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                <title>India's - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>आर्थिक मोर्चे पर भारत की सुदृढ़ता</title>
                                    <description><![CDATA[एक बार फिर विश्व बैंक ने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था घोषित किया है। जबकि (India’s Strength On Economic Front) उसने वर्ष 2021 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट का पुवार्नुमान जारी किया है। हमारी अर्थव्यवस्था का दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्था एवं मंदी से अप्रभावित अर्थव्यवस्था होना, देश के लिये […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<br /><p style="text-align:justify;">एक बार फिर विश्व बैंक ने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था घोषित किया है। जबकि (India’s Strength On Economic Front) उसने वर्ष 2021 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट का पुवार्नुमान जारी किया है। हमारी अर्थव्यवस्था का दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्था एवं मंदी से अप्रभावित अर्थव्यवस्था होना, देश के लिये एक सुखद अहसास है और भारत की सुनहरी एवं सुदृढ़ तस्वीर की प्रस्तुति है। लेकिन एक बड़ा प्रश्न है कि इस लोक-लुभावनी तस्वीर के बावजूद न तो बढ़ती महंगाई नीचे आ रही है और न ही डॉलर के मुकाबले रुपये की फिसलन रूक रही है। विश्व बैंक की ग्लोबल इकोनॉमिक प्रोस्पैक्टस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर वित्त वर्ष 2017 के 6.7 प्रतिशत से बढ़कर 2018 में 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। वर्ष 2021 तक के तीन वर्षों में इसके 7.5 फीसदी बने रहने का पूवार्नुमान जारी किया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">वास्तव में किसी और बड़ी अर्थव्यवस्था की विकास दर 7 फीसदी को भी पार नहीं कर पाएगी। यह पूवार्नुमान एवं घोषणा (India’s Strength On Economic Front) नरेन्द्र मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों, नीतियों एवं योजनाओं का परिणाम है। रिपोर्ट में मोदी सरकार की ओर से किए गए ढांचागत सुधारों की सराहना भी की गई है। सरकार के नीतिगत आर्थिक सुधारों के प्रभाव अब दिखने लगे हैं और अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो रही है। इससे निजी उपभोग मजबूत रहने और निवेश में तेजी जारी रहने की उम्मीद है। हम भारत की अर्थव्यवस्था को आठ प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ते देखना चाहते हैं तो इसके लिये हमें उद्योग और सेवा क्षेत्र का भी सहारा लेना होगा, खेती को भी प्रोत्साहित करना होगा। क्योंकि दुनिया के किसी भी हिस्से में खेती का विकास अपेक्षित दर से ज्यादा नहीं हो रहा है। यदि हम गरीबी से पिंड छुड़ा कर समृद्धि का जीवन जीना चाहते हैं तो हमें अपनी सोच एवं नीतियों को बदलना ही होगा। उद्योग, खेती, रोजगार, स्वनिर्भरता, ग्रामीण विकास को बढ़ावा देना होगा, ताकि वे आर्थिक वृद्धि के इंजन बन सकें। इसके लिये मोदी सरकार के प्रयास और उन प्रयासों की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर टंकार एवं खनक उनके लिये एक अच्छी खबर है, क्योंकि यह चुनावी वर्ष है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार किसी भी दल की हो, भले ही योजनाकारों के नाम भी बदल जायें, और आर्थिक नियोजन के स्तर पर विश्व बैंक भले ही हमारी अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का खिताब दे दे, लेकिन फिर भी सभी की चिन्ता केवल यह दिखती है कि डॉलर की तुलना में रुपये का अवमूल्यन कैसे रूके, कैसे महंगाई एवं बेरोजगारी पर नियंत्रण स्थापित हो। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि जो अमेरिका मंदी से रूबरू हो रहा है और अपने समय की सबसे बड़ी बेकारी को सह रहा है, फिर भी देखिये कि आर्थिक रूप से उभरते और मंदी से अप्रभावित रुपया डॉलर की तुलना में अवमूल्यन की ओर बना है। लगातार बढ़ती महंगाई के चलते आम आदमी अभावों का शिकार हो रहा है। जनता को पूरी तरह बाजार के रहमो-करम पर छोड़ देने की सरकार की नीति आम आदमी की जिन्दगी को बदहाल बना रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">चीन की विकास दर वर्ष 2017 में 6.9 प्रतिशत रही थी जबकि भारत की उस वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत थी। भारत अब आने वाले वर्षों में चीन को पछाड़ सकता है। विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में भारत जैसी उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सचेत करते हुए कहा है कि उन्हें भविष्य में कुछ मुश्किलें झेलने के लिए भी तैयार रहना होगा। इन देशों की सरकारों को अपना कर्ज प्रबंधन मजबूत बनाने के साथ आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करना होगा। भारत 2030 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार होगा, उसके आगे केवल चीन और अमेरिका होंगे। इस स्थिति को पाने के लिये सरकार को रोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा। विशेषत: गांवों पर आधारित जीवनशैली को बल देना होगा। जबकि आजादी के बाद से जितनी भी सरकारें आयी हैं उन्होंने शहरीकरण पर बल दिया है। एक विडम्बनापूर्ण सोच देश के विकास के साथ जुड़ गयी है कि जैसे-जैसे देश विकसित होता जायेगा वैसे-वैसे गांव की संरचना टूटती जायेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन्हें शहर कहा जा रहा है वहां अपने संसाधनों से बहिष्कृत लोगों की बेतरतीब, बेचैन अरैर विस्थापित भीड़ ही होगी। जो अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की सबसे बड़ी बाधा है। मजबूत अर्थव्यवस्था का अर्थ उन्नत जीवनशैली होना जरूरी है। लेकिन आर्थिक वृद्धि दर से निर्धारित होने वाला यह अर्थतंत्र क्या देश की जनता को गरिमापूर्ण जीवन दे पाया है, क्या रोजगारों का समुचित प्रबंध कर पाया है, क्या उन्नत खेती को स्थापित किया गया है। कहीं ऐसा तो नहीं हो रहा है कि आर्थिक वृद्धि दर और जीडीपी के मानकों से चलती यह अर्थव्यवस्था अनेक क्षेत्रों में उत्पादित माल- स्टील, सीमेंट, बिजली आदि को खपाने का जरिया है। आर्थिक योजनाकारों का कोई भी नक्शा इन्हीं दबावों और आर्थिक लॉबियों और सब मिला कर मौजूदा अर्थव्यवस्था से बड़े स्तर पर लाभान्वित होने वाले उद्योग-व्यापार समूहों की चिन्ताओं से तय होता है। ऐसा होता है इसीलिये महंगाई पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है, रोजगार सीमित होते जा रहे हैं, किसान आत्महत्या कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तभी विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में भारत जैसी उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सचेत भी किया है। नरेन्द्र मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था को विकसित देशों की तर्ज पर बढ़ाने की कोशिशें की हैं। स्टार्टअप, मेक इन इंडिया और बुलेट ट्रेन की नवीन परियोजनाओं को प्रस्तुति का अवसर मिला। नोटबंदी और जीएसटी को लागू किया गया, भारत में भी डिजिटल इकॉनमी स्थापित करने के प्रयास हुए। भारत की विदेशों में साख बढ़ी। लेकिन घर-घर एवं गांव-गांव में रोशनी पहुंचाने के बावजूद आम आदमी अन्य तरह के अंधेरों में डूबा है। भौतिक समृद्धि बटोर कर भी न जाने कितनी तरह की रिक्तताओं की पीड़ा भोग रहा है। गरीब अभाव से तड़पा है तो अमीर अतृप्ति से। कहीं