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                <title>Black Money - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>कालेधन की वापसी की उम्मीद बढ़ी</title>
                                    <description><![CDATA[कालेधन की वापसी शुरू नहीं हुई तो सरकार के लिए कालांतर में समस्या खड़ी हो सकती है
कालेधन पर 30 प्रतिशत जुर्माना लगाकर सफेद करने की सुविधा दी थी
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/expectation-of-return-of-black-money-increased/article-10712"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2019-10/black-money.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">स्विस बैंक में जमा भारतीयों के कालेधन से जुड़ा पहले दौर का विवरण स्विट्जरलैंड ने भारत को सौंप दिया है। इसमें सक्रिय खातों की जानकारी दर्ज है। भारत और स्विट्जरलैंड के बीच नई स्वचालित सूचना विनिमय प्रणाली से यह जानकारी मिली है। इस जानकारी को विदेशी खातों में रखे गए कालेधन के खिलाफ लड़ाई में एक अहम सफलता माना जा रहा है। भारत उन 75 देशों में शामिल है, जिनके साथ स्विट्जरलैंड के संघीय कर प्रशासन (एफटीए) ने बैंक खातों की जानकारी साझा की है। यह शुरूआत वैश्विक मानदंडों के तहत हुई है। स्विस बैंकों में भारत के 100 खाते ऐसे भी हैं, जिन्हें 2018 में बंद कर दिया गया है। अगली कड़ी में इन बंद खातों में धन के लेन-देन की जानकारी भी दे दी जाएगी। स्विस नेशनल बैंक द्वारा दी जानकारी में बताया है कि भारतीयों का छह प्रतिशत घटकर 2018 में 6,757 करोड़ रुपए रह गया है। स्विस बैंकों में धन जमा करने वाले देशों की सूची में भारत दुनियाभर में 74वें पायदान पर है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि अन्य विदेशी बैंकों में भारतीय नागरिकों का कितना कालाधन जमा है, इस सिलसिले में कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन हाल ही में तीन अध्ययनों ने दावा किया है कि वर्ष 1980 से 2010 के दौरान भारतीयों का करीब 15 लाख करोड़ से लेकर 35 लाख करोड़ रुपए तक कालाधन विदेशी बैंकों में जमा हो सकता है। कालाधन का यह अनुमान नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक फायनेंस एंड पॉलिसी, एनसीएईआर और एनआईएफएम ने लगाया है। इन अध्ययनों ने यह भी कहा है कि सबसे ज्यादा कालाधन भूमि एवं भवन कारोबार, दवा उद्योग, पान मसाला, गुटखा, तंबाकू, बुलियन, वस्तु व्यापार, फिल्म और शिक्षा क्षेत्रों में लगा है। कांग्रेस नेता वीरप्पा मोइली की अध्यक्षता वाली स्थाई समिति की रिपोर्ट में भी यही बात सामने आई है। इस समिति ने सोलहवीं लोकसभा भंग होने से पहले तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन को 28 मार्च 2019 को यह रिपोर्ट सौंप दी थी, ‘स्टेटस आॅफ अनएकाउंटेड इनकम वेल्थ वोथ इनसाइड इंडिया एंड आउटसाइड द कंट्री शीर्षक वाली यह रिपोर्ट सत्रहवीं लोकसभा के पहले सत्र में पेश की जा चुकी है।</p>
<p style="text-align:justify;">संसदीय रिपोर्ट के अनुसार, कालेधन के सृजित व जमा होने के संबंध में न तो कोई विश्वसनीय आंकड़े हैं और न ही अनुमान लगाने का कोई सर्वमान्य तरीका प्रचलन में है। अब तक जो अनुमान लगाए गए हैं, उनमें न तो एकरूपता है और न ही गणना के तरीके को लेकर आमराय है। बावजूद यह सही है कि देश और देश के बाहर कालाधन बड़ी मात्रा में मौजूद है। यह देश की जीडीपी का सात प्रतिशत से लेकर 120 प्रतिशत तक हो सकता है। हालांकि मोदी सरकार ने कालेधन पर अंकुश के लिए ‘कालाधन अघोषित विदेशी आय एवं जायदाद और अस्तित्व विधेयक-2015 और कालाधन उत्सर्जित ही न हो, इस हेतु ‘बेनामी लेनदेन निरोधक विधेयक अस्तित्व में ला दिए हैं। ये दोनों विधेयक इसलिए एक दूसरे के पूरक हैं। एक तो आय से अधिक काली कमाई देश में पैदा करने के स्रोत उपलब्ध हैं, दूसरे इस कमाई को सुरक्षित रखने की सुविधा विदेशी बैंकों में हासिल है। लिहाजा कालाधन फल फूल रहा है। दोनों कानून एक साथ वजूद में आने से यह उम्मीद जग गई थी कि कालेधन पर कालांतर में लगाम लगेगी, जो अब सच्चाई में बदलती दिख रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल कालेधन के जो कुबेर राष्ट्र की संपत्ति राष्ट्र में लाकर बेदाग बचे रहना चाहते हैं, उनके लिए अघोषित संपत्ति देश में लाने के दो उपाय सुझाए गए हैं। वे संपत्ति की घोषणा करें और फिर 30 फीसदी कर व 30 फीसदी जुर्माना भर कर शेष राशि का वैध धन के रूप में इस्तेमाल करें। इस कानून में प्रावधान है कि विदेशी आय में कर चोरी प्रमाणित होती है तो 3 से 10 साल की सजा के साथ जुर्माना भी लगाया जा सकता है। इसी प्रकृति का अपराध दोबारा करने पर तीन से 10 साल की कैद के साथ 25 लाख