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                <title>गड़बड़ी ईवीएम में या राजनीतिक दलों की सोच में ?</title>
                                    <description><![CDATA[मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मतदान के बाद ईवीएम के रखरखाव को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं और ईवीएम के जरिये धांधली के प्रयासों का मामला गर्मा गया है। कांग्रेस पार्टी द्वारा मतदान के बाद ईवीएम वाले स्ट्रांग रूम के आसपास सीसीटीवी की मरम्मत के बहाने लैपटॉप और मोबाइल फोन के साथ संदिग्धों को […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/think-of-the-disturbances-in-evm-or-political-parties/article-6837"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2018-12/evm.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए मतदान के बाद ईवीएम के रखरखाव को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं और ईवीएम के जरिये धांधली के प्रयासों का मामला गर्मा गया है। कांग्रेस पार्टी द्वारा मतदान के बाद ईवीएम वाले स्ट्रांग रूम के आसपास सीसीटीवी की मरम्मत के बहाने लैपटॉप और मोबाइल फोन के साथ संदिग्धों को देखे जाने और ईवीएम से छेड़छाड़ की गंभीर साजिश रचने के आरोप लगाए गए हैं और यह भी कहा गया है कि कई ऐसे वीडियो सामने आए हैं, जिनमें अधिकारी पिछले दरवाजे से स्ट्रांग रूम के अंदर जाते देखे गए हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रदेश में सागर तथा अनूपपुर में मतदान के दो-तीन बाद ईवीएम स्ट्रांग रूम में पहुंचने और भोपाल के स्ट्रांग रूम में तीन घंटे तक बिजली गुल रहने तथा उस दौरान सीसीटीवी काम न करने के गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। अगर ये सभी आरोप सही हैं तो निश्चित रूप से यह बेहद गंभीर मामला है। हालांकि राज्य के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कांताराव द्वारा कहा गया है कि राज्य के स्ट्रांगरूम की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह पुख्ता है और स्ट्रांगरूम को सभी की उपस्थिति में सील किया गया है, सुरक्षा बलों की तैनाती है, इसलिए किसी तरह की आशंका नहीं होनी चाहिए। ईवीएम से छेड़छाड़ को लेकर उठ रहे आरोप नए नहीं हैं बल्कि अरसे से विपक्षी दल सदैव ईवीएम के विरोध में सुर बुलंद करते रहे हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">विधानसभा चुनावों तथा अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों में ईवीएम के बजाय मतपत्रों के इस्तेमाल को लेकर 17 राजनीतिक दलों के प्रस्ताव को आधार बनाते हुए सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका को आखिरकार सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए गत दिनों अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया कि ऐसी धारणा गलत है कि ईवीम के बजाय मतपत्रों के जरिये चुनाव ज्यादा विश्वसनीय है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने स्पष्ट किया कि हर मशीन के ठीक या गलत होने की संभावना रहती है और यह उपयोग करने वालों पर निर्भर करता है कि वे उसका कैसे इस्तेमाल करते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अदालत की इस टिप्पणी के बाद ईवीएम के सही इस्तेमाल की जिम्मेदारी और जवाबदेही अब चुनाव आयोग तथा संबंधित अधिकारियों की ही है। इससे पहले तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त ओमप्रकाश रावत बैलेट पेपर से मतदान कराए जाने की मांग को खारिज करते हुए कह चुके थे कि निष्पक्ष तथा पारदर्शी चुनावों के लिए देश में अत्याधुनिक वीवीपैट तथा ईवीएम मशीनों से ही मतदान कराया जाएगा। इसी वर्ष 27 अगस्त को निर्वाचन आयोग द्वारा चुनाव सुधार के मद्देनजर बुलाई गई मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की बैठक में सभी राष्ट्रीय व 51 राज्यस्तरीय राजनीतिक दलों ने हिस्सा लिया था और बैठक में आयोग द्वारा ईवीएम तथा वीवीपैट से जुड़ी समस्याओं का