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                <title>Success Story - Sach Kahoon Hindi</title>
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                <title>Arunima Sinha Story: अरुणिमा सिन्हा के बुलंद हौसलों के आगे मुश्किल हालात भी रोक नहीं पाए कदम</title>
                                    <description><![CDATA[अरुणिमा सिन्हा ने ट्रेन हादसे में एक पैर खोने के बाद हार नहीं मानी और 2013 में माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय दिव्यांग महिला बनकर इतिहास रच दिया।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/delhi/arunima-sinha-story-even-difficult-circumstances-could-not-stop-arunima/article-88374"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/arunima-sinha.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Success Story: नई दिल्ली (सच कहूँ )। 11 अप्रैल 2011 की वो रात, जिसने एक होनहार खिलाड़ी की जिंदगी बदल दी। लगभग मौत को छूकर लौटने के बाद इस खिलाड़ी ने हार नहीं मानी और फिर ऐसा इतिहास रच दिया, जिसकी कल्पना कर पाना हर किसी के लिए असंभव है। यह कहानी है भारत की उस दिव्यांग खिलाड़ी की, जिसने बुलंद हौसलों और इरादे के साथ अपने कृत्रिम पैरों से विश्व की सबसे ऊंची चोटी को भी छोटा साबित कर दिया। बात हो रही है माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय दिव्यांग खिलाड़ी अरुणिमा सिन्हा की। Delhi News</p>
<p style="text-align:justify;">20 जुलाई 1989 को जन्मी अरुणिमा सिन्हा की कहानी सिर्फ एक पर्वतारोही की विजय गाथा नहीं बल्कि दृढ़ निश्चय, साहस और आत्मविश्वास की एक मिसाल है। उत्तर प्रदेश के अंबेडकरनगर जिले में पड़ने वाले पंडाटोला में उनका जन्म हुआ। खेलकूद का शौक था, जैसे हर बच्चे में होता है, लेकिन उनके इरादे औरों से कहीं अधिक बुलंद थे। वॉलीबॉल खेल में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा के बल पर पहचान बनाई।</p>
<p style="text-align:justify;">हालांकि, अरुणिमा की जिंदगी में एक बहुत ही दर्दनाक मोड़ तब आया, जब अप्रैल 2011 में वह लखनऊ से दिल्ली की यात्रा कर रही थीं। एक सोने की चेन के लिए कुछ बदमाशों ने उन्हें चलती ट्रेन से फेंक दिया था। वह पूरी रात पटरी पर पड़ी रहीं और 48 ट्रेनें उनके पास से गुजरती रहीं। रेलवे ट्रैक का वह मंजर भी उनके लिए एक डरावने सपने जैसा था। हादसे में दोनों पैर बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो चुके थे। Delhi News</p>
<p style="text-align:justify;">अरुणिमा सिन्हा ने 2011 की उस घटना के बारे में एक इंटरव्यू में कहा, "यह मेरी जिंदगी का यू-टर्न था। दिल्ली में एक जॉब इंटरव्यू था, इसलिए लखनऊ से ट्रेन के जरिए आ रही थी। कुछ लोगों ने ट्रेन में लूटपाट शुरू की। मैं एक खिलाड़ी थी तो उसी के अनुरूप एक भावना उठी और मैंने अपनी सोने की चेन को बचाने की कोशिश की। हाथापाई हुई और लुटेरों ने चलती ट्रेन से उन्हें नीचे फेंक दिया।"</p>
<p style="text-align:justify;">अरुणिमा सिन्हा ने बताया था, "मैं ट्रैक पर पड़ी रही और ट्रेनें गुजरती रहीं। यहां तक कि ट्रेन जब गुजरती थी तो लोगों का टॉयलेट भी उस समय शरीर पर गिरता था। मैं उठने की कोशिश कर रही थी लेकिन उठ नहीं पा रही थी। एक पैर कट चुका था और दूसरे पैर की हड्डियां टूटकर बाहर आ चुकी थीं।" हालांकि, अगली सुबह सूरज के उगने के साथ ही इंसानियत भी जागी और गांववालों का एक समूह उनकी मदद के लिए आगे आया। उन्होंने उन्हें पटरी से उठाया और बरेली के जिला अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल में इलाज के लिए व्यवस्थाएं नहीं थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">अरुणिमा सिन्हा बताती हैं, "मैं डॉक्टरों की आवाज सुन पा रही थी लेकिन उस समय देख नहीं पा रही थी। मैंने बोला कि मैं कई घंटों से रेलवे ट्रैक पर थी, तो आप मेरा पैर काटेंगे तो अच्छे के लिए क्योंकि दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा था।" डॉक्टरों को मजबूरन उनका एक पैर काटना पड़ा। उनकी जगह कृत्रिम पैर लगाया गया। बहुत मुश्किल हालात का सामना करने के बावजूद अरुणिमा सिन्हा ने इस त्रासदी को अपनी पहचान नहीं बनने दिया और इसके बजाय अपने पर्वतारोहण के सपने को पूरा करने का रास्ता चुना। Delhi News</p>
<p style="text-align:justify;">वह इस बात में विश्वास रखती हैं कि, "जो आप नहीं कर सकते, उसे उस काम के आड़े न आने दें जो आप कर सकते हैं।" अरुणिमा के मन में उस एक अनजान रास्ते से एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचने का विचार आया। सिर्फ अपने मजबूत इरादे और कभी न हार मानने वाले जज्बे के साथ, वह एक ऐसी यात्रा पर निकल पड़ीं जो उनकी हिम्मत की कड़ी परीक्षा लेने वाली थी। अरुणिमा उत्तरकाशी में टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन के कैंप में शामिल हुईं, जहां उन्हें माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला बछेंद्री पाल ने ट्रेनिंग दी।</p>
