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                <title>Artical on G20 Summit - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <description>Artical on G20 Summit RSS Feed</description>
                
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                <title>विश्व राजनीति व अर्थव्यवस्था के लिए पांच सिद्धान्त</title>
                                    <description><![CDATA[G20 Summit : पिछले सप्ताह दिल्ली में आयोजित जी 20 शिखर सम्मेलन पूर्णत: सफल रहा। विदेशों से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम को इस सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए बधाई दे रहे हैं और भारतीय टिप्पणीकार इस वैश्विक शिखर सम्मेलन के आयोजन से भारत को होने वाले लाभों को गिना रहे हैं। G20 Summit […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/rajasthan/five-principles-for-world-politics-and-economy/article-52413"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/g20-summit-1.gif" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>G20 Summit :</strong> पिछले सप्ताह दिल्ली में आयोजित जी 20 शिखर सम्मेलन पूर्णत: सफल रहा। विदेशों से प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम को इस सम्मेलन के सफल आयोजन के लिए बधाई दे रहे हैं और भारतीय टिप्पणीकार इस वैश्विक शिखर सम्मेलन के आयोजन से भारत को होने वाले लाभों को गिना रहे हैं। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">इस शिखर सम्मेलन की सफलता का मापन करने के लिए अनेक मानदंडों का उपयोग किया जा सकता है जैसा कि ऐतिहासिक पहल जिसमें अफ्रीकी यूनियन को जी 20 में शामिल कर इसे जी 21 बनाना, जैव ईंधन एलाइंस और सम्मेलन में भाग ले रहे नेताओं द्वारा आम सहमति से घोषणा पत्र जारी करना, सम्मेलन के दौरान अनेक द्विपक्षीय बैठकें और बहुपक्षीयता पर बल देना। तथापि जी 20 में भारत की सबसे बड़ी सफलता अफ्रीकी संघ को जी 20 में शामिल करना है और इसके दो प्रमुख कारण हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">पहला, नई दिल्ली में वैश्विक राजनीति का पुनर्गठन किया गया। उत्तर का प्रतिनिधित्व करने वाला यूरोपीय संघ और दक्षिण का प्रतिनिधित्व करने वाला अफ्रीकी संघ एक ही मेज पर बैठ कर विश्व के मुद्दों पर चर्चा और उनका निर्णय कर रहे थे। दूसरा, ग्लोबल साउथ की आवाज अफ्रीकी संघ के 55 देशों के माध्यम से सुनने को मिली और इसे औपचारिक रूप से जी 20 का सदस्य बनाया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">जी 20 के दिल्ली शिखर सम्मेलन की अन्य उपलब्धियां भी हैं। हालांकि इस शिखर सम्मेलन को सफल बनाने में अन्य देशों का सहयोग और योगदान भी रहा है। तथापि इस शिखर सम्मेलन के दौरान वार्ता और नेतृत्व कौशल के लिए पूर्ण श्रेय इसके अध्यक्ष भारत को दिया जाता है। भारत नवंबर 2022 से जी 20 की अध्यक्षता कर रहा है और उसने देश के विभिन्न भागों में इस संबंध में 200 से अधिक बैठकें की जिसमें एक लाख से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी द्वारा नवंबर में इस संबंध में एक वर्चुअल रिपलेशन मीट का प्रस्ताव भी किया गया। विश्व के भविष्य के निर्माण के लिए प्रधानमंत्री मोदी द्वारा प्रयुक्त पांच सिद्धान्तों के माध्यम से इस