बढ़ा है लेकिन कुपोषण भी जारी है। गरीबी मिटाने की स्कीमें आज भी वोट बैंक की नीति को लेकर जारी हैं। यदि विकास है तब गरीबी कहां से आ रही है। आर्थिक सिद्धांतों पर राजनीति में विरोधाभाष है। निसंदेह देश ने तरक्की की है लेकिन राजनेताओं व उनके साथ जुड़े उद्योगपतियों ने देश की तरक्की से लाख गुणा ज्यादा तरक्की की है।</p>
<p style="text-align:justify;">आज इंडिया की पहचान अम्बानी व टाटा के कारण है जो दुनिया के अमीर लोगों में गिने जाते हैं। उधर देश राजधानी दुष्कर्मों व भूख से मर बच्चियों की खबरों से पटी पड़ी है। 1947 में मिली आजादी केवल राजनीतिक आजादी नहीं बल्कि आर्थिक, सामाजिक व संस्कृतिक खुशहाली की चाहत भी थी। वास्तविक आजादी के अर्थ को पूरा करने की आवश्यकता है।</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>
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                <pubDate>Thu, 16 Aug 2018 12:00:12 +0530</pubDate>
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                <title>कांग्रेस ने उठाया अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा</title>
                                    <description><![CDATA[हर बात के लिए सरकार जिम्मेदार नहीं: राठोड़ नई दिल्ली (एजेंसी) कांग्रेस ने एक निजी टेलीविजन चैनल के तीन कर्मचारियों को सरकार के खिलाफ ‘सच की खोज’ के लिए सरकार के दबाव में हटाये जाने का आरोप लगाते हुये आज लोकसभा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया। सदन में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/congress-releases-freedom-of-expression/article-5129"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-08/congress-releases-freedom-expression.jpg" alt=""></a><br /><h2 style="text-align:justify;">हर बात के लिए सरकार जिम्मेदार नहीं: राठोड़</h2>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)</strong> कांग्रेस ने एक निजी टेलीविजन चैनल के तीन कर्मचारियों को सरकार के खिलाफ ‘सच की खोज’ के लिए सरकार के दबाव में हटाये जाने का आरोप लगाते हुये आज लोकसभा में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मुद्दा उठाया। सदन में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने शून्यकाल में यह मुद्दा उठाते हुये कहा कि पिछले कुछ समय से मीडिया पर पाबंदी लगायी जा रही है और ऐसी कोई भी खबर देने पर जो सरकार को नापसंद हो, उन पर कार्रवाई की जा रही है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मीडिया पर दबाव बना रही है सरकार</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मन की बात में किये गये दावे की ‘रियलिटी चेक’ करने के लिए छत्तीसगढ़ के एक गाँव में संवाददाता भेजने के बाद एक निजी टेलीविजन चैनल पर इतना दबाव बनाया गया कि उसे अपने एक वरिष्ठ पत्रकार तथा दो एंकरों को निकालना पड़ा। उन्होंने कहा कि ‘रियलिटी चेक’ में दावा गलत साबित हुआ था। खड़गे ने सरकार पर आरोप लगाया कि वह चैनलों और मीडिया को दबाना चाहती है जो अच्छी बात नहीं है। इसके जवाब में सूचना एवं प्रसारण मंत्री राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़ ने कहा कि ये आरोप गलत हैं। चैनल की पहली खबर गलत निकलने के बाद भी सरकार ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। जब विपक्ष के पास कोई मुद्दा नहीं होता है तो वह हर बात के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराती है।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 03 Aug 2018 09:52:28 +0530</pubDate>
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                <title>न्यायपालिका की स्वतंत्रता आवश्यक</title>
                                    <description><![CDATA[भारत के अगले होने वाले मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने हाल ही में न्यायपालिका की समस्याओं का विश्लेषण किया और विशेषकर इसलिए भी कि न्यायपालिका में लोगों का अत्यधिक विश्वास है। ऐसे समय में जब राजनीतिक व्यवस्था से लोगों का विश्वास समाप्त हो रहा है संभवतया न्यायपालिका ही एकमात्र ऐसा अंतिम स्तंभ है जिस पर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/freedom-of-judiciary-required/article-5012"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/judiciary.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत के अगले होने वाले मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने हाल ही में न्यायपालिका की समस्याओं का विश्लेषण किया और विशेषकर इसलिए भी कि न्यायपालिका में लोगों का अत्यधिक विश्वास है। ऐसे समय में जब राजनीतिक व्यवस्था से लोगों का विश्वास समाप्त हो रहा है संभवतया न्यायपालिका ही एकमात्र ऐसा अंतिम स्तंभ है जिस पर लोग निर्भर रह सकते हैं। तीसरा रामनाथ गोयंका स्मारक व्याख्यान देते हुए न्यायमूर्ति गोगोई ने एक ऐसी न्यायपालिका का पक्ष लिया जो अग्रलक्षी हो तथा न्यायधीश न्याय प्रदान करने मे अग्रणी भूमिका निभा रहे हों। उन्होंने इस बात पर खेद व्यक्त किया कि मामलों के त्वरित निपटान के माध्यम से न्याय प्रदान करना संभव नहीं हो सका क्योंकि न्यायधीश ऐसे कामगार बन गए जिनके पास साधन नहीं हैं अर्थात बड़ी संख्या में लंबित मामलों के निपटान के लिए अपेक्षित अवसंरचना नहीं है। वस्तुत: आज ऐसी स्थिति बन गयी है कि यदि न्यायपालिका में विशेषकर निचले स्तर पर समुचित सुविधाएं उपलब्ध नहीं करायी गयी तो लोगों का न्यायपालिका में से विश्वास उठ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उल्लेखनीय है कि न्यायपालिका ने सामाजिक, पर्यावरणीय और राजनीतिक क्षेत्र में ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं जिससे देश की तस्वीर ही बदल गयी है। भ्रष्टाचार से संबंधित निर्णयों का उच्चतम न्यायालय ने स्वागत किया है और दोषी तथा कुछ राजनेताओं और उच्च पदाधिकारियों को दंडित किया गया है। किसी भी देश में न्यायपालिका संविधान की अभिरक्षक और लोगों के मूल अधिकारों की गारंटीदाता होती है। इसे राज्य का न केवल सबसे पवित्र स्तंभ माना जाता है अपितु ऐसी आधारशिला भी माना जाता है जिस पर सभ्यताओं का विकास होता है। विभिन्न सिद्धान्तों में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को स्वीकार किया गया है ताकि सामाजिक समानता, राजनीतिक विकास, शांति और प्रगति सुनिश्चित हो सके।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे देश में न्यायपालिका विभिन्न दौरों से गुजरती है और उनमें से एक दौर आवश्यकता के सिद्धान्त के नाम से जाना जाता है जिसमें न्यायापालिका की भूमिका की उपेक्षा की गयी। किंतु न्यायिक आंदोलन के बाद न्यायपालिका की गरिमा बहाल होने लगी। इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि न्यायपालिका देश की सामाजिक, राजनीतिक व्यवस्था में बदलाव लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है और न्यायधीश इस कार्य में अग्रणी रहते हैं क्योंकि इस संबंध में उन्हें स्वतंत्रता प्राप्त है। न्यायपालिका द्वारा उठाए गए अनेक कदमों से लोगों में विश्वास बहाल हुआ है कि सरकार का यह अंग कार्यपालिका और विधायिका की तुलना में सर्वोत्तम अंग है।</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में न्यायालयों में विशेषकर निचले न्यायालयों में मामलों के लंबित रहने का कारण सरकार की उपेक्षा है और सरकार ने इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया है। इसका कारण संसाधनों की कमी बताया जा सकता है किंतु लोगों को अब संदेह होने लगा है कि इस उपेक्षा का कारण यह भय है कि मामलों के त्वरित निपटान से सरकार के कुकृत्यों का पदार्फाश होगा। हाल के वर्षों में न्यायिक सक्रियता बढ़ी है और इसके बारे में अनेक प्रश्न उठे हैं। किंतु कानूनी विशेषज्ञों के एक वर्ग का मानना है कि ऐसा दृष्टिकोण आवश्यक है और समाज के हित में है। तथापि न्यायालयों को इस बात को ध्यान में रखना होगा कि वे अपनी न्यायिक कृत्यों की सीमा का उल्लंघन न करें और कार्यपालिका और विधायिका के क्षेत्रों में अतिक्रमण न करें।</p>