<p style="text-align:justify;">तमाम मुश्किलों के बावजूद वह माउंट एवरेस्ट की चोटी पर पहुंचीं और 2013 में यह अद्भुत कारनामा करने वाली पहली दिव्यांग महिला बनीं। 52 दिनों की कड़ी मेहनत, मजबूत इरादे और हिम्मत के बाद वह चोटी पर पहुंचीं। माउंट एवरेस्ट फतह और बाधाओं को पार करने के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। Delhi News</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>सच कहूँ विशेष स्टोरी</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                            <category>दिल्ली</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 19 Jul 2026 18:51:59 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>Success Story: मिडिल क्लास से 4500 करोड़ की कंपनी तक का सफर: जानिए कैसे समीर माहेश्वरी ने मेहनत और अनुशासन से लिखी सफलता की कहानी</title>
                                    <description><![CDATA[Success Story:मिडिल क्लास से 4500 करोड़ की कंपनी तक का सफर: जानिए कैसे समीर माहेश्वरी ने मेहनत और अनुशासन से लिखी सफलता की कहानी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/national/journey-from-middle-class-to-rs-4500-crore-company-know/article-88073"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/success-story.jpg" alt=""></a><br /><p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">Success Story: अक्सर माना जाता है कि बड़ी सफलता उन्हीं लोगों को मिलती है, जिनके पास पहले से पैसा, मजबूत पारिवारिक पृष्ठभूमि या बड़े संसाधन होते हैं। लेकिन कई ऐसे उद्यमी हैं जिन्होंने साधारण परिवार से निकलकर अपनी मेहनत, अनुशासन और सही सोच के दम पर असाधारण सफलता हासिल की। ऐसी ही प्रेरणादायक कहानी है हेल्थकार्ट (HealthKart) के संस्थापक <strong>समीर माहेश्वरी</strong> की, जिन्होंने एक मिडिल क्लास परिवार से निकलकर करीब <strong>4,500 करोड़ रुपये</strong> की कंपनी खड़ी कर दी।</p>
<h3 style="text-align:justify;">मिडिल क्लास परिवार से शुरू हुआ सफर | Success Story</h3>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">समीर माहेश्वरी का जन्म जयपुर के एक मारवाड़ी मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। बचपन से ही उन्होंने पैसों की अहमियत और सीमित संसाधनों में संतुलित जीवन जीना सीखा। परिवार में हर खर्च सोच-समझकर किया जाता था, जिसने उन्हें बचत और वित्तीय अनुशासन की आदत सिखाई।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">उन्होंने दिल्ली के प्रतिष्ठित <strong>IIT</strong> से पढ़ाई की और बाद में <strong>हार्वर्ड बिजनेस स्कूल</strong> से एमबीए किया। हालांकि, समीर का मानना है कि उनकी असली ताकत उनकी मिडिल क्लास परवरिश रही, जिसने उन्हें मेहनत और जिम्मेदारी का महत्व समझाया।</p>
<h3 style="text-align:justify;">आज भी नहीं भूले मिडिल क्लास की आदतें</h3>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">सफल बिजनेसमैन बनने के बावजूद समीर आज भी अपने पुराने संस्कार नहीं भूले हैं। वह बताते हैं कि महंगे जूते खरीदने से पहले कई बार सोचते हैं और ऑनलाइन शॉपिंग के दौरान सबसे बेहतर और सस्ता विकल्प तलाशते हैं।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">वह इसे अपना <strong>"मिडिल क्लास ऑपरेटिंग सिस्टम"</strong> कहते हैं, जो आज भी उनके फैसलों और जीवनशैली का अहम हिस्सा है। उनके मुताबिक, यह केवल पैसे बचाने की आदत नहीं, बल्कि अनुशासित जीवन जीने का तरीका है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">2011 में रखी हेल्थकार्ट की नींव</h3>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">समीर माहेश्वरी ने वर्ष <strong>2011</strong> में प्रभात टंडन के साथ मिलकर <strong>HealthKart</strong> की शुरुआत की। शुरुआत में कंपनी हेल्थ और फिटनेस से जुड़े प्रोडक्ट्स बेचती थी।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">बाद में वर्ष <strong>2015</strong> में कंपनी का एक हिस्सा अलग होकर <strong>1mg</strong> बना, जिसे बाद में <strong>टाटा ग्रुप</strong> ने अपने साथ जोड़ लिया।</p>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">आज हेल्थकार्ट देशभर में ऑनलाइन और ऑफलाइन माध्यम से प्रोटीन, विटामिन, न्यूट्रिशन और हर्बल सप्लीमेंट्स बेचने वाली प्रमुख कंपनियों में शामिल है।</p>
