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                <title>One Nation One Election News - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>One Nation One Election News RSS Feed</description>
                
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                <title>One Nation, One Election: एक राष्ट्र, एक चुनाव देश के लिए नई व्यवस्था नहीं: सुनील भार्गव</title>
                                    <description><![CDATA[One Nation, One Election: जयपुर। एक राष्ट्र एक चुनाव जन जागरूकता अभियान के प्रदेश संयोजक सुनील भार्गव ने प्रेसवार्ता कर बताया कि स्वतंत्रता के बाद से अब तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के 400 से अधिक चुनावों ने निष्पक्षता और पारदर्शिता के प्रति भारत के चुनाव आयोग की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया है। हालाँकि, अलग-अलग […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/one-nation-one-election-is-not-a-new-system-for-the-country-sunil-bhargava/article-67982"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-03/one-nation-one-election.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">One Nation, One Election: जयपुर। एक राष्ट्र एक चुनाव जन जागरूकता अभियान के प्रदेश संयोजक सुनील भार्गव ने प्रेसवार्ता कर बताया कि स्वतंत्रता के बाद से अब तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के 400 से अधिक चुनावों ने निष्पक्षता और पारदर्शिता के प्रति भारत के चुनाव आयोग की प्रतिबद्धता को प्रदर्शित किया है। हालाँकि, अलग-अलग और बार-बार होने वाले चुनावों की प्रकृति ने एक अधिक कुशल प्रणाली की आवश्यकता पर चर्चाओं को जन्म दिया है। इससे ह्यह्यएक राष्ट्र, एक चुनावह्यह्य की अवधारणा में रुचि फिर से जग गई है। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">ह्यह्यएक राष्ट्र, एक चुनावह्यह्य के इस विचार को एक साथ चुनाव के रूप में भी जाना जाता है, जो लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों को एक ही साथ कराने का प्रस्ताव प्रस्तुत करता है। इन चुनावी समय-सीमाओं को एक साथ जोड़ने के दृष्टिकोण का उद्देश्य चुनावों के लिए किए जाने वाले प्रबंध से जुड़ी चुनौतियों का समाधान करना, इसमें लगने वाले खर्च को घटाना और लगातार चुनावों के कारण कामकाज में होने वाले व्यवधानों को कम करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">संयोजक सुनील भार्गव ने बताया कि भारत में एक साथ चुनाव कराने के संबंध में उच्च स्तरीय समिति की रिपोर्ट को 2024 में जारी किया गया था। रिपोर्ट ने एक साथ चुनाव के दृष्टिकोण को लागू करने के लिए एक व्यापक रूपरेखा प्रदान की। इसकी सिफारिशों को 18 सितंबर 2024 को केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा स्वीकार किया गया, जो चुनाव सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इस प्रक्रिया के समर्थकों का तर्क है कि इस तरह की प्रणाली प्रशासनिक दक्षता को बढ़ा सकती है, चुनाव संबंधी खर्चों को कम कर सकती है और नीति संबंधी निरंतरता को बढ़ावा दे सकती है। भारत में शासन को सुव्यवस्थित करने और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को उसके अनुकूल बनाने करने की आकांक्षाओं को देखते हुए एक राष्ट्र, एक चुनाव की अवधारणा एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में उभरी है जिसके लिए गहन विचार-विमर्श और आम सहमति की आवश्यकता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">देश में पहले भी हो चुके एक साथ आम चुनाव | One Nation One Election</h3>
<p style="text-align:justify;">एक साथ चुनाव कराने की अवधारणा भारत में नई नहीं है। संविधान को अंगीकार किए जाने के बाद, 1951 से 1967 तक लोकसभा और सभी राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ आयोजित किए गए थे। लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के पहले आम चुनाव 1951-52 में एक साथ आयोजित किए गए थे। यह परंपरा इसके बाद 1957, 1962 और 1967 के तीन आम चुनावों के लिए भी जारी रही। हालाँकि, कुछ राज्य विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने के कारण 1968 और 1969 में एक साथ चुनाव कराने में बाधा आई थी। चौथी लोकसभा भी 1970 में समय से पहले भंग कर दी गई थी, फिर 1971 में नए चुनाव हुए।</p>
<p style="text-align:justify;">पहली, दूसरी और तीसरी लोकसभा ने पांच वर्षों का अपना कार्यकाल पूरा किया। जबकि, आपातकाल की घोषणा के कारण पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल अनुच्छेद 352 के तहत 1977 तक बढ़ा दिया गया था। इसके बाद कुछ ही, केवल आठवीं, दसवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं लोकसभाएं अपना पांच वर्षों का पूर्ण कार्यकाल पूरा कर सकीं। जबकि छठी, सातवीं, नौवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं सहित अन्य लोकसभाओं को समय से पहले भंग कर दिया गया। इन घटनाक्रमों ने एक साथ चुनाव के चक्र को अत्यंत बाधित किया, जिसके कारण देश भर में चुनावी कार्यक्रमों में बदलाव का मौजूदा स्वरूप सामने आया है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">एक साथ चुनाव कराने के संबंध में उच्च स्तरीय समिति | Rajasthan News</h3>
<p style="text-align:justify;">भारत सरकार ने 2 सितंबर 2023 को पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक साथ चुनाव कराने पर उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था। इसका प्राथमिक उद्देश्य यह पता लगाना था कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के लिए एक साथ चुनाव कराना कितना उचित होगा। समिति ने इस मुद्दे पर व्यापक स्तर पर सार्वजनिक और राजनीतिक प्रतिक्रियाएं मांगीं और इस प्रस्तावित चुनावी सुधार से जुड़े संभावित लाभों और इसकी चुनौतियों का विश्लेषण करने के लिए विशेषज्ञों से परामर्श किया। यह रिपोर्ट समिति के निष्कर्षों, संवैधानिक संशोधनों के लिए इसकी सिफारिशों और शासन, संसाधनों तथा जन-मानस पर एक साथ चुनाव के अपेक्षित प्रभाव का विस्तृत अवलोकन प्रस्तुत करती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएँ | Rajasthan News</h3>
<p style="text-align:justify;">47 राजनीतिक दलों ने इस विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। इनमें से 32 दलों ने संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग और सामाजिक सद्भाव जैसे लाभों का हवाला देते हुए एक साथ चुनाव कराने का समर्थन किया। 15 दलों ने संभावित लोकतंत्र विरोधी प्रभावों और क्षेत्रीय दलों के हाशिए पर जाने से जुड़ी चिंताएं व्यक्त कीं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">विशेषज्ञ परामर्श</h3>