से लेकर एक करोड़ रुपए तक का अर्थ-दण्ड लगाया जा सकता है। जाहिर है,कालाधन घोषित करने की यह कोई सरकारी योजना नहीं थी। अलबत्ता अज्ञात विदेशी धन पर कर व जुर्माना लगाने की ऐसी सुविधा थी, जिसे चुका कर व्यक्ति सफेदपोश बना रह सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसा ही उपाय प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव ने देशी कालेधन पर 30 प्रतिशत जुर्माना लगाकर सफेद करने की सुविधा दी थी। इस कारण सरकार को करोड़ों रुपए बतौर जुर्माना मिल गए थे और अरबों रुपए सफेद धन के रूप में तब्दील होकर देश की अर्थव्यस्था मजबूत करने के काम आए थे। कालाधन उत्सर्जित न हो, इस हेतु दूसरा कानून बेनामी लेनदेन पर लगाम लगाने के लिए लाया गया था। यह विधेयक 1988 से लंबित था। इस संशोधित विधेयक में बेनामी संपत्ति की जब्ती और जुर्माना से लेकर जेल की हवा खाने तक का प्रावधान है। साफ है,यह कानून देश में हो रहे कालेधन के सृजन और संग्रह पर अंकुश लगाने के लिए है।</p>
<p style="text-align:justify;">यह कानून मूल रूप से 1988 में बना था। लेकिन अंतर्निहित दोषों के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका। इससे संबंधित नियम पिछले 27 साल के दौरान नहीं बनाए जा सके। नतीजतन यह अधिनियम धूल खाता रहा। जबकि इस दौरान जनता दल, भाजपा और कांग्रेस सभी को काम करने का अवसर मिला। इससे पता चलता है कि हमारी सरकारें कालाधन पैदा न हो, इस पर अंकुश लगाने के नजरिए से कितनी लापरवाह रही हैं। सब-कुल मिलाकर मोदी सरकार के कालेधन को वापिस लाने के प्रयास लगातार बने रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारत के निवेदन पर स्विट्जरलैंड सरकार से जो समझौते हुए थे, उनके तहत स्विस बैंकों में भारतीयों के खातों की जानकारी मिलना तय थी। दरअसल स्विट्रलैंड ने कालाधन की पनाहगाह की अपनी छवि सुधारने के लिए कुछ वर्षों में कई सुधार किए हैं। 2014 में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद दोनों देशों ने अपने संबंध मजबूत बनाने के लिए ‘ग्लोबल आॅटोमेटिक एक्सचेंज आॅफ इंफोरमेशन’ संधि पर हस्ताक्षर भी किए हैं। इस संधि के तहत ही भारतीय खाताधारकों की सूचना भारत को दी गई है। प्रेस ट्रस्ट आॅफ इंडिया ने इन नामों को उजागर पहले ही कर दिया है। इस समाचार में कुछ नामों के संकेत शुरूआती अक्षर के रूप में ही दिए गए हैं। दरअसल स्विट्जरलैंड के गोपनीय कानून के मुताबिक नाम के पहले अक्षर, जन्म तिथि और उनकी राश्ट्रीयता सार्वजनिक की जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">यदि इस जानकारी के मिलने के बाद भी कालेधन की वापसी शुरू नहीं हुई तो सरकार के लिए कालांतर में समस्या खड़ी हो सकती है ? हालांकि ये जानकारियां स्विट्जरलैंड के यूबीए बैंक के सेवानिवृत कर्मचारी ऐल्मर ने एक सीडी बनाकर जग जाहिर कर दी है। इस सूची में 17 हजार अमेरिकियों और 2000 भारतीयों के नाम दर्ज हैं। अमेरिका तो इस सूची के आधार पर स्विस सरकार से 78 करोड़ डॉलर अपने देश का कालाधन वसूल करने में सफल हो गया है। ऐसी ही एक सूची 2008 में फ्रांस के लिष्टेंस्टीन बैंक के कर्मचारी हर्व फेल्सियानी ने भी बनाई थी। इस सीडी में भी भारतीय कालाधन के जमाखोरों के नाम हैं। ये दोनों सीडियां संप्रग सरकार के कार्यकाल के दौरान ही भारत सरकार के पास आ गई थीं। इन्हीं सीडियों के आधार पर राजग सरकार ने कालाधन वसूलने की कार्रवाई को आगे बढ़ाया है, जिसके परिणाम आते दिख रहे हैं।<br />
<strong><em>प्रमोद भार्गव</em></strong></p>
<p> </p>
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                                                            <category>फटाफट न्यूज़</category>
                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 10 Oct 2019 20:14:51 +0530</pubDate>
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                <title>अगले साल तक खुलेगा कालेधन का पूरा चिट्ठा</title>
                                    <description><![CDATA[स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के धन में 13 साल में सबसे तेज वृद्धि नई दिल्ली (एजेंसी)। वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को कहा कि स्विट्जरलैंड में भारतीयों द्वारा जमा किए गए (Complete, Blog, Black Money, Open, Till, Next, Year) कालेधन के सभी आंकड़े अगले वर्ष तक मिल जायेंगे। गोयल का यह बयान ऐसे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/complete-blog-of-black-money-will-be-open-till-next-year/article-4562"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/blackmoney.jpg" alt=""></a><br /><h1>स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के धन में 13 साल में सबसे तेज वृद्धि</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong></p>
