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                <title>diplomatic - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>आतंकवाद एवं भगोड़ों के खिलाफ वैश्विक रणनीति बनाएं राजनयिक: वेंकैया</title>
                                    <description><![CDATA[आर्थिक विकास के वर्तमान चरण का प्रभावी संकलन बनाना चाहिए (Diplomatic: Terrorism creates a global strategy: Venkaiah) नयी दिल्ली  (वार्ता) उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने रविवार को कहा कि राजनयिकों को आतंकवाद, काला धन और भगोड़े अपराधियों के खिलाफ वैश्विक रणनीति बनाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। नायडू ने विदेशों में भारतीय मिशनों के प्रमुखों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/diplomatic-terrorism-creates-a-global-strategy-venkaiah/article-4603"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-07/venkaiah.jpg" alt=""></a><br /><h1>आर्थिक विकास के वर्तमान चरण का प्रभावी संकलन बनाना चाहिए</h1>
<p><strong>(Diplomatic: Terrorism creates a global strategy: Venkaiah)</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>नयी दिल्ली  (वार्ता) </strong></p>
<p style="text-align:justify;">उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू ने रविवार को कहा कि राजनयिकों को आतंकवाद, काला धन और भगोड़े अपराधियों के खिलाफ वैश्विक रणनीति बनाने में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। नायडू ने विदेशों में भारतीय मिशनों के प्रमुखों के साथ बैठक को संबोधित करते हुए यहां कहा कि देश की विदेश नीति के अनूठे खजाने और कालातीत मूल्यों के साथ आर्थिक विकास के वर्तमान चरण का प्रभावी संकलन बनाना चाहिए।उन्होंने कहा, “हमें देश के अनूठे खजाने और कालातीत मूल्यों को ऊपर उठाकर भारत की कहानी लिखने और समकालीन भारत में आर्थिक विकास और परिवर्तनीय गति के वर्तमान चरण के उत्साह को जीवंत बनाने की जरूरत है।</p>
<h1>सतर्क रहने की जरूरत</h1>
<p style="text-align:justify;">”उन्होंने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के ओजस्वी नेतृत्व की सराहना करने के साथ ही उनके दो सहयोगियों एम जे अकबर और जनरल वी के सिंह की भी जमकर प्रशंसा की। नायडू ने कहा कि भारतीय विदेश नीति ने राजनयिकों के लिये नये मानक स्थापित किये हैं और पिछले चार वर्षों में इसमें लगभग पूरे विश्व को शामिल करके एक असाधारण रणनीति सुनिश्चित की है।उन्होंने मिशन प्रमुखों से कहा कि दुनियाभर के देशाें की राजधानियों में भारत के प्रतिनिधि के तौर पर उन्हें सतर्क रहने की जरूरत है।</p>
<p>Diplomatic Terrorism Creates Global Strategy</p>
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                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 02 Jul 2018 00:40:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>आतंकवाद पर भारत की कूटनीतिक जीत</title>
                                    <description><![CDATA[पाकिस्तान को आतंकवादी फंडिंग के कारण अंतर्राष्ट्रीय मंच पर झटका लगा है। आतंकी संगठनों को फंड उपलब्ध कराने वाले देशों पर नजर रखने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने पाकिस्तान को “ग्रे लिस्ट” में डाल दिया है और जून में होने वाली बैठक में इसकी आधिकारिक पुष्टि हो जाएगी। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अब पड़ोसी देश […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/indias-diplomatic-victory-over-terrorism/article-3569"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-03/pakistan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पाकिस्तान को आतंकवादी फंडिंग के कारण अंतर्राष्ट्रीय मंच पर झटका लगा है। आतंकी संगठनों को फंड उपलब्ध कराने वाले देशों पर नजर रखने वाली संस्था फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स ने पाकिस्तान को “ग्रे लिस्ट” में डाल दिया है और जून