<p style="text-align:justify;">तथापि संवैधानिक और सांविधिक उपबंधों के उल्लंघन के मामलों में न्यायपालिका द्वारा हस्तक्षेप किया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि कोई ऐसा नीतिगत निर्णय लिया जाता है जिसका किसी कानून के साथ टकराव हो या जो लोक हित में न हो तो न्यायालय को इस पर विचार करना चाहिए। हालांकि यह कार्यपालिका का क्षेत्र है। जब एक से अधिक विकल्प उपलब्ध हों और सरकार उनमें से कोई निर्णय नीतिगत निर्णय लेती हो तो न्यायालयों को ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और ऐसे नीतिगत मामलों में अपील लटकानी नहीं चाहिए। इसका उदाहरण बाल्को बनाम भारत संघ 2002 है। न्यायालयों द्वारा न्याय निर्णयन के लिए जो भी मार्ग अपनाया जाएं वह न्यायिक सिद्धान्तों के अनुरूप हो। आज न्यायपालिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस संस्था पर अधिक ध्यान देने और समाज में स्वतंत्रत भूमिका निभाने की है। निचली अदालतों में अवसंरचना में सुधार के लिए अधिक धनराशि की आवश्यकता है। फास्ट टैÑक न्यायालयों की स्थापना की जानी चाहिए और राज्यों की राजधानी से अलग अन्य शहरों मे उच्च न्यायालयों की पीठ स्थापित की जानी चाहिए। न्यायालयों को त्वरित न्याय देना चाहिए और इसे लोगों की पहुंच में रहना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा माना जाता है कि धनी और प्रभावशाली लोग निचली अदालतों में सौदेबाजी करते हैं और इस आशंका को दूर किया जाना चाहिए। देश सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर आगे बढ़ रहा है इसलिए आम आदमी को यह आश्वासन दिया जाना चाहिए कि न्यायपालिका धन, बल बाहुबल या किसी अन्य शक्ति द्वारा प्रभावित नहीं की जा सकती है और इसके लिए उच्च न्यायपालिका को जिला और उपमंडल न्यायालय पर निगरानी रखनी चाहिए। इसके अलावा न्यायिक अधिकारियों और न्यायधीशों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के कथित आरोपों की गंभीरता से जांच की जानी चाहिए। राजनेताओं और नौकरशाहों में भ्रष्टाचार आम बात है। किंतु न्यायपालिका के बारे में ऐसी धारणा नहीं है। लोगों को विश्वास है कि न्यायपालिका बिना किसी भय या पक्षपात के न्याय प्रदान करेगी। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि न्यायिक सक्रियता बढने का कारण सरकार का अकुशल कार्यकरण और विभिन्न क्षेत्रों में नीतियों और नियमों का लागू न होना है। न्यायपालिका की पहुंच बढ़ायी जानी चाहिए ताकि लोगों को न्याय मिल सके। यदि तथाकथित न्यायिक सक्रियता का समुचित विश्लेषण किया जाए तो यह सामाजिक न्याय की दृष्टि से उचित नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा माना जाता है कि आगामी वर्षों में सामाजिक आर्थिक बदलाव और समाज को सुदृढ़ करने में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी और यह न्याय, समानता और भ्रातृत्व के लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेगी। तथापि सबसे बड़ी चुनौती अभी भी बनी हुई है कि क्या न्यायपालिका अपनी वास्तविक स्वतंत्रता बनाए रखेगी या नहीं। इस संदर्भ में पूर्व मुख्य न्यायधीश आरएम लोढ़ा के ये शब्द उल्लेखनीय हैं मुझे विश्वास है कि देश में सुदृढ कानून का शसन होगा क्योंकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता लोगों के मन में विश्वास पैदा करती है कि देश में न्यायपालिका है और यदि कार्यपालिका या किसी अन्य द्वारा उनके साथ कुछ गलत किया जाता है तो न्यायपालिका उनके बचाव के लिए आगे आएगी।</p>
<p style="text-align:left;">धुर्जति मुखर्जी (इंफा)</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 25 Jul 2018 15:14:40 +0530</pubDate>
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                <title>देश की आजादी के मसीहा थे वीर बिरसा मुंडा: नरेंद्र अरोडा</title>
                                    <description><![CDATA[करनाल (सच कहूँ न्यूज)। प्रतिमा रक्षा सम्मान समिति एवं एंटी करप्शन फाउंडेशन आॅफ इंडिया की ओर से मां भारती के वीर सपूत बिरसा मुंडा के बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। उपस्थित देशभक्तों द्वारा वीर बिरसा मुंडा के चित्र पर पुष्प मालाएं भेंट की गई। अध्यक्षता राष्टÑीय अध्यक्ष नरेंद्र अरोडा ने की। नरेंद्र अरोडा […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/the-leader-of-the-countrys-freedom-was-veer-birsa/article-4109"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/hr-4.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>करनाल (सच कहूँ न्यूज)। </strong>प्रतिमा रक्षा सम्मान समिति एवं एंटी करप्शन फाउंडेशन आॅफ इंडिया की ओर से मां भारती के वीर सपूत बिरसा मुंडा के बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। उपस्थित देशभक्तों द्वारा वीर बिरसा मुंडा के चित्र पर पुष्प मालाएं भेंट की गई। अध्यक्षता राष्टÑीय अध्यक्ष नरेंद्र अरोडा ने की। नरेंद्र अरोडा ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भारतभूमि पर ऐसे कई नायक पैदा हुए जिन्होंने इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों से लिखवाया, एक छोटी सी आवाज को नारा बनने में देर न हीं लगती बस दम उस आवाज को उठाने वाले में होना चाहिए और इसकी जीती जागती मिसाल थे वीर बिरसा मुंडा। बिरसा मुंडा ने बिहार और झारखंड के विकास और भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में अहम रोल निभाया। बिरसा मुंडा ने अंग्रेजो के खिलाफ मुंडा सेना तैयार की ओर कई लड़ाईयां लड़ी। इस अवसर पर चेयरमैन पवन शर्मा, प्रदेश अध्यक्ष हरियाणा तोषित काम्बोज, नितिन वधवा, आराध्या मौजूद रही।</p>
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                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 12 Jun 2018 10:03:00 +0530</pubDate>
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                <title>स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में एक थे गुलाम अब्बास</title>
