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                <title>Delhi G20 Summit - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Delhi G20 Summit RSS Feed</description>
                
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                <title>G20 Summit: बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की आवाज बनेगा जी-20</title>
                                    <description><![CDATA[G20 Summit: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (UNSC) में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व और सदस्यता में वृद्धि का मुद्दा एक अंतराल के बाद पुन: चर्चा में आ गया है। जी-20 की दिल्ली शिखर बैठक से पहले और उसके बाद यूएनएससी के भीतर सुधारों को लेकर जिस तरह से वैश्विक नेताओं की प्रतिक्रिया आ रही है, उससे लगता है […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/g-twenty-will-become-the-voice-of-reform-in-multilateral-institutions/article-52277"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/g20.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">G20 Summit: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (UNSC) में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व और सदस्यता में वृद्धि का मुद्दा एक अंतराल के बाद पुन: चर्चा में आ गया है। जी-20 की दिल्ली शिखर बैठक से पहले और उसके बाद यूएनएससी के भीतर सुधारों को लेकर जिस तरह से वैश्विक नेताओं की प्रतिक्रिया आ रही है, उससे लगता है वर्ल्ड लीडर इसे लेकर गंभीर है। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">जी-20 समिट में शामिल होने के लिए नई दिल्ली आए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पीएम मोदी के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक के दौरान कहा कि ग्लोबल गवर्नेस में ज्यादा लोगों की साझेदारी और प्रतिनिधित्व होना चाहिए। हम यूएनएससी में भारत को परमानेंट मेंबर बनाए जाने का समर्थन करते हैं। बैठक से पहले यूएन चीफ एंटोनियो गुटरेस ने भी कहा कि यूएनएससी की मेंबरशिप का फैसला उनके हाथ में नहीं है, लेकिन वो चाहते हैं कि यूएनएससी में सुधार हो और इसमें भारत भी शामिल हो। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">और अब बैठक के बाद जिस तरह से पाकिस्तान के खास मित्र तुर्किये ने भारत का समर्थन किया है, उससे मामले की गंभीरता को समझा जा सकता हैै। तुर्किये के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन ने कहा कि अगर भारत जैसा देश यूएनएससी का स्थायी सदस्य बनता है, तो तुर्किये को गर्व होगा। दुनिया पांच से भी बड़ी है। हम सुरक्षा परिषद में सिर्फ इन पांच को नहीं रखना चाहते है। G20 Summit</p>
<h3>भारत लंबे समय से यूएनएससी की परमानेंट सीट के लिए दावा कर रहा है</h3>
<p style="text-align:justify;">पिछले डेढ-दो दशकों से इस बात की चर्चा लगातार बल पकड़ रही है कि संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में कई बहुपक्षीय संस्थान बदलते हुए भू-राजनीतिक परिदृश्य में तालमेल बैठाने में असफल हुए हैं। ये संस्थान बड़ी शक्तियों के बीच आम सहमति विकसित करने और संघर्ष को रोकने में विफल रहे है। ऐसी ही एक संस्था संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिष्द अर्थात यूएनएससी है। ग्लोबल पर्सपेक्टिव में इस स्पेस को भरने के लिए हाल के दौर में कई वैकल्पि समूहों का उभार हुआ है। इनमें से कई ऐसे समूह है, जिनमें भारत न केवल शामिल है, बल्कि अहम भूमिका में है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब चूंकि, जी-20 शिखर बैठक की मेजबानी भारत के पास थी, और भारत लंबे समय से यूएनएससी की परमानेंट सीट के लिए दावा कर रहा है। भारत के अलावा, ब्राजील, जर्मनी और जापान भी स्थायी सदस्यता का दावा कर रहे हैं, लेकिन ‘कॉफी क्लब‘ (यूएनएससी में सुधार का विरोध करने वाले राष्ट्रों का अनौपचारिक समूह) के अड़ियल रूख के कारण इन देशों को परमानेंट सीट नहीं मिल पा रही है। ऐसे में यह पहले से ही तय था कि दिल्ली शिखर बैठक के दौरान भारत इस मुद्दे को प्रमुखता के साथ उठाएगा। भारत ने ऐसा किया भी।