अतिभाव, कहीं अभाव। शहरी बस्तियां बस रही है मगर आदमी उजड़ता जा रहा है। भाजपा सरकार जिनको विकास के कदम मान रही है, वे ही उसके लिए विशेष तौर पर हानिकारक सिद्ध हुए हैं। इस पर गंभीर आत्म-मंथन करके ही हम भारत की बढ़ती आर्थिक वृद्धि दर एवं जीडीपी का नया धरातल तैयार कर नया भारत निर्मित कर सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) के अनुमान के अनुसार 2018-19 में प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय 11.1 फीसदी वृद्धि के साथ 1,25,397 रुपए पर पहुंच जाएगी जो 2017-18 में 1,12,835 रुपए थी। आर्थिक मोर्चे पर विशेष रूप से बैंकिंग क्षेत्र में भी जहां सुधार के संकेत सामने आए, वहीं राजकोषीय घाटे के संदर्भ में केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेतली ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार राजकोषीय घाटा पाटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के कोष का इस्तेमाल नहीं करेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि राजकोषीय घाटा पाटने की दिशा में मोदी सरकार का रिकार्ड पूर्व की सरकारों से कहीं बेहतर रहा है। तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था की तस्वीर निष्कंटक बन रही है। रिजर्व बैंक के कोष का उपयोग बैंकों की सहायता अथवा गरीबी निवारण के कार्यक्रमों पर किया जा सकता है, ऐसा संकेत स्वयं जेतली ने किया है। संकट के दिनों में इसकी अत्यधिक उपयोगिता रहती है। जो भी निर्णय किए जाएं, वह राजनीति से प्रेरित नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में होने चाहिएं।</p>
<p style="text-align:justify;">आवश्यकता है कि राष्ट्रीय अस्मिता के चारों ओर लिपटे अंधकार के विषधर पर मोदी सरकार अपनी पूरी ऊर्जा और संकल्पशक्ति के साथ प्रहार करें तथा वर्तमान की हताशा में से नये विहान और आस्था के उजालों का आविष्कार करे। सदियों की गुलामी और स्वयं की विस्मृति का काला पानी हमारी नसों में अब भी बह रहा है। इन हालातों में भारत ने कितनी सदियों बाद खुद को आगे बढ़ता देखा है। इसलिए आम जनता को गुमराह करने वाली राजनीति को समझना होगा। इन मानसिकताओं से उबरे बिना हम वास्तविक तरक्की की ओर अग्रसर नहीं हो सकते। <strong>ललित गर्ग</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 11 Jan 2019 19:56:26 +0530</pubDate>
                
                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>71 वर्षों में भारत पहली बार आस्ट्रेलिया में प्रबल दावेदार</title>
                                    <description><![CDATA[आस्ट्रेलिया में एक भी सीरीज़ नहीं जीत सका भारत नई दिल्ली (एजेंसी)। भारतीय टीम का विदेशी जमीन पर टेस्ट रिकॉर्ड बेशक शानदार नहीं है लेकिन कप्तान विराट कोहली (India’s Strongest Claimant In Australia For 71 Years) की अगुवाई में विश्व की नंबर एक टीम इंडिया इस बार आस्ट्रेलिया दौरे में पहली बार टेस्ट सीरीज़ जीतने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/sports/indias-strongest-claimant-in-australia-for-71-years/article-6805"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/indias-strongest-claimant-in-australia-for-71-years-copy.