में होने वाली बैठक में इसकी आधिकारिक पुष्टि हो जाएगी। अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अब पड़ोसी देश पाकिस्तान पर कड़ी निगाह रखेगा। इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण है कि पाकिस्तान के सदाबहार मित्र चीन ने भी आतंकी फंडिंग के मामले में पाकिस्तान का अंततोगत्वा समर्थन नहीं किया। जबकि चीन का सीपीईसी अर्थात चीन पाकिस्तान इकॉनोमिक कॉरिडोर के आधारभूत संरचना प्रोजेक्ट में करीब 60 बिलियन डॉलर का निवेश पाकिस्तान में है। ऐसे में चीन के इस निर्णय के विशेष महत्व को समझा जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एफएटीएफ के पेरिस बैठक में यह निर्णय लगभग सर्वसहमति से लिया गया। पाकिस्तान को मनी लॉंन्ड्रिग के मामले में वर्ष 2012 से 2015 तक के लिए वॉच लिस्ट में डाल दिया गया था। लेकिन इस बार यह कार्यवाई आतंकी संगठनों को धन मुहैया कराने के मामले में की गई है, जो पूर्व से काफी कड़ी है। एफएटीएफ एक अंतरसरकारी संस्था है, जिसकी स्थापना वर्ष 1989 में की गई थी। इसका मुख्य उदेश्य मनी लॉंन्ड्रिग (धन शोधन), आतंकियों को धन मुहैया कराना और अंतर्राष्ट्रीय वित्त व्यवस्था को नुकसान पहुँचाने वाले अन्य खतरों के प्रति ठोस कार्यवाई करना है। संगठन द्वारा लिया गया फैसला सदस्य देशों के लिए बाध्यकारी होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एफएटीएफ के पेरिस बैठक में इसके 37 सदस्यों में केवल तुर्की को छोड़कर इसके सभी 36 सदस्यों का समर्थन मिला है। ज्ञात हो एफएटीएफ में किसी भी नए कदम को रोकने के लिए कम से कम 3 सदस्यों का समर्थन होना चाहिए।एफएटीएफ के पूर्ण सत्र की कार्यवाई पूरी निजी होती है। पाकिस्तान को वॉच लिस्ट में वापस भेजने की अमेरिकी और ब्रिटिश प्रस्ताव पर सऊदी अरब, तुर्की, रूस और चीन ने असहमति जताई। इस पर वाशिंगटन ने अभूतपूर्व रूप से पाकिस्तान पर दूसरा प्रस्ताव रखा। ट्रंप प्रशासन ने शुरू से इस मुद्दे पर दबाव डालना प्रारंभ कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">अमेरिका ने इस प्रस्ताव को पारित कराने के लिए सर्वप्रथम गल्फ कॉपरेशन कांउसिल को विरोध छोड़ने के लिए तैयार कर लिया। सऊदी अरब द्वारा लगातार पाकिस्तान को समर्थन दिया जा रहा था। हाल ही में पाकिस्तान ने सऊदी अरब को अपना सैन्य सहयोग प्रदान किया था। ऐसे में सऊदी अरब तथा पाकिस्तान के रिश्ते को समझा जा सकता है। अमेरिका ने सऊदी अरब प्रतिनिधियों से बातचीत करते हुए उन्हें याद दिलाया कि दोनों देशों की व्यापक साझेदारी है। ज्ञात हो सऊदी अरब एफएटीएफ का पूर्ण सदस्य नहीं है। अमेरिका ने सऊदी अरब को फुल मेंबरशिप का लालच दिया। फलत: सऊदी अरब ने भी पाकिस्तान का साथ छोड़ दिया। इस संपूर्ण प्रकरण में रूस भी पाकिस्तान के तरफ झुका हुआ था।</p>
<p style="text-align:justify;">परंतु भारत और रूस के ऐतिहासिक मजबूत रिश्तों के आधार पर भारत ने रूस को अपने प्रभाव में ले लिया। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है कि आखिर पाकिस्तान का समर्थन करने से चीन कैसे पीछे हटा? दरअसल, रूस और सऊदी अरब के पाकिस्तान से किनारा करने के बाद चीन पर भी पीछे हटने के दबाव में लगातार वृद्धि हो रही थी। पाकिस्तान एवं चीन के अति घनिष्ठ संबंधों को देखते हुए, इस मामले में चीन का समर्थन प्राप्त करना काफी कठिन था। चीन एफएटीएफ में शीर्ष स्थान प्राप्त करने के लिए पैरवी कर रहा था और इसके लिए उसे प्रायोजक देशों के समर्थन की आवश्यकता होती।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान पर चीन की तटस्थता के बदले भारत और अमेरिका ने चीन को समर्थन देने की बात कही। जब अमेरिका सऊदी अरब और तुर्की से बात कर रहा था, तब भारत चीनी प्रतिनिधिमंडल से मोर्चा संभाल रहा था। अंतत:भारतीय प्रतिनिधिमंडल जो नई दिल्ली से निरंतर संपर्क में था, उसने अमेरिका के साथ मिलकर चीनी टीम के साथ समझौता किया जो कि भविष्य में बीजिंग के लिए एफएटीएफ में बड़ी भूमिका निभाने के समर्थन से संबंधित है। इसके अतिरिक्त चीन अपने इस निर्णय के द्वारा पाकिस्तानी नीति निर्माताओं पर आतंकवाद को लेकर कुछ दबाव