<h4 style="text-align:justify;">135 मिलियन डॉलर की फंडिंग, 500 मिलियन डॉलर की वैल्यूएशन</h4>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">साल <strong>2022</strong> में हेल्थकार्ट ने <strong>135 मिलियन डॉलर</strong> की फंडिंग जुटाई। इसके बाद कंपनी की वैल्यूएशन करीब <strong>500 मिलियन डॉलर</strong> तक पहुंच गई। लगातार विस्तार और मजबूत बिजनेस मॉडल के दम पर कंपनी ने भारतीय हेल्थ और न्यूट्रिशन मार्केट में अपनी अलग पहचान बनाई।</p>
<h4 style="text-align:justify;">लिंक्डइन पर शेयर किए सफलता के 5 मंत्र</h4>
<p class="isSelectedEnd" style="text-align:justify;">समीर माहेश्वरी ने लिंक्डइन पर अपनी जिंदगी से जुड़े पांच महत्वपूर्ण सबक साझा किए, जिन्हें लोगों ने खूब पसंद किया।</p>
<ul style="text-align:justify;">
<li><strong>हर रुपये की कीमत समझें</strong> – पैसा खर्च करने से पहले सोच-समझकर फैसला लें।</li>
<li><strong>जरूरत और शौक में अंतर समझें</strong> – हर इच्छा को जरूरत न बनाएं।</li>
<li><strong>पहले बचत, फिर खर्च करें</strong> – वित्तीय अनुशासन सफलता की पहली सीढ़ी है।</li>
<li><strong>जो मिला है, उसके लिए आभारी रहें</strong> – संतोष और शुक्रगुजारी जीवन को बेहतर बनाती है।</li>
<li><strong>दूसरों से तुलना प्रेरणा के लिए करें</strong> – तुलना आपको बेहतर बनने के लिए प्रेरित करे, निराश नहीं।</li>
</ul>
<h3 style="text-align:justify;">सफलता का सबसे बड़ा मंत्र</h3>
<p style="text-align:justify;">समीर माहेश्वरी की कहानी बताती है कि सफलता केवल बड़ी डिग्री, ऊंचे पद या अमीर परिवार से नहीं मिलती। सही सोच, मेहनत, अनुशासन और लगातार सीखते रहने की आदत किसी भी व्यक्ति को ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है। उनका सफर आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने सपनों को साकार करना चाहते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 12:21:31 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Gurugram News: पूज्य गुरु जी को दिया मिस्टर इंडिया सीजन-4 के विजेता प्रोफेसर डॉ. संजय ने अपनी सफलता का श्रेय</title>
                                    <description><![CDATA[पेशे से प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार ने फैशन की दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए मिस्टर इंडिया सीजन-4 का खिताब अपने नाम किया है। उदयपुर में आयोजित भव्य समारोह में डॉ. संजय को मिस्टर इंडिया सीजन-4 का विजेता घोषित किया गया। उन्होंने अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय डेरा सच्चा सौदा के पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को दिया है।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/delhi/gurugram-news-professor-dr-sanjay-winner-of-mr-india-season/article-87908"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2026-07/dr-sanjay-profesor.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Mr. India Season 4: गुरुग्राम (सच कहूँ/संजय मेहरा)। पेशे से प्रोफेसर डॉ. संजय कुमार ने फैशन की दुनिया में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हुए मिस्टर इंडिया सीजन-4 का खिताब अपने नाम किया है। उदयपुर में आयोजित भव्य समारोह में डॉ. संजय को मिस्टर इंडिया सीजन-4 का विजेता घोषित किया गया। उन्होंने अपनी इस सफलता का पूरा श्रेय डेरा सच्चा सौदा के पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां को दिया है। उनका आशीर्वाद ही उनके जीवन की हर उपलब्धि में सदैव फलता-फूलता है। कई वर्षों से उनका परिवार और वे स्वयं डेरा सच्चा सौदा से जुड़े हैं। Gurugram News</p>
<p style="text-align:justify;">मूलरूप से हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के ढलियारा गांव के मूल निवासी प्रोफेसर डॉ.संजय कुमार ने कहा कि पूज्य गुरु जी का उनके जीवन की हर सफलता में आशीर्वाद रहता है। डॉ. संजय कुमार ने ज्ञान के साथ फैशन में भी खुद को निखारा है। महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी, रोहतक से पीएचडी कर चुके डॉ. संजय मॉडलिंग की दुनिया में उच्च शिक्षा का दुर्लभ उदाहरण हैं। मिस्टर इंडिया सीजन-4 में शुरूआत से ही उनकी बौद्धिक क्षमता, शालीनता और आत्मविश्वास ने सबका ध्यान खींचा। फिनाले में रैंप वॉक, व्यक्तित्व और सवाल-जवाब में उन्होंने सटीक जवाबों और आत्मविश्वास से निर्णायकों एवं दर्शकों का दिल जीता। </p>