<p style="text-align:justify;">वित्त मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को कहा कि स्विट्जरलैंड में भारतीयों द्वारा जमा किए गए <strong>(Complete, Blog, Black Money, Open, Till, Next, Year)</strong> कालेधन के सभी आंकड़े अगले वर्ष तक मिल जायेंगे। गोयल का यह बयान ऐसे समय में आया है जब स्विट्जरलैंड ने वीरवार को एक रिपोर्ट जारी किया, जिसके अनुसार वर्ष 2017 में भारतीय द्वारा उसके यहां जमा की गयी धनराशि 50 फीसदी से अधिक बढ़कर सात हजार करोड़ रुपये के पार पहुंच गई है।</p>
<h1>अवैध लेनदेन की आशंका जताना सही नहीं</h1>
<p style="text-align:justify;">गोयल ने यहां संवाददाताओं से कहा कि सरकार के पास सभी जानकारियां हैं और यदि कोई भी व्यक्ति दोषी पाया जायेगा तो उसके विरूद्ध कठोर कार्रवाई की जायेगी। वर्तमान समय में किसी भी व्यक्ति को देश से बाहर रुपये जमा करने का साहस नहीं है और यह सरकार के कठिन परिश्रम से संभव हुआ है। गोयल ने कहा कि भारत और स्विट्जरलैंड के बीच एक संधि है जिसके तहत उसने भारत और कुछ अन्य देशों द्वारा दी गयी जानकारियों के आधार पर विदेशी ग्राहकों के बारे में सूचनायें साझा करना शुरू कर दिया है। एक जनवरी 2018 से 31 मार्च 2019 तक सभी डाटा उपलब्ध हो जाएंगे। उन्होंने वीरवार को जारी रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि इसको अभी से कालाधन या अवैध लेनदेन की आशंका जताना सही नहीं है।</p>
<h1>राहुल का मोदी पर तंज, क्या अब ये व्हाइट मनी है!</h1>
<p style="text-align:justify;">कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने पिछले चार साल के दौरान स्विस बैंकों में भारतीयों की जमा राशि में 50 फीसदी की वृद्धि होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए शुक्रवार को कहा कि पहले इसे कालाधन बताने वाले मोदी उसे अब उसे सही बता रहे हैं। गांधी ने ट्वीट किया, ‘उन्होंने (मोदी)2014 में कहा, ‘मैं स्विस बैंक से सारा कलाधन वापस लाऊंगा और हर भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए जमा करूंगा। उन्होंने 2016 में कहा, ‘नोटबंदी से देश में कालाधन खत्म हो जाएगा। वह 2018 में कह रहे हैं भारतीयों द्वारा स्विस बैंक में जमा की गयी राशि 50 फीसदी बढ़ गयी है और यह सफेद पैसा है।</p>
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<p> </p>
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                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 29 Jun 2018 22:17:37 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
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                <title>राजनीतिक पार्टियों की काली कमाई</title>
                                    <description><![CDATA[देश विडंबनाओं के साथ भरा पड़ा है, खास कर राजनीति में जो कहा जाता है वह होता नहीं है, जो असलियत है वह बताई नहीं जाती। कालेधन की वापसी का दावा करने वाली राजनीतिक पार्टियां खुद ही काले धन पर पल रही हों तो आम आदमी का भौंच्चका रह जाना स्वाभाविक है। एक खुलासे के […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/editorial/black-money-of-political-parties/article-3880"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-06/black-money.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश विडंबनाओं के साथ भरा पड़ा है, खास कर राजनीति में जो कहा जाता है वह होता नहीं है, जो असलियत है वह बताई नहीं जाती। कालेधन की वापसी का दावा करने वाली राजनीतिक पार्टियां खुद ही काले धन पर पल रही हों तो आम आदमी का भौंच्चका रह जाना स्वाभाविक है। एक खुलासे के अनुसार राजनीतिक पार्टियों को 711 करोड़ का चंदा ‘अज्ञात स्त्रोतों’ से प्राप्त हुआ है। कानून की भाषा में यह कालाधन है जो कि दंडनीय है। इस राशि में सबसे बड़ा हिस्सा 532 करोड़ भाजपा के हिस्से आया है जो कांगे्रस सहित कई अन्य पार्टियों के कुल चंदे से 9 गुणा अधिक है। ऐसे हालातों में देश से बाहर रखा कालाधन वापिस लाने व देश के अंदर कालेधन का खात्मा करना असंभव है। दरअसल पैसा राजनीति में सबसे बड़ी बुराई बन गया है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंदा तकनीकी तौर पर रिश्वत का ही एक रूप हो गया है, जो धनवान राजनीतिक पार्टियों को चुनावों के समय जो दान दिया जाता है, सरकारें बनने पर पूंजीपतियों द्वारा वह कई गुणा अधिक वसूल किया जाता है। जब तक चंदा राजनीति का अंग बना रहेगा तब तक सुधार की गुजांईश बहुत कम है। सभी राजनेता यह बात सार्वजनिक तौर स्वीकार कर चुके हैं कि वह सिर्फ रूपयों की कमी के कारण ही हार गए। जब पार्टियां ‘पेशेवर चुनाव रणनीतिकारों’ को 500-700 करोड़ रूपये फीस के तौर पर देंगी तो लड़ाई विचारों की नहीं पैसों की होगी। एक प्रसिद्ध रणनीतिकार की तरफ से केन्द्र से लेकर राज्यों तक मुंह मांगी फीस देने वाली पार्टियों की सरकार बनाने की चर्चा है।</p>
