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                <title>Bizarre news - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>OMG News: धरती की वो पहली खास जगह, जो समुंदर से बाहर निकली, क्या आप जानते हैं भारत के किस राज्य में स्थित है वो जगह?</title>
                                    <description><![CDATA[OMG News: (सच कहूं/अनु सैनी)। एक दौर था जब पूरी पृथ्वी केवल समुंदर के ही अंदर थी, यानी सतह पर केवल पानी ही पानी था, उसके बाद धरती के कुछ हिस्से सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकले,लेकिन सवाल ये है कि वो कौन सा इलाका था जो सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकला था? दरअसल […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/the-first-special-place-on-earth-that-came-out-of-the-sea/article-61751"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-09/omg-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>OMG News: (सच कहूं/अनु सैनी)। </strong>एक दौर था जब पूरी पृथ्वी केवल समुंदर के ही अंदर थी, यानी सतह पर केवल पानी ही पानी था, उसके बाद धरती के कुछ हिस्से सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकले,लेकिन सवाल ये है कि वो कौन सा इलाका था जो सबसे पहले समुंद्र से बाहर निकला था? दरअसल अब तक हम सब यहीं मानते आ रहे हैं कि सबसे पहले अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया समुद्र से बाहर आए, लेकिन अब एक नई रिसर्च में सामने आया है कि झारखंड में सिंहभूम जिला समुद्र से बाहर आने वाला दुनिया का पहला जमीनी हिस्सा है, 13 देशों के 8 रिसर्चर्स 7 साल की रिसर्च के बाद इस नतीजे पर पहुंचे हैं।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/use-rice-water-to-keep-your-skin-glowing/">Skin Care: स्किन को ग्लोइंग रखने के लिए करें चावल के पानी का इस्तेमाल, एक्सपर्ट से जानें इसे बनाने और यूज करने का तरीका…</a></p>
<h3 style="text-align:justify;">रिसर्च खोज की कहानी.. OMG News</h3>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम में रिसर्च टीम की अगुआई करने वाल आॅस्ट्रेलिया के पीटर केवुड ने कहा, कि हमारा सौरमंडल, पृथ्वी या दूसरे ग्रह कैसे बने? इन सवालों की खोज में वे और उनकी टीम के 1 साथी, जिनमें 4 भारत से थे, इन सबने 7 साल तक झारखंड के कोल्हान और ओडिशा के क्योंझर समेत कई दूसरे जिलों के पहाड़-पर्वतों को छान मारा। उन्होंने कहा कि पृथ्वी से जमीन कब बाहर निकली, इस सवाल का जवाब खोजने के लिए जुनून जरूरी था, ये जगह नक्सल प्रभावित हैं, लेकिन हमने तय किया था कि करना है, सो करना है।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं अपने 6-7 साल के फील्ड वर्क में लगभग 300-400 किलो पत्थरों का लेबोरेट्री में टेस्ट किया हैं, इनमें कुछ बलुआ पत्थर थे और कुछ पत्थर ग्रेनाइट थे, उन्होंने जो बलुआ पत्थर देखें, उनकी खासियत यह थी कि उनका निर्माण नदी या समुद्र के किनारे हुआ था, उनका कहना हैं कि नदी या समुद्र का किनार तभी हो सकता हैं, जब आसपास भूखंड हों।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सिंहभूम 320 करोड़ साल पहले बना था | OMG News</h3>
<p style="text-align:justify;">वहीं पीटर ने कहा, कि जब उन्होंने बलुआ पत्थरों की उम्र निर्धारित करने की कोशिश की, तो तब उन्हें पता चला कि सिंहभूम आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले बना था, इसका मतलब यह हुआ कि आज से लगभग 320 करोड़ साल पहले यह हिस्सा एक भूखंड के रूप में समुद्र की सतह से ऊपर था।</p>