<p style="text-align:justify;">डॉ. संजय कई राष्ट्रीय ब्रांड्स के विज्ञापनों का हिस्सा रह चुके हैं। देश के बड़े फैशन वीक्स में रैंप वॉक का लंबा अनुभव रखते हैं। मिस्टर एंड मिस इंडिया नेक्स्ट टॉप सुपर मॉडल सीजन-4 मॉडलिंग रिवोल्यूशन की तरफ से गीतांजलि रिजॉर्ट उदयपुर में आयोजित किया गया था। इस शो के आयोजक साहिल रघुवंशी और मयंक लालवानी हैं। इस शो में भारतभर से 25 युवक और 25 युवतियां ग्रैंड फिनाले के लिए चुने गए थे। डॉ. संजय सीनियर कैटेगरी में विनर रहे, मान्यता वैष्णव मिस कैटेगरी की विनर रहीं और प्रणजाल जूनियर कैटेगरी के विनर रहे। इस शो में डॉ. संजय को कैश प्राइज, दो एल्बम सॉन्ग और एक साल का मॉडलिंग कॉन्ट्रेक्ट मिला है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">ढलियारा से मिस्टर इंडिया तक का सफर</h3>
<p style="text-align:justify;">डॉ. संजय कुमार ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा ढलियारा से प्राप्त की और फिर उच्च शिक्षा के लिए महर्षि दयानंद यूनिवर्सिटी गए, जहां से उन्होंने पीएचडी की डिग्री हासिल की। वर्तमान में वे प्रोफेसर के पद पर कार्यरत हैं और शिक्षा के क्षेत्र में भी सेवाएं दे रहे हैं। डॉ. संजय की यह जीत सिर्फ एक खिताब नहीं है। यह साबित करती है कि मेहनत, लगन और सही दिशा में किए गए प्रयासों से कोई भी मुकाम हासिल किया जा सकता है। इस उपलब्धि को हासिल करके डॉ. संजय कुमार ने यह साबित कर दिया कि डिग्री और ड्रीम दोनों साथ चल सकते हैं। हिमाचल से उठकर राष्ट्रीय मंच परचम लहराने वाले इस प्रोफेसर पर पूरे प्रदेश को गर्व है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>रंगमंच</category>
                                            <category>राज्य</category>
                                            <category>सच कहूँ विशेष स्टोरी</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                            <category>दिल्ली</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 11 Jul 2026 12:25:44 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Manmohan]]></dc:creator>
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                <title>सफलता की कहानी, पारुल की जुबानी</title>
                                    <description><![CDATA[मेहनत की बदौलत पारुल ने कामयाबी की बुलंदियों को छुआ किसान की बेटी ने सात समुंदर पार देश और गांव का नाम किया रोशन पारुल नैन का ऑस्ट्रेलिया-इंडिया इंस्टीट्यूट में एक्जीक्यूटिव असिस्टेंट पद पर चयन गांव कुलेरी की पारुल ने मेहनत और शिक्षा के दम पर हासिल किया बड़ा मुकाम, ग्रामीण परिवेश से निकलकर बनी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/due-to-hard-work-parul-touch-the-heights-of-success/article-72043"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2025-06/uklana-news-1.jpg" alt=""></a><br /><h3 class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction" style="text-align:justify;">मेहनत की बदौलत पारुल ने कामयाबी की बुलंदियों को छुआ</h3>
<ul style="text-align:justify;">
<li class="ai-optimize-6 ai-optimize-introduction">किसान की बेटी ने सात समुंदर पार देश और गांव का नाम किया रोशन</li>
<li class="ai-optimize-7">पारुल नैन का ऑस्ट्रेलिया-इंडिया इंस्टीट्यूट में एक्जीक्यूटिव असिस्टेंट पद पर चयन</li>
<li class="ai-optimize-8">गांव कुलेरी की पारुल ने मेहनत और शिक्षा के दम पर हासिल किया बड़ा मुकाम, ग्रामीण परिवेश से निकलकर बनी मिसाल</li>
</ul>
<p class="ai-optimize-9" style="text-align:justify;"><strong>उकलाना (सच कहूँ/कुलदीप स्वतंत्र)।</strong> Uklana News: यदि हौसले बुलंद हों और इरादे मजबूत, तो गांव की गलियों से निकलकर भी बेटियाँ सात समुंदर पार अपना और अपने देश का नाम रोशन कर सकती हैं। ऐसा ही कारनामा कर दिखाया है उकलाना हल्के के गांव कुलेरी की बेटी पारुल नैन ने। एक किसान परिवार में जन्मी पारुल आज ऑस्ट्रेलिया के प्रतिष्ठित Australia-India Institute में Executive Assistant to the CEO जैसे अहम पद पर कार्यरत हैं।</p>
<h3 class="ai-optimize-11" style="text-align:justify;">गांव से मेलबर्न तक की संघर्ष भरी उड़ान | Uklana News</h3>
<p class="ai-optimize-12" style="text-align:justify;">पारुल नैन, किसान दयानंद नैन (पूर्व सरपंच) व सुनैना की बेटी हैं। पारुल नैन के पिता गांव में खेतीबाड़ी का कार्य करते हैं तथा माता सुनैना वर्तमान में मुख्यमंत्री उड़नदस्ता हिसार की इन्चार्ज हैं। पारुल की माता सुनैना ने बताया कि पारुल ने प्रारंभिक पढ़ाई डीपीएस स्कूल हिसार से की,इसके बाद चंडीगढ़ के मेहर चंद महाजन कॉलेज से स्नातक और पंजाब यूनिवर्सिटी से गवर्नेस एंड लीडरशिप में स्नातकोत्तर (MA)किया। लेकिन पारुल यहीं नहीं रुकीं। उन्होंने शिक्षा और मेहनत को हथियार बनाया और दो वर्ष पूर्व ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न पहुँचीं।</p>