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:justify;">आस्ट्रेलिया में एक भी सीरीज़ नहीं जीत सका भारत</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">भारतीय टीम का विदेशी जमीन पर टेस्ट रिकॉर्ड बेशक शानदार नहीं है लेकिन कप्तान विराट कोहली <strong>(India’s Strongest Claimant In Australia For 71 Years)</strong> की अगुवाई में विश्व की नंबर एक टीम इंडिया इस बार आस्ट्रेलिया दौरे में पहली बार टेस्ट सीरीज़ जीतने की प्रबल दावेदार मानी जा रही है। भारत की दावेदारी को न केवल भारतीय खिलाड़ियों ने बल्कि आस्ट्रेलिया के दूसरे सबसे सफल कप्तान स्टीव वॉ का भी मानना है कि भारत के पास इस बार छह दिसंबर से शुरु होने वाली चार टेस्टों की सीरीज़ में जीत हासिल करने का सुनहरा मौका है। आस्ट्रेलियाई टीम में कप्तान स्टीवन स्मिथ, ओपनर डेविड वार्नर और बल्लेबाज़ कैमरन बेनक्रॉफ्ट नहीं हैं जो बॉल टेम्परिंग प्रकरण के चलते प्रतिबंधित हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">यह माना जा रहा है कि इन तीन खिलाड़ियों खासतौर पर स्मिथ और वार्नर की गैर मौजूदगी में आस्ट्रेलियाई टीम कमजोर पड़ जाएगी। लेकिन आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी हमेशा अपनी जमीन पर मजबूत माने जाते हैं। वर्ष 1980 के आसपास कैरी पैकर सीरीज़ के चलते जब कई दिग्गज आस्ट्रेलियाई खिलाड़ी टीम से बाहर थे तब भारतीय टीम ने आस्ट्रेलिया का दौरा किया था। उस समय माना जा रहा था कि भारतीय टीम कमजोर पड़ी आस्ट्रेलियाई टीम से सीरीज़ जीत लेगी लेकिन तीन मैचों की वह सीरीज़ 1-1 की बराबरी पर छूटी थी।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत ने 1947-48 में पहली बार आस्ट्रेलिया का दौरा किया था और पांच टेस्टों की सीरीज़ 0-4 से गंवा दी थी। भारत ने अपने इतिहास में अब तक आस्ट्रेलियाई जमीन पर 11 सीरीज़ खेली हैं लेकिन वह एक बार भी आस्ट्रेलिया में सीरीज़ नहीं जीत सका है। इन 11 टेस्ट सीरीज़ में भारत ने तीन सीरीज़ ड्रॉ खेली हैं। टीम इंडिया ने आस्ट्रेलिया के खिलाफ कुल 94 टेस्ट खेले हैं जिनमें से उसने 26 जीते हैं, 41 हारे हैं, एक टाई रहा है और 26 ड्रॉ खेले हैं। भारत ने आस्ट्रेलियाई जमीन पर 44 टेस्ट खेले हैं जिनमें से उसने पांच जीते हैं 28 हारे हैं और 10 ड्रॉ खेले हैं। इसी तथ्य से अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि भारतीय टीम को आस्ट्रेलियाई जमीन पर कितना संघर्ष करना पड़ा है।</p>
<p style="text-align:justify;">भारत ने 1947-48 में आस्ट्रेलिया में अपनी पहली सीरीज़ 0-4 से गंवाई थी। भारत ने इसके बाद 1967-68 में आस्ट्रेलिया का दौरा किया और चार मैचों की सीरीज़ 0-4 से गंवा दी। वर्ष 1977-78 की सीरीज़ सबसे अधिक रोमांचक रही थी जिसे आस्ट्रेलिया ने 3-2 से जीता था। 1980-81 की तीन मैचों की सीरीज़ 1-1 से ड्रॉ रही। 1985-86 में तीन मैचों की सीरीज़ में सभी टेस्ट ड्रॉ रहे जबकि 1991-92 में भारत ने पांच मैचों की सीरीज़ 0-4 से गंवाई। वर्ष 1999-2000 में भारत ने तीन मैचों की सीरीज़ 0-3 से गंवाई लेकिन 2003-04 में चार मैचों की सीरीज़ 1-1 से ड्रॉ खेली। इसके बाद भारत ने 2007-08 में चार मैचों की सीरीज़ 1-2 से, 2011-12 में चार मैचों की सीरीज़ 0-4 से और 2014-15 में चार मैचों की आखिरी सीरीज़ 0-2 से गंवाई।</p>
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                <pubDate>Tue, 04 Dec 2018 13:20:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>101 वें मैच में भारत की सबसे बड़ी जीत</title>
                                    <description><![CDATA[101 वें मैच में भारत की सबसे बड़ी जीत डबलिन ओपनर लोकेश राहुल (70) और सुरेश रैना (69) के तूफानी अर्धशतकों के बाद स्पिनरों युजवेंद्र चहल और कुलदीप यादव के तीन- तीन विकेटों के दमदार प्रदर्शन से भारत ने दूसरे और अंतिम ट्वंटी 20 अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच में आयरलैंड को 143 रन से पीटकर दो […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/other-news/indias-biggest-win-101st-match/article-4582"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/india-won-the-match-copy.jpg" alt=""></a><br /><h1>101 वें मैच में भारत की सबसे बड़ी जीत</h1>