<p style="text-align:justify;">चंदा एकत्रित करने की स्वीकृति के साथ-साथ चुनाव कमीशन की ओर से खर्च की सीमा तय करना व नामाकंन के समय उम्मीदवार द्वारा उसकी अपनी चल-अचल सम्पति के विवरण जारी करने के नियम बेअसर हो रहे हैं। बहुत से नेता चुनाव लड़ने की हिम्मत नहीं करते चूंकि उनके पास धन नहीं है। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिन्द्र सिंह ने तो यहां तक कह दिया था कि राजनीति राजनीतिक घरानों के वश की ही बात रह गई है। राजनीतिक पार्टियों के पास आया कालाधन चुनाव प्रबंध के साथ-साथ शासन-प्रशासन में भी भ्रष्टाचार पैदा करता है। पैसे की अधिकता लोकतंत्र को बौना करती है। राजनीतिक पार्टियों को चंदा एकत्रित करने पर राष्टÑीय बहस होनी चाहिए ताकि धन किसी भी पार्टी की ताकत न बने।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>सम्पादकीय</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 Jun 2018 08:30:41 +0530</pubDate>
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                <title>नोटबंदी से काले धन का सफाया नहीं : सर्वे का दावा</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली (एजेंसी)। देश के तैंतीस गैर सरकारी संगठनों द्वारा किए गए सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि 55 प्रतिशत लोगों का मानना है कि नोटबंदी से काले धन का सफाया नहीं हुआ और 48 प्रतिशत लोगों की राय है कि आतंकवादी हमलों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। गत वर्ष आठ नवंबर को प्रधानमंत्री […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/black-money-is-not-eliminated-from-the-ban-on-the-ban-survey-claims/article-3494"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-11/sarwe.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली (एजेंसी)।</strong> देश के तैंतीस गैर सरकारी संगठनों द्वारा किए गए सर्वेक्षण में दावा किया गया है कि 55 प्रतिशत लोगों का मानना है कि नोटबंदी से काले धन का सफाया नहीं हुआ और 48 प्रतिशत लोगों की राय है कि आतंकवादी हमलों पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। गत वर्ष आठ नवंबर को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा नोट बंदी की घोषणा के एक साल बाद देश की अर्थव्यस्था पर पड़े प्रभावों का अध्ययन करने वाले इस सर्वेक्षण की रिपोर्ट आज यहाँ जारी की गयी जिसमें यह निष्कर्ष सामने आया है।</p>
<p style="text-align:justify;">सामाजिक संगठन अनहद के नेतृत्व में देश के 21 राज्यों में 3647 लोगों के सर्वेक्षण के दौरान नोटबंदी से जुड़े 96 प्रश्न पूछे गए थे। प्रसिद्ध सामाजिक कार्यकर्ता जान दयाल, गौहर राजा, सुबोध मोहंती और शबनम हाशमी द्वारा आज यहाँ जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल 26.6 प्रतिशत लोगों का मानना है कि नोटबंदी से काले धन का सफाया हुआ है जबकि 55.4 प्रतिशत लोग मानते हैं कि कला धन नहीं पकड़ा गया जबकि 17.5 प्रतिशत लोगों ने इस पर जवाब नहीं दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">इसी तरह केवल 26.३ प्रतिशत ने माना कि नोटबंदी से आतंकवाद Ÿखत्म हो जायेगा जबकि 25.3 प्रतिशत ने कोई जवाब नहीं दिया। 33.2 प्रतिशत ने माना कि इससे घुसपैठ कम हुई जबकि 45.4 ने माना कि घुसपैठ कम नहीं हुई जबकि 22 प्रतिशत लोगों ने जवाब नहीं दिया। रिपोर्ट के अनुसार 48.6 प्रतिशत लोगों का कहना हा कि कैशलेस समाज बनाने का झांसा देने के लिए नोट बंदी की गयी जबकि 34.2 प्रतिशत लोगों ने कहा कि नगदी रहित अर्थव्यस्था अच्छी बात है और सरकार ने इस दिशा में कदम उठाया है जबकि केवल 17 प्रतिशत लोगों ने माना कि अर्थव्यस्था को नगदी रहित बनाने के लिए ही नोटबंदी की गयी।</p>