<p class="ai-optimize-13" style="text-align:justify;">मेलबर्न यूनिवर्सिटी से उन्होंने पब्लिक पॉलिसी और मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री प्राप्त की। इसके अतिरिक्त उनके पास गवर्नेंस और लीडरशिप में भी मास्टर डिग्री है।</p>
<h3 class="ai-optimize-14" style="text-align:justify;">प्रशासन, शोध और नीति निर्माण में योगदान | Uklana News</h3>
<p class="ai-optimize-15" style="text-align:justify;">मुख्यमंत्री उड़नदस्ता इन्चार्ज सुनैना ने बताया कि बेटी पारुल नैन अब ऑस्ट्रेलिया-इंडिया इंस्टीट्यूट में कार्यरत हैं, जहां वे संस्थान के CEO और वरिष्ठ नेतृत्व को उच्च-स्तरीय सहयोग प्रदान करती हैं। वे संस्थान की रणनीतिक योजनाओं, शोध परियोजनाओं और भारत-ऑस्ट्रेलिया के बीच द्विपक्षीय संबंधों को सशक्त बनाने में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।</p>
<p class="ai-optimize-16" style="text-align:justify;">पारुल का अनुभव भारत में ज़िला स्तरीय प्रशासन, सार्वजनिक नीति अनुसंधान, और शैक्षणिक लेखन जैसे क्षेत्रों में रहा है। उन्होंने हरियाणा की विभिन्न सरकारी संस्थाओं में इंटर्नशिप भी की है।</p>
<h3 class="ai-optimize-17" style="text-align:justify;">गांव में खुशी का माहौल, बेटी बनी प्रेरणा</h3>
<p class="ai-optimize-18" style="text-align:justify;">पारुल की इस उपलब्धि पर गांव कुलेरी में गर्व और खुशी का माहौल है। उनके पिता दयानंद नैन व माता सुनैना का कहना है, “पारुल ने हमेशा बड़े सपने देखे और उन्हें सच करने के लिए दिन-रात मेहनत की। उसने साबित कर दिया कि बेटियाँ किसी से कम नहीं।”</p>
<h3 class="ai-optimize-19" style="text-align:justify;">शिक्षा और आत्मविश्वास से बदली किस्मत</h3>
<p class="ai-optimize-20" style="text-align:justify;">सुनैना ने कहा कि पारुल की कहानी उन लाखों बेटियों के लिए प्रेरणा है जो सीमित संसाधनों के बावजूद आगे बढ़ना चाहती हैं। गांव के एक साधारण किसान परिवार से निकलकर अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुँचना आसान नहीं था, लेकिन पारुल ने यह करके दिखाया।</p>
<h3 class="ai-optimize-21" style="text-align:justify;">पारुल ने माता पिता व मामा को दिया अपनी सफलता का श्रेय</h3>
<p class="ai-optimize-22" style="text-align:justify;">पारुल नैन ने अपनी सफलता का श्रेय अपने पिता दयानंद नैन, माता सुनैना व मामा डॉ भीम सिंह पूनिया को दिया और कहा कि मेरी माता ने मुझे एक अच्छा मार्गदर्शक, दोस्त, गुरु, माता बनकर आगे बढाया। जिसकी बदौलत ही आज मै यहां तक पहुंची हूँ। मुझे कामयाब करने के लिए खुद की खुशियों को भी बलिदान देने का काम किया है। जिसका मैं कभी कर्ज नहीं उतार पाऊंगी। Uklana News</p>
<p class="ai-optimize-23"><strong>यह भी पढ़ें:– </strong><a title="सच कहूँ की 23वीं स्थापना दिवस पर हुए सामाजिक कार्य, रखवाए सकोरे व बाल्टियां" href="http://10.0.0.122:1245/sach-kahun-celebrated-its-23rd-anniversary-in-firozabad/">सच कहूँ की 23वीं स्थापना दिवस पर हुए सामाजिक कार्य, रखवाए सकोरे व बाल्टियां</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>हरियाणा</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/due-to-hard-work-parul-touch-the-heights-of-success/article-72043</link>
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                <pubDate>Wed, 11 Jun 2025 17:20:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Flight of Spirits: एक पैर की कमी भी सरसा की ज्योति के हौसले को कम नहीं कर सकी!</title>
                                    <description><![CDATA[आत्मविश्वास के बल पर शॉटपुट, डिस्कस थ्रो और जैवलीन थ्रो में बनी मिसाल Flight of spirits: सरसा/ओढ़ां (सच कहूँ /राजू ओढ़ां)। आत्मविश्वास मजबूत हो और मन में कुछ कर गुजरने की प्रबल ललक हो तो शारीरिक असक्षमता भी घुटने टेक देती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ओढ़ां के जवाहर नवोदय स्कूल की दसवीं कक्षा में […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/state/haryana/even-the-lack-of-a-leg-could-not-dampen-the-spirits-of-jyoti-of-sirsa/article-65783"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2024-12/jyoti-sirsa.jpg" alt=""></a><br /><h3 style="text-align:justify;">आत्मविश्वास के बल पर शॉटपुट, डिस्कस थ्रो और जैवलीन थ्रो में बनी मिसाल</h3>