भी डालना चाह रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन का इस समय पाकिस्तान में भारी निवेश है और कई बार चीन को भी आतंकवादियों के कारण सीपीईसी प्रोजेक्ट में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त चीन वैश्विक तौर पर भी एक जिम्मेदार महाशक्ति के रुप में संकेत देने का प्रयास कर रहा है कि वह भी आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष में विश्व समुदाय के साथ है। ज्ञात हो चीन पूर्व में पाकिस्तानी आतंकवादी मौलाना मसूद अजहर को बार-बार वीटो के प्रयोग कर बचाने के कारण अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बदनाम हो चुका है। सितंबर 2017 में चीन में संपन्न ब्रिक्स बैठक में भारतीय प्रयास से ब्राजील, रूस, दक्षिण अफ्रीका, भारत और चीन ने पाकिस्तान केंद्रित आतंकवादी संगठनों को वैश्विक सुरक्षा के लिए खतरा बताया था। ऐसे में ब्रिक्स सम्मेलन में चीन द्वारा किए दावों को पूरा करने का अंतर्राष्ट्रीय दबाव भी चीन पर था। एक सप्ताह पहले भी चीन ने सीपीईसी के लिए बलूच नेताओं से सीधी वार्ता कर पाकिस्तान को बलूचिस्तान में भी मानवाधिकार हनन रोकने व बलूचिस्तान में शांति स्थापित करने का संकेत दिया था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस तरह अपने सदाबहार मित्र चीन का सहयोग नहीं मिलने से पाकिस्तान को भी स्पष्ट संदेश पहुँच गया कि अगर वह आतंकवाद के मामले पर निष्क्रिय रवैया अपनाता है, तो न केवल पाकिस्तान को अंतर्राष्ट्रीय विरोध का सामना करना पड़ेगा, अपितु चीन के भी विरोध का सामना करना पड़ेगा। साथ ही चीन पाकिस्तान का विरोध कर यह भी स्पष्ट कर दिया कि अगर चीन के आर्थिक एवं सुरक्षा हितों का पाकिस्तान ध्यान नहीं रखेगा, तो चीन का पूर्ण समर्थन भी समाप्त हो सकता है। भारत के आक्रामक कूटनीतिक पहल के लिए इससे बेहतर वक्त नहीं हो सकता था, क्योंकि ट्रंप की अगुवाई वाला अमेरिका आतंक फैलाने को लेकर पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराने की लगातार मांग करता रहा है। हालांकि भारत को सावधानी से इस अवसर का फायदा उठाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि चीन और सऊदी अरब जून के बाद अपने मौजूद रूख में कोई बदलाव न करें।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर जून तक पाकिस्तान ने टेरर फंडिंग को खत्म करने के लिए विस्तृत कार्ययोजना नहीं तैयार की तो उसका नाम ब्लैक लिस्ट देशों में शुमार कर लिया जाएगा। टास्क फोर्स के इस कदम के बाद पाकिस्तान के सामने अन्य एजेंसियों की ओर से भी डाउनग्रेड किए जाने का खतरा मंडरा रहा है। स्वयं पाकिस्तानी विशेषज्ञ भी स्वीकार कर रहे हैं कि आईएमएफ, विश्व बैंक, एशियाई विकास बैंक समेत मूडीज, स्टैंडर्ड एंड पूअर्स और फिच जैसी एजेंसियाँ पाकिस्तान को डाउनग्रेड कर सकती है। ऐसा होने पर अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों और बैंकों के लिए पाकिस्तान में कारोबार करना मुश्किल हो जाएगा। इस्लामाबाद पर 300 अरब डॉलर का संप्रभुता कर्ज है, ऐसे में देनदारी चुकता नहीं करने पर स्थिति और भी विकट होगी। ऐसे स्थिति में पाकिस्तानी अर्थव्यवस्था में गिरावट एक ऐसा चक्र शुरू हो सकता है, जिसे पुन: मुक्त होना पाकिस्तान के लिए मुश्किल हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><em>राहुल लाल</em></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 01 Mar 2018 02:55:08 +0530</pubDate>
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                <title>एससीओ में भारत की कूटनीतिक सफलता के मायने!</title>