<p style="text-align:justify;">वहीं अब तक माना जाता रहा है कि अफ्रीका और आॅस्ट्रेलिया के क्षेत्र सबसे पहले समुद्र से बाहर निकले, लेकिन हमने पाया कि सिंहभूमि क्षेत्र उनसे भी 20 करोड़ साल पहले बाहर आया, उन्होंने दावा किया कि सिंहभूम क्रेटान समुद्र से निकला पहला द्वीप है, यह हमारी पूरी टीम के लिए बड़ा ही रोमांचक पल था।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सिंहभूम महाद्वीप के नाम से जाना जाता है ये इलाका</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने जब सिंहभूम के ग्रेनाइट पत्थर की जांच की तो यह पता चला, कि सिंहभूम महाद्वीप आज से तकरीबन 350 से 320 करोड़ साल पहले लगातार ज्वालामुखी गतिविधियों से बना था, इसका मतलब यह हुआ कि 320 करोड़ साल पहले सिंहभूम महाद्वीप समुद्र की सतह से ऊपर आया, लेकिन उसके बनने की प्रक्रिया उससे भी पहले शुरू हो गई थी।</p>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि यह क्षेत्र उत्तर में जमशेदपुर से लेकर दक्षिण में महागिरी तक, पूर्व में ओडिशा के सिमलीपाल से पश्चिम में वीर टोला तक फैला हुआ है, इस क्षेत्र को हम सिंहभूम क्रेटान या महाद्वीप कहते हैं, पीटर ने बताया, कि शोध के लिए उन्होंने पिछले 6-7 साल में कई बार सिंहभूम महाद्वीप के कई हिस्सों में फील्ड वर्क किया जैसे कि समलीपाल, जोड़ा, जमशेदपुर, क्योंझर इत्यादि… अध्ययन के दौरान हमारा केंद्र जमशेदपुर और ओडिशा का जोड़ा शहर था, यहीं से कभी बाइक से कभी बस-कार से फील्ड वर्क पर निकलते थे।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आगे की रिसर्च के लिए खुली राह | OMG News</h3>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम दुनिया का पहला द्वीप हैं, जो समुद्र से बाहर निकला, यानी यहां के आयरन ओर की पहाड़ियों समेत दूसरी पहाड़ियां 320 करोड़ साल से भी ज्यादा पुरानी हैं, इस रिसर्च के मॉड्यूल से पहाड़ी से इलाकों अथवा पठारी क्षेत्र में आयरन, गोल्ड माइंस खोजने में सहूलियत होगी। इसके अलावा बस्तर, धारवाड़ इलाकों में भूमिगत घटनाओं की उत्पति की जानकारी मिलेगी, भू-गर्भीय अध्ययन के लिए भी यह रिसर्च बहुत उपयोगी साबित होगी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कोलकाता-बारीपदा से कूरियर के जरिए आॅस्ट्रेलिया भेजे जाते थे पत्थर</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि उनकी टीम अलग-अलग समय पर शोध के लिए भारत पहुंची, इस दौरान तीन से 4 क्विंटल पत्थर रिसर्च के लिए इकट्ठे किए, उन्हें बारीपदा और कोलकाता के रास्ते आॅस्ट्रेलिया के लिए कूरियर से भेजा। उन्होंने बताया कि वे सब होटल या किसी ढाबे में खाना खाते थे, और रिसर्च के लिए जंगल-पहाड़ों को निकलते थे। उन्होंने बताया कि उनका फिल्ड वर्क 2017 और 2018 में ज्यादा रहा। उन्होंने खासतौर पर बताया कि नक्सल प्रभावित एरिया होने के बावजूद भी उन्हें कोई परेशानी नहीं हुई।</p>
<h3 style="text-align:justify;">सैंपल कलेक्शन करने में स्थानीय लोगों ने की मदद</h3>
<p style="text-align:justify;">वे पत्थरों को उनके प्राकृतिक रूप में समझने की कोशिश करते थे, जैसे उनका स्वरूप कैसा है, उनका रंग क्या है, वे कितनी आसानी से टूट सकते हैं, कितनी दूर तक फैले हुए हैं, हम अलग-अलग समय में आते थे, कभी बरसात, तो कभी गर्मी के दिनों में फील्ड वर्क में सबसे कठिन काम यह ढूंढना होता था कि पत्थर कहां पर मौजूद हैं। उन्होंने बताया कि उनके पास मैप होते थे, लेकिन ज्यादातर समय छोटी चट्टानें या फिर सड़कों के किनारे या नदी नालों के किनारे स्थित पत्थरों तक पहुंचने के लिए हमें स्थानीय