संज्ञान लेकर शंकाओं के संतोषजनक समाधान का आश्वासन देते हुए सकारात्मक संकेत दिया गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">भले ही उसके बाद भी कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दल ईवीएम के विरोध का राग अलापते रहे हैं किन्तु आयोग के इस तर्क को अब सुप्रीम कोर्ट ने भी पुख्ता कर दिया है कि कुछ दलों के विरोध के चलते मतपत्रों पर वापस लौटना सही नहीं होगा। दरअसल आयोग नहीं चाहता कि बूथ कैप्चरिंग का दौर वापस आए। तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त रावत कह चुके हैं कि आयोग ने सभी राजनीतिक दलों और लोगों को खुली चुनौती दी थी कि वे ईवीएम हैक करके दिखाएं किन्तु कोई आगे नहीं आया। उनका कहना है कि जो हारता है, वह किसी को तो जिम्मेदार ठहराता ही है, इसी तर्ज पर खेल में हारने पर रैफरी को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है और चुनाव में हारने पर ईवीएम को।</p>
<p style="text-align:justify;">2017 में उत्तर प्रदेश में भाजपा की धमाकेदार जीत हो या कुछ अन्य राज्यों के चुनावों में पार्टी की सरकार बनने का मामला, हर मौके पर ईवीएम पर संशय की उंगलियां उठाई गई लेकिन यही आवाजें उस वक्त खामोश रही, जब इन्हीं ईवीएम की बदौलत कुछ उपचुनावों में विपक्षी दलों ने प्रचण्ड जीत हासिल की। जब अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली विधानसभा की 70 में से 67 सीटें जीत लीं तो ईवीएम अच्छी थी लेकिन जैसे ही पंजाब व गोवा में बुरी तरह शिकस्त हुई और दिल्ली एमसीडी व विधानसभा उपचुनाव में उनके प्रत्याशी हारे तो उनको लगने लगा कि इससे छेड़छाड़ की गई है। जब उनको न्यौता दिया गया कि वे आएं और इसमें छेड़छाड़ को साबित करें तो वे ऐसा नहीं कर पाए।</p>
<p style="text-align:justify;">चुनाव आयोग पर हो भरोसा: हालांकि कुछ अवसर ऐसे आए हैं, जब ईवीएम के पूरी तरह सुरक्षित होने के दावों पर सवालिया निशान लगे थे लेकिन अब चुनाव आयोग द्वारा दिए जा रहे इस भरोसे पर तो यकीन करना ही चाहिए कि ईवीएम को इस तरह बनाया गया है कि उसमें गड़बड़ी नहीं हो सकती और अब आयोग ऐसी मशीनें भी तैयार करा रहा है, जो छेड़छाड़ होते ही स्वत: बंद हो जाएंगी, साथ ही वीवीपैट के जरिये मतदाता को उसके मत की जानकारी देने वाली पर्ची मुद्रित करने की भी व्यवस्था की जा रही है।</p>
<p style="text-align:justify;">ईवीएम को लेकर चुनाव आयोग द्वारा यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि ईवीएम के फेल होने का प्रतिशत मात्र 0.6 फीसदी ही है। ऐसे में हम इस तथ्य को भी कैसे नजरअंदाज कर सकते हैं कि चुनाव आयोग विभिन्न अवसरों पर तमाम राजनीतिक दलों के साथ-साथ अन्य लोगों को भी ईवीएम हैक करने की चुनौती दे चुका है और आश्चर्य की बात है कि ईवीएम पर सवाल उठाने वाला कोई भी दल या कोई भी व्यक्ति इस चुनौती को स्वीकार करने की हिम्मत तक नहीं जुटा सका। ऐसे में ईवीएम की साख पर इस प्रकार के सवाल बार-बार उठाए जाने का आखिर क्या औचित्य है?</p>
<p style="text-align:right;"><strong>योगेश कुमार गोयल</strong></p>
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 06 Dec 2018 08:53:10 +0530</pubDate>
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                <title>कृषि लागत घटाने की भी सोचें</title>
                                    <description><![CDATA[हालांकि यह कहना अन्याय होगा कि सरकार न तो फसली उत्पाद का न्यूनतम समर्थन खरीद मूल्य बढ़ायेगी और न ही न्यूनतम समर्थन खरीद मूल्य पर अधिकतम फसल की खरीद सुनिश्चित करेगी, बेहतर हो कि किसान अपने उत्पादन की लागत घटाये, लेकिन सरकारी रवैये और कर्ज माफी से संतुष्ट हो जाने के रूप में किसान संगठनों […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/perspectives/opinion-and-analysis/think-of-reducing-farm-cost/article-1313"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2017-06/farm.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">हालांकि यह कहना अन्याय होगा कि सरकार न तो फसली उत्पाद का न्यूनतम समर्थन खरीद मूल्य बढ़ायेगी और न ही न्यूनतम समर्थन खरीद मूल्य पर अधिकतम फसल की खरीद सुनिश्चित करेगी, बेहतर हो कि किसान अपने उत्पादन की लागत घटाये, लेकिन सरकारी रवैये और कर्ज माफी से संतुष्ट हो जाने के रूप में किसान संगठनों द्वारा पेश नरमी का यथार्थ यही है।</p>