शिखर सम्मेलन और उससे परे देखने का प्रयास किया गया। मोदी राष्ट्रीय और वैश्विक राजनीति में रणनीतियों के निर्माण और विद्यमान प्रवृतियों के लिए शब्द निर्माण में माहिर हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अपने उद्घाटन भाषण में मोदी ने विश्व में व्याप्त विश्वास के अभाव पर चर्चा की और कहा कि इसे समाप्त किया जाना चाहिए और इसके लिए उन्होंने चार लोकप्रिय नारों पर आधारित राष्ट्रीय रणनीति को अपनाने का आह्वान किया जो सबका साथ, सबका विकास, सबका प्रयास और सबका विश्वास है और उन्होंने सबका विश्वास को वैश्विक विश्वास की पुनर्स्थापना से जोड़ा।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मोदी ने वैश्विक भविष्य के निर्माण के लिए 5डी गढेÞ। आपको ध्यान होगा कि इस शिखर सम्मेलन का उद्देश्य कथन एक परिवार, एक धरती, एक भविष्य है और जो 5डी इस सम्मेलन के दौरान मोदी ने गढे वे हैं – डेमोक्रेसी, डेमोग्राफी, डेवलपमेंट, डायलॉग और डिप्लोमैसी। जी 20 के नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में मोदी ने वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए इन पांच सिद्धान्तों को बढावा देने पर बल दिया। जी 20 की अध्यक्षता के रूप में भारत के प्रदर्शन पर विचार करना आवश्यक है जिसका समापन जी 20 शिखर सम्मेलन के रूप में हुआ है। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">वर्तमान में जी 20 विश्व में सबसे बडा मंच है क्योंG20 Summit कि संयुक्त राष्ट्र संघ पर पांच परमाणु शक्तियों के नियंत्रण और विश्व के मुद्दों पर किसी भी निर्णय लेने में किसी एक सदस्य द्वारा वीटो का स्वेच्छाचारी ढंग से प्रयोग करने के कारण संयुक्त राष्ट्र संघ अप्रभावी हो रहा है। तथापि जी 20 शिखर सम्मेलन में सबसे महत्वपूर्ण सिद्धान्त वार्ता है।</p>
<p style="text-align:justify;">स्पष्ट है कि विगत एक वर्ष के दौरान भारत ने वार्ता और कूटनीति के मामले में अच्छा प्रदर्शन किया है। मतभेदों के शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण समाधान के लिए वार्ता आवश्यक है। भारत वार्ता और कूटनीति पर बल दे रहा है कि ये दोनों चीजें साथ साथ चलनी चाहिए और यूक्रेन युद्ध की समाप्ति के लिए भी इनका प्रयोग किया जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने अनेक बार कहा है कि अब युद्ध का समय नहंी रह गया है। हमें वार्ता और कूटनीति का सहारा लेना चाहिए। एक पुरानी कहावत है कि सभी युद्ध कूटनीति की विफलता का प्रतिनिधित्व करते हैं। कुछ तर्क कर सकते हैं कि जब कोई युद्ध के लिए आतुर हो तो उससे वार्ता की अपेक्षा करना हास्यास्पद है। किंतु दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी ने कूटनीति का पूर्ण उपयोग किया। नई दिल्ली में शिखर सम्मेलन के आरंभ से एक दिन पूर्व वे आधे दिन के दौरे पर आसियान-भारत शिखर सम्मेलन और पूर्वी एशियाई शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए गए। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">इन शिखर सम्मेलनों में उनकी उपस्थिति इस बात का द्योतक है कि भारत इन शिखर सम्मेलनों को कितना महत्व देता है और इसके लिए उन्हें नई दिल्ली में आयोजित किए जा रहे जी 20 के लिए नेताओं की सद्भावना प्राप्त है। दूसरा, भारतीय वार्ताकार दल ने समझौतों और घोषणाओं के लिए एक अलग अलग वार्ता की।</p>