<p>डबलिन</p>
<p>ओपनर लोकेश राहुल (70) और सुरेश रैना (69) के तूफानी अर्धशतकों के बाद स्पिनरों युजवेंद्र चहल और कुलदीप यादव के तीन- तीन विकेटों के दमदार प्रदर्शन से भारत ने दूसरे और अंतिम ट्वंटी 20 अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट मैच में आयरलैंड को 143 रन से पीटकर दो मैचों की सीरीज में मेजबान टीम का 2-0 से सफाया कर दिया।</p>
<p>भारत ने पहला मैच 76 रन से जीता था और दूसरा मैच उससे भी बड़े अंतर से शुक्रवार को 143 रन से जीत लिया। भारत की अपने ट्वंटी 20 मैचों के इतिहास में 101 मैचों में यह सबसे बड़ी जीत है। भारत की इससे पहले रनों के लिहाज से सबसे बड़ी जीत पिछले साल दिसम्बर में श्रीलंका के खिलाफ कटक में 93 रन से थी। ओवरआल ट्वंटी 20 के इतिहास में रनों के लिहाज से यह तीसरी सबसे बड़ी जीत है। भारत का इंग्लैंड के खिलाफ मुश्किल सीरीज शुरू होने से पहले यह आखिरी अंतर्राष्ट्रीय मैच था।</p>
<p>भारत को इंग्लैंड से पहला ट्वंटी 20 मैच तीन जुलाई को मैनचेस्टर में खेलना है। भारत की बल्लेबाजी और गेंदबाजी ताकत के सामने आयरलैंड की टीम बौनी नजर आयी और पूरी तरह समर्पण कर गयी। भारत ने चार विकेट पर 213 रन का विशाल स्कोर बनाने के बाद आयरलैंड को 12.3 ओवर में मात्र 70 रन पर निपटा दिया। भारत ने लगातार दूसरे मैच में 200 से ऊपर का स्कोर बनाया। भारत ने इस मैच में ओपनर शिखर धवन, महेंद्र सिंह धोनी, भुवनेश्वर कुमार और जसप्रीत बुमराह को विश्राम देकर लोकेश राहुल, दिनेश कार्तिक, उमेश यादव और सिद्धार्थ कौल को मौका दिया।</p>
<p>भारत के चार परिवर्तन आयरलैंड पर और भारी पड़ गए। आयरलैंड के बल्लेबाजों के पास भारत के कलाई के स्पिन्नरों चहल और कुलदीप का कोई जवाब नहीं था। पहले मैच में चार विकेट लेने वाले चाइनामैन गेंदबाज कुलदीप ने 2.3 ओवर में 16 रन देकर तीन विकेट झटके जबकि पहले मैच में तीन विकेट लेने वाले लेग स्पिनर चहल ने चार ओवर में 21 रन पर तीन विकेट लिए। तेज गेंदबाज उमेश यादव ने 19 रन पर दो विकेट, सिद्धार्थ ने चार रन पर एक विकेट और हार्दिक पांड्या ने 10 रन पर एक विकेट लिया।</p>
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<p> </p>
<p> </p>
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                                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                            <category>खेल</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 30 Jun 2018 14:56:45 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>एससीओ में भारत की कूटनीतिक सफलता के मायने!</title>
                                    <description><![CDATA[पाकिस्तान के साथ-साथ भारत भी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का पूर्णकालिक सदस्य बन गया। इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है। इस प्रकार भारत अब एक और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अहम् भूमिका निभाने जा रहा है। पिछले दिनों भारत और पाकिस्तान को एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बनाया गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/meaning-of-indias-diplomatic-success-in-sco/article-1269"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/india-2.