                                    <description><![CDATA[जाहिद खान फिल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, पत्रकार, उपन्यासकार, पब्लिसिस्ट और देश के सबसे लंबे समय तकरीबन बाबन साल तक चलने वाले स्तंभ ‘द लास्ट पेज’ के स्तंभकार ख्वाजा अहमद अब्बास उन कुछ गिने चुने लेखकों में से एक हैं, जिन्होंने अपने लेखन और फिल्मों दोनों से पूरे देश को मुहब्बत, अमन और इंसानियत का पैगाम […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/one-of-chief-fighters-of-freedom-struggle-ghulam-abbas/article-4007"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/artical.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>जाहिद खान</strong></p>
<p style="text-align:justify;">फिल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, पत्रकार, उपन्यासकार, पब्लिसिस्ट और देश के सबसे लंबे समय तकरीबन बाबन साल तक चलने वाले स्तंभ ‘द लास्ट पेज’ के स्तंभकार ख्वाजा अहमद अब्बास उन कुछ गिने चुने लेखकों में से एक हैं, जिन्होंने अपने लेखन और फिल्मों दोनों से पूरे देश को मुहब्बत, अमन और इंसानियत का पैगाम दिया। अब्बास ने न सिर्फ फिल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी नए मुकाम कायम किए। हरफनमौला शख्सियत के धनी अब्बास साहब को देश में समानांतर या नव-यथार्थवादी सिनेमा के रहनुमाओं में गिना जाता है। ख्वाजा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून, 1914 को हरियाणा के पानीपत शहर में हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके दादा ख्वाजा गुलाम अब्बास 1857 स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में से एक थे और वह पानीपत के पहले क्रांतिकारी थे, जिन्हें तत्कालीन अंग्रेज हुकूमत ने तोप के मुंह से बांधकर शहीद किया था। इस बात का भी शायद ही बहुत कम लोगों को इल्म हो कि अब्बास, मशहूर और मारूफ शायर मौलाना अल्ताफ हुसैन हाली के परनवासे थे। यानी वतन के लिए कुछ करने का जज्बा और जोश उनके खून में ही था। अदब से मुहब्बत की तालीम उन्हें विरासत में मिली थी।</p>
<p style="text-align:justify;">ख्वाजा अहमद अब्बास की शुरूआती तालीम हाली मुस्लिम हाई स्कूल में और आला तालीम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। उनके अंदर एक रचनात्मक बैचेनी नौजवानी से ही थी। वे भी देश के लिए कुछ करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने कलम को अपना हथियार बनाया। छात्र जीवन से ही वे पत्रकारिता से जुड़ गए। उन्होंने ‘अलीगढ़ ओपिनियन’ नाम की देश की पहली छात्र-प्रकाशित पत्रिका शुरू की। जिसमें उन्होंने उस वक्त देश की आजादी के लिए चल रही तहरीक से मुताल्लिक कई विचारोत्तेजक लेख प्रकाशित किए।</p>
<p style="text-align:justify;">ख्वाजा अहमद अब्बास ने उस वक्त लिखना शुरू किया जब देश अंग्रेजों का गुलाम था। पराधीन भारत में लेखन से समाज में अलख जगाना, उस वक्त सचमुच एक चुनौतीपूर्ण कार्य था, पर उन्होंने यह चुनौती स्वीकार की और जिंदगी के आखिर तक अपनी कलम को विराम नहीं लगने दिया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अब्बास जिस सबसे पहले अखबार से जुड़े, वह ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ था। इस अखबार में बतौर संवाददाता और फिल्म समीक्षक उन्होंने साल 1947 तक काम किया। अपने दौर के मशहूर साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ से उनका नाता लंबे समय तक रहा।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अखबार में प्रकाशित उनके कॉलम ‘लास्ट पेज’ ने उन्हें देश भर में काफी शोहरत प्रदान की। अखबार के उर्दू और हिंदी संस्करण में भी यह कॉलम क्रमश: ‘आजाद कलम’ और ‘आखिरी पन्ने’ के नाम से प्रकाशित होता था। अखबार में यह कॉलम उनकी मौत के बाद ही बंद हुआ। ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ और ‘ब्लिट्ज’ के अलावा ख्वाजा अहमद अब्बास ने कई दूसरे अखबारों के लिए भी लिखा। मसलन ‘क्विस्ट’, ‘मिरर’ और ‘द इंडियन लिटरेरी रिव्यूव’। एक पत्रकार के तौर पर उनकी राष्ट्रवादी विचारक की भूमिका और दूरदर्शिता का कोई सानी नहीं है। अपने लेखों के जरिए उन्होंने समाजवादी विचार लगातार लोगों तक पहुंचाए।</p>
<p style="text-align:justify;">ख्वाजा अहमद अब्बास फिल्मों में पार्ट-टाईम पब्लिसिस्ट के रूप में आए थे, लेकिन बाद में वे पूरी तरह से इसमें रम गए। साल 1936 से उनका फिल्मों में आगाज हुआ। सबसे पहले वे हिमांशु राय और देविका रानी की प्रॉडक्शन कम्पनी बॉम्बे टॉकीज से जुड़े। आगे चलकर साल 1941 में उन्होंने अपनी पहली फिल्म पटकथा ‘नया संसार’ भी इसी कंपनी के लिए लिखी। साल 1945 में फिल्म ‘धरती के लाल’ से ख्वाजा अहमद अब्बास का कैरियर एक निर्देशक के रूप में शुरू हुआ। ख्वाजा अहमद अब्बास की यथार्थवाद में गहरी जड़ें थीं। उनके लिए सिर्फ फिल्म ही महत्वपूर्ण थीं, न कि उससे जुड़े आर्थिक लाभ।</p>
<p style="text-align:justify;">अब्बास के लिए सिनेमा समाज के प्रति एक कटिबद्धता थी और इस लोकप्रिय माध्यम से उन्होंने समाज को काफी कुछ देने की कोशिश की। वे सिनेमा को बहुविधा कला मानते थे, जो मनोवैज्ञानिक और सामाजिक वास्तविकता के सहारे लोगों में वास्तविक बदलाव की आकांक्षा को जन्म दे सकती है। अब्बास की ज्यादातर फिल्में सामाजिक व राष्ट्रीय चेतना की महान दस्तावेज है। उनके बिना हिंदी फिल्मों में नेहरू के दौर और रूसी लाल टोपी का तसव्वुर नहीं किया जा सकता।</p>
<p style="text-align:justify;">मशहूर निमार्ता-निर्देशक राज कपूर के लिए ख्वाजा अहमद अब्बास ने जितनी भी फिल्में लिखी, उन सभी में हमें एक मजबूत सामाजिक मुद्दा मिलता है। चाहे यह ‘आवारा’ हो, ‘जागते रहो’ (1956), या फिर ‘श्री 420’। पैंतीस वर्षों के अपने फिल्मी करियर में अब्बास ने तेरह फिल्मों का निर्माण किया। लगभग चालीस फिल्मों की कहानी और पटकथाएँ लिखीं, जिनमें ज्यादातर राजकपूर की फिल्में हैं। एक वक्त ऐसा भी था, जब उनका नाम फिल्मों में कामयाबी की जमानत होता था। उन्हें फिल्मी दुनिया में मुंह मांगी रकम मिलने लगी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">बावजूद इसके उन्होंने अदब और पत्रकारिता से अपना नाता नहीं तोड़ा। कहानी संग्रह ‘नई धरती नए इंसान’ की भूमिका में वे लिखते हैं, ‘‘मैं इन तमाम हिन्दुस्तानियों से प्रेम करता हूं। सबसे सहानुभूति रखता हूं। सबको समझने का प्रयास करता हूं। इसलिए कि वह मेरे हमवतन, मेरे साथी, मेरे समकालीन हैं। मैं अपनी कहानियों में उनके चेहरे एवं चरित्र दशार्ना चाहता हंू। न केवल औरों को बल्कि खुद उनको। मनुष्य को समाज का दर्पण दिखाना भी एक क्रांतिकारी काम हो सकता है, क्योंकि आत्मप्रवंचना नहीं बल्कि आत्मदर्शन स्वयं की वास्तविकता जानना,</p>
<p style="text-align:justify;">अपने व्यक्तित्व को समझना भी सामाजिक और मनोवैज्ञानिक बदलावों को बड़ी गति में ला सकता है।’’<br />
अब्बास बुनियादी तौर पर एक अफसानानिगार थे, वे एक बेहतरीन अदीब थे। उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज में जमकर लिखा। अब्बास की कहानियों की तादाद कोई एक सैंकड़े से ऊपर है। उन्होंने अंग्रेजी, उर्दू और हिंदी तीनों भाषाओं में जमकर लिखा।</p>
