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                <title>Gorkhaland Andolan - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>गोरखालैंड मांग की धधकती आग</title>
                                    <description><![CDATA[लो दुनिया भर में प्राकृतिक सुंदरता के लिए विख्यात और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र दार्जिलिंग आज अराजकता और हिंसा की चपेट में है। आंदोलन से जनजीवन अस्त-व्यस्त है और शहर से रौनक गायब है। आगजनी और हिंसा के कारण यहां आए पर्यटक खौफ और दहशत में हैं। इस बदतर हालात के लिए जितना […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/article/gorkhaland-andolan-in-darjeeling/article-1413"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/gorkhaland-andolan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">लो दुनिया भर में प्राकृतिक सुंदरता के लिए विख्यात और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र दार्जिलिंग आज अराजकता और हिंसा की चपेट में है। आंदोलन से जनजीवन अस्त-व्यस्त है और शहर से रौनक गायब है।</p>
<p style="text-align:justify;">आगजनी और हिंसा के कारण यहां आए पर्यटक खौफ और दहशत में हैं। इस बदतर हालात के लिए जितना दोषी पश्चिम बंगाल की सरकार है ,उतना ही गोरखालैंड राज्य की मांग कर रहे गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) दल भी। बहरहाल पश्चिम बंगाल की ममता सरकार राज्य के पहाड़ी इलाकों दार्जिलिंग के स्कूलों में बांग्ला भाषा थोपने की जल्दबाजी नहीं दिखायी होती, तो गोरखा जनमुक्ति मोर्चा को भी विरोध की चिंगारी को दावानल में बदलने का मौका हाथ नहीं लगता।</p>
<p style="text-align:justify;">बेशक राज्य सरकार को अधिकार है कि वह शिक्षा का पाठ्यक्रम सुनिश्चित करे, लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह क्षेत्रीय भावनाओं के साथ खिलवाड़ करे। वह भी तब, जब पहाड़ी इलाकों में भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता को लेकर पहले से ही भावनाएं उफान पर हों। ऐसे संवेदनशील मसले पर निर्णय लेने से पहले उसे सहमतिपूर्ण वातावरण निर्मित करना चाहिए था।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर बात रायशुमारी की होती, तो दार्जिलिंग अराजकता और आग की लपटों की भेंट नहीं चढ़ता। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के आंदोलनकारियों के प्रति राज्य सरकार की सख्ती का नतीजा है कि 35 साल पुराने गोरखालैंड राज्य की मांग पुन: धधक उठी है।</p>
<p style="text-align:justify;">राज्य सरकार द्वारा गोरखा टेरिटोरियल एडमिनिस्टेÑशन और गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के अधीन रहे नगर निगमों में आर्थिक अनियमितताओं के आरोपों की जांच ने भी आंदोलन की आग में घी का काम किया है। इन परिस्थितियों के बीच गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के लिए अपना जनाधार बढ़ाने के लिए एक संवेदनशील मुद्दे की जरुरत थी, जिसे पश्चिम बंगाल की सरकार ने सहजता से उपलब्ध करा दिया। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा इसे हथियार बनाकर गोरखालैंड राज्य की मांग को धार दे रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">जहां तक गोरखालैंड राज्य के मांग का मसला है, तो दार्जिलिंग प्रारंभ में पश्चिम बंगाल का हिस्सा नहीं था। इतिहास में जाएं तो 1865 में जब अंग्रेजों ने चाय का बागान शुरु किया, तो यहां बड़ी संख्या में मजदूर काम करने आए। उस वक्त कोई अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखा नहीं थी, लिहाजा ये लोग खुद को गोरखा किंग के अधीन और इस इलाके को अपनी जमीन मानते थे।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन आजादी के बाद भारत ने नेपाल के साथ शांति व दोस्ती के लिए 1950 का समझौता किया और सीमा विभाजन के बाद यह हिस्सा भारत में आ गया। उसके बाद से ही यहां के लोग अलग राज्य के निर्माण की मांग कर रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह यह है कि बंगाली और गोरखा मूल के लोग सांस्कृतिक व ऐतिहासिक तौर पर एक-दूसरे से अलग मानते हैं और यही कारण है कि गोरखालैंड राज्य की मांग को बल मिल रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">तथ्य यह भी कि ब्रिटिशकाल में दार्जिलिंग सिक्किम का हिस्सा हुआ करता था। बाद में उसका विलय बंगाल में कर दिया गया। लेकिन इसके बावजूद भी यहां के लोगों की संस्कृति, खान-पान व पहनावा बंगाल से भिन्न है।</p>