<p style="text-align:justify;">सर्वेक्षण में यह भी दावा किया गया है कि केवल 6.7 प्रतिशत लोगों का कहना है कि नोटबंदी से आम जनता को फायदा हुआ जबकि 60 प्रतिशत लोगों ने माना कि इस से कारपोरेट जगत को लाभ हुआ जबकि 26.7 प्रतिशत की नज़र में नोटबंदी से सर कार को फायदा हुआ। सर्वे में 65 प्रतिशत लोगों ने माना कि नोट बंदी के दौरान अमीर लोगबैंक की लाइन में नहीं लगे जबकि नोटबंदी से 50 प्रतिशत लोगों का भरोसा सरकार पर से खत्म हो गया। सर्वेक्षण को तैयार करने में वादा न तोड़ो, युवा, मजदूर किसान विकास संस्थान, आश्रय, आसरा मंच, नयी सोच, पहचान, रचना, अधिकार, अभियान जैसे अनेक संगठनों ने सहयोग किया है। रिपोर्ट में उन 90 मृतक की सूची भी दी गयी जो नोटबंदी के दौरान मौत के शिकार बने।</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>उत्तर प्रदेश</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 07 Nov 2017 06:29:31 +0530</pubDate>
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            <item>
                <title>डिजीटल भुगतान से कालाधन पर अंकुश</title>
                                    <description><![CDATA[नोटबंदी से काले धन की निकासी को लेकर पक्ष-प्रतिपक्ष या आर्थिक विश्लेषक भले ही आज भी एकमत ना हो या उनके द्वारा कुछ भी कहा जा रहा हो, पर एक बात साफ हो गई है कि नोटबंदी के बाद देश में डिजीटल भुगतान की ओर लोगों का रुझान तेजी से बढ़ा है। विमुद्रीकरण के पीछे […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/hindi-article-black-money/article-2762"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/black-money1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">नोटबंदी से काले धन की निकासी को लेकर पक्ष-प्रतिपक्ष या आर्थिक विश्लेषक भले ही आज भी एकमत ना हो या उनके द्वारा कुछ भी कहा जा रहा हो, पर एक बात साफ हो गई है कि नोटबंदी के बाद देश में डिजीटल भुगतान की ओर लोगों का रुझान तेजी से बढ़ा है। विमुद्रीकरण के पीछे सरकार की और कोई मंशा हो या ना हो, पर लोगों को डिजीटल भुगतान व्यवस्था से जोड़ने की मंशा भी एक रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">डिजीटल भुगतान से दो नंबर में भुगतान, यानि कालाधन पर कुछ हद तक प्रभावी रोक लगाने में सरकार सफल होती दिख रही है। इसका कारण भी है, क्योंंकि विमुद्रीकरण के पहले सरकार के लाख प्रयासों के बावजूद देश में चेक से भुगतान की प्रवृति नहीं बढ़ पाई थी। विमुद्रीकरण के बाद देश में डिजीटल या यूं कहें कि कार्ड के जरिए भुगतान में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी से साफ होने लगा है कि लोगों में अब डिजीटल भुगतान को लेकर जागृति आई है।</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल कालाधन के कई रास्तों में से एक दो नंबर में नकद भुगतान और बड़े नोटों का संग्रह रहा है। विमुद्रीकरण और इसके बाद बैंकों से लेनदेन खासतौर से एटीएम या अन्य माध्यमों से लेन-देन को सीमित या सीमा तय करने से प्रभाव सामने आया है। हालांकि सरकार के इन फैसलों पर सोशल मीडिया को हथियार बनाकर भ्रांतियां फैलाने के लाख प्रयास किए गए, पर सरकार अपने दोनों ही उद्देश्यों को पूरा कराने में सफल रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">देशवासी विमुद्रीकरण के महत्व को समझने लगे हैं, वहीं अब लोगों में बड़े नोटों को जमा करने की प्रवृति पर भी स्वप्रेरित अंकुश लगा है। कम से कम आरबीआई के आंकड़े तो यही कह रहे हैं। इसके साथ ही नवंबर-दिसंबर के विमुद्रीकरण या यों कहे कि नोटबंदी के परिणाम अब प्राप्त होने लगे हैं। विमुद्रीकरण और नकदी उपलब्धता को लेकर एसबीआई द्वारा तैयार कराई गई एक रिपोर्ट तो यही कहती है।</p>
<p style="text-align:justify;">रिपोर्ट के अनुसार देश में बड़े नोटों का चलन कम हुआ है, छोटी नकदी का उपयोग बढ़ा है और लोगों में डिजीटल भुगतान की प्रति रुझान बढ़ा है। जहां एक और कार्ड के जरिए भुगतान में 40 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई हैं वहीं बड़े नोटों के लेनदेन में 14 फीसदी की कमी आई है। छोटे नोटों खासतौर से एक सौ रुपए के नोट का चलन बढ़ा है। सरकार ने भी बाजार में छोटे नोट अधिक उतारे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">देखा जाए तो नरेन्द्र मोदी सरकार ने सोची समझी रणनीति के तहत आर्थिक सुधारों को बढ़ावा दिया है। सरकार बनते ही पहले गरीब से गरीब आदमी को जन धन योजना से जोड़ने के लिए जीरो बैलेंस पर जनधन खातें खोले गए हालांकि उस समय इसकी काफी आलोचना हुई पर देश के आम आदमी की भी आसानी से बैंकों तक पहुंच हो सकी। जन धन योजना में लाखों खाते खुले और 30-35 हजार करोड़ रुपए से अधिक की राशि इन खातों मे ंजमा हो गई।</p>
<p style="text-align:justify;">देखने वाली बात यह है कि यह राशि उस गरीब आदमी की बचत है जो दो समय की रोटी के लिए संघर्षरत है। हालांकि नोटबंदी के दौरान जन-धन खातों में कालाधन जमा होने की संभावना जताई जाती रही पर 50 दिनों में यही कही तीन साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए के आसपास इन जनधन खातों में जमा हुए जिससे साफ है कि जनधन खातों में अधिकांश पैसा नोटबंदी के अतिरिक्त जमा हुआ है।</p>