<p style="text-align:justify;">अब्बास उर्दू में भी उतनी ही रवानी से लिखते थे, जितना कि अंग्रेजी में। दुनिया की तमाम भाषाओं में उनकी कहानियों के अनुवाद हुए। अब्बास की कहानियों में वे सब चीजें नजर आती हैं, जो एक अच्छी कहानी में बेहद जरूरी हैं। एक शानदार कथानक, किरदारों का हकीकी चरित्र-चित्रण और ऐसी किस्सागोई कि कहानी शुरू करते ही, खत्म होने तक पढ़ने का जी करे। ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी जिंदगी के आखिरी वक्त तक लिखा। उनकी कहानियों का दायरा पांच दशक तक फैला हुआ है। ‘एक लड़की’, ‘जाफरान के फूल’, ‘पांव में फूल’, ‘मैं कौन हूं’, ‘गेंहू और गुलाब’, ‘अंधेरा-उजाला’, ‘कहते हैं जिसको इश्क’, ‘नई धरती नए इंसान’, ‘अजंता की ओर’, 20वीं सदी के लैला मजनू’, ‘आधा इंसान’, ‘सलमा और समुद्र’, और ‘नई साड़ी’ ख्वाजा अहमद अब्बास के प्रमुख कहानी संग्रह हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">उनकी पहली कहानी ‘अबाबील’ साल 1935 में छपी और उसके बाद यह सिलसिला बीसवी सदी के आठवे दशक तक चला। इस बीच मुल्क में उन्होंने कई दौर देखे। अंग्रेजों की गुलामी, बंटवारे की आग, नये हिन्दुस्तान की तामीर, हिन्दुस्तान-पाकिस्तान जंग, हिन्दुस्तान-चीन जंग। इन सभी दौरों को यदि अच्छी तरह से जानना-समझना है, तो उनकी कहानियों को पढ़कर गुजरिये।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ देर उनके ख्यालो के साथ चलिये, कुछ देर ठहरिये। बहुत कुछ समझ में आ जाएगा। जब अब्बास ने अपनी पहली कहानी लिखी, तो उस वक्त उनकी उम्र महज उन्नीस साल थी। उन्नीस साल कोई ज्यादा उम्र नहीं होती लेकिन जो कोई भी इस छोटी सी कहानी को एक बार पढ़ लेगा, वह अब्बास के जेहन और उनके कहन का दीवाना हुए बिना नहीं रहेगा। इस एक अकेली कहानी से अब्बास रातों-रात देश-दुनिया में मशहूर हो गए। बाद में दुनिया की कई जबानों में इस कहानी के अनुवाद हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">अंग्रेजी, रूसी, जर्मन, स्वीडिश, अरबी, चीनी वगैरह-वगैरह। जर्मन जबान में दुनिया की बेहतरीन कहानियों का जब एक संकलन निकला, तो उसमें ‘अबाबील’ को शामिल किया गया। अंग्रेजी में जब इसी तरह का एक संकलन डॉक्टर मुल्कराज आनंद और इकबाल सिंह ने किया, तो वे भी इस कहानी को रखे बिना नहीं रह पाये। राष्ट्रीय स्तर पर ही नही, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह कहानी खूब सराही गई। अदब में इसे आला दर्जे की रचना का खिताब हासिल है।<br />
ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी आखिरी सांस माया नगरी मुंबई में ली। साल 1987 में जून के ही महीने की पहली तारीख को, बहत्तर साल की उम्र में वे इस दुनिया से दूर चले गए। उन्होंने अपने आखिरी दिनों तक अखबारों के लिए लिखा। मौत से पहले लिखे अब्बास के वसीयतनामे को उनकी आखिरी इच्छा के मुताबिक फिल्म कॉलम के तौर पर प्रकाशित किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">वसीयत में उन्होंने जो लिखा, वह भी कम दिलचस्प नहीं है,‘‘मेरा जनाजा यारों के कंधों पर जुहू बीच स्थित गांधी के स्मारक तक ले जाएं, लेजिम बैंड के साथ। अगर कोई खिराज-ए-अकीदत पेश करना चाहे और तकरीर करे तो उनमें सरदार जाफरी जैसा धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हो, पारसी करंजिया हों या कोई रौशनख्याल पादरी हो वगैरह, यानी हर मजहब के प्रतिनिधि हों।’’ ख्वाजा अहमद अब्बास की साम्यवादी विचारधारा में गहरी आस्था थी।</p>
<p style="text-align:justify;">उनके तईं समाजवाद केवल किताबों और अध्ययन तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने तमाम दुख-परेशानियां और खतरे झेलते हुए इसे अपनी जिंदगी में भी ढालने की कोशिश की। वह दूसरों के लिए जीने में यकीन करते थे। समाजवाद उनके जीने का सहारा था और आखिरी समय तक उन्होंने इस विचार से अपनी आस नहीं छोड़ी। इस दुनिया से जुदा हुए अब्बास को 21 साल हो गए, लेकिन मरने के इतने साल बाद, आज भी वे लोगों के जेहन में जिंदा हैं और आगे भी रहेंगे। कोई उन्हें भुला नहीं पाएगा।</p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Jun 2018 12:14:50 +0530</pubDate>
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                <title>शहीदों की शहादत से मिली देश को आजादी</title>
                                    <description><![CDATA[देश में 30 जनवरी के अलावा 23 मार्च भी शहीद दिवस के तौर पर मनाया जाता है। 30 जनवरी को जहां महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पड़ती है, तो वहीं 23 मार्च 1931 को क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को बरतानिया हुकूमत ने सरकार के खिलाफ क्रांति का बिगुल फंूकने के इल्जाम में फांसी की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/independence-of-the-country-attained-by-martyrdom/article-3648"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/sahid.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में 30 जनवरी के अलावा 23 मार्च भी शहीद दिवस के तौर पर मनाया जाता है। 30 जनवरी को जहां महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पड़ती है, तो वहीं 23 मार्च 1931 को क्रांतिकारी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को बरतानिया हुकूमत ने सरकार के खिलाफ क्रांति का बिगुल फंूकने के इल्जाम में फांसी की सजा सुनाई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">इन तीनों जांबाज क्रांतिकारियों की अजीम शहादत को श्रद्धांजलि देने के लिए ही शहीद दिवस मनाया जाता है। अदालती आदेश के मुताबिक सरदार भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव तीनों को 24 मार्च, 1931 को फाँसी लगाई जानी थी, लेकिन एक दिन पहले ही 23 मार्च की शाम इन्हें फाँसी लगा दी गई और अंग्रेजी हुकूमत ने इनकी लाश रिश्तेदारों को न देकर रातों रात ले जाकर सतलुज नदी के किनारे जला दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">आजादी के इन मतवालों का कसूर जानें, तो वह सिर्फ इतना भर था कि वे अपने देश को आजाद देखना चाहते थे। आजादी की इसी जद्दोजहद में जो काम उनके संगठन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन जिसे हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी भी कहते थे ने उन्हें सौंपा, उसे इन तीनों ने पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी से निभाया। अपने फर्ज से उन्होंने कभी गद्दारी नहीं की। अपनी सरजमीं को आजाद कराने के लिए हंसते-हंसते फांसी पर चढ़ गए।</p>