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, 1945 में जिस समय संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी उस समय संयुक्त राष्ट्र में 51 और सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी और छह निर्वाचित अस्थायी कुल 11 सदस्य थे। साल 1965 में महासभा ने संकल्प 1991 पारित कर चार्टर में संशोधन करते हुए अस्थायी सदस्यों की संख्या 6 से बढ़ाकर 10 कर दी और सदस्य देशों को भौगालिक आधार पर प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान किया गया। ये बदलाव एक सीमा तक तो उपयोगी साबित हुआ लेकिन पी-5 (पांच परमानेंट सदस्य) की वीटो पावर में संशोधन न किए जाने के कारण सुधार की पूरी कवायद बेकार हो गई ।</p>
<h3>संयुक्त राष्ट्र 1945 में बनाया गया एक ‘फ्रोजेन मैकेनिज्म‘ बन कर रह गया</h3>
<p style="text-align:justify;">यूएनएससी में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व का सवाल और सदस्यता में वृद्धि का मुद्दा यूएन की वार्षिक बैठकों में हमेशा उठता रहा है। भारत सहित दुनिया के कई अन्य देश इस बात की मांग करते आए हैं कि बदलती वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप यूएनएससी में सुधार कर भारत, ब्राजील, जापान और जर्मनी को स्थायी सदस्य बनाया जाए। लेकिन महासभा आज तक किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पायी है। इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले छह दशकों से चार्टर में सुधार को लेकर कोई कदम नहीं उठाया जा सका है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी वॉयस आॅफ द ग्लोबल साउथ समिट में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र 1945 में बनाया गया एक ‘फ्रोजेन मैकेनिज्म‘ बन कर रह गया है। एस. जयशंकर ने तो यहां तक कह दिया है कि यूएनएससी पांच लोगों की तरह है, जो ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठे हैं, और नहीं चाहते कि अन्य लोग उसमें प्रवेश करें। उन्होंने टिकट की कीमत बढ़ाने और अन्य प्रतिबंध जैसी बाधाएं डाल दी है। सच तो यह है कि यूएन में सुधार की भारत की मांग को यूएनएससी की स्थायी सदस्यता पाने की आकांक्षा से जोड़कर देखा जाता रहा है। इसका परिणाम यह हुआ कि अलग-अलग मौकों पर विभिन्न देश संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता दिलाने में भारत को समर्थन का आश्वासन तो देते रहे है, लेकिन वे इस मसले पर गंभीर नहीं हुए है। G20 Summit</p>
<h3>आज भारत 1945 वाला भारत नहीं है | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">जहां तक यूएनएससी में भारत की स्थायी सदस्यता का सवाल है, मैं समझता हूं भारत को इस मामले में ज्यादा लामबंदी की जरूरत नहीं है। क्योंकि आज जहां भारत खड़ा है, वहां उसे यूएनएससी की नहीं बल्कि यूएनएससी को भारत की जरूरत होनी चाहिए। आज भारत 1945 वाला भारत नहीं है। आज वह दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करता हैं। अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी ताकत और चांद के दक्षिणी धू्रव पर पहलकदमी करने वाला पहला देश बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को गंभीरता से लिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सार्क, आसियान, बिम्सटेक, एससीओ, ईब्सा, ब्रिक्स, क्वाड, जी-20 