<p style="text-align:justify;">सोची-समझी रणनीति के तहत ही सरकार ने कालाधन की स्वघोषणा का अवसर दिया और उसके बाद नवंबर में पूरे देश को चौकाते हुए हजार और पांच सौ के नोटों को बंद करने की घोषणा कर दी। हालांकि नोटबंदी के दौरान आमजन को परेशानी का सामना करना पड़ा, सरकार को विपक्ष की आलोचना का शिकार भी होना पड़ा पर इसके बाद हुए चुनावों के परिणामों ने सरकार के पक्ष में मेंडेट देकर सारे कयासों को निर्मूल सिद्ध कर दिया।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार ने सोच समझ कर ही बड़े नोट बाजार में कम उतारे और उसका परिणाम सामने हैं। बैंक खातों को आधार से अनिवार्य रुप से जोड़ने का परिणाम यह हो रहा है कि अब कालाधन आसानी से पकड़ में आ सकेगा। सरकार डिजीटल लेन देन को बढ़ावा देने के लिए ही बैंकिंग सेवाओं को शुल्क के दायरें मेंं ला रही है। देखा जाए तो बैंकिंग सेवाएं अब सेवा नहीं रही बल्कि पेड सेवा बन गई है। आधार से जुड़ते ही बेनामी खातों या एक से अधिक खातों की पकड़ भी आसान हो गई है। और अब तो एक जुलाई से जीएसटी लागू कर सरकार ने साफ संकेत दे दिया है।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि इन सुधारों से देश की आर्थिक विकास की गति प्रभावित हुई है, पर नए और कठोर निर्णयों का अल्पगामी व दूरगामी प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। आज दुनिया के देशों में भारतीय अर्थ व्यवस्था को सशक्त आर्थिक व्यवस्था के रुप में देखा जा रहा है। हालांकि नवंबर से अब तक अर्थ जगत में विरोध के स्वरों के कारण आर्थिक गतिविधयां प्रभावित हो रही है। पहले नोटबंदी और अब जीएसटी के नाम पर विरोध हो रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">पर यह नहीं भूलना चाहिए कि नवाचार को अपनाने में समय लगता है पर सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने की पूरी संभावनाएं भी रहती है। बड़े नोटों के लेनदेन में 14 प्रतिशत की बड़ी कमी और कार्ड से भुगतान में 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी इसका साफ संकेत हैं। देश का नागरिक आर्थिक सुधारों में विश्वास रखता है, सहजता से स्वीकार भी करता है। खासतौर से जब नई चीजें आती है तो थोेड़े समय में स्वीकार्य भी हो जाती है।</p>
<p style="text-align:justify;">बड़े नोटों के लेन देन में कमी से कालाधन का संग्रहण कम होगा वहीं डिजीटल लेनदेन से कालाधन और भ्रष्टाचार पर कुछ हद तक रोक लग सकेगी। जिस तरह से राजीव गांधी की कम्प्यूटर क्रांति के सकारात्मक परिणाम आज देखने को मिल रहे हैं आने वाले समय में डिजीटल भुगतान के और अधिक सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे और भारतीय अर्थ व्यवस्था अधिक सशक्त होकर उभरेगी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-डॉ़ राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
</p><p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 31 Jul 2017 23:10:22 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>विदेशों में जमा काले धन के बारे में सरकार के पास नहीं है कोई जानकारी</title>
                                    <description><![CDATA[नई दिल्ली। भारतीयों ने विदेशों या विदेशी बैंकों में कितना कालाधन जमा कर रखा है, उस बारे में सरकार के पास कोई आधिकारिक अनुमान नहीं है। लोकसभा में एक सवाल का लिखित में जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने यह बात कही। हालांकि, उन्होंने बताया कि वित्त मामलों पर स्थाई समिति की […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/government-does-not-have-any-information-about-black-money-deposited/article-2506"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/govt.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> भारतीयों ने विदेशों या विदेशी बैंकों में कितना कालाधन जमा कर रखा है, उस बारे में सरकार के पास कोई आधिकारिक अनुमान नहीं है। लोकसभा में एक सवाल का लिखित में जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री अरूण जेटली ने यह बात कही। हालांकि, उन्होंने बताया कि वित्त मामलों पर स्थाई समिति की सिफारिशों के आधार पर सरकार ने देश के अंदर और बाहर इस तरह के धन का अनुमान लगाने के लिए एक अध्ययन शुरू कराया है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि यह अध्ययन राष्ट्रीय लोकवित्त एवं नीति (एनआईपीएफपी), राष्ट्रीय आर्थिक प्रयुक्त अनुसंधान परिषद (एनसीएईआर) और राष्ट्रीय वित्त प्रबंध संस्थान (एनआईएफएम) द्वारा किया जा रहा है। इन संस्थानों की रिपोर्टों के नतीजों पर सरकार की प्रतिक्रिया वित्त मामलों की स्थाई समिति के समक्ष जल्द ही रखी जाएगी।</p>