<p style="text-align:justify;">अफ्रीकी यूनियन को जी 20 में शामिल करने के प्रस्ताव का कोई भी देश सक्रिय रूप से इसका विरोध नहीं कर रहा था किंतु किसी ने भी इस दिशा में अग्रलक्षी कदम नहंी उठाए। भारत ने ऐसा किया। मोदी ने जी 20 के नेताओं को शिखर सम्मेलन से बहुत पहले लिखा कि क्या किसी को अफ्रीकी यूनियन को जी 20 में एक स्थायी सदस्य के रूप में शामिल करने पर कोई आपत्ति है और इस तरह उन्हें इन नेताओं की सहमति प्राप्त हुई।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी तरह ब्लैक सी ग्रेन कॉरीडोर को पुन: शुरू करने, खाद्य सुरक्षा, डीपीआई, एसपीजी, बहुपक्षीय विकास बैंकों में सुधार, ग्लोबल साउथ के लिए राजनीतिक स्थान आदि मुद्दों पर कदम दर कदम सहमति बनायी गई। शेरपाओं और संबंधित मंत्रियों ने इस संबंध में वार्ता की और जहां आवश्यक हुआ वहां प्रधानमंत्री ने मार्गदर्शन दिया। विकास एक सतत् चलने वाली प्रक्रिया है और यह एक सापेक्ष अवधारणा है। कुछ देश अन्य देशों की तुलना में कम विकसित है और विकास का अलग अलग अर्थ भी है। कुछ देश इसका मापन सकल घरेलू उत्पादन से करते हैं तो कुछ देश सकल घरेलू खुशहाली से करते हैं। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">मोदी ने विकास के मापन के लिए सकल घरेलू उत्पाद के स्थान पर मानव केन्द्रित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने इस बात को रेखांकित किया कि महामारी ने हमें इस बदलाव के लिए मजबूर किया है तथापि विकास कुछ वैश्विक सिद्धान्तों पर आधारित होना चाहिए और वे हैं साझेदारी, समावेशी, न्यापूर्ण और सार्वभौमिक। जनांकिकी विकास और आर्थिक समृद्धि में एक महत्वपूर्ण कारक बन गया है। चीन की चमत्कारी आर्थिक वृद्धि का श्रेय उसके सस्ते श्रम को दिया जाता है किंतु जनांकिकी बदल गई है। चीन में अब जनसंख्या उम्रदराज हो गई है और उसकी श्रम लागत बढ रही है। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरी ओर भारत में लगभग 65 प्रतिशत जनसंख्या कार्य करने की उम्र में है। तथापि अपने जनांकिकीय लाभों का दोहन करने के लिए भारत के लिए आवश्यक है कि वह अपनी श्रम शक्ति को आधुनिक अर्थव्यवस्था के अनुकूल समुचित कौशल प्रशिक्षण दे। किसी भी देश में जनांकिकी को उचित अवसर और गरिमापूर्ण कार्य दशाओं के माध्यम से उत्पादक बनाया जाना चाहिए। ये सभी चार सिद्धान्त पांचवें सिद्धान्त अर्थात लोकतंत्र से जुड़े हुए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">जी 20 से इतर जी 7 में सभी औद्योगिक लोकतांत्रिक देश शामिल हैं। चीन की आर्थिक विकास ने कुछ देशों को भ्रमित कर दिया है कि क्या चीन का मॉडल संपदा निर्माण के अनुकूल है। किंतु यह सच्चाई से परे है। किंतु चीनी अर्थव्यवस्था के बिना पश्चिमी देश भी कठोर विनियमों के साथ सस्ते श्रम की तलाश कर रहे हैं। अब जब चीन पश्चिमी सर्वोच्चता को चुनौती दे रहा है तो अब वे भारत और अन्य लोकतंत्रों की ओर मूड़ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">स्थिरता, शांति और समृद्धि के लिए लोकतंत्र अपरिहार्य है। अंतत: मैं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की टिप्पणी को उद्घत करना चाहता हूं ‘मैं भारत के भविष्य के लिए चिंतित नहीं हूं अपितु आशावादी हूं क्योंकि यह विश्व मंच पर सही मार्ग पर आगे बढ रहा है। किंतु भारत तभी समृद्ध होगा जब यहां पर सौहार्दपूर्ण समाज बना रहेगा।’ नि:संदेह किसी भी देश की विदेश नीति और उसकी अंतर्राष्ट्रीय छवि उसकी सीमाओं के भीतर उसके भूभाग में जो कुछ भी हो रहा है उसको परिलक्षित करता है। आशा की जाती है कि प्रधानमंत्री मोदी और उनकी टीम इस जमीनी वास्तविकता से परिचित होंगे। G20 Summit</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. डीके गिरी,वरिष्ठ लेखक व स्वतंत्र टिप्पणीकार </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="Earth: नासा ने रची इतिहास की नई कहानी, धरती से बड़े इस ग्रह पर भी है जीवन-पानी!" href="http://10.0.0.122:1245/nasa-created-a-new-story-of-history-there-is-life-and-water-even-on-this-planet-bigger-than-earth/">Earth: नासा ने रची इतिहास की नई कहानी, धरती से बड़े इस ग्रह पर भी है जीवन-पानी!</a></p>
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                                                            <category>लेख</category>
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                                            <category>राजस्थान</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 16 Sep 2023 14:21:27 +0530</pubDate>
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                <title>G20 Summit: बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार की आवाज बनेगा जी-20</title>
                                    <description><![CDATA[G20 Summit: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (UNSC) में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व और सदस्यता में वृद्धि का मुद्दा एक अंतराल के बाद पुन: चर्चा में आ गया है। जी-20 की दिल्ली शिखर बैठक से पहले और उसके बाद यूएनएससी के भीतर सुधारों को लेकर जिस तरह से वैश्विक नेताओं की प्रतिक्रिया आ रही है, उससे लगता है […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/g-twenty-will-become-the-voice-of-reform-in-multilateral-institutions/article-52277"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-09/g20.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">G20 Summit: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (UNSC) में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व और सदस्यता में वृद्धि का मुद्दा एक अंतराल के बाद पुन: चर्चा में आ गया है। जी-20 की दिल्ली शिखर बैठक से पहले और उसके बाद यूएनएससी के भीतर सुधारों को लेकर जिस तरह से वैश्विक नेताओं की प्रतिक्रिया आ रही है, उससे लगता है वर्ल्ड लीडर इसे लेकर गंभीर है। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">जी-20 समिट में शामिल होने के लिए नई दिल्ली आए अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने पीएम मोदी के साथ हुई द्विपक्षीय बैठक के दौरान कहा कि ग्लोबल गवर्नेस में ज्यादा लोगों की साझेदारी और प्रतिनिधित्व होना चाहिए। हम यूएनएससी में भारत को परमानेंट मेंबर बनाए जाने का समर्थन करते हैं। बैठक से पहले यूएन चीफ एंटोनियो गुटरेस ने भी कहा कि यूएनएससी की मेंबरशिप का फैसला उनके हाथ में नहीं है, लेकिन वो चाहते हैं कि यूएनएससी में सुधार हो और इसमें भारत भी शामिल हो। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">और अब बैठक के बाद जिस तरह से पाकिस्तान के खास मित्र तुर्किये ने भारत का समर्थन किया है, उससे मामले की गंभीरता को समझा जा सकता हैै। तुर्किये के राष्ट्रपति तैयप एर्दोगन ने कहा कि अगर भारत जैसा देश यूएनएससी का स्थायी सदस्य बनता है, तो तुर्किये को गर्व होगा। दुनिया पांच से भी बड़ी है। हम सुरक्षा परिषद में सिर्फ इन पांच को नहीं रखना चाहते है। G20 Summit</p>