<p style="text-align:justify;">समिति ने भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीशों, पूर्व चुनाव आयुक्तों और विधि विशेषज्ञों से परामर्श किया। इनमें से अधिकाधिक लोगों ने एक साथ चुनाव कराने की अवधारणा का समर्थन किया और बार-बार चुनाव कराने से संसाधनों की बर्बादी तथा सामाजिक-आर्थिक बाधाओं पर ज़ोर दिया ।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आर्थिक प्रभाव</h3>
<p style="text-align:justify;">सीआईआई, फिक्की और एसोचौम जैसे व्यापारिक संगठनों ने प्रस्ताव का समर्थन किया। उन्होंने बार-बार चुनाव से जुड़ी समस्याओं और खर्च में कमी लाकर आर्थिक स्थिरता पर इसके सकारात्मक प्रभाव को उजागर किया।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कानूनी और संवैधानिक विश्लेषण</h3>
<p style="text-align:justify;">समिति ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82ए और 324ए में संशोधन का प्रस्ताव रखा है, ताकि लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय निकायों के लिए एक साथ चुनाव कराए जा सकें।</p>
<h3 style="text-align:justify;">एक साथ चुनाव कराने का औचित्य</h3>
<p style="text-align:justify;">पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक साथ चुनाव कराने संबंधी उच्च स्तरीय समिति द्वारा जारी रिपोर्ट के निष्कष जारी किए। इसमें बताया गया कि देश के विभिन्न भागों में चल रहे चुनावों के कारण, राजनीतिक दल, उनके नेता, विधायक तथा राज्य और केंद्र सरकारें अक्सर शासन को प्राथमिकता देने के बजाय आगामी चुनावों की तैयारी पर अपना ध्यान केंद्रित करते हैं। एक साथ चुनाव कराने से सरकार का ध्यान विकासात्मक गतिविधियों और जन कल्याण को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नीतियों के कार्यान्वयन पर केंद्रित होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनावों के दौरान आदर्श आचार संहिता के कार्यान्वयन से नियमित प्रशासनिक गतिविधियाँ और विकास संबंधी पहल बाधित होती हैं। यह व्यवधान न केवल महत्वपूर्ण कल्याणकारी योजनाओं की प्रगति में बाधा डालता है, बल्कि शासन संबंधी अनिश्चितता को भी जन्म देता है। एक साथ चुनाव कराने से आचार संहिता के लंबे समय तक लागू होने की संभावना कम होगी, जिससे नीतिगत निर्णय लेने में देर नहीं होगी और शासन में निरंतरता संभव होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव ड्यूटी के लिए बड़ी संख्या में कर्मियों की तैनाती, जैसे कि मतदान अधिकारी और सरकारी अधिकारियों को उनकी मूल जिम्मेदारियों से हटाकर चुनाव कार्यों में लगाना संसाधनों के उपयोग के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। एक साथ चुनाव आयोजित होने से, बार-बार तैनाती की आवश्यकता कम हो जाएगी, जिससे सरकारी अधिकारी और सरकारी संस्थाएं चुनाव-संबंधी कार्यों के बजाय अपनी प्राथमिक भूमिकाओं पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">देश भर में चल रहे चुनावों का चल रहा चक्र सुशासन से ध्यान भटकाता है। राजनीतिक दल अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए चुनाव-संबंधी गतिविधियों पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं, जिससे विकास और आवश्यक शासन के लिए कम समय बचता है। एक साथ चुनाव पार्टियों को मतदाताओं की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने प्रयासों को समर्पित करने की अनुमति देते हैं, जिससे संघर्ष और आक्रामक प्रचार की घटनाओं में कमी आती है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">वित्तीय बोझ में कमी | One Nation One Election</h3>
<p style="text-align:justify;">एक साथ चुनाव कराने से कई चुनाव चक्रों से जुड़े वित्तीय खर्च में काफी कमी आ सकती है। यह मॉडल प्रत्येक व्यक्तिगत चुनाव के लिए मानव-शक्ति, उपकरणों और सुरक्षा संबंधी संसाधनों की तैनाती से संबंधित व्यय को घटाता है। इससे होने वाले आर्थिक लाभों में संसाधनों का अधिक कुशल आवंटन और बेहतर राजकोषीय प्रबंधन शामिल हैं, जो आर्थिक विकास और निवेशकों के विश्वास के लिए अनुकूल वातावरण को बढ़ावा देता है One Nation One Election</p>
<p><a title="IIFA Awards 2025: मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री से आईफा आयोजन समिति के सदस्यों ने मुलाकात कर दिया निमंत्रण" href="http://10.0.0.122:1245/iifa-organizing-committee-members-meet-chief-minister-deputy-chief-minister/">IIFA Awards 2025: मुख्यमंत्री, उप मुख्यमंत्री से आईफा आयोजन समिति के सदस्यों ने मुलाकात कर दिया निमं…</a></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                            <category>राजस्थान</category>
                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 05 Mar 2025 18:01:42 +0530</pubDate>
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                <title>One Nation One Election: एक राष्ट्र एक चुनाव के लिए संविधान संशोधन लोकसभा में पुर्रस्थापित</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)। One Nation One Election: लोकसभा और सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने के प्रावधान वाले ऐतिहासिक संविधान (129वां) संशोधन विधेयक 2024 को मंगलवार को लोकसभा में पुर्रस्थापित करने के सरकार के प्रस्ताव को सदन ध्वनिमत से स्वीकार किया। विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/constitution-amendment-for-one-nation-one-election-introduced-in-lok-sabha/article-65427"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-12/new-delhi-15.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (सच कहूँ न्यूज)।</strong> One Nation One Election: लोकसभा और सभी राज्यों और केन्द्रशासित प्रदेशों की विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने के प्रावधान वाले ऐतिहासिक संविधान (129वां) संशोधन विधेयक 2024 को मंगलवार को लोकसभा में पुर्रस्थापित करने के सरकार के प्रस्ताव को सदन ध्वनिमत से स्वीकार किया। विधि एवं न्याय राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल द्वारा पेश किये गये इस विधेयक पर विपक्ष ने गहरी आपत्ति जतायी। कांग्रेस समेत विभिन्न दलों के सदस्यों ने इसे संविधान एवं संघवाद के खिलाफ बताते हुए इसका विरोध किया। विधेयक को पेश करने पर सत्ता और विपक्ष के बीच लम्बे वाद-विवाद के बाद इस पर मतविभाजन कराया गया। मतविभाजन में संविधान (129वां) संशोधन विधेयक 2024 और संघ राज्य क्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक 2024 विधेयकों को पुर्रस्थापित करने के पक्ष में 269 मत और विरोध में 198 वोट पड़े। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">सदन ने इन विधेयकों को बारीकी से समीक्षा के लिए संसद की संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजने का प्रस्ताव पारित किया है। विधेयक को पेश करते हुए श्री मेघवाल ने कहा कि संविधान संशोधन का यह विधेयक संविधान सम्मत है और किसी भी रूप में यह राज्य की शक्तियों कम नहीं करता है। इस विधेयक से संविधान के मूल ढांचे में कोई छेड़छाड़ नहीं होती है। इससे कोई न तो संसद की शक्ति में कमी आ रही है न ही विधानमंडल की शक्ति में कमी आ रही है। उन्होंने कहा, ‘हम संविधान की किसी सूची में संशोधन नहीं कर रहे हैं तो संघीय ढांचे पर कैसे हमला होगा। संविधान निमार्ता बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर ने भी कहा था कि कोई भी देश के संघीय ढांचे को नहीं बदल सकता है। हम संविधान की किसी अनुसूची में कोई संशोधन नहीं कर रहे हैं। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद का धन्यवाद करते हुये कहा कि बहुत विस्तृत चर्चा के बाद इस विधेयक को लाया गया है। इस संबंध में सर्वदलीय बैठक में भी चर्चा हुई, जिसमें बहुमत संशोधन करने के पक्ष में थे। उन्होंने कहा कि यह विधेयक 41 साल से लंबित था जिसे प्रधानमंत्री मोदी ने निर्णय लेकर बदलाव करने का संकल्प लिया है। उन्होंने दोनों विधेयकों को संयुक्त संसदीय समिति में भेजने की सिफारिश की।</p>
<p style="text-align:justify;">इससे पहले सरकार ने लोकसभा में आज ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ विधेयक पेश किया और विपक्ष ने इसे संघीय ढांचे के खिलाफ बताते हुये विधेयक को वापस लेने की मांग की।</p>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस के मनीष तिवारी ने विधेयकों का विरोध करते हुये कहा है कि यह हमारे लोकतंत्र और संघीय ढांचे के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि भारत में संघवाद की व्यवस्था है और ये विधेयक पूरी तरह से संविधान की इस व्यवस्था के खिलाफ है।</p>
<p style="text-align:justify;">समाजवादी पार्टी के धर्मेंद्र यादव ने विधेयकों का विरोध किया और इसे संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया। उन्होंने इन विधेयकों को तानाशाही का परिणाम बताया और इन्हें वापस लेने की सरकार से मांग की। कांग्रेस के गौरव गोगोई ने इन विधेयक को देश के वोटरों के मतदान करने के अधिकार पर आक्रमण बताया है। उन्होंने विधेयक को संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) को भेजने की मांग की। इन विधेयकों में राष्ट्रपति को राज्यों की विधानसभाओं को भंग करने का इतना अधिकार दिया गया है, जितना पहले नहीं था। चुनाव आयोग को भी राज्य सरकारों को बर्खास्त करने का अधिकार दिया गया है, जो गलत है। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">तृणमूल कांग्रेस के कल्याण बनर्जी ने विधेयकों को संविधान की मूल भावना के खिलाफ बताया। उन्होंने कहा कि राज्यों के चुनाव वहां की सरकार के कार्यकाल की अवधि पर निर्भर करते हैं और केंद्र के चुनाव केंद्र सरकार के कार्यकाल पर तो फिर एक साथ चुनाव कैसे कराये जा सकते हैं। इसमें राज्यों की स्वायत्तता को खत्म किया जा रहा है। ध्यान रहे एक ही पार्टी हमेशा नहीं रहती है और एक दिन सत्ता बदल जायेगी। यह चुनाव सुधार नहीं, सिर्फ एक व्यक्ति की इच्छाओं को पूरा करने वाले विधेयक हैं। द्रमुक के टी आर बालू ने इस विधेयक को जेपीसी को सौंपने की मांग की।</p>
<p style="text-align:justify;">संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने कहा कि सभी दलों का प्रतिनिधित्व इसमें है और अध्यक्ष ओम बिरला ने खुद कहा है कि वह सभी दलों के नेताओं को इस मुद्दे पर विचार रखने का मौका देंगे। यूआईएमएल के ई. टी बशीर ने विधेयक को संविधान पर हमला बताया। शिवसेना के अनिल यशवंत देसाई ने विधेयक को राष्ट्र की संघीय ढांचे पर हमला करार दिया। उन्होंने कहा कि राज्यों के विधानसभाओं के अधिकारों को कम नहीं किया जाना चाहिये। गोगोई ने कहा कि राष्ट्रपति सिर्फ मंत्रिपरिषद से सलाह लेते हैं, वह चुनाव आयोग से सलाह नहीं ले सकते। इस विधेयक के प्रावधानों के अनुसार अब राष्ट्रपति चुनाव आयोग से भी सलाह ले सकते हैं। वह इसका पुरजोर विरोध करते हैं। इस विधेयक में चुनाव आयोग को अत्यधिक अधिकार दिये गये हैं। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">गोगोई ने कहा, ‘भारतीय जनता पार्टी समझती है कि वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रचार से सारे चुनाव छीन लेगी तो वह गलतफहमी में है। इस विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति में भेजा जाये, वह इस विधेयक का विरोध करते हैं। आॅल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुस्लिमीन के असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि इस विधेयक के लागू हो जाने से राज्यों में राष्ट्रपति शासन की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा। उन्होंने कहा, ह्लयह विधेयक एक आदमी के अहम को बढ़ावा देने के लिये लाया गया है। मैं इस विधेयक का विरोध करता हूं। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार) की सुप्रिया सुले ने कहा कि यह विधेयक संघवाद और संविधान के विरुद्ध है। सांसद, विधायक पांच वर्ष के लिये चुने जाते हैं, उन्हें बीच में क्यों हटाया जाये। उन्होंने कहा कि वह विधेयक का विरोध करती हैं। विधेयक को वापस लिया जाये या इसे संयुक्त संसदीय समिति में भेजा जाये।</p>
<p style="text-align:justify;">रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी के एन के प्रेमचंद्रन ने कहा कि वह विधेयकों का पुरजोर विरोध करते हैं। यह संघवाद की मूल भावना के विरोध में है। इसे लाने से संघवाद के ढांचे का विरोध होगा। इस पर व्यापक चर्चा होनी चाहिये थी। केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने विधेयक पर चर्चा के दौरान हस्तक्षेप करते हुए कहा जब यह संविधान संशोधन विधेयक कैबिनेट के पास चर्चा में आया था तभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि इसे जेपीसी को देना चाहिए। इसपर सभी स्तर पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस वजह से ही मुझे लगता है कि इसमें सदन का ज्यादा समय खर्च किए बगैर अगर मंत्री जी कहते हैं कि वह इसे जेपीसी को सौंपने को तैयार हैं, तो जेपीसी में सारी चर्चा होगी और जेपीसी की रिपोर्ट के आधार पर कैबिनेट इसे पारित करेगी तब भी फिर से इस पर सारी चर्चा होगी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Kapde ka Thaila: गुरुग्राम में पब्लिक प्लेस पर मशीनों से मिलेंगे कपड़े के थैले" href="http://10.0.0.122:1245/cloth-bags-will-be-available-from-machine-at-public-places-in-gurugram/">Kapde ka Thaila: गुरुग्राम में पब्लिक प्लेस पर मशीनों से मिलेंगे कपड़े के थैले</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Tue, 17 Dec 2024 17:31:05 +0530</pubDate>