<h1 style="text-align:justify;">628 भारतीयों के बैंक खाते का लगा पता</h1>
<p style="text-align:justify;">सरकार का कहना है कि स्विट्जरलैंड में एचएसबीसी के बैंक खातों में 628 भारतीयों के बैंक खाते होने की सूचना सरकार को फ्रांस सरकार से दोहरे कराधान से बचाव समझौते (डीटीएसी) के तहत मिली थी। इन मामलों की जांच के जरिए 8,437 करोड़ रूपए की अघोषित आय को मई 2017 तक कर के दायरे में लाया गया। गौरतलब है कि काला धन पर रोक लगाने के लिए सूचना के आदान प्रदान के लिए जनवरी 2017 तक भारत के 139 देशों सिंगापुर सहित विदेशी क्षेत्राधिकारों के साथ कर समझौते हैं।</p>
<h1 style="text-align:justify;">10 वर्षों में कालेधन को सफेद करने के 2,260 मामले दर्ज</h1>
<p style="text-align:justify;">देश में पिछले 10 वर्षों के दौरान धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) के तहत 2,260 मामले दर्ज किए। केंद्रीय वित्त मंत्री जेटली ने लोकसभा में बताया कि देश में पिछले 10 वर्षों में धन शोधन (मनी लाउंडिंÑग) निवारण अधिनियम के तहत 2,260 मामले दर्ज किए गए। उन्होंने बताया कि इस कानून के तहत 370 मामलों में मुकदमा दायर किया गया और धन शोधन को लेकर दो मामलों में दो लोगों की दोष सिद्धि हुई।</p>
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                <pubDate>Fri, 21 Jul 2017 06:57:38 +0530</pubDate>
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                            </item>
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                <title>कालेधन पर लगाम की कोशिश है जीएसटी</title>
                                    <description><![CDATA[30जून 2017’ भारतीय इतिहास में 8 नवंबर के बाद एक और ऐतिहासिक तारीख साबित हुई। यहां 8 नवंबर का जिक्र इसलिए किया गया है, क्योंकि नोटबंदी कालेधन पर प्रहार करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था। जीएसटी को उसी लक्ष्य को हासिल करने हेतु अगला कदम समझा जा सकता है। क्योंकि नोटबंदी के बाद सरकार […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/gst-try-to-control-on-black-money/article-1891"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-07/gst-1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">30जून 2017’ भारतीय इतिहास में 8 नवंबर के बाद एक और ऐतिहासिक तारीख साबित हुई। यहां 8 नवंबर का जिक्र इसलिए किया गया है, क्योंकि नोटबंदी कालेधन पर प्रहार करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम था। जीएसटी को उसी लक्ष्य को हासिल करने हेतु अगला कदम समझा जा सकता है। क्योंकि नोटबंदी के बाद सरकार के पास सबसे बड़ी चुनौती कालेधन को दोबारा नहीं पनपने देने की है। इस बात को समझने के लिए पहले यह समझना होगा कि कालाधन बनता कैसे है?</p>
<p style="text-align:justify;">कालाधन दो तरह का होता है, एक वो जो भ्रष्टाचार के द्वारा सरकारी अधिकारियों द्वारा रिश्वत के रूप में लिया जाता है और दूसरा वो जो सरकार को कर न देकर बचाया जाता है। अधिकारियों द्वारा जो रिश्वत ली जाती है, उस कालेधन से आम आदमी पिसता है। जबकि कर बचाकर जो काला धन बनाया जाता है, उससे सरकार को राजस्व की हानि होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">क्या यह आश्चर्यजनक नहीं है कि वह देश जिसकी आबादी सवा करोड़ है, उसमें कर देने वालों की संख्या मात्र 1.5% है? कुल मिलाकर इन परिस्थितियों में नुकसान देश का ही है। तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का जीएसटी रूपी यह कदम उस कालेधन पर लगाम लगाने की कोशिश कहा जा सकता है, जो कर चोरी द्वारा पनपता है।</p>
<p style="text-align:justify;">यहां यह समझना जरूरी है कि कर दो प्रकार के होते हैं- एक प्रत्यक्ष और दूसरे अप्रत्यक्ष। प्रत्यक्ष कर वो जो हम सरकार को सीधे तौर पर देते हैं- जैसे आयकर, सम्पत्ति कर आदि। अप्रत्यक्ष कर वो जो व्यापारी या फिर सर्विस प्रोवाइडर अपने ग्राहक से लेकर सरकार को देता है। सर्वप्रथम समझने वाली बात यह है कि जीएसटी के दायरे में केवल अप्रत्यक्ष कर आ रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रत्यक्ष कर यथावत् ही हैं। अब जो अप्रत्यक्ष कर हैं, वो अभी तक ग्राहक से तो ले लिए जाते थे, लेकिन सरकार के खाते में पहुंच नहीं पाते थे। बात केवल इतनी भी नहीं है, दरअसल भारतीय कर प्रणाली जो अभी तक चल रही थी, उसमें जटिलताएं भी बहुत थीं। अभी तक भारतीय संविधान के अनुसार वस्तुओं की बिक्री पर राज्य सरकार कर लेती थीं और वस्तुओं के उत्पादन व सेवाओं पर केन्द्र सरकार।</p>