जैसे संगठन वर्तमान वैश्विक व्यवस्था को किसी न किसी रूप में प्रभावित करते हैं, भारत इन संगठनों में अहम भूमिका में है। ऐसे में यूएनएससी की परमानेंट सीट पर भारत का होने का मतलब यूएनएससी के सम्मान में वृद्धि होना है। दूसरा, जिस तरह से पूरी यूएनएससी पर पी-5 देशों का नियंत्रण है, उसे देखते हुए भी भारत जैसे बड़े देश के लिए यह आकर्षण का कोई खास केन्द्र नहीं होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">जब तक यूएन चार्टर में परिवर्तन कर वीटो प्रक्रिया को वोटिंग प्रकिया में नहीं बदला जाता तब तक सुरक्षा परिषद् से उसकी वास्तविक भूमिका की उम्मीद नहीं की जा सकती है। यूके्रन युद्ध ने इस अंतरराष्ट्रीय संस्था की बढ़ती हुई अप्रासंगिकता को एक झटके में उजागर कर दिया। पूरी दुनिया गवाह है कि कैसे यूएनएससी के एक परमानेंट मैम्बर (रूस) ने अपने पड़ोसी देश पर आक्रमण किया उसकी क्षेत्रीय अखंडता से खिलवाड़ किया और दुनिया की ‘पुलिस मैन’ कहलाने वाली संस्था मूकदर्शक बनी रही। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">संक्षेप में कहें तो बहुधु्रवीय विश्व व्यवस्था में आज भी कुछ देश इस मुगालते में हैं कि दुनिया उनकी जेब में है, और वे इसको जैसे चाहे चला सकते हैं। लेकिन अब जी-20 के नए अध्यक्ष ब्राजील ने यूएनएससी में सुधार को लेकर किसी रोडमैप तक पहुंचने की बात कही है, उसे देखते हुए लगता है कि निकट भविष्य में शायद यूएनएससी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप व्यवहार करती दिखे। G20 Summit</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. एन.के. सोमानी, अंतर्राष्टÑीय मामलों के जानकार </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 13 Sep 2023 15:28:04 +0530</pubDate>
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                <title>G20 Summit: जी-20 का नेतृत्व एवं भारत के समक्ष चुनौतियां</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/leadership-of-g-twenty-and-challenges-before-india/article-52187"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/g-20.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">G20 Summit: जी-20 वैश्विक अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा तय करने वाला दुनिया की बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। यह वैश्विक स्तर पर आर्थिक मामलों को समझने और परस्पर सहयोग करने में बड़ी भूमिका निभाता है। दुनिया के राजनीतिक और आर्थिक मुद्दों पर विचार-विमर्श करना इसके एजेंडे का अहम बिन्दू है। यह विश्व की दो-तिहाई से अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। विश्व के कुल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 80 फीसदी भागीदारी अकेले जी-20 देशों की रहती है। विश्व की 65 प्रतिशत से अधिक आबादी वाले इस संगठन की इस साल भारत अध्यक्षता कर रहा है। G20 Summit</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>जी-20 का इतिहास | G20 Summit </strong></h3>
<p style="text-align:justify;">जी-20 की स्थापना का विचार 90 के दशक में उस वक्त अस्तित्व में आया जब दुनिया के अलग-अलग कोनों में स्थित विकसित और विकासशील देश आर्थिक एवं वित्तीय रूप से विभिन्न समस्याओं का सामना कर रहे थे। पूंजीवादी प्रभाव से उत्पन्न होने वाली समस्याओं के सामूहिक निराकरण की राह तलाशने के उदेश्य को लेकर जी-20 अस्तित्व में आया। समूह की स्थापना की परिकल्पना वर्ष 1999 के वैश्विक मंदी से निबटने के उपायों के लिए जी-7 देशों कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान, यूनाइटेट किंग्डम और संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा की गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">1998 में इस समूह में रूस भी जुड़ गया था और समूह का नाम जी- 7 से जी-8 हो गया। वर्ष 1999 में जर्मनी के कोलोन में जी-8 देशों की बैठक हुई इसमें एशिया के आर्थिक संकट पर चर्चा हुई इसके बाद दुनिया के बीस शक्तिशाली अर्थव्यवस्था वाले देशों को एक मंच पर लाने का फैसला किया गया। अत: 25 सिंतबर, 1999 को औपचारिक रूप से अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डीसी में जी-20 की स्थापना की गई। आगे चलकर जी-8 को राजनीतिक और जी-20 को आर्थिक मंच के रूप में स्वीकार किया गया। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">प्रांरभ में जी-20 केवल सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों के वार्षिक सम्मेलनों तक सीमित था। लेकिन जब 2008 की वैश्विक मंदी ने यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्था को अपनी चपेट में लिया तो सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्क्ष्ज्ञ स्वयं इस संगठन के वार्षिक सम्मेलनों में उपस्थित होकर आर्थिक मुददों पर चर्चा करने लगे। राष्ट्राध्यक्ष और शासनाध्यक्षों की उपस्थिति के कारण 2008 के बाद जी-20 और अधिक प्रासंगिक हो गया। वर्ष 2014 में क्रीमिया पर कब्जा कर लेने के कारण रूस को इस समूह से बाहर कर दिया गया। क्रीमिया पर कब्जे की घटना के बाद जी-20 की राजनीतिक इकाई अर्थात जी-8 पुन: जी-7 में बदल गया।</p>
<p style="text-align:justify;">आरंभ में जी-20 का एक मात्र उदेश्य केवल मध्यम आय वाले देशों की वित्तीय स्थिति को सुरक्षित करना था। लेकिन बाद में इसके एजेंडे में जलवायु परिवर्तन, सतत विकास, स्वास्थ्य, कृषि, ऊर्जा, पर्यावरण, भ्रष्टाचार विरोध और अन्य वैश्विक चुनौतियां के समाधान को भी शामिल कर लिया गया। हालांकि, अभी तक इसका कोई स्थायी मुख्यालय नहीं है। ऐसे में प्रतिवर्ष जिस देश द्वारा जी-20 शिखर बैठक की अध्यक्षता की जाती है, वही देश अनौपचारिक रूप से इसके मुख्यालय का काम करता है। जहां तक समूह की अध्यक्षता का सवाल है, तो अध्यक्षता का निर्धारण प्रत्येक वर्ष सदस्य देश रोटेशन पद्धति के आधार पर करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कौन-कौन से देश शामिल है: आॅस्ट्रेलिया, चीन, ब्राजिल, कोरिया गणराज्य, फ्रांस, जर्मनी, सउदी अरब, रूस, टर्की, यूनाइटेड किंगडम, अर्जेंटीना, कनाडा, जापान, संयुक्त राज्य अमेरिका, इटली, भारत, मेक्सिको, दक्षिण अफ्रीका व यूरोपीय संघ शामिल हैं। अब भारत के प्रस्ताव से इस संगठन में अफ्रीकन यूनियन भी स्थायी सदस्य के रूप में शामिल हो गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">जी-20 की कार्यप्रणाली और उद्धेश्य: जी-20 की कार्यप्रणाली को दो भागों में विभाजित किया गया है। प्रथम, वित्त ट्रैक और द्वितीय शेरपा ट्रैक। वित्त ट्रैक में सदस्य देशों के वित्त मंत्रियों और केद्रीय बैंक के गवर्नरों द्वारा वित्तीय मामलों को लेकर विचार-विमर्श और संवाद किया जाता है, जबकि शेरपा ट्रैक के अंतर्गत नेताओं के निजी दूत राजनीतिक मुद्दों पर बातचीत करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक जी-20 के उद्धेश्यों की बात है जी-20 समूह से जुड़े देश वित्तीय नियमों को बढावा देने और भविष्य के वित्तीय संकटों को रोकने की दिशा में भी प्रयासरत रहते हैं। समूह आर्थिक ढांचे के विकास हेतू तो कार्य करता ही है, साथ ही ग्लोबल परिस्थितियों में आने वाले बदलावों पर भी नजर रखता है। इसके अंतर्गत कृषि, रोेजगार, ऊर्जा, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, वैश्विक खाद्य सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुददों पर विश्व समुदाय को साथ लेकर काम करता है।