<p style="text-align:justify;">साइमन कमीशन के आगमन पर देश में हर ओर उसका तीखा विरोध हुआ। पंजाब में इस विरोध का नेतृत्व लाला लाजपत राय कर रहे थे। 30 अक्तूबर, 1928 को लाहौर में एक विशाल जुलूस का नेतृत्व करते समय वहाँ के डिप्टी सुप्रीटेन्डेन्ट स्कार्ट के कहने पर उनके मातहत अफसर सांडर्स ने वहशी लाठीचार्ज किया, जिसमें सैंकड़ो लोगों के साथ लाला लाजपत राय भी घायल हो गए। घाव इतने गहरे थे कि राय साहब का देहांत हो गया। पंजाब में अंग्रेजी हुकूमत के इस काले कारनामे से देश भर में तीखी प्रतिक्रिया हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">लाला लाजपत राय की मौत के शोक में जगह-जगह पर श्रद्धांजलि सभाओं का आयोजन किया गया। इस क्रूर घटना से भारतीय क्रांतिकारियों का खून खौल उठा और उन्होंने लाला लाजपत राय की मौत के जिम्मेदार अंग्रेज अफसरों की हत्या करने का मंसूबा बना लिया। हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने इस काम के लिए भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को चुना। बाद में इस योजना में चंद्रशेखर आजाद भी शरीक हुए। आखिर वह दिन 19 दिसंबर 1928 आया, जब इन क्रांतिकारियों ने अपनी योजना को कार्यरूप प्रदान करते हुए लाला लाजपत राय के हत्यारे अंग्रेज अफसर सांडर्स की हत्या कर दी। अपने काम को सही तरह से अंजाम देने के बाद चारों लोग घटनास्थल से बचकर भाग निकले। पुलिस उन्हें ढ़ूढ़ती ही रह गई।</p>
<p style="text-align:justify;">साण्डर्स की हत्या को क्रांतिकारियों ने इन अल्फाजों में इंसाफ के लायक बतलाया-देश के करोड़ों लोगों के सम्माननीय नेता की एक साधारण पुलिस अधिकारी के क्रूर हाथों द्वारा की गयी हत्या….. राष्ट्र का घोर अपमान है। भारत के देशभक्त युवाओं का यह कर्तव्य है कि वे इस कायरतापूर्ण हत्या का बदला लें….. हमें साण्डर्स की हत्या का अफसोस है किन्तु वह उस अमानवीय व्यवस्था का एक अंग था, जिसे नष्ट करने के लिये हम संघर्ष कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लाहौर साजिश केस के बाद भी क्रांतिकारी खामोश नहीं बैठ गए, बल्कि अपने छोटे-छोटे कार्यकलापों से अंग्रेज सरकार के खिलाफ क्रांति का अलख जगाए रखे। 8 अप्रैल, 1929 को अंग्रेज सरकार के जनविरोधी पब्लिक सेफ्टी बिल व टेज्ड डिस्प्यूट्स बिल के खिलाफ और इस सरकार के बहरे कानों में आवाज पहुँचाने के लिए भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केन्द्रीय असेम्बली में बम फेंककर धमाका किया। बम फेंककर ये बहादुर क्रांतिकारी इस मर्तबा भाग नहीं गए, बल्कि आगे बढ़कर खुद ही इन्होंने अपनी गिरफ्तारी दी।</p>
<p style="text-align:justify;">बम फेंकने का मकसद किसी को घायल करना नहीं था, बहरी अंगे्रज हुकूमत के कान खोलना था। गिरफ्तारी का एक और अहम मकसद अदालत को अपनी विचारधारा के प्रचार का माध्यम बनाना था, जिससे भारतीय जनता क्रांतिकारियों के विचारों तथा राजनीतिक दर्शन से वाकिफ हो सके। अपने इस जरूरी काम में क्रांतिकारी कामयाब भी हुए। इस बम विस्फोट और उसके बाद इन क्रांतिकारियों की गिरफ्तारी एवं उनके विचारों की गूंज पूरे देश में सुनाई दी गई। अंग्रेजों के खिलाफ हिंदोस्तानी अवाम का गुस्सा बढ़ता चला गया। एक तरफ अंग्रेजों के खिलाफ जनता एकजुट हो रही थी, तो दूसरी ओर क्रांतिकारियों के प्रति अंग्रेजों का दमन चक्र तेज हो गया। उनकी गिरफ्तारियां की जाने लगीं।</p>
<p style="text-align:justify;">लाहौर में एक बम बनाने की फैक्ट्री पकड़ी गई, जिसके बाद 15 अप्रैल, 1929 को सुखदेव और दीगर क्रांतिकारी अंग्रेजों की गिरफ्त में आ गए। एक वक्त ऐसा भी आया, जब चंद्रशेखर आजाद और राजगुरु को छोड़कर हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के सभी सरगर्म मेम्बर गिरफ्तार कर लिए गए। पुलिस से बचने के लिए राजगुरु कुछ दिनों के लिए महाराष्ट्र चले गए, लेकिन बाद में वे भी अंग्रेजी पुलिस के शिकंजे में फंस गए। अंग्रेजों ने चंद्रशेखर आजाद का पता जानने के लिए राजगुरु पर अनेक अमानवीय अत्याचार किये, लेकिन राजगुरु इनसे जरा सा भी विचलित नहीं हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने अंग्रेजों को चंद्रशेखर का सुराग नहीं दिया। अंग्रेज हुकूमत ने राजगुरु को उनके बाकी क्रांतिकारी साथियों के साथ लाहौर की जेल में ही कैद कर दिया। भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव पर लाहौर साजिश केस के तहत अदालत में मुकदमा चला, लेकिन यह सब दिखावा था। फैसला पहले से ही तय था और इन तीनों को अदालत ने सजा-ए-मौत की सजा सुनाई। सजा सुनने के बाद भी ये मतवाले क्रांतिकारी जरा सा भी नहीं घबराए और इन्होंने इंकलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुदार्बाद के नारे लगाकर खुशी-खुशी इसे मंजूर किया। इन तीनों क्रांतिकारियों को जब फांसी लगी, तब इनकी उम्र महज 23-24 साल थी। जिस उम्र में आज का नौजवान पढ़-लिखकर कुछ काम करने की सोचता है, उस उम्र में इन मतवाले क्रांतिकारियों ने देश के लिए अपनी शहादत दे दी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">क्रांतिकारियों में सरदार भगतसिंह सबसे ज्यादा विचारसंपन्न थे। छोटी सी ही उम्र में उन्होंने खूब पढ़ा-लिखा। दुनिया को करीब से देखा, समझा और व्यवस्था बदलने के लिए जी भरकर कोशिशें कीं। जेल जीवन के दो वर्षों में भी भगत सिंह ने खूब अध्ययन, मनन, चिंतन व लेखन किया। जेल के अंदर से ही उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन को बचाए रखा और उसे विचारधारात्मक स्पष्टता प्रदान की। भगत सिंह सिर्फ जोशीले नौजवान नहीं थे, जो कि जोश में आकर अपने वतन पर मर मिटे थे। उनके दिल में देशभक्ति के जज्बे के साथ एक सपना था। भावी भारत की एक तस्वीर थी। जिसे साकार करने के लिए ही उन्होंने अपना सर्वस्व: देश पर न्यौछावर कर दिया। वे सिर्फ क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि युगदृष्टा, स्वप्नदर्शी, विचारक भी थे। वैज्ञानिक ऐतिहासिक दृष्टिकोण से सामाजिक समस्याओं के विश्लेषण की उनमें अद्भुत क्षमता थी। भगत सिंह ने कहा था कि मेहनतकश जनता को आने वाली आजादी में कोई राहत नहीं मिलेगी। उनकी भविष्यवाणी अक्षरश: सच साबित हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">आज देश में प्रतिक्रियावादी शक्तियों की ताकत बढ़ी है। पंूजीवाद, बाजारवाद, साम्राज्यवाद के नापाक गठबंधन ने सारी दुनिया को अपने आगोश में ले लिया है। अपने ही देश में हम आज दुष्कर परिस्थितियों में जी रहे हैं। चहुं ओर समस्याऐं ही समस्याएें हैं। समाधान नजर नहीं आ रहा है। ऐसे माहौल में शहीद भगत सिंह के फांसी पर चढ़ने से कुछ समय पूर्व के विचार याद आते हैं, जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है, तो किसी भी प्रकार की तब्दीली से वह हिचकिचाते हैं, इस जड़ता और निष्क्रियता को तोड़ने के लिए एक क्रांतिकारी स्प्रिट पैदा करने की जरूरत होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अन्यथा पतन और बर्बादी का वातावरण छा जाता है। लोगों को गुमराह करने वाली प्रतिक्रियावादी शक्तियां जनता को गलत रास्ते में ले जाने में सफल हो जाती हैं। इससे इन्सान की प्रगति रूक जाती है और उसमें गतिरोध आ जाता है। इस परिस्थिति को बदलने के लिए यह जरूरी है कि क्रांति की स्प्रिट ताजा की जाए। ताकि इंसानियत की रूह में एक हरकत पैदा हो।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>जाहिद खान</strong></p>
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                <pubDate>Fri, 23 Mar 2018 05:51:11 +0530</pubDate>