<p style="text-align:justify;">किसी सामान के निर्माण के साथ ही सर्वप्रथम उस पर एक्साइज ड्यूटी और किसी किसी मामले में एडीशनल एक्साइज ड्यूटी भी लगती थी। इसके बाद लगता था सर्विस टैक्स। यदि माल एक राज्य से दूसरे राज्य में जाता है, तो देना होता था एन्ट्री टैक्स। इसके बाद उस पर लगता था उस राज्य का वैट, यानी सेल्स टैक्स। और अगर उस सामान का नाता मनोरंजन से है, तो मनोरंजन अथवा लग्जरी टैक्स लगता था।</p>
<p style="text-align:justify;">टैक्स का यह सिलसिला काफी लम्बा था, कुल मिलाकर अलग-अलग लगभग 18 टैक्स लगते थे और सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह कि भारत का उपभोक्ता एक आम आदमी इन परिस्थितियों में टैक्स पर टैक्स देने को विवश था। बावजूद इसके सरकारी खजाना खाली रहता था और काले धन से व्यापारियों की तिजोरियां भरी।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन जीएसटी के लागू हो जाने से न सिर्फ इतने अलग-अलग प्रकार के टैक्सों से छुटकारा मिलेगा, बल्कि चूंकि टैक्स भरने की प्रक्रिया कम्प्यूटर पर होने के कारण टैक्स जमा करने के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काटने से भी आजादी मिलेगी। अगर इसके तकनीकी पहलू पर बात करें, तो 20 लाख के टर्नओवर वाले व्यापारियों को जीएसटी के दायरे से बाहर रखा गया है, जबकि 75 लाख के टर्नओवर वाले व्यापारियों को कम्पोसिट स्कीम के अन्तर्गत केवल 1% टैक्स चुकाना है। यहां यह जानकारी विशेष महत्व रखती है कि भारत में लगभग 68% व्यापारी इन्हीं दो श्रेणियों में आते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">तो कुल मिलाकर इतना तो तय है कि जीएसटी भारतीय अर्थव्यवस्था में न सिर्फ खुद एक बुनियादी बदलाव है, बल्कि सरकार द्वारा राजस्व प्राप्ती में भी ठोस बदलाव लाने वाला एक महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगा। काले धन के एक प्रकार पर सरकार के जीएसटी रूपी वार के बाद देश को इंतजार रहेगा भ्रष्टाचार रूपी कालेधन पर लगाम का। क्योंकि सरकार होती तो जनता के लिए है, लेकिन जब तक उसे चलाने वाले नेता और अधिकारियों के भ्रष्ट आचरण को रोकने में वह नाकाम रहेगी, तब तक नोटबंदी और जीएसटी जैसे कदम भी अपना मकसद हल करने में नाकाम ही सिद्ध होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-डॉ. नीलम महेंद्र</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                <pubDate>Sun, 02 Jul 2017 22:24:14 +0530</pubDate>
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                <title>कालाधान: सूचनाओं के आदान-प्रदान को स्विटजरलैंड की मंजूरी</title>
                                    <description><![CDATA[संघीय परिषद की मुहर नई दिल्ली। स्विस बैंकों में कालाधन रखने वाले भारतीय तक सरकार की पकड़ अब आसान होने वाली है, क्योंकि उनकी बैंक की सारी डिटेल तुरंत सरकार तक पहुंच जाएगी। दरअसल, स्विट्जरलैंड ने भारत और 40 अन्य देशों के साथ अपने यहां संबंधित देश के लोगों के वित्तीय खातों, संदिग्ध काले धन […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/uttar-pradesh/switzerland-approval-for-exchange-information-about-black-money/article-1307"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/plastic-note1.jpg" alt=""></a><br /><h1 style="text-align:center;">संघीय परिषद की मुहर</h1>
<p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली।</strong> स्विस बैंकों में कालाधन रखने वाले भारतीय तक सरकार की पकड़ अब आसान होने वाली है, क्योंकि उनकी बैंक की सारी डिटेल तुरंत सरकार तक पहुंच जाएगी। दरअसल, स्विट्जरलैंड ने भारत और 40 अन्य देशों के साथ अपने यहां संबंधित देश के लोगों के वित्तीय खातों, संदिग्ध काले धन से संबंधित सूचनाओं के आदान- प्रदान की व्यवस्था को शुक्रवार को मंजूरी दे दी।</p>
<p style="text-align:justify;">अब इन देशों को गोपनीयता और सूचना की सुरक्षा के कड़े नियमों का अनुपालन करना होगा। टैक्स संबंधी सूचनाओं के स्वत: आदान-प्रदान पर वैश्विक संधि को मंजूरी के प्रस्ताव पर स्विट्जरलैंड की संघीय परिषद की मुहर लग गई है। स्विट्जरलैंड सरकार ने इस व्यवस्था को वर्ष 2018 से संबंधित सूचनाओं के साथ शुरू करने का निर्णय लिया है यानी आंकड़ों के आदन प्रदान की शुरुआत 2019 में होगी।</p>
<p style="text-align:justify;">
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                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 16 Jun 2017 08:44:02 +0530</pubDate>
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