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>जी-20 की अध्यक्षता और भारत</strong>  | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">भारत की विदेश नीति हालिया दौर में वैश्विक मंच पर नेतृतव के तौर पर विकसित हुई है। इसी कड़ी में 1 दिसंबर, 2022 से भारत जी-20 का नेतृत्व ( अध्यक्षता) कर रहा है। भारत द्वारा तैयार किया गया जी-20 लॉगो भी समूह के प्रति भारत की सोच को प्रदर्शित करता है। भारत द्वारा डिजायन किया गया जी-20 लॉगो भारत के राष्ट्रीय घ्वज के रंगों केसरिया, सफेद, हरे समेत नीले रंग से भी प्रेरित है। यह लॉगो भारत के राष्ट्रीय फूल कमल के साथ पृथ्वी ग्रह की तुलना करता है। जो प्रतिकुल परिस्थितियों में भी विकास का प्रतिनिधित्व करता है। अध्यक्षता के दौरान भारत के छोटे-बड़े शहरों में 200 से अधिक बैठकों का आयोजन किया गया था।</p>
<h3 style="text-align:justify;"><strong>भारत के समक्ष चुनौतियां</strong></h3>
<p style="text-align:justify;">यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद दुनिया दो भागों में बंट गई है। रूस को जी-20 से बहार करने की मांग भी पश्चिमी देशों द्वारा की जा रही है। अहम बात यह है कि भारत के पश्चिमी देशों और रूस दोनों के साथ घनिष्ठ संबंध है। जहां एक और वह पश्चिमी प्रतिबंधों के बावजूद रूस से तेल का आयात जारी रखे हुए है, वहीं दूसरी और भारत लगातार रूस से शांतिपूर्ण समाधान की बात कर रहा है। ऐसे में भारत को न केवल जी-20 को बचाना होगा बल्कि समूह के बहुआयामी एजेंडे की विविध क्षेत्रों में बहुपक्षीय सहयोग भी कायम करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके अलावा विभाजित दुनिया में 20 बड़े नेताओं को सामूहिक घोषणा पत्र के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के लिए राजी करना भी सरल कार्य नहीं रहने वाला है। बाली शिखर बैठक के दौरान ऐसा हो चुका है। जहां राष्ट्रपति जोको विडोडी ने संयुक्त घोषणा पत्र पर सहमति के लिए अपने देश की राजनीतिक पूंजी को दाव पर लगा दिया था। ऐसे में भारत को सभी मतभेदों के समाधान तलाशने होंगे और वैश्विक शांति के लिए विभिन्न विचारधाराओं के बीच सेतुओं का निर्माण करना होगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>क्या रहेगा भारत का विजन:</strong> जहां तक भारत के विजन का सवाल है तो भारत को इस अठारवें शिखर सम्मेलन में अपने आधार वाक्य एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य पर धैर्य और गंभीरता से के साथ आगे बढ़ना होगा। भारत को जी-20 की अध्यक्षता के दौरान उन देशों के विचारों को भी सामने लाना होगा जिनका समूह में प्रतिनिधित्व नहीं है। इसके अलावा जी-20 के अध्यक्ष और विकासशील देशों की तिकड़ी के हिस्से के रूप में भारत से उन मुद्दों को आगे बढ़ाने की उम्मीद भी की जा रही है, जो गरीब देशों को सकारात्मक रूप से प्रभावित करेंगे। भारत की जी-20 की अध्यक्षता इस बात पर निर्भर करेगी कि भारत कितनी कुशलता से देशों के बीच दूरियां पाटने, विवादों को खत्म करने, शांति स्थापित करने, संघर्ष को शांत करने और टूट चुकी आपूर्ति श्रृखलाओं को फिर से बहाल करने के लिए रास्ते और साधन खोज पाता है।</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. एन.के. सोमानी, अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sun, 10 Sep 2023 16:11:41 +0530</pubDate>
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                <title>G20 Summit: जी-20 की मेजबानी और भारत की बढ़ती अहमियत</title>