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                <title>One Nation, One Election: एक राष्ट्र, एक चुनाव और चुनौतियाँ</title>
                                    <description><![CDATA[One Nation, One Election: लोकसभा और राज्य की विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने का मामला लम्बे समय से बहस में है मगर अब इस पर कुछ कदम उठाए जा रहे हैं। विदित हो कि स्वस्थ एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला होती हैं और भारत में निष्पक्ष चुनाव हमेशा चुनौती रही है। […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/one-nation-one-election-and-challenges/article-52493"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/one-nation-one-election-1.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">One Nation, One Election: लोकसभा और राज्य की विधान सभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने का मामला लम्बे समय से बहस में है मगर अब इस पर कुछ कदम उठाए जा रहे हैं। विदित हो कि स्वस्थ एवं निष्पक्ष चुनाव लोकतंत्र की आधारशिला होती हैं और भारत में निष्पक्ष चुनाव हमेशा चुनौती रही है। पड़ताल बताती है कि हर साल भारत में किसी न किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। मौजूदा समय में देखें तो लोकसभा के साथ आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, सिक्किम और अरूणाचल प्रदेश के विधानसभा के चुनाव सम्पन्न कराए जाते जबकि 28 राज्यों में 23 राज्य और 2 केन्द्र शासित प्रदेश पुदुचेरी और दिल्ली के चुनाव अलग-अलग समय में होते हैं। One Nation, One Election</p>
<p style="text-align:justify;">खास यह भी है कि लोकसभा चुनाव के 6 महीने पहले छत्तीसगढ़, राजस्थान, मध्य प्रदेश और तेलंगाना का चुनाव होता है जो कि साल 2023 में होने जा रहा है और साल 2024 के अप्रैल-मई में लोकसभा का चुनाव होगा। इतना ही नहीं लोकसभा चुनाव के 6 महीने बाद महाराष्ट्र और हरियाणा का चुनाव होता है यदि इन राज्यों को लोकसभा के साथ जोड़कर चुनाव कराया जाए तब भी कम से कम ये छह राज्य एक चुनाव में आ सकते हैं और 5 पहले से हैं तो ऐसे में 11 राज्य लोकसभा के साथ चुनाव कराने में संवैधानिक कोई दिक्कत दिखती नहीं है। बस कुछ की विधानसभा पहले भंग करनी है, कुछ के लिए कुछ पेचीदगियों से निपटना है। One Nation, One Election</p>
<p style="text-align:justify;">देखा जाए तो अलग-अलग समय में चुनाव होना मतलब लोकसभा का एक बार जबकि विधानसभा का हर साल कोई न कोई चुनव रहता है। नतीजन मानव संसाधन और खजाना दोनों दबाव से गुजरते रहते हैं साथ ही चुनाव आयोग के लिए आदर्श चुनाव आचार संहिता भी चुनौती लिए रहती है। कहा जाए तो देश हमेशा चुनावी मोड में रहता है फलस्वरूप प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय भी निरंतरता लिए रहते हैं, प्रभावित भी होते हैं और खजाने पर भी भारी बोझ पड़ता है। इन्हीं सब कारणों के चलते लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ कराने का इरादा मजबूत होता दिख रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">बीते एक सितम्बर को मोदी सरकार ने वन नेशन, वन इलेक्शन को लेकर एक कदम और तब बढ़ा दिया जब विधि मंत्रालय ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित कर दी जिसमें सात अन्य सदस्य भी शामिल हैं। एक देश एक चुनाव की वकालत स्वयं प्रधानमंत्री मोदी 2020 में पहले ही कर चुके हैं। हालांकि साल 1983 में भारत निर्वाचन आयोग ने एक चुनाव कराने का प्रस्ताव दिया था जिसका जिक्र विधि आयोग की 1999 की रिपोर्ट में भी है। इसके पीछे सबसे बड़ा तर्क चुनावी खर्च को बचाने को माना जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">देखा जाए तो एक अरब चालीस करोड़ की जनसंख्या वाला भारत एक विकासशील देश है और महज तीन ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था से युक्त है। अशिक्षा, गरीबी, भुखमरी समेत कई ढांचागत विकास और समावेशी संदर्भ को अभी बहुत उठान देना है। ऐसे में बड़ी और बढ़ी हुई अर्थव्यवस्था बेफिजूल की खर्ची रोकने से भी सम्भव है। वन नेशन, वन इलेक्शन इस बचत को कुछ हद तक बढ़ावा दे सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">बानगी के तौर पर देखें 1951-52 के चुनाव में जहां 11 करोड़ रूपए खर्च हुए थे वहीं 2019 के लोकसभा चुनाव में यह आंकड़ा 60 हजार करोड़ की भारी-भरकम राशि के खर्च से भरा हुआ है। इसके अलावा 28 राज्यों और 2 केन्द्रशासित अर्थात दिल्ली और पुदुचेरी के विधानसभा चुनाव भी अलग-अलग खर्चों से पटे हैं। जाहिर है संरचनात्मक व तकनीकी तौर पर चुनाव आयोग को सशक्त करने के साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराना मशीनरी, समय और खजाना तीनों की सेहत के लिए ठीक हो सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दो टूक यह भी है कि वन नेशन, वन इलेक्शन कोई नई बात नहीं है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते थे। 1968 और 1969 में कई विधानसभाएं समय से पहले भंग हो गयी और लोकसभा भी समय से पहले 1970 में भंग हो गयी। फलस्वरूप वन नेशन, वन इलेक्शन की परम्परा यहीं से बिखर सी गयी। मगर एक सच यह है कि एक देश, एक चुनाव की राह आसान नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">1999 की विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट से यह स्पश्ट होता है कि हर साल और सत्र के बाहर चुनाव के चक्र को समाप्त किया जाना चाहिए और वापसी वहां पर करनी चाहिए जहां लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ होते हैं। 2015 की संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट में भी एक चुनाव करने की व्यावहारिकता पर अपनी राय मुखर की जिसमें समिति ने भारी खर्च, आचार संहिता को बनाए रखना, आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति पर प्रभाव और चुनाव के दौरान मानव शक्ति पर अतिरिक्त बोझ पड़ना आदि की पहचान की थी। 2018 की विधि आयोग की रिपोर्ट में एक साथ चुनाव एक बेहतर मसौदा था। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">इसमें कहा गया कि संविधान के मौजूदा ढांचे के तहत एक साथ चुनाव नहीं कराए जा सकते। संविधान, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 और लोकसभा व राज्य विधानसभाओं की प्रक्रिया के नियमों में उचित संशोधन के मामले में एक साथ चुनाव कराए जा सकते हैं। आयोग ने यह भी सुझाया था कि कम से कम 50 फीसद राज्यों को संवैधानिक संशोधनों की पुश्टि करनी चाहिए। वैसे सरकार बड़ी व्यवस्था होती है और संविधान उसी व्यवस्था को चलाने की एक सर्वोच्च विधि है। समय-समय पर संविधान में आवश्यकता और प्रासंगिकता को देखते हुए संशोधन किए जाते रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">फिलहाल लगभग लोकसभा चुनाव के मुहाने पर खड़े देश में एक साथ चुनाव की बात जोर ले चुकी है। मानसून सत्र के दौरान केन्द्रीय कानून मंत्री ने कहा था कि एक साथ चुनाव कराने के लिए संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करना होगा। एक साथ चुनाव के फायदे अनेक हैं मगर क्या इसका कोई नुकसान भी हो सकता है। ऐसा माना जा रहा है कि लोकसभा के चुनाव के अलग एजेण्डे होते हैं जबकि विधानसभा के चुनाव के लिए अलग चुनौतियां होती हैं। इसमें क्षेत्रीय दलों का नुकसान हो सकता है क्योंकि एक साथ चुनाव में दो अलग-अलग मुद्दे उठा पाना मुश्किल होगा। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">क्षेत्रीय दल के आभाव में राश्ट्रीय दल सरकार के तौर पर कम दबाव वाले हो सकते हैं जिसमें अंकुश और नियंत्रण प्रभावित हो सकता है। इतना ही नहीं लोकतंत्र को जनता का शासन कहा जाता है। देश में संसदीय प्रणाली में एक साथ चुनाव न होना कोई बड़ी बात नहीं है जिस खजाने में चुनावी खर्च की बात हो रही है वह देश में हुए अब तक के किसी घोटाले की तुलना में बहुत मामूली है। सरकारें साफ-सुथरी और भ्रश्टाचार पर लगाम लगाने वाली हों तो चुनावी खर्च के बावजूद भी विकास को गगनचुम्बी बनाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">साथ ही जन प्रतिनिधि जवादेह बने रहेंगे। पड़ताल बताती है कि दुनिया के कई देश साउथ अफ्रीका, स्वीडन व बेल्जियम आदि एक साथ चुनाव में होते हैं। कुछ देश तो संसद से लेकर नगरपालिका तक एक ही साथ चुनाव में रहते हैं। इसके अलावा जर्मनी, फिलिपीन्स, ब्राजील आदि जैसे देश भी एक साथ चुनाव में रहते हैं। संदर्भ निहित परिप्रेक्ष्य यह भी है कि यह एक संवैधानिक मुद्दा है और संवेदनशील भी है। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में संविधान की मूल भावना को ध्यान में रखते हुए ही एक साथ चुनाव वाली अवधारणा को जमीन पर उतारना उचित होगा। संविधानविद् और कानूनविद् तथा सरकार इसकी बारीकियों को ध्यान में रखते हुए इस कसौटी से पार पाएंगे इसकी सम्भावना दिखती है। बावजूद इसके इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वन नेशन, वन इलेक्शन की राह पूरी तरह समतलतो नहीं है। One Nation, One Election</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. सुशील कुमार सिंह, वरिष्ठ स्तंभकार एवं प्रशासनिक चिंतक </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="हमारे सैनिकों, निर्दोष नागरिकों के खून की हर बूंद का बदला लिया जाएगा:सिन्हा" href="http://10.0.0.122:1245/every-drop-of-blood-of-our-soldiers-innocent-civilians-will-be-avenged-sinha/">हमारे सैनिकों, निर्दोष नागरिकों के खून की हर बूंद का बदला लिया जाएगा:सिन्हा</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 18 Sep 2023 10:40:51 +0530</pubDate>
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                <title>समय की मांग है ‘एक देश-एक चुनाव’</title>
                                    <description><![CDATA[One Nation One Election:- अब जबकि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में ‘एक देश एक चुनाव’ पर विचार हेतु केंद्र सरकार ने एक समिति का गठन कर दिया है, तब यह मुद्दा बहुत विचारणीय हो गया है। स्वस्थ, टिकाऊ और विकसित लोकतंत्र वही होता है, जिसमें विविधता के लिए भरपूर जगह होती है, लेकिन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/the-need-of-the-hour-is-one-country-one-election/article-51936"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/one-nation-one-election.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">One Nation One Election:- अब जबकि पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में ‘एक देश एक चुनाव’ पर विचार हेतु केंद्र सरकार ने एक समिति का गठन कर दिया है, तब यह मुद्दा बहुत विचारणीय हो गया है। स्वस्थ, टिकाऊ और विकसित लोकतंत्र वही होता है, जिसमें विविधता के लिए भरपूर जगह होती है, लेकिन विरोधाभास नहीं होते। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भविष्योन्मुखी दृष्टि वाले नेतृत्व में विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत धीरे-धीरे इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है। ‘एक देश-एक टैक्स’ की सफलता ने इस बात को सही साबित किया है। अब तक देश के लगभग एक तिहाई राज्यों में लागू हो चुके ‘एक नेशन-एक राशन’ कार्यक्रम के ऐसे ही सकारात्मक परिणाम मिल रहे हैं। इसी प्रकार, एक देश-एक कानून (यूनिफॉर्म सिविल कोड) लागू किए जाने के विचार को भी जनता के एक विशाल वर्ग का अपार समर्थन मिल रहा है। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">‘एक देश-एक चुनाव’ लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं का चुनाव एक साथ करवाने का एक नीतिगत उपक्रम है। इसे समझने के लिए हमें चुनाव की प्रक्रिया को समझना होगा। हमारे देश में केंद्र और सभी राज्यों में, केंद्र शासित प्रदेशों को छोड़कर, जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें कार्य करती हैं। इनका कार्यकाल पांच वर्ष का होता है। ये कार्यकाल, किसी भी महीने पूरा हो सकता है। जब किसी निर्वाचित सरकार का पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा हो जाता है, तो उस राज्य में अथवा केंद्र में एक निर्धारित अवधि के अंदर नए चुनाव कराना आवश्यक होता है, ताकि वहां नई सरकार गठित की जा सके और देश और उस प्रदेश का काम फिर से सुचारू ढंग से चलना सुनिश्चित किया जा सके। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">चुनावों की प्रक्रिया को निर्बाध व निष्पक्ष ढंग से सम्पन्न कराने के लिए, काफी बड़े तंत्र व खर्च की आवश्यकता होती है। जितने ज्यादा चुनाव, उतनी ही ज्यादा व्यवस्था। 2023 को ही लें। इस साल राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, जम्मू-कश्मीर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम सहित देश के दस राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं (इनमें से कुछ राज्यों में इस साल चुनाव हो चुके हैं)। इनमें कितने समय, धन और व्यवस्था की जरूरत पड़ेगी, इसका अंदाजा लगाना कोई मुश्किल काम नहीं है। ऊपर से, इन चुनावों के खत्म होते-होते लोकसभा चुनावों की गहमागहमी शुरू हो जाएगी। अब सोचिए कि यदि इन राज्यों के और लोकसभा के चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था की जा सके तो देश का कितना समय और धन बचेगा। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">आज यदि हम देश के राजनीतिक परिदृश्य पर नजर डालें, तो पाएंगे कि हर वर्ष देश का कोई न कोई हिस्सा चुनावमय बना रहता है। लेकिन, शुरूआत में ऐसा नहीं था। देश के पहले आम चुनावों से लेकर अगले पंद्रह सालों तक, 1952, 1957, 1962, 1967 में चार बार लोकसभा चुनाव हुए और हर बार राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव भी इनके साथ-साथ ही करवाए गए। लेकिन, जब 1968-69 में अलग-अलग कारणों से कुछ राज्यों की विधानसभाएं उनका कार्यकाल खत्म होने से पहले ही भंग कर दी गर्इं, तो यह सिलसिला बाधित हो गया। यहां तक कि पहली बार लोकसभा चुनाव भी समय से पहले ही करवा लिए गए। चौथी लोकसभा का कार्यकाल 1972 तक था, लेकिन आम चुनाव इसके पूरा होने से पहले ही 1971 में करवा लिए गए। सच तो यह है कि ‘एक देश, एक चुनाव’ की अवधारणा काफी पुरानी है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस विषय पर संविधान समीक्षा आयोग, विधि आयोग, चुनाव आयोग और नीति आयोग जैसे प्रभावशाली संस्थानों की राय भी काफी सकारात्मक है। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मजबूत नेतृत्व में राजग सरकार, राष्ट्रहित में इस विचार को और अधिक लटकाए न रखकर एक ठोस व साकार रूप देना चाहती है। ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ के पीछे सबसे बड़ा उद्देश्य तो यही है कि राजकोष पर पड़ने वाला चुनाव खर्च के बोझ को कम से कम किया जाए, जो पिछले कुछ दशकों में लगातार बढ़ता ही गया है। इसके अलावा थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद होने वाले चुनावों के दौरान आचार संहिता लागू हो जाने से बहुत सारे विकास कार्य और जनहित कार्यक्रम बाधित होते हैं, इससे भी बचा जा सकेगा। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">यदि हम खर्च की ही बात करें तो पिछले पैटर्न की बात करें तो पहले आम चुनावों से लेकर पिछले आम चुनावों तक उम्मीदवारों की संख्या करीब पांच गुना बढ़ी है, लेकिन चुनावों पर आने वाला खर्च पांच हजार गुना से भी ज्यादा हो गया है। 1951-52 में जब पहले लोकसभा चुनाव हुए थे, तो इनमें 53 राजनीतिक दल चुनावी समर में उतरे थे। इन चुनावों में 1874 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और खर्च आया कुल 11 करोड़ रुपए। अब 2019 के लोकसभा चुनावों को देखते हैं। इनमें कुल 9000 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा और खर्च था लगभग 60 हजार करोड़ रुपए। यानि हर लोकसभा क्षेत्र पर औसतन 110 करोड़ का खर्च। जबकि 2014 के आम चुनावों पर इसका आधा ही यानी लगभग 30 हजार करोड़ रुपए खर्च आया था। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">अब देश में विधानसभा सीटों की बात करते हैं। सभी राज्यों में कुल मिलाकर विधानसभा की चार हजार से अधिक सीटें हैं। मोटे-मोटे तौर पर एक लोकसभा क्षेत्र में करीब आठ विधानसभा सीटें आती हैं। यदि हम 2019 के आम चुनावों के खर्च को विधानसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्य में देखें, तो यह लगभग 15 करोड़ रुपए प्रति विधानसभा सीट बैठता है। मान लीजिए कि एक लोकसभा सीट और उसके अंतर्गत आने वाली आठ विधानसभा सीटों के लिए दो अलग-अलग समय पर चुनाव होते हैं। ऐसे में यह खर्च दोगुना हो जाएगा। लेकिन, यदि हम इन्हीं चुनावों को एक साथ करवाएं तो इस खर्च को काफी हद तक कम किया जा सकता है। इससे जो धन राशि बचेगी, उसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण, पेयजल की उपलब्धता सुनिश्चित कराने जैसे कार्यों में किया जा सकता है, जिससे लोगों के जीवन स्तर में सुधार आएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">केवल खर्च ही नहीं, बल्कि अन्य कई दृष्टि से भी ‘एक देश एक चुनाव’ का विचार काफी फायदेमंद है। इसमें प्रशासनिक तंत्र और सुरक्षा बलों पर बार-बार पड़ने वाला बोझ कम होगा, जिससे वे चुनावी गतिविधियों से बचा समय दूसरे उपयोगी कार्यों को दे सकते हैं। मतदाता सरकार की नीतियों को केंद्र व राज्य दोनों स्तर पर परख सकेंगे। बार-बार चुनाव होते रहने से शासन-प्रशासन के कार्यों में जो बाधाएं आती हैं, उनसे बचा जा सकेगा। साथ ही एक निश्चित अंतराल के बाद चुनाव कराए जाएंगे तो जनता को भी राहत मिलेगी और राजनीतिक दलों, चुनाव आयोग, चुनावों में सुरक्षा व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों को इनकी तैयारी के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि भारत जैसे विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में इस राह में बहुत सारी चुनौतियां भी सामने आ सकती हैं। इनमें सबसे बड़ी समस्या तो लोकसभा और विधानसभाओं के कार्यकाल के बीच सामंजस्य स्थापित करने की है। यदि हम 2024 के आम चुनावों को ही लें तो देश के करीब आधे राज्यों की विधानसभाएं इन चुनावों के दौरान ऐसी होंगी, जिन्होंने अपना आधा कार्यकाल भी पूरा नहीं किया होगा। ऐसे में उन्हें बीच में भंग कर नए चुनाव कराना बहुत सारे राजनीतिक विवादों का सबब बन सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">मान लीजिए कि राजनीतिक दल आपसी सहमति से इसके लिए तैयार भी हो जाते हैं, तो इस विचार को व्यावहारिक धरातल पर उतारने के लिए कई विधानसभाओं के कार्यकाल को घटाना पड़ेगा और कई के कार्यकाल को बढ़ाना होगा। इसके लिए संविधान में अनेक संशोधनों की आवश्यकता होगी। दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया, जर्मनी, स्पेन, हंगरी, स्लोवेनिया, अल्बानिया, पोलैंड, बेल्जियम जैसे दुनिया के कई ये देश हैं, जो केंद्र और राज्यों के चुनाव एक साथ ही कराते हैं, ताकि उनके विकास की गति बाधित न हो। भारत इन देशों के अनुभवों का लाभ उठा सकता है।                                                                                      <strong>प्रो. संजय द्विवेदी, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="कनाडा के वैंकूवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर दो विमानों में टक्कर" href="http://10.0.0.122:1245/two-planes-collide-at-vancouver-international-airport-canada/">कनाडा के वैंकूवर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर दो विमानों में टक्कर</a></p>
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                                                            <category>विचार</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 Sep 2023 13:51:08 +0530</pubDate>