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                <title>अब एक नयी सम्पूर्ण क्रांति हो</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/now-there-is-a-whole-new-revolution/article-3383"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-10/leaders.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">आजादी के आंदोलन से हमें ऐसे बहुत से नेता मिले जिनके प्रयासों के कारण ही यह देश आज तक टिका हुआ है और उसकी समस्त उपलब्धियां उन्हीं नेताओं की दूरदृष्टि और त्याग का नतीजा है। ऐसे ही नेताओं में जीवनभर संघर्ष करने वाले और इसी संघर्ष की आग में तपकर कुंदन की तरह दमकते हुए समाज के सामने आदर्श बन जाने वाले पे्ररणास्रोत थे लोकनायक जयप्रकाश नारायण। जो अपने त्यागमय जीवन के कारण मृत्यु से पहले ही प्रात: स्मरणीय बन गये थे। अपने जीवन में संतों जैसा प्रभामंडल केवल दो नेताओं ने प्राप्त किया। एक महात्मा गांधी थे तो दूसरे जयप्रकाश नारायण। इसलिए जब सक्रिय राजनीति से दूर रहने के बाद वे 1974 में ह्यसिंहासन खाली करो जनता आती है के नारे के साथ वे मैदान में उतरे तो सारा देश उनके पीछे चल पड़ा, जैसे किसी संत महात्मा के पीछे चल रहा हो।</p>
<p style="text-align:justify;">11 अक्टूबर, 1902 को जन्मे जयप्रकाश नारायण भारतीय स्वतंत्रता सेनानी और राजनेता थे। वे समाज-सेवक थे, जिन्हें लोकनायक के नाम से भी जाना जाता है। 1999 में उन्हें मरणोपरान्त भारत रत्न से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें समाजसेवा के लिए 1965 में मैगससे पुरस्कार प्रदान किया गया था। पटना के हवाई अड्डे का नाम उनके नाम पर रखा गया है। दिल्ली सरकार का सबसे बड़ा अस्पताल लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल भी उनके नाम पर है।लोकनायक जयप्रकाशजी की समस्त जीवन यात्रा संघर्ष तथा साधना से भरपूर रही। उसमें अनेक पड़ाव आए, उन्होंने भारतीय राजनीति को ही नहीं बल्कि आम जनजीवन को एक नई दिशा दी, नए मानक गढ़े।</p>
<p style="text-align:justify;">जैसे- भौतिकवाद से अध्यात्म, राजनीति से सामाजिक कार्य तथा जबरन सामाजिक सुधार से व्यक्तिगत दिमागों में परिवर्तन।  लोकनायक जयप्रकाशजी की जीवन की विशेषताएं और उनके व्यक्तित्व के आदर्श कुछ विलक्षण और अद्भुत हैं जिनके कारण से वे भारतीय राजनीति के नायकों में अलग स्थान रखते हैं। उनका सबसे बड़ा आदर्श था जिसने भारतीय जनजीवन को गहराई से प्रेरित किया, वह था कि उनमें सत्ता की लिप्सा नहीं थी, मोह नहीं था, वे खुद को सत्ता से दूर रखकर देशहित में सहमति की तलाश करते रहे और यही एक देशभक्त की त्रासदी भी रही थी। वे कुशल राजनीतिज्ञ भले ही न हो किन्तु राजनीति की उन्नत दिशाओं के पक्षधर थे, प्रेरणास्रोत थे।</p>
<p style="text-align:justify;">वे देश की राजनीति की भावी दिशाओं को बड़ी गहराई से महसूस करते थे। यही कारण है कि राजनीति में शुचिता एवं पवित्रता की निरंतर वकालत करते रहे। महात्मा गांधी जयप्रकाश की साहस और देशभक्ति के प्रशंसक थे। उनका हजारीबाग जेल से भागना काफी चर्चित रहा और इसके कारण से वे असंख्य युवकों के सम्राट बन चुके थे। वे अत्यंत भावुक थे लेकिन महान क्रांतिकारी भी थे। वे संयम, अनुशासन और मयार्दा के पक्षधर थे। इसलिए कभी भी मयार्दा की सीमा का उल्लंघन नहीं किया। विषम परिस्थितियों में भी उन्होंने अपना अध्ययन नहीं छोड़ा और आर्थिक तंगी ने भी उनका मनोबल नहीं तोड़ा। यह उनके किसी भी कार्य की प्रतिबद्धता को ही निरूपित करता था, उनके दृढ़ विश्वास को परिलक्षित करता है। मैंने जेपी को नहीं देखा लेकिन उनकी प्रेरणाएं मेरे पारिवारिक परिवेश की आधारभित्ति रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">मेरी माताजी स्व. सत्यभामा गर्ग उनकी अनन्य सेविका थी। राजस्थान में होने वाले जेपी के कार्यक्रमों को वे संचालित किया करती थी, उनके व्यक्तिगत व्यवस्था में जुड़े होने के कारण उनके आदर्श एवं प्रेरणाएं हमारे परिवार का हिस्सा थे। मेरे आध्यात्मिक गुरु आचार्य श्री तुलसी के जीवन से जुड़े एक बड़े विरोधपूर्ण वातावरण के समाधान में भी जयप्रकाश का अमूल्य योगदान है। उनकी चर्चित पुस्तक अग्निपरीक्षा को लेकर जब देश भर में दंगें भड़के, तो जेपी के आह्वान से ही शांत हुए। जेपी के कहने पर आचार्य तुलसी ने अपनी यह पुस्तक भी वापस ले ली।  जयप्रकाश नारायण को 1970 में इंदिरा गांधी के विरुद्ध विपक्ष का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है। इन्दिरा गांधी को पदच्युत करने के लिये उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति नामक आन्दोलन चलाया।</p>
<p style="text-align:justify;">लोकनायक ने कहा कि सम्पूर्ण क्रांति में सात क्रांतियाँ शामिल हैं-राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक क्रांति। इन सातों क्रांतियों को मिलाकर सम्पूर्ण क्रान्ति होती है। सम्पूर्ण क्रांति की तपिश इतनी भयानक थी कि केन्द्र में कांग्रेस को सत्ता से हाथ धोना पड़ गया था। जयप्रकाश नारायण की हुंकार पर नौजवानों का जत्था सड़कों पर निकल पड़ता था। बिहार से उठी सम्पूर्ण क्रांति की चिंगारी देश के कोने-कोने में आग बनकर भड़क उठी थी। जेपी के नाम से मशहूर जयप्रकाश नारायण घर-घर में क्रांति का पर्याय बन चुके थे। लालमुनि चैबे, लालू प्रसाद, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान या फिर सुशील मोदी, आज के सारे नेता उसी छात्र युवा संघर्ष वाहिनी का हिस्सा थे।</p>
<p style="text-align:justify;">देश में आजादी की लड़ाई से लेकर वर्ष 1977 तक तमाम आंदोलनों की मशाल थामने वाले जेपी यानी जयप्रकाश नारायण का नाम देश के ऐसे शख्स के रूप में उभरता है जिन्होंने अपने विचारों, दर्शन तथा व्यक्तित्व से देश की दिशा तय की थी। उनका नाम लेते ही एक साथ उनके बारे में लोगों के मन में कई छवियां उभरती हैं। लोकनायक के शब्द को असलियत में चरितार्थ करने वाले जयप्रकाश नारायण अत्यंत समर्पित जननायक और मानवतावादी चिंतक तो थे ही इसके साथ-साथ उनकी छवि अत्यंत शालीन और मर्यादित सार्वजनिक जीवन जीने वाले व्यक्ति की भी है। उनका समाजवाद का नारा आज भी हर तरफ गूंज रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भले ही उनके नारे पर राजनीति करने वाले उनके सिद्धान्तों को भूल रहे हों, क्योंकि उन्होंने सम्पूर्ण क्रांति का नारा एवं आन्दोलन जिन उद्देश्यों एवं बुराइयों को समाप्त करने के लिये किया था, वे सारी बुराइयां इन राजनीतिक दलों एवं उनके नेताओं में व्याप्त है। सम्पूर्ण क्रान्ति के आह्वान में उन्होंने कहा था कि भ्रष्टाचार मिटाना, बेरोजगारी दूर करना, शिक्षा में क्रांति लाना, आदि ऐसी चीजें हैं जो आज की व्यवस्था से पूरी नहीं हो सकतीं क्योंकि वे इस व्यवस्था की ही उपज हैं। वे तभी पूरी हो सकती हैं जब सम्पूर्ण व्यवस्था बदल दी जाए और सम्पूर्ण व्यवस्था के परिवर्तन के लिए क्रान्ति, सम्पूर्ण क्रान्ति आवश्यक है। इसलिये आज एक नयी सम्पूर्ण क्रांति की जरूरत है। यह क्रांति व्यक्ति सुधार से प्रारंभ होकर व्यवस्था सुधार पर केन्द्रित हो। कुर्सी पर कोई भी बैठे, लेकिन मूल्य प्रतिष्ठापित होने जरूरी है। ऐसा करके ही हम एक महान लोकनायक को सच्ची श्रद्धांजलि दे पाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>ललित गर्ग</strong></p>