<p style="text-align:justify;">Flight of spirits: सरसा/ओढ़ां (सच कहूँ /राजू ओढ़ां)। आत्मविश्वास मजबूत हो और मन में कुछ कर गुजरने की प्रबल ललक हो तो शारीरिक असक्षमता भी घुटने टेक देती है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है ओढ़ां के जवाहर नवोदय स्कूल की दसवीं कक्षा में पढ़ने वाली ऐलनाबाद निवासी 16 वर्षीय छात्रा ज्योति। ज्योति एक पैर से दिव्यांग है लेकिन उसने अपनी इस कमजोरी को हावी नहीं होने दिया बल्कि इस पर जीत हासिल करते हुए खेलों में कदम आगे बढ़ाए। Sirsa News</p>
<p style="text-align:justify;">दो सालों की मेहनत के बलबूते पर ज्योति ने निशक्त खिलाड़ियों के खेलों में अपनी पहचान बनाई और शॉटपुट, डिस्कस थ्रो और जैवलीन थ्रो में राष्ट्रीय व अंतर्राष्टÑीय स्तर पर 12 पदक जीतकर अपने संस्थान, देश प्रदेश व माता पिता का नाम गौरवांवित किया। ज्योति उन बच्चों के लिए प्रेरणास्त्रोत है जो शारीरिक असक्षमता के चलते अपने आप को कमजोर समझकर आगे नहीं बढ़ पाते। ज्योति का सपना है कि वो एक दिन पेराओलंपिक खेलों में देश का नाम रोशन करे। 16 वर्षीय इस उभरती हुई खिलाड़ी ज्योति से सच-कहूँ प्रतिनिधि ने विशेष बातचीत की।</p>
<h4 style="text-align:justify;">2 वर्षों में जीते 12 मेडल | Sirsa News</h4>
<p style="text-align:justify;">ज्योति 2 वर्ष के अंतराल में 2 नेशनल, 2 इंटरनेशनल व 2 स्टेट खेल चुकी है। जिसमें उसने शॉटपुट में 4, जैवलीन थ्रो में 4 तथा डिस्कस थ्रो में 4 सहित कुल 12 मेडल हासिल किए हैं। इनमें 12 मेडल में से 4 मेडल गोल्ड हैं।</p>
<h3 style="text-align:justify;">हैदराबाद में शिक्षा व ट्रेनिंग साथ-साथ, पहली बार रोहतक में झटके 2 गोल्ड</h3>
<p style="text-align:justify;">ज्योति को वर्ष 2022 में हैदराबाद के रंगारेड्डी में स्थित जवाहर नवोदय विद्यालय में बुलाया गया। वहां पर शिक्षा के साथ-साथ आदित्य मैहता फाउंडेशन की ओर से खेलों की ट्रेनिंग भी दी जाती। 2 वर्ष तक ज्योति ने वहां रहकर 9वीं व 10वीं की शिक्षा ग्रहण की और साथ-साथ खेलों की ट्रेनिंग भी ली। जिसके बाद जनवरी 2023 में रोहतक में राज्यस्तरीय खेल हुए जिसमें ज्योति ने शॉटपुट व जैवलीन थ्रो में 2 गोल्ड मेडल हासिल किए। उसका चयन नेशनल लेवल खेलों के लिए हो गया। फिर अप्रैल 2023 में गुजरात में हुए राष्ट्रीय स्तरीय खेलों में ज्योति ने बेहतर प्रदर्शन किया और शॉटपुट में गोल्ड व जैवलीन थ्रो में सिल्वर मेडल जीते।</p>
<h3 style="text-align:justify;">कृत्रिम पैर बना सहारा तो लगा दिये मैडलों के ढेर | Sirsa News</h3>
<p style="text-align:justify;">ज्योति ने बताया कि उसका एक पैर दूसरे पैर से काफी छोटा है। जिसके चलते वह चलने में असमर्थ थी। ऐेसे में वह कृत्रिम पैर के सहारे खड़ी हुई और एक सामान्य खिलाड़ी की तरह ही एक नहीं बल्कि तीन तीन खेलों में भाग लेकर बड़ी उपलब्धि हासिल की। ज्योति ने राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेलकर 12 मेडल जीतकर ये साबित कर दिखाया कि प्रतिभा शारीरिक क्षमता की मोहताज नहीं होती।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्योति ने बताया कि उसके घर में पिता, मां, 2 बहनें व एक भाई सहित कुल 6 सदस्य हैं। जन्म से ही एक पैर से दिव्यांग है। उसने 5वीं तक की शिक्षा अपने गांव ऐलनाबाद के सरकारी स्कूल से ग्रहण की। उसके बाद ओढ़ां के जवाहर नवोदय विद्यालय में कक्षा 6वीं में उसका चयन हो गया। अप्रैल 2022 में हरिद्वार में दिव्यांग बच्चों के लिए आदित्य मैहता फाउंडेशन की ओर से एक शिविर लगाया गया। जिसमें देश के विभिन्न राज्यों से काफी दिव्यांग बच्चे पहुंचे। इस शिविर में ज्योति ने शॉटपुट व डिस्कस थ्रो में भाग लिया और उसकी बेहतर प्रतिभा के चलते उसका चयन हो गया।</p>
<p style="text-align:justify;">हमें ज्योति पर गर्व है। दिव्यांग होने के बावजूद भी शिक्षा व खेल को मेंटेन रखना अपने आप में काफी मुश्किल भरा है, लेकिन ज्योति ने ये कर दिखाया। हमें विश्वास है ज्योति एक दिन पेराओलंपिक में देश के लिए गोल्ड लाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>— ललित कालड़ा, प्राचार्य (जवाहर नवोदय विद्यालय ओढां)</strong></p>
<h3 style="text-align:justify;">फरवरी में दुबई में खेलने के लिए उत्साहित ज्योति | Sirsa News</h3>
<p style="text-align:justify;">ज्योति अब फरवरी 2025 में दुबई में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय खेलों में भाग लेने के लिए वह काफी उत्साहित है। फरवरी में उसकी 10वीं की परीक्षा भी है। इसके लिए उस पर एक तरह से दोहरा दबाव भी है, लेकिन फिर भी वह शिक्षा व खेलों को पूरा समय दे रही है। उसे पूरा विश्वास है कि वह पढ़ाई और खेल दोनों में बेहतर प्रदर्शन करेगी। इसके साथ-साथ वह 2025 में होने वाली यूथ एशियन चैंपियनशिप भी भाग लेने के लिए उत्साहित है।</p>