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पाकिस्तान के साथ-साथ भारत भी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) का पूर्णकालिक सदस्य बन गया। इसे भारत की एक बड़ी कूटनीतिक सफलता माना जा रहा है। इस प्रकार भारत अब एक और अंतरराष्ट्रीय मंच पर अहम् भूमिका निभाने जा रहा है। पिछले दिनों भारत और पाकिस्तान को एससीओ का पूर्णकालिक सदस्य बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अस्ताना में एससीओ शिखर सम्मेलन से इतर चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग से मुलाकात की थी। दोनों देशों के बीच चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे और परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत की सदस्यता के मुद्दे पर बढ़ते मतभेदों के दौरान हुई इस मुलाकात को संबंध सुधारने के प्रयास के तौर पर देखा जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों नेताओं के बीच की यह मुलाकात इस लिहाज से खास है कि यह इनके बीच की इस साल की पहली मुलाकात है और यह भारत द्वारा बेल्ट एंड रोड फोरम का बहिष्कार किए जाने के बाद हुई। पीएम मोदी करीब 8 महीने बाद चीन के राष्ट्रपति से मिले। एससीओ में भारत की पूर्ण सदस्यता का समर्थन करने पर भारत ने चीन का धन्यवाद किया।</p>
<p style="text-align:justify;">दोनों देशों के बीच इस औपचारिक बैठक को काफी अहम् माना जा रहा है, क्योंकि चीन के सीपीईसी और एनएसजी में भारत की नो एंट्री पर दोनों देशों के रिश्तों में खटास रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब उम्मीद है कि इस बैठक के बाद कुछ सकारात्मक कदम सामने आ सकते हैं। इससे पहले पीएम मोदी ने करीब 17 महीने बाद इस सम्मेलन में पाकिस्तान पीएम नवाज शरीफ से मुलाकात की। भारत-पाक रिश्तों में तनाव व दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात की अटकलों के बीच एक कार्यक्रम में नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ ने एक दूसरे का अभिवादन किया और एक दूसरे का हालचाल पूछा।</p>
<p style="text-align:justify;">एससीओ की स्थापना अप्रैल 1996 में चीन के शंघाई में हुई थी। उस समय चीन और रूस के अलावा मध्य एशिया के तीन देश कजाखस्तान, किर्गिस्तान और तजीकिस्तान इसके संस्थापक सदस्य थे, इसलिए तब इसका नाम शंघाई-5 रखा गया था। 2001 में उज्बेकिस्तान के शामिल होने के बाद इसका नाम बदलकर शंघाई सहयोग संगठन कर दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">अब यह 8 देशों वाला एक महत्वपूर्ण क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग का मंच बन गया है। इस संगठन का मुख्य उद्देश्य मध्य एशिया में सुरक्षा चिंताओं के मद्देनजर आपसी सहयोग बढ़ाना है। एससीओ की सदस्यता मिलने से भारत का मध्य एशियाई देशों से रिश्ते और प्रगाढ़ होंगे। वहां के बाजारों में भारत का प्रवेश आसान हो जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">मध्य एशिया के देशों के पास गैस का बड़ा भंडार है। चूंकि चीन पहले ही रूस से बड़े पैमाने पर अपनी जरूरत की गैस ले रहा है, ऐसे में कजाखस्तान, तजीकिस्तान, उज्बेकिस्तान जैसे देश अपनी गैस की बिक्री के लिए भारत की ओर देख रहे हैं। रूस और कजाखस्तान जैसे सदस्यों के साथ प्राकृतिक गैस खरीद को लेकर भारत की बातचीत पहले से हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">रूस से भारत तक गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना पर भी बातचीत चल रही है। इसी तरह भारत, किर्गिस्तान के साथ भी ऊर्जा के क्षेत्र में सहयोग करना चाहता है। विभिन्न देशों की ऊर्जा जरूरतों के बीच सामंजस्य बनाने के लिए एक समिति भी बनी है। भारत मध्य एशियाई देशों में बड़ा निवेश कर सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही ऊर्जा संरक्षण से जुड़ी आधुनिक टेक्नॉलजी भी इन मुल्कों को उपलब्ध करा सकता है। एससीओ की सदस्यता कूटनीतिक नजरिए से भी महत्वपूर्ण है। बताते हैं कि भारत के शामिल होने से इसमें चीन का प्रभुत्व कम होगा। अब चीन, पाकिस्तान के हर कदम का आंख