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                <pubDate>Wed, 11 Oct 2017 04:33:16 +0530</pubDate>
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                <title>PoK में फिर लगे आजादी के नारे</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली: पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आजादी के आंदोलन की गति तेज हो रही है। पाकिस्तान से आजादी के लिए जनदाली में जम्मू-कश्मीर राष्ट्रीय छात्र संघ द्वारा विशाल रैली आयोजित की गई. रैली में आजादी के नारे लगाए गए। स्थानीय नेता लीकांत खान ने कहा कि पाकिस्तान इस शांतिपूर्ण जगह को बर्बाद करने के लिए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/freedom-slogans-again-in-pok/article-3225"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/pok.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली: </strong>पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में आजादी के आंदोलन की गति तेज हो रही है। पाकिस्तान से आजादी के लिए जनदाली में जम्मू-कश्मीर राष्ट्रीय छात्र संघ द्वारा विशाल रैली आयोजित की गई. रैली में आजादी के नारे लगाए गए। स्थानीय नेता लीकांत खान ने कहा कि पाकिस्तान इस शांतिपूर्ण जगह को बर्बाद करने के लिए यहां आतंकवादियों को भेजता है। पीओके में लगातार आजादी की मांग उठ रही है।</p>
<h1 style="text-align:justify;">‘अवैध कब्जा ही असली मुद्दा’</h1>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर भारत हमेशा से यह कहता रहा है कि पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान पर पाकिस्तान का कब्जा अवैध है और उसे खाली करना होगा। भारत का कहना है कि अगर भारत और पाकिस्तान के बीच जम्मू और कश्मीर को लेकर कोई विवाद है तो वह सिर्फ पाकिस्तान की तरफ से पीओके और गिलगित-बाल्टिस्तान पर अवैध कब्जा है।</p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>देश</category>
                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 18 Aug 2017 22:52:57 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>स्वतंत्रता को दें नया आयाम</title>
                                    <description><![CDATA[पन्द्रह अगस्त हमारे राष्ट्र का गौरवशाली दिन है, इसी दिन स्वतंत्रता के बुनियादी पत्थर पर नव-निर्माण का सुनहला भविष्य लिखा गया था। इस लिखावट का निहितार्थ था कि हमारा भारत एक ऐसा राष्ट्र होगा, जहां न शोषक होगा, न कोई शोषित, न मालिक होगा, न कोई मजदूर, न अमीर होगा, न कोई गरीब। सबके लिए […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/give-new-dimension-to-freedom/article-3140"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-08/india-3.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पन्द्रह अगस्त हमारे राष्ट्र का गौरवशाली दिन है, इसी दिन स्वतंत्रता के बुनियादी पत्थर पर नव-निर्माण का सुनहला भविष्य लिखा गया था। इस लिखावट का निहितार्थ था कि हमारा भारत एक ऐसा राष्ट्र होगा, जहां न शोषक होगा, न कोई शोषित, न मालिक होगा, न कोई मजदूर, न अमीर होगा, न कोई गरीब। सबके लिए शिक्षा, रोजगार, चिकित्सा और उन्नति के समान और सही अवसर उपलब्ध होंगे। आजादी के सात दशक बीत रहे हैं, अब साकार होता हुआ दिख रहा है हमारी जागती आंखों से देखा गया स्वप्न। अहसास हो रहा है स्वतंत्र चेतना की अस्मिता का। अब बन रहा है नया भारत।</p>
<p style="text-align:justify;">हर बार आजादी के जश्न को मनाते हुए अनेक प्रश्न खड़े रहे हैं, ये प्रश्न इसलिये खड़े हुए हैं क्योंकि आज भी आम आदमी न सुखी बना, न समृद्ध। न सुरक्षित बना, न संरक्षित। न शिक्षित बना और न स्वावलम्बी। अर्जन के सारे स्रोत सीमित हाथों में सिमट कर रह गए। स्वार्थ की भूख परमार्थ की भावना को ही लील गई। हिंसा, आतंकवाद, जातिवाद, नक्सलवाद, क्षेत्रीयवाद तथा धर्म, भाषा और दलीय स्वार्थों के राजनीतिक विवादों ने आम नागरिक का जीना दूभर कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, लेकिन इसका स्वाद हम चख ही नहीं पाए। ऐसा लगता रहा है कि जमीन आजाद हुई है, जमीर तो आज भी कहीं, किसी के पास गिरवी रखा हुआ है। ट्रेन या सड़क दुर्घटनाएं हों या बार-बार आतंकी बम धमाकों से दहल जाना या फिर महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न- चहुं ओर लोक जीवन में असंतोष है, असुरक्षा का भाव है। लोकतंत्र घायल है। वह आतंक का रूप ले चुका है।</p>
<p style="text-align:justify;">मुझे अपनी मलेशिया एवं सिंगापुर की यात्रा से लौटने के बाद महसूस हुआ कि हमारे यहां की फिजां डरी-डरी एवं सहमी-सहमी है। कभी पुलिस कमिश्नर तो कभी राजनेताओं ने महिलाओं पर हो रहे हमलों, अत्याचारों के लिये उनके पहनावे या देर रात तक बाहर घूमने को जिम्मेदार ठहराया है, जबकि सिंगापुर एवं मलेशिया में महिलाओं के पहनावे एवं देर रात तक अकेले स्वच्छंद घूमने के बावजूद वहां महिलाएं सुरक्षित हैं और अपना स्वतंत्र जीवन जीती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">हमें समस्या की जड़ को पकडना होगा। केवल पत्तों को सींचने से समाधान नहीं होगा। ऐसा लगता है कि इन सब स्थितियों में जवाबदेही और कर्तव्यबोध तो दूर की बात है, हमारे सरकारी तंत्र में न्यूनतम मानवीय संवेदना भी बची हुई दिखायी नहीं देती।</p>
<p style="text-align:justify;">लगभग तीन सप्ताह से चल रही संसद में विरोधी पार्टियों के द्वारा अवरोध बना हुआ है, जनता के हितों पर कुछ सार्थक निर्णय लेने के लिये चुनी गयी संसद अपने ही हितों के लिये संसद की कार्रवाही का अवरोध करना, कैसा लोकतांत्रिक आदर्श है? प्रश्न है कि कौन स्थापित करेगा एक आदर्श शासन व्यवस्था? कौन देगा इस लोकतंत्र को शुद्ध सांसे? जब शीर्ष नेतृत्व ही अपने स्वार्थों की फसल को धूप-छांव देने की तलाश में हैं। जब रास्ता बताने वाले रास्ता पूछ रहे हैं और रास्ता न जानने वाले नेतृत्व कर रहे हैं सब भटकाव की ही स्थितियां हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">गांधी, शास्त्री, नेहरू, जयप्रकाश नारायण, लोहिया के बाद राष्ट्रीय नेताओं के कद छोटे होते गये और परछाइयां बड़ी होती गईं। हमारी प्रणाली में तंत्र ज्यादा और लोक कम रह गया है। यह प्रणाली उतनी ही अच्छी हो सकती है, जितने कुशल चलाने वाले होते हैं। लेकिन कुशलता तो तथाकथित स्वार्थों की भेंट चढ़ गयी। लोकतंत्र श्रेष्ठ प्रणाली है। पर उसके संचालन में शुद्धता हो। लोक जीवन में ही नहीं लोक से द्वारा लोक हित के लिये चुने प्रतिनिधियों में लोकतंत्र प्रतिष्ठापित हो और लोकतंत्र में लोक मत को अधिमान मिले- यह वर्तमान समय की सबसे बड़ी अपेक्षा है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारी सबसे बड़ी असफलता है कि आजादी के 70 वर्षों के बाद भी हम राष्ट्रीय चरित्र नहीं बना पाये। राष्ट्रीय चरित्र का दिन-प्रतिदिन नैतिक हृास हो रहा था। हर गलत-सही तरीके से हम सब कुछ पा लेना चाहते थे। अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए कर्तव्य को गौण कर दिया था। इस तरह से जन्मे हर स्तर पर भ्रष्टाचार ने राष्ट्रीय जीवन में एक विकृति पैदा कर दी थी। न केवल यूपीए के 10 वर्ष के शासन से बल्कि क्षेत्रीय पार्टियों एवं राज्यों में उनकी अलोकतांत्रिक एवं भ्रष्ट गतिविधियों से जनता ऊब चुकी थी और विपरीत एवं अराजक स्थितियां जनता को बार-बार अहसास दिला रही थी कि देश को एक ताकतवर नेता की जरूरत है जो कड़े त्वरित फैसले ले सके।</p>