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                <title>एक राष्ट्र एक चुनाव संदेह को बढ़ावा देने वाला: स्टालिन</title>
                                    <description><![CDATA[चेन्नई (एजेंसी)। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन (M. K. Stalin) ने रविवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार के ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ पर जोर देने की लोचना करते हुए इसे संदेह को बढ़ावा देने वाला बताया। स्टालिन ने कहा यह संघवाद को कमजोर करने का एक जबरदस्त प्रयास है, यह […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/one-nation-one-election-promoting-doubt-stalin/article-51924"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/modi-one-nation1.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>चेन्नई (एजेंसी)।</strong> तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन (M. K. Stalin) ने रविवार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार के ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ पर जोर देने की लोचना करते हुए इसे संदेह को बढ़ावा देने वाला बताया। स्टालिन ने कहा यह संघवाद को कमजोर करने का एक जबरदस्त प्रयास है, यह लोकतंत्र नहीं बल्कि तानाशाही का नुस्खा है। उन्होंने यहां एक पार्टी पदाधिकारी के विवाह समारोह में कहा कि केंद्र की भाजपा सरकार का ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ पर जोर देना हमारे संघीय ढांचे को कमजोर करने का एक जबरदस्त प्रयास है।’ उन्होंने कहा, ‘यह केंद्रीकृत शक्ति की ओर एक कदम है जो राज्यों के संघ, भारत के सार के खिलाफ है।’ One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">स्टालिन ने बाद में एक सोशल मीडिया पोस्ट में कहा, यह अचानक घोषणा और उसके बाद पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द की अध्यक्षता में उच्च-स्तरीय समिति का गठन केवल संदेह को बढ़ावा देता है। ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ तानाशाही का नुस्खा है, लोकतंत्र का नहीं।’ उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग शासन पर तीखा हमला करते हुए कहा कि ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ लाने का विचार महज एक साजिश है और यह लोकतंत्र नहीं बल्कि तानाशाही है जिसका सामना आज देश कर रहा है। उन्होंने कहा, ‘पीएम मोदी ‘एक देश, एक चुनाव’ की साजिश रच रहे हैं। Chennai News</p>
<p style="text-align:justify;">द्रमुक के सुप्रीमो ने विपक्षी महागठबंधन ‘इंडिया गठबंधन’ पर कहा कि भाजपा इससे डरी हुई है। यह देश के संघीय ढांचे की रक्षा के लिए भाजपा को सत्ता से बाहर करने के मुख्य लक्ष्य के साथ बना है। उन्होंने कहा, ‘केंद्र ने पूर्व राष्ट्रपति को टीम का प्रमुख बनाया है। भले ही वह पूर्व राष्ट्रपति हैं, लेकिन उन्हें राजनीति से दूर रहना चाहिए। एक ऐसी टीम बनाई गई है जो भाजपा की आवाज पर चलती है। यह तानाशाही है। स्टालिन ने कहा, इंडिया गठबंधन की ‘मुंबई में आखिरी बैठक में, हमने विभिन्न टीमों का गठन किया। भाजपा ऐसी चीजों को देखकर डर गई है। अब सरकार ने संसद सत्र बुलाया है और समय से पहले चुनाव कराने की कोशिश की जा रही है। One Nation One Election</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="बीपीएल कार्ड व फैमिली आईडी पर आया बड़ा अपडेट" href="http://10.0.0.122:1245/government-should-remove-the-problems-coming-in-bpl-card-and-family-id-sandeep-garg/">बीपीएल कार्ड व फैमिली आईडी पर आया बड़ा अपडेट</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 04 Sep 2023 10:49:36 +0530</pubDate>
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                <title>एक देश, एक चुनाव : माना जा रहा बड़ा फैसला</title>
                                    <description><![CDATA[One Nation One Election: केंद्र सरकार ने 18 सितंबर से संसद में विशेष सत्र बुलाया है। इस घटना की गंभीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि सभी दलों में आंतरिक विचार-विमर्श जारी है। चर्चा के मुताबिक ही सरकार ने एक देश-एक चुनाव पर चर्चा के लिए संसदीय समिति का गठन किया […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/one-nation-one-election-considered-a-big-decision/article-51839"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/modi-one-nation.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">One Nation One Election: केंद्र सरकार ने 18 सितंबर से संसद में विशेष सत्र बुलाया है। इस घटना की गंभीरता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि सभी दलों में आंतरिक विचार-विमर्श जारी है। चर्चा के मुताबिक ही सरकार ने एक देश-एक चुनाव पर चर्चा के लिए संसदीय समिति का गठन किया है। विपक्षी दल इस कमेटी पर हैरानी व्यक्त रहे हैं, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि सत्र में इस पर कार्रवाई होगी या नहीं। राजनीतिक गलियारों में विशेष सत्र को किसी बड़े फैसले के रुप में माना जा रहा है। जहां तक ​​लोकसभा और विधानसभा चुनाव का सवाल है, तो यह मामला पुराना है। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा 1970 से पूर्व होता रहा है। भारत विश्व का सबसे बड़ा व मजबूत लोकतंत्र है, जहां लगभग एक अरब मतदाता हैं। चुनाव लोकतंत्र की आत्मा हैं। चुनाव का विषय सुधार का विषय हैं, यदि चुनाव एक साथ कराए जाएं तो इसके कई फायदे हो सकते हैं। अरबों रुपये के खर्च को बचाया जा सकता है। फिर भी इस विचार पर आपत्तियां भी उचित हो सकती हैं। यदि संपूर्ण चर्चा के बाद बिल पेश किया जाता है तो इससे देशों को लाभ हो सकता है। चुनाव प्रक्रिया में सुधार होना अति आवश्यक है, लेकिन इस निर्णय के पीछे मंशा क्या है, यह भी साफ होना चाहिए। One Nation One Election</p>