<p style="text-align:justify;">यथार्थ यह भी है कि न्यूनतम समर्थन खरीद मूल्य को लागत के डेढ़ गुना तक बढ़ाने को लेकर केन्द्र सरकार हाथ खड़े कर चुकी है। इसके लिए सरकारों के अपने तर्क हैं। उत्पादक से उपभोक्ता के बीच सक्रिय दलालों के मुनाफे को नियंत्रित करने में भी सरकारों की कोई खास रुचि दिखाई नहीं दे रही। यह रुचि पैदा करना जरूरी है। इसके लिए जन दबाव बनाने के जो भी शांतिमय तरीके हों, आजमाने चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि सरकार और बाजार दोनों ही कभी भी किसान के नियंत्रण में नहीं रहे। जब तक किसान अपनी फसल के भण्डारण की स्वावलंबी क्षमता हासिल नहीं कर लेता, तब तक आगे भी ऐसी कोई संभावना नहीं होने वाली। लिहाजा, सरकार, कर्ज और बाजार के भरोसे खेती करना अब पूरी तरह जोखिमभरा सौदा है। अत: यह जरूरी है कि फसल उत्पादन लागत में कमी के उपायों पर अमल शुरू हो। लेकिन यह कैसे हो?</p>
<p style="text-align:justify;">कृषि में लागत मूल्य के मुख्य 10 मद हैं:- भूमि, मशीनी उपकरण, सिंचाई, बीज, खाद, कीट-खरपतवारनाशक, मड़ाई, भण्डारण, समय और आवश्यक श्रम। जो भूमिहीन किसान, दूसरों के खेत किरायेदारी पर लेकर खेती करते हैं, उनकी भूमि किरायेदारी लागत घटाने के लिए जबरन किया गया कोई भी प्रयास अंतत: सामाजिक विद्वेष खड़ा करने वाला साबित होगा। जैसे-जैसे खेत मालिक की शर्त पर श्रम की उपलब्धता घटती जायेगी, यह लागत स्वत: कम होती जायेगी; यह भरोसा रखें।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरा पहलू देखें, तो सस्ते श्रम की उपलब्धता घटने से खेती में श्रम की लागत बढ़ी है। इसका एक पक्ष यह भी है कि बुआई, सिंचाई, निराई, कटाई, मड़ाई आदि के जो काम मानव श्रम से संभव थे, अब उन्हें आधुनिक मशीनी उपकरणों से करने की बाध्यता है। किंतु भारत के ज्यादातर किसानों के पास कृषि जरूरत के सभी उपकरण खरीदने की क्षमता नहीं है।</p>
<p style="text-align:justify;">इस तरह आधुनिक मशीनी उपकरण, बड़े किसानों के लिए तो एक मुश्त लागत का मद है, लेकिन छोटे किसानों को हर फसल पर इनकी सेवा के लिए ठेकेदारों को दाम चुकाना पड़ता है, जोकि काफी अधिक होता है। हमारे वैज्ञानिक व इंजीनियरों ने सस्ते, स्वावलंबी और लंबी आयु वाले कृषि उपकरण ईजाद तो कई किए, लेकिन इनमें से ज्यादातर के व्यापक उत्पादन को सरकारों ने प्रोत्साहन नहीं दिया। बायोवेद संस्थान, श्रृंगवेरपुर (इलाहाबाद) में एक बैल मात्र से चलने वाला कोल्हूनुमा ट्यूबवैल बिना बिजली-डीजल तीन इंच पानी देता है।</p>
<p style="text-align:justify;">सरकार, बिजली में तो सब्सिडी देती है, लेकिन बिना बिजली चलने वाले उपकरणों को प्रोत्साहित करने में दिलचस्पी नहीं रखती। बिना मवेशी, बिजली, ईंधन चलने वाले ‘मंगलसिंह टरबाइन’ को ईजाद करने वाले किसान मंगलसिंह (जिला ललितपुर, उ.प्र.) को तो उलटे हतोत्साहित किया गया। शेष जो कृषि उपकरण उद्योगपतियों और व्यापारियों की शरण में पहुंचे, वे किसान तक महंगे होकर ही पहुंचे। लिहाजा, कृषि मशीनी उपकरण खरीद और उपयोग लागत घटाने का तात्कालिक उपाय यही है कि किसान मशीनी उपकरण खरीद तथा रखरखाव की सामिलात व्यवस्था करें।</p>
<p style="text-align:justify;">सामिलात व्यवस्था होगी, तो एक ही उपकरण 20-25 किसानों के काम आ सकेगा। उपकरण खराब होने पर ठीक करने के हुनर को भी किसान समूहों को खुद ही हासिल करना होगा। इससे लागत घटेगी, साझा बढ़ेगा। साझा बढ़ते ही लागत में कमी के कई मार्ग स्वत: खुल जायेंगे। मेरे पास श्रम है, आपके पास ट्यूबवैल। मैं आपकी दो बीघा खेत में गेहूं की बुआई, कटाई, मड़ाई मुफ्त कर दूंगा, आप मेरे दो बीघा गेहूं की तीन सिंचाई मुफ्त कर देना।</p>