                                    <description><![CDATA[G20 Summit: नई दिल्ली में 9 से 10 सितम्बर को जी-20 सम्मेलन हो रहा है। इस अंतर्राष्ट्रीय संस्था के सम्मेलन की मेजबानी करना भारत की अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बढ़ रही लोकप्रियता का संकेत है। बेशक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रुस के राष्ट्रपति वलादीमीर पुतिन द्वारा इस सम्मेलन में न पहुंचने संबंधी चर्चा ने […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/g-20-hosting-and-indias-growing-importance/article-52066"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/g20-summit.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">G20 Summit: नई दिल्ली में 9 से 10 सितम्बर को जी-20 सम्मेलन हो रहा है। इस अंतर्राष्ट्रीय संस्था के सम्मेलन की मेजबानी करना भारत की अंतर्राष्ट्रीय मंच पर बढ़ रही लोकप्रियता का संकेत है। बेशक चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रुस के राष्ट्रपति वलादीमीर पुतिन द्वारा इस सम्मेलन में न पहुंचने संबंधी चर्चा ने कई शंकाए खड़ी कर दी थी परंतु अब चीन द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है कि वह भारत की मेजबानी का समर्थन करता है। जिनपिंग की जगह वहां के प्रधानमंत्री ली कियांग भाग ले रहे हैं और इसी तरह रुस के प्रतिनिधि भी आ रहे हैं। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">चर्चा यह रही है कि शी जिनपिंग ज्यादातर उन सम्मेलनों में ही हिस्सा लेते हैं जहां वह हॉवी रहे सकें और अपना एंजेडा सेट कर सकें। अगर इस चर्चा को भी सही मान लिया जाए तो यह भी भारत के लिए प्राप्ति वाली बात है कि जी-20 जैसे संगठन में भारत का इतना स्थान बन गया है कि भारत विरोधी एंजेडे के लिए कोई और देश अपनी कामयाबी की उम्मीद नहीं रखता। रुस के राष्ट्रपति की अनुपस्थिति के अपने अर्थ हो सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">कुल मिलाकर भारत को विकसित पश्चिम देशों के साथ मिलकर चलने का मौका मिलेगा। चीन और रुस के राष्ट्रपति के ना आने के कारण कुछ भी हो परंतु भारत को मेजबानी मिलने का समर्थन मिलना इस बात का सबूत है कि भारत की सिद्धांतक पहुंच और समर्था को हर कोई स्वीकार कर रहा है। बेशक यह सम्मेलन सीधे तौर पर भारत-चीन संबंधों को रेखांकित करने वाला मंच नहीं है। फिर भी इस बात की उम्मीद करनी जरुर बनती है कि चीन के किसी नेता के आने या ना आने से भारत को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला।</p>
<p style="text-align:justify;">पुतिन की अनुपस्थिति की वजह यूक्रेन के साथ रुस का युद्ध भी माना जा रहा है। ऐसे हालातों में रुस की भारत से दूरी का कोई मुद्दा नहीं रह जाता है। सम्मेलन में अमेरिका, इंग्लैंड, जर्मन सहित कई ताकतवार देश भाग ले रहे हैं। इन हालातों में यह सम्मेलन भारत के लिए काफी उपलब्धियों भरा रहने के आसार हैं। यह भी उम्मीद करनी चाहिए कि भारत द्वारा समेलन के माध्यम से विश्व को नई दिशा देने का प्रयत्न करेगा।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Delhi G20 Summit: 21वीं सदी को एशिया की सदी बनाने में भारत और आसियान में सहयोग जरूरी: पीएम" href="http://10.0.0.122:1245/delhi-g20-summit/">Delhi G20 Summit: 21वीं सदी को एशिया की सदी बनाने में भारत और आसियान में सहयोग जरूरी: पीएम</a></p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                            <category>विचार</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 07 Sep 2023 13:28:41 +0530</pubDate>
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                <title>Delhi G20 Summit: 21वीं सदी को एशिया की सदी बनाने में भारत और आसियान में सहयोग जरूरी: पीएम</title>