                                    <description><![CDATA[पाकिस्तान के साथ-साथ भारत भी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का पूर्णकालिक सदस्य बन गया। इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है। इस प्रकार भारत अब एक और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अहम् भूमिका निभाने जा रहा है। पिछले दिनों भारत और पाकिस्तान को एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बनाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/meaning-of-indias-diplomatic-success-in-sco/article-1269"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/india-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पाकिस्तान के साथ-साथ भारत भी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का पूर्णकालिक सदस्य बन गया। इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है। इस प्रकार भारत अब एक और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अहम् भूमिका निभाने जा रहा है। पिछले दिनों भारत और पाकिस्तान को एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अस्ताना में एससीओ शिखर सम्मेलन से इतर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात की थी। दोनों देशों के बीच चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता के मुद्दे पर बढ़ते मतभेदों के दौरान हुई इस मुलाकात को संबंध सुधारने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों नेताओं के बीच की यह मुलाकात इस लिहाज से खास है कि यह इनके बीच की इस साल की पहली मुलाकात है और यह भारत द्वारा बेल्ट एंड रोड फोरम का बहिष्कार किए जाने के बाद हुई। पीएम मोदी करीब 8 महीने बाद चीन के राष्ट्रपति से मिले। एससीओ में भारत की पूर्ण सदस्यता का समर्थन करने पर भारत ने चीन का धन्यवाद किया।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों देशों के बीच इस औपचारिक बैठक को काफी अहम् माना जा रहा है, क्योंकि चीन के सीपीईसी और एनएसजी में भारत की नो एंट्री पर दोनों देशों के रिश्तों में खटास रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब उम्मीद है कि इस बैठक के बाद कुछ सकारात्मक कदम सामने आ सकते हैं। इससे पहले पीएम मोदी ने करीब 17 महीने बाद इस सम्मेलन में पाकिस्तान पीएम नवाज शरीफ से मुलाकात की। भारत-पाक रिश्तों में तनाव व दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात की अटकलों के बीच एक कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ ने एक दूसरे का अभिवादन किया और एक दूसरे का हालचाल पूछा।</p>
<p style="text-align:justify;">एससीओ की स्थापना अप्रैल 1996 में चीन के शंघाई में हुई थी। उस समय चीन और रूस के अलावा मध्य एशिया के तीन देश कजाखस्तान, किर्गिस्तान और तजीकिस्तान इसके संस्थापक सदस्य थे, इसलिए तब इसका नाम शंघाई-5 रखा गया था। 2001 में उज्बेकिस्तान के शामिल होने के बाद इसका नाम बदलकर शंघाई सहयोग संगठन कर दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">अब यह 8 देशों वाला एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग का मंच बन गया है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य मध्य एशिया में सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर आपसी सहयोग बढ़ाना है। एससीओ की सदस्यता मिलने से भारत का मध्य एशियाई देशों से रिश्ते और प्रगाढ़ होंगे। वहां के बाजारों में भारत का प्रवेश आसान हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मध्य एशिया के देशों के पास गैस का बड़ा भंडार है। चूंकि चीन पहले ही रूस से बड़े पैमाने पर अपनी जरूरत की गैस ले रहा है, ऐसे में कजाखस्तान, तजीकिस्तान, उज्बेकिस्तान जैसे देश अपनी गैस की बिक्री के लिए भारत की ओर देख रहे हैं। रूस और कजाखस्तान जैसे सदस्यों के साथ प्राकृतिक गैस खरीद को लेकर भारत की बातचीत पहले से हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">रूस से भारत तक गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना पर भी बातचीत चल रही है। इसी तरह भारत, किर्गिस्तान के साथ भी ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग करना चाहता है। विभिन्न देशों की ऊर्जा जरूरतों के बीच सामंजस्य बनाने के लिए एक समिति भी बनी है। भारत मध्य एशियाई देशों में बड़ा निवेश कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही ऊर्जा संरक्षण से जुड़ी आधुनिक टेक्नॉलजी भी इन मुल्कों को उपलब्ध करा सकता है। एससीओ की सदस्यता कूटनीतिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। बताते