<h3 style="text-align:justify;">बेटी किसी से कम नहीं, बच्चों को दें शिक्षा व खेलों में आजादी</h3>
<p style="text-align:justify;">जब बेटी का खेलों का लिए चयन हुआ तो एक समय तो हमें ये लगा कि वह किस तरह से कर पाएगी। लेकिन जब उसने प्रथम बार गोल्ड जीता तो मेरा विश्वास बढ़ गया कि उनकी बेटी किसी से कम नहीं है। मुझे ज्योति पर नाज है। जो बच्चे दिव्यांग है उन बच्चों के अभिभावकों से मैं आह्वान करता हूं कि प्रतिभा उम्र या शारीरिक क्षमता की मोहताज नहीं होती। अपने बच्चों को शिक्षा व खेलों में आजादी अवश्य दें।           <strong>— विजयपाल, ज्योति के पिता।</strong></p>
<h3 style="text-align:justify;">”अपने आप को किसी से कम न समझें” | Success Story</h3>
<p style="text-align:justify;">जो बच्चे दिव्यांग हैं और अपने आप को अन्य से कम समझते हैं, मैं उनसे कहना चाहती हूं कि शारीरिक असक्षमता को कभी अपने आप पर हावी न होने दें। अपनी प्रतिभा को बाहर निकलने दें। वे किसी से भी कम नहीं हैं। मेरे इस खेल व शिक्षा के सफर में मेरे माता-पिता मेरे कवच के रूप में मददगार रहे।       <strong>— ज्योति</strong></p>
<h3 style="text-align:justify;">बैंगुलुरु में हुए ट्रायल, थाइलैंड के लिए हुआ चयन</h3>
<p style="text-align:justify;">जून 2023 में बैंगुलुरु में ओपन ट्रायल हुए। जिसमें अंडर-20 एथलेटिक्स में ज्योति का मुकाबला सीनियर खिलाड़ी के साथ हुआ। इस मुकाबले में ज्योति के बेहतर प्रदर्शन के चलते उसका चयन थाइलैंड में होने वाले अंतर्राष्ट्रीय खेलों के लिए हुआ। दिसंबर 2023 में थाइलैंड में आयोजित हुए अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय खेलों में ज्योति ने एक साथ 3 खेलों में भाग लिया और तीनों में मेडल हासिल किए। जिसमें जैवलीन थ्रो में सिल्वर, शॉटपुट में सिल्वर तथा डिस्कस थ्रो में ब्रांज मेडल शामिल था।</p>
<h3 style="text-align:justify;">इस बार गोल्ड नहीं मिला तो अगली बार पक्का</h3>
<p style="text-align:justify;">थाइलैंड में भले ही ज्योति का प्रदर्शन बेहतर रहा, लेकिन वह इस बात को लेकर मायूस दिखी कि गोल्ड नहीं जीत पाई। फिर ज्योति के कोच वीनू कोटी ने उसमें ऊर्जा भरते हुए कहा कि कभी आत्मविश्वास को कमजोर न पड़ने देना। वह अपनी तैयारी पूरी रखे, इस बार गोल्ड नहीं मिला तो क्या अगली बार पक्का है। जिसके बाद अप्रैल 2024 में बैंगलुरु में हुए राष्ट्रीय स्तरीय खेलों में ज्योति ने भाग लेकर शॉटपुट में सिल्वर व डिस्कस थ्रो में सिल्वर मेडल जीते। जिसके बाद दिसंबर 2024 में फिर से थाइलैंड में अंतर्राष्ट्रीय स्तरीय खेल हुए और इस बार दौरान ज्योति ने गोल्ड की चाह को पूरा कर दिया। उसने जैवलीन में गोल्ड व डिस्कस थ्रो में सिल्वर मेडल हासिल कर भारत देश का नाम चमकाया। Sirsa News</p>
<p><a title="इधर सर्दी का सितम बढ़ा तो उधर डेरा सच्चा सौदा के इंसानियत की भलाई के कार्य बढ़ने लगे!" href="http://10.0.0.122:1245/warm-clothes-distributed-to-the-families-of-labourers-living-at-brick-kilns-in-yamunanagar/">इधर सर्दी का सितम बढ़ा तो उधर डेरा सच्चा सौदा के इंसानियत की भलाई के कार्य बढ़ने लगे!</a></p>
]]></content:encoded>
                
                                                            <category>देश</category>
                                            <category>हरियाणा</category>
                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
                                            <category>सच कहूँ विशेष स्टोरी</category>
                                            <category>न्यूज़ ब्रीफ</category>
                                    

                <link>https://www.sachkahoon.com/state/haryana/even-the-lack-of-a-leg-could-not-dampen-the-spirits-of-jyoti-of-sirsa/article-65783</link>
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                <pubDate>Fri, 27 Dec 2024 10:57:22 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[Sach Kahoon Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>Success Story: अचार बेचने से लेकर ‘पद्मश्री’ तक का सफर</title>
                                    <description><![CDATA[Success Story: राजकुमारी देवी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर के सरैया गांव में एक निर्धन परिवार में हुआ था। वो शिक्षिका बनना चाहती थीं, लेकिन गरीबी के कारण उन्हें जल्द ही आनंदपुर गांव के अवधेश कुमार चौधरी से शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। शादी के बाद उन्होंने अपने ससुराल वालों से लड़कर अपनी […]