लोगों की मदद लेनी पड़ी। सिंहभूम में फील्ड वर्क करने के दौरान ऐसी परिस्थितियां आई, जब स्थानीय लोगों ने हमें पत्थर ढूंढने में बहुत मदद की थी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">5-5 किलो के थैलों में कलेक्ट करते थे सैंपल</h3>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि पत्थरों को प्राकृतिक रूप में जांचने के बाद वे उनका सैंपल कलेक्ट करते और लैबोरेट्रीज में ले जाते थे। वे 5-5 किलो के थैलों में सैंपल कलेक्ट करते थे, सैंपल कलेक्ट करने के लिए वे पत्थरों को हथौडेÞ से मारकर उनके टुकड़े करते थे, उनका कहना है कि ये काम भी बहुत कठीन था।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि उन्हें कभी-कभी ऐसे पत्थर मिलते थे, जिन्हें तोड़ने के लिए बहुत मशक्कत करनी पड़ती थी इन सैंपल को हम लैबोरेट्री में ले जाते थे, वहां यह खोज की जाती थी, कि वे किन-किन रासायनिक तत्वों से बने थे जैसे, लोहा, मैग्नीशियम, आॅक्सीजन वगैरह, आखिरकार हमारे संघर्ष का मुकाम सुखद रहा। इस तरह हमने पाया कि समुद्र से निकलने वाला द्वीप हमारा सिंहभूम ही था।</p>
<h3 style="text-align:justify;">रिसर्च टीम में ये वैज्ञानिक रहे शामिल</h3>
<p style="text-align:justify;">सिंहभूम पर 7 साल तक रिसर्च करने वाले वैज्ञानिकों की टीम में आॅस्ट्रेलिया की मोनाश यूनिविर्सिटी के पीटर केवुड़, जैकब मल्डर, शुभोजीत राय, प्रियदर्शी चौधरी और आॅलिवर नेबेल, आॅस्ट्रेलिया की ही यूनिवर्सिटी आॅफ मेलबर्न की ऐल्श्री वेनराइट, अमेरिका के कैलिफोर्निया इंस्टूट्यूट आॅफ टेकनोलॉजी के सूर्यजेंदु भट्टाचार्यों के साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी के शुभम मुखर्जी शामिल हैं।</p>
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                                                            <category>देश</category>
                                            <category>साहित्य</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 03 Sep 2024 11:28:51 +0530</pubDate>
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                <title>NASA: अंतर&amp;#x200d;िक्ष में मिल गया है पृथ्&amp;#x200d;वी जैसा ग्रह, चंद्रमा की तरह चमकता भी है, इतना मिला तापमान&amp;#8230;.</title>
                                    <description><![CDATA[space news: डॉ. संदीप सिंहमार। खगोल वैज्ञानिकों के हाथ एक बड़ी सफलता लगी है। इन वैज्ञानिकों ने सुदूर अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसे ग्रहों की खोज कर ली है। खास बात यह है कि पृथ्वी जैसा नजर आने वाला यह ग्रह चंद्रमा की तरह चमकता भी है और वैज्ञानिकों ने पहली बार इस ग्रह का तापमान […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/earth-like-planet-has-been-found-in-space/article-56115"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/nasaa.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">space news: डॉ. संदीप सिंहमार। खगोल वैज्ञानिकों के हाथ एक बड़ी सफलता लगी है। इन वैज्ञानिकों ने सुदूर अंतरिक्ष में पृथ्वी जैसे ग्रहों की खोज कर ली है। खास बात यह है कि पृथ्वी जैसा नजर आने वाला यह ग्रह चंद्रमा की तरह चमकता भी है और वैज्ञानिकों ने पहली बार इस ग्रह का तापमान भी मापा है। TRAPPIST-1b नाम का यह ग्रह देखने में बिल्कुल पृथ्वी जैसा लग रहा है। ऐसा कर दिखाया है अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा (NASA) ने। इस ग्रह की खोज के बाद नासा के वैज्ञानिक अब इस खोज में लगे हैं कि क्या यह