<h3>भारत लंबे समय से यूएनएससी की परमानेंट सीट के लिए दावा कर रहा है</h3>
<p style="text-align:justify;">पिछले डेढ-दो दशकों से इस बात की चर्चा लगातार बल पकड़ रही है कि संयुक्त राष्ट्र के नेतृत्व में कई बहुपक्षीय संस्थान बदलते हुए भू-राजनीतिक परिदृश्य में तालमेल बैठाने में असफल हुए हैं। ये संस्थान बड़ी शक्तियों के बीच आम सहमति विकसित करने और संघर्ष को रोकने में विफल रहे है। ऐसी ही एक संस्था संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिष्द अर्थात यूएनएससी है। ग्लोबल पर्सपेक्टिव में इस स्पेस को भरने के लिए हाल के दौर में कई वैकल्पि समूहों का उभार हुआ है। इनमें से कई ऐसे समूह है, जिनमें भारत न केवल शामिल है, बल्कि अहम भूमिका में है।</p>
<p style="text-align:justify;">अब चूंकि, जी-20 शिखर बैठक की मेजबानी भारत के पास थी, और भारत लंबे समय से यूएनएससी की परमानेंट सीट के लिए दावा कर रहा है। भारत के अलावा, ब्राजील, जर्मनी और जापान भी स्थायी सदस्यता का दावा कर रहे हैं, लेकिन ‘कॉफी क्लब‘ (यूएनएससी में सुधार का विरोध करने वाले राष्ट्रों का अनौपचारिक समूह) के अड़ियल रूख के कारण इन देशों को परमानेंट सीट नहीं मिल पा रही है। ऐसे में यह पहले से ही तय था कि दिल्ली शिखर बैठक के दौरान भारत इस मुद्दे को प्रमुखता के साथ उठाएगा। भारत ने ऐसा किया भी।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल, 1945 में जिस समय संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई थी उस समय संयुक्त राष्ट्र में 51 और सुरक्षा परिषद में पांच स्थायी और छह निर्वाचित अस्थायी कुल 11 सदस्य थे। साल 1965 में महासभा ने संकल्प 1991 पारित कर चार्टर में संशोधन करते हुए अस्थायी सदस्यों की संख्या 6 से बढ़ाकर 10 कर दी और सदस्य देशों को भौगालिक आधार पर प्रतिनिधित्व देने का प्रावधान किया गया। ये बदलाव एक सीमा तक तो उपयोगी साबित हुआ लेकिन पी-5 (पांच परमानेंट सदस्य) की वीटो पावर में संशोधन न किए जाने के कारण सुधार की पूरी कवायद बेकार हो गई ।</p>
<h3>संयुक्त राष्ट्र 1945 में बनाया गया एक ‘फ्रोजेन मैकेनिज्म‘ बन कर रह गया</h3>
<p style="text-align:justify;">यूएनएससी में न्यायसंगत प्रतिनिधित्व का सवाल और सदस्यता में वृद्धि का मुद्दा यूएन की वार्षिक बैठकों में हमेशा उठता रहा है। भारत सहित दुनिया के कई अन्य देश इस बात की मांग करते आए हैं कि बदलती वैश्विक व्यवस्था के अनुरूप यूएनएससी में सुधार कर भारत, ब्राजील, जापान और जर्मनी को स्थायी सदस्य बनाया जाए। लेकिन महासभा आज तक किसी निष्कर्ष तक नहीं पहुंच पायी है। इसका नतीजा यह हुआ कि पिछले छह दशकों से चार्टर में सुधार को लेकर कोई कदम नहीं उठाया जा सका है।</p>