मूंदकर समर्थन करने से भी हिचकिचाएगा। लेकिन चीन ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना को लेकर भारत पर कूटनीतिक दबाव बना सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">एससीओ की सदस्यता हासिल करने में पाकिस्तान ने भले ही सफलता हासिल कर ली हो, पर उसके साथ बहुत अच्छा नहीं हुआ। एससीओ की पूर्ण सदस्यता मिलते ही जहां एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एससीओ के ही मंच से पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर लपेटा, वहीं दूसरी ओर उसके सदाबहार दोस्त चीन के राष्ट्रपति शी ने भी ब्लूचिस्तान में दो चीनी शिक्षकों की हत्या से खफा होकर पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से रस्मी मुलाकात तक नहीं की।</p>
<p style="text-align:justify;">कह सकते हैं कि पाकिस्तान के खिलाफ भारत को एससीओ के रूप में एक ऐसा कारगर मंच मिल चुका है, जहां आतंकवाद के मुद्दे पर पाकिस्तान को आसानी से घेरा जा सकता है। एससीओ के मंच पर द्विपक्षीय मुद्दों पर चर्चा नहीं हो सकती। यह बात एससीओ के सभी सदस्य देश अच्छी तरह से जानते हैं। भारत सभी मंचों पर जहां पाक द्वारा आतंकवाद को प्रायोजित करने का मुद्दा जोर-शोर से उठाता रहता है वहीं पाकिस्तान जवाब में कश्मीर का मुद्दा जोर-शोर से उठाने का प्रयास करता रहता है।</p>
<p style="text-align:justify;">चूंकि आतंकवाद आज एक विश्वव्यापी समस्या बन चुका है ऐसे में एससीओ के मंच से आतंकवाद का मुद्दा उठाने में भारत को कोई समस्या नहीं आएगी जबकि पाकिस्तान को इस मंच से कश्मीर का मुद्दा उठाने का मौका नहीं मिलेगा क्योंकि पूरी दुनिया कश्मीर को भारत-पाकिस्तान के बीच का द्विपक्षीय मुद्दा मान चुकी है और उसे अकसर इसे द्विपक्षीय रूप से सुलझाने की सलाह भी मिलती रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">पाकिस्तान लाख चाहकर भी एससीओ का हाल सार्क जैसा नहीं कर सकता। सार्क में तो पाकिस्तान जब तब भारत का रास्ता काटने का प्रयास करता रहता था लेकिन एससीओ में पाकिस्तान के लिए ऐसा करना असंभव है। इस संगठन में चीन और रूस जैसी बड़ी ताकतें और मजबूत अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं जो अपने आर्थिक हितों की खातिर पाकिस्तान को संगठन के एजेंडे से इतर कुछ भी करने की इजाजत नहीं देंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">भले ही रूस द्वारा भारत को सदस्यता दिलाने के जवाब में चीन ने पाकिस्तान के लिए भी एससीओ के दरवाजे खोलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई हो। ऐसे में जब एससीओ में शामिल देश आतंकवाद के मुद्दे को लेकर भारत की चिन्ताओं पर ध्यान देंगे तो पाकिस्तान पर निश्चित ही दबाव पड़ेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">बहरहाल, यह कह सकते हैं कि भारत आतंकवाद के मुद्दे को उठाकर पाकिस्तान को एक्सपोज कर सकता है क्योंकि यह एक ऐसा बहुपक्षीय मसला है जिससे सभी देश पीड़ित हैं। आतंकवाद से लड़ने के लिए सभी सदस्य देशों ने प्रस्ताव पास किया था, जिससे एससीओ के ऐंटी टेरर चार्टर को मजबूती मिली।</p>
<p style="text-align:justify;">माना जा रहा है कि आतंकवाद के मसले पर रूस के लिए भारत का सहयोग करना और भी आसान हो जाएगा। अन्य मामलों में भी दोनों में सहयोग बढ़ेगा। उम्मीद है भारत की उपस्थिति से इस संगठन को एक नया तेवर मिलेगा। देखना है कि भारत इसका कितना लाभ उठा पाता है?</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-राजीव रंजन तिवारी</strong></p>
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                <pubDate>Thu, 15 Jun 2017 22:35:58 +0530</pubDate>
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