<p style="text-align:justify;">भाषा से इतर अन्य मामलों में भी यहां के लोग स्वयं को बंगालियों से अलग मानते हैं। यह भिन्नता ही यहां के लोगों को अलग गोरखालैंड राज्य के लिए प्रेरित कर रही है। यहां के लोगों का तर्क है कि जब भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता के आधार पर देश में राज्यों का बंटवारा हुआ और मराठी बोलने वालों के लिए महाराष्ट्र और गुजराती बोलने वालों के लिए गुजरात राज्य का गठन हुआ, तो उसी आधार पर गोरखालैंड राज्य का गठन क्यों नहीं होना चाहिए?</p>
<p style="text-align:justify;">गोरखालैंड राज्य की मांग की शुरुआत गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट के नेता सुभाष घीसिंग ने की थी। उन्होंने 5 अप्रैल 1980 को गोरखालैंड नाम दिया। इसके बाद पश्चिम बंगाल की राज्य सरकार दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल बनाने पर राजी हुई। बेहतर होगा कि केंद्र, राज्य व गोरखा जनमुक्ति मोर्चा सभी मिलकर इस मसले पर गंभीरता से विचार कर समाधान का रास्ता तलाशें।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-रीता सिंह</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 19 Jun 2017 23:18:45 +0530</pubDate>
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                <title>गोरखालैंड समस्या में ममता को धैर्य से काम लेना होगा</title>
                                    <description><![CDATA[गोरखालैंड आंदोलन ने पश्चिम बंगाल में हिंसक रूप धारण कर लिया है। इसके साथ ही इस मामले में राजनीति भी तेज हो गई है। तीखे भाषण देने वाली प्रदेश की मुख्यमंत्री परिस्थितियों को समझने व संयम से काम लेने की बजाय बदले की भावना से काम कर रही हैं। ममता ने आंदोलनकारियों को आतंकी कहकर […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/editorial/gorkhaland-andolan-politics-too-fast/article-1375"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/gorkh-andolan.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गोरखालैंड आंदोलन ने पश्चिम बंगाल में हिंसक रूप धारण कर लिया है। इसके साथ ही इस मामले में राजनीति भी तेज हो गई है। तीखे भाषण देने वाली प्रदेश की मुख्यमंत्री परिस्थितियों को समझने व संयम से काम लेने की बजाय बदले की भावना से काम कर रही हैं। ममता ने आंदोलनकारियों को आतंकी कहकर नया विवाद खड़ा कर दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">ममता इस सारे विवाद को भाजपा एंव मोदी सरकार की राजनीति करार देकर तुच्छ राजनीति पर भी उतारू हैं। परिस्थितियों के अनुसार, प्रदेश सरकार को चाहिए कि वह केंद्र सरकार का सहयोग ले। प्रदेश व केंद्र सरकार दोनों मिलकर गोरखा आंदोलन का समाधान निकाल सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन यह काफी दु:खद है कि गोरखा आंदोलन की आड़ में ममता बनर्जी केंद्र सरकार को बदनाम कर अपना कद बढ़ाना चाह रही हैं। प्रदर्शनकारियों के साथ प्रदेश सरकार वार्ता कर इस आंदोलन का पटाक्षेप कर सकती हैं, न कि उन्हें आतंकी कहकर प्रदेश का नुक्सान करवाया जाए। आंदोलन कोई भी हो, तो आम जन मानस में बहुत सी अफवाहें भी फैल जाती हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">आजकल तो सोशल मीडिया का दौर है, ऐसे में ये अफवाहें भयवाह रूप भी धर लेती हैं। वर्ष 1985-98 के दौरान गोरखालैंड आंदोलन में 1000 से ज्यादा लोग मारे गए थे। अत: प्रदेश सरकार को माहौल शांत करने के प्रयास तेज कर देने चाहिएं। इस वक्त राजनीतिक बयानबाजी से ज्यादा शासन प्रबंध आवश्यक हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">दार्जीलिंग पश्चिम बंगाल का ही नहीं, पूरे भारत का प्रसिद्ध पर्यटक स्थल है, जिससे पश्चिम बंगाल सरकार को अच्छी आय भी होती है। आंदोलन चलता रहता है तब इस सीजन में पर्यटन प्रभावित होगा, जिसका नुक्सान आंदोलकारियों को भी होगा व प्रदेश सरकार को भी होगा। जहां तक पृथक गोरखलैंड राज्य के निर्माण की बात है तो पृथक राज्यों की मांग देश के अन्य हिस्सों में भी हो रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्षेत्र के महत्व व स्थानीय लोगों की समस्याओं को देखते हुए केंद्र सरकार ने नये राज्यों का भी गठन किया है। अत: जब आमजन को लगता है कि किसी विशेष भू-भाग से जुड़े रहने पर उनके विकास की अनदेखी हो रही है, तब वह आंदोलन कर सकते हैं जोकि उनका संवैधानिक अधिकार भी है। यह सरकार का दायित्व है कि वह अंसतुष्टों को कैसे संतुष्ट कर पाती है।</p>
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                <pubDate>Sun, 18 Jun 2017 23:41:49 +0530</pubDate>
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                <title>गोरखालैंड आंदोलन तेज, अतिरिक्त बल तैनात</title>
                                    <description><![CDATA[दार्जिलिंग: पश्चिम बंगाल में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) प्रमुख विमल गुरुंग के कार्यालय में कल पैरा-मिलिट्री बलों के छापे की कार्रवाई के विरोध में जीजेएम समर्थकों ने आज दूसरे दिन भी सरकारी संपत्तियों को आग लगाने की घटनाओं को अंजाम दिया। इस बीच कानून एवं व्यवस्था पर नियंत्रण के मद्देनजर केंद्र से भेजे गये 400 […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/international/gorkhaland-andolan-fast-deployed-additional-force/article-1289"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/gorkhaland.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>दार्जिलिंग:</strong> पश्चिम बंगाल में गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (जीजेएम) प्रमुख विमल गुरुंग के कार्यालय में कल पैरा-मिलिट्री बलों के छापे की कार्रवाई के विरोध में जीजेएम समर्थकों ने आज दूसरे दिन भी सरकारी संपत्तियों को आग लगाने की घटनाओं को अंजाम दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">इस बीच कानून एवं व्यवस्था पर नियंत्रण के मद्देनजर केंद्र से भेजे गये 400 और पैरा-मिलिट्री बल के जवान दार्जिलिंग पहुंच गये हैं। दूसरी तरफ राज्य सरकार ने सात और आईपीएस अधिकारियों को यहां तैनात किया है।</p>
<h2 style="text-align:justify;">अर्थव्यवस्था के अलावा अलग पहचान का भी सवाल</h2>
<p style="text-align:justify;">काफी लंबे समय से चल रहे इस आंदोलन के कुछ ठोस कारण हैं। भौगोलिक दृष्टि से यह इलाका पश्चिम बंगाल की मुख्यधारा से बहुत दूर है और भाषा-संस्कृति का बंगाली तत्व यहां काफी कमजोर है। साफ है कि अलग गोरखालैंड की मांग को महज विकास की आकांक्षा के रूप में नहीं समझा जा सकता। इसके पीछे पर्यटन और चाय की भिन्न अर्थव्यवस्था के अलावा अलग पहचान सवाल का भी है।</p>
<p style="text-align:justify;">विकास के मामले में पश्चिम बंगाल के बाकी हिस्सों का हाल भी ऐसा नहीं है कि गोरखालैंड वाले उसके साथ रहने को लालायित हों। इस पहाड़ी इलाके को विकास के एक अलग मॉडल की भी दरकार है।</p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;"><a href="http://10.0.0.122:1245/">Hindi News </a>से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें <a href="https://www.facebook.com/SachKahoonOfficial">Facebook</a> और <a href="https://x.com/SACHKAHOON">Twitter</a> पर फॉलो करें।</p>
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                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>अन्य खबरें</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 16 Jun 2017 02:54:07 +0530</pubDate>
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