<p style="text-align:justify;">विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी वॉयस आॅफ द ग्लोबल साउथ समिट में कहा था कि संयुक्त राष्ट्र 1945 में बनाया गया एक ‘फ्रोजेन मैकेनिज्म‘ बन कर रह गया है। एस. जयशंकर ने तो यहां तक कह दिया है कि यूएनएससी पांच लोगों की तरह है, जो ट्रेन के प्रथम श्रेणी के डिब्बे में बैठे हैं, और नहीं चाहते कि अन्य लोग उसमें प्रवेश करें। उन्होंने टिकट की कीमत बढ़ाने और अन्य प्रतिबंध जैसी बाधाएं डाल दी है। सच तो यह है कि यूएन में सुधार की भारत की मांग को यूएनएससी की स्थायी सदस्यता पाने की आकांक्षा से जोड़कर देखा जाता रहा है। इसका परिणाम यह हुआ कि अलग-अलग मौकों पर विभिन्न देश संयुक्त राष्ट्र की स्थायी सदस्यता दिलाने में भारत को समर्थन का आश्वासन तो देते रहे है, लेकिन वे इस मसले पर गंभीर नहीं हुए है। G20 Summit</p>
<h3>आज भारत 1945 वाला भारत नहीं है | G20 Summit</h3>
<p style="text-align:justify;">जहां तक यूएनएससी में भारत की स्थायी सदस्यता का सवाल है, मैं समझता हूं भारत को इस मामले में ज्यादा लामबंदी की जरूरत नहीं है। क्योंकि आज जहां भारत खड़ा है, वहां उसे यूएनएससी की नहीं बल्कि यूएनएससी को भारत की जरूरत होनी चाहिए। आज भारत 1945 वाला भारत नहीं है। आज वह दुनिया की सबसे बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करता हैं। अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी ताकत और चांद के दक्षिणी धू्रव पर पहलकदमी करने वाला पहला देश बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को गंभीरता से लिया जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सार्क, आसियान, बिम्सटेक, एससीओ, ईब्सा, ब्रिक्स, क्वाड, जी-20 जैसे संगठन वर्तमान वैश्विक व्यवस्था को किसी न किसी रूप में प्रभावित करते हैं, भारत इन संगठनों में अहम भूमिका में है। ऐसे में यूएनएससी की परमानेंट सीट पर भारत का होने का मतलब यूएनएससी के सम्मान में वृद्धि होना है। दूसरा, जिस तरह से पूरी यूएनएससी पर पी-5 देशों का नियंत्रण है, उसे देखते हुए भी भारत जैसे बड़े देश के लिए यह आकर्षण का कोई खास केन्द्र नहीं होना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">जब तक यूएन चार्टर में परिवर्तन कर वीटो प्रक्रिया को वोटिंग प्रकिया में नहीं बदला जाता तब तक सुरक्षा परिषद् से उसकी वास्तविक भूमिका की उम्मीद नहीं की जा सकती है। यूके्रन युद्ध ने इस अंतरराष्ट्रीय संस्था की बढ़ती हुई अप्रासंगिकता को एक झटके में उजागर कर दिया। पूरी दुनिया गवाह है कि कैसे यूएनएससी के एक परमानेंट मैम्बर (रूस) ने अपने पड़ोसी देश पर आक्रमण किया उसकी क्षेत्रीय अखंडता से खिलवाड़ किया और दुनिया की ‘पुलिस मैन’ कहलाने वाली संस्था मूकदर्शक बनी रही। G20 Summit</p>
<p style="text-align:justify;">संक्षेप में कहें तो बहुधु्रवीय विश्व व्यवस्था में आज भी कुछ देश इस मुगालते में हैं कि दुनिया उनकी जेब में है, और वे इसको जैसे चाहे चला सकते हैं। लेकिन अब जी-20 के नए अध्यक्ष ब्राजील ने यूएनएससी में सुधार को लेकर किसी रोडमैप तक पहुंचने की बात कही है, उसे देखते हुए लगता है कि निकट भविष्य में शायद यूएनएससी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के अनुरूप व्यवहार करती दिखे। G20 Summit</p>
<p style="text-align:right;"><strong>डॉ. एन.के. सोमानी, अंतर्राष्टÑीय मामलों के जानकार </strong><br />
<strong>(यह लेखक के अपने विचार हैं)</strong></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Wed, 13 Sep 2023 15:28:04 +0530</pubDate>
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