<p style="text-align:justify;">नि:संदेह देश को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए फिजूलखर्ची को कम करना होगा अन्यथा हमारा देश चुनावों का देश बनकर रह जाएगा। कभी लोकसभा चुनाव आते हैं, कभी विधानसभा, पंचायत, कभी शहरी, कभी उपचुनाव। देश की पहले लोकसभा चुनाव केवल दस करोड़ खर्च पर हुए थे। 2019 में यह खर्च बढ़कर आठ अरब को पार कर गया। एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी व गैर-सरकारी खर्चों को जोड़ा जाए तो यह खर्च 60 हजार करोड़ के करीब पहुंच जाता है। यदि चुनाव का आधा खर्च भी बचा लिया जाए तो देश के हजारों स्कूलों, अस्पतालों, सड़कों, पुलों की तस्वीर बदल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">विशेष रूप से दुर्गम पहाड़ी और रेगिस्तानी क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की तैनाती और स्टाफ की तैनाती बहुत मुश्किल होती है। यदि यह निर्णय किसी राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर लिए जाएं तो अवश्य सुधार दिखेगा। बदलाव प्रकृति का हिस्सा है, फिर भी लोकतंत्र में असहमति और विरोध को भी स्थान दिया गया है। बेहतर होगा यदि सरकार व विपक्ष देश हित में बड़े निर्णयों के संबंध में सकारात्मक एवं जिम्मेदार व्यवहार का प्रमाण दें। One Nation One Election</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="जानें ‘One Nation’, ‘One Election’ से क्या होगा फायदा, पहली बार कब हुआ ‘एक देश एक चुनाव’" href="http://10.0.0.122:1245/one-nation-one-election-news/">जानें ‘One Nation’, ‘One Election’ से क्या होगा फायदा, पहली बार कब हुआ</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 02 Sep 2023 10:32:39 +0530</pubDate>
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                <title>जानें &amp;#8216;One Nation&amp;#8217;, &amp;#8216;One Election&amp;#8217; से क्या होगा फायदा, पहली बार कब हुआ &amp;#8216;एक देश एक चुनाव&amp;#8217;</title>
                                    <description><![CDATA[One Nation One Election News:देश में एक ही चुनाव कराने को लेकर केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। यानी केंद्र सरकार ने ‘वन नेशन’ , ‘वन इलेक्शन’ को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में समिति का गठन किया है। दरअसल रामनाथ कोविंद को इस समिति का अध्यक्ष […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/one-nation-one-election-news/article-51821"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/one-nation-one-election-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">One Nation One Election News:देश में एक ही चुनाव कराने को लेकर केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। यानी केंद्र सरकार ने ‘वन नेशन’ , ‘वन इलेक्शन’ को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में समिति का गठन किया है। दरअसल रामनाथ कोविंद को इस समिति का अध्यक्ष बनाया गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह समिति इस मुद्दे पर विचार करने के बाद अपने रिपोर्ट सौंपेगी और इसके बाद ही यह तय होगा कि आने वाले समय में क्या सरकार लोकसभा चुनाव के साथ ही सभी राज्य में विधानसभा के चुनाव कराने की तैयारी करेगी या नहीं। वहीं पिछले कई सालों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी विधानसभा और आम चुनाव को एक साथ करने के विचार पर जोर दे रहे हैं। लेकिन ऐसा करना आसान नहीं होगा लेकिन ऐसा क्यों चलिए और अगर ऐसा हो गया तो इसके क्या फायदे होंगे। ‌</p>
<p style="text-align:justify;">वन नेशन वन इलेक्शन को लागू करने में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है इसे लागूं करने में सबसे पहले संविधान में संशोधन करना होगा। लोकसभा का कार्यकाल या तो बढ़ाना होगा या फिर समय से पहले इसे खत्म करना होगा, इतना ही नहीं कुछ विधानसभा का कार्यकाल बढ़ाना भी पड़ सकता है, जबकि कुछ विधानसभा का कार्यकाल समय से पहले खत्म करना होगा। इसे लागू करने से पहले सभी दलों में आम राय बनाना जरूरी है, हालांकि एक देश एक चुनाव को लेकर चुनाव आयोग पहले ही कह चुका है कि वह इसके लिए तैयार है। वहीं खास बात यह है कि अगर देश में एक चुनाव को लागू भी किया जाता है तो पंचायत और नगर पालिकाओं के चुनाव इसके तहत नहीं कराएं जा सकते। ऐसा इसलिए भी क्योंकि यह राज्य के विषय है।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/khansi-phlegm-ilaj/">Khansi/Phlegm Ilaj: खांसी या कफ से सिर दर्द का क्या है कनेक्शन जानें, ऐसे में क्या लेना चाहिए एक्शन?</a></p>
<h3 style="text-align:justify;">क्या देश में पहली बार है ‘वन नेशन’ , ‘वन इलेक्शन’? One Nation One Election</h3>
<p style="text-align:justify;">अगर केंद्र सरकार देश में एक देश एक चुनाव को लागू करती है तो यह कोई पहली बार नहीं होगा जब इस तरह देश में चुनाव कराए जाएंगे। इससे पहले भी वर्ष 1952, 1957, 1962 1967 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जा चुके हैं। 1968 और 1969 में कई विधानसभा समय से पहले भांग भी की गई है वही 1970 में लोकसभा को समय से पहले भंग किया गया था 1970 के बाद ही ‘एक देश, एक चुनाव की परंपरा खत्म हो गई थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">एक देश एक चुनाव से क्या फायदा होगा? One Nation One Election</h3>
<p style="text-align:justify;">अगर देश में एक देश एक चुनाव की परंपरा लागू हो जाए तो इससे चुनाव में पैसों की बर्बादी बचेगी, साथ ही राज्यों के मुताबिक बार-बार चुनाव कराने की चुनौती से भी मुक्ति मिलेगी। जानकारी के मुताबिक ऐसा करने से चुनाव में इस्तेमाल होने वाले काले धन पर भी लगाम लगाया जा सकता है, साथ ही साथ सरकारी संसाधनों का उपयोग सीमित होगा और इससे देश में विकास कार्यों की रफ्तार पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा।</p>
<h3 style="text-align:justify;">‘एक देश एक चुनाव’ को लागू करने में आएगी ये चुनौती | One Nation One Election</h3>
<p style="text-align:justify;">जानकारी के अनुसार ‘एक देश एक चुनाव’ को लागू करने से केंद्र में बैठी सरकार के दल को फायदा संभव है। ऐसा हुआ तो जिस दल की केंद्र में सरकार है वो ही अन्य राज्यों में भी सरकार बन सकती है।वहीं इस परंपरा के शुरू होने से छोटे दलों को नुकसान भी हो सकता है, साथ ही इसके लागूं होने के बाद चुनावी नतीजों में भी देरी हो सकती है।</p>
<blockquote class="wp-embedded-content"><p><a href="http://10.0.0.122:1245/coconut-oil-and-aloe-vera/">Coconut Oil And Aloe Vera: जब एलोवेरा जेल और नारियल तेल के फायदे हैं बेमिसाल फिर केमिकल युक्त प्रोडक्ट्स का क्यों करना है इस्तेमाल?</a></p></blockquote>
<p><iframe class="wp-embedded-content" title="“Coconut Oil And Aloe Vera: जब एलोवेरा जेल और नारियल तेल के फायदे हैं बेमिसाल फिर केमिकल युक्त प्रोडक्ट्स का क्यों करना है इस्तेमाल?” — Sach kahoon - Best Online Hindi News" src="http://10.0.0.122:1245/coconut-oil-and-aloe-vera/embed/#?secret=7T9Nfkn1SC%23?secret=bPWyrzEJnU" width="500" height="282" frameborder="0"></iframe></p>
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                <pubDate>Fri, 01 Sep 2023 13:58:07 +0530</pubDate>
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