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.sachkahoon.com/inspiration/journey-from-selling-pickles-to-padmashree/article-55080"><img src="https://www.sachkahoon.com/media/400/2023-11/success-story.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">Success Story: राजकुमारी देवी का जन्म बिहार के मुजफ्फरपुर के सरैया गांव में एक निर्धन परिवार में हुआ था। वो शिक्षिका बनना चाहती थीं, लेकिन गरीबी के कारण उन्हें जल्द ही आनंदपुर गांव के अवधेश कुमार चौधरी से शादी करने के लिए मजबूर होना पड़ा। शादी के बाद उन्होंने अपने ससुराल वालों से लड़कर अपनी शिक्षा पूरी की। इस दौरान उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा। उन्होंने अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए खेती करने का फैसला किया और डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय से प्रशिक्षण लिया। उन्हें अपने समुदाय से उपहास और बहिष्कार का सामना करना पड़ा, जो यह नहीं मानते थे कि एक महिला इस क्षेत्र में सफल हो सकती है। Success Story</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/attention-excessive-use-of-ginger-can-cause-these-problems-in-the-body/">Ginger Health Ri: सावधान! अदरक का अधिक इस्तेमाल से शरीर में ये हो सकती हैं दिक्कतें</a></p>
<p style="text-align:justify;">शादी के बाद वो कई स्वयं सहायता समूहों में शामिल हो गईं और पता चला कि ये स्वयं सहायता समूह व्यवहार में कैसे काम करते हैं। उन्होंने अपने आस-पास के समुदाय की सहायता के लिए अपना समूह शुरू किया और इन स्वयं सहायता समूहों की मदद से वो कई कम आय वाले परिवारों को रोजगार और कमाई प्रदान करने में सक्षम हुईं। खेती की मूल बातें सीखने के बाद उन्होंने अपनी जमीन पर सब्जियां, फल, पेड़ और झाड़ियां उगाना शुरू किया। अन्य किसानों के विपरीत जो अपने उत्पाद सीधे बाजार में बेचते थे, उन्होंने अपना ब्रांड लॉन्च किया और अपनी विशेषज्ञता का उपयोग हस्तनिर्मित अचार, जैम और जेली बनाने में किया।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/mix-these-2-things-in-turmeric-and-apply-it-on-your-face-your-in-will-glow-within-a-week/">Winter Skin Care Tips: हल्दी में ये 2 चीजें मिलाकर चेहरे पर लगा लो, एक हफ्ते में चमक जाएगी…</a></p>
<p style="text-align:justify;">जैसे-जैसे बिक्री बढ़ी, उनका व्यवसाय बढ़ा। उन्होंने गांव-गांव साइकिल से सफर तय कर महिलाओं से मुलाकात की और अपने उत्पादों का प्रचार किया, जिससे उन्हें ‘साइकिल चाची’ नाम मिला। उन्होंने अपना ज्ञान अन्य महिलाओं के साथ साझा किया और उन्हें खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया। प्रतिरोध का सामना करने के बावजूद उन्होंने साइकिल चलाना जारी रखा और नई प्रौद्योगिकियों और कृषि तकनीकों के बारे में जागरूकता फैलाई। आज राजकुमारी दिल्ली और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों में 23 अलग-अलग जैम और अचार पेश करती हैं। उनके नेतृत्व में लगभग 300 महिला स्वयं सहायता समूहों का गठन किया गया।</p>
<p><a href="http://10.0.0.122:1245/drink-this-thing-mixed-with-milk-before-sleeping-at-night-then-see-the-wonders-you-will-get-these-big-benefits/">Bedtime Drink: रात को सोने से पहले दूध में मिलाकर पी लो ये एक चीज, फिर देखो कमाल…मिलेंगे ये बड़े फायदे</a></p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कड़ी मेहनत और समर्पण से कई उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। 2006-07 में उन्हें नवीन व्यावसायिक तकनीकों के लिए ‘किसान श्री’ से सम्मानित किया गया। 2020 में उन्हें कृषि और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए पद्मश्री से नवाजा गया। इसके अलावा उन्हें सरैया कृषि विज्ञान केंद्र के सलाहकार के रूप में भी चुना गया और उन्होंने कृषि वैज्ञानिक भर्ती बोर्ड के सदस्य के रूप में भी काम किया। केंद्र सरकार ने उनकी प्रेरक यात्रा पर एक वृत्तचित्र भी बनाया, जिसमें कृषि के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों और योगदान पर प्रकाश डाला गया। अपनी नवीन कृषि तकनीकों के साथ अपने समुदाय में महिलाओं को सशक्त बनाने के किसान चाची के जुनून ने साबित कर दिया है कि महिलाएं पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती हैं।</p>
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                                                            <category>प्रेरणास्रोत</category>
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                <pubDate>Tue, 21 Nov 2023 12:51:11 +0530</pubDate>
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