मनुष्य रह सकता है या नहीं। इस ग्रह पर मनुष्य का जीवन संभव हुआ तो यह नासा की अब तक की सबसे बड़ी खोज होगी। नासा के वैज्ञानिक इस खोज को लेकर बड़े ही उत्साहित हैं। वैज्ञानिक वर्षों से ऐसे ग्रह की तलाश कर रहे हैं,जो पृथ्‍वी की तरह हो। जहां जीवन की संभावना हो। लेकिन अभी तक कोई भी ऐसा ग्रह उन्‍हें नहीं मिला था,पर अब यह सफलता मिली है। वैसे तो खगोल वैज्ञानिकों ने उनकी संभावना वाले ग्रह की पहले भी खोज की है लेकिन ऐसा संभव नहीं हो पाया। जीवन संभव होगा या नहीं इस पर अभी कुछ नहीं कहा जा सकता।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/swollen-veins/">Swollen Veins: क्या फूली हुई नसें हानिकारक हैं? लक्षण, कारण और उपचार, जानें डॉक्टर की जुबानी</a></p>
<h3 style="text-align:justify;">वायुमंडल नहीं मिला</h3>
<p style="text-align:justify;">अमेर‍िकी अंतर‍िक्ष एजेंसी नासा ने पृथ्वी की तरह दिखाई देने वाले ग्रह की खोज तो कर ली है। लेकिन सबसे बड़ी समस्या यह है कि इस ग्रह पर वायुमंडल नहीं है और वायुमंडल के बिना जीवन की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। इसल‍िए ये दावा तो अभी कल्पनाशील ही रहेगा कि यहां जीवन की संभावना है। पर वैज्ञानिकों की खोज जारी है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">यह है मेट्रो की रिपोर्ट</h3>
<p style="text-align:justify;">मेट्रो की रिपोर्ट के अनुसार नासा के स्पेस टेलीस्कोप ने ट्रैपिस्ट-1 नामक तारे की परिक्रमा कर रहे कई चट्टानी एक्सोप्लैनेट की खोज की थी। लेकिन अब जेम्स वेब स्पेस टेलीस्कोप ने तारे की परिक्रमा करने वाले चट्टानी एक्सोप्लैनेट में से एक का तापमान मापने में सफलता हास‍िल कर ली है। इसे बड़ी सफलता से जोड़ कर देखा जा रहा है। TRAPPIST-1b के नाम से जाना जाने वाला यह ग्रह चमकता जरूर है,पर खुद का ऐसा प्रकाश नहीं है। जिससे यह प्रकाश फैलाए।</p>
<blockquote class="twitter-tweet">
<p dir="ltr" lang="en" xml:lang="en">What kinds of planets could host alien life? <a href="https://twitter.com/NASAWebb?ref_src=twsrc%5Etfw">@NASAWebb</a> will help tackle this question by looking at TRAPPIST-1, a system of seven rocky planets orbiting a faint star: <a href="https://t.co/pDQFLyFokV">https://t.co/pDQFLyFokV</a></p>
<p>It’s the 5th anniversary of the TRAPPIST-1 news, but there’s more <a href="https://twitter.com/NASAAstrobio?ref_src=twsrc%5Etfw">@NASAAstrobio</a> to come! <a href="https://t.co/e35ymHBULy">pic.twitter.com/e35ymHBULy</a></p>
<p>— NASA (@NASA) <a href="https://twitter.com/NASA/status/1496191146359414792?ref_src=twsrc%5Etfw">February 22, 2022</a></p></blockquote>
<p></p>
<h3 style="text-align:justify;">बहुत गर्म है यह ग्रह,तापमान 230 डिग्री सेल्सियस</h3>
<p style="text-align:justify;">इस गहन शोध के के सह-लेखक डॉ. पियरे-ओलिवियर लागेज ने कहा यह पहली बार है, जब हमने क‍िसी चट्टानी ग्रह के उत्‍सर्जन का पता ल‍गाया है। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि मानी जा सकती है। हमने पाया क‍ि TRAPPIST-1b बहुत ज्यादा गर्म है। इस ग्रह तापमान लगभग 230 ड‍िग्री सेल्‍स‍ियस मिला है। नासा ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि बेशक इसका वायुमंडल नहीं है,लेकिन यह ग्रह हमारे सौर मंडल के चट्टानी ग्रहों जितना छोटा और प्रकाश प्राप्‍त करने वाला ग्रह हो सकता है। इस पर अभी रिसर्च जारी है।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/signs-of-cholesterol-in-men/">Signs of Cholesterol: कोलेस्ट्रॉल बढ़ने के 5 लक्षण, पीला जहर निकालेंगे ये घरेलू उपाय</a></p>