<p style="text-align:justify;">आप मुझे सरसों के अच्छे बीज दे देना; मैं आपको मटर के अच्छे बीज दे दूंगा। इसी तरह उपज की खरीद-फरोख्त भी बाजार की जगह, पहले आपस में होने लगेगी। इससे लागत घटेगी और मुनाफा बढ़ेगा। पारंपरिक खेती और बार्टर पद्धति का सदगुण यही था। श्रम लागत बढ़ाने वाले कुछ और कारणों को समाप्त करना जरूरी है, जिनका प्रवेश ट्रेक्टर और बाजारू बीज के साथ हुआ। कल्टीवेटर युक्त ट्रेक्टर यदि पूरे खेत में तीन बार जुताई करता है, तो इस दौरान वह किनारों पर कई गुना अधिक बार घूम जाता है।</p>
<p style="text-align:justify;">परिणाम यह होता है कि किनारे दब जाते हैं। खेत किनारे से ढाल हो जाता है। लिहाजा, हर दो-चार साल बाद रोटावेटर लगाकर खेत को समतल कराने के लिए काफी अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है। रोटावेटर की जुताई मंहगी भी है। जबकि बैल से जुताई, इसका एक समाधान है। जुताई उपकरण के डिजायन तथा जुताई के तरीके में सुधार कर भी इस अतिरिक्त श्रम खर्च को घटाया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">उर्वरक व कीटनाशकों से मुक्ति का एक ही उपाय है, वह है जैविक खाद। कंपोस्ट खाद, केचुंआ खाद, मानव मल की खाद और हरी खाद के अलावा गोमूत्र, गुड़ आदि के मिश्रण से जैविक खाद बनाने जैसे कई प्रयोग इधर चर्चा में आये हैं; इन्हे अपनायें। मवेशियों की संख्या बढ़ायें। मवेशियों की संख्या बढ़ाने के लिए चारे वाले पौधे व फसल तो लगायें ही, मवेशियों को उनके चारागाह लौटायें। जैसे ही किसान खेत से रासायनिक उर्वरक हटायेगा; जैविक खाद तीन लाभ एक साथ लायेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">जैविक खाद, केचुओं आदि भू-जीवों को न्योता देकर ऊपर बुला लेती है। लिहाजा, आप देखेंगे कि मिट्टी की उर्वरकता हर साल घटने की बजाय, बढ़ने लगेगी। जैविक खाद, मिट्टी के ढेलों को बांधकर रखती है। लिहाजा, कम सिंचाई में भी खेत में ज्यादा लंबे समय तक नमी बनी रहेगी। बहुत संभव है कि एक बारिश होने पर सरसों, चना, मटर जैसी फसलें बिना सींचे ही होने लगें। इससे सिंचाई खर्च घटेगा। कीटनाशक को खेत से बाहर करने के तीन साल के भीतर अपने बच्चों को कीट खिलाकर पालने वाली गौरैया जैसी चिड़ियां वापस लौट आयेंगी। इसके व्यापक लाभ होंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">किसान का सबसे ज्यादा खर्च समय और सिंचाई के रूप में होता है। नीलगाय, जंगली सुअर आदि जीवों को यदि उनके जंगल, झुरमुट और पेयजल स्त्रोत लौटा दिए जायें तो रखवाली में जाया होने वाला समय स्वत: बच जायेगा। महाराष्ट्र आदि में आज ऐसे इलाके कई हैं, जहां सिंचाई के लिए पानी 750 फीट गहरे से ऊपर लाना होता है।</p>
<p style="text-align:justify;">जलसंचयन स्त्रोतों, छोटे बरसाती नालों, नदियों और इनके किनारे झड़ियों-जंगलों के पुनर्जीवित होते ही हम पायेंगे कि भू-जल स्तर स्वत: ऊपर उठ आया। मेड़बंदी ऊंची हो; खेत समतल हो; बूंद-बूंद सिंचाई तथा फव्वारा जैसी अनुशासित सिंचाई पद्धतियां इस्तेमाल हों, तो कम पानी में पूरे खेत में सिंचाई संभव है। स्पष्ट है कि इन कदमों के उठते ही सिंचाई लागत में अप्रत्याशित घटोत्तरी देखने को मिलेगी।</p>
<p style="text-align:justify;">इस दिशा में सरकारों के कुछ कार्यक्रम हैं। उनका लाभ सभी तक कैसे पहुंचे; इसके लिए कुछ लोग, पंचायतों को सक्रिय करने में लगें तो कुछ बिना किसी की प्रतीक्षा किए खुद शुरूआत करने में। यह भी भारत के अन्नदाता की रक्षा का एक आंदोलन ही होगा। लेकिन इसमें हिंसा नहीं, साझा, सहकार और स्वावलंबन फैलेगा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>-अरुण तिवारी</strong></p>
<p style="text-align:justify;">
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                                                            <category>लेख</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 16 Jun 2017 23:23:33 +0530</pubDate>
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