हैं कि भारत के शामिल होने से इसमें चीन का प्रभुत्व कम होगा। अब चीन, पाकिस्तान के हर कदम का आंख मूंदकर समर्थन करने से भी हिचकिचाएगा। लेकिन चीन ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना को लेकर भारत पर कूटनीतिक दबाव बना सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एससीओ की सदस्यता हासिल करने में पाकिस्तान ने भले ही सफलता हासिल कर ली हो, पर उसके साथ बहुत अच्छा नहीं हुआ। एससीओ की पूर्ण सदस्यता मिलते ही जहां एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एससीओ के ही मंच से पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर लपेटा, वहीं दूसरी ओर उसके सदाबहार दोस्त चीन के राष्ट्रपति शी ने भी ब्लूचिस्तान में दो चीनी शिक्षकों की हत्या से खफा होकर पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से रस्मी मुलाकात तक नहीं की।</p>
<p style="text-align:justify;">कह सकते हैं कि पाकिस्तान के खिलाफ भारत को एससीओ के रूप में एक ऐसा कारगर मंच मिल चुका है, जहां आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को आसानी से घेरा जा सकता है। एससीओ के मंच पर द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा नहीं हो सकती। यह बात एससीओ के सभी सदस्य देश अच्छी तरह से जानते हैं। भारत सभी मंचों पर जहां पाक द्वारा आतंकवाद को प्रायोजित करने का मुद्दा जोर-शोर से उठाता रहता है वहीं पाकिस्तान जवाब में कश्मीर का मुद्दा जोर-शोर से उठाने का प्रयास करता रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चूंकि आतंकवाद आज एक विश्वव्यापी समस्या बन चुका है ऐसे में एससीओ के मंच से आतंकवाद का मुद्दा उठाने में भारत को कोई समस्या नहीं आएगी जबकि पाकिस्तान को इस मंच से कश्मीर का मुद्दा उठाने का मौका नहीं मिलेगा क्योंकि पूरी दुनिया कश्मीर को भारत-पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मुद्दा मान चुकी है और उसे अकसर इसे द्विपक्षीय रूप से सुलझाने की सलाह भी मिलती रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान लाख चाहकर भी एससीओ का हाल सार्क जैसा नहीं कर सकता। सार्क में तो पाकिस्तान जब तब भारत का रास्ता काटने का प्रयास करता रहता था लेकिन एससीओ में पाकिस्तान के लिए ऐसा करना असंभव है। इस संगठन में चीन और रूस जैसी बड़ी ताकतें और मजबूत अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं जो अपने आर्थिक हितों की खातिर पाकिस्तान को संगठन के एजेंडे से इतर कुछ भी करने की इजाजत नहीं देंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">भले ही रूस द्वारा भारत को सदस्यता दिलाने के जवाब में चीन ने पाकिस्तान के लिए भी एससीओ के दरवाजे खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। ऐसे में जब एससीओ में शामिल देश आतंकवाद के मुद्दे को लेकर भारत की चिन्ताओं पर ध्यान देंगे तो पाकिस्तान पर निश्चित ही दबाव पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल, यह कह सकते हैं कि भारत आतंकवाद के मुद्दे को उठाकर पाकिस्तान को एक्सपोज कर सकता है क्योंकि यह एक ऐसा बहुपक्षीय मसला है जिससे सभी देश पीड़ित हैं। आतंकवाद से लड़ने के लिए सभी सदस्य देशों ने प्रस्ताव पास किया था, जिससे एससीओ के ऐंटी टेरर चार्टर को मजबूती मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">माना जा रहा है कि आतंकवाद के मसले पर रूस के लिए भारत का सहयोग करना और भी आसान हो जाएगा। अन्य मामलों में भी दोनों में सहयोग बढ़ेगा। उम्मीद है भारत की उपस्थिति से इस संगठन को एक नया तेवर मिलेगा। देखना है कि भारत इसका कितना लाभ उठा पाता है?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-राजीव रंजन तिवारी</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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]]></content:encoded>
                
                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 15 Jun 2017 22:35:58 +0530</pubDate>
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