<h3 style="text-align:justify;">आसपास मिले सात अन्य ग्रह,जहां जीवन की उम्मीद!</h3>
<p style="text-align:justify;">नासा के खगोल वैज्ञानिक रिसर्च टीम के प्रमुख डॉ. थॉमस ग्रीन ने कहा की किसी भी दूरबीन से ऐसी रोशनी अब तक नहीं मापी गई थी। इस पहली बार हुआ है। इससे हम पता लगा पाएंगे क‍ि क्‍या इस ग्रह पर कभी जीवन रहा है या नहीं। इसके आसपास सात और ग्रह नजर आते हैं, जो ठंडे हैं और उम्‍मीद जगाते हैं।नासा के अनुसार TRAPPIST-1 b सबसे भीतरी ग्रह है। पृथ्वी को सूर्य से मिलने वाली ऊर्जा से लगभग चार गुना अधिक ऊर्जा भी प्राप्त करता है। हालांकि अभी जो तापमान मिला है,उससे यह तो सिद्ध हो गया है कि यह ग्रह उन ग्रहों में जरूर शामिल हुआ है,जहां मनुष्य के लिए जीवन की तलाश की जा सकती है। नासा के वैज्ञानिक इस ग्रह की खोज को भविष्य की उम्मीद बता रहे हैं</p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
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                <pubDate>Sun, 07 Apr 2024 12:03:56 +0530</pubDate>
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                <title>Viral News: संपूर्ण पृथ्वी का भार कितना है? जानें वैज्ञानिकों की राय!</title>
                                    <description><![CDATA[Viral News: नई दिल्ली। पृथ्वी के भार को लेकर अलग-अलग वैज्ञानिकों की अलग-अलग राय है! पृथ्वी का वजन लगभग 13,170,000,000,000,000,000,000,000 पाउंड (या 5,974,000,000,000,000,000,000,000 किलोग्राम) है। बताया जाता है कि पृथ्वी इतनी बड़ी है कि उसे किसी पैमाने पर नहीं रखा जा सकता, वैज्ञानिक भी पृथ्वी के वजन का पता लगाने के लिए गणित और गुरुत्वाकर्षण के […]
]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/what-is-the-weight-of-the-entire-earth-know-the-opinion-of-scientists/article-55870"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-04/viral-news.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Viral News: नई दिल्ली। पृथ्वी के भार को लेकर अलग-अलग वैज्ञानिकों की अलग-अलग राय है! पृथ्वी का वजन लगभग 13,170,000,000,000,000,000,000,000 पाउंड (या 5,974,000,000,000,000,000,000,000 किलोग्राम) है। बताया जाता है कि पृथ्वी इतनी बड़ी है कि उसे किसी पैमाने पर नहीं रखा जा सकता, वैज्ञानिक भी पृथ्वी के वजन का पता लगाने के लिए गणित और गुरुत्वाकर्षण के नियमों का उपयोग करते हैं। Viral News</p>
<p style="text-align:justify;">बता दें कि हमारा ग्रह पृथ्वी, कठोर चट्टानों और खनिजों से लेकर जीवित चीजों की लाखों प्रजातियों तक सब कुछ रखता है और यह अनगिनत प्राकृतिक और मानव निर्मित संरचनाओं से ढका हुआ है। तो कैसे पता लगाया जाए कि उन सबका वजन कितना है? उस प्रश्न का कोई एक उत्तर नहीं है। जैसे चंद्रमा पर मनुष्यों का वजन हमारे घर की तुलना में बहुत कम होता है, वैसे ही पृथ्वी का भी सिर्फ एक ही वजन नहीं है। पृथ्वी का वजन उस पर लगने वाले गुरुत्वाकर्षण बल पर निर्भर करता है, जिसका अर्थ है कि इसका वजन खरबों पाउंड या कुछ भी नहीं हो सकता है। Viral News</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/epfo-pension-update/">Pension Update: पेंशनभोगियों की हो गई बल्ले-बल्ले, पेंशन को लेकर बड़ी खुशखबरी</a></p>