<p style="text-align:justify;">अधिकारों का दुरुपयोग नहीं हो, मतदाता स्तर पर भी और प्रशासक स्तर पर भी। लोक चेतना जागे। लोकतंत्र के दो मजबूत पैर न्यायपालिका और कार्यपालिका स्वतंत्र रहें। एक दूसरे को प्रभावित न करें। संविधान के अन्तर्गत बनी आचार संहिता मुखर हो, प्रभावी हो। केवल पूजा की चीज न हो। जन भावना लोकतंत्र की आत्मा होती है। लोक सुरक्षित रहेगा तभी तंत्र सुरक्षित रहेगा। लोक के लिए, लोक जीवन के लिए, लोकतंत्र के लिए जरूरत है कि उसे शुद्ध सांसें मिलें। लोक जीवन और लोकतंत्र की अस्मिता को गौरव मिले। इसी सन्देश में स्वतंत्रता की सार्थकता निहित है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस वर्ष हम स्वतंत्रता दिवस मनाते हुए महसूस कर रहे हैं कि निराशाओं के बीच आशाओं के दीप जलने लगे हैं, यह शुभ संकेत हैं। एक नई सभ्यता और एक नई संस्कृति करवट ले रही है। नये राजनीतिक मूल्यों, नये विचारों, नये इंसानी रिश्तों, नये सामाजिक संगठनों, नये रीति-रिवाजों और नयी जिंदगी की हवायें लिए हुए आजाद मुल्क की एक ऐसी गाथा लिखी जा रही है, जिसमें राष्ट्रीय चरित्र बनने लगा है, राष्ट्र सशक्त होने लगा है, न केवल भीतरी परिवेश में बल्कि दुनिया की नजरों में भारत अपनी एक स्वतंत्र हस्ती और पहचान लेकर उपस्थित है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन की दादागिरी और पाकिस्तान की दकियानूसी हरकतों को मुंहतोड़ जबाव पहली बार मिला है। चीन ने कभी कल्पना भी नहीं की होगी कि सीमा विवाद को लेकर डोकलाम में उसे भारत के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">यह सब प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के करिश्माई व्यक्तित्व का प्रभाव है। उन्होंने लोगों में उम्मीद जगाई, देश के युवाओं के लिए वह आशा की किरण हैं। इसका कारण यही है कि लोग ताकतवर और तुरन्त फैसले लेने वाले नेता पर भरोसा करते हैं ऐसे कद्दावर नेता की जरूरत लम्बे समय से थी, जिसकी पूर्ति होना और जिसे पाकर राष्ट्र केवल व्यवस्था पक्ष से ही नहीं, सिद्धांत पक्ष भी सशक्त हुआ है। किसी भी राष्ट्र की ऊंचाई वहां की इमारतों की ऊंचाई से नहीं मापी जाती बल्कि वहां के राष्ट्रनायक के चरित्र से मापी जाती है। उनके काम करने के तरीके से मापी जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे राष्ट्रनायकों ने, शहीदों ने एक सेतु बनाया था संस्कृति का, राष्ट्रीय एकता का, त्याग का, कुबार्नी का, जिसके सहारे हम यहां तक पहुंचे हैं। मोदी जी भी ऐसा ही सेतु बना रहे हैं, ताकि आने वाली पीढ़ी उसका उपयोग कर सके। मोदीजी चाहते हैं कि हर नागरिक इस सेतु को बनाने के लिये तत्पर हो। यही वह क्षण है जिसकी हमें प्रतीक्षा थी और यही वह सोच है जिसका आह्वान है अभी और इसी क्षण शेष रहे कामों को पूर्णता देने का, क्योंकि हमारा भविष्य हमारे हाथों में हैं। ऐसा करके ही हम स्वतंत्रता दिवस को मनाने की सार्थकता सिद्ध कर पाएंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-ललित गर्ग</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 16 Aug 2017 02:19:45 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>आजादी, पर कैसी</title>
                                    <description><![CDATA[आज भारत की आजादी को 70 वर्ष हो रहे हैं। यह आजादी हमें वर्षों के संघर्ष और बलिदान देने की बाद ही मिली है। उस दिन को भी हम नहीं भुला सकते जब 9 अगस्त 1942 को ’अंग्रेजो भारत छोड़ो‘ का नारा दिया गया और अंग्रेजों के पैर उखाड़ने हेतु हमारे आजादी के दीवानों ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">आज भारत की आजादी को 70 वर्ष हो रहे हैं। यह आजादी हमें वर्षों के संघर्ष और बलिदान देने की बाद ही मिली है। उस दिन को भी हम नहीं भुला सकते जब 9 अगस्त 1942 को ’अंग्रेजो भारत छोड़ो‘ का नारा दिया गया और अंग्रेजों के पैर उखाड़ने हेतु हमारे आजादी के दीवानों ने अपनी जान की बाजी लगाई और खूनी खेल खेले और जमकर संघर्ष किया और अंग्रेजों को खदेड़ दिया और हमें 15 अगस्त 1947 को आजादी दिलाई। न जाने कितने वीरों ने अपने घर परिवार छोड़ दिये थे और देश की स्वतंत्राता के लिए स्वतंत्राता संग्राम में कूद पड़े थे।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ शीर्ष नेताओं महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र, चन्द्रशेखर, भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव, राम प्रसाद बिस्मिल, गेंदालाल आदि को तो हम सहज ही याद कर लेते हैं मगर न जाने कितने हजारों वीर थे जिन्हें हम नहीं जानते। वह समय उस धारा का था जब हर व्यक्ति के मन में राष्ट्र प्रेम की भावना थी, लेकिन आज हमारी आजादी धूमिल-सी प्रतीत हो रही है। हर तरफ आतंक का राज फैल रहा है। सारे नेता भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये हैं। नित नये घोटाले हो रहे हैं। आज प्रकृति से हमें मुफ्त में मिलने वाली घास-फूस भी नहीं बची है। क्या हमारे स्वतंत्राता सेनानियों ने ऐसा सोचा होगा कि आने वाली हमारी पीढ़ी स्वतंत्र होते हुये भी परतंत्रता की बेड़ियों में जकड़ जायेगी। आज स्थिति यह हो गयी है कि जनता के नेता बने लोग अपने फायदे हेतु अपने ही देश को लूट रहे हैं। आजादी के समय हिंदू-मुस्लिम एकता थी। दोनों ही मिलजुल कर रहते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">आज हिंदू-मुस्लिम दंगे व तनाव हर शहर की कहानी है। इसके जिम्मेवार और कोई नहीं, हम ही हैं। आज बुराई इतनी फैल चुकी है कि संसद और विधान सभाएं, जिन्हें सच्ची राहों पर चलने वाला कहा जाता है, भी नहीं बची हैं। वहां भी आपसी कलह, तोड़-फोड़ एवं गाली-गलौज चलती रहती है। क्या कोई बता सकता है कि भगत और राजगुरू ने ऐसा ही सोचा होगा, बिलकुल नहीं। आज पूरे समाज में भ्रष्टाचार, भुखमरी, बेरोजगारी, आतंक, कुप्रवृत्ति, बेईमानी और अराजकता, नशा, तस्करी की बेड़ियों ने अपना घना जाल फैला दिया है। अगर आज देश से बुराइयों का जाल नहीं काटा गया तो 70 वर्ष क्या, सैंकड़ों वर्ष में भी हम सही मायने में आजाद नहीं हो सकते। आजादी पर्व पर हमें उन वीरों को याद कर उन्हें अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि देनी होगी और शपथ लेनी होगी कि हम अपनी आजादी को हर कीमत पर बचाकर रखेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/what-kind-of-freedom/article-3042</link>
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                <pubDate>Fri, 11 Aug 2017 03:31:21 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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