                                    <description><![CDATA[Delhi G20 Summit:  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक विकास को गति देने और 21वीं सदी को एशिया की सदी बनाने के लिए भारत एवं आसियान के बीच सहयोग की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा है कि कोविड पश्चात एक नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था का निर्माण और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती देने से […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/delhi-g20-summit/article-52065"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/delhi-g20-summit.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Delhi G20 Summit:  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक विकास को गति देने और 21वीं सदी को एशिया की सदी बनाने के लिए भारत एवं आसियान के बीच सहयोग की महत्ता को रेखांकित करते हुए कहा है कि कोविड पश्चात एक नियम आधारित वैश्विक व्यवस्था का निर्माण और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती देने से यह लक्ष्य हासिल हो सकता है। मोदी ने इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में 20वें भारत आसियान शिखर-सम्मेलन में अपने आरंभिक वक्तव्य में यह बात कही।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने भारत एवं आसियान के बीच साझीदारी का चौथा दशक प्रारंभ होने पर प्रसन्नता व्यक्त की और कहा कि हमारा इतिहास और भूगोल भारत और आसियान को जोड़ते हैं। साथ ही साझा मूल्य, क्षेत्रीय एकता, शांति, समृद्धि, और बहुध्रुवीय विश्व में साझा विश्वास भी हमें आपस में जोड़ता है।आसियान भारत की ऐक्ट ईस्ट नीति का केंद्रीय स्तंभ है। भारत आसियान केन्द्रीयता और हिन्द प्रशांत क्षेत्र पर आसियान के दृष्टिकोण का पूर्ण समर्थन करता है। भारत के हिन्द प्रशांत क्षेत्र पहल में भी आसियान क्षेत्र का प्रमुख स्थान है। पिछले वर्ष हमने भारत-आसियान मैत्री वर्ष मनाया और आपसी संबंधो को एक ह्यसमग्र रणनीतिक साझीदारी का रूप दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि आज वैश्विक अनिश्चितताओं के माहौल में भी हर क्षेत्र में, हमारे आपसी सहयोग में लगातार प्रगति हो रही है। यह हमारे संबंधो की ताकत और सातत्य का प्रमाण है। उन्होंने कहा कि इस वर्ष की आसियान शिखर-सम्मेलन की थीम है- ह्यआसियान मैटर्ज़: एपीसेंट्रम आॅफ ग्रोथह्ण। आसियान मैटर्स, क्योंकि यहाँ सभी की आवाज सुनी जाती है, और आसियान एपीसेंट्रम आॅफ ग्रोथ क्योंकि वैश्विक विकास में आसियान क्षेत्र की अहम भूमिका है। वसुधैव कुटुंबकमझ्र ह्यएक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ की यही भावना भारत की जी-20 अध्यक्षता की भी थीम है।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने कहा, ‘इक्कीसवीं सदी एशिया की सदी है। हम सब की सदी है। इसके लिए आवश्यक है, कोविड पश्चात एक नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था का निर्माण और मानव कल्याण के लिए सबका प्रयास।स्वतंत्र एवं मुक्त हिन्द प्रशांत क्षेत्र की प्रगति में और ग्लोबल साउथ की आवाज को बुलंद करने में, हम सबके साझे हित हैं। मुझे विश्वास है कि आज हमारी बातचीत से भारत और आसियान क्षेत्र के भावी भविष्य को और सुदृढ़ बनाने के लिए नए संकल्प लिए जायेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि समन्वयक देश सिंगापुर, आगामी अध्यक्ष लाओ पीडीआर और आप सभी के साथ भारत कंधे से कन्धा मिलाकर काम करने के लिए प्रतिबद्ध है। मोदी ने भारतझ्र आसियान शिखर-सम्मेलन के शानदार आयोजन के लिए इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विडोडो का आभार व्यक्त किया तथा कंबोडिया के प्रधानमंत्री हुन मानेट को हाल ही में आसियान की अध्यक्षता ग्रहण करने के लिए बधाई दी। प्रधानमंत्री ने बैठक में पर्यवेक्षक के रूप में तिमोर लेस्ते के प्रधानमंत्री सेनाना गुजमाओ का भी स्वागत किया।</p>
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