<p style="text-align:justify;">वैज्ञानिकों ने भी पृथ्वी के भार का निर्धारण करने में सदियाँ लगा दी हैं, वह पृथ्वी का द्रव्यमान है, जो किसी लागू बल के विरुद्ध गति के प्रति इसका प्रतिरोध है। नासा की मानें तो पृथ्वी का द्रव्यमान 5.9722×1024 किलोग्राम या लगभग 13.1 सेप्टिलियन पाउंड है। यह मिस्र के खफ्रÞे पिरामिड के लगभग 13 क्वाड्रिलियन के बराबर है, जिसका वजन लगभग 10 बिलियन पाउंड (4.8 बिलियन किलोग्राम) है। अंतरिक्ष की धूल और हमारे वायुमंडल से निकलने वाली गैसों के कारण पृथ्वी के द्रव्यमान में थोड़ा उतार-चढ़ाव होता है, लेकिन ये छोटे परिवर्तन पृथ्वी को अरबों वर्षों तक प्रभावित नहीं करेंगे। हालाँकि, दुनिया भर के भौतिक विज्ञानी अभी भी दशमलव पर सहमत नहीं हैं और उस कुल योग तक पहुँचना कोई आसान काम नहीं है। चूँकि पृथ्वी को एक पैमाने पर रखना असंभव है, वैज्ञानिकों को अन्य मापने योग्य वस्तुओं का उपयोग करके इसके द्रव्यमान को त्रिकोण बनाना पड़ा। Viral News</p>
<p style="text-align:justify;">पहला घटक आइजैक न्यूटन का सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण का नियम था, यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ स्टैंडर्ड्स एंड टेक्नोलॉजी के मेट्रोलॉजिस्ट स्टीफन श्लामिंगर ने लाइव साइंस को बताया। प्रत्येक वस्तु जिसमें द्रव्यमान होता है, उसमें गुरुत्वाकर्षण बल भी होता है, जिसका अर्थ है कि किन्हीं दो वस्तुओं के बीच हमेशा कुछ बल होगा।</p>
<p style="text-align:justify;">न्यूटन के सार्वभौमिक गुरुत्वाकर्षण के नियम में कहा गया है कि दो वस्तुओं (एफ) के बीच गुरुत्वाकर्षण बल को वस्तुओं के संबंधित द्रव्यमान (एम1 और एम 2) को गुणा करके, वस्तुओं के केंद्रों के बीच की दूरी को वर्ग (आर 2) से विभाजित करके निर्धारित किया जा सकता है, और फिर उस संख्या को गुरुत्वाकर्षण स्थिरांक (जी) से गुणा करना, जिसे अन्यथा गुरुत्वाकर्षण की आंतरिक शक्ति के रूप में जाना जाता है, या F=G((m₁*m₂)/r²)</p>
<p style="text-align:justify;">इस समीकरण का उपयोग करके, वैज्ञानिक सैद्धांतिक रूप से पृथ्वी की सतह पर किसी वस्तु पर ग्रह के गुरुत्वाकर्षण बल को मापकर पृथ्वी के द्रव्यमान को माप सकते थे। लेकिन एक समस्या थी: कोई भी जी के लिए कोई संख्या नहीं बता सका। फिर, 1797 में, भौतिक विज्ञानी हेनरी कैवेंडिश ने वह शुरूआत की जिसे कैवेंडिश प्रयोग के रूप में जाना जाता है। टोर्सियन बैलेंस नामक एक वस्तु का उपयोग करते हुए, जो दो घूमने वाली छड़ों से बनी होती है, जिसमें सीसे के गोले लगे होते हैं, कैवेंडिश ने छड़ों पर कोण को मापकर दो सेटों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल की मात्रा का पता लगाया, जो कि छोटे गोले के आकर्षित होने के कारण बदल गया।</p>
<p style="text-align:justify;">कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो के फिजियोलॉजिस्ट जॉन वेस्ट ने लाइव साइंस को बताया, जिनका काम बहुत मौलिक था और उस समय इसने बड़ा प्रभाव डाला। गोले के बीच के द्रव्यमान और दूरी को जानने के बाद, कैवेंडिश ने गणना की कि G = 6.74×10−11 m3 kg–1 s−2। डेटा पर अंतर्राष्ट्रीय विज्ञान परिषद की समिति वर्तमान में G को 6.67430 x 10-11 m3 kg-1 s-2 के रूप में सूचीबद्ध करती है, जो कैवेंडिश की मूल संख्या से केवल कुछ दशमलव अंक कम है। तब से वैज्ञानिकों ने ज्ञात द्रव्यमान की अन्य वस्तुओं का उपयोग करके पृथ्वी के द्रव्यमान की गणना करने के लिए जी का उपयोग किया है जिसके बलबूते पर 13.1 सेप्टिलियन पाउंड की करीबी संख्या पर पहुंचे हैं।</p>
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                <pubDate>Mon, 01 Apr 2024 11:56:03 +0530</pubDate>
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